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  • रिक्तिका या रसधानियाँ क्या होती है ? रिक्तिका के लक्षण, विशेषताएं एवं कार्य | Vacuoles – वेक्यूल in Hindi

    रिक्तिका या रसधानियाँ क्या होती है ? रिक्तिका के लक्षण, विशेषताएं एवं कार्य | Vacuoles – वेक्यूल in Hindi

    इस आर्टिकल में हम जानेंगे की रिक्तिका जिन्हें रसधानियाँ भी कहा जाता है क्या होती है ? रिक्तिका (Vacuoles) के लक्षण, विशेषताएं एवं कार्य क्या है ? आदि

    रिक्तिका (Vacuoles) किसे कहते है ? रसधानियाँ क्या है ?

    कोशिका की रसधानियाँ (vacuoles) यानी रिक्तिकाएं इकहरी झिल्ली (टोनोप्लास्ट) से घिरी तथा तरल पदार्थों से भरी रचनाएँ होती हैं। पादप कोशिका में, यह बड़े आकार में, जबकि जन्तु कोशिका में ये अनेक और बहुत ही छोटे आकार में होती है।बहुक्रियाशील ऑर्गेनेल सभी पौधों और कवक की कोशिकाओं में पाए जाते हैं, साथ ही कुछ प्रोटिस्ट, पशु और बैक्टीरिया कोशिकाओं में भी पाए जाते हैं | रिक्तिका सबसे महत्वपूर्ण सेल ऑर्गेनेल (कोशिकांग) में से एक है और कई कार्य करता है, जिसमें शामिल हैं: जल अवशोषण, सेल रंग, चयापचय से विषाक्त पदार्थों को हटाने, पोषक तत्वों का भंडारण आदि |

    रिक्तिकाएं/रसधानियाँ छोटी अथवा बड़ी हो सकती हैं। इनके अंदर ठोस या तरल पदार्थ भरा रहता है। जन्तु कोशिकाओं में रसधानियाँ छोटी होती हैं जबकि पादप कोशिकाओं में ये बड़ी होती हैं।

    “रिक्तिका” शब्द “लैटिन” “वेकस” से आया है जिसका अर्थ है “रिक्त”, क्योंकि ये माइक्रोस्कोप के साथ देखे जाने पर एक खाली जेब की तरह दिखते हैं.

    दरअसल, कोशिका के साइटोप्लाज्म में रिक्तिकाएं छोटे डिब्बे होते हैं, हालांकि, इन्हें मानव आंख द्वारा देखा जा सकता है, इनमें रसायन और एंजाइम होते हैं जो पदार्थों (जैसे कि भोजन और विषाक्त यौगिकों) को निकलने की अनुमति देते हैं।

    रिक्तिका के लक्षण एवं विशेषताएं

    रिक्तिका मुख्य रूप से पानी और अमीनो एसिड से बने होते हैं। इसके अलावा, रिक्तिका के भीतर के तरल पदार्थ में एंजाइम, शक्कर, खनिज लवण (पोटेशियम, सोडियम), ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड और कुछ वर्णक शामिल हैं जो पौधों और फूलों की पत्तियों के रंग के लिए जिम्मेदार हैं ।

    रिक्तिकाएं चारों ओर से एक अर्द्धपारगम्य झिल्ली (लिपिड) से घिरी रहती है, जो नमक के पानी को साइटोप्लाज्म से बाहर रखने की अनुमति देता है। जिसे टोनोप्लास्ट (Tonoplast) कहते हैं।

    वेकॉल्स तब बनते हैं जब एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम द्वारा छोड़े गए पुटिकाएं और गोलगी तंत्र द्वारा छोड़े गए एक एकल अंग में जुड़े होते हैं ।

    रिक्तिका का कोई विशिष्ट आकार या आकार नहीं होता है। ये दो विशेषताएं सेल की व्यक्तिगत जरूरतों पर निर्भर करेंगी।

    नई कोशिकाओं में छोटे रिक्तिका की एक श्रृंखला होती है; हालांकि, जब कोशिका परिपक्व होती है, तो ये छोटे जीव एकल केंद्रीय रिक्तिका में फ्यूज हो जाते हैं।

    केंद्रीय रिक्तिका कोशिका के आयतन का 90% भाग लेती है और 95% रह सकती है जब वह पानी के अवशोषण द्वारा फैलती है।

    पौधों में रिक्तिकाएं जानवरों की कोशिकाओं में लाइसोसोम के समान कार्य करती हैं, क्योंकि दोनों ऐसे थैली होते हैं जिनमें पाचन एंजाइम होते हैं।

    रिक्तिका के कार्य (Function of Vacuoles)

    • रिक्तिका को कोशिका का भण्डार घर कहा जाता है, जिसमें खनिज लवण, शर्करा, कार्बनिक अम्ल, O2 एवं Co2 आदि भरे होते हैं। इसमें स्थित रसधानी रस के कारण ही कोशिकाओं की स्फीति (turgidity) बनी रहती है। इसमें एक वर्णक एन्थोसायनिन पाया जाता है।
    • रिक्तिकाएं उन पोषक तत्वों का स्रोत होती हैं जिन्हें अंकुरण के दौरान बीज की आवश्यकता होती है ।
    • पादप कोशिकाओं की रिक्तिका में कोशिका रस (Cell sap) भरा रहता है जो कि निर्जीव पदार्थ होता है।
    • जन्तु कोशिका में रिक्तिका जल संतुलन का कार्य करती हैं।
    • पादप कोशिका में ये स्फीति (Turgidity) तथा कठोरता प्रदान करती है।
    • रिक्तिका कोशिका के साइटोप्लाज्म की अम्लता को अवशोषित करती है ।
    • रिक्तिकाएं साइटोसोल को विषाक्त पदार्थों, जैसे भारी धातुओं और हर्बिसाइड्स से बचाती हैं ।
    • कुछ एक कोशिकीय जीवों में विशिष्ट रसधानियाँ कुछ अपशिष्ट पदार्थों की शरीर से बाहर निकालने में सहायक होती हैं। पादप कोशिका का यह 90 प्रतिशत स्थान घेरता है।
    • इनमें भोज्य पदार्थ संचित रहते हैं। जलीय पौधों की रसधानियाँ गैसयुक्त होकर पौधों को तैरने में मदद करती हैं।
    • रिक्तिकाएं कवक एवं पौधों की कोशिकाओं के छोटे पुटिका होते हैं जो पानी शर्करा जैसे विभिन्न पदार्थों के भंडारण की अनुमति देते हैं। कई पुटिकाओं का संलयन रिक्तिका के विकास की अनुमति प्रदान करता है, जिनके समोच्च को प्लाज्मा झिल्ली द्वारा सीमांकित किया जाता है।
    • टर्गर एक घटना है जो तब होती है जब कोशिका आंतरिक तरल पदार्थ द्वारा निकाले गए बल के कारण सूज जाती है ।
    • यह घटना सेल की दीवार पर अधिक दबाव उत्पन्न करती है। रिक्तिकाएं पानी (हाइड्रोस्टेटिक दबाव) का उपयोग करके इस दबाव का हिस्सा छोड़ती हैं, जो सेल और पौधे की कठोरता को बनाए रखने में मदद करता है ।
    • जानवरों के विपरीत, पौधों में स्वयं उत्सर्जन की प्रणाली नहीं होती है, इसलिए यह अपशिष्ट और विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने के अन्य तरीकों पर निर्भर करता है ।
    • कोशिका अणु से छुटकारा पाने के लिए रिक्तिका का उपयोग करती है जिसकी उसे आवश्यकता नहीं है। इसे प्राप्त करने के लिए, रिक्तिका अवांछित तत्व को अवशोषित करती है और बाद में, सेल की दीवार की ओर बढ़ती है ।
    • एक बार सेल की दीवार में, रिक्तिका इसके साथ फ़्यूज़ हो जाती है, “कचरा” खोला और निष्कासित कर दिया जाता है। फिर, यह अंग कोशिका की दीवार से बंद हो जाता है और अलग हो जाता है ।
    • रिक्तिका के अंदर अम्लीय वातावरण, साथ ही साथ इस अंग में मौजूद एंजाइम बड़े अणुओं को ख़राब करने में मदद करते हैं जिन्हें रिक्तिका में भेजा जाता है ।
    • टोनोप्लास्ट साइटोप्लाज्म से रिक्तिका में हाइड्रोजन आयनों को ले जाने में हस्तक्षेप करता है, जिससे पर्यावरण की अम्लता बढ़ जाती है। इस अर्थ में, वेक्यूल जानवरों की कोशिकाओं में लाइसोसोम जैसा दिखता है ।
  • सेन्ट्रोसोम तारककाय (Centrosome) क्या है | तारककाय की खोज, कार्य और रासायनिक संगठन Centrioles ( सेन्ट्रियोल्स) in Hindi

