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  • कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) और जीव द्रव्य (Protoplasm) क्या है ?

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) क्या है उसकी संरचना क्या है और कोशिका द्रव्य की विशेषताएँ क्या है ? साथ ही हम जानेगे की जीवद्रव्य (Protoplasm) क्या है ? उसकी खोज किसने की | जीवद्रव्य (Protoplasm) की संरचना और विशेषताएँ क्या है ?

    कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) क्या है ?

    कोशिका का एक बड़ा भाग है, जो कोशिका झिल्ली या प्लाज्मा झिल्ली से घिरा एक तरल पदार्थ होता है। अर्थात कोशिका मे कोशिका झिल्ली के अंदर केन्द्रक को छोड़कर सम्पूर्ण पदार्थों को कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) कहते हैं। इसमें बहुत से कोशिका के घटक होते हैं, जिसे कोशिका अंग कहते हैं, जो कोशिका के लिए विशिष्ट कार्य करते हैं।

    कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm) सभी कोशिकाओं में पाया जाता है तथा कोशिका झिल्ली के अंदर तथा केन्द्रक झिल्ली के बाहर रहता है। यह रवेदार, जेलीनुमा, अर्धतरल पदार्थ है। यह पारदर्शी एवं चिपचिपा होता है। यह कोशिका के 70% भाग की रचना करता है।

    इसकी रचना जल एवं कार्बनिक तथा अकार्बनिक ठोस पदार्थों से हुई है। इसमें अनेक रचनाएँ होती हैं। प्रकाश सूक्ष्मदर्शी में सभी कोशिकांगों (Cell organelles) को स्पष्ट नहीं देखा जा सकता है। इन रचनाओं को स्पष्ट देखने के लिए इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी या किसी अन्य अधिक विभेदन क्षमता वाले सूक्ष्मदर्शी की आवश्यकता पड़ती है

    यूकैरियोटिक कोशिकाओं में कोशिकांग झिल्लीयुक्त होते हैं, जबकि प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में ये झिल्लीयुक्त नहीं होते हैं |

    इसके बारे में सबसे पहले पोर्टर ( Porter) ने सन् 1945 में बताया था ।

    जीवद्रव्य (Protoplasm) क्या है ?

    कोशिकाद्रव्य तथा केन्द्रक दोनों को मिलाकर जीवद्रव्य कहलाता है। यह कोशिकाद्रव्य अर्द्ध पारदर्शक चिपचिपा, रंगहीन तथा कणिकामय होती है। यहाँ एन्जाइम की प्रचुरता होती है।

    यह प्रत्येक कोशिका में कोशिका झिल्ली के अंदर पाया जाता है। रासायनिक दृष्टि से यह (जीवद्रव्य) कार्बोनिक तथाअकार्बनिक पदार्थो का एक मिश्रण है। इसका उपयोग सभी जीवों द्वारा ईंधन के रूप में किया जाता है।

    डुजार्डिन (Dujardin) ने 1835 में प्रोटोप्लाज्म (protoplasm) की खोज की और इसे “सरकोड (sarcode)” नाम दिया।

    जेई पुर्किनजे (J.E. Purkinje) ने 1839 में सबसे पहले ‘प्रोटोप्लाज्म (Protoplasm) शब्द की शुरुआत की और इस तरल जैविक पदार्थ को जीवद्रव्य  (Protoplasm) का नाम दिया।

    जीव द्रव्य के प्रकार

    जीव द्रव्य को दो भागों में बांटा गया है यह द्रव्य हर एक कोशिका में मौजूद होता है इसके दो भाग इस प्रकार हैं पहला कोशिका द्रव्य तथा दूसरा केंद्रक द्रव्य। किसी भी जीव की कोशिका में जीव द्रव्य अवश्य पाया जाता है तथा जीवित प्राणी के शरीर में यह जीवन का मूल संचरण होता है।

    मैक्स शुल्त्स (Max Schultze) ने प्रोटोप्लाज्म और सरकोड के बीच समानता स्थापित की जो उन्हें एक सिद्धांत का प्रस्ताव करने के लिए प्रेरित किया जिसे हर्टविग द्वारा प्रोटोप्लाज्मिक सिद्धांत (protoplasmic theory by Hertwig) कहा जाता है। यह सिद्धांत बताता है कि जीवद्रव्य जीवन का भौतिक आधार है (protoplasm is the physical basis of life) ।

  • प्लाज्मा झिल्ली या जीवद्रव्य कला या कोशिका कला (Plasma membrane) क्या है ? इसकी संरचना (Structure) एवं कार्य।

