Tag: biology

  • पौधों में परिसंचरण तंत्र की क्रियाविधि | पौधों में परिवहन (Transportation in Plants in Hindi)

    पौधों में परिसंचरण तंत्र की क्रियाविधि | पौधों में परिवहन (Transportation in Plants in Hindi)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे कि पौधों में परिसंचरण तंत्र की क्रियाविधि और पौधों में परिवहन (Transportation in Plants क्या है ? पादप और जल के बीच में क्या सम्बन्ध है ? पोधों में परिवहन की प्रक्रिया (Transportation in Plants) क्या है ? पौधों में जाइलम (Xylem) और फ्लोएम (Phloem) का क्या योगदान है ? पौधों में परिसंचरण की विधियां कोनसी है ? रसारोहण (Desertification) क्या है ? विसरण दाब न्यूनता (Diffusion Pressure Deficit — DPD) क्या है ? वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) क्या है ? वाष्पोत्सर्जन तथा बिन्दुस्रावण में क्या अन्तर है ? आदि

    पौधों में परिसंचरण या परिवहन (Transportation) क्या है ? What is Transportation in Plants

    पौधों में परिसंचरण या परिवहन (Transportation) का तात्पर्य जड़ द्वारा भूमि से अवशोषित जल एवं खनिज लवणों की पत्तियों तक पहुँचकर प्रकाश संश्लेषण हेतु विशिष्ट स्थिति उत्पन्न करना तथा पत्तियों में संश्लेषित कार्बनिक पदार्थ को अन्य अंगों तक पहुँचता है।

    सरल शब्दों में कहे तो परिवहन वह प्रक्रिया है जिसे जरिये पौधे अपने जीवन के लिए उसके सभी भागों में पानी और आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति करते है |

    पौधों में परिसंचरण या परिवहन (Transportation in Plants) एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। पेड़ अपनी जड़ों से पत्तियों की युक्तियों तक जीवित रहने के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्वों और पानी का परिवहन करते हैं। पौधों में परिवहन के मामले में, सबसे बड़ी बाधा पानी है क्योंकि यह विकास में एक सीमित कारक के रूप में समाप्त होता है। इस समस्या को दूर करने के लिए, पेड़ों और अन्य पौधों में पानी के अवशोषण (absorption) और स्थानान्तरण (translocation) की सही व्यवस्था होती है।

    पौधों में जाइलम (Xylem) और फ्लोएम (Phloem)

    पौधों में पानी और खनिजों का परिवहन दो प्रकार के संवाहक ऊतकों द्वारा किया जाता है:

    1. जाइलम

    2. फ्लाएम

    पौधों में जाइलम (Xylem) और फ्लोएम (Phloem) से युक्त नलिकाओं का एक विशाल नेटवर्क होता है। यह उस  संचार प्रणाली (Circulatory system) की तरह है जैसी प्रणाली से पूरे मानव शरीर में रक्त का संचार होता है । मनुष्यों में संचार प्रणाली के समान, जाइलम और फ्लोएम ऊतक (tissue) पूरे पौधे में फैले होते हैं। ये संवाहक ऊतक (conducting tissues ) जड़ों से उत्पन्न होते हैं और पेड़ों की टहनियाँ के माध्यम से ऊपर जाते हैं। बाद में वे शाखाओं में बंट जाते हैं और फिर मकड़ी के जाले की तरह हर पत्ते में ओर भी आगे बढ़ते हैं।

    जाइलम (Xylem)

    जाइलम एक लंबी, निर्जीव नली है जो जड़ों से पत्तियों तक तने के माध्यम से चलती है। पानी जड़ के बालों (root hair) द्वारा अवशोषित किया जाता है और जब तक यह जाइलम तक नहीं पहुंच जाता, तब तक परासरण द्वारा कोशिका से कोशिका की गति (cell movement) से गुजरता है। यह पानी तब जाइलम वाहिकाओं के माध्यम से पत्तियों तक पहुँचाया जाता है और वाष्पोत्सर्जन (transpiration) की प्रक्रिया द्वारा वाष्पित हो जाता है।

    जाइलम भी फ्लोएम जैसी लम्बी कोशिकाओं से बना होता है। हालांकि, जाइलम विशेष रूप से जड़ों से सभी पौधों के हिस्सों तक पानी पहुंचाने के लिए जिम्मेदार है। चूंकि वे इतना महत्वपूर्ण कार्य करते हैं, एक पेड़ में बहुत सारे जाइलम ऊतक होते है ।

    फ्लाएम (Phloem)

    फ्लोएम पोधों में पोषक तत्वों और शर्करा जैसे कार्बोहाइड्रेट के स्थानान्तरण के लिए जिम्मेदार होता है, जो पत्तियों द्वारा पौधे के उन क्षेत्रों में उत्पादित होता है जो चयापचय (metabolically) रूप से सक्रिय होते हैं। यह जीवित कोशिकाओं से बना होता है। इन कोशिकाओं की कोशिका भित्ति कोशिकाओं के सिरों पर छोटे-छोटे छिद्र बनाती है जिन्हें चालनी प्लेट (sieve plates) कहा जाता है।

    पौधों में परिवहन स्तर

    एक कोशिका से दूसरी कोशिका में पदार्थ का परिवहन (Transportation of substance from one cell to another)

    फ्लोएम और जाइलम के भीतर रस का लंबी दूरी तक परिवहन (Long-Distance transport of sap within phloem and xylem)

    अलग-अलग कोशिकाओं द्वारा विलेय और पानी का विमोचन और अवशोषण (The release and uptake of solute and water by individual cells)

    पौधों में परिसंचरण की विधियां

    विसरण (Diffusion)

    सभी पदार्थ (ठोस, द्रव एवं गैस) के अणु गतिज ऊर्जा (kinetic energy) के कारण अधिक सान्द्रता वाले स्थान से कम सान्द्रता वाले स्थान की और गति करते हैं यहीं गति विसरण कहलाती है।

    परासरण (Osmosis)

    यह विसरण की एक विशिष्ट प्रक्रिया है, जब दो भिन्न सान्द्रता वाले विलयनों को अर्द्धपारगम्य झिल्ली द्वारा पृथक किया जाता है, तो विलायक का कम सान्द्रता वाले विलयन से अधिक सान्द्रता वाले विलयन की ओर होने वाला विसरण परासरण कहलाता है।

    किसी विलयन का परासरण दाब वह दाब है, जो उस विलयन की अर्द्धपरागम्य झिल्ली द्वारा विलायक (अथवा कम सान्द्रता वाले विलयन) से पृथक करने पर अधिक सान्द्रता वाले विलयन में विलायक के परासरण के कारण उत्पन्न होता है।

    स्फीति दाब तथा भित्ति दाब (Turgor Pressure and Wall Pressure)

    जीवद्रव्य द्वारा कोशिका भित्ति पर डाला गया दाब ही स्फीति दाब कहलाता है। यह क्रिया अन्तः परासरण की स्थिति में होता है।

    स्फीति दाब के साथ-साथ ही इसके बराबर व विपरीत (Equal and Opposite ) एक दाब कोशिका भित्तियों द्वारा भी उत्पन्न होता है, जो भित्ति दाब कहलाता है।

    विसरण दाब न्यूनता (Diffusion Pressure Deficit — DPD)

    किसी शुद्ध विलायक (अर्थात् सर्वाधिक विसरण दाब युक्त) में पदार्थों को घोलने पर उसके विसरण दाब में आई कमी को विसरण दाब न्यूनता या चूषण दाब (Suction Pressure) कहते हैं। यह दाब न्यूनता परासरण दाब तथा स्फीति दाब के अन्तर के बराबर होती है। इसे ही जल विभव (water potential) कहा जाता है।

    जल का अवशोषण (Absorption of water) शैवालों में जल का अवशोषण सभी कोशिकाओं द्वारा, ब्रायोफाइटा में मूलाभासों (rhizoids) द्वारा तथा टेरिडोफाइटा, अनावृतबीजी व आवृतबीजी में जड़ों द्वारा होता है। जड़ में कोशिका परिपक्वन प्रदेश (Zone of Cell Maturation) में उपस्थित मूलरोमों के द्वारा पौधे जल का अवशोषण करते हैं।

    रसारोहण (Desertification) क्या है ?

    जड़ों द्वारा अवशोषित जल का गुरुत्वाकर्षण के विपरीत स्तम्भ, शाखाओं तथा पत्तियों तक पहुँचने की क्रिया रसारोहण कहलाती है। सर जे. सी. बोस ने रसारोहण का पल्सेशन वाद प्रस्तुत किया।

    डिक्सन तथा जोली द्वारा दिए गए वाष्पोत्सर्जनाकर्षण- जलीय संसंजक मत (Transpiration pull-cohesive force of water theory) के अनुसार, रसारोहण की क्रिया निम्नलिखित तथ्यों पर आधारित है।

    वाष्पोत्सर्जनाकर्षण (Transpiration Pull)

    पत्तियों की पर्णमध्योतक कोशिकाओं की भित्तियों से जल के वाष्पन के कारण इनकी परासरण सान्द्रता तथा विसरण दाब न्यूनता (DPD) अधिक हो जाती है, और परासरण द्वारा जल जाइलम वाहिकाओं (xylem vessels) से पर्ण मध्योतक कोशिकाओं में प्रवेश करता है। इससे जाइलम द्रव में उत्पन्न तनाव को वाष्पोत्सर्जनाकर्षण कहा जाता है।

    जल का संसंजक बल (Cohesive Force of Water)

    हाइड्रोजन बन्धों के कारण जल के अणुओं के बीच परस्पर आकर्षण को संसंजक बल कहते हैं। संसंजक बल के कारण मूल रोम से पत्तियों तक जल का एक अविरल स्तम्भ (continuous column) बना रहता है ।

    जल का आसंजक बल (Adhesive Force of Water)

    जल के अणु संकीर्ण जाइलम वाहिकाओं तथा वाहिनिकाओं से आसंजक बल द्वारा जुड़े रहते हैं।

    पौधों में परिसंचरण या परिवहन (Transportation in Plants) से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य

    सम परासारी विलयन वह विलयन, जिसका परासरण दाब कोशिका रस (cell sap) के परासरण दाब के बराबर होता है।

    अति परासारी विलयन वह विलयन, जिसका परासरणी दाब कोशिका रस के परासरण दाब की तुलना में अधिक होता है।

    अल्प परासारी विलयन वह विलयन, जिसका परासरण दाब कोशिका रस के परासरण दाब की तुलना में कम होता है। किसी पदार्थ के ठोस कणों द्वारा किसी द्रव को बिना विलयन बनाए अवशोषण करने को अन्त शोषण (imbibition) कहते हैं। जैसे कपास के रेशे, बीज, लकड़ी के बुरादे आदि ऐसे पदार्थ हैं, जो इसी प्रक्रिया से जल सोखते हैं, और फुलकर मोटे हो जाते हैं। पौधों में अधिक वाष्पोत्सर्जन के कारण पत्तियों के मुरझा जाने की प्रक्रिया म्लानि (wilting) कहलाती है।

    पौधों की पत्तियों के किनारों पर उपस्थित जल रन्ध्रों (hydathodes) से बूँदों के रूप में जल की हानि बिन्दुस्राव ( guttation) कहलाती है। यह मूल दाब के कारण होता है। वाष्पोत्सर्जन की दर की माप पोटोमीटर (potometer) से की जाती है। जलोद्भिद पौधों की पत्तियों में रन्ध्रों का अभाव होता है।

    वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) क्या है ?