    सेन्ट्रोसोम तारककाय (Centrosome) क्या है | तारककाय की खोज, कार्य और रासायनिक संगठन Centrioles ( सेन्ट्रियोल्स) in Hindi

    इस आर्टिकल में हम जानेगें की तारककाय यानी सेन्ट्रोसोम (Centrosome) जिसे तारककेंद्र भी कहते है क्या होता है ? तारककाय ( सेन्ट्रोसोम) की सरंचना क्या है ? तारककाय ( सेन्ट्रोसोम) का सायनिक संगठन क्या है ? तारककाय ( सेन्ट्रोसोम) के प्रमुख कार्य क्या है ? आदि

    सेन्ट्रोसोम तारककाय (Centrosome) क्या है ?

    यह मुख्य रूप से जंतु कोशिका में केंद्र के निकट तारे समान आकृति में पाई जाती है । इसके अलावा कुछ शैवालों तथा कवकों में दो जोड़े सेन्ट्रियोल्स (Centrioles) की बनी एक रचना होती है इसलिए इसे डिप्लोसोम (Diplosome) भी कहा जाता है। यह खोखली सूक्ष्मबेलनाकार रचनाएं होती है।तो एक युग्म के रूप में उपस्थित रहतीं हैं।

    प्रत्येक सेन्ट्रियोल्स सूक्ष्मनलिकाओं से निर्मित तीन तन्तुओं के नौ समूहों का बना होता है दो जोड़े सेन्ट्रियोल्स (तारककेन्द्रों) सेन्ट्रोस्फीयर (Centrosphere) से घिरे होते हैं। इस सम्पूर्ण रचना को सेन्ट्रोसोम कहा जाता है। कोशिका विभाजन के समय सेन्ट्रोसोम दो जोड़े सेन्ट्रियोल्स में विभाजित हो जाता है, जो दो विपरीत ध्रुवों पर चले जाते हैं।

    तारककाय सेन्ट्रोसोम की खोज

    सेंट्रोसोम की खोज संयुक्त रूप से वाल्थर फ्लेमिंग ने 1875 में [12] [13] और एडौर्ड वैन बेनेडेन ने 1876 में की थी और बाद में बाद में थियोडोर बोवेरी (T. Boweri) द्वारा इसका वर्णन और नामकरण तारककाय (सेन्ट्रोसोम) 1888 में किया गया।

    तारककाय (सेन्ट्रोसोम) की संरचना (Structure)

    प्रत्येह सेन्ट्रोसोम दो जोड़े तारककेन्द्रों (Centrioles) का बना होता है प्रत्येक जोड़े के दो सेन्ट्रिओल डिप्लोसोम(Diplosome) कहलाते है तथा एक-दूसरे से 90° का कोण बनाते हुए स्थित होते है।

    प्रत्येक तारककेन्द्रों (centrioles) त्रिक तन्तुओं (Triplet Fibres) के नौ समूहों (Nine Sets) का बना होता है।

    यह त्रिक तन्तु एक मध्य नाभि(Hub) के चारों ओर स्थित होते है। प्रत्येक त्रिक तन्तु  में तीन सूक्ष्म नलिकाएँ (Microtubules) एक रेखा में स्थित होती है। इस प्रकार के नौ त्रिक तन्तु रवाहीन(Amorphous), इलेक्ट्रॉनडेन्स पदार्थ में धँसे रहते है। यह इलेक्ट्रॉनडेन्स पदार्थ a नलिकाओं से केंद्रों की ओर जाकर केंद्र में नाभि(Hub) से जुड़ जाता है। प्रत्येक तारक काय कोकली विधि से बनी होती है यह एक या दोनों सिरों से खुली रहती है इसको देखने पर एक गाड़ी के पहिए के जैसी रचना प्रतीत होती है 

    तारक काय के सभी 9 त्रिक समूह एक समान होते हैं।

    सेन्ट्रोस्फीयर (Centriosphere) और डिप्लोसोम (Diplosome)

    कोशिका द्रव्य का क्षेत्र जो डिप्लोसोम को घेरे रहता है उसे सेन्ट्रोस्फीयर (Centrosphere)  कहते हैं। सेन्ट्रोस्फीयर व तारककाय से बनता है सेन्ट्रोसोम कहलाता है।  तारककाय या सेन्ट्रोडल्स का युग्म डिप्लोसोम कहलाता है

    Centrioles में RNA (सम्भवतः DNA) भी उपथित होते है लेकिन इनके कार्य अभी ज्ञात नहीं है।

    तारककाय सेन्ट्रोसोम का रासायनिक संगठन

    तारक काय सूक्ष्म नलिकाओं से रचित होती है। यह सूक्ष्मनलिकाएं ट्यूब्यूलिन (Tubulin ) नामक संरचनात्मक प्रोटीन से बनी होती है।

    तारककाय (सेन्ट्रोसोम) के प्रमुख कार्य  (Main Function of Centrosome)

    • तारक केंद्र कोशिकाओं में सूक्ष्म नलिकाओं के संगठन में सहायक होते हैं
    • शुक्राणु की  पूूंछ के का निर्माण करता है।
    • जंतु कोशिका में कोशिका विभाजन के समय तर्कु तंतुओं का निर्माण करती है।
    • सूक्ष्म जीवो में पाए जाने वाले अंगों जैसे कशाभिका ( Flagella ) व पक्ष्माभ (Cilia ) का निर्माण होता है
    • तारककाय  सूत्री विभाजन(Mitosis) के समय दो जोड़े Centrioles में विभाजित हो जाता है जिसमें से एक जोड़ा Centrioles एक ध्रुव (Pole) पर उसी स्थान पर रह जाता है तथा दूसरा जोड़ा Centrioles घूमकर दूसरे ध्रुव की ओर चला जाता है। इस प्रकार तारककाय (Centrosome) कोशिका विभाजन में भाग लेता है।
  • पाचन क्या है ? सरल भाषा में

    पाचन क्या है ? सरल भाषा में

    जटिल अणुओं का उनके सरल अणुओं में परिवर्तन पाचन कहलाता है | प्रोटीनों (जटिल अणुओं) का एमीनो अम्लों (सरल अणुओं) में विघटन – इसी प्रकार ग्लुकोज़ CO2 और H2O में विघटन – श्वसन प्रक्रिया ग्लूकोस का ग्लाइकोजन में रूपांतरण संश्लेषणात्मक प्रक्रिया है !