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की प्लाज्मा झिल्ली या जीवद्रव्य कला या कोशिका कला क्या होती है, प्लाज्मा झिल्ली की संरचना (Structure), इकाई झिल्ली संकल्पना, फ्ल्यूइड मोजैक मॉडल और कोशिका कला या प्लाज्मा झिल्ली के कार्य क्या होता है आदि |

    प्लाज्मा झिल्ली या जीवद्रव्य कला या कोशिका कला (Plasma membrane) क्या है

    कोशिका कला कोशिका की सबसे बाहरी परत है, जो उसके विभिन्न घटकों को बाहरी वातावरण से अलग करती है। सभी कोशिकाओं (जन्तु कोशिका या पादप या नग्न कोशिकाएँ) के अवयव चारों तरफ से एक अत्यन्त पतली, लचीली तथा अर्द्धपारगम्य झिल्ली (Semi-permeable membrane) घिरे रहते हैं, जिसे जीवद्रव्य कला या कोशिका कला (Plasma membrane) कहते हैं ।

    यह झिल्ली जीवद्रव्य कला, जीवद्रव्य तथा ऊतक द्रव्य (Tissue fluid) के बीच एक अवरोधक की तरह कार्य करती है, जिससे होकर कुछ विलयन, विलायक तथा यौगिक अन्दर – बाहर हो सकते हैं। इस तरह यह झिल्ली आवश्यक पदार्थों को अन्दर अथवा बाहर जाने देती है। इसी को चयनात्मक पारगम्यता (selective permeability) कहते हैं। इस दृष्टि से O2 एवं CO2, कोशिका झिल्ली के आर-पार विसरण प्रक्रिया तथा जल परासरण प्रक्रिया द्वारा कोशिका के अन्दर एवं बाहर होते हैं।

    प्लाज्मा झिल्ली की संरचना (Structure of Plasma membrane)

    रॉबर्टसन (1959) की इकाई झिल्ली अवधारणा के अनुसार सभी कोशिकाएँ दो प्रोटीन परतों (प्रत्येक 20 Å मोटी) के मध्य फॉस्फोलिपिड की परत (35 Å मोटी) की बनी होती है।

    इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से प्लाज्मा शिल्ली का अध्ययन करने पर ये तीन स्तरों की बनी दिखाई देती है :

    (i) 20 Å मोटी, बाह्य सघन स्तर (External dense layer) – यह प्रोटीन की बनी होती है।

    (ii) 35 Å मोटी, मध्य हल्की स्तर (Middle light layer) – यह द्विध्रुवीय तथा फॉस्फोलिपिड की बनी होती है।

    (iii) 20 Å मोटी भीतरी सघन स्तर (Internal dense layer) – यह भी प्रोटीन की बनी होती है।

    इकाई झिल्ली संकल्पना (Unit membrane concept)

    रॉबर्ट्सन (Robertson) ने सन् 1959 में प्लाज्मा झिल्ली के बारे में जो परिकल्पना का प्रतिपादन किया, जिसे ‘इकाई झिल्ली परिकल्पना‘ कहते हैं।

    इस परिकल्पना के अनुसार, प्रोटीन-लिपिड तथा प्रोटीन की बनी त्रिस्तरीय प्लाज्मा झिल्ली को ‘इकाई झिल्ली‘ (Unit membrane) कहते हैं और प्लाज्मा झिल्ली के अलावा कोशिका के अन्दर मिलने वाली सभी झिल्लियाँ इकाई झिल्ली की ही बनी होती हैं । रॉबर्ट्सन  की परिकल्पना के अनुसार एण्डोप्लाज्मिक रेटिकुलम, माइटोकॉण्ड्रिया, लाइसोसोम, गॉल्जीकाय, राइबोसोम, केन्द्रक कला (Nuclear membrane) व लवक आदि भी इसी इकाई झिल्ली के बने होते हैं। इस परिकल्पना के अनुसार, विभिन्न प्रकार के कोशिकाओं की संरचना प्लाज्मा झिल्ली या इकाई झिल्ली के द्वारा होती है।

    फ्ल्यूइड मोजैक मॉडल (Fluid Mosaic Model)

