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  • पादप ऊतक | Plant Tissue | जाइलम, फ्लोएम, Phloyem, Xylem, Plant Tissues in Hindi

    पादप ऊतक | Plant Tissue | जाइलम, फ्लोएम, Phloyem, Xylem, Plant Tissues in Hindi

    इस आर्टिकल में जीवधारियों की बनावट के साथ उत्तक के बारे में विस्तृत रूप से जानेगें | पादप उत्तक क्या है उसके प्रकार क्या है इसके बारे में जानेगें | साथ ही स्थायी उत्तक (Permanent Tissue) और जटिल स्थायी उत्तक (Complex Permanent Tissue) को समझेगें | जाइलम क्या है ?, फ्लोएम क्या है ? जाइलम और फ्लोएम में क्या अंतर है ? विशिष्ट स्थायी उत्तक (Special Permanent Tissue) क्या है उसके प्रकार क्या है और वह पोधो के लिय किस प्रकार सहायक है ? रबरक्षीरी (Laticiferous glands) ग्रंथिया क्या होती है और किस प्रकार बनती है आदि के बारे में बात करेगे |

    उत्तक क्या है (What is Tissues)

    बहुकोशिकीय जीवों में विभिन्न शारीरिक कायों के सम्पादन हेतु समान उत्पत्ति, संरचना एवं कार्यो वाली कोशिकाओं का समूह संगठित होता है। कोशिकाओं का यह विशेष समूह जिसे ऊतक (tissue) कहते हैं, निश्चित कार्य हेतु जिम्मेदार होते हैं। ऊतक शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम विचट (Witchet) ने किया। जीव विज्ञान की वह शाखा, जिसमें ऊतकों का अध्ययन किया जाता है उसे औतिकी (Histology) कहते हैं।

    विभिन्न कोशिकाएँ मिलकर ऊतक बनते है। ऊतकों का समूह मिलकर अंग, अंगों का समूह अंगतन्त्र बनाता है और अगतन्त्र मिलकर जीव के जीवन प्रक्रिया को सुचारु रूप से चलाते हैं।

    बहुकोशिकीय जीवों का यह संगठन पादपों और प्राणियों में अलग-अलग प्रकार का होता है।

    जैसा कि हम जानते है कि पादप भी जीवित होते हैं, और जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ उनको भी होती हैं, जिनकी पूर्ति के लिए उनमें अनेक प्रकार के कार्य होते हैं। किंतु पादपों का शरीर और शरीर में होने वाली क्रियाएँ जंतुओं से पूर्णतः भिन्न होती हैं। अतः पादप ऊतक भी जंतु ऊतकों से भिन्न होते हैं जो अपने शरीर में होने वाली क्रिया-विधियों के लिए अनुकूलित होते हैं।

    जेवियर बिचैट (Xavier Bichat ) ने 1801 anatomy (शरीर रचना विज्ञान) के अध्ययन के दौरान ऊतक (Tissue) शब्द की शुरुआत की। बिचैट ने 21 प्रकार के प्राथमिक ऊतकों की पहचान की, जिनसे मानव शरीर के अंगों की रचना होती है ।

    पादप तथा जंतु ऊतक (Plant and Animal Tissues)

    विभज्योतक (Meristematic Tissue) – इनमें विभाजन की अपार क्षमता पाई जाती है।
    स्थायी ऊतक (Permanent Tissue) – ये विभाजन की क्षमता खो कर विभिन्न प्रकार के कार्यों को संपादित करते हैं।

    स्थायी ऊतक को पुनः उनकी संरचना की जटिलता के आधार पर दो प्रकारों में बाँटा जाता है-

    सरल स्थायी ऊतक (Simple Permanent Tissue)
    जटिल स्थायी ऊतक (Complex Permanent Tissue)

    सरल स्थायी ऊतकों को पुनः उनकी कोशिकाओं की प्रवृत्यिों एवं अंतराकोशिकीय अवकाश के आधार पर तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-

    पैरेनकाईमा (Parenchyma)
    कोलेनकाईमा (Cholenchyma)
    स्केलेरेनकाईमा (Schalerenchyma)

    इसी प्रकार जटिल स्थायी ऊतक भी उनके द्वारा संपादित कार्यों के आधार पर दो प्रकार के होते हैं-

    जाइलम (Xylem)
    फ्लोएम (Pholem)

    इसी प्रकार जंतु ऊतकों को भी मोटे तौर पर चार भागों में बाँटा जा सकता है-

    उपकला ऊतक (Epithelial Tissue)
    संयोजी ऊतक (Connective Tissue)
    पेशीय ऊतक (Muscular Tissue)
    तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue)

    पादप ऊतक (Plant Tissue) क्या है ?

    पादप ऊतक दो प्रकार के विभज्योत्तक ऊतक और स्थायी ऊतक होते है

    विभज्योत्तक ऊतक (Meristematic Tissue)

    इस ऊतक की कोशिकाओं में तीव्र गति से विभाजन (सूत्री विभाजन) होने की प्रवृत्ति होती है। यह ऊतक पौधों के वर्धी भागों, जैसे तने तथा जड़ों के अग्र सिरे (apical rogion) में पाए जाते हैं। यह ऊतक पौधों की लम्बाई एवं मोटाई बढ़ाने हेतु उत्तरदायी होते हैं। यह मुख्यतया तीन प्रकार के होते हैं:

    शीर्षस्थ अथवा अग्रही विभज्योत्तक (Apical Meristematic Tissue)

    यह ऊतक जड़ एवं तने के अग्र (शीर्ष) भाग तथा पत्तियों के कक्षों में स्थित कलिकाओं में ऊतक पाया जाता है। यह ऊतक मुख्य रूप से पौधों की लम्बाई में वृद्धि के लिए उत्तरदायी होते हैं। उदाहरण – प्ररोह शीर्ष तथा मूल शीर्ष

    पार्श्व विभज्योत्तक (Lateral Meristematic Tissue)

    ये ऊतक पौधों के तने एवं जड़ों के पार्श्व भागों में पाए जाते है, जो पौधों की मोटाई के लिए विशेष महत्व रखती है। इसी में जाइलम और फ्लोएम, जैसे संवहनी तन्त्र पाए जाते हैं। उदाहरण – संवहन कैम्बियम तथा कॉर्क कैम्बियम

    अन्तर्वेशी विभज्योत्तक (Intercalary Meristematic Tissue)

    ये ऊतक हमेशा पर्व सन्धि (nodes) पर पाए जाते हैं तथा इन ऊतकों के कारण पौधों की लम्बाई में वृद्धि होती है। ये वास्तव में शीर्षस्थ विभज्योत्तकों के अवशेष है, जो बीच में स्थायी ऊतकों के आ जाने के कारण अलग हो जाते हैं। शाकाहारी जन्तुओं द्वारा घासों के अग्र भाग खा लिए जाने पर, उसमें अन्तर्वेशी विभज्योत्तक के माध्यम से ही वृद्धि होती है।

    स्थायी ऊतक (Permanent Tissue)

    विभज्योत्तक ऊतक परिपक्व होने पर स्थायी ऊतकों में परिवर्तित हो जाती है। किन्तु स्थायी ऊतकों में विभाजन की क्षमता नहीं होती है। इन ऊतकों की कोशिकाएँ मृत अथवा जीवित, पतली या मोटी भित्ति वाली होती है। यह तीन प्रकार की होती हैं :

    साधारण स्थायी ऊतक (Simple Permanent Tissue)

    इस ऊतक की यही विशेषता होती है कि इसमें एक ही प्रकार की आकृति तथा एक ही तरह के कार्य करने वाली (homogeneous) कोशिकाओं का समूह होता है। ये तीन प्रकार के होते हैं :

    मृदूतक (Parenchyma)

    यह ऊतक पौधों के मुलायम भागों तथा विभिन अंगों (बाहरी त्वचा तथा फल के गूदे आदि) में पाए जाते हैं। इसका मुख्य कार्य खाद्य पदार्थों जैसे मण्ड, प्रोटीन तथा वसा का संग्रह करना है। कुछ पौधों जैसे नागफनी तथा यूफोरबिया के माँसल तनों तथा पत्तियों में जल संग्रह का कार्य करते हैं। यदि इनमें हरित लवण उपस्थित होता है तो यह प्रकाश-संश्लेषण करते हैं और क्लोरेनकाइमा कहलाते हैं।

    स्थूलकोणोत्तक (Collenchyma)

    यह ऊतक मृदूतक का ही रूपान्तरित रूप है तथा यह शाकीय पौधों की बाहरी त्वचा के नीचे और पत्तियों के पर्णवृन्तों में पाए जाते है। इसकी कोशिकाएँ जीवित, रिक्तिकायुक्त एवं कोशिकाद्रव्य युक्त होती है। इसकी कोशका भित्तियों के कोनों पर सेलुलोज तथा पेक्टिन के जमाव के कारण असमान रूप से मोटी होती है। इसका मुख्य कार्य पौधों को यान्त्रिक बल तथा लचीलापन प्रदान करने तथा हरितलवक की उपस्थिति में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया करना है ।

    दृढ़ोतक (Sclerenchyma)

    यह ऊतक मोटी कोशिका भित्ति तथा लिग्निन युक्त मृत (dead), लम्बी, संकरी तथा दोनों सिरों पर नुकीली होती है। यह ऊतक पौधों को यान्त्रिक दृढ़ता प्रदान करता है। इसकी कोशिका भित्ति में अनेक जगहों पर सेलुलोज का जमाव नहीं होता है चूँकि इन स्थानों पर जीवद्रव्य तन्तु होते हैं। ऐसे स्थान सरल गर्त (simple pits) कहलाते हैं। लिग्निन युक्त होने के कारण इसका तन्तु अत्यन्त ही दृढ़ होता है, जिसे स्क्लेरिड्स कहते हैं। अखरोट तथा नारियल की अन्तः फल भित्तियों में तथा लेग्युमिनोसी कुल के बीजों के बीजाकरण में यह ऊतक पाए जाते हैं।

    जटिल स्थायी ऊतक (Complex Permanent Tissue)

    इस प्रकार के ऊतक एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से बने होते हैं। इसे संवहन ऊतक भी कहा जाता है क्योंकि पादपों में यह संवहन का कार्य करते हैं। इसके अन्तर्गत जाइलम एवं फ्लोएम जैसे संवहनीय ऊतक आते हैं।

    1. जाइलम (Xylem) क्या है ?

    यह पतली एवं लम्बी नलिकाओं के रूप में पौधों की जड़ों से लेकर पत्तियों तक फैले होते हैं। ये जड़ों द्वारा अवशोषित जल एवं खनिज-लवणों को पत्तियों तक पहुँचाने का कार्य करता है तथा पौधों को दृढ़ता प्रदान करता है इसे प्रायः काष्ठ (wood) भी कहा जाता है। जाइलम को जटिल ऊतक इसलिए कहते हैं क्योंकि यह चार प्रकार की कोशिकाओं- वाहिनिकाओं (tracheids), वाहिकाओं (vessel), काष्ठ तन्तु (wood fibres) और काष्ठ मृदूतक (wood parenchyma) की बनी होती है।

    वाहिनिकाएँ एवं वाहिकाएँ मृत कोशिकाओं की बनी होती है। वाहिकाएँ टेरिडोफाइट्सजिम्नोस्पर्म में अनुपस्थित होती हैं।

    आवृतबीजियों में उपस्थित जल एवं खनिज लवणों के संवहन हेतु इसमें अनेक वाहिनिकाएँ एवं वाहिकाएँ होती है। जाइलम के अन्तर्गत आने वाले काष्ठ मृदूतक (जीवित व अधिक मात्रा में होती है) स्टार्च तथा वसीय पदार्थों का संचय तथा जल परिवहन में सहायता करते हैं। इसकी कोशिका भित्ति सख्त तथा लिग्निनयुक्त होती है, जो पौधों को अतिरिक्त यान्त्रिक दृढ़ता प्रदान करता है। सामूहिक रूप से इसे काष्ठ तन्तु (Xylem Fibre) कहते हैं।

    2. संवहन पूल (Vascular Bundle) क्या है ?

    संवहन पूल कैम्बियम सहित या कैम्बियम रहित जाइलम तथा फ्लोयम का बना होता है। कैम्बियम युक्त संवहन पूल खुले (open vascular bundle), जबकि कैम्बियम रहित संवहन पूल बन्द (closed vascular bundle) कहलाते हैं।

    • एण्डार्क (Endarch) सेन्ट्रीफ्यूगल जाइलम (जब प्रोटोजाइलम मध्य भाग की ओर तथा मेटाजाइलम बाहर की ओर होता है)।
    • एक्सार्क (Exarch) सेन्ट्रीपीटल जाइलम (जब प्रोटोजाइलम बाहर की तथा मेटाजाइलम केन्द्र की ओर होता है)।
    • संयुक्त संवहन पूल (Conjoint vascular bundle) जाइलम व फ्लोएम एक अर्द्धव्यास पर साथ-साथ पाए जाते हैं ।
    • संकेन्द्री (Concentric) एक प्रकार का संवहन ऊतक है, जो दूसरे प्रकार के संवहन ऊतक को घेरे रहता है।

    द्वितीयक वृद्धि

    जब पौधा छोटा होता है, तब उसमें ऊतक प्राथमिक विभज्योत्तक द्वारा बनते हैं अर्थात् इनके द्वारा निर्मित ऊतकों को प्राथमिक ऊतक कहते हैं।

    आयु बढ़ने के साथ द्विबीजपत्री पौधों में नई कोशिकाओं का निर्माण स्थायी मृदूतक द्वारा उत्पन्न नई विभज्योत्तक से होता है। ये नई कोशिकाएँ द्वितीयक ऊतक कहलाती हैं।

    इन्हीं द्वितीयक ऊतकों के कारण पौधे के अंगों की मोटाई में वृद्धि होती है, जिसे द्वितीयक वृद्धि कहते हैं।

    द्वितीयक वृद्धि एधा (cambium) एवं कॉर्क एधा (cork cambium) के कारण होती है। द्वितीयक वृद्धि केवल द्विबीजपत्री पादपों में ही पाई जाती है। इससे बनने वाले वार्षिक वलयों के आधार पर ही वृक्षों की आयु निर्धारित होती है।

    3. फ्लोएम (Phloem) क्या है ?

    प्रकाश-संश्लेषण में निर्मित भोज्य पदार्थ का पौधों के विभिन्न भागों में पहुँचाने का कार्य फ्लोएम संवहनीय ऊतक द्वारा संचालित होता है।

    यह चार प्रकार की कोशिकाएँ-चालनी नलिकाएँ (sieve tubes), सखि कोशिकाएँ (companion cells), फ्लोएम मृदूतक (phloem parenchyma) तथा फ्लोएम तन्तु (phloem fibres) से मिलकर बनता है।

    इनमें से चालनी नलिका में छिद्रित भित्ति मुख्य रूप से भोज्य पदार्थ के संवहन का कार्य करती है, जबकि अन्य शेष कोशिका उसे इस कार्य में सहायता करती है। फ्लोएम की नलिकाएँ जीवित कोशिकाएँ होती हैं तथा पौधों की यान्त्रिक दृढ़ता में विशेष योगदान नहीं करती है। चालनी नलिकाएँ परिपक्व अवस्था में अकेन्द्री (enucleate) हो जाती हैं। ये कोशिकाएँ अनावृतबीजी (gymnosperm) में अनुपस्थित होती हैं।

    जाइलम (Xylem) और फ्लोएम (Phloem) में क्या अंतर है ?

    1. जाइलम के ऊतक (Tissue) ट्यूबलर के आकार की संरचना के होते हैं, जिसमें क्रॉस दीवारों (Cross walls) की अनुपस्थिति होती है । यह ऊतक एक तारे के आकार जैसा दिखता है. वहीं फ्लोएम ऊतक ट्यूबलर के आकार के, लम्बें होते हैं, पतली छलनी नलिकाओं (Thin Sieve Tubes) के साथ दीवारों (Walls) की उपस्थिति के साथ संरचनाएं वाले ।

    2. जाइलम एक संवहनी ऊतक है जो पानी और विघटित खनिजों को जड़ से अवशोषित कर शेष पौधे तक पहुँचाता है और फ्लोएम एक संवहनी ऊतक है जो पौधे के हरे भागों से पौधे के बाकी हिस्सों में प्रकाश संश्लेषण के दौरान तैयार घुलनशील कार्बनिक यौगिकों को स्थानांतरित करता है।

    3. जाइलम मुख्य रूप से संवहनी बंडलों (Vascular Bundles) के केंद्र में स्थित होते हैं और फ्लोएम मुख्य रूप से संवहनी बंडलों की परिधि (Periphery) की ओर स्थानीयकृत होते हैं।

    4. जाइलेम के फाइबर छोटे होते हैं और फ्लोएम के फाइबर बड़े होते हैं ।

    5. जाइलेम जड़ों, स्टेम और पत्तियों में मौजूद होते हैं और फ्लोएम, स्टेम और पत्तियों में मौजूद होते हैं, जो बाद में जड़ों, फलों और बीजों में स्थानांतरित और विकसित होते हैं ।

    6. जाइलम का मूवमेंट एक ही दिशा में होता है यानी यूनीडायरेक्शनल (Unidirectional) ऊपर की ओर, वहीं फ्लोएम का द्विदिश यानी दोनों दिशा में (Bidirectional) मूवमेंट होता है (Up and Down) ।

    7. जाइलम में ट्रेकिड्स (Tracheids), Vessel Elements, जाइलम पैरेन्काइमा, और जाइलम फाइबर शामिल हैं । वहीं फ्लोएम में शामिल हैं: सह कोशिकाएं (Companion Cells), छलनी नलिकाएं (Sieve Tubes), बास्ट फाइबर (Bast Fibres), फ्लोएम फाइबर, और फ्लोएम पैरेन्काइमा ।

    8. जाइलम ऊतक की कोशिकाएं पैरेन्काइमा कोशिकाओं को छोड़कर मृत कोशिकाएं (Dead cells) होती हैं और फ्लोएम ऊतक की कोशिकाएं बास्ट फाइबर को छोड़कर जीवित कोशिकाएं होती हैं।

    9. जाइलम में कोशिकाओं की कोशिका भित्ति (Cell wall) मोटी होती है और फ्लोएम की कोशिकाओं की कोशिका भित्ति पतली होती है।

    10. लिग्नीफाइबड (Lignified) कोशिका भित्ति (Cell wall) जाइलम में मौजूद होती हैं और फ्लोएम में कोशिका भित्ति (Cell wall) लिग्नीफाइबड (Lignified) नहीं होती है।

    11. संवहनी बंडलों (Vascular Bundles) में जाइलम ऊतक की मात्रा फ्लोएम ऊतक से अधिक होती है यानी संवहनी ऊतक में फ्लोएम ऊतक की मात्रा तुलनात्मक रूप से कम होती है।

    12. जाइलम ऊतक के दो प्रकार के तत्वों अर्थात जाइलम वाहिकाओं (Xylem Vessels) और वाहिनिकाओं (Tracheid) से होकर ही जल एवं खनिजों को पौधों की जड़ों से उसकी पत्तियों तक पहुंचाया जाता है और फ्लोएम की जीवित कोशिकाएं ‘चालनी नलिकाएँ’ (Sieve Tubes) कहलाती हैं. फ्लोएम में कोशिकाओं की अंतिम भित्ति पर चालनी पट्टियाँ (sieve plates) पायी जाती हैं, जिनमें छोटे–छोटे छिद्र बने होते हैं।

    13. जाइलेम घुलनशील खनिज पोषक तत्वों और पानी के अणुओं को जड़ों से पौधे के अन्य हिस्सों तक पहुंचाता है और फ्लोएम भोजन और अन्य पोषक तत्वों सहित चीनी और अमीनो एसिड पत्तियों से भंडारण अंगों और पौधे के बढ़ते भागों तक पहुंचाता है।

    14. जाइलेम, पौधे को यांत्रिक शक्ति (Mechanical Strength) प्रदान करता है और स्टेम को मजबूत रहने में मदद करता है वहीं जड़ों, बल्ब (Bulbs) और Tubers जैसे अंगों के भंडारण के लिए पौधों के प्रकाश संश्लेषक क्षेत्रों द्वारा संश्लेषित शर्करा का परिसंचरण करता है।

    15. जाइलेम वाष्पशील (Transpiration) और प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के माध्यम से खोए हुए पानी के अणुओं की कुल मात्रा को पूरा करता है और पूरे पौधे में प्रोटीन और mRNAs के परिवहन के लिए जिम्मेदार है ।

    विशिष्ट स्थायी ऊतक (Special Permanent Tissue)

    बाह्य त्वचा (Epidermis) यह पादप देह की सबसे बाहर वाली पर्त है, जो मुख्यतया सुरक्षात्मक कार्य करती है। यह पादपों के सामान्य प्ररोहों (shoots) से वाष्पोत्सर्जन (transpiration) द्वारा अत्यधिक जल हानि से बचाव करती है। इसका कारण एपिडर्मिस की बाह्य सतह पर क्यूटिन अथवा सुबेरिन नामक कड़ा पदार्थ का जमा होना है, जो पौधों में वाष्पोत्सर्जन क्रिया में होने वाली जलहानि को कम करता है।

    स्टोमेटा (Stomata) शाखाओं की बाह्य त्वचा में छोटे-छोटे अति सूक्ष्म छिद्र होते हैं जिन्हें रन्ध्र कहते हैं, जो सेम या गुर्दे (kidneys) के आकार की बाह्य त्वचीय कोशिकाओं से घिरे होते हैं, जिन्हें द्वार कोशिकाएँ (guard cells) कहते हैं। द्वार कोशिकाएँ जीवित, हरितलवक युक्त तथा केन्द्रयुक्त होती हैं। द्वार कोशिकाएँ और आस-पास की बाह्य कोशिकाएँ मिलकर रन्ध्री समूह (Stomatal complex) बनाती है।

    बाह्य त्वचा के त्वचा रोम एककोशिकीय या बहुकोशिकीय शाखित या सरल होते हैं। यदि त्वचा रोम स्रावण का कार्य करते हैं, तो उन्हें ग्रन्थिल रोम कहते हैं, यह दो प्रकार की होती हैं

    बाह्य ग्रन्थियाँ बाह्य त्वचा पर उपस्थित दंशन रोम विषैले पदार्थ का स्रावण करते हैं, जैसे-बिच्छू पौधे मकरन्दकोष (nectaries), शर्करा जैसे पदार्थ मकरन्द का स्रावण करती है। कीटभक्षी पौधों की पाचक ग्रन्थियाँ प्रोटिओलिटिक एन्जाइम का स्रावण करती हैं।

    आन्तरिक ग्रन्थियाँ यह ऊतकों के अन्दर पाई जाती हैं। इसके अन्तर्गत नींबू तथा सन्तरे के फलों के छिलके में तेल ग्रन्थियाँ एवं पान की पत्तियों में श्लेष्मक स्रावी ग्रन्थियाँ, पाइनस में रेजिन एवं टेनिन का स्रावण करने वाली ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं। हाइडेथोड जल का स्रावण करने वाली ग्रन्थियाँ हैं।

    रबरक्षीरी (Laticiferous glands) ग्रन्थियाँ कोशिकाएँ लम्बी, पतली भित्ति युक्त, बहुकेन्द्री, गाढ़े तरल लैटेक्स से युक्त कुछ कोशिकाओं में रबरक्षीर भरी होती हैं। ये कोशिकाएँ पतली भित्ति युक्त शाखित तथा बहुकेन्द्रकी एवं स्वतन्त्र इकाइयों के रूप में जैसे यूफोरबिया, मदार तथा कनेर में रबरक्षीरी कोशिकाएँ होती हैं।

    पोस्त, रबड़ आदि में रबरक्षीरी वाहिकाएँ पाई जाती हैं, जो अनेक कोशिकाओं के मिलने तथा बीज की परतों के घुल जाने से बनती हैं।

    उत्तक से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य

    वास्तव में काष्ठ द्वितीयक जाइलम होता है, जो द्वितीयक वृद्धि के दौरान संवहन एधा की सक्रियता के फलस्वरूप बनता है।

    पौधों के तनों एवं जड़ों में द्वितीयक वृद्धि संवहन एधा तथा कॉर्क एथा की सक्रियता के फलस्वरूप होता है।

    द्वितीयक वृद्धि का आशय-पौधों के तनों या जड़ों में स्थायी पैरेन्काइमा ऊतकों द्वारा उत्पन्न नए विभज्योत्तक से है, जिसके फलस्वरूप पौधों की लम्बाई और मोटाई में वृद्धि होती है। यह वृद्धि सिर्फ द्विबीजपत्री पौधों में ही पाई जाती है, चूँकि ये उसी में ही पाए जाते हैं जबकि एकबीजपत्री पौधों में इसका अभाव होता है। कॉर्क मोटी भित्ति वाली मृत कोशिका होती है जो पौधों की तनों की परिधि पर एक पर्त के रूप में रहती है।

    कॉर्क ऊतकों के लिए सुरक्षा का काम करता है।

    व्यवसायिक रूप से कॉर्क का उत्पादन क्यूरकस सुबरनामक वृक्ष से होता है।

  • जन्तुओं में पोषण (Nutrition in Animals)  एवं जन्तुओं के पोषक पदार्थ (Nutritive Substance of Animals)

    जन्तुओं में पोषण (Nutrition in Animals) एवं जन्तुओं के पोषक पदार्थ (Nutritive Substance of Animals)

    इस आर्टिकल में हम जंतुओं के पोषण और पोषक पदार्थों के बारे में बात करेगें | जंतुओं के विकास के लिए कोनसे पोषक पदार्थ आवश्यक होते है ? जंतुओं के विकास के लिय पोषक पदार्थ क्यों जरूरी है ? जैविक क्रियाओं के लिय कोनसे पोषक पदार्थ जरूरी होते है और वो जीवों के कहा से प्राप्त होते है या उन पोषक पदार्थों का स्त्रोंत क्या है ? रासायनिक संगठन के आधार पर पोषक पदार्थों के कितने प्रकार है ?

    साथ ही इस आर्टिकल में हम जानेगे कि कार्बोहाइड्रेट्स क्या होते है ? वसा क्या है ? विटामिन क्या होते है ? प्रोटीन क्या होते है और इनका जीवों के शारीरिक विकास में किस प्रकार योगदान है ? खनिज लवण क्या होते है ? आदि

    जन्तुओं में पोषण (Nutrition in Animals) क्यों जरूरी है ?

    जन्तु अपने पोषण के लिए वनस्पतियों एवं अन्य जन्तुओं पर निर्भर होता है अर्थात् जन्तु उत्पादक न होकर उपभोक्ता होता है।

    जन्तु पोषण के दो प्रकार-प्राणिसम पोषण तथा अवशोषी पोषण हैं। प्राणिसम पोषण के अन्तर्गत जन्तु भोजन को अपने शरीर के अन्दर ले जाते हैं अर्थात् निगलते हैं। इसके बाद भोजन का पाचन एवं अवशोषण होता है। वहीं अवशोषी पोषण के अन्तर्गत भोजन का अन्तर्ग्रहण न होकर उसका अवशोषण होता है। उदाहरण फफूंदी में।

    जन्तुओं के पोषक पदार्थ (Nutritive Substance of Animals) कोनसे है ?