    पाचन वह क्रिया है जिसमें भोजन को यांत्रि‍कीय और रासायनिक रूप से छोटे छोटे घटकों में विभाजित कर दिया जाता है ताकि उन्हें रक्तधारा में अवशोषित किया जा सके. पाचन एक प्रकार की अपचय क्रिया है: जिसमें आहार के बड़े अणुओं को छोटे-छोटे अणुओं में बदल दिया जाता है।

    स्तनपायी प्राणियों द्वारा भोजन को मुंह में लेकर उसे दांतों से चबाने के दौरान लार ग्रंथियों से निकलने वाले लार में मौजूद रसायनों के साथ रासायनिक प्रक्रिया होने लगती है।

    यह भोजन फिर ग्रासनली से होता हुआ उदर में जाता है, जहां हाइड्रोक्लोरिक अम्ल सर्वाधिक दूषित करने वाले सूक्ष्माणुओं को मारकर भोजन के कुछ हिस्से का यांत्रि‍क विभाजन (जैसे, प्रोटीन का विकृतिकरण) और कुछ हिस्से का रासायनिक परिवर्तन आरंभ करता है।

    भोजन को पक्वाशय में पहुंचते ही सर्वप्रथम इसमें यकृत से निकलने वाला पित्त रस आकर मिलता है पित्त रस छारीय होता है और यह भोजन को अम्लीय से छारीय बना देता है यहां अग्नाशय से अग्नाशय रस आकर भोजन मिलता है इसमें तीन प्रकार के एंजाइम होते हैं !

    • ट्रिप्सिन यह प्रोटीन एवं उनको पॉलिपेप्टाइड तथा अमीनो अम्ल में परिवर्तित करता है
    • एमाइलेज – यह मांड को घुलनशील शर्करा में परिवर्तित करता है
    • लाइपेज – यह इमल्सीफाइड वसाओं का ग्रीन तथा फैटी एसिड्स में परिवर्तित करता है
  • किंग कोबरा घोंसला क्यूँ बनाता है ?

    किंग कोबरा घोंसला क्यूँ बनाता है ?

    विश्व में किंग कोबरा एकमात्र ऐसा सर्प है जो घोंसला बनाता है पर क्या आपको पता है वो घोंसला क्यूँ बनाता है ?

    वास्तव में ये एक अंडप्रजक सर्प है जो घोंसले में अंडे देता है और अंडों से सर्प निकलने तक घोंसले की पहरेदारी करता है ! विश्व में सर्प प्रजाति का केवल किंग कोबरा ही अपना घोंसला बनाता है !

    King Kobra संसार का सबसे लम्बा विषधर सर्प है। इसकी लम्बाई 5.6 मीटर तक होती है। सांपों की यह प्रजाति दक्षिणपूर्व एशिया एवं भारत के कुछ भागों में खूब पायी जाती है। एशिया के सांपों में यह सर्वाधिक खतरनाक सापों में से एक है।

    इसकी लंबाई 20 फिट तक हो सकती है। तथा यह भारत के दक्षिण क्षेत्रों में बहुतायात में पाया जाता है।

    भारत में, किंग कोबरा वन्यजीव संरक्षण की अनुसूची द्वितीय अधिनियम, 1972 (यथा संशोधित) और एक व्यक्ति को सांप के ऊपर से 6 साल के लिए कैद हो सकती है हत्या का दोषी के तहत रखा जाता है।

  • राइबोसोम की सरंचना एवं प्रकार (Ribosome in Hindi) | राइबोसोम के कार्य, विशेषताएं क्या है ? हिंदी में

    राइबोसोम की सरंचना एवं प्रकार (Ribosome in Hindi) | राइबोसोम के कार्य, विशेषताएं क्या है ? हिंदी में

    इस आर्टिकल में राइबोसोम की सरंचना एवं प्रकार के बारे में जानेगें | राइबोसोम की खोज किसने की ? उसके प्रमुख कार्य क्या है ? राइबोसोम को प्रोटीन का कारखाना (फैक्ट्री) क्यों कहा जाता है ? राइबोसोम के प्रकार क्या है आदि के बारे में जानकारी लेगें |

    राइबोसोम का परिचय (Introduction of Ribosome)

    राइबोसोम एक गोलाकार, दो उपइकाइयों के बने, झिल्ली विहीन राइबोन्यूक्लिओप्रोटीन के सूक्ष्म कण होते हैं, जो हरितलवक, केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य में (अन्तःप्रद्रव्यी जालिका पर राइबोफोरोन प्रोटीन द्वारा जुड़ा) पाए जाते हैं।

    यह एक झिल्ली विहीन कोशिकांग है। राइबोसोम सभी कोशिकाओं (सार्वभौमिक कोशिकांग) में पाया जाता है। कोशिकाद्रव्य में यह स्वतंत्र रूप में तथा खुरदरीअन्तःप्रद्रव्यी जालिका पर दाने के रूप में पाया जाता है। राइबोसोम सबसे छोटी कोशिकांग इकाई भी है और इसका आकार 15-20nm होता है।

    राइबोसोम RBC कोशिका को छोड़कर शेष सभी कोशिकाओं में (यूकैरियोटिक कोशिकाप्रोकैरियोटिक कोशिका) में पाया जाता है। ये प्रोटीन संश्लेषण नामक प्रक्रिया में अमीनो एसिड से प्रोटीन को बनाते हैं | राइबोसोम परिपक्व आरबीसी (Mature RBC) में अनुपस्थित होता हैं। रीबोफोरिन प्रोटीन की मदद से RER (खुरदरी अन्तःप्रद्रव्यी जालिका) पर उपस्थित होता है।

    राइबोसोम की खोज (Introduction of Ribosome)

    राइबोसोम की खोज सर्वप्रथम रोमानिया के जीववैज्ञानिक जॉर्ज पैलाडे (George Emil Palade) ने 1955 में की थी | उन्होंने इस खोज के लिए इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी का प्रयोग किया था जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। राइबोसोम नाम 1958 में वैज्ञानिक रिचर्ड बी. रॉबर्ट्स (Richard B. Roberts) ने प्रस्तावित किया था।

    राइबोसोम और उसके सहयोगी अणु 20वीं शताब्दी के मध्य से जीवविज्ञान के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाए हुए हैं। 7 अक्टूबर, 2009 को भारतीय मूल के वैज्ञानिक वेंकटरमन रामकृष्णन को रसायन विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें राइबोसोम की कार्यप्रणाली व संरचना के उत्कृष्ट अध्ययन के लिए यह पुरस्कार संयुक्त रूप से दिया गया |

    राइबोसोम की संरचना (Structure of Ribosome)

    प्रत्येक राइबोसोम लगभग दो गोलाकार सबयूनिट्स (Subunits) का बन जाता है. इनमें एक छोटी (छोटी इकाई) एवं एक बड़ी सब-यूनिट (बड़ी उप इकाई) होती है | छोटी इकाई की आकृति अण्डाकार एवं बड़ी इकाई की आकृति गुंबद के आकार जैसी होती है

    छोटी इकाई व बड़ी उप इकाई के क्रमशः कार्य m- RNA को जोड़ना व t- RNA को जोड़ने का काम करते हैं। राइबोसोम की संरचना के स्थाइत्व के लिए mg2+ की आवश्यकता होती है जिसका मान 0.001 मोलर होता है।

    राइबोसोम की बड़ी उपइकाई में तीन स्थल (साइट) होते हैं :

    ए-स्थल (A-Site): – यह अमीनोएसिल स्थल तथा टी-आरएनए के लिए ग्राही स्थल होता है।

    पी-स्थल (P-Site): – यह पेप्टाइडल साइट, पेप्टाइड श्रंखला के दीर्घीकरण के लिए स्थल होता है।

    ई-स्थल (E-Site): – यह टी-आरएनए के लिए राइबोसोम से बाहर निकलने के लिए स्थल होता है।

    इसकी उपइकाईयाँ राइबोप्रोटीन और आर-आरएनए द्वारा बनी होती है। जो निम्न प्रकार की होती है-