    सिंगर एवं निकोलसन (1972) ने तरल मोजैक मॉडल प्रस्तुत किया इसके अनुसार, कोशिका कला में दो प्रकार की प्रोटीन (परिधीय अथवा बाह्य तथा समाकल या आन्तरिक), ग्लाइकोप्रोटीन तथा ग्लाइकोलिपिड होते हैं। सर्वप्रथम प्लाज्मा झिल्ली की त्रिस्तरीय संरचना के बारे में डेनियली तथा डेवसन (Danielli and Davson) ने सन् 1935 में बताया। इसके बाद हार्वे तथा डेनियली ने इसकी रचना का एक कल्पित चित्र बनाया।

    कोशिका कला या प्लाज्मा झिल्ली के कार्य (Functions cell membrane or plasma
    membrane)

    कोशिका झिल्ली लचीली होती है और कार्बनिक अणुओं; जैसे-ग्लाइकोप्रोटीन तथा ग्लाइकोलिपिड की बनी होती है।

    कोशिका झिल्ली का लचीलापन एककोशिकीय जीवों में कोशिका के बाह्य वातावरण से भोजन तथा अन्य पदार्थ ग्रहण करने में सहायता करता है। इस प्रक्रिया को एण्डोसाइटोसिस कहते हैं। अमीबा इसी प्रक्रिया द्वारा भोजन ग्रहण करता है।

    पारगम्यता (Permeability)

    कोशिका कला पतली, लचीली झिल्ली होती है, जो आवश्यक पदार्थों को कोशिका के अन्दर व बाहर आने-जाने देती है। कोशिका कला की इस प्रवृत्ति को पारगम्यता (Permeability) कहते है। पारगम्यता के आधार पर कोशिका कला के अलग अलग प्रकार होते है  –

    ऐसी कोशिका कला जो किसी भी पदार्थ को आर-पार नहीं जाने देती, अपारगम्य होती है।

    ऐसी कोशिका कला जो कुछ चुने हुये पदार्थों को ही कोशिका के अन्दर एवं बाहर आने-जाने देती है, चयनात्मक पारगम्य कला (Selective permeable membrane) होती है। सभी कोशिका कला इस श्रेणी की ही होती है।

    ऐसी कोशिका कला जो जल को कोशिका के अन्दर एवं बाहर आने-जाने देती है, “अर्द्धपारगम्य कोशिका कला होती है।

    ऐसी कोशिका कला, जो केवल गैस पदार्थों को कोशिका के अन्दर व बाहर नहीं आने-जाने देती है, अपारगम्य कोशिका कला होती है।

    परासरण (Osmosis)

    जब कम सान्द्र एवं अधिक सान्द्र विलयनों को अर्द्धपारगम्य झिल्ली के द्वारा अलग रखा जाता है, तो जल कम सान्द्रता वाले विलयन से अधिक सान्द्रता वाले विलयनों की ओर बहता है, तो यह क्रिया परासरण (Osmosis) कहलाती है। जब जल कोशिका के अन्दर से बाहर जाता है, तो बाह्य परासरण (Exosmosis) कहलाता है। जब जल कोशिका में बाहर से अन्दर जाता है, तो अन्तःपरासरण (Endosmosis) कहलाता है

    विसरण (Diffusion)

    जब कोशिका कला के द्वारा दो अलग-अलग सान्द्रता वाले विलयन अलग होते हैं, तो कम सान्द्रता वाला विलयन अधिक सान्द्रता वाले विलयन की ओर बहने लगता है तथा सान्द्रता समान होने पर बहना बन्द हो जाता है।

  • जंतु कोशिका और पादप कोशिका में अंतर || तुलना तथा समानता

    हम इस आर्टिकल में जानेगे में की जंतु कोशिका और पादप कोशिका में क्या अंतर है ? जंतु कोशिका किसे कहते हैं और पादप कोशिका किसे कहते हैं। इसके साथ ही हम जंतु कोशिका और पादप कोशिका में क्या अंतर है , जंतु कोशिका तथा पादप कोशिका में क्या समानता है, साथ ही जंतु कोशिका और पादप कोशिका का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे।

    जंतु कोशिका और पादप कोशिका के बीच के अंतर को जानने के लिय हम सबसे पहले कोशिका के बारे में जानेगें |

    कोशिका

    जीवों के उनके जैविक क्रियाओं में आकार प्रदान करने वाली मूलभूत इकाई को कोशिका कहा जाता है। उसका जीवन की सबसे छोटी कार्यात्मक और संरचनात्मक इकाई है।