    भोज्य पदार्थों में निहित वे उपयोगी रासायनिक घटक, जिनका उपयुक्त मात्रा में उपलब्ध होना शरीर के विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए अति आवश्यक है, पोषक पदार्थ कहलाते हैं। रासायनिक संगठन के आधार पर पोषक पदार्थों को निम्न भागों में बाँटा गया है

    1. कार्बोहाइड्रेट्स

    2. वसा

    3. प्रोटीन

    4. विटामिन

    5. खनिज लवण

    6. जल

    इन पोषक तत्वों में से कार्बोहाइड्रेट तथा वसा ऊर्जा उत्पादन तथा प्रोटीन निर्माणकारी पदार्थ और विटामिन, खनिज लवण एवं जल उपापचयी नियन्त्रक हैं।

    कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates) क्या है ? कार्बोहाइड्रेट्स के प्रकार, स्त्रोत और कार्य

    यह कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का कार्बनिक यौगिक है, जिसका अनुपात क्रमश: 1 : 2 : 1 है यह पचने के उपरान्त ग्लूकोज में परिवर्तित हो जाते हैं। इसी ग्लूकोज के ऑक्सीकरण से र को ऊर्जा मिलती है। शरीर की कुल ऊर्जा का 50-79% मात्रा को पूर्ति कार्बोहाइड्रेट से ही होती है।

    1 ग्राम कार्बोहाइड्रेट के ऑक्सीकरण से 45 किलो कैलोरी ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

    इसका सामान्य सूत्र (CH2O)n होता है। खाद्य पदार्थों में ये शर्करा, स्टार्च एवं सेलुलोज के रूप में पाए जाते हैं। कुछ कार्बोहाइड्रेट जल में घुलनशील होती है, जैसे शकंरा, जो स्वाद में मीठा होता है, जबकि स्टार्च (मण्ड) एवं सेलुलोज अघुलनशील कार्बोहाइड्रेट के प्रमुख उदाहरण हैं।

    पोषण के अन्तर्गत शर्करा ग्लूकोज के रूप में बदल जाता है, जिसका भण्डारण ग्लाइकोजन के रूप में होता है। ग्लूकोज से ग्लाइकोजन बनने की क्रिया ग्लाइकोजेनेसिस कहलाती है।

    सेलुलोज क्या है ?

    यह पौधे की कोशिका मित्ति में पाए जाते हैं।

    कपास एवं कागज शुद्ध सेलुलोज होते हैं।

    यह ग्लूकोस का बहुलक है।

    पशु, जैसे-गाय, भैंस, बकरी आदि में सेलुलोज का पाचन होता है, परन्तु मनुष्य में इसका पाचन नहीं होता।

    कार्बोहाइड्रेट के प्रकार (Types of Carbohydrate) क्या है ?

    रासायनिक संरचना के आधार पर इसे तीन श्रेणियों में बाटां गया है।

    मोनोसैकेराइड्स (Monosaccharides)

    इसमें कार्बोहाइड्रेट की एक ही इकाई होती है।

    यह सभी कार्बोहाइड्रेट की सबसे सरल अवस्था होती है।

    ये जल में घुलनशील तथा मीठो होती है। .

    ग्लूकोज और फ्रक्टोस पौधों में सामान्य रूप से पाया जाने वाला मोनोसैकेराइड्स है।

    इनमें से ग्लूकोज प्रकाश-संश्लेषण का मुख्य उत्पाद है तथा इससे ऊर्जा उपलब्ध होते हैं, जबकि फ्रक्टोस फलों में पाए जाते हैं।

    ग्लूकोज सबसे महत्वपूर्ण मोनोसैकेराइड्स है, जो फलों में मुख्यतया अंगूर और शहद में मिलता है। फ्रक्टोस शरीर के अन्दर ग्लाइकोजन में परिवर्तित हो जाती है।

    शरीर में पहुंचे सभी कार्बोहाइड्रेट्स सर्वप्रथम ग्लूकोज में जल अपघटित होते हैं।

    ऑलिगोसैकेराइड्स (Oligosaccharides)

    ये मोनोसैकेराइड्स के 2-10 अणुओं से मिलकर बनता है, जैसे

    ग्लूकोस + ग्लूकोस = माल्टोस

    ग्लूकोस + फ्रक्टोस = सुक्रोस

    ग्लूकोस + ग्लैक्टोस = लैक्टोस

    सुक्रोस, माल्टोस और लैक्टोस प्रमुख डाइसैकेराइड्स हैं।

    सुक्रोस गन्ना, चुकन्दर, गाजर तथा मीठे फलों में पाया जाता है।

    माल्टोस स्वतन्त्र रूप से नहीं वरन् बीजों की (मुख्यतया जौ) शर्करा अर्थात् माल्ट शुगर होती है।

    पॉलीसैकेराइड्स (Polysaccharides)

    ये जल में अघुलनशील होते हैं, जो अनेक मोनोसैकेराइड्स अणुओं के मिलने से बनता है।

    ये पौधों में मुख्य रूप से सेलुलोज में पाए जाते हैं।

    आवश्यकता पड़ने पर यह जल-अपघटन (hydrolysis) द्वारा ग्लूकोस में बदल जाता है। इस रूप में यह ऊर्जा उत्पादन हेतु संग्रहित ईंधन का कार्य करता है।

    पॉलीसैकेराइड के प्रमुख उदाहरण

    मण्ड या स्टार्च सभी प्रकार के अनाजों, सब्जियों, विशेषकर आलू, शकरकन्द आदि में मिलता है।

    ग्लाइकोजन जन्तु के शरीर में संचित अवस्था में रहता है और आवश्यकता पड़ने पर इसका उपयोग होता है।

    काइटिन आर्थोपोडा संघ के जन्तुओं के बाहा कंकाल का निर्माण।

    सेलुलोज पौधों की कोशिका भित्ति का निर्माण करती है।

    कार्बोहाइड्रेटस के कार्य कोनसे है ?

    यह शरीर को ऊर्जा प्रदान करने वाले मुख्य स्रोत होते हैं।

    ये मण्ड के रूप में ‘संचित ईंधन’ का कार्य करते हैं।

    यह वसा में बदलकर ‘संचित भोजन’ का कार्य करते हैं।

    यह DNA और RNA के घटक पेन्टोज शर्करा होता है।

    प्रोटीन को शरीर के निर्माणकारक कार्यों हेतु सुरक्षित रखते हैं

    शरीर में वसा के उपयोग हेतु यह अत्यन्त ही आवश्यक है।

    वसा (Fats) क्या है ? वसा के स्त्रोत, प्रकार और कार्य

    ये कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के असंतृप्त यौगिक होते हैं किन्तु रासायनिक रूप से कार्बोहाइड्रेट से भिन्न होती है।

    इसमें कार्बोहाइड्रेट्स की तुलना में ऑक्सीजन की बहुत कम मात्रा होती है। ये पानी में अघुलनशील परन्तु क्लोरोफॉर्म, बेन्जीन, पेट्रोलियम आदि कार्बनिक विलायकों में घुलनशील होती है। क्षार द्वारा इसका पायसीकरण किया जा सकता है।

    वसा एक अणु ग्लिसरॉल तथा वसा अम्ल (fatty acid) के तीन अणुओं के एस्टर बन्ध द्वारा बनते हैं इसलिए इन्हें ट्राइग्लिसराइड्स कहते हैं।

    शरीर की कुल ऊर्जा का 20-30% ऊर्जा वसा से प्राप्त होती है, जबकि एक ग्राम वसा के पूर्ण ऑवसीकरण से 9.3 किलो कैलोरी ऊर्जा मुक्त होती है। वसा का संचय विशिष्ट वसीय ऊतक (adipose tissues) में होता है। 20°C पर वसा तेल कहलाते हैं।

    वसा के प्रकार (Type of Fats) कोनसे है ?

    रासायनिक दृष्टि से वसा मुख्यतया तीन प्रकार की होती हैं-1. सरल वसा 2. संयुक्त वसा 3. व्युत्पन्न वसा।

    सरल वसा (Simple Fats)

    सरल वसा में केवल ग्लिसरॉल व वसा अम्ल एस्टर बन्ध द्वारा संयुक्त होते हैं।

    संयुक्त वसा (Complex Fats)

    इन वसाओं में अम्ल तथा एल्कोहॉल के साथ-साथ नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस भी होते हैं। इन्हें जटिल लिपिड्स (compler lipids) भी कहा जाता है।

    ये मुख्यतया दो प्रकार के होते हैं – फॉस्फोलिपिड और ग्लाइकोलिपिडा

    इनमें से फॉस्फोलिपिड में फॉस्फोरस का अंश होता है, जो पित्त, यकृत एवं पेशियों में संचित होती है। परन्तु ग्लाइकोलिपिड तत्रिका तत्र के ऊतक में पाई जाती है।

    व्युत्पन्न वसा (Derived Fats)

    ये संयुक्त वसाओं के जल अपघटन से बनती हैं, जैसे-स्टीरॉयड (लिंग हॉर्मोन, पित्त अम्ल), स्टीरॉल (कोलेस्ट्रॉल, विटामिन-D), प्रोस्टाग्लैन्डिन वसा अम्ल व्युत्पन्न है, जो अरेखित पेशियों के संकुचन, रुधिर स्कन्दन, शोघ तथा एलर्जी प्रतिक्रियाओं में भाग लेते हैं।

    वानस्पतिक वसा (Plant Fats)

    यह प्रकृति के मुख्य रूप से वनस्पतियों, फलों तथा बीजों में पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है।

    जन्तुओं में वसा ऊतक, यकृत तथा अस्थि मज्जा में संचित रहती है। वसा अम्ल दो प्रकार के होते हैं

    संतृप्त वसा और असंतृप्त वसा अम्ला अधिकतर संतृप्त वसा जन्तु वसा होता है।

    सामान्य ताप पर यह ठोस होता है, जैसे-मक्खन परन्तु नारियल का तेल एवं ताड़ का तेल ही संतृप्त वनस्पति तेल के उदाहरण हैं, जबकि असंतृप्त वसा मछली के तेल एवं वनस्पति तेलों में मिलते हैं।

    वसा के प्रमुख कार्य

    यह ठोस रूप में शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है।

    यह त्वचा के नीचे जमा होकर शरीर के ताप को बाहर नहीं निकलने देती है।

    शरीर के विभिन्न अंगों की चोवें से बचाती है। – आरक्षित भोजन के रूप में।

    प्लाज्मा झिल्ली के निर्माण में सहायक होती है।

    प्रोटीन (Protein) क्या है ? प्रोटीन के प्रकार, स्त्रोत एवं कार्य

    यह एक जटिल कार्बनिक यौगिक होता है। प्रोटीन शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1938 में वरजेलियस ने किया। शरीर की वृद्धि एवं ऊतकों के टूट-फूट की मरम्मत में प्रोटीन की भूमिका अहम होती है।

    इसके अलावा शरीर में विभिन्न रासायनिक क्रियाओं के लिए उत्प्रेरक के रूप में विभिन्न एन्जाइम की भूमिका होती है, जो प्रोटीन ही होता है। प्रोटीन अमीनो अम्लों के बहुलक होते हैं इनमें लगभग 20 प्रकार के अमीना अम्ल पाए जाते हैं।

    मानव शरीर में इनमें से 10 प्रकार के अमीनो अम्ल का संश्लेषण शरीर में स्वयं होता है, जबकि शेष 10 प्रकार के अमीनो अम्ल भोजन के द्वारा प्राप्त करते हैं।

    कुछ आवश्यक प्रोटीन के प्रकार

    शारीरिक प्रोटीन कार्य एन्जाइम्स जैव उत्प्रेरक, जैव-रासायनिक अभिक्रियाओं में सहायक हैं। हॉर्मोन्स शरीर की क्रियाओं का नियनन करते हैं।

    परिवहन प्रोटीन हीमोग्लोबिन, विभिन्न पदार्थों का परिवहन करती है। संरचनात्मक प्रोटीन कोशिका एवं ऊतक निर्माण करती है।

    रक्षात्मक प्रोटीन संक्रमण से रक्षा करने में सहायक है। उदाहरण-प्रतिरक्षी। संकुचन प्रोटीन ये पेशी संकुचन एवं चलन हेतु उत्तरदायी है, उदाहरण-मायोसिन, एक्टिन आदि।

    प्रोटीन के कार्य

    यह शरीर की वृद्धि तथा ऊतकों की मरम्मत करता है।

    यह एन्जाइम तथा विटामिन का निर्माण करता है। – प्रोटीन श्वसन अंगों के निर्माण में भाग लेता है।

    यह संयोजी ऊतकों, अस्थियों तथा उपास्थियों के निर्माण में भाग लेता है।

    प्रोटीन की कमी से मैरेस्मस नामक रोग हो जाता है।

    विटामिन (Vitamins) क्या है ? विटामिन (Vitamins) के प्रकार, स्त्रोत और उपयोग

    कैसिमिर फूंक ने इस शब्द का प्रतिपादन किया। यह स्वयं ऊर्जा उत्पादन तो नहीं कर सकता परन्तु ऊर्जा सम्बन्धी रासायनिक क्रियाओं को नियन्त्रित करता है।

    हमारा शरीर विटामिन – D एवं K का संश्लेषण कर सकता है, जबकि अन्य विटामिन बाह्य स्रोत (भोजन) से प्राप्त किए जाते हैं।

    इनका नामकरण अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षरों के अनुसार किया गया है; जैसे-A, B, C, D, E एवं KI

    विलेयता के आधार पर विटामिनों को दो वर्गों में बाँटा गया है।

    1. जल में घुलनशील विटामिन – विटामिन-B समूह और विटामिन-C

    2. वसा में घुलनशील विटामिन – विटामिन- A, D, E एवं KI

    विटामिनों के स्रोत, कार्य एवं कमी के प्रभाव

    खनिज लवण (Minerals)

    खनिज लवण (Minerals) भोजन के अकार्बनिक अवयव है, जो शरीर के उपापचयी क्रिया को नियन्त्रित करते हैं। यह शरीर के ऊतकों के निर्माण के लिए कच्चा पदार्थ है और एन्जाइम तथा विटामिन के आवश्यक अंग है।

    खनिज पदार्थ के मुख्य स्त्रोत और कार्य

    सन्तुलित भोजन (Balanced Diet) क्या है ?

    वह भोजन, जिसमें सभी पोषक तत्त्व उचित अनुपात में सम्मिलित होते हैं सन्तुलित भोजन कहलाते हैं। इसका निर्धारण प्रत्येक व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और कार्य के अनुरूप होता है।

    पोषक तत्त्वों के स्रोत : एक दृष्टि में

    पोषक पदार्थस्रोत
    कार्बोहाइड्रेटचीनी, शहद, दूध, अनाज, आलू आदि
    प्रोटीनअण्डा, दूध, पनीर, दाल, मछली आदि
    वसाघी, तेल, दूध, मांस आदि
    विटामिनमांस, मछली, दूध, गाजर, हरी सब्जी आदि
    खनिज लवणमांस, दूध, अनाज, हरी सब्जी आदि

    कुपोषण (Malnutrition) क्या है ?

    भोजन की आवश्यक मात्रा तथा आवश्यक तत्त्वों का समावेश न होना कुपोषण की स्थिति पैदा करती है। सामान्यतया कुपोषण की स्थिति प्रोटीन की कमी के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती है, जिसके कारण शरीर के वृद्धि एवं विकास में बाधा उत्पन्न होती है।

    अपोषण (Under-nutrition)

    इसका आशय भोजन में आवश्यक तत्त्वों का सर्वथा अभाव होना है, जिसके परिणामस्वरूप शरीर की आवश्यकता की पूर्ति नहीं हो पाती है।

    पोषण की अधिकता के परिणाम

    संतृप्त वसा की अधिकता से रुधिर में कॉलेस्टरॉल को मात्रा बढ़ जाती है, जो रुधिर वाहिनियों की दीवार पर जम जाती है। फलत: रुधिर को गति कम हो जाती है एवं रुधिर दाब बढ़ जाता है एवं हृदय सम्बन्धी रोग हो जाते हैं।

    अधिक कैलोरी वाले भोजन, जैसे-घी, शक्कर आदि के सेवन से मोटापा तथा डायबिटीज की समस्या आती है।

  • जैव विकास तथा जैव विकास के सिद्धांत (Bio Evolution and theories of Bio Evolution)

    जैव विकास तथा जैव विकास के सिद्धांत (Bio Evolution and theories of Bio Evolution)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की जैव विकास ((Bio evolution) क्या है ? जैव विकास के प्रमुख सिद्धांत (theories of Bio evolution) क्या है ? जीवन का विकास क्या है ? जैव विकास के संबंधित प्रमुख परिकल्पनाएँ कोन – कोनसी है ? जैव विकास के प्रमुख आधार क्या है ? जैव विकास की विशेषताएं क्या है ? आनुवंशिकता एवं जैव विकास के बीच संबंध क्या है ? आदि

    जीवन की उत्पत्ति (Origin of Life) और जैव विकास (Bio evolution)

    जैव विकास एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में होने वाला आनुवंशिक (Genetic) परिवर्तन है। पृथ्वी के प्रारंभ से ही निम्नकोटि के जीवों का क्रमिक परिवर्तनों द्वारा निरंतर अधिकाधिक जटिल जीवों की उत्पत्ति वास्तविक रूप से जैव विकास ही है। जैव विकास के अनुसार पृथ्वी पर पहले की पूर्वज जातियों के जैव विकास के द्वारा ही, नई-नई जातियां उत्पन्न हुई और हो रही हैं। 

    पृथ्वी का उद्गम लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व हुआ, जबकि इस पर जीवन की उत्पत्ति लगभग 3.5 – 4 अरब वर्ष पूर्व हुई। जीवन की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कई विचार धाराएं प्रचलित हैं, अरस्तू द्वारा प्रतिपादित स्वत:जनन के सिद्धान्त के अनुसार, निम्न वर्ग के जीवधारी निर्जीव पदार्थों से स्वतः पैदा हो जाते हैं।

    17 वीं शताब्दी के दौरान फ्रांसिस्को रेड्डी ने दो अलग-अलग बर्तनों, जिनमें एक खुला तथा दूसरा बन्द उसमें मांस का नमूना रखा। इस परीक्षण के निष्कर्ष में खुले बर्तन वाले मांस में कीड़े दिखाई दिए, जवकि बन्द बर्तन में नहीं। इससे अरस्तू के जीवन की स्वत: उत्पत्ति सिद्धान्त कमजोर पड़ा फिर लुई पाश्चर के प्रयोग से स्वत: जनन सिद्धान्त धराशायी हो गया। जीवन की उत्पत्ति के सम्बन्ध में ओपेरिन एवं हेल्डेन द्वारा आधुनिक सिद्धान्त, प्रकृतिवाद या जैव-रसायन विकास (Bio-chemical evolution) सिदान्त  प्रतिपादित किया गया।

    ओपेरिन ने 1936 में अपनी पुस्तक द ऑरिजिन ऑफ लाइफ (The Origin of Life) में इस सिद्धान्त का विस्तारपूर्वक वर्णन किया,  जिसके अनुसार आदिकाल में हाइड्रोजन गैस अधिक मात्रा में होने के कारण पृथ्वी का वायुमण्डल अपचायक था तथा इसमें ऑक्सीजन अनुपस्थित थी। तापमान कम होने पर हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, कार्बन आदि परमाणुओं के आपस में संयोग से इसके अणु बने। इस प्रक्रम में पहले जटिल कार्बनिक यौगिक तथा कोएसरवेट एवं न्यूक्लियोप्रोटीन्स का निर्माण हुआ।

    स्टैनले मिलर अपने विख्यात प्रयोग में उसने पृथ्वी के प्रारम्भिक वायुमण्डल जैसी स्थितियों को पैदा करते हुए एवं बन्द फ्लास्क (स्वान आकार के) में विद्युत धारा को अमोनिया, मीथेन, हाइड्रोजन और वाष्प के मिश्रण में से गुजारकर कार्बोहाइड्रेड एवं अमीनो अम्लों का मिश्रण प्राप्त किया। इन पदार्थों में अभिक्रिया के परिणास्वरूप पॉलीसैकेराइड, प्रोटीन, लिपिड एवं न्यूक्लिक अम्ल बने।

    न्यूक्लिक अम्ल में अभिक्रिया कर स्वप्रतिकृतियन की क्षमता थी। इनके विकास से निर्जीव एवं सजीव के बीच की एक सीमा निर्धारित हो गई और आगे चलकर प्रारम्भिक कोशिकाएँ, संश्लेषण वृद्धि तथा परिवर्धन करने लगी, जिसकी परिणति पोषण-विधियों के विकास के साथ सम्पन्न हुई। परजीविता, मृतजीविता, प्राणो सदृश पोषण विधियों के पश्चात् स्वपोषी पोषण विधि का भी विकास हुआ। ये स्वपोषी जीव दो प्रकार के रसायन-संश्लेषी तथा प्रकाश-संश्लेषी थे। इसकी अन्तिम कड़ी के रूप में वायुमण्डल का निर्माण हुआ तथा ऑक्सीजन की उपस्थिति से यह काफी महत्वपूर्ण हो गया।

    जैविक विकास (Biological Evolution) क्या है ?

    जीवन की उत्पत्ति आदिसागर के जल में न्यूक्लियोप्रोटीन्स के विषाणु, जैसे कणों के रूप में, आज से लगभग 3.7 अरब वर्ष पूर्व, पृथ्वी के इतिहास के प्रीकैम्ब्रियन महाकल्प में हुई और ये प्रारम्भिक जीव परपोषी एवं अवायवीय थे। इनकी कोशिका आज के विषाणु तथा माइकोप्लाज्मा के समान थी। कुछ समय संग्राहक का रूप ले लिया तथा आनुवंशिक कोड के बाद कोशिका के DNA ने आनुवंशिक सूचनाओं के द्वारा RNA एवं प्रोटीन-संश्लेषण से जुड़ गया।

    ऐसा माना जाता है कि प्रारम्भिक जीव रसायनी परपोषी थे, जो जटिल कार्बनिक पदार्थों के किण्वन से ऊर्जा प्राप्त करते थे। तदन्तर पर्णहरिम के विकास से प्रकाश-स्वपोषी जीवों का विकास हुआ। प्रारम्भिक प्रकाश-स्वपोषी-जीव-अवायवीय थे जो 3.5 अरब पूर्व वायवीय प्रकाश-स्वपोषी जीवों में रूपान्तरित हो गए।

    लिन मारगुलिस के अनुसार, कुछ अवायवीय परभक्षी के कोशिकाओं ने प्रारम्भिक वायवीय जीवाणुओं का भक्षण किया और प्रथम यूकैरियोटिक कोशिका बन गई। परभक्षी कोशिका, जिसने वायवीय जीवाणु तथा प्रकाश-संश्लेषी नीली-हरी शैवाल कोशिका का भक्षण किया। वह यूकैरियोटिक पादप कोशिका बन गई अर्थात् वायवीय जीवाणु माइटोकॉण्ड्रिया तथा नीले-हरे शैवाल हरितलवक के रूप में स्थापित हो गए।

    जैव विकास के सिद्धान्त (Theories of Organic Evolution)

    जैव विकास एक विकासीय घटना है, जो क्रमिक एवं सतत् प्रक्रिया के अनुरूप सरल से जटिल जीवों की ओर होती है। जीवन की उत्पत्ति से संबंधित सबसे प्राचीन परिकल्पना, स्वतः उत्पादन की है, जबकि आधुनिक परिकल्पना प्रकृतिवाद की है। 

    इसके अन्तर्गत उपार्जित लक्षणों की वंशागति पर आधारित लैमार्कवाद, प्राकृतिक चयन सिद्धान्त पर आधारित डार्विनवाद तथा उत्परिवर्तन पर आधारित ह्यूगो डी व्रीज का सिद्धान्त प्रमुख रूप से शामिल है।

    लैमार्कवाद (Lamarckism) क्या है ?

    फ्रांसीसी वैज्ञानिक जीन बैप्टिस्ट डी लैमार्क ने 1809 ई. में फिलोसफी जूलोजिक (Philosophie Zoologique) नामक प्रसिद्ध पुस्तक में उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धान्त प्रस्तुत किया।

    इस सिद्धान्त के अनुसार, प्रत्येक जीव अपने जीवन काल में जिस वातावरण में रहता है, उसके प्रभाव से अनेक लक्षण उपार्जित करता है। यही उपार्जित लक्षण उसकी सन्तानों में पहुँच जाते हैं तथा धीरे-धीरे नई जाति (new species) बन जाती है। इस सिद्धान्त के अनुसार, जिस अंग का लगातार प्रयोग होता है वह धीरे-धीरे आकार में बढ़ जाता है तथा जिस अंग का प्रयोग नहीं होता है या काफी कम होता है उसका क्रमशः ह्यस होता जाता है तथा अन्त में वह समाप्त हो जाता है; जैसे-अवशेषी अंग।

    लैमार्क का सिद्धान्त मूलतः चार अवधारणाओं पर आधारित है, जो इस प्रकार हैं:

    बड़े होने की प्रवृति

    वातावरण का सीधा प्रभाव

    अंगों के उपयोग एवं उसके अनुप्रयोग का प्रभाव

    उपार्जित लक्षणों की वंशागति

    लैमार्क के अनुसार, वर्तमान जिराफों के पूर्वज छोटी गर्दन एवं छोटी टाँगों वाले थे तथा वृक्षों की पत्तियाँ खाते थे, जिसके लिए उसे गर्दन ऊपर करनी पड़ती थी। ऊँचे वृक्षों की पत्तियाँ खाने के प्रयास में जिराफ की गर्दन एवं अगली टाँगें लम्बी हो गईं। अत: इस आधार पर किसी अंग के सक्रियता से उस अंग का विकास होता है। अंगों के कम उपयोग का उदाहरण लैमार्क ने साँपों में दिया, जिनके पैर गायब हो गए।

    लैमार्कवाद की सबसे अधिक आलोचना जर्मन वैज्ञानिक वीजमान ने की, जिन्होंने अपने प्रयोग में 21 पीढ़ियों तक चूहों की पूँछ काटकर आपस में प्रजनन करवाया, परन्तु किसी भी पीढ़ी में पूंछ विहीन चूहे उत्पन्न नहीं हुए। इससे प्रमाणित होता है कि वातावरण से प्राप्त उपार्जित लक्षणों की वंशागति नहीं होती है। वीजमान ने जननद्रव्य की निरन्तरता का सिद्धान्त प्रतिपादित किया।

    जैव विकास के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

    * पेलिओजोइक महाकल्प को प्राचीन जीवन का उद्भव काल भी कहते हैं।

    * डेवोनियन कल्प को मछलियों का युग भी कहा जाता है।

    * कार्बोनिफेरस कल्प को उभयचरों का युग कहा जाता है।

    * मीसोजोइक महाकल्प को सरीसृपों का युग भी कहा जाता है।

    * सीनोजोइक महाकल्प को स्तनधारियों का युग भी कहा जाता है।

    * प्लीस्टोसीन युग को मानव युग कहा जाता है।

    डार्विनवाद (Darwinism) क्या है ?