    पौधों के वायवीय भागों से जल की वाष्प के रूप में हानि वाष्पोत्सर्जन (transpiration) कहलाती है।

    वाष्पोत्सर्जन तीन प्रकार का होता है

    1. रन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन – 80-90%

    2. उपत्वचीय वाष्पोत्सर्जन – 3-9%

    3. वातरन्ध्रीय वाष्पोत्सर्जन – 0.1%

    रन्ध्र की संरचना

    रन्ध्र एक छोटा-सा छिद्र है, जो चारों ओर से गुर्दे या सेम के बीज के आकार की बाह्य त्वचीय कोशिकाओं (epidermal cells) से घिरा होता है। इन कोशिकाओं को द्वार कोशिकाएँ या रक्षक कोशिकाएँ (guard cells) कहते हैं। द्वार कोशिकाएँ जीवित, हरितलवक युक्त तथा केन्द्रकयुक्त होती हैं। द्वार कोशिकाओं की अन्दर की भित्ति मोटी तथा बाहरी भित्ति पतली होती है।

    रक्षक कोशिकाओं के चारों ओर विभिन्न आकार के बाह्य त्वचीय कोशिकाएँ होती हैं, जिनको उपकोशिका या गौण कोशिका (subsidiary cells or accessory cells) कहते हैं।

    सक्रिय K+ स्थानान्तरण क्रियाविधि

    लेविट (1974) के अनुसार, प्रकाश की उपस्थिति में द्वार कोशिकाओं में मैलिक अम्ल उत्पन्न होता है, जो मैलेट व H+ में वियोजित हो जाता है और H+, K+ से बदल जाते हैं।

    H+ बाहर निकलते हैं और K+ अन्दर आ जाते हैं। K+ मैलेट से क्रिया करके पोटैशियम मैलेट का निर्माण करते हैं, जो कोशिका की रिक्तिका में स्थानान्तरित हो जाता है।

    पोटैशियम मैलेट की उपस्थिति में बाह्य त्वचा कोशिकाओं से द्वार कोशिकाओं में जल का परासरण होने से उनका स्फीति दाब बढ़ जाता है और रन्ध्र खुल जाते हैं।

    रन्ध्रों के खुलने तथा बन्द होने की क्रियाविधि

    रन्ध्र प्रायः दिन में खुलते हैं, और रात्रि में बन्द रहते हैं, परन्तु CAM में रन्ध्र दिन में बन्द रहते हैं और रात्रि में खुलते हैं। रन्ध्र का खुलना व बन्द होना द्वार कोशिकाओं की स्फीति (turgidity) तथा श्लथन (flaccidity) पर निर्भर करता है। स्फीति तथा श्लथ दशा के सम्बन्ध में दो प्रकार के मत दिए गए  

    स्टार्च-शर्करा परिवर्तन मत

    सेयरे (1926) के अनुसार, प्रकाश → प्रकाश संश्लेषण → पत्ती में CO2 की सान्द्रता में कमी → द्वार कोशिकाओं की pH का बढ़ना → एन्जाइम द्वारा स्टार्च का शर्करा में परिवर्तन → द्वार कोशिकाओं के परासरण दाब का बढ़ना → द्वार कोशिकाओं में जल का गमन → द्वार कोशिकाएँ स्फीति दशा में → रन्ध्रीय छिद्र का खुलना

    वाष्पोत्सर्जन का महत्त्व

    वाष्पोत्सर्जन मूल से शीर्ष तक जल, खनिज लवणों के परिवहन तथा तापक्रम सन्तुलन में उपयोगी है।

    करटिस (1926) ने वाष्पोत्सर्जन को आवश्यक दुर्गुण कहा।

    वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करने वाले कारक

    वाष्पोत्सर्जन की दर आपेक्षिक आर्द्रता व्युत्क्रमानुपाती होती है अर्थात् आर्द्रता के बढ़ने पर वाष्पोत्सर्जन की दर घटती है।

    वाष्पोत्सर्जन की दर वायु की गति के अनुक्रमानुपाती होती है। तापमान बढ़ने के साथ वाष्पोत्सर्जन की दर भी बढ़ जाती है।

    CO2 की कम सान्द्रता पर वाष्पोत्सर्जन अधिक व CO2 की अधिक सान्द्रता पर व वाष्पोत्सर्जन कम होता है।

    एब्सिसिक अम्ल, फिनाइल मरक्यूरिक एसीटेट, ऐस्पेरीन आदि वाष्पोत्सर्जन की दर को घटा देते हैं।

    वाष्पोत्सर्जन तथा बिन्दुस्रावण में अन्तर

    वाष्पोत्सर्जनबिन्दुस्रावण
    यह क्रिया दिन में होती है।यह क्रिया रात में होती है।
    पानी वाष्प बनकर उड़ता है।पानी द्रव के रूप में निकलता है।
    यह क्रिया रन्ध्रों द्वारा होती है।यह जल रन्ध्रों द्वारा होती है, जो शिराओं के अन्त में होते हैं।
    वाष्पोत्सर्जित जल शुद्ध होता है।जल शुद्ध नहीं होता है, अपितु इसमें खनिज तथा शर्करा आदि मिलते हैं।
    यह क्रिया रन्ध्रों से नियन्त्रित है।यह क्रिया अनियन्त्रित है।
    यदि सतह का तापमान घटा दिया जाए, तो वाष्पोत्सर्जन की क्रिया धीमी पड़ सकती है।इसमें ऐसा कोई सम्बन्ध नहीं है।
  • मानव पाचन तंत्र | Human Digestive System in Hindi – Detailed

    मानव पाचन तंत्र | Human Digestive System in Hindi – Detailed

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की मानव पाचन तंत्र (Human Digestive System) किस तरह से काम करता है, कोनसे अंग इस प्रक्रिया में महत्वपुर्ण भूमिका निभाते है, मुखगुहा (Buccal Cavity), आमाशय (Stomach), छोटी आंत (Small Intestine), बड़ी आंत (Large Intestine) द्वारा कैसे पाचन की क्रिया पूर्ण होती है, साथ ही जानेगे की पचे हुए भोजन का अवशोषण एवं स्वांगीकरण (Absorption and Assimilation of Digestive Food) कैसे होता है, अपचित भोजन का बहिष्करण (Egestion of Indigested Food) कैसे होता है, पाचन से सम्बन्धित ग्रन्थियाँ (Glands Related to Digestion) कोन कोंनसी है, यकृत के कार्य (Function of Liver) क्या है?, अग्नाशय (Pancreas) क्या है? और पाचन से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य कोनसे है आदि |

    बहुकोशिकीय जीवधारियों में शरीर की कोशिकाएँ अलग-अलग कार्य करने के लिए विशिष्टीकृत हो जाती हैं। इस विशिष्टीकरण के कारण इनकी रचना भी अपने-अपने कार्यों के अनुरूप भिन्न-भिन्न हो जाती हैं। इस प्रकार बहुकोशिकीय जीवधारियों के शरीर में विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं के समूह बन जाते हैं, जिसे ऊतक कहा जाता है। कई ऊतकों के समूह अंग एवं कई अंग मिलकर अंग तन्त्र बनाते हैं, जैसे—मुख, आमाशय, यकृत आदि अंग मिलकर पाचन हेतु पाचन तन्त्र बनाते हैं।

    मानव पाचन तंत्र क्रिया (process of Human Digestive System)

    वे जटिल भौतिक एवं रासायनिक प्रक्रियाएँ, जिनके द्वारा जटिल एवं अघुलनशील भोज्य कणों को सरल, घुलनशील एवं अवशोषण योग्य भोज्य कणों में परिवर्तित किया जाता है, पाचन कहलाता है। मानव पाचन तंत्र (Human Digestive System) यानी भोजन के पाचन की क्रिया पाँच चरणों में; जैसे- अन्तर्ग्रहण, पाचन, अवशोषण, स्वांगीकरण तथा मल त्याग में पूर्ण होती है।

    मनुष्य के पाचन तन्त्र में एक आहारनाल और सहयोगी ग्रन्थियाँ होती हैं। आहारनाल मुख, मुखगुहा, ग्रसनी, प्रसिका, आमाशय, क्षुद्रान्त्र (छोटी आंत), वृहदान्त्र (बड़ी आंत), मलाशय और मल द्वार से बनी होती है। सहायक पाचन ग्रन्थियों में लार अन्थि, यकृत और अग्न्याशय हैं।

    मुखगुहा में पाचन (Digestion in Buccal Cavity)

    मुख के अन्दर दाँत भोजन को चबाते हैं। जीभ स्वाद को पहचानती है और भोजन को लार के साथ मिलाकर इसे अच्छी तरह से चबाने के लिए सुगम बनाती है। लार में उपस्थित टायलिन या एमाइलेज एन्जाइम स्टार्च पर कार्य करता है और स्टार्च को माल्टोज शर्करा में अपघटित कर देता है तथा माल्टेज एन्जाइम माल्टोज शर्करा को ग्लूकोज में बदल देता है।

    मनुष्य के ऊपरी व निचले जबड़ों में कुल 32 दाँत होते हैं। मनुष्य के दाँत गर्तदन्ती (thecodont), द्विवारदन्ती (diphyodont ) तथा विषमदन्ती (heterodont) तीन प्रकार के होते हैं। मनुष्य के जबड़े में दो कृन्तक, एक रदनक, दो अग्रचवर्णक तथा तीन चवर्णक दाँत पाये जाते हैं।

    मनुष्य दन्तसूत्र

    जीभ

    जीभ मुखगुहा के निचले भाग पर स्थित एक मोटी मांसल रचना होती है, जिसकी ऊपरी सतह पर कई छोटे-छोटे अंकुर (papillae) होते हैं, जिन्हें स्वाद कलियाँ ( taste buds) कहते हैं। जीभ के अग्रभाग से मीठे स्वाद का पश्च भाग से कड़वे स्वाद का तथा बगल के भाग से खट्टे स्वाद का आभास होता है। टायलिन एन्जाइम के कारण भोजन के स्वाद में मिठास आ जाती है।

    आमाशय में पाचन (Digestion in Stomach)

    मुखगुहा से लार से सना हुआ भोजन निगल द्वार के द्वारा ग्रासनली (Oesophagus) में पहुँचता है, जहाँ से क्रमाकुंचन की प्रक्रिया द्वारा ग्रासनली से आमाशय में भोजन परन्तु पहुँचता है। आमाशय में प्रोटीन एवं वसा का पाचन प्रारम्भ हो जाता है, कार्बोहाइड्रेट का पाचन नहीं होता है।

    आमाशय में पाइलोरिक ग्रन्थियों से जठर रस (gastric juice) निकलता है, जबकि ऑक्सिन्टिक या भित्तिय कोशिकाओं से HCI निकलता है। जठर रस में पेप्सिन और रेनिन एन्जाइम होते है, जिसमें से पेप्सिन प्रोटीन को पाचन कर उसे पेप्टोन्स में बदल देती है, जबकि रेनिन दूध में घुली हुई प्रोटीन केसीन को ठोस प्रोटीन कैल्शियम पैराकेसीनेट में परिवर्तित कर देती हैं। इस प्रकार दूध फट जाता है। अब पेप्सिन इस प्रोटीन (केसीन) को पेप्टोन्स में परिवर्तित कर देती है। आमाशय में वसा पाचक एन्जाइम जठर लाइपेज वसीय पदार्थों पर क्रिया कर उसे छोटे-छोटे अणुओं में तोड़ देता है।

    आमाशय में स्रावित HCI मुख्य रूप से भोजन के माध्यम को अम्लीय बनाता है, जिससे लार के टाइलिन की क्रिया समाप्त हो जाती है। यह अम्ल भोजन के साथ आए जीवाणुओं को नष्ट कर देता है तथा एन्जाइम की क्रिया को तीव्र कर देता है।

    छोटी आंत में पाचन (Digestion in Small Intestine)

    छोटी आंत में पित्त, अग्न्याशयी रस तथा आंत रस आकर मिलते हैं तथा भोजन का पाचन पूर्ण करते हैं। पित्त एवं अग्न्याशयी रस आंत के pH को क्षारीय करते हैं। इसमें तीन एन्जाइम होते हैं, जिसमें ट्रिप्सिन, प्रोटीन को पॉलीपेप्टाइड एवं अमीनो अम्ल में, एमाइलेज स्टार्च को सरल शर्करा में, जबकि लाइपेज वसीय पदार्थों को ग्लिसरॉल एवं वसीय अम्ल (fatty acid) में तोड़ देता है। छोटी आंत आहारनाल का सबसे लम्बा भाग होता है। आहारनाल के इसी भाग में पाचन की क्रिया पूर्ण होती है।

    बड़ी आंत में पाचन (Digestion in Large Intestine)

    बड़ी आंत में उपस्थित चूषक कोशिकाएँ (goblet cells) श्लेष्मा का स्रावण करती हैं। यहाँ पर अपचे भोजन से जल का अवशोषण होता है फलतः मल गाढ़ा हो जाता है। शाकाहारी जन्तुओं के भोजन में उपस्थित सेलुलोज का पाचन यहीं पर होता है, जहाँ विद्यमान सहजीवी जीवाणु (symbiotic bacteria) इस सेलुलोज को शर्करा में बदल देती है।

    पचे हुए भोजन का अवशोषण एवं स्वांगीकरण (Absorption and Assimilation of Digestive Food)

    छोटी आंत में ही पचे भोजन का अवशोषण मुख्य रूप से होता है। छोटी आंत की सतह पर अंगुलीनुमा उभार पाए जाते हैं, जिन्हें आंत रसाकुंरों (intestinal villi) कहते हैं। इन्हीं रसांकुरों पर रुधिर केशिकाएँ और लिम्फ वाहिनियाँ का जाल बिछा होता है, जो पचे भोजन के अवशोषण में सहायक होती हैं। रुधिर केशिकाओं से ग्लूकोज तथा अमीनो अम्ल का अवशोषण, जबकि वसा अम्ल एवं ग्लिसरोल का अवशोषण लसीका (lymph) द्वारा हो जाता है।

    अपचित भोजन का बहिष्करण (Egestion of Indigested Food)

    बड़ी आंत में जल का अवशोषण होने के बाद शेष बचा अपच भोजन मलाशय के माध्यम से मलद्वार द्वारा बाहर निकल जाता है। अंतत: इसी प्रक्रिया के साथ पाचन की क्रिया समाप्त होती है।