    मुख्य रूप से दो प्रकार की कोशिकाएं होती हैं।

    1. प्रोकैरियोटिक कोशिका 2. यूकैरियोटिक कोशिका

    प्रोकैरियोटिक कोशिका

    प्रोकैरियोटिक कोशिका ऐसी कोशिका होती है जिसमें केंद्रक नहीं होता है तथा इनमें कोशिकांग भी सुविकसित नहीं होता है प्रोकरयोटिक कोशिका में कोशिका भित्ति म्यूरॉन की बनी होती है इनके गुणसूत्र में हिस्टोन प्रोटीन नहीं पाया जाता है

    उदाहरण – जीवाणु ( Bacteria ) , साइनोबैक्टीरिया अर्कीबैक्टीरिया , विषाणु ( Virus ) , बैक्टीरियोफेज , माइकोप्लाज्मा ( PPLO ) , नील हरित शैवाल ( Blue green algae ) रिकेट्सिया की कोशिकाएं आदि |

    यूकैरियोटिक कोशिका

    यूकैरियोटिक कोशिका में केंद्रक पाए जाते हैं इनमें कोशिकांग पूर्ण रूप से विकसित होता है यूकैरियोटिक कोशिका के गुणसूत्र में हिस्टोन प्रोटीन पाया जाता है तथा ये क्षारीय प्रकृति के होते हैं।

    उदाहरण – सभी जन्तु कोशिका , प्रोटोजोआ , जीव, पादप कोशिका, जन्तु आदि।

    यूकैरियोटिक कोशिका दो प्रकार की होती है।

    जन्तु कोशिका

    पादप कोशिका।

    मूल रूप से जो कोशिका जंतुओं में पाई जाती हैं उसे जंतु कोशिका कहते हैं |

    जो कोशिकाएं पोधों में पाई जाती है उन्हें पादप कोशिका कहते है |

    जन्तु  एवं पादप कोशिका में अन्तर (Difference between Plant and Animal cell)

    जन्तु कोशिकापादप कोशिका
    कोशिका कला के बाहर कोई भित्ति नहीं होती। कोशिका कला ही कोशिका की सीमा है।कोशिका कला चारों ओर से एक भित्ति द्वारा घिरी रहती है, जिसे कोशिका भित्ति कहते हैं, जो प्रायः सेलुलोज नामक पदार्थ की बनी होती है।
    रसधानियाँ अनुपस्थित या बहुत छोटी होती हैं। अतः कोशिकाद्रव्य कोशिका में समान रूप से वितरित रहता हैबड़ी-बड़ी रसधानियाँ होती हैं, जो कि कोशिका का काफी बड़ा भाग घेरे रहती हैं।
    लवक नहीं पाए जाते हैं।लवक पाए जाते हैं (हरे हरितलवक, रंगहीन ल्यूकोप्लास्ट एवं रंगीन क्रोमोप्लास्ट)।
    अधिकांश जन्तुओं की कोशिकाओं में सेण्ट्रोसोम पाए जाते हैं।अधिकांश पौधों की कोशिकाओं में सेन्ट्रोसोम नहीं पाए जाते हैं।
    लाइसोसोम पाए जाते हैं।अधिकांश पौधों की कोशिकाओं में लाइसोसोम नहीं मिलते।
  • अनावृतबीजी (Gymnosperms) एवं आवृतबीजी (Angiosperm) क्या है ? अनावृतबीजी एवं आवृतबीजी पोधों के बीच अंतर, लक्षण, विशेषताएँ और महत्त्व क्या है ?

    अनावृतबीजी (Gymnosperms) एवं आवृतबीजी (Angiosperm) क्या है ? अनावृतबीजी एवं आवृतबीजी पोधों के बीच अंतर, लक्षण, विशेषताएँ और महत्त्व क्या है ?

    इस आर्टिकल में हम जानेगें: अनावृतबीजी (Gymnosperms – जिम्नोस्पर्म) पोधे क्या होते है ?, अनावृतबीजी पोधों की विशेषताएँ, लक्षण और उदहारण क्या है ?, अनावृतबीजी पोधों का आर्थिक महत्त्व  क्या है ?, आवृतबीजी (Angiosperm – एंजियोस्पर्म) पोधे क्या होते है ?, आवृतबीजी पोधों की विशेषताएँ, लक्षण और उदाहरण क्या है ? आवृतबीजी पोधों का आर्थिक महत्त्व  क्या है ? और अनावृतबीजी और आवृतबीजी पोधों के अंतर क्या है ?