    चार्ल्स डार्विन के जैव विकास के सम्बन्ध में विचार विस्तारपूर्वक उनकी पुस्तक ‘ओरिजिन ऑफ स्पीशीज बाइ नेचुरल सेलेक्शन’ (प्राकृतिक चयन द्वारा जातियों का विकास) में सन् 1859 में प्रकाशित हुए।

    डार्विनवाद के मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं:

    जीवों में सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता प्रत्येक जीव जाति में सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता होती है। उदाहरण के लिए, फल-मक्खी (ड्रोसोफिला) एक बार में 200 अण्डे देती हैं, जिससे 10-14 दिनों में वह मक्खियाँ बन जाती हैं। यदि सभी अण्डों से उत्पन्न मक्खियाँ जीवित रहें एवं जनन करें, तो 40-45 दिनों में इसकी संख्या लगभग 20 करोड़ हो जाएगी।

    जीवन संघर्ष सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता के बावजूद प्रकृति में प्रत्येक जाति के जीवधारियों की संख्या लगभग स्थिर रहती है। इसका कारण यह है कि जीवधारियों को अपने अस्तित्व को बनाए रखने, वृद्धि करने एवं जनन करने के लिए भोजन, प्रकाश, वास-स्थान, जनन के लिए साथी आदि की आवश्यकता होती है। परन्तु ये सब प्रकृति में सीमित हैं। अर्थात् जीवधारियों को पैदा होते ही इनके लिए संघर्ष करना पड़ता है।

    जैव विकास के बारे में डार्विन की व्याख्या का आधार एच एम एस बीगल नामक जहाज पर की गई समुद्री यात्रा के समय का प्राकृतिक अवलोकन एवं माल्थस का जनसंख्या सिद्धान्त था।

    अपनी यात्रा के दौरान डार्विन ने गैलापैगोज द्वीप समूह पर 20 प्रकार की चिड़ियाएँ देखीं। बाद ये चिड़ियाएँ डार्विन की फिन्चिस के नाम से प्रसिद्ध हुई।

    विभिन्नताएँ एवं उनकी वंशागति संसार में सभी जीवधारियों में विभिन्नताएँ पाई जाती हैं। एक ही माता-पिता की सन्तानें भी बिल्कुल एक जैसी नहीं होती हैं। विभिन्नताएँ केवल रंग रूप में ही नहीं बल्कि विभिन्न लक्षणों के लिए हो सकती हैं, जैसे-दौड़ने की शक्ति, रोगों से लड़ने की शक्ति, कार्य क्षमता आदि, जो भिन्नताएँ किसी जीवधारी का अस्तित्व बनाए रखने में सहयोगी होती हैं, ये लाभदायक विभिन्नताएँ अगली पीढ़ियों में पहुँचती हैं।

    योग्यतम की उत्तरजीविता व प्राकृतिक चयन जीवन संघर्ष में वही जीवधारी सफल होते है, जिनमें परिस्थितियों के अनुकूल विभिन्नताएँ होती है और जनन करके जनसंख्या में वृद्धि करते हैं। अधिक-से-अधिक अनुकूल लक्षणों वाले जीवधारियों (योग्यतम) का एक प्रकार से प्रकृति द्वारा चयन होता है। इसी को योग्यतम की उत्तरजीविता या प्राकृतिक चयन (Natural Selection) कहते हैं, जिसे हरबर्ट स्पेन्सर ने सामाजिक विकास के सन्दर्भ में योग्यतम की अतिजीविता (Survival of the Fittest) कहा।

    नई जातियों की उत्पत्ति वातावरण या परिस्थितियाँ निरन्तर बदलती रहती हैं। फलस्वरूप निरन्तर नए लक्षणों का प्राकृतिक चयन होता रहता है। उपयोगी विभिन्नताएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी इकट्ठी होती रहती हैं और काफी समय बाद (सैकड़ों-हजारों वर्षों बाद) उत्पन्न जीवधारियों के लक्षण मूल जीवधारियों से इतने भिन्न हो जाते हैं कि एक नई जाति बन जाती है।

    विभिन्नताओं के कारण, उत्पत्ति तथा आनुवंशिकता की व्याख्या न होने, अवशेषी अंगों की उपस्थिति न होने आदि के कारण डार्विनवाद की आलोचना की गई।

    नव-डार्विनवाद क्या है ?

    नव-डार्विनवाद के अनुसार लैंगिक जनन करने वाले जीवों की सन्तानों में उत्परिवर्तन के कारण विभिन्नताएँ होती हैं। प्रकृति इनमें से लाभदायक विभिन्नताओं का चयन करती है। एक जाति के विभिन्न समूहों के प्रजनन काल भिन्न होने के कारण लैंगिक पृथक्करण हो जाता है, जिसके फलस्वरूप नयी जातियों का विकास होता है। पेपर्ड मॉथ की ग्रे किस्म का औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् काली किस्म में रूपान्तरित होना प्राकृतिक चयन का उदाहरण है।

    ह्यूगो डी व्रीज का उत्परिवर्तन वाद  (Mutation Theory of Hugo de Vries)

    ह्यूगो डी वीज नामक वैज्ञानिक ने 1901 ई. में इवनिंग प्रिमरोज (ऑइनोथेरा लैमार्कियाना) में उत्परिवर्तन (mutation) की खोज की और उत्परिवर्तन सिद्धान्त दिया, जिसके अनुसार नई जाति की उत्पत्ति अचानक एक ही बार में होने वाली स्पष्ट एवं स्थायी (वंशागत) आकस्मिक परिवर्तनों (उत्परिवर्तनों) के कारण होती है।

    उत्परिवर्तन वाद सिदांत की प्रमुख विशेषताएं

    नई जातियों की उत्पत्ति एक ही बार में स्पष्ट एव स्थायी (वंशागत) आकस्मिक परिवर्तनों (उत्परिवर्तनों) के परिणामस्वरूप होती है, न कि छोटी-छोटी व अस्थिर विभिन्नताओं के प्राकृतिक चयन द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचय व क्रमिक विकास के फलस्वरूप है।

    सभी जीवधारियों में उत्परिवर्तन की प्राकृतिक प्रवृत्ति होती है, जो कभी कम या अधिक या लुप्त हो सकती है।

    उत्परिवर्तन अनिश्चित होते हैं। ये किसी एक अंग विशेष में अथवा अनेक अंगों में एक साथ ठत्पन्न हो सकते हैं। परिणामस्वरूप अंग अचानक लुप्त या अधिक विकसित हो सकते हैं।

    एक ही जाति के विभिन्न सदस्यों में विभिन्न प्रकार के उत्परिवर्तन हो सकते हैं।

    उपरोक्त उप्परिवर्तनों के परिणामस्वरूप अचानक ऐसे जीवधारी उत्पन्न हो सकते हैं, जो जनक से इतने अधिक भिन्न हों कि उन्हें नई जाति माना जा सके।

    प्रकृति में स्वयं होने वाले उत्परिवर्तन प्राकृतिक (spontaneous) तथा X-किरणों, α-किरणों, β-किरणों या रासायनिक पदार्थों (जैसे-मस्टर्ड गैस) आदि के द्वारा प्रेरित किए जाने वाले उत्परिवर्तन कृत्रिम (induced) कहलाते हैं।

    जाति निर्माण (Speciation)

    जाति अन्तः प्रजनन करने वाले ऐसे जीवों का समूह है, जो एक या अनेक जनसंख्याओं में रहते हैं।

    किसी जनसंख्या के सारे सदस्यों की जीन मिलकर उस जनसंख्या की जीन राशि (gene pool) बनाते हैं।

    एक जननिक रूप से समांग जनसंख्या का दो या अधिक जनसंख्याओं, जो आनुवंशिक रूप से भिन्न तथा जननिक पृथक्करण युक्त हो, में टूटना जाति निर्माण या स्पीसिएशन (speciation) कहलाता है।

    जाति निर्माण मुख्यतया दो प्रकार से होता है:

    एलोपैट्रिक स्पीसिएशन

    एक जाति को कुछ जनसंख्याओं का भौगोलिक पृथक्करण (geographical isolation) हो जाता है। हजारों वर्षों बाद ये दो जनसंख्याएँ विकास के क्रम में भिन्न हो जाती हैं। जब ये दो जनसंख्याएँ दोबारा सम्पर्क में आती हैं तब इनके बीच प्रजनन नहीं होता है। इस प्रकार प्रत्येक जनसंख्या एक नई जाति वन जाती है।

    सिम्पैट्रिक स्पीसिएशन

    जब एक जाति को, एक ही भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाली दो जनसंख्याएँ जननिक रूप से पृथक् हो जाती है, तब ये जनसंख्या धीरे-धीरे एक-दूसरे से भिन्न होती चली जाती हैं और अलग जातियाँ बन जाती हैं।

    जैव विकास के प्रमाण (Evidences of Organic Evolution)

    आकारिकी एवं शारीरिकी से प्रमाण

    समजात अंग (Homologous organs)

    ऐसे अंग, जो रचना और उत्पत्ति में समान परन्तु कार्य में भिन्न हो; जैसे-मेंढक, पक्षी एवं मनुष्य के अग्रपाद।

    समवृति अंग (Analogous organs)

    ऐसे अंग, जो समान कार्यों में उपयोग होने के कारण समान दिखाई पड़ते हैं, लेकिन उनकी मूल रचना एवं भ्रूणीय प्रक्रिया में भिन्नता पाई जाती है समवृति अंग कहलाते हैं; जैसे-पक्षियो एवं कीटों के पंखा

    अवशेषो अंग (Vestigial organs)

    वे अंग, जो वे पूर्वजों में कार्यशील थे, परन्तु वर्तमान में कार्यविहीन है; जैसे-साँपों के अल्पविकसित पाद, कोबी पक्षी के पंख, मनुष्य के त्वचा के वाल, वर्माफॉर्म एपेन्डिक्स आदि। जीवों में कभी-कभी अचानक कोई ऐसा लक्षण विकसित हो जाता है, जो वर्तमान जातीय लक्षण न होकर किसी निम्न वर्गीय पूर्वव जाति का होता है इसो क्रिया को प्रत्यावर्तन (atavism) कहते हैं।

    संयोजक जातियों से प्रमाण

    कुछ जीव-जन्तुओं में उनसे कम विकसित निन्न वर्गीय जातियों के तथा उनसे अधिक विकसित उच्च वर्गीय जातियों के लक्षणों का सम्मिश्रण पाया जाता है।

    उदाहरण             संयोजक कड़ी

    आर्किऑटेरिक्स – सरीसृपों एवं पक्षियों

    निओपिलिना   – मौलस्का एवं एनीलिडा

    पेरीपेटस      – एनीलिडा एवं ऑर्थोपोडा

    प्रोटोथीरिया    – सरीसृप एवं स्तनधारी

    यूग्लीना      –  पादप एवं जन्तु

    आनुवंशिकी से प्रमाण

    विभिन्न जातियों के सदस्यों में परस्पर संकरण जातियों के घनिष्ट विकासीय सम्बन्धों को प्रमाणित करता है, जैसे – घोड़े तथा गधे से वर्णसंकर खच्चर का बनना।

    तुलनात्मक कार्यिकी एवं जैव-रसायन से प्रमाण (Evidences from Comparative Physiology and Biochemistry)

    फ्लोकिन एवं वाल्ड ने जन्तुओं एवं पादपों की कार्यिकी एवं जैव-रसायन से सम्बन्धित प्रमाण प्रस्तुत किए

    प्रारम्भिक जीवों से लेकर जटिलतम स्तनियों तक जीवद्रव्य के समान रासायनिक संयोजन, प्रोटोजोआ से स्तनियों तक अधिकांश जन्तुओं में ट्रिप्सिन नामक एन्जाइम की उपस्थिति, एमाइलेस की उपस्थिति, सभी कशेरुकियों में थायरॉक्सिन हॉर्मोन की उपस्थिति तथा हीमोग्लोबिन से बनाए गए | हिमेटिन रवों की आकृति एवं माप में समानता, मानव व चिम्पैंजी में रुधिर सीरम प्रोटीन में समानता आदि जैव विकास को दर्शाते हैं।

    बायोजेनेटिक नियम अथवा पुनरावृत्ति सिद्धान्त या भ्रौणिकी से प्रमाण

    हैकेल ने इस सिद्धान्त को प्रतिपादित किया जिसके अनुसार, व्यक्तिवृत्त में जातिवृत्त की पुनरावृत्ति होती है अर्थात् जन्तु अपनी भ्रूणावस्था में पूर्वजों की अवस्थाओं को दोहराते हैं। (Ontogeny Repeats Phylogeny)

    जीवाश्म

    प्राचीन जीवों के शेष बचे भार्गों; जैसे – हड्डी दाँत, शैल आदि को जीवाश्म कहते हैं। ये मुख्यतया अवसादी चट्टानों में पाए जाते हैं। जीवाश्म की आयु यूरेनियम लैड विधि, रेडियोधर्मी कार्बन विधि, फिसन ट्रैक तथा इलेक्ट्रॉन चक्रण रेजोनेन्स आदि विधियों द्वारा ज्ञात की जाती है। कॉपोलाइट ऐसे जीवाश्म होते हैं, जिनमें जन्तुओं के मल में फॉस्फेट लवणों का संचय होता है।

    मानव का विकास (Human Evolution) – सम्पूर्ण जानकारी

    मानव या होमीनिड वंश, जो मनुष्य व कपियों के पूर्वज थे, का उद्भव आज से लगभग 2.4 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ। होमीनिड वंश का विकास एशिया तथा अफ्रीका में हुआ।

    * डार्विन ने अपनी पुस्तक ‘डेसेन्ट ऑफ मैन एण्ड सेलेक्शन इन रिलेशन टू सैक्स’ (Descent of Man and Selection in Relation to Sex) में मानव का विकास कपियों जैसे पूर्वज से होने के सिद्धान्त का वर्णन किया।

    * लिनियस ने मनुष्य को वानरों व कपियों के साथ रखा तथा उसे वैज्ञानिक नाम होमो सेपियन्स (Homo sapiens) दिया, जिसका अर्थ है –  बुद्धिमान प्राणी।

    मानव का वर्गीकरण

    संघ  – कॉर्डेटा

    वर्ग – स्तनधारी

    गण – प्राइमेट

    उपगण – एन्थ्रोपोइडिया

    कुल – होमीनिडी

    वंश – होमो

    जाति – सेपियन्स

    उपजाति – सेपिएन्स

    – गज-श्रूज (Elephant shrews) मानव के प्रारम्भिक पूर्वज माने जाते हैं।

    – गिब्बन भारत में पाया जाने वाला अकेला कपि है।

    • मानव व कपियों का विकास एक सम्मिलित पूर्वज से हुआ था।

    . प्रोप्लिओपिथेकस मानव-पूर्व पूर्वज है, जिसके जीवाश्म लगभग 3.5 करोड़ वर्ष पूर्व ओलिगोसीन युग की चट्टानों में मिले हैं। इसमें मनुष्य व कपि दोनों के लक्षण हैं।

    – मायोसीन में पाए जाने वाले कपि लिम्नोपिथेकस को गिब्बन का पूर्वज माना जाता है।

    आधुनिक चिम्पैन्जी का पूर्वज प्रोकोंसल को माना जाता है

    प्रोकोंसल के जीवाश्म लीकी द्वारा पूर्वी अफ्रीका से प्राप्त किए गए।

    ड्रायोपिथेकस (Dryopithecus)

    . ड्रायोपिथेकस अफ्रीकेन्स (Dryopithecus Africans) का जीवाश्म अफ्रीका और यूरोप की चट्टानों से प्राप्त हुआ ।

    • इसे मनुष्य एवं कपि दोनों का पूर्वज माना जाता है।

    • यह चिम्पैन्जी से करीबी समानता दिखाता है।

    • यह मायोसीन के समय 250 लाख साल पहले जीवित था।

    • यह शाकाहारी था और कोमल फलों व पत्तियों को खाता था।

    रामापिथेकस (Ramapithecus)

    लेविस (Lewis) ने 1932 में भारत की शिवालिक पहाड़ी की प्लीयोसीन चट्टानों से रामापिथेकस के जीवाश्म को खोजा।

    यह 14-15 मिलियन वर्ष पहले पश्च-मायोसीन से प्लायोसीन युग में जीवित था।

    रामापिथेकस अपनी पिछली टाँगों पर सीधा खड़ा होकर चलता था।

    यह आधुनिक मानव की तरह कठोर नट व बीज खाता था।

    ऑस्ट्रेलोपिथेकस (Australopithecus)

    इसे प्रथम कपि मानव माना जाता है।

    यह लगभग 4 से 1.5 मिलियन वर्ष पहले प्लीस्टोसीन युग के दौरान गुफाओं में रहता था।

    इसकी कपाल क्षमता 500-700 घन सेमी थी। .

    यह पूरी तरह द्विपद (bipedal) होमोनिड था।

    जबड़े तथा दाँत मनुष्य के समान थे और यह सर्वाहारी था। .

    इसकी खोज एल. बी. वी. लिकी ने की थी।

    जावा मानव (होमो इरेक्टस इरेक्टस)

    • जावा मानव का विकास पूर्व तथा मध्य प्लीस्टोसीन में लगभग 600000 वर्ष पूर्व हुआ।

    • इसका जीवाश्म जावा के त्रिनिल स्थान से प्राप्त हुआ, जिसे डुबॉइस ने खोजा।

    होमो इरेक्टस इरेक्टस नाम मेयर (1950) ने दिया।

    • इसके जबड़े बड़े तथा भारी लेकिन आधुनिक मानव के लगभग समान थे

    • इसकी कपाल क्षमता लगभग 40 घन सेमी थी।

     औसत शारीरिक सम्बाई 170 सेमी तथा भार 70 किग्रा था।

    यह सर्वाहारी था इसने सबसे पहले नि का उपयोग भोजन पकान, अपनी रक्षा करने तथा शिकार में किया था।

    पेकिंग मानव (होमो इरेक्टस पेकिनेंन्सिंस)

    पैकिंग मानत की खोज पाईनै 1924 में चीन के पैकिंग (बीजिंग) की।

    पैकिंग मानव के जीवाश्म लगभग 6 लाख वर्ष पुराने थे।

    इराकी कपाल गुहा का आयराम लगभग 850-1200 घन सेमी था।

    ये जावा मानव की तरह सर्वाहारी तथा कनीयल थे। इनमें ठोड़ी अनुपस्थित थी।

    ये पत्थर के औजारों को शिकार करने तथा अपनी रक्षा के लिए प्रयोग करते थे।

    निएन्डरथल मानव (होमो सेपियन्स निएन्डरथेलेन्सिस)

    जर्मनी की निएन्डर घाटी से 1856 में सी फूलरॉट ने निएन्डरथल मानव के जीवाश्म प्राप्त किए थे। ये सबसे पुराने जीवाश्म है।

    इनका विकास लगभग 150000 वर्ष पूर्व हुआ था और लगभग 25000 वर्ष पहले ये विलुप्त हो गए।  इनकी कपाल गुहा का आयतन 1450 घन सेमी था।

    इनका जबड़ा गहरा, ठोड़ी रहित और खोपड़ी की अस्थियाँ चौड़ी थी।

    ये सर्वाहारी और केनिबल थे और आग का प्रयोग खाना पकाने व गर्म रखने के लिए करते थे।

    ये वास्तविक मनुष्य थे, जिनमें संस्कृति की उत्पत्ति हुई और ये हथियार बनाना भी जानते थे।

    क्रो-मैग्नॉन मानव (होमो सेपियन्स फॉसिलिस)

    ये लगभग 50000 वर्ष पूर्व उत्पन्न हुए तथा 20000 वर्ष पूर्व विलुप्त हो गए। इनके जीवाश्म क्रो-मैग्नॉन (फ्रांस) के पत्थरों से मैक प्रीगर ने 1868 में प्राप्त किया।

    इनकी कपाल गुहा का आयतन 1660 घन सेमी था, जो कि आधुनिक मानव से भी अधिक था अर्थात् ये आधुनिक मानव से अधिक बुद्धिमान थे।

    ये गुफाओं में सुन्दर चित्रकारी करते थे। निएन्डरथल व क्रो-मैग्नॉन दोनों ही आधुनिक मानव के सीधे पूर्वज माने जाते हैं।

    आधुनिक मानव (होमो सेपियन्स)

    लगभग 10000 वर्ष पूर्व आखिरी हिम युग (glacial period) के पश्चात् आधुनिक मानव का विकास क्रो-मैग्नॉन मानव से हुआ।

    इनकी कपाल गुहा का आयतन लगभग 1460 घन सेमी होता है।

    इनमें सेरीब्रम अत्यधिक विकसित होता है। आधुनिक मानव की कुछ प्रजातियाँ निम्न हैं:

    (a) नीग्रोइड्स (Negroids)

    (b) कॉकेसोइड्स (Caucasoids)

    (c) मोन्गोलॉयड्स (Mongoloids)

    डॉ. शैपीरो के अनुसार, होमो सेपियन्स सेपियन्स धीरे-धीरे होमो सेपियन्स फ्युचुरिस में विकसित हो जाएगा इस मानव का मस्तिष्क अधिक उन्नत व जटिल होगा, सिर गुम्बद के आकार का होगा, यह अधिक लम्बा होगा तथा शरीर बाल रहित होगा।

  • कोशिका विभाजन (Cell Division) क्या है ?  कोशिका चक्र क्या है ? | अर्द्धसूत्री विभाजन एवं समसूत्री विभाजन in Hindi

    कोशिका विभाजन (Cell Division) क्या है ? कोशिका चक्र क्या है ? | अर्द्धसूत्री विभाजन एवं समसूत्री विभाजन in Hindi

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की कोशिका विभाजन (cell division) क्या होता है ? koshika vibhajan के प्रकार क्या है ? koshika vibhajan क्यों जरूरी है ? साथ ही हम जानेगे कि समसूत्री कोशिका विभाजन और अर्द्धसूत्री विभाजन क्या है | समसूत्री कोशिका विभाजन और अर्द्धसूत्री विभाजन की परिभाषा, उनमे अंतर और उनके प्रकार क्या है ? आदि

    कोशिका विभाजन (Cell Division) क्या है ?

    कोशिका विभाजन का आशय उस प्रक्रिया से है, जिसके अन्तर्गत एक कोशिका से दो कोशिकाओं का निर्माण होता है, जिससे जीवों में प्रजनन और वृद्धि सम्भव हो पाती है। इस घटना में पहले DNA का द्विगुणन और फिर केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य का विभाजन होता है।  कोशिका विभाजन सभी जीवों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसमे कोशिका विभाजन के दौरान डीएनए प्रतिकृति व कोशिका वृद्धि होती है। ये सभी प्रक्रियाएं जैसे कोशिका विभाजन, डीएनए प्रतिकृति और कोशिका वृद्धि एक दूसरे के साथ समायोजित होकर, इस प्रकार संपन्न होती हैं कि कोशिका विभाजन सही होता है व संतति कोशिकाओं में इनकी पैतृक कोशिकाओं वाला जीनोम होता है।

    कोशिका विभाजन के प्रकार

    कोशिका विभाजन प्रमुख रुप से तीन प्रकार का होता है

    1. असूत्री विभाजन – प्रोकैरियोटिक जीवों में

    2. सूत्री विभाजन या समसूत्री विभाजन – कायिक कोशिकाओं में

    अर्द्धसूत्री विभाजन – जननिक कोशिकाओं में

    कोशिका विभाजन और कोशिका चक्र

    सभी सजीवों की कोशिकाएं दो भागों में विभाजित होकर जनन करती है, जिसमे प्रत्येक पैतृक कोशिका विभाजित होकर दो नई संतति कोशिकाओं का निर्माण करती है ये नव निर्मित संतति कोशिकाएं स्वयं वृद्धि एवं पुन: विभाजन करती है |

    कोशिका चक्र क्या है ?

    कोशिका विभाजन सभी जीवों के लिय एक महत्वपुर्ण प्रक्रिया है | एक कोशिका विभाजन के दौरान डीएनए प्रतिकृति व कोशिका वृद्धि होती है कोशिका अपने जीनोम का द्विगुणन व अन्य संघटकों का संश्लेषण और तत्पश्चात विभाजित होकर दो नई संतति कोशिकाओं का निर्माण करती है, इसे कोशिका चक्र कहते है | यद्यपि कोशिका वृद्धि (कोशिकाद्रव्यीय वृद्धि के संदर्भ में) एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें डीएनए का संश्लेषण कोशिका चक्र की किसी एक विशिष्ट अवस्था में होता है। कोशिका विभाजन के दौरान, प्रतिकृति गुणसूत्र (डीएनए) जटिल घटना क्रम के द्वारा संतति केंद्रकों में वितरित हो जाते हैं। ये सारी घटनाएं आनुवंशिक नियंत्रण के अंतर्गत होती हैं।

    एक प्ररूपी (यूकेरियोटिक) चक्र का उदाहरण मनुष्य की कोशिका के संवर्द्धन में होता है, जो लगभग प्रत्येक चौबीस घंटे में विभाजित होती है। यद्यपि कोशिका चक्र की यह अवधि एक जीव से दुसरे जीव एवं कोशिका से दूसरी कोशिका प्रारूप के लिए बदल सकती है। उदाहरणार्थ- यीस्ट के कोशिका चक्र के पूर्ण होने मेंलगभग नब्बे मिनट लगते हैं।

    कोशिका चक्र की प्रावस्थाएँ

    कोशिका चक्र की अवधि एक जीव से दुसरे जीव एवं कोशिका से दूसरी जीव एवं कोशिका से दूसरी कोशिका प्रारूप के लिय बदल सकती है | कोशिका चक्र की दो मूल प्रावस्थाए होती है जो निम्न है :

    • अंतरावस्था (Interphase)
    • एम (M) प्रावस्था (सूत्री विभाजन) (Mitosis Phase)

    अन्तरावस्था (interphase)

    सूत्री विभाजन के प्रारम्भ से पहले एक अन्तरावस्था (interphase) होती है इसमें G1, S तथा G2,  उप-अवस्थाएँ होती हैं। अंतरावस्था को विश्राम अवस्था भी कहते है | यह वह प्रावस्था जिसमे कोशिका विभाजन के लिय तैयार होती है तथा इस दौरान क्रमबद्ध तरीके से कोशिका वृद्धि एवं डीएनए का प्रतिकृतिकरण दोनों होते है अंतरावस्था को तीन प्रावस्थाओं या उप-अवस्थाएँ में विभाजित किया जाता है :

    1. पश्च सूत्री अन्तरकाल प्रावस्था (G1 Phase या जी1 प्रावस्था)

    2. संश्लेषण प्रावस्था (S Phase या एस प्रावस्था)

    3. पुर्व – सूत्री विभाजन अंतरालकाल प्रावस्था (G2 Phase या जी2 प्रावस्था)

    G1 – प्रोटीन एवं RNA का संश्लेषण होता है।

    S – इसमें DNA का द्विगुणन एवं हिस्टोन प्रोटीन का संश्लेषण होता है।

    G2 – RNA व प्रोटीन का संश्लेषण होता है।

    G0 – इसमें कोशिका विशेषीकृत हो जाती है और इसके बाद कोशिका विभाजन नहीं होता।

    जी1 प्रावस्था में कोशिका उपापचयी रूप में सक्रिय होती है, एवं लगातार वृद्धि करती है, परन्तु इसका डीएनए प्रतिकृति नही करता है | एस प्रावस्था या संश्लेषण प्रावस्था के दौरान डीएनए का निर्माण एवं इसकी प्रतिकृति होती है | इस दौरान डीएनए की मात्रा दुगुनी हो जाती है |

    प्राणी कोशिका में एस प्रावस्था के दौरान केन्द्रक में डीएनए का जैसे ही प्रतिकृतिकरण प्रारम्भ होता है वैसे ही तारककेंद्र का कोशिकाद्रव्य में प्रतिकृतिकरण होने लगता है, कोशिका वृद्धि के साथ सूत्री विभाजन हेतु जी2 प्रावस्था के दौरान प्रोटीन का निर्माण होता है |