    50s उपइकाई – 34% प्रोटीन + 23 एस और 5 एस आर-आरएनए

    30s उपइकाई – 21% प्रोटीन + 16 एस आर-आरएनए

    60s उपइकाई – 40% प्रोटीन + 28 एस, 5.8 एस और 5 एस आर-आरएनए

    40s उपइकाई 33% प्रोटीन + 18 एस आरआरएनए

    Ribosome का निर्माण न्यूक्लियोलस (केन्द्रिक) में 40-60% प्रोटीन और 60-40% आरएनए द्वारा होता है। न्यूक्लियोलस को राइबोसोमल उत्पादक फैक्टरी (Ribosomal Manufactring Factory) माना जाता है।

    राइबोसोम के प्रकार (Types of Ribosome)

    राइबोसोम प्रोकेरियोटिक कोशिका और यूकैरियोटिक कोशिका दोनों में पाया जाता है। राइबोसोम के प्रकार निम्न है-

    प्रोकेरीयोट राइबोसोम (Prokaryotic Ribosome) 

    प्रोकैरियोटिक कोशिका में राइबोसोम 70S  प्रकार का पाया जाता है जो बड़ी उप इकाई 50S की इकाई 25s + 5S) एवं छोटी उप इकाई 30S की इकाई 16S प्रकार की बनी होती है

    युकेरीयोट  राइबोसोम (Eukaryotic Ribosome)

    यूकैरियोटिक कोशिका में राइबोसोम 80S प्रकार का पाया जाता हैं जो बड़ी उप इकाई 60S की इकाई (28S + 5.8S + 5S) एवं छोटी उप इकाई 40S की इकाई 18S  प्रकार की बनी होती है।

    हरितलवक राइबोसोम (Chloroplast Ribosome)

    यह 70s प्रकार के जो 50s और 30s उपइकाई के बने होते है।

    माइटोकांड्रिया राइबोसोम (Mitochondrial Ribosome)

    माइटोकॉन्ड्रिया के राइबोसोम को माइटोराइबोसोम भी कहते हैं यह 70s प्रकार के जो 50s और 30s उपइकाई के बने होते है। माइटोकॉन्ड्रिया व क्लोरोप्लास्ट का राइबोसोम 70S प्रकार का पाया जाता है। क्लोरोप्लास्ट के राइबोसोम को प्लास्टीड्यिल राइबोसोम कहते हैं।

    ध्यान दें :

    s = अवसादन गुणांक (Sedimentation coefficient) (राइबोसोम के आकार की मापने की इकाई होती है)

    70S राइबोसोम्स: ये आकार में छोटे होते हैं एवं इनका अवसादन गुणांक 70S होता है. ये माइटोकॉन्ड्रिया, क्लोरोप्लास्ट एवं बैक्टीरिया आदि में पाए जाते हैं |

    80S राइबोसोम्स: ये आकार में कुछ बड़े होते हैं और इनका अवसादन गुणांक 80S होता है. ये उच्च विकसित पौधों एवं जन्तु कोशिकाओं में पाए जाते हैं |

    राइबोसोम की प्रमुख विशेषताएं

    • राइबोसोम झिल्ली विहीन (Membraneless) होते हैं।
    • राइबोसोम कोशिकाद्रव्य, माइटोकॉन्ड्रिया, केंद्रक, अन्तःप्रद्रव्यी जालिका, हरितलवक में पाए जाते है।
    • यह गोलाकार (spherical) होते हैं।
    • इनका व्यास 150- 250 Å होता है
    • यह राइबोप्रोटीन तथा mRNAके बने होते हैं।
    • इनके आकार का निर्धारण अवसादन गुणांक (Sedimentation coefficient) के आधार पर किया जाता है।

    राइबोसोम के कार्य (Functions of Ribosome)

    राइबोसोम एक ऐसी कोशिका संरचना है जो प्रोटीन के संश्लेषण में सहायक होती है | कई कोशिकाओं को उनकी मरम्मत या रासायनिक प्रक्रियाओं को निर्देशित करने के लिए प्रोटीन की आवश्यकता होती है | राइबोसोम का मुख्य कार्य अमीनों अम्ल के द्वारा प्रोटीन संश्लेषण में सहायता करना है | प्रोटीन के निर्माण की प्रक्रिया ट्रांसलेशन या अनुवादन (Translation) कहलाती है।

    पॉलीराइबोसोम

    प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis)के दौरान कई Ribosome एम-आरएनए से जुड़कर एक सरंचना बनाता है, जिसे पॉलीराइबोसोम या पोलीसीम कहा जाता है।

    राइबोसोम को प्रोटीन की फैक्ट्री क्यों कहा जाता है ?

    चूँकि राइबोसोम प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis) में भाग लेता है, इसलिए इसे सेल के इंजन या प्रोटीन फैक्ट्री के रूप में जाना जाता है। इस को कोशिका का प्रोटीन कारखाना (Protein Factory of the Cell) या प्रोटीन की फैक्ट्री कहा जाता है |

    यदि कोशिका में राइबोसोम हटा दिया जाए तो क्या होगा?

    यदि कोशिका से राइबोसोम हटा दिए जाते हैं, तो प्रोटीन संश्लेषण नहीं होगा। इस प्रकार कोशिका चयापचय उत्पादों की कमी के कारण आगे प्रदर्शन करने की क्षमता खो देगी। कोशिका अंततः मर जाएगी | 
  • नीले हरे शैवालों की कुछ जातियों की कौन सी विशेषता उन्हें जैविक खाद के रूप में वर्धित करने में सहायक है ?

    नीले हरे शैवालों की कुछ जातियों की कौन सी विशेषता उन्हें जैविक खाद के रूप में वर्धित करने में सहायक है ?

    नीले हरे शैवालों में ऐसी क्रियाविधि होती है जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को ऐसे नए रूप में परिवर्तित कर देती है जिसे फसल के पौधे आसानी से ग्रहण कर सकते हैं !

    शैवालों के अध्ययन को फ़ाइकोलोजी कहते हैं, शैवाल प्राय पर्णहरित युक्त, संवहन ऊतक रहित, आत्मपोषी होते हैं !

    इनका प्रयोग निम्न रूपों में किया जाता है –

    • भोजन के रूप में – फोरफाइरा, अल्वा, सरगासन, लेमिनेरिया, नास्टोक
    • आयोडिन बनाने में – लेमिनेरिया, फ्यूकस, एकलोनिया आदि
    • खाद के रूप में – नोस्टोक, एनाबीना, केल्प आदि
    • औषधियों के रूप में – क्लोरेला से क्लोरेलिन नामक प्रतिजैविक एवं लेमिनेरिया से टिंचर आयोडिन वनाई जाती है !
    • अनुसंधान कार्यों में – क्लोरेला असीटेबुलेरिया, एलोनिया आदि, ये खेत में सड़कर वायु मंडलीय नाइट्रोजन को नाइट्रेट में बदल देते हैं जिससे जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है !
  • कुछ पौधे कीटभक्षी (insectivorous plants) क्यों होते हैं ?

    कुछ पौधे कीटभक्षी (insectivorous plants) क्यों होते हैं ?