    अनावृतबीजी और आवृतबीजी पौधों की दो मुख्य श्रेणियां हैं। दोनों बीज वाले (seed bearing) पौधे हैं जिनमें कुछ समानताएं हैं। अनावृतबीजी आवृतबीजी विकसित होने के 200 मिलियन से अधिक वर्षों से पहले ही पृथ्बी पर इनकी उपस्थिती थी l इन दोनों के बीच मुख्य अंतर इनकी विविधता (diversity) है। 

    अनावृतबीजी (Gymnosperms – जिम्नोस्पर्म) पोधे क्या होते है ?

    अनावृतबीजी समूह के पौधों में बीज किसी प्रकार की संरचना से ढके हुए नहीं होते हैं अर्थात् बीज नग्न (खुला हुआ एवं अण्डाशय का अभाव) होता है। जैसा कि नाम से पता चलता है कि अनावृतबीजी पादप जगत के संवहनी पौधे हैं जो नग्न बीज धारण करते हैं। इनकी बहुत ही कम प्रजाति पृथ्वी पर पाई जाती है इसका मुख्य कारण इनके बीजों के संरक्षण का अभाव है। बीज निकलने पर वो खुले और असुरक्षित होते हैं। इन बीजों को जल्दी से जमीन में उतर कर पनपने की आवश्यकता होती है ताकि ख़राब मौसम, जानवरों या अन्य कारणों से इनको क्षति न पहुचे l

    अनावृतबीजी पोधों की विशेषताएँ और लक्षण

    यह पौधा सदाबहार, काष्ठीय तथा लम्बा होता है। ये मरुद्भिद् स्वभाव के होते हैं, जिनमें रन्ध्र पत्ती में घुसे होते हैं तथा बाह्य त्वचा पर क्यूटिकल की पर्त चढ़ी होती है। अनावृतबीजी के अन्तर्गत शंकुधारी पौधे रखे गये हैं, जिसमें चीड़, फर, स्पूस आदि आते हैं।

    भारत में विशेषकर मैदानी भागों में साइकेड नामक पौधे पाए जाते हैं। इस वर्ग के पौधे काष्ठीय, लम्बे एवं बहुवर्षीय होते हैं। इसमें वायु परागण होता है तथा बहुभ्रूणता पाई जाती है, जिसमें मूलांकुर तथा प्राकुंर (plumule) के साथ ही एक या एक से अधिक बीजपत्र बनते हैं।

    अनावृतबीजी पोधों के उदाहरण

    जिम्नोस्पर्म की बहुत कम प्रजातियाँ हैं, इन पौधों के कुछ उदाहरण सरू (cypress), गनेटम (Gnetum), पाइन (pine), स्प्रूस (spruce), रेडवुड (redwood), जिन्कगो (Ginkgo), साइकैड्स (Cycads), जुनिपर (Juniper), फ़िर (Fir) और वेलवित्चिया (Welwitschia) हैं।

    अनावृतबीजी पोधों का आर्थिक महत्त्व

    • साइकस के तनों से मण्ड निकालकर खाने वाला साबूदाना बनाया जाता है। इसलिए साइकस को सागोपाम भी कहा जाता है।
    • चीड़ के पेड़ से तारपीन का तेल, देवदार की लकड़ी से सिड्रस का तेल तथा जूनीपेरस की लकड़ी से सिड्रस काष्ठ तेल का उत्पादन होता है।
    • जूनीपेरस की लकड़ी का उपयोग पेन्सिल तथा पैन होल्डर बनाने में होता है। एबीज तथा पीसिया की लकड़ी को माचिस की डिब्बियाँ तथा उसके काष्ठ लुग्दी से कागज तैयार किया जाता है। 3
    • चीड़ के पेड़ से रेजिन का उत्पादन होता है।
    • इफेड्रीन दवा, जो इफेड्रा से प्राप्त होता है, का उपयोग दमा की बीमारियों के इलाज हेतु किया जाता है।

    आवृतबीजी (Angiosperm – एंजियोस्पर्म) क्या है

    जैसा कि नाम से पता चलता है, आवृतबीजी संवहनी पौधे हैं, जो फलों या परिपक्व अंडाशय में बीज देते हैं। आवृतबीजी फूल बनाता है जो प्रजनन अंगों और फलों (reproductive organs and fruits ) को carry करता है । ये पौधे स्थलीय आवास के लिए अधिक अनुकूल हैं और इनका बहुत व्यापक रुप से फैले हुए है, अभी तक इनकी लगभग 250000 प्रजातियों की पहचान की जा चुकी है