    जो कोशिकाएं आगे विभाजित नही होती है जी1 प्रावस्था से निकल कर निष्क्रिय अवस्था में पहुचती है, जिसे कोशिका चक्र की शांत अवस्था (G0) कहते है |

    प्राणियों में सूत्री विभाजन केवल द्विगुणित कायिक कोशिकाओं में ही दिखाई देता है | इसके विपरीत पादपों में सूत्री विभाजन अगुणीत एवं द्विगुणीत दोनों कोशिकाओं में दिखाई देता है |

    सूत्री कोशिका विभाजन या समसूत्री विभाजन (Mitosis)

    सभी जन्तुओं और पौधों में, जनन कोशिकाएँ एवं अन्य सारी कोशिकाएँ सूत्री विभाजन से विभाजन करती हैं। इस कोशिका विभाजन की खोज डब्ल्यू. फ्लेमिंग ने की। यह सभी प्रकार के कायिक कोशिकाओं (vegetative cells) में होती है। इसमें एक द्विगुणित मातृ-कोशिका से दो समान सन्तति कोशिकाएँ बनती हैं। सूत्री विभाजन की प्रक्रिया दो भागों केन्द्रक विभाजन एवं कोशिकाद्रव्य विभाजन में सम्पन्न होती है।

    सूत्री विभाजन  (एम (M) प्रावस्था) उस अवस्था को व्यक्त करता है, जिसमे वास्तव में कोशिका विभाजन या समसूत्री विभाजन होता है, और अंतरावस्था दो क्रमिक एम प्रावस्थाओं के बीच की प्रावस्था को व्यक्त करता है, कोशिका चक्र की कुल अवधि की 95 प्रतिशत से अधिक की अवधि अंतरावस्था में ही व्यतीत होती है |

    सूत्री विभाजन  का आरम्भ केन्द्रक के विभाजन (Kayokinesis कैरियो काईनेसिस) और इसका अंत कोशिका द्रव्य विभाजन (Cytokinesis साईटो काईनेसिस) के साथ होता है

    विधा के लिए सूत्री विभाजन को केंद्रक विभाजन की चार अवस्थाओं में विभाजित किया गया है।

    केन्द्रक विभाजन (Kayokinesis)

    इस विभाजन की प्रक्रिया चार अवस्थाओं में सम्पन्न होती है | यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि कोशिका विभाजन एक प्रगतिशील प्रक्रिया है और इसकी विभिन्न अवस्थाओं के बीच स्पष्ट रूप से विभाजन करना मुश्किल है। केन्द्रक विभाजन यानि केरियोकाइनेसिस को चार अवस्थाओं में विभाजित किया गया है :

    • पूर्वावस्था (Prophase)।
    • मध्यावस्था (Metaphase)।
    • पश्चावस्था (Anaphase)।
    • अंत्यावस्था (Telophase)।

    पूर्वावस्था (Prophase)

    अंतरावस्था की व G1 अवस्था के बाद पूर्वावस्था केरियोकाइनेसिस का पहला पड़ाव है। वास्तविक कोशिका विभाजन की शुरूआत इसी अवस्था से होती है। इसमें प्रत्येक गुणसूत्र लम्बाई में पूरी तरह से दो बराबर भागों में बैट जाती है। इस आधे भाग को अर्द्धगुणसूत्र कहा जाता है। ये अर्द्धगुणसूत्र सेन्ट्रोमीयर पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं और केन्द्रक कला तथा केन्द्रिका नष्ट हो जाती है। कोशिका विभाजन का यह सबसे लम्बा चरण होता है।

    पूर्वावस्था के पूर्ण होने के दौरान की घटनाओं की विशेषताएं

    • गुणसूत्रीय द्रव्य संघनित होकर ठोस गुणसूत्र बन जाता है। गुणसूत्र दो अर्धगुणसूत्रों से बना होता है, जो आपस में सेंट्रोमियर से जुड़े रहते हैं। 
    • अंतरावस्था के समय जिस तारककाय का द्विगुण हुआ है वह कोशिका में विपरीत ध्रुव की ओर जाने लगता है। प्रत्येक तारककाय सूक्ष्म नलिकाओं को विकरित करता है, जिसे तारक (एस्टर) कहते हैं। ये तन्तु व तारक मिलकर समसूत्री विभाजन यंत्र बनाते हैं। पूर्वावस्था के अंत में यदि कोशिका को सूक्ष्मदर्शी से देखा जाता है तो इसमें गॉल्जीकाय, अंतर्द्रव्यी जालिका, केंद्रिका व केंद्रक आवरण दिखाई नहीं देता है।

    मध्यावस्था (Metaphase)

    केंद्रक आवरण के पूर्णरूप से विघटित होने के साथ समसूत्री विभाजन की द्वितीय अवस्था प्रारंभ होती है, इसमें गुणसूत्र कोशिका के कोशिका द्रव्य में फैल जाते हैं। इस अवस्था तक गुणसूत्रों का संघनन पूर्ण हो जाता है यह अवस्था काफी छोटी होती है उच्च पादपों में अतारकीय (Anastral) और जन्तुओं में तारकीय (astral) सूत्री विभाजन होता है।  यही वह अवस्था है जब गुणसूत्रों की आकृति का अध्ययन बहुत ही सरल तरीके से किया जा सकता है। 

    मध्यावस्था गुणसूत्र दो संतति अर्धगुणसूत्रों से बना होता है जो आपस में गुणसूत्रबिंदु से जुड़े होते हैं गुणसूत्रबिंदु के सतह पर एक छोटा बिंब आकार की संरचना मिलती है जिसे काइनेटोकोर कहते हैं। गुणसूत्र के सेन्ट्रोमीयर से कुछ तन्तु (टेक्टाइल तन्तु) ध्रुवों से जुड़े रहते हैं।  सूक्ष्म नलिकाओं से बने हुए तर्कुतंतु के जुड़ने का स्थान ये संरचनाएं (काइनेटीकोर) हैं, जो दूसरी ओर कोशिका के केंद्र में स्थित गुणसूत्र से जुड़े होते हैं। इस अवस्था में गुणसूत्र मध्य रेखा पर आकर एकत्र हो जाते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र का एक अर्धगुणसूत्र एक ध्रुव से तर्कुतंतु द्वारा अपने काइनेटोकोर के द्वारा जुड़ जाता है, वहीं इसका संतति अर्धगुणसूत्र तर्कुतंतु द्वारा अपने काइनेटोकोर से विपरीत ध्रुव से जुड़ा होता है। मध्यावस्था में जिस तल पर गुणसूत्र पंक्तिबद्ध हो जाते हैं, उसे मध्यावस्था पट्टिका कहते हैं।

    मध्यावस्था की मुख्य विशेषता

    • तर्कुतंतु गुणसूत्र के काइनेटोकोर से जुड़े रहते हैं।
    • गुणसूत्र मध्यरेखा की ओर जाकर मध्यावस्था पट्टिका पर पंक्तिबद्ध होकर ध्रुवों से तर्कुतंतु से जुड़ जाते हैं।

    पश्चावस्था (anaphase)

    सूत्री विभाजन के अन्तर्गत इस अवस्था में सर्वाधिक कम समय (2-3 मिनट) लगता है। इस अवस्था में अर्धगुणसूत्र अलग हो जाते हैं और सन्तति गुणसूत्रों (daughter chromosomes) के मध्य प्रतिकर्षण ( बल या टेक्टाइल तन्तुओं के ध्रुवों की ओर खिंचाव के कारण ये विपरीत ध्रुवों की ओर गति करते हैं।

    पश्चावस्था की विशेषताएं

    • गुणसूत्रबिंदु विखंडित होते हैं और अर्धगुणसूत्र अलग होने लगते हैं।
    • अर्धगुणसूत्र विपरीत ध्रुवों की ओर जाने लगते हैं।

    अन्त्यावस्था (Telophase)

    इस चरण में में नवजात गुणसूत्र के प्रत्येक जोड़े के चारों ओर एक केन्द्रक झिल्ली का निर्माण होता है और एक पूर्ण कोशिका का निर्माण होता है। इसके साथ ही सन्तति गुणसूत्र ध्रुवों पर एकत्र हो जाते हैं। इस सम्बन्ध में को जन्तु कोशिकाओं में सन्तति कोशिकाओं को पृथक करने के लिए संकुचन होता है, परन्तु पादप कोशिकाओं में संकुचन के स्थान पर कोशिका प्लेट बनती हैं।

    अन्त्यावस्था की मुख्य घटनाएं

    • गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों की ओर एकत्रित हो जाते हैं और इनकी पृथक पहचान समाप्त हो जाती है। 
    • गुणसूत्र समूह के चारों तरफ केंद्रक झिल्ली का निर्माण हो जाता है। 
    • केंद्रिका, गॉल्जीकाय व अंतर्द्रव्यी जालिका का पुनर्निर्माण हो जाता है।

    कोशिका द्रव्य विभाजन (Cytokinesis)

    केन्द्रक विभाजन के बाद कोशिकाद्रव्य का विभाजन होता है। सूत्री विभाजन के दौरान द्विगुणित गुणसूत्रों का संतति केंद्रकों में संपृथकन होता है जिसे केंद्रक विभाजन (Karyokinesis) कहते हैं।  कोशिका विभाजन संपन्न होने के अंत में कोशिका स्वयं एक अलग प्रक्रिया द्वारा दो संतति कोशिकाओं में विभाजित हो जाती है, इस प्रक्रिया को कोशिकाद्रव्य विभाजन कहते हैं। प्राणी कोशिका का विभाजन जीवद्रव्यकला में एक खांच बनने से संपन्न होता है। खांचों के लगातार गहरा होने व अंत में केंद्र में आपस में मिलने से कोशिका का कोशिकाद्रव्य दो भागों में बँट जाता है। यद्यपि पादप कोशिकाएं जो अपेक्षाकृत अप्रसारणीय कोशिका भित्ति से घिरी होती हैं अतः इनमें कोशिकाद्रव्य विभाजन दूसरी भिन्न प्रक्रियाओं द्वारा संपन्न होता है। पादप कोशिकाओं में नई कोशिका भित्ति निर्माण कोशिका के केंद्र से शुरू होकर बाहर की ओर पूर्व स्थित पार्श्व कोशिका भित्ति से जुड़ जाता है। नई कोशिकाभित्ति निर्माण एक साधारण पूर्वगामी रचना से प्रारंभ होता है जिसे कोशिका पट्टिका कहते हैं, जो दो सन्निकट कोशिकाओं की भित्तियों के बीच मध्य पट्टिका को दर्शाती है। कोशिकाद्रव्य विभाजन के समय कोशिका अंगक जैसे सूत्रकणिका (माइटोकॉड्रिया) व प्लैस्टिड लवक का दो संतति कोशिकाओं में वितरण हो जाता है। कुछ जीवों में केंद्रक विभाजन के साथ कोशिकाद्रव्य का विभाजन नहीं हो पाता है। इसके परिणामस्वरूप एक ही कोशिका में कई केंद्रक बन जाते हैं। ऐसी बहुकेंद्रकी कोशिका को संकोशिका कहते हैं  नारियल का तरल भ्रूणपोश इसका एक उदाहरण है । यह पादप कोशिकाओं में फ्रेग्मोप्लास्ट से, कोशिका के मध्य से बाहर की ओर कोशिका प्लेट के निर्माण द्वारा तथा जन्तुओं में कोशिका कला के मध्यवर्ती स्थान से अन्तर्वलन (invagination) द्वारा होता है।

    जन्तु और पादप कोशिकाओं के सूत्री विभाजन में विभिन्नताएँ

    पादप कोशिकाजन्तु कोशिका
    सेन्ट्रियोल अनुपस्थित होते हैं।सेन्ट्रियोल उपस्थित होते हैं।
    एस्टर नहीं बनते हैं।एस्टर बनते हैं।
    कोशिका विभाजन में एक कोशिका प्लेट बनता हैकोशिका विभाजन में कोशिकाद्रव्य का निर्माण और दो भागों में बँटते हैं।

    सूत्री कोशिका विभाजन का महत्त्व (Importance of Mitosis)

    सूत्री विभाजन या मध्यवर्तीय विभाजन केवल द्विगुणित कोशिकाओं में होता है। यद्यपि कुछ निम्न श्रेणी के पादपों एवं सामाजिक कीटों में अगुणित कोशिकाएं भी सूत्री विभाजन द्वारा विभाजित होती हैं। सूत्री विभाजन के कारण जीवों की वृद्धि तथा विकास सम्भव हो पाता है। यह अलैंगिक जनन का आधार है। इससे सन्तति कोशिकाओं (daughter cells) में गुणसूत्रों की संख्या मातृ कोशिका के समान होती हैं। इसके साथ ही सन्तति कोशिकाओं के गुण भी मातृ कोशिका के ही समान होता है। बहुकोशिकीय जीवधारियों की वृद्धि सूत्री विभाजन के कारण होती है। कोशिका वृद्धि के परिणामस्वरूप केंद्रक व कोशिकाद्रव्य के बीच का अनुपात अव्यवस्थित हो जाता है। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि कोशिका विभाजित होकर केंद्रक कोशिकाद्रव्य अनुपात को बनाए रखे। सूत्री विभाजन का एक महत्वपूर्ण योगदान यह है कि इसके द्वारा कोशिका की मरम्मत होती है। अधिचर्म की उपरी सतह की कोशिकाएं, आहार नाल की भीतरी सतह की कोशिकाएं एवं रक्त कोशिकाएं निरंतर प्रतिस्थापित होती रहती है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis)

    इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम फॉर्मर एवं मूरे ने किया। लैंगिक प्रजनन द्वारा संतति के निर्माण में दो युग्मकों का संयोजन होता है, जिनमें अगुणित गुणसूत्रों का एक समूह होता है। युग्मक का निर्माण विशिष्ट द्विगुणित कोशिकाओं से होता है। यह विशिष्ट प्रकार का कोशिका विभाजन है, जिसके द्वारा बनने वाली अगुणित संतति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है। इस प्रकार के विभाजन को अर्धसूत्री विभाजन कहते हैं।  यह विभाजन केवल जनन कोशिकाओं (reproductive cells) में होता है। इस विभाजन में गुणसूत्रों की संख्या कम होकर आधी रह जाती है, इसलिए इसे न्यूनकारी कोशिका विभाजन (reduction division) भी कहा जाता है।

    अर्धसूत्री विभाजन की मुख्य विशेषताएं

    अर्द्धसूत्री विभाजन केन्द्रक विभाजन का रूप है। सूत्री विभाजन की तरह इसमें मुख्य कोशिका में अन्तरावस्था के क्रम में ही DNA रेप्लीकेशन होता है, परन्तु यह केन्द्रक विभाजन (nucleus division) तथा कोशिका विभाजन (cell division) के दो चरणों में पूरा होता है, जिसे अर्द्धसूत्री I और अर्द्धसूत्री II के नाम से जाना जाता है। यह विभाजन जन्तु में शुक्राणु और अण्डाणु के बनने (gametogenesis) के दौरान और पौधों में स्पोर (spore) बनने के क्रम में होता है। यह विभाजन द्विगुणित (diploid) जनन कोशिकाओं में होता है, जिसके परिणामस्वरूप चार अगुणित कोशिकाएँ (haploid cells) बनती हैं।

    अर्धसूत्री विभाजन की अवस्थाएँ

    अर्धसूत्री Iअर्धसूत्री II
    पूर्वावस्था Iपूर्णावस्था II
    मध्यावस्था Iमध्यावस्था II
    पश्चावस्था Iपश्चावस्था II
    अंत्यावस्था Iअंत्यावस्था II

    अर्द्धसूत्री विभाजन। (Meiosis।)

    इसे न्यूनकारी विभाजन (reduction division) भी कहा जाता है।

    इसकी चार अवस्थाएँ होती हैं

    पूर्वावस्था I (Prophase I)

    अर्धसूत्री विभाजन I की पूर्वावस्था की तुलना समसूत्री विभाजन की पूर्वावस्था से की जाए तो, यह अधिक लंबी व जटिल होती है। गुणसूत्रों के व्यवहार के आधार पर इसे पाँच प्रावस्थाओं में उपविभाजित किया गया है जैसे-तनुपट्ट (लेप्टोटीन), युग्मपट्ट (जाइगोटीन), स्थूलपट्ट (पैकेटीन), द्विपट्ट (डिप्लोटीन) व पारगतिक्रम (डायकाइनेसिस)।

    साधारण सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखने पर तनुपट्ट (लिप्टोटीन) अवस्था के दौरान गुणसूत्र धीरे-धीरे स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं। गुणसूत्र का संहनन (कॉम्पैक्शन) पूरी तनुपट्ट अवस्था के दौरान जारी रहता है। इसके उपरांत पूर्वावस्था I का द्वितीय चरण प्रारंभ होता है, जिसे युग्मपट्ट कहते हैं। इस अवस्था के दौरान गुणसूत्रों का आपस में युग्मन प्रारंभ हो जाता है और इस प्रकार की संबद्धता को सूत्रयुग्मन कहते हैं।

    लेप्टोटीन

    इसमें केन्द्रक जाल संघनित होकर गुणसूत्र बनाते हैं। एक ही प्रकार के गुण रखने वाले गुणसूत्र समजात गुणसूत्र कहलाते हैं।

    युग्मपट्ट (जाइगोटीन) 

    इस उप-अवस्था में समजात गुणसूत्र युग्म बनाते हैं। इस क्रिया को सिनेप्सिस (synapsis) कहते हैं। इस प्रकार के गुणसूत्रों के युग्मों को समजात गुणसूत्र कहते हैं। इस अवस्था का इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मलेखी यह दर्शाता है कि गुणसूत्र सूत्रयुग्मन के साथ एक जटिल संरचना का निर्माण होता है, जिसे सिनेप्टोनिमल सम्मिश्र कहते हैं। जिस सम्मिश्र का निर्माण एक जोड़ी सूत्रयुग्मित समजात गुणसूत्रों द्वारा होता है, उसे युगली (bivalent) अथवा चतुष्क (tetrad) कहते हैं। यद्यपि ये अगली अवस्था में अधिक स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। पूर्वावस्था I की उपर्युक्त दोनों अवस्थाएं स्थूलपट्ट (Pachytene) अवस्था से अपेक्षाकृत कम अवधि की होती हैं। इस अवस्था के दौरान प्रत्येक युगली गुणसूत्र के चार अर्ध गुणसूत्र चतुष्क के रूप में अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं।

    इस अवस्था में पुनर्योजन ग्रंथिकाएं दिखाई देने लगती हैं जहाँ पर समजात गुणसूत्रों के असंतति अर्धगुणसूत्रों के बीच विनिमय (क्रासिंग ओवर) होता है। विनिमय दो समजात गुणसूत्रों के बीच आनुवंशिक पदार्थों के आदान-प्रदान के कारण होता है। विनिमय एंजाइम द्वारा नियंत्रित प्रक्रिया है व जो एंजाइम इस प्रक्रिया में भाग लेता है, उसे रिकाम्बीनेज कहते हैं। दो गुणसूत्रों में आनुवंशिक पदार्थों का पुनर्योजन जीन विनिमय द्वारा अग्रसर होता है। समजात गुणसूत्रों के बीच पुनर्योजन स्थूलपट्ट अवस्था के अंत तक पूर्ण हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप विनिमय स्थल पर गुणसूत्र जुड़े हुए दिखाई पड़ते हैं। द्विपट्ट (डिप्लोटीन) के प्रारंभ में सिनेप्टोनीमल सम्मिश्र का विघटन हो जाता है और युगली के समजात गुणसूत्र विनिमय बिंदु के अतिरिक्त एक दूसरे से अलग होने लगते हैं।

    विनिमय बिंदु पर X आकार की संरचना को काएज्मेटा कहते हैं। कुछ कशेरुकी प्राणियों के अडंकों में द्विपट्ट महीनों या वर्षों बाद समाप्त होती है।

    अर्धसूत्री पूर्वावस्था I की अंतिम अवस्था पारगतिक्रम (डायाकाइनेसिस) कहलाती है। जिसमें काएज्मेटा का उपांतीभवन हो जाता है, जिसमें काएज्मेटा का अंत होने लगता है। इस अवस्था में गुणसूत्र पूर्णतया संघनित हो जाते हैं व तर्कुतंतु एकत्रित होकर समजात गुणसूत्रों को अलग करने में सहयोग प्रदान करते हैं। पारगतिक्रम के अंत तक केंद्रिका अदृश्य हो जाती है और केंद्रक-आवरण झिल्ली भी विघटित हो जाता है। पारगतिक्रम मध्यावस्था की ओर पारगमन को निरूपित करता है।

    पैकेटीन

    इस उप-अवस्था में गुणसूत्र के लम्बाई में फटने के कारण समजात गुणसूत्र जोड़े में चार क्रोमैटिड दिखाई देते हैं। इस स्थिति को चर्तुसंयोजक (tetrad) कहा जाता है। समजात गुणसूत्रों के अबहन अर्द्धगुणसूत्रों के मध्य विनियम (crossing over) भी होता है।

    डिप्लोटीन

    इसमें समजात गुणसूत्र का प्रत्येक अर्द्धगुणसूत्र एक-दूसरे से अलग होने लगता है, परन्तु कुछ स्थानों पर एक-दूसरे के साथ क्रॉस रखता है, जिसे क्याज्मेटा कहते हैं।

    डाइकाइनेसिस

    इस उप-अवस्था में केन्द्रक तथा केन्द्रक कला लुप्त हो जाती हैं तथा क्याज्मेटा गुणसूत्र के सिरे की ओर खिसकने लगते हैं, जिसे टर्मिनेलाइजेशन (terminalization) कहते हैं।

    मध्यावस्था I (Metaphase I)

    इसमें तर्कु उपकरण बन जाता है तथा तर्कु तन्तु गुणसूत्रों के सेन्ट्रोमीटर से जुड़ जाते हैं।

    पश्चावस्था I (Anaphase I)

    तर्कु तन्तुओं के संकुचन के कारण समजात गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों पर जाने लगते हैं और प्रत्येक ध्रुव पर गुणसूत्र की संख्या आधी हो जाती है।

    अन्त्यावस्था I (Telophase I)

    इस अवस्था में केन्द्रक तथा केन्द्रक कला प्रकट हो जाती है। कोशिकाद्रव्य विभाजन शुरू हो जाता है और कोशिका की इस अवस्था को कोशिका द्विक कहते हैं। कोशिकाद्रव्य विभाजन द्वारा दो कोशिकाएँ बनती हैं, जो अन्त्यावस्था में प्रवेश करती है, परन्तु इसमें DNA का द्विगुणन नहीं होता है। उसके बाद पूर्वावस्था II आती है जो पूर्वावस्था I से काफी सरल होती है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन || (Meiosis II)

    अर्द्धसूत्री I के बाद यह अवस्था शुरू होती है। दोनों के मध्य की अवस्था विरामावस्था कहलाती है। इस चरण में चार अवस्थाएँ होती हैं, जो सूत्री विभाजन के समान होता है।

    पूर्वावस्था II (Interphase II)

    अर्धसूत्री विभाजन II गुणसूत्र के पूर्ण लंबा होने के पहले व कोशिकाद्रव्य विभाजन के तत्काल

    बाद प्रारंभ होता है। इसमें केन्द्रिका और केन्द्रक आवरण विखर जाते हैं साथ ही अर्द्धगुणसूत्र छोटे और मोटे हो जाते हैं तथा तर्कु (spindle fibre) बन जाते हैं।

    मध्यावस्था II (Metaphase II)

    इसमें केन्द्रिका और केन्द्रक झिल्ली विलुप्त हो जाती है। तर्क बन जाती है और गुणसूत्र तर्क के मध्य रेखा (equator) पर सेन्ट्रोमीयर द्वारा चिपक जाते हैं।

    पश्चावस्था II (Anaphase II)

    इसमें सेन्ट्रियोल पहले सेन्ट्रोमीयर्स को और फिर क्रोमैटिड्स को विपरीत ध्रुवों पर खींचते हैं।

    अन्त्यावस्था II (Telophase II)

    यह अवस्था अर्धसूत्री विभाजन की अंतिम अवस्था है, जिसमें गुणसूत्रों के दो समूह पुनः केंद्रक आवरण द्वारा घिर जाते हैं। कोशिकाद्रव्य विभाजन के उपरांत चार अगुणित संतति कोशिकाओं का कोशिका चतुष्टय बन जाता है। इस तरह इसमें चार नई कोशिकाओं का निर्माण होता है। गुणसूत्र कुण्डली से खुलकर, सीधे, लम्बे और एक समान हो जाते है। तकुं (spindle fibre) विलुप्त हो जाते हैं और सेन्टियोल दोहरे हो जाते हैं। केन्द्रक आवरण केन्द्रक के चारों ओर फिर से बनते हैं, जहाँ गुणसूत्र संख्या अविभाजित कोशिका में मौजूद गुणसूत्रों की संख्या की आधी (haploid) की होती है। जीव को एक अविभाजित कोशिका से चार नए कोशिकाओं का निर्माण करते हैं।

    मुख्यतया अगुणित जीवन चक्र वाले पौधों; जैसे-यूलोथ्रिक्स में युग्मनज में अर्द्धसूत्री विभाजन, द्विगुणित जीवन चक्र वाले पौधों में युग्मकी अर्द्धसूत्री विभाजन तथा उच्च वर्ग के पौधों में बीजाणुक अर्द्धसूत्री विभाजन (sporic meiosis) होता है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन का महत्त्व (Importance of Melosis)

    अर्द्धसूत्री विभाजन में विनिमय (crossing over) द्वारा नई किस्मों का विकास होता है। चूंकि एक जाति के समस्त जीवों में पीढ़ी दर पीढ़ी गुणसूत्रों की संख्या सदैव स्थिर रहती है, जो अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा ही सम्भव हो पाता है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन के मौलिक लक्षण

    समसूत्री एवं अर्द्धसूत्री विभाजन में अंतर (Differences between Mitosis and Meiosis)

    समसूत्री विभाजनअर्द्धसूत्री विभाजन
    यह शरीर के कायिक कोशिकाओं एवं लैंगिक कोशिकाओं में होता है।यह केवल लैंगिक कोशिकाओं में होता है।
    कोशिका के गुणसूत्रों में कोई परिवर्तन नहीं होता है।इसमें सन्तति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या आधी रह जाती है।
    यह प्रक्रिया चार अवस्थाओं में सम्पन्न होती है।यह दो उपविभाजनों में पूरा होता है जिसमें पहला न्यूनकारी (reductional) तथा प्रत्येक विभाजन में 4-5 अवस्थाएँ होती हैं।
    गुणसूत्रों के आनुवंशिक पदार्थ में आदान-प्रदान नहीं होता है इसलिए सन्तति कोशिकाओं में भी उसी प्रकार के गुणसूत्र होते हैं, जैसे जनक कोशिका में।गुणसूत्रों के बीच आनुवंशिक पदार्थ का आदान-प्रदान होता है इसलिए सन्तति कोशिकाओं के गुणसूत्र में कुछ भाग पितृ कोशिका से तथा कुछ भाग मातृ कोशिका से आ जाता है अतःसन्तति कोशिका के गुणसूत्र, जनकों के गुणसूत्र से भिन्न होते हैं।
    सन्तति कोशिका में जनक जैसे ही गुणसूत्र होने के कारण आनुवंशिक विविधता नहीं होती है lसन्तति कोशिकाओं में जनकों से भिन्न गुणसूत्र होने के कारण आनुवंशिक विविधता होती है।
    एक जनक (parents) से दो सन्तति कोशिकाएँ (daughter) बनती हैं।एक जनक से चार सन्तति कोशिकाएँ बनती हैं।

  • कोशिका (Cell) से जुड़े महत्वपुर्ण प्रश्न और उत्तर | कोशिका (Koshika) के सवाल और जवाब | जीव विज्ञान प्रश्नोतरी | Cell Biology Topics | कोशिका विज्ञान से जुडी जानकारी |

    कोशिका (Cell) से जुड़े महत्वपुर्ण प्रश्न और उत्तर | कोशिका (Koshika) के सवाल और जवाब | जीव विज्ञान प्रश्नोतरी | Cell Biology Topics | कोशिका विज्ञान से जुडी जानकारी |

    कोशिका संबंधी महत्वपूर्ण प्रश्न – जीव विज्ञान प्रश्नोतरी | Cell Biology Topics – इस आर्टिकल में हमने कोशिका से जुड़े कुछ महत्वपुर्ण प्रश्नों को उनके उत्तर सहित शामिल किया है | आर्टिकल में हमने कोशिका से जुड़े जितने भी परीक्षा की दृष्टि से Koshika – important question and answers को जोड़ा है | साथ ही कोशिका संबंधी महत्वपूर्ण प्रश्न- जीव विज्ञान प्रश्नोत्तरी | Cell Biology Topics, कोशिका विज्ञान के महत्वपूर्ण प्रश्न (cell biology topics) – प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाने वाले कोशिका विज्ञान (cytology) या कोशिका जैविकी (cell biology general science questions) विषयक महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (biology gk questions) आदि इसमें सम्मिलित किये गये है |

    कोशिका से क्या समझते हैं ?