    कुछ वनस्पतियां कीट भक्षी होती हैं क्योंकि उन्हें पर्याप्त नाइट्रोजन प्राप्त नहीं होता है और वह पर्याप्त नाइट्रोजन प्राप्त करने के लिए कीट पर निर्भर रहती है !  ये पौधे अपने भोजन को स्वयं संश्लेषित करने की क्षमता रखते हैं और इसलिए इन्हें स्वपोषी (ऑटोट्रोफ्स) कहा जाता है।

    कीट भक्षी पौधे

    1- सेरोसेनिया – इस पौधे में थैली नुमा पत्तियां जमीन पर एक झुंड में सजी रहती हैं। आकर्षक रंग की इन पत्तियों पर कुछ ग्रंथियां रहती हैं जिनमें शहद होता है। कीट पतंगे इसके रंग और शहद के कारण थैली के भीतर चले जाते हैं और कांटों में फंस जाते हैं और बाहर नहीं निकल पाते।

    2- ड्रोसैरा -इसे सनड्यूज़ भी कहते हैं। इसकी गोल-गोल पत्तियों के किनारे लाल रंग की घुण्‍डी वाले आलपिन सरीखे बाल होते हैं जिनसे एक चिपचिपा रस निकलता रहता है। छोटे कीट पतंगों को यही रस चिपका लेता है और फिर घुण्डियां मुड़कर चारों ओर से उसे घेर लेती हैं।

    3- यूट्रीकुलेरिया – इसे ब्लैडरवर्ट भी कहते हैं। इसकी पत्तियां गोल गुब्बारेनुमा होती हैं। जैसे ही कोई कीट-पतंगा इसके नजदीक आता है इस मौजूद रेशे उसे जकड़ लेते हैं। पत्तियों में निकलने वाला एंजाइम कीटो को खत्म करने में मदद करता है।

    4- पिचर प्लांट – इसे नेपिन्थिस के नाम से भी जाना जाता है। इसके मुंह और किनारे की ओर शहद की थैलियां होती हैं। कीट पतंगे सुराही के रंग से आकर्षित होकर शहद के लालच में अपनी जान गंवा बैठते हैं। चिकनी दीवार के कारण ये रेंगकर बाहर भी निकल नहीं पाते। इसे घटपर्णी के नाम से भी जाना जाता है। 

    5- डायोनिया – इसमें कीट पतंगों को पकड़ने वाला फंदा जमीन पर सजी पत्तियां होती हैं। यह भी ड्रोसैरा की तरह ही शिकार करता है। इसके दो पत्ते इसके लिए शिकार का काम करते हैं जिनके ऊपर लगे बाल इतने सक्रिय होते हैं कि चींटी तक की मौजूदगी तक पहचान लेते हैं। जैसे ही शिकार करीब आता है 1 सेकंड में उसे निगल लेता है।

  • अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) क्या है ? उसके प्रकार, संरचना और कार्य (सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में )

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) क्या है ? उसके प्रकार, संरचना और कार्य (सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में )

    इस आर्टिकल में हम जानेगें की अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum)या अंतर द्रव्य जालिका किसे कहते है ? अन्तःप्रद्रव्यी जालिका कितने प्रकार की होती है ? अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) की सरंचना कैसी होती है ?, और अन्तःप्रद्रव्यी जालिका के कार्य क्या होते है ? और अन्तःप्रद्रव्यी जालिका के रूपांतर क्या होते है ? आदि

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका ( एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम) या अंतर द्रव्य जालिका क्या है ?

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका झिल्ली युक्त नलिकाओं का एक बहुत बड़ा तन्त्र होता है। यह दोहरी झिल्ली से घिरी होती है। यह जन्तु एवं पादप कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य में अत्यंत सूक्ष्म, शाखित, झिल्लीदार, अनियमित नलिकाओं के घने जाल के रूप में पाई जाती है ।  यह लाइपोप्रोटीन की बनी होती है और कोशिकाओं में समानान्तर नलिकाओं के रूप में फैली रहती है। कोशिकाओं में इनका विस्तार कभी-कभी केन्द्रक की बाह्य झिल्ली से प्लाज्मा झिल्ली तक होता है।

    Endoplasm का अर्थ है जीवद्रव्य में और रेटिकुलम (reticulum) का अर्थ होता है एक प्रकार का जाल या जालिका | एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम की इस झिल्ली को पहली बार 1945 में कीथ आर. पोर्टर, अल्बर्ट क्लाउड और अर्नेस्ट एफ. फुलम द्वारा देखा गया था। बाद में, रेटिकुलम शब्द, जिसका अर्थ है “जाल या नेटवर्क”, पोर्टर द्वारा 1953 में इस झिल्ली युक्त नलिकाओं का वर्णन करने के लिए लागू किया गया था।

    एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम को झिल्ली युक्त नलिकाओं का पूरा एक नेटवर्क होने के कारण झिल्लियों का तंत्र (system of membrane) भी कहा जाता है।

    यह परिपक्व RBC को छोड़कर सभी यूकेरियोटिक कोशिकाओं में पाया जाता है। मांसपेशियों में एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम को सार्कोप्लाज्मिक रेटिकुलम कहा जाता है। जिसमें Ca की अधिकता होती है।

    अन्तः प्रद्रव्यी जालिका की संरचना (Structure of Endoplasmic reticulum)

    एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम की सामान्य संरचना सिस्टर्न नामक झिल्लियों का एक बना एक जाल या नेटवर्क होता है।

    ये थैली जैसी संरचनाएं साइटोस्केलेटन (cytoskeleton) द्वारा एक साथ रखी जाती हैं। फॉस्फोलिपिड झिल्ली (phospholipid membrane) सिस्टर्नल स्पेस (या लुमेन) को घेर लेती है, जो पेरिन्यूक्लियर स्पेस (perinuclear space) के साथ निरंतर होती है लेकिन साइटोसोल से अलग होती है।

    एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम तीन प्रकार की सरंचनाओं का एक जाल होता है जो निम्न है :

    सिस्टर्नी (Cisternae)

    ये लंबी, चपटी, अशाखित झिल्ली से बनी संरचना है। ये सिस्टर्नी समानांतर व्यवस्थित होकर  लैमिली (lamellae) का निर्माण करती हैं। ये खुरदरी अन्त: प्रद्रव्यी जालिका (Rough endoplasmic reticulum or RER) में अच्छी तरह से विकसित होती है।

    पुटिका (Vesicle)

    ये सिस्टर्नी से अलग, गोल और अंडाकार थैलीनुमा संरचना हैं, जो चिकनी अन्तः प्रदव्यीजालिका (Smooth endoplasmic reticulum – SER) में प्रचुर मात्रा में पायी जाती हैं।

    नलिकाएँ (Tubule)

    ये पुटिका तथा सिस्टर्नी से अलग-थलग और शाखित संरचना हैं जो चिकनी अन्तः प्रदव्यीजालिका में अच्छी तरह से विकसित है।

    अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के समान होती है, लेकिन इसके घटक भागों को अलग किया जा सकता है। गॉल्जीकाय (Golai Body) की तरह जीवद्रव्य में इसका कोई निश्चित स्थान नहीं है

    अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के प्रकार (Types of Endoplasmic reticulum)

    अन्तः प्रद्रव्यी जालिका दो प्रकार की खुरदरी अन्तःप्रद्रव्यी जालिका खुरदरी अन्त: प्रद्रव्यी जालिका (Rough endoplasmic reticulum or RER) तथा चिकनी अन्तः प्रदव्यीजालिका (Smooth endoplasmic reticulumSER) होती है।

    खुरदरी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका (Rough Endoplasmic Reticulum)

    खुरदरी अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (rough ER) का खुरदरापन उस पर स्थित राइबोसोम के कारण होता है। राइवोसोम पर प्रोटीन-संश्लेषण होता है। RER में राइबोसोम की बड़ी उपइकाई राइबोफ़ोरिन नामक ट्रांसमेम्ब्रेग्लाइकोप्रोटीन द्वारा जुड़ी होती है।

    अन्त:प्रद्रव्यी जालिका का प्रमुख कार्य उन सभी वसाओं व प्रोटीनों का संश्लेषण करना है, जो विभिन्न कोशिका झिल्ली अथवा केन्द्रक झिल्ली का निर्माण करते हैं।

    खुरदरी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के कार्य (Functions of Rough Endoplasmic Reticulum-RER)

    इसके द्वारा लाइसोसोम के एंजाइमों का निर्माण किया जाता है। विभिन्न प्रकार की प्रोटीन का संश्लेषण (Synthesis of Protein) करती है | ग्लाइकोसिलेशन (Glycosylation) की प्रक्रिया RER में ही होती है।
    RER में प्रोटियोसोम (proteasome) की सहायता से अनफोल्डेड प्रोटीन (Unfolded protein) को नष्ट किया जाता है।

    चिकनी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका (Smooth Endoplasmic Reticulum)