    आवृतबीजी पोधों की विशेषताएँ और लक्षण

    ये पुष्प युक्त पौधे होते हैं, जिसमें बीज सदैव फलों के अन्दर होता है। इस वर्ग के पौधों में जड़, तना, पत्ती, फूल और फल लगते हैं। ये शाक, झाड़िया या वृक्ष तीनों ही रूप में मिलते हैं। आवृतबीजी में परागकण तथा बीजाण्ड विशिष्ट रचना के रूप में विकसित होते हैं, जिन्हें पुष्प कहा जाता है, जबकि अनावृतबीजी में बीजाण्ड अनावृत होते हैं।

    आवृतबीजी पोधों के उदाहरण

    आम, सेब, केला, आड़ू, चेरी, नारंगी और नाशपाती सहित फलों के पेड़ अक्सर फल देने से पहले फूल दिखाते हैं और परागण प्रक्रिया आमतौर पर मधुमक्खियों के जरिये संपन्न करते है । चावल, मक्का और गेहूं सहित अनाज भी एंजियोस्पर्म के उदाहरण हैं। इन पौधों में परागण प्रक्रिया पवन द्वारा की जाती है। एंजियोस्पर्म के अन्य उदाहरणों में गुलाब, लिली, ब्रोकोली, केल, पेटुनीया, बैंगन, टमाटर, मिर्च और गन्ना शामिल हैं।

    आवृतबीजी पोधों के प्रकार

    आवृतबीजी को दो वर्गों एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री में बाँटा गया है।

    एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री पौधों में अन्तर

    एकबीजपत्रीद्विबीजपत्री
    बीज में बीजपत्रों की संख्या एक होती है।इसमें दो बीजपत्र होते हैं।
    पुष्प प्रायः त्रितयी (timerous) अर्थात् पुष्पांग प्रायः तीन के जोड़े में होते हैं।पुष्प प्रायः चतुर्तयी एवं पंचतयी होती हैं अर्थात् इसमें पुष्पांग 4 – 5 के जोड़े होता है।
    प्रायः अपस्थानिक जड़ें तथा इनमें संवहन पूल प्राय 8-32 होती हैं।इसमें प्रायः मूसला जड़ें तथा इनमें संवहन पूल 2-6 होती हैं। 
    तने में संवहन पूल (vascular bundles) बिखरे हुए होते हैं।इसमें संवहन पूल घेरे में व्यवस्थित होती है तथा संवहन पूलों में कैम्बियम की पट्टी उपस्थित होती है।
    पत्तियों में शिराएँ एक-दूसरे के समानान्तर होती हैं।इसमें शिरा-विन्यास जालिकावत् शिराओं का जाल होता है।

    आवृतबीजियों का आर्थिक महत्त्व

    • हेविया ब्रेसिलिएन्सिस एवं फाइकस इलास्टिका से रबर प्राप्त होती है। कोको तथा चॉकलेट थियोब्रोया कोको के बीजों से प्राप्त होती है। इलायची इलेटेरिया कोडेमोमम का फल है।
    • (Economic Importance of Angiosperms) कोयर नामक रेशा नारियल के फल की मध्यफलभित्ति से प्राप्त होता है।
    • क्रिकेट बल्ले सैलिक्स एल्बा की लकड़ी से बनाये जाते हैं।
    • हॉकी के बल्ले, टेनिस व बैडमिन्टन के रैकेट तथा क्रिकेट स्टम्प मोरस एल्वात्र लकड़ी से बनाये जाते हैं।
    • केसर क्रोकस सटाइवस के पुष्पों की वर्तिकार तथा वर्तिका से प्राप्त होती है। च्युइंगम, एक्रेस सैपोटो के दूधिया क्षीर से प्राप्त होती है।

    अनावृतबीजी और आवृतबीजी पोधों में क्या अंतर है ?  

    आवृतबीजी और अनावृतबीजी के बीच मुख्य अंतर इनकी विविधता है। आवृतबीजी की विविधता अनावृतबीजी से अधिक है। उच्च विविधता क्षमता की वजह से ही आवृतबीजी पोधें स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र की एक विस्तृत विविधता के अनुकूल हैं। आवृतबीजी की एक अन्य विशेषता फूल और फलों का उत्पादन है।