    कोशिका जीवधारियों की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई होती है | कोशिका प्राय: स्वत: जनन की सामर्थ्य रखती है। यह विभिन्न पदार्थों का वह छोटे-से-छोटा संगठित रूप है जिसमें वे सभी क्रियाएँ होती हैं जिन्हें सामूहिक रूप से हम जीवन कहतें हैं। सजीवों की सभी जैविक क्रियाएँ कोशिकाओं के भीतर होती हैं। प्रत्येक जीव का जीवन एक कोशिका से आरम्भ होता है | यदि वह इसी एक कोशिका के सहारे अपने जीवन को चलाता रहता है तो उसे एककोशिकीय जीव (Unicellular) जीव कहा जाता है, परन्तु अधिकांश जीवों में यह कोशिका विभाजन करती है और अंत में बहुकोशिकीय जीव बन जाता है |

    कोशिका कितनी होती है?

    कुछ सजीव जैसे जीवाणुओं के शरीर एक ही कोशिका से बने होते हैं, उन्हें एककोशकीय जीव कहते हैं जबकि कुछ सजीव जैसे मनुष्य का शरीर अनेक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है उन्हें बहुकोशकीय सजीव कहते हैं। मानव शरीर में लगभग 60-90 ट्रिलियन सेल से बना होता है।

    कोशिका की खोज किसने की और कब की?

    कोशिका की खोज सर्वप्रथम रॉबर्ट हुक ने 1665 में की। उन्होंने कार्क की एक महीन काट में मधुमक्खी के छत्ते के समान कोठरियाँ देखी जिन्हें उन्होंने कोशिका (सेल-Cell) का नाम दिया। हुक की इस खोज ने कोशिकाओं को जीवन की सबसे छोटी इकाइयों के रूप में समझने के लिए प्रेरित किया तथा कोशिका सिद्धांत की नींव रखी | 1939 ई० में श्लाइडेन तथा श्वान ने कोशिका सिद्धान्त प्रस्तुत किया जिसके अनुसार सभी सजीवों का शरीर एक या एकाधिक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है तथा सभी कोशिकाओं की उत्पत्ति पहले से उपस्थित किसी कोशिका से ही होती है।

    कोशिका सिद्धान्त किसने प्रस्तुत किया ?

    1939 ई० में श्लाइडेन तथा श्वान ने कोशिका सिद्धान्त प्रस्तुत किया जिसके अनुसार सभी सजीवों का शरीर एक या एकाधिक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है तथा सभी कोशिकाओं की उत्पत्ति पहले से उपस्थित किसी कोशिका से ही होती है।

    कोशिका प्रायः छोटी होती है क्यों?

    कोशिका के बड़े होने के साथ सतह का आयतन अनुपात छोटा हो जाता है। इस प्रकार, यदि कोशिका एक निश्चित सीमा से आगे बढ़ेगी तो पर्याप्त सामग्री कोशिका झिल्ली को पार करने में सक्षम नहीं हो पायेगी यही कारण है कि कोशिकाओं का आकार आम तौर पर छोटा होता है।

    कोशिका का कार्य क्या है?

    सजीवों की सभी जैविक क्रियाएँ कोशिकाओं के भीतर होती हैं। कोशिकाओं के भीतर ही आवश्यक आनुवांशिक सूचनाएँ होती हैं जिनसे कोशिका के कार्यों का नियंत्रण होता है तथा सूचनाएँ अगली पीढ़ी की कोशिकाओं में स्थानान्तरित होती हैं। कोशिका जीवधारियों की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई होती है | कोशिका प्राय: स्वत: जनन की सामर्थ्य रखती है। यह विभिन्न पदार्थों का वह छोटे-से-छोटा संगठित रूप है जिसमें वे सभी क्रियाएँ होती हैं जिन्हें सामूहिक रूप से हम जीवन कहतें हैं।

    कोशिका का सबसे बड़ा कोशिकांग कौन सा है?

    केंद्रक कोशिका का सबसे बड़ा कोशिकांग है। कोशिका द्रव्य में स्थित वह संरचना जो जीवद्रव्य की क्रियाओं को संचालित करता है अर्थात कोशिका का नियंत्रण करता है, केंद्रक कहलाता है | केंद्रक कोशिका का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग है जो कोशिका के प्रबन्धक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। केंद्रक में कोशिका की वंशानुगत जानकारी होती है और कोशिका के विकास और प्रजनन को नियंत्रित भी करती है|

    यूकेरियोटिक से आप क्या समझते हैं?

    इस प्रकार की कोशिकाओं में पूर्ण विकसित केन्द्रक अर्थात् केन्द्रक कला और केन्द्रिका युक्त तथा पूर्ण विकसित कोशिकांग पाए जाते हैं। इस प्रकार की कोशिकाओं के गुणसूत्र में DNA तथा हिस्टोन प्रोटीन से बनी इकाई न्यूक्लिओसोम पाई जाती हैं। ये कोशिका अर्थात् वास्तविक केन्द्रक वाली यूकैरियोटिक कोशिकाएँ अधिकांश शैवाल, उच्च पादप एवं जन्तुओं में पाई जाती हैं।

    प्रोकैरियोटिक कोशिका क्या है ?

    प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में केन्द्रक कला नहीं होती है। इस प्रकार केन्द्रकीय पदार्थ कोशिकाद्रव्य में बिखरा होता है। गुणसूत्र के स्थान पर हिस्टोन प्रोटीन रहित DNA के धागे होते हैं। ऐसी कोशिकाओं में पूर्ण रूप से विकसित कोशिकांगों का अभाव रहता है। ये कोशिकाएँ अर्थात् वास्तविक केन्द्रक रहित प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ नीले-हरे शैवाल, माइकोप्लाज्मा और जीवाणु में पाई जाती हैं।

    मानव शरीर की सबसे छोटी कोशिका कौन है?

    शुक्राणु मानव शरीर की सबसे छोटी कोशिका होती है। यह एक नर जनन कोशिका है ।

    कोशिका कला कहाँ पाई जाती है?

    केन्द्रक कोशिका के लगभग मध्य में स्थित एक गोलाकार या अण्डाकार संरचना होती है। सामान्यतया एक कोशिका में एक ही केन्द्रक पाया जाता है। केन्द्रक एक दोस्तरीय आवरण से घिरी संरचना है जिसे केन्द्रक कला कहते हैं। कोशिका कला या कोशिका झिल्ली (cell membrane) कोशिका की सबसे बाहरी परत, जो उसके विभिन्न घटकों को बाहरी वातावरण से अलग करती है।

    सबसे छोटी कोशिका का नाम क्या है?

    माइकोप्लाज़्मा को सबसे छोटी जीवित कोशिका के रूप में जाना जाता है लेकिन इसमें कोशिका भित्ति नहीं होती है। ये एककोशिकीय जीव हैं जो ऑक्सीजन के बिना जीवित रह सकते हैं।

    रॉबर्ट हुक ने कोशिका की खोज कैसे की?

    कोशिका की खोज सबसे पहले सन् 1665 में “रॉबर्ट हुक”(Robert Hooke) ने किया था रॉबर्ट हुक ने कंपाउंड माइक्रोस्कोप की मदद से बोतल की काॅर्क की महीन टुकड़ों में मधुमक्खी के छत्ते के समान कोठरियां देखी, जिसको उन्होंने “कोशिका” का नाम दिया इसलिए उन्हें कोशिका (Cell) के खोजकर्ता कहा जाता है

    कोशिका चक्र क्या है ?

    कोशिका चक्र, या कोशिका-विभाजन चक्र, एक कोशिका में होने वाली घटनाओं की श्रृंखला है जो इसे दो कोशिकाओं (daughter cell) में विभाजित करने का कारण बनती है।

    कोशिका चक्र का क्रम क्या है?

    एक कोशिका चक्र घटनाओं की एक श्रृंखला है जो एक कोशिका के बढ़ने और विभाजित होने पर घटित होती है अर्थात घटनाओं का वह अनुक्रम जिसमे कोशिका अपने जीनोम का द्विगुणन एवं अन्य संघटको का संश्लेषण होता है और इसके बाद विभाजित होकर दो नयी संतति कोशिकाओं का निर्माण करती है, कोशिका चक्र कहलाती है। कोशिका चक्र की दो मूल प्रावस्थाएँ होती है अर्थात सम्पूर्ण प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होती है, प्रथम चरण में कोशिका के केन्द्रक का विभाजन होता है। इस प्रक्रिया को केन्द्रक-विभाजन (कैरियोकाइनेसिस) कहते हैं। विभाजन के द्वितीय चरण में कोशिका-द्रव्य का विभाजन होता है। इस प्रक्रिया को कोशिका-द्रव्य विभाजन कहते हैं।

    मनुष्य में कोशिका चक्र कितने समय का होता है?

    मनुष्य में कोशिका चक्र 24 घंटे का होता है |

    कोशिका चक्र का सबसे लंबा चरण कौन सा है?

    कोशिका चक्र की सम्पूर्ण प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होती है, प्रथम चरण में कोशिका के केन्द्रक का विभाजन होता है। इस प्रक्रिया को केन्द्रक-विभाजन (कैरियोकाइनेसिस) कहते हैं। विभाजन के द्वितीय चरण में कोशिका-द्रव्य का विभाजन होता है। इस प्रक्रिया को कोशिका-द्रव्य विभाजन कहते हैं।

    कोशिका चक्र का प्रशांत प्रावस्था Go क्या है?

    वे कोशिकाएँ जो आगे विभाजित नहीं होती हैं तथा निष्क्रिय अवस्था में पहुँचती हैं, जिसे कोशिका, चक्र की प्रशांत अवस्था (G0) कहा जाता है। इस अवस्था की कोशिका उपापचयी रूप से सक्रिय होती है, लेकिन विभाजित नहीं होती, इनमें विभाजन जीव की आवश्यकता के अनुसार होता है।

    यीस्ट को कोशिका चक्र पूरा करने में कितना समय लगता है?

    यीस्ट के कोशिका चक्र के पूर्ण होने में लगभग नब्बे मिनट लगते हैं।

    जीवद्रव्य क्या है ?

    कोशिका का एक बड़ा भाग है, जो कोशिका झिल्ली या प्लाज्मा झिल्ली से घिरा एक तरल पदार्थ होता है। इसमें बहुत से कोशिका के घटक होते हैं, जिसे कोशिका अंग कहते हैं, जो कोशिका के लिए विशिष्ट कार्य करते हैं। कोशिकाद्रव्य तथा केन्द्रक दोनों को मिलाकर जीवद्रव्य कहलाता है। यह कोशिकाद्रव्य चिपचिपा, रंगहीन तथा कणिकामय होती है। यहाँ एन्जाइम की प्रचुरता होती है।

    गॉल्जीकाय की खोज कब हुई?

    गॉल्जीकाय (Golgi apparatus also known as the Golgi complex, Golgi body) की पहचान 1897 में इतालवी वैज्ञानिक कैमिलो गोल्गी (Camillo Golgi) ने की थी और 1898 में उनके नाम गॉल्जीकाय का नाम रखा गया था | कैमिलो गोल्गी इटली का एक तंत्रिका वैज्ञानिक था, जिसने श्वेत उलूक (Barn Owl) की तंत्रकोशिकाओं में इसका पता लगाया, जो उसके नाम से ही विख्यात है। इसकी आकृति चपटी होती है तथा ये एक के बाद एक समानान्तर रूप में स्थिर रहे हैं। गॉल्जीकाय को लाइपोकॉण्ड्यिा या डिक्टियोसोम भी कहा जाता है।

    कोशिका का ट्रैफिक पुलिस किसे कहा जाता है ?

    गॉल्जीकाय को कोशिका को ‘ट्रैफिक पुलिस‘ भी कहा जाता है।

    कोशिका का कौन सा अंग आत्मघाती थैली के नाम से जाना जाता है?

    लाइसोसोम (Lysosome) को कोशिका की आत्मघाती थैली या आत्महत्या की थैली कहा जाता है | यह कोशिका का अपशिष्ट निपटाने वाला तन्त्र है। लाइसोसोम में बहुत शक्तिशाली पाचन एंजाइम (digestive enzymes) होते हैं जो कार्बनिक पदार्थ को तोड़ देते हैं। कोशिकीय उपापचय में रूकावट के कारण जब कोशिका क्षतिग्रस्त या मर हो जाती है तो लाइसोसोम फट जाते हैं और अपनी ही कोशिका को पाचित कर देते हैं या खा जाते या नष्ट हो जाते हैं। असल में लाइसोसोम कोशिका का आमाशय (पेट) होते हैं। एसिड भरी ये थैलियां फटने पर उनके एसिड तत्व कोशिका को ही नष्ट कर देते हैं।

    क्यों लाइसोसोम आत्मघाती बैग कहा जाता है?

    लाइसोसोम (lysosomes) को आत्मघाती थैली (suicide bags) इसलिए कहते हैं क्योकि यह कोशिका का अपशिष्ट निपटाने वाला तन्त्र है। लाइसोसोम में बहुत शक्तिशाली पाचन एंजाइम (digestive enzymes) होते हैं जो कार्बनिक पदार्थ को तोड़ देते हैं। कोशिकीय उपापचय में रूकावट के कारण जब कोशिका क्षतिग्रस्त या मर हो जाती है तो लाइसोसोम फट जाते हैं और अपनी ही कोशिका को पाचित कर देते हैं या खा जाते या नष्ट हो जाते हैं। असल में लाइसोसोम कोशिका का आमाशय (पेट) होते हैं। एसिड भरी ये थैलियां फटने पर उनके एसिड तत्व कोशिका को ही नष्ट कर देते हैं।

    कोशिका के किस अंगक को बिजलीघर कहते हैं और क्यों?

    चूँकि सभी आवश्यक रासायनिक क्रियाओं को करने के लिए माइटोकॉण्ड्रिया ATP के रूप में ऊर्जा प्रदान करते हैं इसिलिय माइटोकाण्ड्रिया को कोशिका का ऊर्जा संयन्त्र या बिजली घर कहा जाता है। माइटोकाण्ड्रिया में जो एन्जाइम होते है वो भोजन पदार्थो का ऑक्सीकरण करके ऊर्जा का निर्माण करते है, जो ए.टी.पी. के रूप में एकत्र होती है।

    मानव तंत्रिका कोशिका का रेखाचित्र बनाइए | | तंत्रिका कोशिकाओं द्वारा क्या कार्य किया जाता है ?

    तंत्रिका कोशिका संदेश प्राप्त कर उनका स्थानान्तरण करती है, जिसके द्वारा यह शरीर में नियंत्रण एवं समन्वय का कार्य करती है। इस कोशिका का कार्य मस्तिष्क से सूचना का आदान प्रदान और विश्लेषण करना है किसी चीज के स्पर्श छूने, ध्वनि या प्रकाश के होने पर ये तंत्रिका कोशिका ही प्रतिक्रिया करते हैं और यह अपने संकेत मेरु रज्जु और मस्तिष्क को भेजते हैं। मोटर तंत्रिका कोशिका मस्तिष्क और मेरु रज्जु से संकेत ग्रहण करते हैं। मांसपेशियों की सिकुड़न और ग्रंथियां इससे प्रभावित होती है। एक सामान्य और साधारण तंत्रिका कोशिका में एक कोशिका यानि सोमा, डेंड्राइट और कार्रवाई होते हैं। तंत्रिका कोशिका का मुख्य हिस्सा सोमा होता है।

    माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का ऊर्जा क्यों कहते हैं?

    माइटोकॉन्ड्रिया किसी भी कोशिका के अंदर पाया जाता है जिसका मुख्य काम कोशिका के हर हिस्से में ऊर्जा पहुंचाना होता है | माइटोकाण्ड्रिया में जो एन्जाइम होते है वो भोजन पदार्थो का ऑक्सीकरण करके ऊर्जा का निर्माण करते है, जो ए.टी.पी. के रूप में एकत्र होती है। इसी कारण माइटोकांड्रिया को कोशिका का पावर हाउस भी कहा जाता है |

    अर्धस्वायत्त कोशिकांग (semi autonomous organelle) किसे कहा जाता है ?

    माइटोकॉण्ड्रिया के मैट्रिक्स में क्रैब्स चक्र के एन्जाइम, DNA, राइबोसोम तथा RNA स्थित होते हैं इसलिए माइटोकॉण्ड्रिया को अर्धस्वायत्त कोशिकांग (semi autonomous organelle) कहा जाता है।

    अर्द्धस्वशासित कोशिकांग कोनसे है ?

    माइटोकॉण्ड्रिया और हरितलवक अर्द्धस्वशासित कोशिकांग कहलाते हैं।

    पादप कोशिका और जंतु कोशिका में क्या अंतर है?

    पादप कोशिका
    कोशिका कला चारों ओर से एक भित्ति द्वारा घिरी रहती है, जिसे कोशिका भित्ति कहते हैं, जो प्रायः सेलुलोज नामक पदार्थ की बनी होती है।
    बड़ी-बड़ी रसधानियाँ होती हैं, जो कि कोशिका का काफी बड़ा भाग घेरे रहती हैं।
    लवक पाए जाते हैं (हरे हरितलवक, रंगहीन ल्यूकोप्लास्ट एवं रंगीन क्रोमोप्लास्ट)।
    अधिकांश पौधों की कोशिकाओं में सेन्ट्रोसोम नहीं पाए जाते हैं।
    अधिकांश पौधों की कोशिकाओं में लाइसोसोम नहीं मिलते।

    जन्तु कोशिका
    कोशिका कला के बाहर कोई भित्ति नहीं होती। कोशिका कला ही कोशिका की सीमा है।
    रसधानियाँ अनुपस्थित या बहुत छोटी होती हैं। अतः कोशिकाद्रव्य कोशिका में समान रूप से वितरित रहता है
    लवक नहीं पाए जाते हैं।
    अधिकांश जन्तुओं की कोशिकाओं में सेण्ट्रोसोम पाए जाते हैं।
    लाइसोसोम पाए जाते हैं।

    प्रोकैरियोटिक में कौन कौन से जीव आते हैं?

    प्रोकैरियोटिक कोशिका नीले- हरे शैवालों तथा जीवाणुओं में ये कोशिकाएं पायी जाती हैं। प्रोकैरियोटिक कोशिका में क्लोरोप्लास्ट, गॉल्जीबाड़ी, तारककाय, माइक्रोकान्ड्रिया तथा अन्तः द्रव्यीजालिका (E.R.) नहीं पायी जाती है। फिर भी 70S प्रकार के राइबोसोम्स पाये जाते हैं तथा इनमें डीएनए हिस्टोन प्रोटीन से सम्बद्ध नहीं होता है।

    प्रोकैरियोटिक जीव कौन सा होता है?

    सबसे छोटा ज्ञात प्रोकैरियोटिक जीव माइकोप्लाज्मा है। माइकोप्लाज्मा सबसे छोटे मुक्त जीव हैं और बैक्टीरिया के सबसे सरल माने जाते हैं। वे जीवाणु वर्ग मोलिक्यूट्स से संबंधित हैं, जिनके सदस्य कोशिका भित्ति की कमी और उनके प्लाज्मा जैसे रूप से प्रतिष्ठित हैं।

    माइकोप्लाज्मा क्या है ?

    माइकोप्लाज्मा सबसे छोटे मुक्त जीव हैं और बैक्टीरिया के सबसे सरल माने जाते हैं। वे जीवाणु वर्ग मोलिक्यूट्स से संबंधित हैं, जिनके सदस्य कोशिका भित्ति की कमी और उनके प्लाज्मा जैसे रूप से प्रतिष्ठित हैं। सबसे छोटा ज्ञात प्रोकैरियोटिक जीव माइकोप्लाज्मा ही है।

    सबसे लंबी कोशिका का नाम क्या है?

    मनुष्यों में सबसे लम्बी कोशिका न्यूरॉन्स जिन्हें तंत्रिका कोशिका (nerve cell) भी कहा जाता है होती है | न्यूरॉन्स या तंत्रिका कोशिकाएं 3 फीट तक लंबी हो सकती हैं। ये मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र की मूलभूत इकाइयाँ हैं । एक विशिष्ट न्यूरॉन में एक cell morphology होता है जिसे सोमा कहा जाता है, इनकी बाल जैसी संरचनाएं जिन्हें डेंड्राइट्स और एक अक्षतंतु कहा जाता है। न्यूरॉन्स पूरे शरीर में दिमाग के जरिये knowledge पहुंचाने में सक्षम होते हैं। न्यूरॉन्स में भी विशेषत: motor neuron (मोटर न्यूरॉन) सबसे बड़ी कोशिका होती है | महिलाओं के शरीर में मानव अंडाणु (human egg ) जो की एक अपवाद (exception) है, वास्तव में शरीर की सबसे बड़ी कोशिका होती है |

    महिला शरीर में सबसे बड़ी कोशिका कौन सी है?

    मानव अंडाणु (human egg ) या अंडकोशिका जो की एक अपवाद (exception) है, वास्तव में शरीर की सबसे बड़ी कोशिका है और इसे बिना सूक्ष्मदर्शी के देखा जा सकता है। अन्य मानव कोशिकाओं की तुलना में, अंडे की कोशिकाएं बहुत बड़ी होती हैं। वे व्यास में 100 माइक्रोन हैं (जो कि एक मीटर का दस लाखवां हिस्सा है) और बालों के एक कतरा के बराबर चौड़ाई में होते है।

    सबसे छोटी मानव कोशिका कोनसी होती है ?

    सेरिबैलम (Cerebellum)की ग्रेन्युल कोशिका (Granule Cell) मानव शरीर की सबसे छोटी कोशिका होती है जो 4 माइक्रोमीटर से 4.5 माइक्रोमीटर लंबी होती है। RBC का आकार भी लगभग 5 माइक्रोमीटर पाया गया है ।

    मानव शरीर की सबसे लम्बी और सबसे बड़ी कोशिका कौन सी है?

    मानव अंडाणु (human egg ) या अंडकोशिका मानव शरीर (महिलाओं में ) की सबसे बड़ी कोशिका है। तंत्रिका कोशिका शरीर में सबसे लंबी कोशिका है।

    कोशिका झिल्ली के कौन कौन से कार्य हैं?

    कोशिका झिल्ली लचीली होती है और कार्बनिक अणुओं; जैसे-ग्लाइकोप्रोटीन तथा ग्लाइकोलिपिड की बनी होती है। कोशिका झिल्ली का लचीलापन एककोशिकीय जीवों में कोशिका के बाह्य वातावरण से भोजन तथा अन्य पदार्थ ग्रहण करने में सहायता करता है। इस प्रक्रिया को एण्डोसाइटोसिस कहते हैं। अमीबा इसी प्रक्रिया द्वारा भोजन ग्रहण करता है। कोशिका झिल्ली कोशिका की आकृति का निर्माण करती है एवं जीव द्रव्य की रक्षा करती है। साथ ही कोशिका झिल्लीअन्तर कोशिकीय विसरण एवं परासरण की क्रिया को नियंत्रित करने के साथ-साथ यह विभिन्न रचनाओं के निर्माण में भी सहायता करती है। कोशिका झिल्ली को सी. क्रेमर एवं नेगेली (1855) ने कोशिका कला एवं प्लोव ने जीवद्रव्य कला कहा।

    कोशिका कला क्या है ?

    कोशिका कला या कोशिका झिल्ली कोशिका की सबसे बाहरी परत, जो उसके विभिन्न घटकों को बाहरी वातावरण से अलग करती है। कोशिका के सभी अवयव एक पतली झिल्ली द्वारा घिरे रहते हैं। यह झिल्ली आवश्यक पदार्थों को अन्दर अथवा बाहर जाने देती है। इसी को चयनात्मक पारगम्यता (selective permeability) कहते हैं। इस दृष्टि से O2 एवं CO2, कोशिका झिल्ली के आर-पार विसरण प्रक्रिया तथा जल परासरण प्रक्रिया द्वारा कोशिका के अन्दर एवं बाहर होते हैं।

    लाइसोसोम कौन बनाता है?

    लाइसोसोम मुख्यतया जन्तु कोशिकाओं में पाई जाने वाली गोल इकहरी झिल्लियों से घिरी थैलियाँ है, जिसमें 50 हाइड्रोलिटिक एन्जाइम पाए जाते हैं वे एक एकल झिल्ली से घिरे होते हैं जो मोटाई में 100 एनएम तक होती है। वे गॉल्जी तंत्र द्वारा बनते हैं और इनमें लगभग 60 विभिन्न प्रकार के अम्ल हाइड्रोलाज़ होते हैं जो विभिन्न सामग्रियों के पाचन में मदद करते हैं। , यह लगभग 5 pH पर कार्य करते हैं। यह कोशिका का अपशिष्ट निपटाने वाला तन्त्र है। लाइसोसोम में उपस्थित पाचनकारी एन्जाइम कार्बनिक पदार्थ को तोड़ देते हैं। लाइसोसोम को आत्महत्या की थैली भी कहा जाता है।

    कोशिका की खोज रॉबर्ट हुक ने कब की?

    कोशिका की खोज रॉबर्ट हुक ने 1665 में की | कोशिका जीवधारियों की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई होती है | कोशिका प्राय: स्वत: जनन की सामर्थ्य रखती है। यह विभिन्न पदार्थों का वह छोटे-से-छोटा संगठित रूप है जिसमें वे सभी क्रियाएँ होती हैं जिन्हें सामूहिक रूप से हम जीवन कहतें हैं।

    प्रोकैरियोटिक एवं यूकैरियोटिक कोशिका में क्या अंतर है?