    चिकनी अन्त:प्रद्रव्यी जालिका (smooth ER) पर राइबोसोम नहीं पाए जाते हैं। SER कोशिकाझिल्ली के लिपिड का संश्लेषण तथा स्टेरॉयड हार्मोन संश्लेषण का प्रमुख स्थल है।

    चिकनी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के कार्य (Functions of Smooth Endoplasmic Reticulum)

    SER पर एस्कॉर्बिक एसिड (Vitamin C) का संश्लेषित किया जाता है। इसी पर विटामिन ए से रेटिना के वर्णकों का निर्माण होता है।
    ये लिपिड संश्लेषण और स्टेरॉयड हार्मोन में भाग लेता है
    ऑक्सीजन स्थानांतरण एंजाइम (ऑक्सीजिनेज) की सहायता से SER आविषालु पदार्थ की विषालुता को कम (Detoxification of drug) किया जाता है।
    पौधों में SER स्फिरोसोमे (Sphaerosomes) का निर्माण करती है।

    अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के रूपांतरण (Modification of Endoplasmic Reticulum)

    सारकोप्लाज्मिक रेटिकुलम (Sarcoplasmic reticulum)

    ये SER के रूपांतरण से बनते है। इनमें Ca2+ संचित रहता है। कंकाली पेशियों और हृद पेशियों में सारकोप्लाज्मिक रेटिकुलम पाए जाते है।

    ग्लाइकोसोम (Glycosome)

    यकृत कोशिकाओं में SER ग्लाइकोजन का संग्रहण करता है जिसे ग्लाइकोसोम कहते है।

    माइलॉयड काय (Myeloid Bodies)

    ये रेटिना की वर्णकित उपकला कोशिकाओं (pigmented epithelial cells) में मौजूद विशेष प्रकार की SER हैं। ये प्रकाश संवेदी (light sensitive) होते है |

    एर्गैस्टोप्लाज्म (Ergastoplasm)

    ये ER की लैमिला (lamellae) में पाए जाने वाले राइबोसोम का समूह हैं।

    माइक्रोसोम (Microsome)

    ये राइबोसोम से संबंधित ER का हिस्सा हैं। जो जीवित कोशिकाओं में नहीं पाया जाता। इनका पात्रे प्रोटीन संश्लेषण (in vitro protein synthesis) के अध्ययन में उपयोग किया जाता है।

    टी-नलिकाएं (T-Tubules)

    ये कंकाली पेशियों और हृद पेशियों की कोशिकाओं में अनुप्रस्थ व्यवस्थित होते हैं। ये पेशियों की कोशिकाओं में संकुचन को उत्तेजित और संचालित करते हैं।

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका आर्टिकल में शामिल महत्वपूर्ण प्रश्न :

    • अंतर द्रव्य जालिका की खोज किसने की थी?
    • एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम की खोज किसने की
    • एण्डोप्लाज्मिक रेटिकुलम in Hindi क्या है ?
    • अन्तः प्रदव्ययी जलिका परिभाषा
    • अंतर द्रव्य जालिका का चित्र
    • अंतर द्रव्य जालिका को इंग्लिश में क्या कहते हैं
    • अंतर द्रव्य जालिका कितने प्रकार की होती हैं
    • अन्तः प्रदव्ययी जलिका के कार्य
    • अंतर द्रव्य जालिका के प्रमुख कार्य क्या है?
    • Smooth endoplasmic reticulum in Hindi
    • चिकनी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका क्या है ?
    • खुरदरी अन्तः प्रद्रव्यी जालिका के कार्य (Functions of Rough Endoplasmic Reticulum-RER) क्या है ?
  • माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) क्या है ? माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना, संख्या और कार्य क्या है ? सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में

    माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) क्या है ? माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना, संख्या और कार्य क्या है ? सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) क्या है ? माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना क्या है, माइटोकॉन्ड्रिया के प्रकार या संख्या कितनी है और माइटोकॉण्ड्रिया का कार्य क्या है ? इसी के साथ हम जानेगे की माइटोकॉण्ड्रिया को कोशिका का शक्ति गृह क्यों कहा जाता है ?

    माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) क्या है ?

    माइटोकॉण्ड्रिया की खोज 1890 ई. में अल्टमेन (Altman) नामक वैज्ञानिक ने की थी। अल्टमेन ने इसे बायोब्लास्ट तथा बेण्डा ने माइटोकॉण्डिया कहा। जीवाणु एवं नील हरित शैवाल को छोड़कर शेष सभी सजीव पादप एवं जंतु कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य में अनियमित रूप से बिखरे हुए दोहरी झिल्ली आबंध कोशिकांगों (organelle) को सूत्रकणिका या माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) कहा जाता हैं। कोशिका के अंदर सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखने में ये गोल, लम्बे या अण्डाकार दिखते हैं।

    माइटोकॉण्ड्रिया सभी प्राणियों में और उनकी हर प्रकार की कोशिकाओं में पाई जाती हैं।

    माइटोकॉण्ड्रिया कोशिकाद्रव्य में की एक बहुत महत्वपूर्ण रचना है जो की कोशिकाद्रव्य में बिखरी रहती है। माइटोकॉण्ड्रिया दोहरी झिल्ली के आवरण से घिरी हुई रचनाएँ होती हैं। माइटोकॉण्ड्रिया का आकार (size) और आकृति (shape) परिवर्तन होता रहता है ।

    माइटोकॉण्ड्रिया की संरचना और विशेषताएँ क्या है ?

    प्रत्येक माइटोकॉण्ड्रिया एक बाहरी झिल्ली एवं एक अन्तः झिल्ली से चारों ओर घिरी रहती है तथा इसके बीच में एक तरलयुक्त गुहा होती है, जिसे माइटोकॉण्ड्रियल गुहा (Mitochondrial cavity) कहते हैं। बाहरी झिल्ली की सतह पर वृंतविहीन कण पाये जाते है, जिन्हें पारर्सन की उपइकाई (subunits of parson) कहा जाता है।

    माइटोकॉण्ड्रिया की बाहरी झिल्ली सपाट और अन्दर वाली झिल्ली मैट्रिक्स की ओर ऊँगली समान नलिकाओं (पादपों में) अथवा क्रिस्टी (जन्तुओं में) जैसी रचनाएँ बनाती हैं।

    माइटोकॉण्ड्रिया कोशिकाद्रव्य में कणों (Chondriomits), सूत्रों (Filament), छड़ों (Chondriconts) और गोलकों (Chondriospheres) के रूप में बिखरा रहता है।

    बाहरी झिल्ली

    माइटोकॉन्ड्रिया की बाहरी झिल्ली प्रोटीन और फॉस्फोलिपिड  की बनी होती है इसमें फॉस्फेटिडिल कोलीन की मात्रा अधिक होती है। इसकी मोटाई 60-70 Å होती है।

    इसकी बाहरी झिल्ली द्वारा बहुत बड़े अणुओं (6000 kD) का स्थानांतरण हो सकता है।

    माइटोकॉन्ड्रिया में बड़ी संख्या में धंसे हुए प्रोटीन (integral proteins) होते हैं जिन्हें पोरिन (porins) कहा जाता है।

    आंतरिक झिल्ली

    माइटोकॉन्ड्रिया की आंतरिक झिल्ली पर ऑक्सीडेटिव फॉस्फोराइलेशन के एंजाइम पाए जाते है इस झिल्ली पर एटीपी संश्लेषण की प्रक्रिया होती है।

    भीतरी झिल्ली (Inner membrane) की बाहरी सतह को सी-फेस (C-Face) तथा आंतरिक सतह को एम-फेस (M – Face) कहा जाता है।

    क्रिस्टी (Cristae)

    आंतरिक झिल्ली में कई उभार (projection) होते हैं जिन्हें क्रिस्टी (Cristae) कहा जाता है।