    आवृतबीजीअनावृतबीजी
    आवृतबीजी पोधों में बीज फूलों के पौधों द्वारा निर्मित होता है और एक अंडाशय के भीतर संलग्न होता हैअनावृतबीजी पोधों में बीज नग्न (खुले) एवं इनमे अण्डाशय का अभाव होता है
    इन पौधों का जीवनचक्र मौसमी (seasonal) होता हैये पौधे सदाबहार होते हैं
    इनमे ट्रिपलोइड ऊतक (triploid tissue) होते हैइनमे हैप्लोइड उत्तक होते है 
    पत्तियाँ आकार में चपटी होती हैंपत्तियां सुई के आकार की होती हैं
    यह पोधे कठोर लकड़ी के साथ होते है यह पोधे नर्म होते है 
    इनका प्रजनन जानवरों पर निर्भर रहता हैइनका प्रजनन हवा पर निर्भर करता है
    इन पोधों की प्रजनन प्रणाली Reproductive system (उभयलिंगी unisexual or bisexual) फूलों में मौजूद होती है इन पोधों की प्रजनन प्रणाली Reproductive system शंकु (corn) में मौजूद होती है और उभयलिंगी प्रकार की होती हैं
  • जीव विज्ञान – एक परिचय

    जीव विज्ञान – एक परिचय

    Biology – An Introduction

    जीव विज्ञान, विज्ञान की वह शाखा है, जिसके अन्तर्गत सजीवों का विस्तृत अध्ययन किया जाता है। अरस्तू को जीव विज्ञान का जनक (Father of Biology) कहा जाता है किन्तु जीव विज्ञान (Biology) शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग लैमार्क एवं ट्रेविरेनस ने 1802 में किया था।

    सजीवों एवं निर्जीवों में समान प्रकार के रासायनिक तत्व होते है, परन्तु कोशिकीय संरचना (cellular structure), उपापचय (metabolism), पोषण (Nutrition), श्वसन (respiration), वृद्धि एवं विकास (growth and development), अनुकूलन (adaptation), प्रजनन (Reproduction), चेतना (Consciousness) एवं संवेदनशीलता (sensitivity) आदि लक्षण सजीवों में पाये जाते हैं, जबकि निर्जीवों में ये अनुपस्थित होते हैं।

    सजीवों के लक्षण (Characters of Living Beings)

    1. कोशिकीय संरचना (cellular structure) – जीव एक या अनेक कोशिकाओं का बना होता है। कोशिका शरीर की रचनात्मक और क्रियात्मक इकाई कहलाती है। यह जटिल संगठन निर्जीवों में नहीं पाया जाता है।

    2. उपापचय (metabolism) – यह जीवधारियों का एक महत्त्वपूर्ण लक्षण है। उपापचय किसी भी जीव की कोशिका में होने वाली रासायनिक क्रियाओं का योग है। यह क्रिया दो भागों में विभक्त की जा सकती है

    • उपचय (Nutrition) – यह रचनात्मक क्रिया है क्योंकि इसमें जीवद्रव्य (Protoplasm) का निर्माण होता है। यह शरीर की वृद्धि और विकास में सहायक है।

    • अपचय (Catabolism) – यह विध्वंसात्मक या नाशात्मक क्रिया है क्योंकि इस क्रिया के दौरान पोषक पदार्थ टूटता है और फलस्वरूप ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

    3. पोषण (respiration) – यह सभी जीवधारियों की विशेषता है क्योंकि शरीर की विभिन्न क्रियाओं को सुचारु रूप से कार्य के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह आवश्यक ऊर्जा जीवधारी भोजन के ऑक्सीकरण (भोजन से प्राप्त करते हैं।) से प्राप्त करते हैं। भोजन के ग्रहण करने से पाचन तक की प्रक्रिया को पोषण कहते हैं।

    4. वृद्धि और विकास (growth and development) – प्रत्येक जीवधारी के जीवन का प्रारम्भ एक कोशिका के रूप में होता है। इस प्रारम्भिक कोशिका के विभाजन और विभाजित कोशिकाओं के पुनर्विभाजन से असंख्य कोशिकाएँ बनती हैं, जिसके फलस्वरूप विभिन्न अंग फिर अंगतन्त्र बनते है, इसी को वृद्धि कहते है, जो प्रत्येक जीव का लक्षण है (हालांकि निर्जीवों में वृद्धि होती हैं; जैसे-पत्थर का बढ़ना या रेत के टिब्बे लेकिन यहाँ वृद्धि कोशिका रहित है और कारक पारिस्थितिक है।) यहाँ बाहा ऊर्जा कार्य करती है।

    5. श्वसन (adaptation) – सभी जीवों में श्वसन जीवन पर्यन्त चलने वाली क्रिया है। इसके अन्तर्गत जीव ऑक्सीजन ग्रहण करते है, जिसके द्वारा भोजन का ऑक्सीकरण होता है तथा CO2, H2O और ऊर्जा उत्पन्न होती है। जीवों में इस प्रकार ऊर्जा उत्पन्न करने वाला प्रक्रम श्वसन कहलाता है।