    प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं (Prokaryotic Cell) में केन्द्रक कला नहीं होती है। इस प्रकार केन्द्रकीय पदार्थ कोशिकाद्रव्य में बिखरा होता है। गुणसूत्र के स्थान पर हिस्टोन प्रोटीन रहित DNA के धागे होते हैं। ऐसी
    कोशिकाओं में पूर्ण रूप से विकसित कोशिकांगों का अभाव रहता है। ये कोशिकाएँ अर्थात् वास्तविक केन्द्रक रहित प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ नीले-हरे शैवाल, माइकोप्लाज्मा और जीवाणु में पाई जाती हैं।
    यूकैरियोटिक कोशिका (Eukaryotic Cell) कोशिकाओं में पूर्ण विकसित केन्द्रक अर्थात् केन्द्रक कला और केन्द्रिका युक्त तथा पूर्ण विकसित कोशिकांग पाए जाते हैं। इस प्रकार की कोशिकाओं के गुणसूत्र में DNA तथा हिस्टोन प्रोटीन से बनी इकाई न्यूक्लिओसोम पाई जाती हैं। ये कोशिका अर्थात् वास्तविक केन्द्रक वाली यूकैरियोटिक कोशिकाएँ अधिकांश शैवाल, उच्च पादप एवं जन्तुओं में पाई जाती हैं।

    वनस्पति तथा जंतु कोशिका में समान रूप से क्या पाए जाते हैं?

    संरचनात्मक रूप से, पौधे और जंतु कोशिकाएं बहुत समान हैं क्योंकि वे दोनों यूकेरियोटिक कोशिकाएं हैं। इन दोनों में केन्द्रक, माइटोकॉन्ड्रिया, अन्तःप्रद्रव्यी जालिका, गॉल्जीकाय, लाइसोसोम और पेरॉक्सिसोम जैसे झिल्ली-बद्ध अंग होते हैं। दोनों में समान झिल्ली, साइटोसोल और साइटोस्केलेटल तत्व भी होते हैं। कोशिका सिदान्त वनस्पति विज्ञान शास्त्री श्लाइडेन और जन्तु विज्ञान शास्त्री श्वान ने प्रस्तुत की थी, जिसके अनुसार, सभी पौधे तथा जन्तु कोशिकाओं से बने हैं और ये जीवन की मूलभूत इकाई हैं। जीवधारियों (जन्तु एवं वनस्पति) का शरीर एक या अनेक कोशिकाओं से बने होते हैं, जो शरीर की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है तथा जीवद्रव्य इसका भौतिक आधार होता है। कोशिका सिदान्त वनस्पति विज्ञान शास्त्री श्लाइडेन और जन्तु विज्ञान शास्त्री श्वान ने प्रस्तुत की थी, जिसके अनुसार, सभी पौधे तथा जन्तु कोशिकाओं से बने हैं और ये जीवन की मूलभूत इकाई हैं। जीवधारियों (जन्तु एवं वनस्पति) का शरीर एक या अनेक कोशिकाओं से बने होते हैं, जो शरीर की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है तथा जीवद्रव्य इसका भौतिक आधार होता है।

    प्लांट सेल और एनिमल सेल में क्या अंतर है?

    पादप कोशिका (प्लांट सेल) में कोशिका कला चारों ओर से एक भित्ति द्वारा घिरी रहती है, जिसे कोशिका भित्ति कहते हैं, जो प्रायः सेलुलोज नामक पदार्थ की बनी होती है।
    पादप कोशिका (प्लांट सेल) में बड़ी-बड़ी रसधानियाँ होती हैं, जो कि कोशिका का काफी बड़ा भाग घेरे रहती हैं। पादप कोशिका (प्लांट सेल) में लवक पाए जाते हैं (हरे हरितलवक, रंगहीन ल्यूकोप्लास्ट एवं रंगीन क्रोमोप्लास्ट)। अधिकांश पौधों की कोशिकाओं में सेन्ट्रोसोम नहीं पाए जाते हैं। अधिकांश पौधों की कोशिकाओं में लाइसोसोम नहीं मिलते।
    जबकि जन्तु कोशिका ( एनिमल सेल) में कोशिका कला के बाहर कोई भित्ति नहीं होती। कोशिका कला ही कोशिका की सीमा है। जन्तु कोशिका ( एनिमल सेल) में रसधानियाँ अनुपस्थित या बहुत छोटी होती हैं। अतः कोशिकाद्रव्य कोशिका में समान रूप से वितरित रहता है | जन्तु कोशिका ( एनिमल सेल) में लवक नहीं पाए जाते हैं। अधिकांश जन्तुओं की कोशिकाओं में सेण्ट्रोसोम पाए जाते हैं। जन्तु कोशिका ( एनिमल सेल) में लाइसोसोम पाए जाते हैं।

    लाइसोसोम कैसे उत्पन्न होते हैं?

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) और गॉल्जी काय (Golgi body) के द्वारा लाइसोसोम का निर्माण के द्वारा होता है। अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) के द्वारा लाइसो सोम के एंजाइमों का निर्माण होता है। लाइसोसोम मुख्यतया जन्तु कोशिकाओं में पाई जाने वाली गोल इकहरी झिल्लियों से घिरी थैलियाँ है, जिसमें 50 हाइड्रोलिटिक एन्जाइम पाए जाते हैं, जो लगभग 5 pH पर कार्य करते हैं। यह कोशिका का अपशिष्ट निपटाने वाला तन्त्र है। लाइसोसोम में उपस्थित पाचनकारी एन्जाइम कार्बनिक पदार्थ को तोड़ देते हैं। लाइसोसोम को आत्महत्या की थैली भी कहा जाता है।

    माइटोकांड्रिया के तीन कार्य क्या है?

    माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का पावर हाउस या ऊर्जा घर कहां जाता है इसमें ऑक्सीश्वसन के दौरान निकलने वाली ऊर्जा एडिनोसीन ट्राईफॉस्फेट (ATP) के रूप में संचित रहती है और सभी आवश्यक रासायनिक क्रियाओं को करने के लिए माइटोकॉण्ड्रिया ATP के रूप में ऊर्जा प्रदान करते हैं। माइटोकॉण्ड्रिया के मैट्रिक्स में क्रैब्स चक्र के एन्जाइम, DNA, राइबोसोम तथा RNA स्थित होते हैं इसलिए माइटोकॉण्ड्रिया को अर्धस्वायत्त कोशिकांग (semi autonomous organelle) कहा जाता है।

    लवक कहाँ पाए जाते है?

    लवक पादप कोशिकाओं के कोशिका द्रव में पाए जाने वाले गोल या अंडाकार रचना हैं, इनमें पादपों के लिए महत्त्वपूर्ण रसायनों का निर्माण होता है। लवक केवल पादप कोशिकाओं में स्थित होते हैं। ये तीन प्रकार के अर्थात् हरितलवक, अवर्णी लवक तथा वर्णी लवक होते हैं। हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) नामक हरे रंग के लवक में जीव जगत की सबसे महत्त्वपूर्ण जैव रासायनिक क्रिया प्रकाश-संश्लेषण होती है।

    कौन से कोशिकांग सक्रिय श्वसन स्थल है?

    कोशिका में श्वसन की क्रिया का कार्यस्थल माइटोकॉन्ड्रिया को कहा जाता है। श्वसन ऐसी प्रक्रिया है जिसके दौरान शरीर की आवश्यकता के लिए उसकी स्तर पर कहें तो कोशिका की ऊर्जा की आपूर्ति के लिए आवश्यक एडिनोसीन ट्राईफॉस्फेट (ATP) की उत्पत्ति श्वसन की क्रिया के द्वारा की जाती है। माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का पावर हाउस या ऊर्जा घर कहां जाता है इसमें ऑक्सीश्वसन के दौरान निकलने वाली ऊर्जा एडिनोसीन ट्राईफॉस्फेट (ATP) के रूप में संचित रहती है और सभी आवश्यक रासायनिक क्रियाओं को करने के लिए माइटोकॉण्ड्रिया ATP के रूप में ऊर्जा प्रदान करते हैं।

    माइटोकॉण्ड्रिया की अन्तःकला में क्या स्थित होता है ?

    क्रेब्स चक्र का सक्सिनिक डीहाइड्रोजीनेज एन्जाइम माइटोकॉण्ड्रिया की अन्तःकला में स्थित होता है।

    कोशिका का कोनसा भाग जीवन का आधार होता है ?

    हक्सले ने बताया कि जीवद्रव्य जीवन का भौतिक आधार है।

    गॉल्जीकाय का कार्य क्या है ?

    गॉल्जीकाय पादप कोशिकाओं में कोशिका पट्ट के निर्माण में भाग लेती हैं, इसलिए कोशिका विभाजन के समय संख्या बढ़ जाती है।

    लोमासोम किसे कहते है ?

    कवकों में कोशिका भित्ति व प्लाज्मालेमा के बीच पाई जाने वाली विशेष रचना लोमासोम कहलाती है।

    टीलोमीयर क्या होते है ?

    गुणसूत्र के सिरों को टीलोमीयर कहते हैं, ये गुणसूत्रों को स्थायित्व प्रदान करते हैं।

    प्रकाश-संश्लेषण की इकाई कोशिका कोनसी है ?

    थाइलेकॉइड पर पाई जाने वाली कोशिकाएँ क्वान्टासोम प्रकाश-संश्लेषण की इकाई है। प्रत्येक क्वान्टासोम में 250-300 हरितलवक अणु उपस्थित होते हैं।

    यूकैरियोटिक कोशिका के कोशिकाद्रव्य, हरितलवक तथा माइटोकॉण्ड्रिया में किस प्रकार के राइबोसोम होते है ?

    यूकैरियोटिक कोशिका के कोशिकाद्रव्य में 80S प्रकार के राइबोसोम तथा हरितलवक तथा माइटोकॉण्ड्रिया में 70 S प्रकार के राइबोसोम उपस्थित होते हैं।

    राइबोसोम अन्तःप्रद्रव्यी जालिका से कैसे जुड़े होते है ?

    राइबोसोम अन्तःप्रद्रव्यी जालिका से एक ग्लाइकोप्रोटीन राइबोफोरीन द्वारा जुड़े होते हैं।

    सपाट अन्तःप्रद्रव्यी जालिका पर किसका संश्लेषण होता है ?

    सपाट अन्तःप्रद्रव्यी जालिका पर लिपिड का संश्लेषण होता है।

    अलग अलग जीवों में हरितलवक के आकार

    क्लोरेला एवं क्लेमाइडोमोनास में हरितलवक प्यालेनुमा, यूलोथ्रिक्स में मेखलाकार, जिग्निमा में तारेनुमा, क्लेडोफोरा एवं ऊडोगोनियम में जालिकामय एवं स्पाइरोगायरा में कुण्डलाकार होते हैं।

    ग्रेना किसमे नही पाए जाते है ?

    शैवालों तथा बण्डल आच्छद कोशिकाओं की हरितलवक में ग्रेना नहीं पाये जाते हैं।

  • गुणसूत्र की खोज, संरचना, आकार, आकृति, रासायनिक संगठन, प्रकार एवं कार्य (Chromosome in Hindi सम्पूर्ण जानकारी)

    गुणसूत्र की खोज, संरचना, आकार, आकृति, रासायनिक संगठन, प्रकार एवं कार्य (Chromosome in Hindi सम्पूर्ण जानकारी)

    इस आर्टिकल में हम गुणसूत्र यानी क्रोमोसोम के बारे में विस्तृत में बतायेगे | गुणसूत्र क्या होते है ? गुणसूत्र की खोज कितने की ?, गुणसूत्रों की सरंचना कैसी होती है ? क्रोमोसोम का आकर कैसा होता है; गुणसूत्र किस आकृति में पाए जाते है ; गुणसूत्रों का रासायनिक संगठन क्या है ? गुणसूत्र कितने प्रकार के होते है ? और सबसे प्रमुख गुणसूत्रों के कार्य क्या होते है ? प्रमुख जीवों में गुणसूत्र की संख्या कितनी होती है ? जीन क्या होते है ? जीनोम क्या होते है और कैसे ये गुणसूत्रों से संबध रखते है ? आदि | साथ ही हम बात करेगे की कैसे स्तनधारी जीवों में एक्स (X) गुण सूत्र और वाई (Y) गुणसूत्र की भूमिका महत्वपूर्ण होती है |

    गुणसूत्र (Chromosome) क्रोमोसोम क्या होते है ?

    गुणसूत्र या क्रोमोसोम (Chromosome) सभी वनस्पतियों व जीवों की कोशिकाओं में पाये जाने वाले तंतु रूपी पिंड होते हैं, जो आनुवांशिक गुणों को निर्धारित व संचारित करने के लिए जाने जाते हैं। गुणसूत्र कोशिका के केन्द्रक (Nucleus) में सूक्ष्म सूत्र जैसा भाग है जो वंशागति के लिए आवश्यक है। क्रोमैटिन कोशिका विभाजन के समय सिकुड़कर छोटे और मोटे धागों का रुप ले लेते हैं। इन्हीं धागों को ही गुणसूत्र या क्रोमोसोम कहा जाता है, जिसमें कोशिका विभाजन नहीं होता है उसमें यह क्रोमैटिन पदार्थ के रूप में विद्यमान रहता है। गुणसूत्र (क्रोमोसोम) में आनुवंशिक गुण होते हैं, जो माता-पिता से DNA अणु के रूप में अगली सन्तति में जाते हैं। DNA अणु में कोशिका के निर्माण और संगठन की सभी आवश्यक सूचनाएँ होती हैं। गुणसूत्रों को ही अनुवांशिक लक्षणों का वाहक कहा जाता है।

    कोशिका के मध्य में गोलाकार या अण्डाकार रचना होती है, जिसे केन्द्रक कहा जाता है। कोशिका का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग, जो कोशिका के प्रबन्धक के रूप में भूमिका निभाता है। केन्द्रक के चार भाग होते हैं – केन्द्रक कला, केन्द्रक द्रव्य, केन्द्रिका तथा क्रोमैटिन। केन्द्रकद्रव्य में धागेनुमा पदार्थ जाल के समान होती है, जो क्रोमैटिन कहलाता है। यह DNA, हिस्टोन प्रोटीन तथा नॉन-हिस्टोन प्रोटीन का बना होता है।

    गुणसूत्र की खोज किसने की

    स्ट्रासबर्गर ने 1875 ई मे गुणसूत्र की खोज किया। सर्वप्रथम क्रोमोसोम ( रंगीन काय ) शब्द का प्रयोग वाल्डेयर ने 1889 में किया।

    गुणसूत्र (Chromosome) की सरंचना

    प्रत्येक गुणसूत्र में जेली के समान एक गाढ़ा द्रव होता है, जिसे मैट्रिक्स कहा जाता है। इसी मैट्रिक्स में दो परस्पर लिपटे महीन एवं कुण्डलित सूत्र, जिसे क्रोमैनिमेटा (Chromonemata) कहा जाता है। प्रत्येक क्रोमैनिमेटा एक अर्द्ध-गुणसूत्र (Chromatid) कहलाता है। ये दोनों क्रोमैटिड गुणसूत्रबिंदु (सेन्ट्रोमीयर) नामक स्थान पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं |

    गुणसूत्र की संरचना में निम्न भाग पाए जाते है :

    अर्धगुणसूत्र या क्रोमेटिड (Chromatid)

    कोशिका विभाजन की मेटाफेज (Metaphase) में गुण सूत्र के दो लंबवत भाग एक ही गुणसूत्रबिंदु से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। इनको अर्धगुणसूत्र या क्रोमेटिड कहते है। ऐनाफेज अवस्था के दौरान गुणसूत्रबिंदु का विभाजन होने से यह दोनों क्रोमेटिड पृथक हो जाते हैं, और पुत्रीगुणसूत्र (Daughter Chromosome) बनाते हैं।

    क्रोमोनिमेटा (Chromonemata)

    इंटरफ़ेज (Interphase) में गुण सूत्र अत्यधिक कुंडली अवस्था में दिखाई देता है, इन्हें वर्ण-गुणसूत्र या क्रोमोनिमेटा (Chromonemata) कहते है ।

    क्रोमोमियर (Chromomere)

    क्रोमोनिमेटा पर बिंदु के जैसी अत्यधिक कुंडली (Coiled) संरचनाएं दिखाई देती है, जिन्हें क्रोमोमियर (Chromomere) कहा जाता है।

    गुणसूत्रबिंदु (Centromere)

    क्रोमोसोम की लंबाई में एक स्थान पर यह थोड़ा संकरा होता है, इस भाग को प्राथमिक संकीर्णन (Primary Constriction) या गुणसूत्रबिंदु (Centromere)  कहा जाता हैं। गूणसूत्र बिन्दु (Centromere) की स्थिति के आधार पर गुणसूत्र अकेन्द्री (अर्थात् सेन्ट्रोमीयर रहित), अन्त:केन्द्री (सेन्ट्रोमीयर एक किनारे पर), अग्रकेन्द्री (सेन्टीमीटर किनारे के समीप) मध्यकेन्द्री (सेन्ट्रोमीयर मध्य में) तथा उपमध्यकेन्द्री (अर्थात् सेन्ट्रोमीयर मध्य भाग से थोड़ा दूर) होते हैं।

    काइनेटोकोर (Kinetochore)

    गुणसूत्रबिंदु पर पाई जाने वाला प्रोटीन काइनेटोकोर (Kinetochore) कहलाता है । कोशिका विभाजन के दौरान तर्कू तंतु (Spindal Fibers) काइनेटोकोर से ही जुड़ते हैं ।

    द्वितीयक संकीर्णन (Secondary Constriction)

    कुछ गुणसूत्रों में प्राथमिक संकीर्णन (Primary Constriction) के अलावा एक अन्य संकरा भाग भी पाया जाता है, जिसे द्वितीयक संकीर्णन कहते हैं।

    अनुषंघी सैटेलाइट क्रोमोसोम (Satellite Chromosome)

    ऐसे गुण सूत्र जिनमें द्वितीयक संकीर्णन (Secondary Constriction) पाया जाता है, उनके द्वितीयक संकीर्णन के ऊपर की एक छोटी भुजा सेटेलाइट (Satellite) कहलाती है और इन्हें ही सैटेलाइट गुणसूत्र (Satellite Chromosome) कहा जाता हैं।

    टिलोमीयर (Telomere)

    गुणसूत्रों का आखरी छोर (End tip) टिलोमीयर कहलाता है।

    गुणसूत्र का रासायनिक संगठन

    गुणसूत्र में डीएनए (DNA) और प्रोटीन पाए जाते हैं।

    यह प्रोटीन दो प्रकार के होते हैं-

    हिस्टोन प्रोटीन  (Histon Protein)

    नॉन हिस्टोन प्रोटीन ((Non Histon Protein)

    हिस्टोन प्रोटीन (Histon Protein)

    यह क्षारीय प्रोटीन (Alkali Protein) होते हैं जिनमे लाइसिन और आर्जिनिन (Lysine and Arginine) अमीनो अम्ल की मात्रा अधिक होती है। हिस्टोन डीएनए को उलझने से रोकते हैं और डीएनए को होने वाले नुकसान से बचाते हैं। इसके अलावा, हिस्टोन जीन विनियमन और डीएनए प्रतिकृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हिस्टोन के बिना, गुणसूत्रों में अवांछित डीएनए बहुत लंबा होगा।

    हिस्टोन प्रोटीन पांच प्रकार के होते हैं जिनका नाम निम्न है

    • H1
    • H2A
    • H2B
    • H3
    • H4

    इनमें से H2A, H2B H3, H4 के दो-दो इकाई जुड़कर हिस्टोन अष्टक (Histon Octamere) का निर्माण करते हैं। इनको कॉड कण (Core Partical) भी कहा जाता है।

    न्यूक्लियोसोम

    हिस्टोन अष्टक के साथ डीएनए की लगभग दो कुंडली तथा H1 हिस्टोन जुड़कर एक संरचना बनाती है, जिसे न्यूक्लियोसोम (Nucleosome) कहा जाता है।

    एक न्यूक्लियोसोम यूकेरियोट्स (eukaryotes) में डीएनए पैकेजिंग की बुनियादी संरचनात्मक इकाई है | कोशिका केन्द्रक के भीतर फिट होने के लिए डीएनए का न्यूक्लियोसोम में संघनित होना जरुरी होता है |

    लगभग 6 न्यूक्लियोसोम (Nucleosome) आपस में जुड़ कर सोलेनोइड (Solenoid) नामक संरचना का निर्माण करते हैं। सोलेनोइड की अवधारणा आउडेट के द्वारा दी गई तथा न्यूक्लियोसोम प्रतिरूप कोर्नबर्ग (Roger David Kornberg) तथा थॉमस के द्वारा दिया गया।

    गुणसूत्रों की आकृति

    गुणसूत्रबिन्दु की स्थिति और गुणसूत्रभुजा (Chromosomal arm) की लंबाई के आधार पर, गुणसूत्रों को चार समूहों में वर्गीकृत किया जाता है :

    1. अग्र केन्द्रकी (Telocentric)
    2. अग्रबिंदु या उप-अन्तकेन्द्रकी (Acrocentric)
    3. उप-मध्यकेन्द्रकी (Submetacentric)
    4. मध्यकेन्द्रकी (Metacentric)

    अग्र केन्द्रकी गुणसूत्र (Telocentric chromosome)

    टेलोसेंट्रिक गुणसूत्रों में, गुणसूत्रबिन्दु (Centromere)  गुणसूत्र के अंतिम सिरे (टिप) पर स्थित होता है। इस प्रकार के गुणसूत्र कोशिका विभाजन की एनाफेज (Anaphase) अवस्था में ’i’ आकार की संरचना के रूप में दिखाई देते हैं। इन गुणसूत्रों में केवल एक गुणसूत्रभुजा (Chromosomal arm) होता है। इस प्रकार के chromosome में बहुत दुर्लभ होते हैं और इन्हें केवल बहुत कम प्रजातियों में देखा गया है।

    अग्रबिंदु या उपअन्तकेन्द्रकी गुणसूत्र (Acrocentric chromosome )

    गुणसूत्रबिन्दु (Centromere) क्रोमोसोम के एक छोर पर इस तरह से स्थित होते है कि इनकी एक बहुत ही छोटी भुजा (P arm) और एक असाधारण लंबी भुजा (Q arm) होती है। कोशिका विभाजन की  मेटाफ़ेज़ अवस्था (Metaphase) में ये ‘J ‘आकार की संरचनाओं के रूप में दिखाई देते हैं।

    टिड्डियों के कुल Acrididae में ऐसे गुण सुत्रों को देखा गया जिससे इनका नाम Acrocentric क्रोमोसोम रखा गया है।

    सभी एक्रोकेंट्रिक क्रोमोसोम SAT-गुणसुत्र होते है।

    SAT-गुणसुत्र  ऐसे गुणसूत्र होते है जिनमें प्राथमिक संकीर्णन के अलावा एक अन्य द्वितीयक संकीर्णन (Secondary Constriction) भी पाया जाता है जिससे गुणसूत्र के एक छोर पर एक घुंडी जैसी संरचना दिखती जिसे सेटेलाइट कहते है और ऐसे गुणसूत्र SAT-गुणसुत्र कहलाते है ।
    मानव में, गुणसूत्र संख्या 13, 15, 21 और 22  ऐसे ही गुण सूत्र होते हैं।

    उप-मध्यकेन्द्रकी गुणसूत्र (Submetacentric chromosome)

    सेंट्रोमियर क्रोमोसोम के केंद्र या मध्य से थोडा दूर स्थित होता है। इसमें दो असमान भुजा (Chromosome arm) होती है एक भुजा छोटी और एक बड़ी भुजा होती है। सबमेटासेंट्रिक गुणसूत्र कोशिका विभाजन के ऐनाफेज (Anaphase) अवस्था में L आकार की संरचनाओं के रूप में दिखाई देते हैं। मानव गुणसूत्रों के अधिकांश submetacentric chromosome होते हैं।

    मध्यकेन्द्रकी गुणसूत्र (Metacentric chromosome)

    गुणसूत्रबिन्दु (centromere) क्रोमोसोम के बिल्कुल केंद्र में स्थित होता है। इस प्रकार गुणसूत्रों के दो बराबर आकार की भुजाएँ होती है।

    मेटासेंट्रिक गुणसूत्र कोशिका विभाजन के एनाफेज (Anaphase) में V आकार की संरचनाओं के रूप में दिखाई देंगे।

    इन गुणसूत्रों को एक आदिम प्रकार (Primitive) का गुणसूत्र माना गया है। जो प्रोकैरियोट में पाया जाया है |

    उभयचर में एवं मानव के गुणसूत्र संख्या 1 और 3 मध्यकेन्द्रकी गुणसूत्र होते हैं।

    गुणसूत्रों के प्रकार ( Type of Chromosomes)

    गुणसूत्र चार प्रकार के होते हैं-

    अलिंग गुणसूत्र (Autosomal Chromosome)

    यह लिंग से संबंधित लक्षणों को छोड़कर सभी प्रकार के कायिक लक्षणों (Somatic symptoms) का निर्धारण करते हैं। इनकी संख्या मानव में 44 होती है।

    लिंग गुणसूत्र (Sex Chromosome)

    यह लिंग का निर्धारण (Sex determination) करते है इनकी संख्या में दो होती है। पुरुष में XY तथा मादा में XX।

    सहायक गुणसूत्र (Acessory Chromosome)

    यह गुणसूत्रों के छोटे-छोटे टुकड़े होते हैं, जिनमें गुणसूत्रबिंदु नहीं पाया जाता। सहायक गुणसूत्र अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) में भाग नहीं लेते। अनुवांशिक रूप से निष्क्रिय होते हैं। इनकी खोज विल्सन द्वारा की गई। मनुष्यों में, प्रत्येक 1500 में लगभग एक व्यक्ति में एक सहायक गुणसूत्र होता है, और इनमें से कुछ मानसिक या शारीरिक असामान्यताओं (mental or physical abnormalities) से जुड़े होते हैं

    विशालकाय गुणसूत्र (Giant  chromoses)

    पॉलीटीन गुणसूत्र (Polytene Chromosome)

    इसकी खोज ई.जी. बालबियानी (E.G. balbiani) ने डायप्टेरा (diapteron) कीटों के लार्वा की लार ग्रंथि में की। पॉलीटीन गुणसूत्र कोल्लर (koller) द्वारा दिया गया। इसमें कई क्रोमोनिमा (chromonema) होते हैं, इसलिए इसे पॉलीटीन गुणसूत्र कहा जाता है।

    इनके कई क्रोमोनिमा क्रोमोमियर से जुड़े रहते हैं। प्रत्येक क्रोमोनिमा में पफ क्षेत्र और गैर-पफ (पफ विहीन) क्षेत्र (puffed region & non-puffed regions) होते हैं। पफ क्षेत्र में बालबियानी छल्ले (Balabiani rings) होते हैं जो डीएनए, आरएनए और प्रोटीन से बने होते हैं।

    ड्रोसोफिला मेलेनोगैस्टर में इनकी आमाप 2000 um होती है। इन गुणसूत्रों में गहरी व हल्की अनुप्रस्थ पट्टियों का विशिष्ट अनुक्रम होता है। गहरी पट्टियाँ यूक्रोमेटिन तथा हल्की पट्टियाँ हेटेरोक्रोमेटिन कहलाती है। इन गुणसूत्रों में गहरी पट्टियों पर लूपनुमा पफ बन जाते हैं। इन विशिष्ट लूपों को बालबियनी लूप कहते हैं। इन लूपों में mRNA का संश्लेषण होता है। गैर-पफ क्षेत्र छल्ले के होते हैं लेकिन वे बैंड (पट्टी) और इंटरबैंड से बने होते हैं। ये क्रोमोसोम एंडोमाइटोसिस (endomostosi) द्वारा बनते हैं। ये कीटों के लार्वा में कायान्तरण (मेटामॉर्फोसिस – metamorphosis) को बढ़ावा देते हैं।