    पाचन से सम्बन्धित ग्रन्थियाँ (Glands Related to Digestion)

    लार ग्रन्थि (salivary glands) तीन जोड़ी (i) अधोजिह्वा ग्रन्थि (sublingual glands) जिह्वा के दोनों ओर, एक-एक (ii) अधोजम्भ ग्रन्थि (sub-maxillary gland) निचले जबड़े के मध्य एक-एक (iii) कर्ण पूर्व ग्रन्थि (parotid gland) कर्णों के नीचे दोनों ओर एक-एक । लार में लगभग 99% जल, लगभग 1% एन्जाइम होते हैं। इसमें टायलिन एवं लाइसोजाइम नामक एन्जाइम होता है। लार कुछ तत्व; जैसे-लैड (शीशा) Pb, मर्करी (Hg) व आयोडाइड (I2) का स्रावण करती हैं।

    यकृत (liver) सबसे बड़ी ग्रन्थि है। मनुष्य में इसका भार लगभग 1.5 किलोग्राम होता है।

    यकृत के शिरापात्रों (sinusoids) में कुप्फर कोशिकाएँ पाई जाती हैं, जो मृत RBCs व जीवाणुओं का भक्षण करती हैं।

    यकृत के कार्य (Function of Liver)


    यकृत पित्त का स्रावण करता है, जो पित्ताशय (gall-bladder) में संचित होता है संग्रह करता है। तथा ग्लाइकोजन हिपेरिन, फाइब्रिनोजन तथा प्रोथ्रॉम्बिन का स्रावण करता है।

    यकृत प्रोटीन उपापचय में भाग लेता है, जिसके फलस्वरूप अमोनिया, यूरिया आदि उत्पन्न होते हैं। यकृत अमोनिया को यूरिया में बदल देता है।

    यूरिया का संश्लेषण करता है तथा विटामिन A, D तथा B12 का निर्माण करता है।

    अमीनो अम्लों का डीऐमीनेशन तथा विषैले पदार्थों का विषहरण (detoxification) करता है।

    फैगोसाइटोसिस क्रिया द्वारा जीवाणुओं का भक्षण करता है। भ्रूणावस्था में लाल रुधिराणुओं का निर्माण करता है।

    अग्नाशय (Pancreas)

    यह शरीर की दूसरी बड़ी मिश्रित प्रन्थि (mixed gland) है। इसके अन्तःस्रावी भाग में निम्न प्रकार की कोशिकाएं होती है।

    एल्फा कोशिकाएँ (α-cells), जो ग्लूकेगॉन हॉर्मोन स्रावित करती हैं।

    बीटा कोशिकाएँ (β-cells), जो इन्सुलिन हॉमोन स्रावित करती हैं। इन्सुलिन रुधिर में शर्करा की मात्रा को नियन्त्रित करने का काम करता है। इन्सुलिन के अल्प स्रावण से मधुमेह (diabetes) नामक रोग हो जाता है।

    डेल्टा कोशिकाएँ (δ-cells), जो सोमेटोस्टेटिन हॉर्मोन स्रावित करती हैं।

    • अग्न्याशय का बाह्य या एक्सोक्राइन भाग जिसे एसीनी कोशिकाएँ कहते हैं अग्न्याशयी रस का स्त्रावण करता है, जो भोजन के पाचन में सहायक है।

    मानव पाचन तंत्र (Human Digestive System) की क्रिया सचित्र

    मानव पाचन तंत्र (Human Digestive System) से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य

    लार में उपस्थित टायलिन एन्जाइम का स्रावण पेरोटिड ग्रन्थियाँ द्वारा होता है ।

    लार में उपस्थित छोटी आंत में बुनर्स ग्रन्थियों द्वारा आंत्र रस निकलता है ।

    बड़ी आंत में उपस्थित सैलोबायोपैरस एवं क्लॉस्ट्रिडियम जीवाणु तथा एन्टोडोनियम नामक प्रोटोजोआ सीकम में सेलुलोज के पाचन में सहायता करते हैं ।

    मनुष्य की दाँत का प्रमुख भाग डेन्टीन का बना होता है ।

    पाइलोरिक वाल्व आमाशय एवं ग्रहणी के बीच पाए जाते हैं ।

    बाइलीरुबिन एवं बिलीवर्डिन वर्णक पित्त रस में पाए जाते है ।

    लाइसोजाइम एक प्रति जीवाणु एन्जाइम है, जो भक्षक कोशिकाओं, आँसुओं, लार एवं स्वेद स्रावों में पाया जाता है ।

    मानव पाचन तंत्र का नामांकित चित्र

  • तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue) क्या है ?

    तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue) क्या है ?

    बहुकोशिकीय जन्तुओं में पाये जाने वाले ऊतकों की चार प्रमुख श्रेणियाँ होती हैं:

    1. उपकला या एपीथीलियमी ऊतक (Epithelial tissues)
    2. संयोजी ऊतक (Connective Tissue)
    3. पेशीय ऊतक (Muscular Tissue)
    4. तंत्रिकीय ऊतक (Nervous Tissue)

    इस आर्टिकल में हम बात करेगे तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue) के बाते में |

    तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue)

    तंत्रिका ऊतक मस्तिष्क (brain), रीढ़ की हड्डी (spinal cord) और तंत्रिकाओं (nerves) में पाए जाते हैं। यह शरीर की कई गतिविधियों के समन्वय और नियंत्रण के लिए जिम्मेदार है। यह मांसपेशियों के संकुचन को उत्तेजित करता है, पर्यावरण के बारे में जागरूकता पैदा करता है, और भावनाओं, स्मृति और तर्क में एक प्रमुख भूमिका निभाता है। इन सभी चीजों को करने के लिए, तंत्रिका ऊतक में कोशिकाओं को विद्युत तंत्रिका आवेगों (electrical nerve impulses) के माध्यम से एक दूसरे के साथ संवाद करने में सक्षम होती है ।

    तन्त्रिका ऊतक संवेदना को शरीर के एक भाग से दूसरे भाग में भेजने का कार्य करता है। इसका निर्माण एक्टोडर्म से होता है। यह ऊतक तन्त्रिका ऊतक या न्यूरॉन का बना होता है। लम्बे तन्त्रिका तन्तु जिसे एक्सॉन भी कहते हैं एक न्यूरॉन के एक्सॉन की अन्तिम छोर की शाखाएँ दूसरे न्यूरॉन के डेन्ड्राइट्स से जुड़कर सिनैप्स बनाती है। आवेग का संचार एक्सॉन की एक कोशिका से दूसरी कोशिका के डेन्ड्राइट्स तक होने से होता है।

    न्यूरॉन्स और तंत्रिका उत्तक

    तंत्रिका ऊतक में कोशिकाएँ जो आवेग (impulses) उत्पन्न करती हैं और संचालित करती हैं, न्यूरॉन्स या तंत्रिका कोशिकाएँ (neurons or nerve cells) कहलाती हैं। न्यूरॉन में एक बड़ी कोशिका काय (cell body), साइटोन, पैरोकैरिऑन पाई जाती हैं। इससे डेन्ड्राइट (dendrites ) और एक्सॉन (Axon) निकलता है। कोशिका काय ((Cell body) में एक केन्द्रक होता है तथा निसल के कण (Nissl’s granules) उपस्थित होते हैं। एक्सॉन की कोशिका कला को एक्सोलेमा तथा कोशिकाद्रव्य को एक्सोप्लाज्म कहते हैं। एक्सॉन दूरस्थ छोर पर छोटी-छोटी शाखाओं में विभाजित हो जाता है, जिन्हें टीलोडेण्ड्रिया कहते हैं।

    नोट:

    कोशिका का मुख्य भाग, वह भाग जो सामान्य कार्य करता है, कोशिका काय (the cell body) होता है।

    डेंड्राइट कोशिका द्रव्य (cytoplasm) के विस्तार, या प्रक्रियाएं हैं, जो कोशिका शरीर में आवेगों (impulses) को ले जाती हैं।

    एक एक्सॉन कोशिका काय (the cell body) से आवेगों (impulses) को दूर करता है।

    तंत्रिका ऊतक में कोशिकाएं भी शामिल होती हैं जो आवेगों को संचारित नहीं करती हैं, बल्कि न्यूरॉन्स (neurons) की गतिविधियों का समर्थन करती हैं। ये ग्लियल कोशिकाएं (Glial cells) (न्यूरोग्लिअल कोशिकाएं) (neuroglial cells) हैं, जिन्हें एक साथ न्यूरोग्लिया (neuroglia) कहा जाता है। सहायक, या ग्लिया, कोशिकाएं न्यूरॉन्स को एक साथ बांधती हैं और न्यूरॉन्स को इन्सुलेट (insulate) करती हैं। इन कोशिकाओं में कुछ फागोसाइटिक (phagocytic) होते हैं और बैक्टीरिया के आक्रमण से बचाते हैं, जबकि अन्य रक्त वाहिकाओं को न्यूरॉन्स से बांधकर पोषक तत्व प्रदान करते हैं।

  • रुधिर (Blood) क्या है, Rudhir अर्थ, परिभाषा, कार्य, रुधिर कोशिकाएँ, प्लाज्मा, हीमोग्लोबिन, स्कन्दन या थक्का, लसिका, Rh-समूह, Blood Group – in Hindi

    रुधिर (Blood) क्या है, Rudhir अर्थ, परिभाषा, कार्य, रुधिर कोशिकाएँ, प्लाज्मा, हीमोग्लोबिन, स्कन्दन या थक्का, लसिका, Rh-समूह, Blood Group – in Hindi

    इस आर्टिकल में हम रुधिर (Blood) जिसे खून या ब्लड भी कहा जाता है के बारे में बतायेगे | इस आर्टिकल में हम जानेगे कि रुधिर क्या होता है ? रुधिर का शरीर के लिए क्या महत्त्व है ? रुधिर के कार्य क्या है ? रुधिर के प्रमुख घटक कोनसे है ? रुधिर कोशिकाय क्या है ? लाल रुधिर कोशिकाएँ,  श्वेत रुधिर कोशिकाएँ, विंबाणु, या प्लेटलेट् क्या होते है ? प्लाज्मा (Plasma) क्या होता है ? हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) क्या होता है ? खून का स्कन्दनयाथक्का कैसे जमता है ? Rh-समूह और रुधिर समूह (Blood Group) क्या होते है ? लसिका क्या है ? आदि |

    रुधिर क्या होता है ? (What is Blood)

    रुधिर एक लाल, वाहक संयोजी ऊतक (vascular connective tissue) है, जो एक चिपचिपा अपारदर्शी द्रव है। इसकी श्यानता (viscosity) 4.7 तथा क्षारीय प्रकृति (pH 7.54) होती है। ऑक्सीकृत रुधिर चमकीले लाल रंग का होता है, जबकि अनॉक्सीकृत रुधिर गुलाबी नीले रंग का होता है। रूधिर में प्लाज्मा एवं रुधिर कोशिकाएँ होती है |

    यह सम्पूर्ण शरीर का लगभग 6-10% भाग बनाता है। एक वयस्क मनुष्य में लगभग 5.8 लीटर रुधिर पाया जाता है। ऊँचे स्थानों पर रहने वाले लोगों में नीचे स्थानों पर रहने वाले लोगों की तुलना में अधिक रुधिर पाया जाता है। रुधिर दो भागों यथा प्लाज्मा और रुधिर कणिकाओं का बना होता है।

    उच्च अकशेरुकी , कशेरुकी एवं मानव में पोषक पदार्थो , गैसों , हार्मोन , अपशिष्ट पदार्थों एवं अन्य उत्पादों के परिवहन के लिए रुधिर पाया जाता है जिसे एक पेशीय ह्रदय द्वारा पम्प किया जाता है , इस सम्पूर्ण तंत्र को परिसंचरण तन्त्र कहते है , परिसंचरण तंत्र के निम्न भाग होते है –

    (i) रुधिर (ii) ह्रदय (iii) रुधिर वाहिकाएँ (iv) रुधिर (blood)

    रुधिर के दो भाग है : (1) द्रव भाग, जिसे प्लाज़्मा कहते हैं और (2) ठोस भाग, जो कोशिकाओं का बना होता है। रुधिर कोशिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं : (1) लाल रुधिर कोशिकाएँ (2) श्वेत रुधिर कोशिकाएँ और (3) विंबाणु, या प्लेटलेट्। प्लाज़्मा में 91 से 92 प्रति शत जल और शेष में (क) सोडियम, पोटैशियम और कैल्सियम, (ख) वसा, (ग) शर्करा, (घ) प्रोटीन आदि होते हैं।

    प्लाज्मा (Plasma)

    प्लाज्मा पीले रंग का निर्जीव द्रव है, जो हल्का क्षारीय होता है। यह रुधिर के सम्पूर्ण आयतन का लगभग 55-60% भाग होता है।