    क्रिस्टी में टेनिस के रेकेट के समान की संरचना होती हैं जिन्हें ऑक्सीसोम या F2 कण या आंतरिक झिल्लिका उपइकाई (inner membrane subunit) कहा जाता है।

    ऑक्सीसोम का निर्माण दो कारकों F0 तथा F1 के द्वारा होता है। F0 कण ऑक्सीसोम के आधार पर होता है।ऑक्सीसोम एटीपीस एंजाइम होते हैं जो ऑक्सीडेटिव फास्फोरिलीकरण में भाग लेता हैं। जो आंतरिक झिल्ली के साथ F1 कण के जुड़ने में मदद करता है। और F0 F1 कण  को OSCP (oligomycin sensitivity conferring protein) कहा जाता है। दो ऑक्सीसम के बीच की दूरी 100Å होती  है।

    आधात्री (Matrix)

    आंतरिक झिल्ली से घिरे हुए स्थान में भरे द्रव को मैट्रिक्स कहते है जिसमे कुल माइटोकॉन्ड्रियन प्रोटीन का लगभग 2/3 भाग होता है। ये प्रोटीन में क्रेब्स चक्र एंजाइम, श्वसनकारी एंजाइम होते है।

    विशेष माइटोकॉन्ड्रियल राइबोसोम, टी-आरएनए और माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए जीनोम की कई प्रतियां शामिल हैं।

    माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए (Mitochondrial DNA)

    माइटोकॉण्ड्रिया के मैट्रिक्स में क्रैब्स चक्र के एन्जाइम, DNA, राइबोसोम तथा RNA स्थित होते हैं इसलिए माइटोकॉण्ड्रिया को अर्धस्वायत्त कोशिकांग (semi autonomous organelle)कहा जाता है।

    इसमें माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए (mt-DNA) उपस्थिति होता है। जिसके कारण यह अपने प्रोटीन एवं एंजाइमों का निर्माण खुद कर सकता है।

    Mitochondrial DNA द्विरज्जुकी (double stranded), नग्न (naked) दानेदार (granular), गोलाकार (circular), उच्च G-C अनुपात (higher G-C ratio) वाला अणु है। माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए (mt-DNA) कोशिक के कुल डीएनए का 1% भाग होता है।

    माइटोकॉन्ड्रिया में  जीनोम (mt-DNA) का आकार छोटा होता है। लेकिन जीन की संख्या बहुत अधिक होती है।

    mt-DNA का आकार जानवरों की तुलना में पौधे में अधिक होता है।

    mt-DNA में उत्परिवर्तन से लेबर ऑप्टिक न्यूरोपैथी(Labour Optic Neuropathy) विकार उत्पन्न होता है। जिसमें नेत्र की दृक तंत्रिका (Optic Nerve) से जुड़े न्यूरॉन क्षतिग्रस्त हो जाते हैं।

    mt-डीएनए का उपयोग Phylogenetic संबंधों के अध्ययन के लिए किया जाता है।

    माइट्रोकान्ड्रिया के द्वारा मानव इतिहास का अध्ययन और खोज भी की जा सकती है, क्योंकि उनमें पुराने गुणसूत्र उपलब्ध होते हैं। शोधकर्ता वैज्ञानिकों ने पहली बार कोशिका के इस ऊर्जा प्रदान करने वाले घटक को एक कोशिका से दूसरी कोशिका में स्थानान्तरित करने में सफलता प्राप्त की है। माइटोकांड्रिया में दोष उत्पन्न हो जाने पर मांस-पेशियों में विकार, एपिलेप्सी, पक्षाघात और मंदबद्धि जैसी समस्याएं पैदा हो जाती हैं

    माइटोकॉन्ड्रिया के कार्य

    इसमें कोशकीय श्वसन (Cellular respiration)  होता है।

    न्यूरॉन्स में पाए जाने वाले माइटोकॉन्ड्रिया न्यूरोहोर्मोन के निर्माण में मदद करते हैं।

    विटललोजेनेसिस (Vitellogenesis) के दौरान माइटोकॉन्ड्रिया में mitochondrial kinase एंजाइम पीतक (Yolk) को घना और अघुलनशील बनाता है।

    माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का पावर हाउस क्यों कहा जाता है ?

    माइटोकॉन्ड्रिया में एटीपी का संश्लेषण (ATP production), एटीपी का भंडारण (ATP storage) और एटीपी का परिवहन (transport) होता है। ये तीनों कार्य माइटोकॉन्ड्रिया में होने के कारण माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का पावर हाउस (कोशिका का शक्ति गृह  (Power house of the cell) कहा जाता है।

    चूँकि सभी आवश्यक रासायनिक क्रियाओं को करने के लिए माइटोकॉण्ड्रिया ATP के रूप में ऊर्जा प्रदान करते हैं। इसे कोशिका का बिजलीघर भी कहा जाता है,

  • कोशिकांग (Cell Organelles) क्या होते हैं? कोशिकांग के प्रकार  (Types of Cell Organelles) | सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में

    कोशिकांग (Cell Organelles) क्या होते हैं? कोशिकांग के प्रकार (Types of Cell Organelles) | सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की कोशिकांग क्या होते है ? अंगक (Organelle) क्या होते है ? कोशिकांग के प्रकार कौन कौनसे है ? कोशिका अंगक क्या है ? कोशिकांग कितने होते है ?

    कोशिकांग (Cell Organelles) क्या होते हैं?

    जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग अलग अलग कार्य करते हैं, उसी तरह कोशिका के भीतर स्थित संरचनाएँ विशिष्ट कार्य करती हैं। इन्हीं संरचनाओं को कोशिकांग या अंगक या कोशिका अंगक (Organelle) कहते हैं।

    उदाहरण के लिये, माइटोकांड्रिया या सूत्रकणिका कोशिका का ‘शक्तिगृह’ (power house) कहलाता है क्योंकि इसी में कोशिका की अधिकांश रासायनिक ऊर्जा उत्पन्न होती है।

    कोशिकाद्रव्य में स्थित कोशिकांग कोशिकाओं के निर्णायक कार्य करते हैं। इन सभी कोशिकांगों का आवरण एक समान होता है। जैसे अन्तर्द्रव्यी जालिका, गॉल्जीकॉय परॉक्सीसोम, ग्लाइऑक्सीसोम आदि। परन्तु कुछ दूसरे कोशिकांगों का आवृत्त फॉस्फोलिपिड का नहीं बना होता है। जैसे– राइबोसोम ।

    कोशिका द्रव्य में पाई जाने वाली झिल्ली युक्त छोटी-छोटी संरचनाओं को कोशिका अंगक कहा जाता है । केंद्रक कोशिका का सबसे बड़ा कोशिकांग है।

    जन्तु कोशिका के मुख्य अवयव:
    (1) केंद्रिक (Nucleolus)
    (2) केंद्रक (Nucleus)
    (3) राइबोसोम (Ribosome)
    (4) पुटिका (Vesicle)
    (5) खुरदरी अंतर्द्रव्यी जालिका (Rough endoplasmic reticulum)
    (6) गॉल्जी काय (Golgi body)
    (7) कोशिकापंजर (Cytoskeleton)
    (8) चिकनी अंतर्द्रव्यी जालिका (Smooth endoplasmic reticulum)
    (9) माइटोकोंड्रिओन (Mitochondrion)
    (10) धानिका (Vacuole)
    (11) साइटोसोल (Cytosol)
    (12) लयनकाय (Lysosome)
    (13) तारककाय (Centrosome)
    (14) कोशिका भित्ति (Cell membrane)

    कोशिकांग के प्रकार कौनसे है (Types of Cell Organelles)

    कोशिकांग के निम्न प्रकार है अर्थात विभिन्न कोशिकांग निम्नलिखित हैं:

    माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria)