    लैंपब्रश गुणसूत्र (Lampbrush Chromosomes)

    कशेरुकियों के परिवर्धनशील अण्डाणु के गुणसूत्रों का आकार लैम्प साफ करने वाले ब्रश जैसा हो जाता है। लैम्प (Lamp) की सफाई करने वाले ब्रश की तरह दिखाई देने के कारण इनको लैंप ब्रश गुणसूत्र (Lampbrush Chromosome) नाम दिया गया। इन गुणसूत्रों का मुख्य केन्द्रीय कुछ DNA का तथा लूप DNA व RNA के बने होते हैं। इनकी खोज रुकर्ट ने की। लैम्पब्रश गुणसूत्र स्तनधारियों को छोड़कर अधिकांश जानवरों के बढ़ते oocytes (अपरिपक्व अंडे) में पाए जाने वाले गुणसूत्र का एक विशेष रूप है | ये शार्क, उभयचर, सरीसृप और पक्षियों के प्राथमिक अण्डक (oocytes) में अर्द्धसूत्री विभाजन के प्रोफेज-I की डिप्लोटिन अवस्था में पाये जाते है। वे अण्डों योक के संश्लेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसमें एक मुख्य अक्ष होता है जिसमें डीएनए और प्रोटीन से बने दो क्रोमोनिमा (chromonema) होते हैं।

    जीन (Gene)

    जीनशब्द को जोहन्सन ने दिया था। आधुनिक शोधों के अनुसार, एक जीन, DNA के एक ऐसा खण्ड है, जो किसी एक विशिष्ट प्रकार की प्रोटीन (एन्जाइम) के संश्लेषण का नियमन करता है। इस भाग को सिस्ट्रॉन कहते हैं।

    इन्हीं जीनों के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में आनुवंशिक लक्षण हस्तान्तरित होते हैं। अतः जीन ही आनुवंशिक गुणों हेतु उत्तरदायी हैं।

    जीनोम (Genome)

    जीनोम (Genome) एक अगुणित गुणसूत्रों के समुच्चय को जीनोम कहते हैं; जैसे-एक युग्मक में उपस्थित कुल गुणसूत्र।

    कैरियोटाइप किसी जाति के कुल गुणसूत्रों की आकारिकी को कैरियोटाइप कहा जाता है।

    इसके अन्तर्गत निम्न लक्षण निहित हैं:

    (i) गुणसूत्रों की संख्या (ii) गुणसूत्रों की कुल लम्बाई (iii) प्रत्येक गुणसूत्र की लम्बाई तथा व्यास (iv) लघु व वृहत् भुजा का अनुपात।

    इडिओग्राम (Idiograms )

    जब किसी जाति के कैरियोटाइप को विशिष्ट चित्रों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है, तो इन चित्रों को इडिओग्राम कहते हैं।

    कुछ प्रमुख जीवों में गुणसूत्रों की संख्या

    किसी भी जाति में सभी जीवो में गुणसूत्रों की संख्या एक समान होती है। भिन्न-भिन्न यानि अलग जातियों के जीवो में इनकी संख्या अलग-अलग होती है। कुछ जीवों उपस्थित गुणसूत्रों की संख्या निम्न होता है।

    जीवसंख्याजीवसंख्या
    ऐस्कैरिस मैगासिफेलस190मानव46
    अमीबा250गोरिल्ला48
    मटर14चिम्पैन्जी48
    मक्का20चूहा40
    गेहूँ42घोड़ा64
    आलू48कुत्ता78
    मेंढक26घरेलू मक्खी12
    बिल्ली38

    गुणसूत्रों के कार्य – Works of Chromosome

    जीवों में गुणसूत्रों का प्रमुख कार्य निम्न है :

    अनुवांशिकता में प्रमुख भूमिका

    गुणसूत्र अनुवांशिकता का वाहक है जिसमें विभिन्न प्रकार की प्रकार की क्रियाओं के लिए संदेश निहित होते हैं। यह प्रोटीन की बहुत से जटिल अणुओं के द्वारा बनते हैं

    जनन की इकाई के रूप में

    गुणसूत्रों के प्रतिलिपिकरण द्वारा संतति गुणसूत्र बन जाते हैं, जो उत्पन्न संतति कोशिकाओं में पहुंचते हैं।

    एक्स (X) गुण सूत्र और वाई (Y) गुणसूत्र की भूमिका

    स्तनधारी जीवों, जिसमें मनुष्य भी शामिल हैं, में लिंग निर्धारण करने वाले दो गुणसूत्रों – एक्स (X) गुण सूत्र और वाई (Y) गुणसूत्र की भूमिका होती है। पुरुषों में एक Y और एक X गुण सूत्र होता है, जबकि महिलाओं में दो X गुणसूत्र होते हैं। किसी पिता का Y गुणसूत्र बिना किसी बदलाव के उसके पुत्रों में जाता है। इसलिए, Y गुणसूत्र के अध्ययन से किसी भी पुरुष के पितृवंश समूह का पता लगाया जा सकता है। Y गुणसूत्र को पुरुष निर्धारण गुणसूत्र के रूप में जाना जाता है। यह अपने साथी X की तुलना में एक छोटा गुणसूत्र है।

    मनुष्य – 46 (23 जोडें) गुणसूत्र

    एक नये अध्ययन में, भारतीय वैज्ञानिकों ने Y क्रोमोसोम के बारे में चौंकाने वाला खुलासा किया है, जो बताता है कि लिंग निर्धारण के अलावा कुछ अन्य प्रक्रियाओं में भी Y क्रोमोसोम की भूमिका हो सकती है। इस अध्ययन में, वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि वाई गुणसूत्र पुरुष प्रजनन में शामिल अन्य गुणसूत्रों पर जीन को नियंत्रित करता है।

    Y गुणसूत्र पर डीएनए अनुक्रम कई प्रतियों में मौजूद होते हैं और उनमें से बहुत कम प्रोटीन के लिए कोडिंग का काम करते हैं। अब तक यह समझा जाता था कि वे Y गुणसूत्रों पर कुछ प्रोटीन कोडिंग जीन्स के लिए पैकिंग सामग्री के रूप में कार्य करते हैं। कोई स्पष्ट कार्य नहीं होने के कारण, Y गुणसूत्र के डीएनए के अधिकांश भाग को व्यर्थ माना जाता था। सीएसआईआर-कोशिकीय एवं आणविक जीवविज्ञान केन्द्र (सीसीएमबी) के वैज्ञानिक प्रोफेसर राशेल जेसुदासन के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में Yगुणसूत्र डीएनए के आश्चर्यजनक अभिनव नियामक कार्यों के बारे खुलासा किया गया है।

    चूहों के Y क्रोमोसम पर किए गए इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया है कि डीएनए के एक गुच्छे का चूहे के वाई गुणसूत्र पर दोहराव होता है, जो वृषण या शुक्र-गन्थि में, विशेष रूप से प्रजनन के लिए आवश्यक अन्य गुणसूत्रों से व्यक्त जीन को नियंत्रित करता है। उन्होंने यह भी दिखाया है कि ये दोहराव प्रजाति-विशिष्ट हैं, यानी वे अन्य प्रजातियों में मौजूद नहीं हैं। शोधकर्ताओं का कहना यह भी है कि ये दोहराव छोटे आरएनए (RNA) के एक वर्ग को जन्म देते हैं, जिन्हें पीआईआरएनए (piRNA) कहा जाता है।

    प्रोफेसर जेसुदासन कहते हैं – “मानव Y गुणसूत्र पर हमारे पहले के अध्ययनों में देखा गया है कि Y गुणसूत्र पर लिंग और प्रजाति-विशिष्ट दोहराव प्रजनन के लिए महत्वपूर्ण गुणसूत्र संख्या-1 से संचरित प्रोटीन-कोडिंग RNA को नियंत्रित करता है। इस अध्ययन में, Y गुणसूत्र और अन्य गुणसूत्रों के बीच परस्पर क्रिया की यह पहली रिपोर्ट है। इस प्रकार, दो अध्ययनों को समेकित करते हुए, हम Y गुणसूत्र द्वारा प्रजनन से जुड़े जीनों का अधिक व्यापक विनियमन देख सकते हैं।”

    वे कहते हैं – “जैसे-जैसे प्रजातियां विकसित होती हैं, ये दोहराव भी साथ-साथ विकसित होते रहते हैं, और धीरे-धीरे प्रजातियों के प्रजनन को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं रहते हैं। इस प्रकार, ऐसा प्रतीत होता है कि ये दोहराव प्रजातियों की पहचान और विकास-क्रम का आधार हैं।”

    स्त्रोत : विज्ञान प्रसार

  • कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) की संरचना, आकार,  भाग  एवं कार्य | केन्द्रक कला, केन्द्रक द्रव्य, केन्द्रिका, क्रोमैटिन तथा गुणसूत्र के प्रकार Nucleus and Chromosome in Hindi

    कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) की संरचना, आकार, भाग एवं कार्य | केन्द्रक कला, केन्द्रक द्रव्य, केन्द्रिका, क्रोमैटिन तथा गुणसूत्र के प्रकार Nucleus and Chromosome in Hindi

    इस आर्टिकल में हम कोशिका केंद्र (Cell Nucleus) के बारे में जानेगें | कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) क्या है ? कोशिका में कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) की क्या भूमिका है ? कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) की संरंचना कैसी होती है ? केन्द्रक के कितने भाग होते है ? और सबसे प्रमुख कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) के प्रमुख कार्य क्या क्या है ? इसके अलावा इस आर्टिकल में हम जानेगें कि केन्द्रक कला या केन्द्रक झिल्ली क्या है ? केन्द्रक द्रव्य क्या होता है ? केन्द्रिका क्या है और उसकी केन्द्रक में क्या भूमिका है ? साथ ही हम बात करेगें कि क्रोमैटिन तथा गुणसूत्र के बारे में |

    कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) क्या है ? What is Cell Nucleus ?

    कोशिका द्रव्य में स्थित वह संरचना जो जीवद्रव्य की क्रियाओं को संचालित करता है अर्थात कोशिका का नियंत्रण करता है, केंद्रक कहलाता है | केंद्रक कोशिका का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग है जो कोशिका के प्रबन्धक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। केंद्रक में कोशिका की वंशानुगत जानकारी होती है और कोशिका के विकास और प्रजनन को नियंत्रित भी करती है| यह एक यूकेरियोटिक सेल का कमांड सेंटर है और आमतौर पर यह एक कोशिकांग (organelle) का सबसे प्रमुख संगठन है | स्तनधारीयों की RBC व पादपों की चालनी बलिकाओं को छोड़कर सभी जीवित कोशिकाओं में केन्द्रक पाया जाता है |

    केन्द्रक कोशिका के लगभग मध्य में स्थित गोलाकार और अण्डाकार सरंचना होती है जिसका व्यास 5u – 20u तक होता है, प्राय: एक कोशिकाओं में एक ही केंद्रक पाया जाता है , परन्तु कुछ सजीवो में एक से अधिक केन्द्रक भी पाये जाते है | जैसे : पैरामिशियम , वाउचेरिया आदि | केन्द्रक एक दो स्तरीय आवरण से घिरी सरंचना है जिसे केन्द्रक कला कहते है | जिसमे खनिज लवण, एंजाइमस, DNA, RNA, क्रोमेटिन धागे (गुणसूत्र) आदि पाए जाते है |

    केन्द्रक कोशिका विभाजन द्वारा वृद्धि, गुणसूत्र में उपस्थित जीन द्वारा आनुवांशिक लक्षणों (माता पिता के गुणों) को अगली पीढ़ी तक पहुचाने एवं कोशिका की सभी उपापचयी क्रियाओं का नियंत्रण एवं नियमन करने का कार्य करता है | अत: यह कोशिका के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक है | केन्द्रक को कोशिका का निदेशक (Director of cell) भी कहते है।

    केन्द्रक (Cell Nucleus) की खोज

    केन्द्रक की खोज 1831 में रोबर्ट ब्राउन ने आर्किक पादप कोशिकाओ के रूप में की थी | केन्द्रक को रॉबर्ट ब्राउन ने आर्किड के जड़ो की कोशिकाओं में देखा और उनको Nucleus (न्यूक्लियस) नाम दिया। केन्द्रक के अध्ययन को Karyology कहा जाता है। फ्लेमिंग ने इसे क्रोमैटिन नाम दिया।

    न्यूक्लियोप्लाज्मिक इंडेक्स (Nucleoplasmic Index) क्या है ?

    केन्द्रक और कोशिका द्रव्य की मात्रा के बीच एक विशिष्ट अनुपात होता है जिसे न्यूक्लियोप्लाज्मिक इंडेक्स (NP) या केरियोप्लाज्मिक इंडेक्स (karyoplasmic index) कहा जाता है जिसे हर्टविग समीकरण के रूप में निम्न प्रकार व्यक्त किया जा सकता है –

    NP = Vn/ VcVn

    जहां

    NP = न्यूक्लियोप्लाज्मिक इंडेक्स

    Vn = केन्द्रक का आयतन

    Vc = कोशिक द्रव्य का आयतन

    कोशिका में केन्द्रक की संख्या (Numbers of Nucleus in Cell)

    आमतौर पर कोशिकाओं में एक ही केन्द्रक पाया जाता है जिसे एककेन्द्रकी कोशिका कहा जाता है। लेकिन पैरामीसियम कोडेटम द्विकेन्द्रकी होता है जबकि पैरामीसियम ऑरिलिया तीन केन्द्रक होते है | कई केन्द्रक वाली कोशिकाओं को बहुकेन्द्रकीय कोशिका कहते है

    उदाहरण म्यूकोर, Rancheria (शैवाल) तथा पशु और मानव की रेखित पेशी कोशिकाओं में जिसे सिंकटीयियम (Syncytium) कहते हैं। केन्द्रक RBC और एंजियोस्पर्म की चालनी नलिका (सिव ट्यूब) में अनुपस्थित होता है।

    केन्द्रक का आकार (Shape of Nucleus)

    केन्द्रक कोशिका के लगभग मध्य में स्थित गोलाकार और अण्डाकार सरंचना होती है जिसका व्यास 5u – 20u तक होता है

    लेकिन यह इओसीनोफिल (Eosinophil) में द्विपालित (Bilobed) होता है बेसोफिल में तीन पालियो (Trilobed) होता है और न्युट्रोफिल (Neutrophil) में बहुपालित (Multilobed) होता है यह मैक्रोफेज कोशिका (Macrophaze) में गुर्दा के आकार का होता है, Verticella में यह घोड़े की नाल के रूप का होता है।

    केन्द्रक का रासायनिक संगठन (Chemical Composition of Nucleus)

    DNA= 9-12%

    प्रोटीन (Basic protein) = 15%

    Enzyme, acid protein & neutral protein = 65%

    RNA = 5%

    लिपिड्स (Lipids) = 3%

    Minerals Ca2+, mg2+, k+ Na+ = traces

    RNA एवं DNAमें फास्फोरस (Phosphorus) उपस्थित होता है

    कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) की संरचना

    केन्द्रक दोहरी झिल्ली से घिरा कोशिकांग है इन दोनों झिल्लियो के मध्य 10-15 नैनोमीटर का रिक्त स्थान होता है, जिसे परिकेन्द्रीय अवकाश कहते है |

    केन्द्रक झिल्ली या केन्द्रक कला में निश्चित स्थानों पर छिद्र होते है, जो केन्द्रक छिद्र कहलाते है | केन्द्रक छिद्रों से RNA व प्रोटीन का परिवहन होता है |

    केन्द्रक झिल्ली के अन्दर एक पारदर्शी , अर्द्धतरल कणिकामय समान व स्वच्छ पदार्थ पाया जाता है जिसे केन्द्रक द्रव्य कहते है, इसमें RNA , DNA , प्रोटीन , एंजाइम , वसा , खनिज लवण आदि पदार्थ पाये जाते है |

    इसमें क्रोमेटिन जाल व केंद्रिका स्थित होती है | केन्द्रिका की खोज फोंटाना ने की थी | केन्द्रिका एक गोलाकार संरचना होती है , एक केन्द्रक में एक केंद्रिका या अधिक भी हो सकती है | जैसे प्याज के केन्द्रक में चार केन्द्रिकाएं होती है |

    क्रोमेटिक जाल डीएनए से बना होता है क्रोमेटिन जाल गुणसूत्र के रूप में बिखरा होता है जो मनुष्य में लगभग 20m लम्बा होता है | इसके अतिरिक्त RNA व हिस्ट्रोन प्रोटीन भी केन्द्रक में पाये जाते है |

    कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) केन्द्रक के कितने प्रकार होते है ?

    केन्द्रक के निम्न चार भाग होते हैं

    1. केन्द्रक कला या केन्द्रक झिल्ली (Nuclear membrane
    2. केन्द्रक द्रव्य (Nucleoplasm or nuclear sap)
    3. केन्द्रिका (Nucleolus)
    4. क्रोमैटिन धागे(Chromatin threads)

    केन्द्रक झिल्ली या केन्द्रक कला (Nuclear Membrane)

    केन्द्रक झिल्ली प्लाज्मा झिल्ली की भांति दोहरी झिल्ली की बनी होती है एवं केन्द्रक के चारों ओर एक आवरण बनाती है |

    केन्द्रक झिल्ली का निर्माण अर्धसूत्री विभाजन के अंत में टिलोफ़ज प्रावस्था में ER द्वारा किया जाता है।

    प्रत्येक झिल्ली लाइपोप्रोटीन से बनी एक इकाई कला होती है | प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में केन्द्रक-कला या तो अविकसित होती है या होती ही नहीं |

    प्लाज्मा झिल्ली की तरह केन्द्रक झिल्ली वरणात्मक पारगम्य होती है | यह केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य के बीच पदार्थों के आवागमन को नियन्त्रित करती है |

    केन्द्रक झिल्ली को Karyotheca भी कहा जाता है। यह 70-80Å मोटी होती है।

    केन्द्रक की बाहरी और भीतरी झिल्ली के बीच के खाली स्थान को परिकेन्द्रकीय अवकाश (पेरिन्यूक्लियर स्पेस, perinuclear space) कहा जाता है।

    केन्द्रक छिद्र (Nuclear Pore)

    केन्द्रक कला या केन्द्रक झिल्ली में छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। न्यूक्लियोपोरिन द्वारा 9 nm आकार वाले केन्द्रक छिद्र का गठन किया जाता है । इन्हीं छिद्रों द्वारा आवश्यक पदार्थों का आदान-प्रदान केन्द्रक द्रव्य तथा कोशिकाद्रव्य के बीच में होता है।

    केन्द्रक छिद्र की संरचना अष्ट कोणीय होती है केन्द्रक छिद्र में इलेक्ट्रॉन सघन वलय पाया जाता है जिसे एनूल्स कहते है। एनूल्स केन्द्रक छिद्र के साथ मिलकर रंध्र-जटिल बनती है।

    केन्द्रक लेमिना (Nuclear Lamina)

    भीतरी झिल्ली में एक रेशेदार प्रोटीन जाल होता है जिसे फाइबर लेमिना कहा जाता है जो परिधीय हेटोरोक्रोमेटिन के साथ जुड़ा होता है। लेमिना मधुमक्खी के छाते की तरह दिखती है।

    केन्द्रक लेमिना प्रोटीन लॅमिन्स (Lamins) से बना है। केन्द्रक लेमिना क्रोमेटिन के संलग्न के लिए स्थल प्रदान करता हैं।

    केन्द्रक द्रव्य (न्यूक्लियोप्लाज्म Nucleoplasm)

    केन्द्रक के मैट्रिक्स को केन्द्रकद्रव्य या केन्द्रक रस या कैरियोलिम्फ कहते है |

    केन्द्रक के अन्दर यह न्यूक्लियोप्रोटीन का बना पारदर्शी, कोलायडी, तरल पदार्थ और कणिकामय प्रोटीन का बना होता है जो केन्द्रक-कला से घिरा रहता है | इसमें केन्द्रिका और क्रोमैटिन धागे के अतिरिक्त, एंजाइम, खनिज लवण, आर.एन.ए, राइबोसोम आदि पाए जाते हैं | यह प्रकृति में acidophilic होती है। 

    केन्द्रिका (Nucleolus) क्या है ? What is Nucleolus ?

    केन्द्रक के अंदर एक या दो केन्द्रिकाएं होती हैं | यह गोल और नग्न संरचना है जो विशिष्ट बिंदु पर क्रोमेटिन से जुड़ा हुआ है जिसे न्यूक्लियोलर संगठित क्षेत्र या (Nucleolar Organiser Region) NOR कहा जाता है। ये किसी झिल्ली के अभाव में सीधे केन्द्रकद्रव्य के सम्पर्क में रहती है | केन्द्रिकाएं प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में नहीं पाई जाती हैं तथा कोशिका विभाजन के समय गायब हो जाती है |

    केन्द्रिका की खोज सर्वप्रथम फोन्टाना ने 1781 में की, उसके बाद 1840 में बोमेन ने इसे न्यूक्लिओलस नाम दिया | केन्द्रिका में प्रोटीन (85%), आर.एन.ए (10%) तथा डी.एन.ए (5%) होता है |

    प्रोटीन संश्लेषण रूप से सक्रिय कोशिकाओ में बड़े केन्द्रिका होते हैं। उदाहरण के लिए oocytes, न्यूरॉन्स आदि।

    केन्द्रिका के भाग

    रेशेदार भाग (Fibrous Part)

    न्यूक्लियोनेमा नामक तंतुओ से बना केन्द्रिका का केंद्रीय भाग होता है। न्यूक्लियोनेमा मुख्य रूप से डीएनए और प्रोटीन से बना है।

    दानेदार भाग/ कणिकीय भाग (Granular Part)

    यह कणिकाओ (आर-आरएनए + प्रोटीन) से मिलकर बना केन्द्रिका का परिधीय भाग है जो परिपक्व राइबोसोम का प्रतिनिधित्व करता है।

    मैट्रिक्स या पार्स एमोर्फा (Amorphous Matrix)

    यह प्रोटीन युक्त मैट्रिक्स आधात्री होता है जिसमें तंतु और कण दोनों होते हैं। राइबोसोमल प्रोटीन का संश्लेषण केन्द्रिका में होता है |

    क्रोमैटिन भाग (Chromatin Part)

    यह डीएनए से बना है। केन्द्रिका में दो प्रकार के क्रोमैटिन होते हैं जो इंट्रान्यूक्लियोलर क्रोमेटिन (Intranuclear) और पेरिन्यूक्लियोलर क्रोमेटिन (Perinuclear) होते हैं।

    केन्द्रिका का कार्य क्या है ? What are Functions of Nucleolus ?

    केन्द्रिका के द्वारा निम्न तीन प्रकार के कार्यों को सम्पादित किया जाता है-

    1. प्रोटीन का संश्लेषण,
    2. राइबोसोमल आरएनए का संश्लेषण,
    3. केन्द्रक से कोशिका द्रव्य में आनुवांशिक सूचनाओं (Genetic Information) का स्थानांतरण है

    केन्द्रिका को राइबोसोम का कारखाना (राइबोसोमल फैक्टरी) के रूप में जाना जाता है।

    केन्द्रिका का रासायनिक संघटन (Chemical Composition of Nucleolus)

    इस में 85% प्रोटीन, 10% आर-आरएनए, और डीएनए का 5% होता है।

    क्रोमैटिन (Chromatin)

    क्रोमैटिन (Chromatin) केन्द्रकद्रव्य में धागेनुमा पदार्थ जाल के समान होती है, जो क्रोमैटिन कहलाता है। यह DNA, हिस्टोन प्रोटीन तथा नॉन-हिस्टोन प्रोटीन का बना होता है। कोशिका विभाजन के समय सिकुड़कर ये छोटे और मोटे हो जाते हैं। इन्हीं धागों को ही क्रोमोसोम कहा जाता है, जिसमें कोशिका विभाजन नहीं होता है उसमें यह क्रोमैटिन पदार्थ के रूप में विद्यमान रहता है।

    ये दो प्रकार के होते हैं –

    1. युक्रोमेटिन (Euchromatin)
    2. हेटोरोक्रोमेटिन (Heteochromatin)

    युक्रोमेटिन (Euchromatin)

    यह आनुवंशिक रूप से सक्रिय होता है यह अभिरंजित करने पर हल्का अभिरंजित होता है इसमें हिस्टोन (Histon) प्रोटीन कम मात्रा में होता है,जिससे ये कम संघनित होता है। यह ट्रांसक्रिप्शन (अनुलेखन) के लिए सक्रिय होता है, इनमें सामान्य रूप से प्रतिकृति (Replication) और जीन विनिमय ( Crossing over) पाया जाता है।

    हेटोरोक्रोमेटिन (Heteochromatin)

    यह आनुवंशिक रूप से निष्किय होता है यह अभिरंजित करने पर गाढ़ा अभिरंजित होता है यह अत्यधिक संघनित (Condense) होता है, जो देर से प्रतिकृति, उच्च घनत्व और कम जीन विनिमय दर्शाता है। इसमें अधिक हिस्टोन और कम अम्लीय प्रोटीन होता है |

    गुणसूत्र (Chromosome) क्या होते है ?

    क्रोमेटिन पदार्थ से बने धागेनुमा संरचना को गुणसूत्र कहते है | 875 में स्ट्रोंगन्सबर्गर ने गुणसूत्र की खोज की तथा 1888 में वाल्डेयर ने क्रोमोसोम नाम दिया | णसूत्रो की संख्या अलग अलग जीवों में अलग अलग होती है जैसे – मनुष्य में 46  | त्येक गुणसूत्र दो अर्द्धगुणसूत्रों से मिलकर बना होता है , दोनों अर्द्धगुणसूत्र एक बिन्दु पर पर आपस में जुड़े होते है जिसे गुणसूत्र बिन्दु या सेन्ट्रोमीगर या काइने टोकोर कहते है | गुणसूत्र पर रेखीय क्रम में जीन पाये जाते है |

    प्रत्येक गुणसूत्र में जेली के समान एक गाढ़ा द्रव होता है, जिसे मैट्रिक्स कहा जाता है। इसी मैट्रिक्स में दो परस्पर लिपटे महीन एवं कुण्डलित सूत्र, जिसे क्रोमैनिमेटा कहा जाता है। प्रत्येक क्रोमैनिमेटा एक अर्द्ध-गुणसूत्र (chromatid) कहलाता है। ये दोनों क्रोमैटिड सेन्ट्रोमीयर नामक स्थान पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं, क्रोमोसोम में आनुवंशिक गुण होते हैं, जो माता-पिता से DNA अणु के रूप में अगली सन्तति में जाते हैं। DNA अणु में कोशिका के निर्माण और संगठन की सभी आवश्यक सूचनाएँ होती हैं। प्राथमिक संकिर्णन के अतिरिक्त अन्य संकीर्णन को द्वितीयक संकीर्णन कहते है , द्वितीयक संकीर्णन के आगे के भाग को सेटेनाइट कहते है |

    ‘जीन’ शब्द को जोहन्सन ने दिया था। आधुनिक शोधों के अनुसार, एक जीन, DNA के एक ऐसा खण्ड है, जो किसी एक विशिष्ट प्रकार की प्रोटीन (एन्जाइम) के संश्लेषण का नियमन करता है। इस भाग को सिस्ट्रॉन कहते हैं।

    इन्हीं जीनों के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में आनुवंशिक लक्षण हस्तान्तरित होते हैं। अतः जीन ही आनुवंशिक गुणों हेतु उत्तरदायी हैं।

    गुणसूत्र (Chromosome) के प्रकार (Type of Chromosome )

    मध्यकेन्द्रकी : जब गुणसूत्र बिन्दु गुणसूत्रों के बीचो बीच होता है जो दोनों भुजाएं समान होती है जिसे मध्यकेन्द्रकी गुणसूत्र कहते है |

    उपमध्यकेन्द्रकी : जब गुणसूत्र बिन्दु गुणसूत्रों में मध्य से हटकर होता है तथा एक भुजा बड़ी व दूसरी भुजा छोटी है , उपमध्य केन्द्रकी गुणसूत्र कहलाता है |

    अग्रबिन्दु : जब गुणसूत्र बिन्दु गुणसूत्र में बिल्कुल किनारे पर स्थित होता है जिससे एक भुजा बहुत छोटी व दूसरी भुजा बहुत बड़ी होती है इसे अग्र बिन्दु गुणसूत्र कहते है |

    अंतकेन्द्री : जब गुणसूत्र बिन्दु गुणसूत्र के शीर्ष पर स्थित होता है तो एक भुजा नाम मात्र की व दूसरी भुजा अव्यन्त: बड़ी होती है जिसे अन्तकेन्द्री कहते है |

    केन्द्रक से जुड़े कुछ महत्वपुर्ण प्रश्न और उनके जवाब

    केन्द्रक किसमे नही पाया जाता है ?