    प्लाज्मा के संघटक

    जल – 90-62%

    अकार्बनिक लवण – 1-2%

    प्लाज्मा प्रोटीन – 6-7%

    अन्य अकार्बनिक यौगिक –   1-2%

    अवयवमात्राप्रमुख कार्य
    1.       जल90%रुधिर दाब व आयतन बनाए रखना
    2.       कार्बनिक पदार्थ  
    (a)     एल्बुमिन45%परासरण दाब उत्पन्न करना
    (b)     ग्लोबुलिन2.5%परिवहन व प्रतिरक्षी उत्पन्न करना
    (c)     फाइब्रिनोजन0.3%रुधिर स्कंदन
    (d)     प्रोयोम्बिनरुधिर स्कंदन
    (e)     ग्लूकोज0.1%पोषक पदार्थ , कोशिकीय इंधन
    (f)      एमीनो अम्ल0.4%पोषक पदार्थ
    (g)     वसा अम्ल0.5%पोषक पदार्थ
    (h)     हार्मोन एंजाइमनियामक पदार्थ
    (i)       यूरिया , यूरिक अम्ल0.4%अपशिष्ट पदार्थ
    (j)       अकार्बनिक पदार्थ0.9%विलेय विभव एवं pH का नियमन करना

    प्लाज्मा के कार्य (Function of Plasma)

    सरल भोज्य पदार्थों (ग्लूकोज, अमीनो अम्ल आदि) का आँत्र एवं यकृत से शरीर के अन्य भागों से में परिवहन करता है।

    यह उपापचयी वर्ज्य पदार्थों; जैसे- यूरिया, यूरिक अम्ल आदि का ऊतकों से वृक्कों (kidney) तक उत्सर्जन हेतु परिवहन करता है।

    यह अन्तःस्रावी ग्रन्थि से लक्ष्य अंगों तक हॉर्मोनों का परिवहन करता है।

    यह रुधिर का pH स्थिर रखने में सहायक होता है।

    प्लाज्मा में उपस्थित रुधिर प्रोटीन एवं फाइब्रिनोजन रुधिर का थक्का जमाने में सहायक होते हैं ।

    रुधिर कणिकाए (Blood Corpuscles or Blood Cells)

    ये कोशिकाएँ प्लाज्मा में पाई जाती हैं, जो रुधिर प्लाज्मा का 40-45% भाग होती है। रुधिर कणिकाओं का प्रतिशत हीमेटोक्रिट मूल्य (Haematocrit Value) या पैक्ड सैल वॉल्यूम) (Packed Cell Volume) कहलाता है। इसमें तीन कणिकाएँ – लाल रुधिर कणिकाएँ, श्वेत रुधिर कणिकाएँ तथा रुधिर प्लेटलेट्स होती हैं।

    लाल रुधिर कणिकाएँ (Red Blood Corpuscles-RBCs)

    ये स्तनधारियों के अतिरिक्त सभी कशेरुकियों में अण्डाकार, द्विउत्तल एवं केन्द्रकीय होती हैं। स्तनियों में (ऊँट एवं लामास को छोड़कर) RBCs गोलाकार, द्विअवतल और केन्द्रक विहीन होती हैं। लाल रुधिर कोशिकाएँ लाल रंग की होती हैं। हीमोग्लोबिन के कारण इनका रंग लाल होता है। ये 7.2 म्यू व्यास की गोल परिधि की और दोनों ओर से पैसे या रुपए के समान चिपटी होती हैं। इनमें केंद्रक नहीं होता। वयस्क पुरुषों के रुधिर के प्रति घन मिलीमीटर में लगभग 50 लाख और स्त्रियों के रुधिर के प्रति घन मिलिमीटर में 45 लाख लाल रुधिर कोशिकाएँ होती हैं। इनकी कमी से रक्तक्षीणता तथा रक्त श्वेताणुमयता (Leukaemia) रोग होते हैं। इन्हें इरिथ्रोसाइट्स भी कहते है |

    RBCs की अतिरिक्त मात्रा प्लीहा (spleen) में संग्रहित होती है, जो रुधिर बैंक (Blood Bank) की भाँति कार्य करती है। गर्भस्थ शिशु में RBCs का निर्माण यकृत एवं प्लीहा में, जबकि शिशु के जन्म के उपरान्त इसका निर्माण मुख्यतया अस्थि मज्जा (bone-marrow) में होता है। मनुष्य का RBCs का औसत जीवनकाल 120 दिन का, जबकि मेंढक एवं खरगोश के RBCs का औसत जीवनकाल क्रमशः 100 तथा 50-70 दिन होता है।

    लाल रुधिर कोशिका का विकास

    आधुनिक मत के अनुसार लाल रुधिर कोशिकाओं का निर्माण रक्त परिसंचरण तंत्र के बाहर होता है।सबसे पहले बनी कोशिका हीमोसाइटोब्लास्ट (Haemoctoblast) कहलाती है। पीछे यह कोशिका लाल रुधिर कोशिका में बदल जाती है। भ्रूण में लाल रुधिर कोशिका रुधिर परिसंचरण क्षेत्र में बनती है। पहले इसके मध्य में केंद्रक होता है, जो पीछे विलीन हो जाता है। शिशुओं के मध्यभ्रूण जीवन से लेकर जन्म के एक मास पूर्व तक लाल रुधिर कोशिकाओं का निर्माण यकृत एवं प्लीहा में होता है। शिशु जन्म के बाद लाल रुधिर कोशिकाएँ अस्थिमज्जा में बनती हैं।

    हीमोग्लोबिन (Haemoglobin)

    RBCs में एक लाल प्रोटीन रंजक हीमोग्लोबिन पाया जाता है, जो एक प्रोटीन ग्लोबिन (96%) तथा रंजक हीम  (4-5%) से बना होता है। हीम अणु के केन्द्र में ‘लौह’ होता है। हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन के परिवहन का कार्य करता है । RBCs का रंग वैसे तो पीला होता है, परन्तु हीमोग्लोबिन के कारण लाल दिखाई देता है।

    हीमोग्लोबिन ही ऑक्सीजन का अवशोषण करता है और इसको रक्त द्वारा सारे शरीर में पहुँचता है। रुधिर में हीमोग्लोबिन की मात्रा 14.5 ग्राम प्रतिशत है। अनेक रोगों में इसकी मात्रा कम हो जाती है। हीम (Haem) का सूत्र (C34 H30 N4 O4 FcOH) है। इसमें लोहा रहता है। इसमें चार पिरोल समूह रहते हैं, जो क्लोरोफिल से समानता रखते हैं। इसका अपचयन और उपचयन सरलता से हो जाता है। अल्प मात्रा में यह सब प्राणियों और पादपों में पाया जाता है। हीमोग्लोबिन क्रिस्टलीय रूप से सरलता से प्राप्त हो सकता है।

    रुधिर परीक्षा के लिए वयस्क व्यक्ति की अंगुली से या शिरा से रुधिर निकाला जाता है। रुधिर को जमने से बचाने के लिए स्कंदन प्रतिरोधी पदार्थ डालते हैं। इसके लिए प्राय: अमोनियम और पोटैशियम ऑक्सेलेट प्रयुक्त किए जाते हैं।

    डबल ऑक्सेलेटेड रुधिर को लेकर, अपकेंद्रित में रखकर, आधे घंटे तक घुमाते हैं। रुधिर का कोशिकायुक्त अंश तल में बैठ जाता है और तरल अंश ऊपर रहता है। यही तरल अंश प्लैज़्मा है।

    RBCs की संख्या का निर्धारण हीमोसाइटोमीटर द्वारा किया जाता है। इसकी संख्या WBCs (White Blood Corpuscles) से अधिक होती है।

    हेमरेज (Haemorrhage) एवं होमोलाइसिस (Haemolysis) से RBCs की संख्या घट जाती है, जिसे एनिमिया (Anaemia) कहा जाता है। RBCs की संख्या में सामान्य स्तर से अधिक वृद्धि पॉलीसाइमिया (polycythemia) कहलाती है।

    श्वेत रुधिर कणिकाएँ (White Blood Corpuscles-WBCs)

    इन्हें ल्यूकोसाइट्स भी कहते है | ये आकार में गोल अथवा अमीबाकार, केन्द्रकयुक्त तथा वर्णकविहीन कणिकाएँ होती हैं। WBCs का आकार RBCs से बड़ा, जबकि संख्या में RBCs से कम होती है। ल्यूकीमिया (रुधिर कैंसर) में WBCs की संख्या बढ़ जाती है। इनका निर्माण श्वेत अस्थि मज्जा में होता है , इनमें हिमोग्लोबिन का अभाव होता है परन्तु केन्द्रक उपस्थित होता है , इनकी संख्या 6000 -8000 प्रतिघन मि.मी होती है | WBC की औसत आयु 45 दिन की होती है | ये लाल रुधिर कोशिकाओं से पूर्णतया भिन्न होती हैं। कुछ श्वेत रुधिर कोशिकाओं में कणिकाएँ होती हैं।

    श्वेत रुधिर कोशिकाओं में जीवाणुओं के भक्षण करने की शक्ति होती है। संक्रामक रोगों के हो जाने पर इनकी संख्या बढ़ जाती है, पर मियादी बुखार, या तपेदिक हो जाने पर इनकी संख्या घट जाती है। श्वेत रुधिर कोशिकाएँ दो प्रकार की होती हैं, एक में कणिकाएँ नहीं होतीं और दूसरी में कणिकाएँ होती हैं। पहले प्रकार को एग्रैन्यूलोसाइट्स (Agranulocytes) और दूसरे प्रकार को ग्रैन्यूलोसाइट्स (Granulocytes) कहते हैं।

    एग्रैन्यूलोसाइट्स कोशिकाएँ दो प्रकार की होती हैं : (1) लसीकाणु (Lymphocyte) कोशिका और (2) मोनोसाइट (Monocyte) कोशिका। लसीका कोशिकाएँ लघु और विशाल दो प्रकार की होती है। मोनोसाइट कुल श्वेत रुधिर कोशिकाओं की 5 से 10 प्रतिशत तक होती हैं।

    ग्रैन्यूलोसाइट कोशिकाएँ तीन प्रकार की होती हैं : (1) न्यूट्रोफिल्स (Neutrophiles, 60 से 70 प्रतिशत), (2) ईओसिनोफिल्स (Eosinophilesm, 1 से 4 प्रतिशत) और (3) बेसोफ़िल्स (Basophiles 0.5 से 1 प्रतिशत)।

    ग्रेन्यूलोसाइट्स (Granulocytes)

    ये कोशिकाएँ लाल अस्थि मज्जा में बनती हैं।

    ये कुल ल्यूकोसाइट्स की लगभग 65% होती हैं।

    ये केन्द्रक के आकार एवं उनके कणों की अभिरंजक क्रियाओं के आधार पर पुनः निम्न प्रकार विभाजित की जा सकती हैं :

    न्यूट्रोफिल्स (Neutrophils)

    ये WBCs की कुल संख्या का लगभग 62% होती है।

    इनके कोशिकाद्रव्य में महीन कण पाए जाते हैं, जो अम्लीय एवं क्षारीय अभिरंजकों द्वारा अभिरंजित होते हैं तथा बैंगनी रंग के दिखाई देते हैं।

    ये शरीर के रक्षक की भाँति कार्य करती हैं

    न्यूट्रोफिल्स शरीर की रक्षा, एसिडोफिल्स घावों को भरने, बेसोफिल्स रुधिर का थक्का जमाने, लिम्फोसाइट प्रतिरक्षियों का संश्लेषण तथा मोनोसाइट जीवाणुओं का भक्षण का कार्य करती है।

    बेसोफिल्स (Basophils)

    ये सायनोफिल्स भी कहलाती हैं।

    कोशिकाद्रव्यी कण बड़े होते हैं, जो नीले रंग के दिखाई पड़ते हैं।

    ये हिपेरिन एवं हिस्टेमिइन (histamine) को स्रावित कर कोशिकाओं में रुधिर का थक्का जमने से रोकती हैं।

    एसिडोफिल्स (Acidophils)

    इनका केन्द्रक द्विपालीयुक्त (bilobed) होता है।

    एलर्जी में इनकी संख्या बढ़ जाती हैं।

    ये घावों को भरने में सहायक होती हैं।

    एग्रेन्यूलोसाइट्स (Agranulocytes)

    ये कुल WBCs का लगभग 35% भाग होती है।

    एग्रेन्यूलोसाइट्स को मोनोसाइट्स (Monocytes) व लिम्फोसाइट्स में विभाजित किया जा सकता है

    मोनोसाइट्स (Monocytes)

    ये सबसे बड़ी ल्यूकोसाइट्स (WBCs) है।

    इनका केन्द्रक अण्डाकार, वृक्क अथवा घोड़े की नाल के आकार का और बाह्य केन्द्रीय होता है।