    माइटोकॉण्ड्रिया की खोज सन् 1900 में अल्टमान नामक वैज्ञानिक ने की थी। इसे कोशिका का ऊर्जा गृह/शक्ति गृह (Power House) भी कहा जाता हैं।  माइटोकॉण्ड्रिया दोहरी झिल्ली के आवरण से घिरी हुई रचनाएँ होती हैं। ये कोशिकाद्रव्य में छोटे-छोटे कणों, गोलों या छड़ों के रूप में पाए जाते हैं। इसमें बाहरी झिल्ली सपाट तथा अन्दर वाली झिल्ली मैट्रिक्स की ओर ऊँगली समान नलिकाओं (पादपों में) अथवा क्रिस्टी (जन्तुओं में) जैसे रचनाएँ बनाती हैं। इसे कोशिका का बिजलीघर कहा जाता है, चूँकि सभी आवश्यक रासायनिक क्रियाओं को करने के लिए माइटोकॉण्ड्रिया ATP के रूप में ऊर्जा प्रदान करते हैं।इसमें DNA एवं राइबोसोम पाए जाते हैं। राइबोसोम (Ribosome) राइबोसोम की खोज सन् 1955 में पैलाडे नामक वैज्ञानिक ने की थी। राइबोसोम राइबोन्यूक्लिक अम्ल (R.N.A.) तथा प्रोटीन के बने होते हैं।

    राइबोसोम (Ribosomes)

    राइबोसोम की खोज सन् 1955 में पैलाडे नामक वैज्ञानिक ने की थी। यह गोलाकार, दो उपइकाइयों के बने, झिल्ली विहीन राइबोन्यूक्लिओप्रोटीन के सूक्ष्म कण होते हैं, जो हरितलवक, केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य में (अन्त:प्रद्रव्यो जालिका पर राइबोफोरोन प्रोटीन द्वारा जुड़ा) पाए जाते हैं।राइबोसोम राइबोन्यूक्लिक अम्ल (R.N.A.) तथा प्रोटीन के बने होते हैं। राइबोसोम गोलाकार, 140-160 A व्यास वाले सघन सूक्ष्म कण होते हैं। यह सभी प्रकार के जीवों में पाए जाते है। राइबोसोम प्रोटीन संश्लेषण का केन्द्र होते हैं। यह एमीनो अम्ल का निर्माण करता है। इसे प्रोटीन की फैक्ट्री कहा जाता Mg की कम सान्द्रता पर ये दो उप-इकाइयों में बँट जाते हैं।

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum)

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका की खोज सन् 1945 में पोर्टर तथा उनके सहयोगियों ने की थी।अन्तःप्रद्रव्यी जालिका झिल्ली युक्त नलिकाओं का एक बहुत बड़ा तन्त्र होता है। यह दोहरी झिल्ली से घिरी होती है। इसे कोशिका का कंकाल तन्त्र कहलाता है क्योकी यह कोशिका को ढाँचा तथा मजबूती प्रदान करता है । इस पर राइबोसोम लगे होते हैं, जो प्रोटीन संश्लेषण का कार्य करते हैं। अन्त:प्रद्रव्यी जालिका का प्रमुख कार्य उन सभी वसाओं व प्रोटीनों का संश्लेषण करना है, जो विभिन्न कोशिका झिल्ली अथवा केन्द्रक झिल्ली का निर्माण करते हैं। चिकनी अन्त:प्रद्रव्यी जालिका (smooth ER) पर राइबोसोम नहीं पाए जाते हैं। ये लिपिड व स्टीरॉल का संश्लेषण करती हैं।

    गॉल्जीकाय (Golai Body)

    गॉल्जीकाय की खोज सन् 1898 में केमिलो गॉल्जी नामक वैज्ञानिक ने की थी। गॉल्जोकाय झिल्ली युक्त पुटिका है, जो एक-दूसरे के ऊपर समानान्तर रूप से रहती है। इन झिल्लियों का सम्पर्क अन्तःप्रद्रव्यो जालिका को झिल्लियो से होता है और इसलिए जटिल कोशिकीय झिल्ली तन्त्र के दूसरे भाग को बनाती हैं। ये केन्द्रक के पास स्थित रहती हैं। कोशिका भित्ति के लिए हेमी सेल्युलोस का निर्माण तथा स्राव गॉल्जीकाय से होता है। गॉल्जीकाय को लाइपोकॉण्ड्यिा या डिक्टियोसोम भी कहा जाता है। गॉल्जीकाय को कोशिका को ट्रैफिक पुलिस भी कहा जाता है। ये कोशिका पट्ट, कोशिका भित्ति, शुक्राणु के एक्रोसोम, लयनकाय तथा हॉरमोन के संश्लेषण का कार्य करती है।

    लाइसोसोम(लयनकाय) (Lysosome)

    सन् 1955में लाइसोसोम की खोज डी दुवे(De Duve)ने की थी। इसमें विभिन्न हाइड्रोलिटिक एन्जाइम्स भरे होते हैं। यह मुख्यतया जन्तु कोशिकाओं में पाई जाने वाली गोल इकहरी झिल्लियों से घिरी थैलियाँ है, जिसमें 50 हाइड्रोलिटिक एन्जाइम पाए जाते हैं, जो लगभग 5 pH पर कार्य करते हैं। यह कोशिका का अपशिष्ट निपटाने वाला तन्त्र है। लाइसोसोम में उपस्थित पाचनकारी एन्जाइम कार्बनिक पदार्थ को तोड़ देते हैं। लाइसोसोम को आत्महत्या की थैली भी कहा जाता है।

    तारककाय(सेन्ट्रोसोम) (Centrosome)

    प्राय: ये जन्तु कोशिका में पाए जाते हैं। इसके अलावा कुछ शैवालों तथा कवकों में दो जोड़े सेन्ट्रियोल्स की बनी एक रचना होती है इसलिए इसे डिप्लोसोम भी कहा जाता है। प्रत्येक सेन्ट्रियोल्स सूक्ष्मनलिकाओं से निर्मित तीन तन्तुओं के नौ समूहों का बना होता है दो जोड़े सेन्ट्रियोल्स सेन्ट्रोस्फीयर से घिरे होते हैं। इस सम्पूर्ण रचना को सेन्ट्रोसोम कहा जाता है। कोशिका विभाजन के समय सेन्ट्रोसोम दो जोड़े सेन्ट्रियोल्स में विभाजित हो जाता है, जो दो विपरीत ध्रुवों पर चले जाते हैं।

    रिक्तिका (रसधानियाँ)(Vacuoles)

    ये इकहरी झिल्ली (टोनोप्लास्ट) से घिरी तथा तरल पदार्थों से भरी रचनाएँ होती हैं। पादप कोशिका में, यह बड़े आकार में, जबकि जन्तु कोशिका में ये अनेक और बहुत ही छोटे आकार में होती है। इसे कोशिका का भण्डार घर कहा जाता है, जिसमें खनिज लवण, शर्करा, कार्बनिक अम्ल, O2 एवं Co2 आदि भरे होते हैं। इसमें स्थित रसधानी रस के कारण ही कोशिकाओं की स्फीति (turgidity) बनी रहती है। इसमें एक वर्णक एन्थोसायनिन पाया जाता है।

    लवक (Plastids)

    सन् 1865 में लवक (Plastid) की खोज हैकेल ने की। लवक कोशिकाओं में स्थित होते हैं। इनकी भीतरी रचना में बहुत-सी झिल्ली वाली परतें होती हैं जो स्ट्रोमा में स्थित होती हैं। ये गोलकार या चपटे आकार के रंगीन अथवा रंगहीन होते हैं। लवक केवल पादप कोशिकाओं में स्थित होते हैं। लवक पुष्पों तथा फलों को आकर्षक रंग देते हैं। पुष्पों का आकर्षक रंग कीटों को आकर्षित करता है, जिससे फूलों में परागण होता है। ये तीन प्रकार के अर्थात् हरितलवक, अवर्णी लवक तथा वर्णी लवक होते हैं।