    प्रश्न : किसमे केन्द्रक नही पाया जाता है ?

    प्रश्न : कोनसी कोशिका में केन्द्रक नही पाया जाता है ?

    प्रश्न : कोनसे जीव में केन्द्रक नही पाया जाता है ?

    प्रश्न : किस प्रकार की कोशिका में केन्द्रक नही पाया जाता है ?

    प्रश्न : कोनसे पेड़ या पादप में केन्द्रक नही पाया जाता है ?

    प्रश्न : कोनसे जानवर में केंदक नही पाया जाता है ?

    प्रश्नों के उत्तर

    स्तनधारीयों की लाल रक्त कोशिकाओं RBC (red blood cells) व पादपों की चालनी बलिकाओं (plant cell sieve tubes) को छोड़कर सभी जीवित कोशिकाओं में केन्द्रक पाया जाता है | क्योकि केन्द्रक कोशिका में पाया जाता है | स्तनधारी लाल रक्त कोशिकाओं (एरिथ्रोसाइट्स) में न तो केन्द्रक होता है और न ही माइटोकॉन्ड्रिया।

    प्रोकैरियोटिक कोशिका ऐसी कोशिका होती है जिसमें केंद्रक नहीं होता है तथा इनमें कोशिकांग भी सुविकसित नहीं होता है प्रोकरयोटिक कोशिका में कोशिका भित्ति म्यूरॉन की बनी होती है इनके गुणसूत्र में हिस्टोन प्रोटीन नहीं पाया जाता है उदाहरण – जीवाणु ( Bacteria ) , साइनोबैक्टीरिया अर्कीबैक्टीरिया , विषाणु ( Virus ) , बैक्टीरियोफेज , माइकोप्लाज्मा ( PPLO ) , नील हरित शैवाल ( Blue green algae ) रिकेट्सिया की कोशिकाएं आदि |

    यूकैरियोटिक कोशिका में केंद्रक पाए जाते हैं इनमें कोशिकांग पूर्ण रूप से विकसित होता है यूकैरियोटिक कोशिका के गुणसूत्र में हिस्टोन प्रोटीन पाया जाता है तथा ये क्षारीय प्रकृति के होते हैं।

    उदाहरण – सभी जन्तु कोशिका , प्रोटोजोआ , जीव, पादप कोशिका, जन्तु आदि।

    RBC में केन्द्रक क्यों नहीं पाया जाता?

    प्रश्न – RBC में केन्द्रक क्यों नहीं पाया जाता?

    प्रश्न – लाल रक्त कोशिका में केन्द्रक का न होना कितना फायदेमंद है ?

    उत्तर – लाल रक्त कोशिका (RBC – red blood cells) में केंद्रक का अनुपस्थिति होना लाल रक्त कोशिकाओं को अपना कार्य करने के लिय अनुकूलन बनाता है। यह लाल रक्त कोशिका को अधिक हीमोग्लोबिन रखने की अनुमति देता है और इसलिए, यह अधिक ऑक्सीजन अणु ले जाता है। यह कोशिका को अपने विशिष्ट द्वि-अवतल आकार (distinctive bi-concave shape) की भी अनुमति देता है जो प्रसार में सहायता करता है।

    प्रश्नों के उत्तर

    कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) से जुड़े महत्वपुर्ण प्रश्न

    निम्न महत्वपूर्ण प्रश्नों के जवाब आपको इस आर्टिकल में मिलेगे :

    केन्द्रक क्या है ?

    कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) क्या है ?

    केन्द्रक का कोशिका में क्या कार्य है ?

    केन्द्रक के कितने भाग होते है ?

    केन्द्रक की सरंचना और कार्य क्या है ?

    केन्द्रक छिद्र क्या है ?

    कोशिका के केंद्र में विधमान तरल पदार्थ क्या कहलाता है ?

    केन्द्रक का चित्र

    केन्द्रक झिल्ली या केन्द्रक कला किसे कहते है ?

    केन्द्रक द्रव्य (Nucleoplasm or nuclear sap) क्या है ?

    केन्द्रिका (Nucleolus) क्या है ?

    क्रोमैटिन धागे(Chromatin threads) क्या है ?

    गुणसूत्र क्या होते है और उनके प्रकार क्या है ?

    बिना नाभिकीय झिल्ली वाली कोशिका का कहलाती है ?

    केन्द्रक को कोशिका का निदेशक (Director of cell) क्यों कहा जाता है ?

  • हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) की सरंचना एवं कार्यों का वर्णन | Chloroplast in Hindi (हरित लवक की सम्पूर्ण जानकारी in Hindi)

    हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) की सरंचना एवं कार्यों का वर्णन | Chloroplast in Hindi (हरित लवक की सम्पूर्ण जानकारी in Hindi)

    इस आर्टिकल में हम जानेगें कि हरित लवक या क्लोरोप्लास्ट क्या होते है ? हरित लवक या क्लोरोप्लास्ट की सरंचना कैसी होती है ? हरित लवक या क्लोरोप्लास्ट के प्रमुख कार्य क्या है ? हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) को पादप कोशिका का रसोईघर क्यों कहा जाता है ? आदि

    हरित लवक को समझने के लिए सबसे पहले हम जानेगे कि लवक क्या होते है ?

    लवक पादप कोशिकाओं के कोशिका द्रव में पाए जाने वाले गोल या अंडाकार रचना हैं । इनमें पादपों के लिए महत्त्वपूर्ण रसायनों का निर्माण होता है। लवक तीन प्रकार के अर्थात् हरितलवक (Chloroplast) , अवर्णी लवक ((Leucoplast) तथा वर्णी लवक (Chromoplasts) होते हैं।

    हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट – Chloroplast) क्या होते है ?

    जिस लवक में पर्णहरित ( क्लोरोफिल ) वर्णक होता है, उसे हरित लवक ( क्लोरोप्लास्ट ) कहते है। इनके कारण पत्तियों का रंग हरा होता है जिससे पेड़ पौधे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा भोजन बनाते है।

    हरितलवक दोहरी झिल्ली से परिबद्ध कोशिकांग है। हरितलवक ऐसा कोशिकांग है जो सौर ऊर्जा यानी प्रकाशीय ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलता है। हरित लवक केवल सुकेन्द्रिक पादप कोशिकाओं में और शैवालीय कोशिकाओं में पाए जाते है। माना जाता है कि नील हरित शैवाल नाम के जीवाणुओं से हरितलवकों का विकास हुआ।

    1883 में, एंड्रियास फ्रांज विल्हेम शिम्पर (Andreas Franz Wilhelm Schimper ) ने हरितलवक को “क्लोरोप्लास्टिड्स” (क्लोरोप्लास्टिडन) (chloroplastids” (Chloroplastiden) का नाम दिया | 1884 में, एडुआर्ड स्ट्रासबर्गर (Eduard Strasburger ) ने इसे “क्लोरोप्लास्ट” (क्लोरोप्लास्टन) नाम दिया ।

    हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) की सरंचना

    हरितलवक की आन्तरिक संरचना जटिल होती है। हरितलवक दोहरे झिल्ली से घिरे होते हैं, जो लाइपोप्रोटीन की बनी होती है। प्रत्येक झिल्ली की मोटाई 50A° होती है। इनकी चौड़ाई 10A° से 30A° तक हो सकती है। इसके अन्दर की ओर एक तरल पारदर्शी दानेदार पदार्थ होता है, जिसे स्ट्रोमा कहा जाता है। इस स्ट्रोमा में अनेक एन्जाइम, राइबोसोम आदि पदार्थ पाए जाते हैं।

    माइटोकॉण्ड्रिया की तरह लवक में अपना DNA और राइबोसोम होते हैं।

    शैवालों में यह सर्पिलाकार, फीतासदृश, प्यालेनुमा, ताराकार, मेखला या पट्टिकावत या बिम्ब सदृश होते हैं। उच्च विकसित पौधों में ये गोलाकार, अण्डाकार लम्बे या बिम्बाकार होते हैं। ये 2μ से 8μ तक या कभी-कभी 100μ तक लम्बे तथा 3μ से 6μ तक व्यास वाले (मोटे) होते हैं।

    वस्तुतः इसमें बाहरी झिल्ली सपाट परन्तु भीतरी झिल्ली गोल पटलिका होती है, जिसे थायलेकॉइड कहते हैं। अनेक स्थानों पर यह थायलेकॉइड एक के ऊपर लगी होती है, जो ग्रेनम कहलाती है। ग्रेनाओं को जोड़ने वाली पटलिकाएँ स्ट्रोमा पटलिकाएँ कहलाती हैं।

    प्रत्येक थाइलेकयिड दो इकाई कलाओं की बनी होती है। इसके दोनों बाहरी स्तर प्रोटीन के अणुओं के बने होते हैं। इनके मध्य में पर्णहरित (chlorophyll) तथा फॉस्फोलिपिड के स्तर होते हैं। पर्णहरित के प्रत्येक अणु में एक शीर्ष तथा एक पूँछ होती है।

    थाइलेकॉयड की कला पर छोटे-छोटे दाने उपस्थित होते हैं, जिन्हें क्वान्टासोम (quantasome) कहते हैं। ये प्रकाश अभिक्रिया की सबसे छोटी और आधारभूत इकाई हैं। प्रत्येक क्वान्टासोम में लगभग 200 अणु पर्णहरिम होते हैं।

    हरितलवक में प्रकाश-संश्लेषण की प्रकाशिक अभिक्रिया ग्रेना में, जबकि प्रकाशहीन अभिक्रिया स्ट्रोमा में होती है।

    हरितलवकों में पर्णहरिम के साथ-साथ सामान्यतया पर्णपीतक (कैरोटिन -carotene) व पर्णपीत (जैन्थोफिल-xanthophyll) वर्णक भी पाये जाते हैं। हरितलवक में प्रकाश-संश्लेषण सम्बन्धी एन्जाइम, सहएन्जाइएम विटामिन E व K तथा सूक्ष्म मात्रा में Mg, Fe, Cu, Mn व Zn भी यौगिकों के रूप में मिलते हैं।

    हरितलवक का रासायनिक विश्लेषण

    हरितलवक के रासायनिक विश्लेषण में पाया गया है कि इसके शुष्क भार में 30-35% प्रोटीन होता है, जिसमें 80% अघुलनशील प्रोटीन होता है। लिपिड्स में वसा 50% स्टीरॉल 20%, मोम 16% तथा फॉस्फेट 2.7% तक होते हैं। दो प्रकार के पर्णहरिम-a (पीला) 75% एवं पर्णहरिम-b (हरा-कला) 25% होता है। जैन्थोफिल 75% व कैरीटीन 25% होता है। हरितलवक में RNA 3-4% तक तथा DNA 0.02-0.1% तक होता है।

    हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) की विशेषताएं

    हरित लवक केवल पादप कोशिकाओं में और शैवालीय कोशिकाओं में पाए जाते है।

    हरित लवक जन्तुओं में अनुपस्थित होते हैं।

    पत्तियों में इनकी मात्रा सबसे अधिक होती है विभिन्न जाति के पौधों में इनका आकार अलगअलग होता है।

    हरे रंग के पदार्थ हरितलवक के कारण इसका रंग हरा होता है।

    हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) को पादप कोशिका की रसोईघर क्यों कहा जाता है ?

    हरितलवक कोशिका का वह कोशिकांग है जहां प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा कार्बोहाइड्रेट का संश्लेषण होता है और भोजन बनाता है। इसलिए हरितलवक को पादप कोशिका की रसोई कहते हैं।

    हरित लवक के प्रमुख कार्य

    हरित लवक प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा कार्बोहाइड्रेटस का निर्माण करते हैं। इनमें ग्लूकोज से मण्ड, प्रोटीन, वसाएँ, विटामिन हार्मोन्स आदि का निर्माण भी होता है।

    जल का आयनीकरण एवं CO2 अपचयन के लिए NADPH + H+ की उपलब्धि कराना हरितलवक का ही कार्य है।

    जल के आयनीकरण से प्राप्त ऑक्सीजन को प्रत्येक जीवधारी के लिए श्वसन हेतु उपलब्ध कराना भी हरित लवक का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है।

    प्रकाश संश्लेषण की प्रकाश अभिक्रिया फॉस्फोरिलेशन व हिल अभिक्रिया क्वान्टासोमों में होती है। हाइड्रोजन का स्थानान्तरण स्ट्रोमा में होता है।

    हरित लवक प्रकाश ऊर्जा को फोटॉन (photon) के रूप में अवशोषित करता है और एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट (Adenosine triphosphate – ATP (एटीपी) बनते हैं। एटीपी को क्लोरोप्लास्ट के थायलाकोइड झिल्ली में संश्लेषित किया जाता है।

  • लवक – हरित लवक, वर्णीलवक, अवर्णीलवक की संरचना और कार्य  | Plastid in Hindi (लवक की सम्पूर्ण जानकारी in Hindi)

    लवक – हरित लवक, वर्णीलवक, अवर्णीलवक की संरचना और कार्य | Plastid in Hindi (लवक की सम्पूर्ण जानकारी in Hindi)

    लवक (Plastid) क्या होता है ? What is Plastid ?

    लवक केवल पादप कोशिकाओं में स्थित होते हैं। लवक पादप कोशिकाओं के कोशिका द्रव में पाए जाने वाले गोल या अंडाकार रचना हैं । इनमें पादपों के लिए महत्त्वपूर्ण रसायनों का निर्माण होता है। लवक तीन प्रकार के अर्थात् हरितलवक (Chloroplast) , अवर्णी लवक ((Leucoplast) तथा वर्णी लवक (Chromoplasts) होते हैं।

    हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) नामक हरे रंग के लवक में जीव जगत की सबसे महत्त्वपूर्ण जैव रासायनिक क्रिया प्रकाश-संश्लेषण होती है। हरे रंग को छोड़कर अन्य रंगों वाले लवकों को वर्णी लवक (क्रोमोप्लास्ट) कहते हैं, इनसे ही फूलों एवं फलों को रंग प्राप्त होता है। रंगहीन लवकों को अवर्णी लवक (लिउकोप्लास्ट) कहते हैं जिनका मुख्य कार्य भोजन संग्रह में मदद करना है। आकृति यह अंडाकार गोलाकार तन्तुनुमा होता है जो पूरे कोशिका द्रव्य मे फैले रहता है जो दो पर्टो से घिरा रहता है। इसके भीतर पाए जाने वाले खाली स्थान को stroma कहते है जो एक तरल पदार्थ से भरा रहता है जिसे matrix कहाँ जाता है।

    लवक कितने प्रकार के होते है ?

    लवक तीन प्रकार के होते है :

    1. हरितलवक (Chloroplast)
    2. अवर्णी लवक (Leucoplast)
    3. वर्णी लवक (Chromoplasts)

    हरितलवक (Chloroplast)

    हरे रंग के पदार्थ हरितलवक के कारण इसका रंग हरा होता है। यह हरितलवक दोहरे झिल्ली से घिरे होते हैं, जो लाइपोप्रोटीन की बनी होती है। इसके अन्दर की ओर एक तरल पारदर्शी पदार्थ होता है, जिसे स्ट्रोमा कहा जाता है। इस स्ट्रोमा में अनेक एन्जाइम, राइबोसोम आदि पदार्थ पाए जाते हैं। माइटोकॉण्ड्रिया की तरह लवक में अपना DNA और राइबोसोम होते हैं।

    वस्तुतः इसमें बाहरी झिल्ली सपाट परन्तु भीतरी झिल्ली गोल पटलिका होती है, जिसे थायलेकॉइड कहते हैं। अनेक स्थानों पर यह थायलेकॉइड एक के ऊपर लगी होती है, जो ग्रेनम कहलाती है। ग्रेनाओं को जोड़ने वाली पटलिकाएँ स्ट्रोमा पटलिकाएँ कहलाती हैं।

    थायलेकॉइड की भीतरी सतह पर क्वान्टासोम पाए जाते हैं, जिसमें हरितलवक अणु होते हैं ये प्रकाश-संश्लेषण की आधारभूत इकाई है। इसे पादप कोशिका का रसोईघर कहा जाता है। हरितलवक में प्रकाश-संश्लेषण की प्रकाशिक अभिक्रिया ग्रेना में, जबकि प्रकाशहीन अभिक्रिया स्ट्रोमा में होती है।

    क्लोरोप्लास्ट वाली पादप कोशिकाएँ

    हरितलवक को आकृति के आधार पर वर्गीकरण निम्न है :

    • क्लोमाइडोमोनास –   कपनुमा
    • स्पाइरोगाइरा (तालाब की रेशम ) – फीताकार
    • ऊडोगोनियम –  जालिकावृत
    • यूलोथ्रिक्स (तालाब की ऊन ) – मेखलाकार
    • उच्च पादप – अण्डकार या तश्तरीनुमा
    • जिग्नीमा – तारकार स्टार्च कार

    अवर्णी लवक (Leucoplast)

    यह एक रंगहीन लवक, जो जड़ों और भूमिगत तनों में पाए जाते हैं। ये स्टार्च के रूप में भोजन का संग्रह करते हैं, ये मुख्यतया तीन ये प्रकार के होते हैं :

    अवर्णी लवक (ल्यूकोप्लास्ट) को तीन भागों में बांट गया है।

    a. एमाइलोप्लास्ट
    b. एलयुरोप्लास्ट
    c. इलियोप्लास्ट

    एमाइलोप्लास्ट, जो जड़ों भूमिगत तनों तथा चावल, गेहूँ तथा मक्का के बीज में पाए जाते हैं तथा स्टार्च का संग्रहण करते हैं। इलायोप्लास्ट बीज में वसा का संग्रहण करते हैं। प्रोटीनोप्लास्ट, इनमें प्रोटीन संग्रहण होता है, जो बीजों में पाए जाते हैं।

    अवर्णी लवक ( एमाइलोप्लास्ट )

    वर्णी लवक (Chromoplasts)

    ये पौधों के रंगीन भागों, पुष्पों की पंखुड़ियों तथा फलों की भित्तियों में पाए जाते हैं। ये पीले, लाल तथा नारंगी रंग के लवक हैं।

    उदाहरण टमाटर में लाइकोपेन, गाजर में कैरोटीन, चुकन्दर में विटानीन आदि वर्णक के कारण इसका रंग निर्धारित होता है।

    वर्णीलवक के उदाहरण निम्न है :

    • टमाटर का लाल रंग लाइकोपीन (Lycopene) लवक के कारण
    • गाजर में कैरोटीन (Carotine)  के कारण
    • चुकन्दर में बिटानीन (Betanin)  के कारण
    • मिर्च का लाल रंग कैप्सेथीन  के कारण
  • माइक्रोबॉडीज (Microbodies) क्या है ? माइक्रोबॉडीज की सरंचना,  प्रकार एवं कार्य (in Hindi)

    माइक्रोबॉडीज (Microbodies) क्या है ? माइक्रोबॉडीज की सरंचना, प्रकार एवं कार्य (in Hindi)

    इस आर्टिकल में हम बात करेगें माइक्रोबॉडीज के बारे में | माइक्रोबॉडीज क्या होते है ? माइक्रोबॉडीज का हमारे शरीर में क्या कार्य होता है ? माइक्रोबॉडीज के प्रकार और सरंचना क्या होती है आदि |

    माइक्रोबॉडीज (Microbodies) क्या है ?

    ये इकाई झिल्ली युक्त छोटे कोशिकांग हैं, जो ऑक्सीकरण क्रियाओं (श्वसन के अतिरक्त अन्य) में भाग लेते हैं। इनमें क्रिस्टलीय कोर तथा कणीय मैट्रिक्स होता है। यह परॉक्सीसोम तथा ग्लाइऑक्सीसोम प्रकार का होता है। ग्लाइऑक्सीसोम्स, ग्लाइऑक्सीलेट चक्र द्वारा वसा के ऑक्सीकरण में भाग लेता है, जबकि परॉक्सीसोम प्रकाश श्वसन में भाग लेता है इसमें उपस्थित कैटेलेज एन्जाइम हाइड्रोजन परॉक्साइड के विघटन का कार्य करता है। ये पौधों, प्रोटोजोआ, और जानवरों की कोशिकाओं में पाया जाता है।

    माइक्रोबॉडीज एक परत वाली झिल्ली से घिरी थैलियां होती है । यह कोशिका के कोशिका द्रव्य (cytoplasm) में पाए जाते हैं, और केवल इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप के उपयोग से ही दिखाई देते हैं। इनका निर्माण एंडोप्लास्मिक जालिका वGalgi bodies से थैलियों(Vesicles) के टूटने से होता है। यह छोटे अंगक (Small Organelles) लगभग 0.2-1.5 माइक्रोमीटर व्यास के होते हैं । ये एक एकल फॉस्फोलिपिड बाइलेयर झिल्ली से घिरे होते है  और उनमें एंजाइम और अन्य प्रोटीन सहित इंट्रासेल्युलर सामग्री का एक मैट्रिक्स होता है, लेकिन उनमें कोई आनुवंशिक सामग्री नहीं होती है जो उन्हें स्वयं-प्रतिकृति की अनुमति देती है। 

    माइक्रोबॉडीज कितने प्रकार के होते है ? (Type of Microbodies)

    माइक्रोबॉडीज के दो प्रकार होते हैं –

    1. परऑक्सीसोम (Peroxisome)
    2. ग्लाइऑक्सीसोम (Glyoxysomes)

    परऑक्सीसोम (Peroxisome)

    ये (0.3-1.5μm) व्यास के लगभग सूक्ष्म गोलाकार कोशिकांग है जो एक परत वाली झिल्ली (Single Layered Membrane) से घिरे होते हैं । इनकी खोज Tolbert ने 1969 में की थी। 

    परऑक्सीसोम का निर्माण golgi bodies से न होकर पूर्व स्थित pre existing Peroxisome से होता है। 

    यह उन पौधों में पाये जाते हैं जिनमे प्रकाश श्वसन की क्रिया होती है । प्रकाश श्वसन की क्रिया कुछ ही पौधों मे होती है क्योंकि कुछ पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में  कार्बन डाई आक्साइड  निकालते है।

    जंतु कोशिका में यह Liver  एवं किडनी में तथा प्रोटोजोआ में पाए जाते हैं । इसमें भी लाइसोसोम के समान एंजाइम्स पाए जाते हैं जिसमें ऑक्सीडेस तथा कैटालेस मुख्य है । 

    उपापचय क्रियाओं में ऑक्सीडेस एंजाइम आणविक ऑक्सीजन लेकर हाइड्रोजन पराक्साइड का निर्माण करते हैं। 

    कैटालेस एंजाइम उपापचय (Metabolism) के फलस्वरुप कोशिका में उत्पन्न होने वाले विषैले पदार्थ हाइड्रोजन पराक्साइड का विघटन कर देते हैं।

    कैटालेस enzyme कोशिका द्रव्य में आने वाले अन्य विषैले पदार्थों को जैसे अल्कोहलिक पेय पदार्थों और अनेक ड्रग्स का भी विघटन कर देते हैं। इसके साथ ही जंतु कोशिकाओं में वसा उपापचय का भी कार्य Peroxisomes ही करते हैं। 

    इनमें सूक्ष्म कणिकाओं वाली मैट्रिक्स (Metrix of Fine Granules) होती है जिनके केंद्र में एक समांग (Homogeneous) तथा अपारदर्शी कोर होती है। इनमें ग्लाइकोलिक अम्ल ऑक्सीडेस, Peroxidase,कैटालेस आदि अधिक मात्रा में पाए जाते हैं।

    प्रकाश श्वसन की क्रिया हरित लवक Peroxisome तथा माइटोकॉन्ड्रिया तीनों में मिलकर होती है। यह अनुक्रम प्रकाश पर निर्भर करता है और इसमें ऑक्सीजन ली जाती है। यह क्रिया प्रकाश की तीव्रता, कार्बन डाइऑक्साइड की कम सांद्रता तथा ऑक्सीजन की अधिक संस्था द्वारा Stimulate होती है। ऐसी स्थिति में हरित लवक में उत्पन्न ग्लाइकोलिक अम्ल के आधिक्य (Excess) में अणु बाहर निकलकर Peroxisome में प्रवेश करते हैं जहां उनका ऑक्सीकरण होता है।

    ग्लाइऑक्सीसोम (Glyoxysomes)

    ग्लाइऑक्सीसोम की खोज Beevers ने 1961 में की थी। यह भी एक सूक्ष्म गोलाकार कोशिकांग हैं जो एक परत वाली झिल्ली के बने होते हैं। यह प्रायः वसीय बीजों, जैसे मूंगफली तथा अरंङ की कोशिकाओं में जहां पर वसा का कार्बोहाइड्रेट में परिवर्तन होता है, पाए जाते हैं। इनमें आइसोसिट्रिक लायेस, मेलेट सिंथेटेस आदि एंजाइम्स पाए जाते हैं। वसा का कार्बोहाइड्रेट में परिवर्तन ग्लाइऑक्सीसोम में पाए जाने वाले ग्लाइऑक्सिलेट चक्र द्वारा होता है।

    माइक्रोबॉडीज के कार्य (Function of Microbodies)

    विभिन्न प्रकार के माइक्रोबॉडीज विभिन्न विशिष्ट कार्य करते हैं:

    • कोशिका में माइक्रोबॉडीज विभिन्न जैव रासायनिक प्रतिक्रियाओं में भाग लेते हैं
    • माइक्रोबॉडीज में मौजूद एंजाइम विभिन्न आवश्यक प्रतिक्रियाओं की सुविधा प्रदान करते हैं, उदा। वसा, अमीनो एसिड,अल्कोहोल (alcohol ), आदि का टूटना।
    • वे पौधों में प्रकाश-श्वसन में शामिल होते हैं
    • पेरोक्साइड का डेटोफिक्सेशन (Detoxification) माइक्रोबॉडीज में होता है