    इनका निर्माण लिम्फनोड एवं प्लीहा में होता है।

    ये अत्यधिक चल होती हैं तथा जीवाणु एवं अन्य रोगकारक जीवों का भक्षण करने का कार्य करती हैं।

    लिम्फोसाइट्स (Lymphocytes)

    ये ल्यूकोसाइट्स (WBCs) का लगभग 30% भाग बनाती हैं।

    इनका केन्द्रक बड़ा और गोल होता है तथा कोशिकाद्रव्य पतली परिधीय परत बनाता है।

    ये प्रतिरक्षियों का निर्माण कर शरीर के प्रतिरक्षा तन्त्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं।

    श्वेत रुधिर कोशिकाएँ निम्नलिखित कार्य करती हैं : 

    (1) आगंतुक जीवाणुओं का भक्षण करती हैं,

    (2) ये प्रतिपिंडों की रचना करती हैं,

    (3) हिपेरिन उत्पन्न कर रुधिरवाहिकाओं में ये रुधिर को जमने से रोकती हैं,

    (4) ये प्लाज्मा प्रोटीन और कुछ कोशिका प्रोटीन की भी रचना करती हैं तथा

    (5) हिस्टामिनरोधी कार्य कर शरीर को एलर्जी से बचाने में सहायक होती हैं।

    रुधिर प्लेटलेट्स (Blood Platelets)

    स्तनधारियों में रुधिर प्लेटलेट्स सूक्ष्म, रंगहीन, केन्द्रकविहीन गोलाकार तथा चक्रिक (discoidal) होती है। मेंढ़क के शरीर के रुधिर में छोटी-छोटी तर्क के आकार की केन्द्रक युक्त कोशिका थ्रोम्बोसाइट होती है। ये मेगाफेरियोसाइट कोशिकाओं की कोशिका द्रव्य टुकड़े होते है, ये अनियमित आकृति की होती है | इनमें केंद्रक का अभाव होता है , इनका निर्माण अस्थि मज्जा में होता है | इनका विनाश यकृत प्लीहा में होता है |

    ये प्रति घन मिलीमीटर रुधिर में 2.5 लाख से 5 लाख तक होते हें। इनका आकर 2.5 म्यू होता है। इनका जीवन चक्र चार दिन का होता है। इनके कार्य निम्नलिखित हैं :

    (1) ये रुधिर के जमने (स्क्रंदन) में सहायक होते हैं तथा

    (2) रुधिरवाहिका के किसी कारणवश टूट जाने पर ये टूटे स्थान पर एकत्र होकर कोशिकाओं को स्थिर करते हैं।

    लसीका (Lymph)

    यह अर्ध पारदर्शी क्षारीय तरल है, जो रुधिर कोशिकाओं तथा ऊतक के बीच स्थित होता है। इसमें RBCs अनुपस्थित तथा प्लाज्मा प्रोटीन की मात्रा कम होती है। इसमें प्लाज्मा तथा ल्यूकोसाइट पाई जाती है। रुधिर की अपेक्षा इसमें कैल्शियम, फॉस्फोरस, पोषक पदार्थ एवं ऑक्सीजन की मात्रा कम जबकि CO, एवं अपशिष्ट पदार्थ अधिक मात्रा में पाए जाते हैं।

    लसीका के कार्य (Functions of Lymph)

    • जल का अस्थायी संचय
    • अधिशेष जल का अवशोषण
    • दीर्घाणुओं का परिवहन, जैसे- प्रोटीन, हॉर्मोन आदि को रुधिर परिसंचरण में ले जाता है चूँकि ये अणु रुधिर कोशिकाओं की भित्तियों को नहीं भेद पाते । यही कारण है कि ये अणु सीधे रुधिर परिसंचरण में नहीं पहुँच पाते हैं।
    • वसा का परिवहन
    • संक्रमण से सुरक्षा – लिम्फोसाइट की मौजूदगी के कारण होता है ।

    लसीका एवं रुधिर में अन्तर

    लसिका रुधिर
    लसीका में श्वेत रुधिर कणिकाएँ अधिक संख्या में होती हैं।रुधिर में श्वेत रुधिर कणिकाएँ लसीका के अनुपात में कम संख्या में होती हैं।
    लसीका में फाइब्रिनोजन की मात्रा कम होती है, फिर भी थक्का जमने की शक्ति इसमें निहित होती है।रुधिर में फाइबिनोजन की मात्रा अधिक होती है, जिससे यह आसानी के साथ थक्का बन जाता है।
    लसीका द्रव रंगहीन होता है।रुधिर का रंग लाल होता है।
    लसीका में लाल रुधिर कणिकाएँ कम संख्या में होती हैं।रुधिर में लाल रुधिर कणिकाएँ अधिक संख्या में होती हैं।

    रुधिर का थक्का बनना, या जमना (रुधिर का स्कन्दन) (Blood Coagution)

    रुधिर का रुधिर वाहिकाओं से बाहर आते ही रुधिर के अवयव एक जैल समान संरचना में परिवर्तित हो जाते है , जिसे रक्त स्कंदन कहते है | यह एक सुरक्षात्मक प्रणाली है जो घाव में रोगाणुओं के प्रवेश को रोकती है तथा रुधिर क्षति को रोकती है | सरल शब्रुदों में रुधिर द्रव होता है, पर शरीर से बाहर निकलने पर वह कुछ मिनटों में जम जाता है, जिसे थक्का या रक्त स्कंदनकहते हैं। थक्का बनने के समय का निर्धारण कई विधियों से किया जा सकता है।

    रुधिर का थक्का बनने की विधियाँ या प्रक्रिया

    रुधिर के जमने में (1) प्रथ्रोम्बिन, (2) कैल्सियम परमाणु, (3) फाइब्रिनोजिन और (4) थ्रांबोप्लास्टिन की आवश्यकता होती है। पहले तीन पदार्थ रक्त में रहते हैं और चौथा प्लेटलेट के टूटने से निकलता है। इनके अतिरिक्त ऐंट्थ्राम्बिन और हिपेरिन भी रहते हैं। ताप के नीचा होने और कैल्सियम को निकाल लेने से तथा जल मिलाकर रुधिर के पतला कर देने से रुधिर का जमना रुक जाता है। मैग्नीशियम तथा सोडियम सल्फेट को मिलाने से तथा हिपेरिन, जोंकसत और डिकूमेरिन आदि रुधिर के जमने में बाधक होते हैं। रुधिर के शीघ्र जमने में ऊष्मा, थ्रांबीन, ऐड्रीनलीन, कैल्सियम क्लोराड तथा विटामिन के (k) से सहायता मिलती है।

    जब किसी कटे हुए भाग से रुधिर बाहर निकलता है, तब यह जैली के रूप में कुछ ही मिनटों में जम जाता है। इसे स्कन्दन कहते हैं। रुधिर के थक्का बनने की क्रिया एक जटिल क्रिया है। जब किसी स्थान से रुधिर बढ़ने लगता है और यह वायु के आता है, तो रुधिर में उपस्थित थ्रॉम्बोसाइट्स टूट जाती है तथा इससे एक विशिष्ट रासायनिक पदार्थ  मुक्त होकर रुधिर के प्रोटीन से क्रिया करता है तथा प्रोथॉम्बोप्लास्टीन नामक पदार्थ में बदल जाता है। यह प्रोथॉम्बोप्लास्टीन रुधिर के कैल्शियम आयन से क्रिया करके थ्रॉम्बोप्लस्टीन बनाती है। थॉम्बोप्लास्टीन, कैल्शियम आयन (Ca+) तथा ट्रिपटेज नामक एन्जाइस के साथ क्रिया करके निष्क्रिय प्रोथॉम्बिन को सक्रिय थ्रॉम्बीन नामक पदार्थ में परिवर्तित कर देती है।

    यह सक्रिय थ्रॉम्बिन रुधिर के प्रोटीन फाइब्रिनोजेन पर क्रिया करता है और उसे फाइब्रिन में परिवर्तित कर देता है। फॉइब्रिन बारीक एवं कोमल तन्तुओं का जाल होता है। यह जाल इतना बारीक एवं सूक्ष्म होता है कि इसमें रुधिर के कण, विशेषकर RBC, फँस जाते हैं और एक लाल ठोस पिण्ड-सा बन जाता है। इसे रुधिर थक्का कहते हैं। थक्का बहने वाले रुधिर को बन्द कर देता है। रुधिर स्कन्दन के बाद कुछ पीला-सा पदार्थ रह जाता है जिसे सीरम कहते हैं। सीरम का थक्का नहीं बन सकता क्योंकि इसमें फाइब्रिनोजन नहीं होता हैं। रुधिर में प्रायः एक प्रति स्कन्दन होता है जिसे हिपेरिन कहते हैं। यह प्रोथॉम्बिन के उत्प्ररेण को रोकता है। इसी कारण शरीर में बहते समय रुधिर नहीं जमता।

    रुधिर के थक्का बनने के दौरान होने वाली महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया; थ्रॉम्बोप्लास्टिन + प्रोथॉम्बिन + कैल्शियम = थ्रॉम्बिन;
    थ्रॉम्बिन + फाइब्रिनोज़न = फाइब्रिन; फाइब्रिन + रुधिर रुधिराणु = रुधिर का थक्का

    रुधिर वाहिका से निकाले गए रुधिर को जमने से बचाने के लिए उसमें थोड़ा-सा ऑक्जेलेट (सोडियम अयदा पोटैशियम ऑक्जेलेट) मिलाया जाता है।

    रुधिर समूह (Blood Groups)

    रुधिर समूह के खोजकर्ता कार्ल लैण्डस्टीनर थे, जिन्होंने 1902 में इसकी खोज की थी। रुधिर को चार समूहों में बाँटा गया है (i) समूह-A (ii) समूह-B (iii) समूह- AB एवं (iv) समूह – O

    रुधिर समूह-A (Blood Group A)  – इसमें प्रतिजन – A तथा प्रतिरक्षी – b पाए जाते हैं।

    रुधिर समूह-B (Blood Group-B)  – इसमें प्रतिजन – B तथा प्रतिरक्षी – a पाए जाते हैं। रुघिर समूह – AB (Blood Group-AB) इसमें प्रतिरक्षी अनुपस्थित रहता है तथा एन्टीजन- AB रहता है। इस समूह के व्यक्ति किसी भी समूह का रुधिर प्राप्त कर सकता है। इसलिए, इसे सर्वग्राही रुधिर समूह (Universal Blood Recipient) कहते हैं।

    रुधिर समूह-O (Blood Group-O) – इसके खोजकर्ता डी कास्टलो तथा स्टल थे। इसमें प्रतिरक्षी-ab उपस्थित रहता है। लेकिन प्रतिजन अनुपस्थित रहता है। इस समूह का व्यक्ति किसी भी समूह को रुधिर प्रदान कर सकता है। इसलिए, इसे सर्वदाता समूह (Universal Blood Donor) कहते हैं।

    एक रुधिर वर्ग के व्यक्ति को उसी वर्ग का रक्त दिया जा सकता है। दूसरे वर्ग का रक्त देने से उस व्यक्ति की लाल रुधिर कोशिकाएँ अवक्षिप्त हो सकती हैं। पर समान वर्ग का रक्त देने से अवक्षेपण नहीं होता। दूसरे वर्ग का रक्त देने से व्यक्ति की मृत्यु तक हो सकती है। दुर्घटना में कही कट जाने से, या शल्य कर्म में कभी कभी इतना रक्तस्राव होता है कि शरीर में रक्त की मात्रा बहुत कम हो जाती है और व्यक्ति की मृत्यु हो सकती है। ऐसी दशा में रोगी के शरीर में रुधिर पहुँचाने से उसकी प्राणरक्षा संभव होती है। उस समय रुधिरपरीक्षा द्वारा रोगी का रुधिर वर्ग मालूम कर, उसी वर्ग के रुधिरवाले मनुष्य का रुधिर लेकर, रोगी को दिया किंतु ओ (O) वर्ग का रुधिर ऐसा होता है कि उसको अन्य वर्गों के व्यक्ति ग्रहण कर सकते हैं। इस कारण ओ (O) वर्ग के रुधिर वाले व्यक्ति सर्वदाता (Universal Donors) कहे जाते हैं। एबी (AB) वर्ग के रुधिरवाले व्यक्ति अन्य सब वर्गों का रुधिर ग्रहण कर सकते हैं। इसलिए ये व्यक्ति सर्वग्रहणकर्ता (Universal Receipients) कहे जाते हैं। रक्त में आर, एच (Rh) तत्व भी होता है, जिसकी परीक्षा भी आवश्यक है।