    C6H12O6 + 6O2 ——-> 6CO2 + 6H2O+ 673 किलो कैलोरी

    6. चेतना एवं संवदेनशीलता (Consciousness & (sensitivity) – यह सजीवों का एक महत्त्वपूर्ण लक्षण है। सभी जीवों में वातावरण में होने वाले परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता होती है और वह स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक परिवर्तन करने में सक्षम होते हैं; जैसे – गर्मी, सर्दी का अनुभव, काँटे के चुभने या अम्ल गिरने पर अंग को अलग हटाना, यह गुण उत्तेजनशीलता भी कहलाता है।

    7. अनुकूलन (adaptation) – जीवधारियों में बाह्य वातावरण के अनुसार शारीरिक रचना और स्वभाव को बदलने की क्षमता होती है; जैसे-मछली का जल में अनुकूलन, मेंढक का जल और थल दोनों में अनुकूलना

    8. प्रजनन या जनन (Reproduction) – यह जीवों का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण लक्षण है। प्रत्येक जीव अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए जनन करता है और अपने जैसी सन्तान उत्पन्न करता है, जिससे उसके वंश में वृद्धि होती है; जैसे-पौधे से बीज उत्पन्न होते है और बीज उगकर वैसे ही पौधे बनाते हैं। इसी प्रकार स्तनी बच्चों को जन्म देते है।

    9. जीवन – मृत्यु चक्र (Life & Death cycle) – प्रत्येक जीवधारी की एक निश्चित आयु होती है। एककोशिकीय जीव विभिन्न चरणों को पूर्ण करके मृत्यु को प्राप्त होता है। जीव विज्ञान की दो मुख्य शाखाएँ वनस्पति विज्ञान पादपों का अध्ययन) और प्राणि विज्ञान (जन्तुओं का अध्ययन) हैं।

    वनस्पति विज्ञान का जनक थियोफ्रेस्टस को कहा जाता है, जिन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक हिस्टोरिया प्लान्टेरम में 500 प्रकार के पौधों का वर्णन किया है।

    जन्तु विज्ञान का जनक अरस्तू को कहा जाता है, जिन्होंने अपनी पुस्तक हिस्टोरिया एनिमेलियम में 500 जन्तुओं की रचना, स्वभाव, वर्गीकरण जनन आदि का विस्तृत वर्णन किया है।

    जीव विज्ञान: अपवाद

    स्तनधारियों की परिपक्व लाल रुधिराणु (RBCs) ऊँट तथा लामास को छोड़कर, अकेन्द्रकी (enucleated) होती हैं। ऑस्ट्रिच, इमु तथा किवी पक्षी हैं, परन्तु उड़ नहीं सकते।

    सरीसर्पों (reptiles) में 3½ कोषीय हृदय होता है, लेकिन क्रोकोडाइल व एलीगेटर में 4 कोषीय हृदय होता है।
    पक्षियों में मूत्राशय नहीं होता परन्तु ऑस्ट्रिच में एक मूत्राशय पाया जाता है।

    डकबिल्ड प्लेटीपस तथा काँटेदार चींटी खोर अण्डे देने वाले स्तनधारी हैं।

    स्तनधारियों में सामान्यतया 7 ग्रीवा कशेरुकाएँ होती हैं, परन्तु सी काऊ में 8 कशेरुकाएँ होती हैं।

    कस्कटा (Cuscuta) एक द्विबीजपत्री पूर्ण स्तम्भ परजीवी है, परन्तु इसमें बीजपत्रों का अभाव होता हैं।
    कुल-लोरेन्थेसी के सदस्यों में छ: बीजपत्र पाये जाते हैं।

    कैलोफाइलम, कोरिम्बियम एवं इरिन्जियम के अतिरिक्त सभी द्विबीजपत्री पौधों की पत्तियों में जालिकारूपी (reticulate) शिरा विन्यास पाया जाता है।

    स्माइलेक्स, कोलोकेशिया, एलोकेशिया तथा डायोस्कोरिया के अतिरिक्त सभी एकबीजपत्री पौधों की पत्तियों में समानान्तर (parallel) शिरा विन्यास पाया जाता है।   कुछ एकबीजपत्री पौधों; जैसे-ड्रेसिना, यक्का, एगेव में असामान्य द्वितीयक वृद्धि (abnormal secondary growth) पायी जाती है।