    रुधिर समूहलाल रुधिर कणिका में प्रतिजन प्लाज्मा में उपस्थित प्रतिरक्षी रक्तदान की संभावना
    AAbA तथा AB वर्ग के रक्तदान कर सकता है।
    BBaB तथा AB वर्ग को रक्तदान कर सकता है।
    ABA तथा Bकोई नहीकिसी भी वर्ग का रुधिर प्राप्त (सर्वग्राही) कर सकता है, परन्तु केवल AB वर्ग के व्यक्ति को ही रक्तदान कर सकता है।
    Oकोई नहीतथाकिसी भी वर्ग को रक्तदान (सर्वदाता) कर सकता है, परन्तु o से ही रुधिर प्राप्त कर सकता है।

    मानव में रुधिर आधान (Blood Transfusion in Human Being)

    मनुष्य के रुधिर समूहों में सामान्यतया कोई भी रुधिर – अभिश्लेषण (agglutination) नहीं होता। इसका कारण यह है कि किसी भी रुधिर समूह में अनुरूप (corresponding) प्रतिरक्षी एवं प्रतिजन उपस्थित नहीं होते अर्थात् प्रतिजन A के साथ प्रतिरक्षी-a, एन्टीजन-B के साथ प्रतिरक्षी – b उपस्थित नहीं होते।

    यदि किसी रुधिर समूह के रुधिर को किसी ऐसे रुधिर वर्ग के रुधिर में मिश्रित कर दिया जाए जिसमें अनुरूप प्रतिजन एंव प्रतिरक्षी उपस्थित हैं, तब रुधिर की लाल कोशिकाओं का अभिश्लेषण हो जाएगा।

    उदाहरण, A रुधिर समूह के रुधिर का, B रुधिर समूह के रुधिर में मिश्रण कर दें, तो रुधिर कोशिकाओं का अभिश्लेषण हो जाएगा। इसमें लाल रुधिर कोशिकाएँ एक-दूसरे से चिपक जाती हैं।

    इस प्रकार के चिपकाव के फलस्वरूप रुधिर वाहिनियों में अवरोध उत्पन्न हो जाता है एवं प्राणी की मृत्यु हो जाती है। अतः रुधिर आधान में एन्टीजन एवं प्रतिरक्षी का ऐसा ताल-मेल करना चाहिए, जिससे रुधिर का अभिश्लेषण न हो सके।

    हीमोग्लोबिन की मात्रा पुरुषों में 2.5-17.5 ग्राम / 100 घन सेमी तथा स्त्रियों में 11.5-16.6 ग्राम / 100 घन सेमी होती है। रुधिर में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है परन्तु लसीका में कम होती है। ब्लड बैंक में रुधिर 10°C पर सुरक्षित रहता है।

    Rh कारक (Rh-factor)

    1940 में लैण्डस्टीनर और वीनर ने रुधिर में एक अन्य प्रकार के प्रतिजन का पता लगाया। इन्होंने इस प्रतिजन की खोज रीसस नामक बन्दर में की थी। इसलिए, इस प्रतिजन का नामकरण Rh कारक (Rh-factor) किया गया।

    जिन व्यक्तियों के रुधिर में यह तत्व पाया जाता है, उनका रुधिर Rh सहित (Rh+) कहलाता है तथा जिनके रुधिर में नहीं पाया जाता, उनका रुधिर Rh रहित (Rh) कहलाता है। रुधिर आधान के समय Rh-कारक की भी जाँच की जाती है। Rh+ को Rh+ का रुधिर ही दिया जाता है। यदि Rh+ रुधिर वर्ग का रुधिर Rh रुधिर वर्ग वाले व्यक्ति को दिया जाए, तो प्रथम बार कम मात्रा होने के कारण कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। किन्तु, जब दूसरी बार यदि इसी प्रकार रक्ताधान किया जाएगा तो रुधिर अभिश्लेषण के कारण Rh रुधिर वर्ग वाले व्यक्ति की मृत्यु हो जाएगी।

    यदि पिता का रुधिर Rh+ हो तथा माता का रुधिर Rhहो तो जन्म लेने वाले शिशु की जन्म से पहले गर्भावस्था में अथवा जन्म के तुरन्त बाद मृत्यु हो जाती है। ऐसा प्रथम सन्तान के जन्म के समय होता है। इस बीमारी को इरिथ्रोब्लास्टोसिस फीटेलिस (Erythroblastosis Foetalis) कहते हैं।

    विभिन्न समूह वाले माता-पिता से उत्पन्न होने वाले बच्चों के सम्भावित रुधिर समूह

    माता-पिता के रुधिर समूहबच्चों में सम्भावित रुधिर समूहबच्चों में असम्भावित रुधिर समूह
    A x AA या OB या AB
    A x BO, A, B, AB 
    A x ABA, B, ABO
    A x OO या AB या AB
    B x BB या OA, AB
    B x ABA, B, ABO
    B x OO या BA, AB
    AB x ABA, B, ABO
    AB x OA, BO, AB
    O x OOA, B, AB
  • जन्तु-ऊतक Animal Tissues | उत्तक के प्रकार (Type of Animal Tissues) | Detailed in Hindi

    जन्तु-ऊतक Animal Tissues | उत्तक के प्रकार (Type of Animal Tissues) | Detailed in Hindi

    इस आर्टिकल में हम जानेगे कि उत्तक क्या होते है और उनके कितने प्रकार होते है | साथ ही जानेगे की उत्तक किस प्रकार बहुकोशिकीय जन्तुओ के लिय जरूरी होते है | साथ ही हम जानेगे कि उपकला या एपीथीलियमी ऊतक (Epithelial tissues), संयोजी ऊतक (Connective Tissue), पेशीय ऊतक (Muscular Tissue) और तंत्रिकीय ऊतक (Nervous Tissue) क्या होते है |

    उत्तक क्या है ? (What is Tissues)

    शरीर की संरचनात्मक इकाई कोशिका है। समान कोशिकाएँ मिलकर ऊतक बनाती हैं। भ्रूणीय विकास, रचना एवं कार्यों में समान कोशाओं के समूहों अथवा परतों को ऊतक (Tissues) कहते हैं। कई ऊतक मिलकर अंग; जैसे- मस्तिष्क, हृदय, यकृत, नेत्र आदि कई अंग मिलकर अंगतन्त्र बनाते हैं, जो विशेष कार्य करते हैं; जैसे- गुर्दे, मूत्रवाहिनियाँ एवं मूत्राशय मिलकर उत्सर्जन तन्त्र बनाते हैं। जन्तुओं के शरीर में विभिन्न प्रकार के अगतन्त्र; जैसे- पाचन तन्त्र, श्वसन तन्त्र, परिसंचरण तन्त्र, तन्त्रिका तन्त्र आदि मौजूद रहते हैं।

    उत्तक के अध्ययन को ऊतकी (Histology) कहते हैं। इस अध्ययन को कुछ लोग सूक्ष्मशरीर (Micro-anatomy) भी कहते हैं, परन्तु इसका विषय-विस्तार ऊतकी से अधिक है। इटली के वैज्ञानिक, मारसेली मैल्पीजाई (1628-1694) ने जीव विज्ञान की यह शाखा स्थापित की, लेकिन इसे हिस्टोलॉजी का नाम मेयर (1819) ने दिया। टिशू (Tissue) शब्द का प्रथम प्रयोग बाइकाट (Bichat, 1771-1802) ने किया।

    ऊतक में उपस्थित मैट्रिक्स का तरल, उस माध्यम का काम करता है जिसके द्वारा ऊतक की कोशाएँ रक्त या लसीका से अपना रासायनिक लेन-देन करती है। अतः इसे ऊतक द्रव (Tissue fluid) कहते हैं, कुछ ऊतकों में कोशाओं का रक्त या लसीका से सीधा सम्पर्क होता है, या साइनोवियल द्रव (Synovial fluid) या सेरीन्त्रीस्पाइनल द्रव (Cerebrospinal fluid) आदि विशेष प्रकार के तरल पदार्थ रासायनिक लेन-देन के माध्यम का काम करते हैं।

    मानव फेफड़े के एक हिस्टोलॉजिक नमूने का microscope से लिया गया चित्र | जिसमें विभिन्न ऊतक जैसे रक्त, संयोजी ऊतक, संवहनी एंडोथेलियम और श्वसन उपकला, हेमटॉक्सिलिन और ईओसिन दिखाई दे रहे है | (Photo – Wikipedia)

    उत्तक के प्रकार (Type of Tissues)

    बहुकोशिकीय जन्तुओं में पाये जाने वाले ऊतकों की चार प्रमुख श्रेणियाँ होती हैं:

    1. उपकला या एपीथीलियमी ऊतक (Epithelial tissues)
    2. संयोजी ऊतक (Connective Tissue)
    3. पेशीय ऊतक (Muscular Tissue)
    4. तंत्रिकीय ऊतक (Nervous Tissue

    उपकला या एपीथीलियमी ऊतक(Epithelial Tissues)

    इन ऊतकों को उपकला (Epithelial) नाम 18वीं सदी में डच वैज्ञानिक रयूश (Ruysch) ने दिया। ये ऊतक शरीर तथा आन्तरांगों की बाहरी तथा भीतरी उघड़ी (Exposed) सतहों पर, रक्षात्मक चादर या छीलन (Peeling) की भाँति ढके रहते हैं। अतः ठोस आंतरान्गों (जीभ, गुर्दे, जिगर, तिल्ली आदि) पर बाहर तथा त्वचा एवं खोखले आन्तरांगों (श्वास-नालें, आहारनाल, रुधिरवाहिनियाँ आदि) पर भीतर-बाहर इसी ऊतक की एक या अधिक परतें आच्छादित उपकला (Epithelial) ऊतक, भ्रूणीय परिवर्धन में तीनों हि प्राथमिक रोहिस्तरों (Primary germinal layers) एक्टोडर्म, मीसोडर्म एवं एन्डोडर्म से बनती हें।

    यह ऊतक शरीर के सुरक्षा कवच का कार्य करते हैं। यह ऊतक शरीर के ऊपर तथा अन्दर विभिन्न भागों की गुहिका का आवरण बनाता है। त्वचा, मुँह, आहारनाल तथा फेफड़ों की बाहरी सतह इसी की बनी होती है।

    इसकी उत्पत्ति भ्रूण के तीनों प्राथमिक जनन स्तरों— एक्टोडर्म, मीसोडर्म एवं एन्डोडर्म से होती है। उपकला ऊतक की कोशिकाएँ एक-दूसरे से सटी रहती हैं तथा अन्तराल बन्धन द्वारा जुड़ी होती हैं, जिसमें रुधिर वाहिनियाँ अनुपस्थित होती हैं। यह ऊतक अकोशिकीय आधारी झिल्ली पर स्थित होता है, जो इसके नीचे स्थित संयोजी ऊतक से अलग करती है। यह जल एवं अन्य पोषक पदार्थों के अवशोषण में सहायता पहुँचाते हैं।

    इन ऊतकों के द्वारा घाव भरा जाता है क्योंकि इनमें पुनरुत्पादन (regeneration) की क्षमता बहुत होती है। यह आहारलाल में अवशोषण, वृक्क नलिकाओं में पुनरावशोषण तथा उत्सर्जन में सहायता करती है।

    शरीर की सभी अन्थियाँ उपकला ऊतक से बनती है, जो दो प्रकार की होती है।

    एककोशिकीय ग्रन्थि (Unicellular Glands)

    जब एक कोशिका स्वावण का कार्य करती है, तो उसे एककोशिकीय ग्रन्थि कहते हैं। इन ग्रन्थियों में प्राय: श्लेष्मा (mucous) बनता रहता है, जो स्रावित होकर संवधिंत सतह को गोला रखता है। जैसे- श्वसन सतह तथा आहारनाल में उपस्थित चषक कोशिकाएँ (gublet cell) |

    बहुकोशिकीय ग्रन्थि (Multicellular Glands)

    इसके अन्तर्गत अनेक कोशिकाएँ स्रावण करने के लिए समूह बना लेती हैं। यह समूह बहुकोशिकीय ग्रन्थि कहलाती है।

    ये दो प्रकार की होती है :

    अन्तः स्त्रावी ग्रन्थियाँ (Endocrine Glands) – इन ग्रन्थियों का सतह से सम्बन्ध समाप्त हो जाता है तथा इनके स्त्रावण (हॉर्मोन) सीधे रुधिर में पहुँचते हैं; जैसे-पीयूष ग्रन्थि, थायरॉइड ग्रन्थि आदि।

    बहिः स्त्रावी ग्रन्थियाँ (Exocrine Glands) – इसमें स्त्रावण नलिकाओं द्वारा सतह पर स्त्रावित होते हैं, जैसे-आमाशयी, आन्त्रिय, लार ग्रन्थियाँ आदि।

    उपकला या एपीथीलियमी ऊतक के कार्य (Functions)

    • उपकलाएँ मुख्यतः शरीर एवं आन्तरांगों के लिए सुरक्षात्मक आवरण बनाती हैं। अतः ये भीतर स्थित ऊतकों की कोशाओं को चोट से, हानिकारक पदार्थों तथा बैक्टीरिया आदि के दुष्प्रभाव से और सूख जाने से बचाती हैं।
    • शरीर एवं आन्तरांगों का अपने बाहरी वातावरण से पदार्थों का सभी लेन-देन एपीथीलियमी आवरण के ही आर-पार होता है।
    • आहारनाल की दीवार की भीतरी सतह पर ये पोषक पदार्थों एवं जल के अवशोषण (Absorption) का और उत्सर्जन अंगों में उत्सर्जन (Excretion) का कार्य करती हैं।
    • त्वचा पर तथा संवेदांगों में ये संवेदना ग्रहण (Sensory reception) का कार्य करती हैं।
    • कई नलिका जैसी खोखले अंगों में ये श्लेष्म (Mucus) या अन्य तरल पदार्थों के संवहन में सहायता करती हैं।
    • इनमें पुनरुत्पादन (Regeneration) की बहुत क्षमता होती है। अतः क्षत ऊतकों पर शीघ्रतापूर्वक पुनरुत्पादित होकर ये घावों के भरने में सहायता करती हैं।

    संयोजी ऊतक (Connective Tissue)

    भ्रूण में एक्टोडर्म और एण्डोडर्म स्तरों के बीच में कोशाओं का एक ढीला-सा तीसरा स्तर, मीसोडर्म होता है। इस स्तर से बनने वाले वयस्क के सारे ऊतकों को हर्टविग (1883) ने मीसेनकाइमा का नाम दिया। भ्रूणीय परिवर्धन के दौरान, इस स्तर के कुछ भाग तो सघन होकर वयस्क के कंकालीय तथा पेशीय ऊतक (Muscular tissue) बनाते हैं और शेष ढीले रहकर संवहनीय और संयोजी ऊतक (Connective tissue) बनाते हैं। पेशीय ऊतकों (Muscular tissues) के अतिरिक्त अन्य सभी मीसोडर्मी ऊतकों की व्यस्क के संयोजी ऊतकों की श्रेणी में रखा जाता है।

    संयोजी ऊतक विभिन्न अंगों और ऊतकों को सम्बद्ध करता है। इस ऊतक कोशिकाओं की संख्या कम होती है तथा अन्तरकोशिकीय पदार्थ अधिक होता है। यह अन्तरकोशिकीय पदार्थ तन्तुवत, ठोस जैली की तरह तरल सघन या कठोर अवस्था में रह सकता है। इस ऊतक का निर्माण भ्रूणीय मोसोडमं (embryonic mesoderm) में होता है। शरीर के लगभग 30% भाग का निर्माण संयोजी ऊतक से ही होता है। पूरे शरीर में सबसे अधिक फैले होते हैं। ये प्रत्येक अंग के भीतर तथा बाहर और विभिन्न अंगों के बीच-बीच में स्थित पाये जाते हैं। अंगों और इनके विभिन्न ऊतकों की साधना, सहारा देना और परस्पर जोड़े रखना संयोजी ऊतकों का मूल कार्य होता है या कह सकते है कि यह शरीर के विभिन्न कोशिकाओं, ऊतकों एवं अंगों के बीच रहता है तथा इसे परस्पर बाँधने या जोड़ने का कार्य करता है।

    संयोजी ऊतक के प्रकार (Kinds of Connective Tissues)

    मैट्रिक्स तथा तन्तुओं की रचना के आधार पर संयोजी ऊतक को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है :

    1. वास्तविक संयोजी ऊतक

    अन्तराली ऊतक

    वसा ऊतक

    श्वेत तन्तुमय संयोजी ऊतक

    पीत लोचदार संयोजी ऊतक

    जालिकामय संयोजी ऊतक

    श्लेष्मी संयोजी ऊतक

    2. कंकालीय संयोजी ऊतक

    1. अस्थि           2. उपास्थि

    3. तरल संयोजी ऊतक

    (i) रुधिर (ii)  लसीका

    वास्तविक संयोजी ऊतक

    फाइब्रोब्लास्ट घाव भरने में सहायक होता है।

    मैक्रोफेज ग्लीयल कोशिका (मस्तिष्क), कुफ्फर कोशिका (यकृत), मोनोसाइट ( रुधिर ) । ये कोशिकाएँ फैगोसाइटिक तथा अपमार्जक होती हैं ।

    मास्ट कोशिकाएँ एलर्जी क्रिया में भूमिका, शरीर की रक्षा तथा विभिन्न पदार्थ उत्पन्न करते हैं; जैसे- हिपेरीन रुधिर को जमने से रोकता है। हिस्टेमिन एलर्जी में उत्तेजक होता है।

    लसीका कोशिकाएँ प्रतिरक्षियों का संश्लेषण एवं संवहन में सहायक होता है।

    प्लाज्मा कोशिकाएँ प्रतिरक्षी पदार्थों का संश्लेषण करते हैं।

    अन्तराली संयोजी ऊतक विभिन्न ऊतकों के बीच का स्थान भरने तथा उन्हें जोड़ने एवं अंगों को उनके स्थान पर बनाए रखने में सहायक होता है। उदाहरण धमनी व शिराओं की भित्ति पर, खोखले अंगों में आदि।

    वसामय ऊतक यह वसा को संश्लेषित, संचय एवं उसका उपापचय करते हैं। व्हेल का ब्लबर (blubber), ऊँट का कूबड़ तथा मैरीनों भेड़ की मोटी पूँछ मुख्यतया वसा ऊतक की बनी होती है।

    श्वेत तन्तुमय ऊतक यह टेण्डन्स या कण्डराओं का निर्माण करता है, जो पेशी को अस्थि से जोड़ता है।

    पीत लोचदार ऊतक यह लिगामेन्ट का निर्माण करता है, जो एक अस्थि को दूसरे अस्थि से जोड़ता है। यह इलास्टिन तन्तुओं का बना होता है।

    कंकालीय संयोजी ऊतक (मीजोडर्म से विकसित)

    उपास्थि (Cartilage) – यह ठोस, अर्द्ध कठोर तथा लचीला संयोजी ऊतक है। यह लेरिंक्स, ट्रेकिया, ब्रोंकाई आदि में मिलते हैं। उपास्थि की रचना तीन घटकों द्वारा होती है

    1. पेरीकॉण्ड्रियम

    2. मैट्रिक्स

    3. कॉण्ड्रियोसाइट्स।

    शार्क मछली का पूरा कंकाल तन्त्र उपास्थि का बना होता है।

    अस्थि (Bone) एक ठोस, कठोर संयोजी ऊतक है। इसके मैट्रिक्स में कैल्शियम तथा फॉस्फोट के एपोटाइट लवण होते हैं। ऑस्टिओसाइट अस्थि का निर्माण करती हैं। इसके मैट्रिक्स को ओसीन (ossien) कहते हैं।

    स्तनधारियों की लम्बी अस्थियों के मैट्रिक्स में एक हैवर्सियन नलिका होती है, जो रुधिर द्वारा अस्थि के अन्दर पोषक पदार्थों तथा ऑक्सीजन का परिवहन करता है ।

    किसी अस्थि के जल जाने से कार्बनिक पदार्थ जल जाता है, जबकि अकार्बनिक पदार्थ राख के रूप में शेष रह जाता है। अस्थि में कार्बनिक तथा अकार्बनिक लवणों का अनुपात क्रमश: 62% और 38% होता है। जिन अस्थियों में हैविर्सियन तन्त्र पाया जाता है, उन्हें संहत (campact) अस्थि कहते हैं।

    स्नायु (Ligaments) यह अस्थि को अस्थि जोड़ता है।

    कंडरा (Tendons) एक संयोजी ऊतक है, जो पेशी को अस्थि से जोड़ता है।

    तरल संयोजी ऊतक

    रुधिर (Blood) एवं लसीका (Lymph), विशेष प्रकार के तरल संयोजी ऊतक (Connective tissue) होते हैं, जिनका कि सारे शरीर में संचारण होता है। रुधिर की उत्पति भ्रूण (Embryo) की मीसोडर्म से होती है। यह शरीर का 8% भाग होता है।

    आयुकरण (Aging)

    संयोजी ऊतकों के मैट्रिक्स का आयुकरण के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। बच्चों में यह अधिकतर लसदार होता है, क्योंकि तंतुओं की संख्या कम होती है। आयु बढ़ने के साथ-साथ इसमें जेली-सदृश आधार पदार्थ की मात्रा कम होती जाती है और तन्तुओं की मोटाई और संख्या बढ़ती जाती है। कुछ स्थानों पर, जैसे लवणों का भी जमाव होने लगता है। इसलिए इस दीवार का लचीलापन कम होता जाता है और ऊतकों में रक्त की आपूर्ति (Supply) गड़बड़ होती जाती है। इस प्रकार धीरे-धीरे सभी ऊतकों की क्रिया-क्षमता और दक्षता में गिरावट आ जाती है। इसी को आयुकरण (Aging) कहते हैं।

    संयोजी ऊतक कार्य (Functions of Connective Tissue)

    • संयोजी ऊतक (Connective tissue) को अवलंबन ऊतक(Supporting tissue) भी कहते हैं, क्योंकि अन्य कोशाओं, ऊतकों एवं अंगों को सीमेन्ट की तरह परस्पर जोड़कर सहारा देना, यथास्थान साधे रखना तथा पैकिंग पदार्थ के रूप में इन्हें परस्पर बाँधे रखना इनका प्रमुख कार्य होता है।
    • इसके मैट्रिक्स में उपस्थित ऊतक द्रव्य ऊतकों की कोशाओं और रुधिर वाहिनियों के बीच रासायनिक लेन-देन के माध्यम का काम करता है।
    • प्रत्येक आन्तरांग के ऊपर यह एक तन्तुमय सुरक्षात्मक खोल बनाता है।
    • यह आन्तरांगों एवं ऊतकों की आवश्यक लोच (Elasticity), चिकनाहट (Lubrication) एवं दृढ़ता प्रदान करता है और धक्कों को सहने (Shock absorber) का काम करता है।
    • यह रासायनिक पदार्थों का संग्रह एवं संवहन भी करता है। उदाहरणार्थ- वसीय अर्थात् ऐडिपोज संयोजी ऊतक (Adipose Connective Tissue) में वसा (Fat) का संग्रह होता है। यह वसीय ऊतक शरीर में कहीं भी, अन्तराली ऊतक के रूपान्तर से बन सकता है, लेकिन त्वचा के नीचे (मानव में पैनीकुलस एडीपोसस- (Panniculus adiposus), तथा हाथी और व्हेल का ब्लबर (Blubber) पीली अस्थिमज्जा एवं रक्तवाहिनियों के गिर्द तथा मेढक में वृक्कों (Kidneys) के निकट विशेष वसीय ऊतक होते हैं। मनुष्य का अधस्त्वचीय (Sub-cutaneous) पैनीकुलस ऐडीपीसस कुछ सीमा तक पुरुष व नारी के शरीर की आकृति में अन्तर के लिए जिम्मेवार होता है।
    • ऊँट का कूबड़ तथा मैराइनो भेड़ (Marino sheep) की मोटी पूँछ भी वसा-संचय के कारण ही होती है। वसा ऊतक शरीर का लगभग 10% से 15% भाग बनाते हैं।
    • यह विषैले पदार्थों (toxins), रोगाणुओं, कीटाणुओं आदि को नष्ट करके शरीर की सुरक्षा करता है।
    • घायल और संक्रमित स्थानों पर यह मृत कोशाओं को नष्ट करके सफाई तथा इनकी क्षतिपूर्ति करके मरम्मत का काम करता है।
    • हड्डियों और पेशियों को दृढ़तापूर्वक परस्पर जोड़कर यह गति एवं गमन में सहायता करता है।
    • कशेरुकियों (Vertebrates) में पूरे शरीर को साधने और इसकी आकृति बनाए रखने के लिए दृढ़ अन्तः कंकालीय ढांचा (Endoskeletal framework) होता है यह एक विशेष प्रकार के सघन संयोजी ऊतक (Dense Connective tissue) का बना हुआ होता है जिसे कंकाल ऊतक (Skeletal tissue) कहते हैं।

    पेशीय ऊतक (Muscular Tissue)

    संकुचनशीलता (Contractility) एवं चालकता (Motility) जीवद्रव के मूल लक्षण होते हैं। अधिकांश बहुकोशीय जन्तुओं में गमन और अंगों की गति के लिए विशेष प्रकार की कोशाओं के ऊतक (Tissue) होते हैं। इन्हें पेशीय ऊतक या पेशियाँ (Muscles) कहते हैं और इनकी कोशाओं को पेशी कोशाएं कहा जाता है । ये ऊतक भ्रूण (Embryo) की मीसोडर्म से बनते हैं (केवल आँखों की आइरिस और सिलियरी काय की पेशियाँ ऐक्टोडर्म से बनती हैं)। पेशीय ऊतक (Muscular tissue) शरीर के भार का लगभग आधा अंश बनाते हैं। पेशीय कोशाएं लम्बी व सँकरी होती हैं, इसीलिए इन्हें पेशी तन्तु (Muscle fibres) भी कहते हैं। आकुंचनशीलता (Contractility) इनका प्रमुख लक्षण होता है।

    पेशीय ऊतक के प्रकार (Type of Muscular Tissue)

    • रेखित पेशियाँ (Striated or striped muscles)
    • अरेखित या अनैच्छिक पेशियां (Unstriaped, Smooth or involuntary Muscles)
    • ह्रदय पेशियां (Cardiac Muscles)

    रेखित पेशियां (Striated or Striped Muscles)

    शरीर की अधिकांश पेशियाँ रेखित होती हैं। ये शरीर के भार का 40% बनाती हैं। ये केन्द्रीय और परिधीय तन्त्रों के नियन्त्रण में जन्तु की इच्छानुसार कार्य करती हैं। अतः इन्हें ऐच्छिक पेशियाँ (Voluntary Muscles) भी कहते हैं। अधिकांश रेखित पेशियाँ अपने दोनों सिरों पर हड्डियों से जुड़ी होती हैं। अतः इन्हें कंकालीय पेशियाँ (Skeletal Muscles) भी कहते हैं। हाथ-पैरों की गति तथा शरीर की गतियाँ एवं गमन इन्हीं पेशियों द्वारा होता है। अतः इन्हें दैहिक पेशियाँ (Somatic Muscles) भी कहते हैं, क्योंकि ये अंगों में द्रुतगामी (rapid) परन्तु अल्पकालीन गतियाँ उत्पन्न करती हैं।

    ऑक्सीजन-ऋण(Oxygen-Debt)

    सक्रिय शारीरिक कार्य या व्यायाम के समय पेशियों में ऊर्जा का व्यय बहुत बढ़ जाता है और अधिकांश एटीपी (ATP)एडीपी (ADP) में बदल जाती है। अतः ग्लूकोज का जारण तेजी से होने लगता है, परन्तु फेफड़े (Lungs) इसके लिए आवश्यक ऑक्सीजन (O2) की पूर्ति नहीं कर पाते। इसीलिए सांस फूलने लग जाती है (Hard breathing)। इसी दशा के शरीर को ऑक्सीजन ऋण (Oxygen debt) कहते हैं। व्यायाम की समाप्ति के काफी देर बाद तक हम जल्दी-जल्दी साँस लेकर इस ऑक्सीजन ऋण को समाप्त कर देते हैं, अर्थात् हवा से अधिक ऑक्सीजन लेकर पेशियों के जारण द्वारा एटीपी के असाधारण व्यय की पूर्ति करते हैं। इसलिए जिन व्यक्तियों की पेशियों में ग्लूकोज की कमी होगी वे अधिक मेहनत का काम नहीं कर सकते।

    थकावट (Fatigue)

    यदि पेशियों को कुछ समय तक निरन्तर आकुंचन करना पड़े तो इनमें आकुंचन की क्षमता धीरे-धीरे कम हो जाती है और पेशियों में लैक्टिक अम्ल (Lactic acid) के जमा हो जाने के कारण इनमें आकुंचन हो ही नहीं पाता। इसी की थकावट (Fatigue) कहते हैं। बाद में धीरे-धीरे लैक्टिक अम्ल को ग्लूकोज में बदल कर थकावट की दशा समाप्त हो जाती है।

    कंपकपी (Shivering)

    जाड़े में कभी-कभी क्षणभर के लिए हमें अपने आप कंपकपी आ जाती है। यह कंकाल पेशियों की एक अनैच्छिक क्रिया होती है। शरीर ताप को बढ़ाना इस क्रिया का उद्देश्य होता है।

    अरेखित या अनैच्छिक पेशियाँ(Unstriped, Smooth or Involuntary Muscles)

    अरेखित पेशियां खोखले आंतरांगों की दीवार, अतिरिकत जननांगों, त्वचा की डर्मिस आदि में होती हैं। इस प्रकार ये आहारनाल, मूत्राशय, पित्ताशय, श्वसन नालों, प्लीहा, नेत्रों, त्वचा, गर्भाशय, योनि, जनन एवं रुधिरवाहिनियों आदि में होती हैं। इन्हें इसलिए आंतरांगीय पेशियां (Visceral muscles) भी कहते हैं। अस्थियों से इनका कोई सम्बन्ध नहीं होता। त्वचा में बालों से सम्बन्धित ऐरेक्टर पिलाई (Arrector pilli) पेशियां तथा शिश्न का स्पंजी पेशी जाल भी अरेखित पेशी ऊतक होते हैं।

    इन पेशियों का आकुंचन स्वायत्त तन्त्र (Autonomous nervous system) के नियन्त्रण में धीरे-धीरे प्रायः एक निश्चित क्रम या लय (Rhythm) में, स्वतः यन्त्रवत् होता रहता है, इस पर जन्तु इच्छा-शक्ति का नियन्त्रण नहीं होता है। इसीलिए इन पेशियों को अनैच्छिक पेशियाँ (Involuntary muscules) कहते हैं। आन्तरांगों का संकुचन, नालवत् आन्तरांगों की गुहा का फैलना या सिकुड़ना, आहारनाल की तरंग-गति (Peristalsis) आदि क्रियाएँ इन्हीं के संकुचन पर निर्भर करती हैं।

    हृद पेशियां (Cardiac muscles)

    कशेरुकियों (Vertebrates) के हृदय की दीवार का अधिकांश भाग हृदपेशियों का बना होता है जिसे मायोकार्डियम (Myocardium) कहते हैं। इन पेशियों के कुछ लक्षण रेखित और कुछ अरेखित पेशियों के होते हैं- इनके छोटे लेकिन मोटे व बेलनाकार पेशी तन्तु रेखित होते हैं। परन्तु इनमें केवल एक या कभी-कभी दो केन्द्रक होते हैं। ये तन्तु कुछ शाखान्वित होकर परस्पर जुड़े होते हैं। केवल इन्हीं पेशियों में पेशी तन्तु सिरों पर ऊँगली- जैसे प्रबंधों (Interdigitations) द्वारा परस्पर गुंथे रहते हैं। इन्हीं स्थानों को पहले अंतर्विष्ट पट्टियां (Intercalated discs) कहते हैं। स्वभाव में हृद पेशियां अन्य पेशियों से भिन्न होती हैं। ये स्वायत्त तन्त्रिका तन्तुओं से सम्बन्धित होती हैं। इनका सबसे विशिष्ट लक्षण यह होता है कि यह जन्तु की इच्छा से स्वतन्त्र अपने आप (Automatically), बिना थके, बिना रुके एक लय से (rhythmically) और मनुष्य में लगभग 72 बार प्रति मिनट की दर से, जीवन भर आकुंचन करती रहती है। इसी को हृदय की धड़कन (Heart beat) कहते हैं। स्पष्ट है कि इनमें एटीपी (ATP) का सबसे अधिक व्यय होता है। इसीलिए पूरे शरीर में इन्हीं कोशाओं में माइटोकॉण्ड्रिया सबसे अधिक व जटिल होते हैं। इनका संकुचन तन्त्रिजनक (Neurogenic) नहीं होता, अर्थात यह तंत्रिका प्रेरणा के कारण नहीं होता, वरन इन्हीं में अन्तर्भूत (Inherent), अर्थात् पेशीजनक (Myogenic) होता है।

    पेशियों में वृद्धि एवं क्षय (Growth and Waste)

    यदि पेशियों को बहुत अधिक कार्य करना पड़े तो धीरे-धीरे इनके तन्तु मोटे हो जाते हैं। इसे पेशी की अतिवृद्धि (Hypertrophy) कहते हैं। गर्भवती स्त्रियों के गर्भाशय की पेशियों में हॉरमोन्स के प्रभाव से अतिवृद्धि हो जाती है। इससे गर्भाशय कई गुना बड़ा हो जाता है। यदि किसी पेशी को काफी समय तक कार्य न करना पड़े तो इसके तन्तु पतले हो जाते हैं। इसे पेशी का क्षय (Atrophy) कहते हैं।

    तंत्रिकीय ऊतक (Nervous Tissue)

    आकुंचन की भाँति, उत्तेजनशीलता (Irritability) एवं संवाहकता (Conductivity) भी जीव द्रव्य के मूलभूत गुण होते हैं, लेकिन अधिकांश मेटाजोआ में इन कार्यों के लिए भी विशिष्ट कोशाएं होती हैं, जिन्हें तंत्रिका कोशाएं या न्यूरॉन्स (Nerve Cells or neurons) कहते हैं। ये भ्रूण की एक्टोडर्म की न्यूरल प्लेट से बनती हैं और तन्त्रिकीय ऊतक की रचनात्मक तथा क्रियात्मक इकाइयां (Units) होती हैं।

    भ्रूणीय परिवर्धन (Embryonic Development)

    भ्रूणीय परिवर्धन में एक बार बन जाने के बाद तन्त्रिका कोशाएँ कभी विभाजित नहीं होती वरन् जीवन भर अन्तरावस्था (Interphase) में रहती हैं और शरीर की वृद्धि के साथ-साथ बड़ी हो जाती हैं। मस्तिष्क की कुछ तन्त्रिका कोशाओं में मिलैनिन (Melanin) रंगा होता है। मादा की तन्त्रिका कोशाओं के केन्द्रक में केन्द्रिका के निकट प्रायः एक बार काय (Barr body) होता है जो एक्स (X) गुणसूत्र के रूपान्तरण से बनता है। तन्त्रिका कोशाओं के कोशापिण्ड, अधिकांश केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (Central nervous system), मुख्यतः मष्तिष्क के धूसर द्रव्य (Grey matter) में होते हैं। केन्द्रीय तन्त्र के बाहर थोड़े से कोशापिण्ड छोटेछोटे समूहों में पाए जाते हैं जिन्हें गुच्छक या गैग्लिया (Ganglia) कहते हैं। मस्तिष्क के अनुमस्तिष्क (Cerebellum) में फ्लास्क की आकृति के कोशापिण्ड होते हैं। इन्हें पुरकिन्जे की कोशाएं (Purkinje cells) कहते हैं।

    तन्त्रिका ऊतक के कार्य (Functions of Nervous Tissue)

    तन्त्रिका ऊतक का कार्य तन्त्रिकीय प्रेरणाओं (Nerve impulses) का संवहन (Conduction) अर्थात एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जाना होता है। त्वचा, कान, आँख, नाक आदि संवेदांगों अर्थात् ग्राहक अंगों (Receptor Organs) की तन्त्रिकासंवेदी (Neurosensory) कोशाएँ जब बाहरी उद्दीपनों (External stimuli) को ग्रहण करती हैं, तो इनसे सम्बन्धित संवेदी अर्थात् अभिवाही तन्त्रिका कोशाओं के तन्तुओं (Sensory or afferent nerve fibres) में विद्युत प्रवाह के रूप में, संवेदी प्रेरणाएँ (Sensory impulses) उत्पन्न होती हैं जिन्हें ये तन्तु केन्द्रीय तन्त्रिका में पहुँचाते हैं। केन्द्रीय तन्त्र से प्रेरक अर्थात् अपवाही तन्त्रिका कोशाओं के तन्तु (Motor or efferent nerve fibres) चालक प्रेरणाओं (Motor impulses) को पेशियों, ग्रन्थियों आदि अपवाहक अंगों (Effector organs) में ले जाते हैं जो उद्दीपनों के अनुसार प्रतिक्रिया (Response) करते हैं। चालक प्रेरणाओं का दूर-दूर (Ganglia) में तन्त्रिका कोशाएँ अपने-अपने अक्ष-तन्तुओं एवं डेन्ड्राइट्स की शाखाओं द्वारा परस्पर सम्बन्धित रहती हैं। इन सम्बन्धों को सिनैप्स (Synaps) कहते हैं।

  • फल क्या है | What is Fruit? | फलों के प्रकार | Types of Fruits in Hindi (फलों से जुडी सम्पूर्ण जानकारी)

    फल क्या है | What is Fruit? | फलों के प्रकार | Types of Fruits in Hindi (फलों से जुडी सम्पूर्ण जानकारी)

    इस आर्टिकल में फलों से जुड़े सारे तथ्यों के बारे में बात करेगे | फल क्या होते है (What is Fruit), फलों के कितने प्रकार है, फलों की विशेषताएँ क्या क्या है, फलों के क्या गुण है आदि महत्वपुर्ण जानकारी इस आर्टिकल में जानेगे |

    फल (Fruits)

    फल पादप का मुख्य अंग है फल का निर्माण निषेचन(FERTILIZATION) के पश्चात जायांग के अण्डाशय(OVARY) से होता हैं।परिपक्व अण्डाशय ही फल कहलाता है। फल में मुख्यतया दो भाग फलभित्ति (Pericap) तथा बीज (seed) होते हैं। केवल अण्डाशय से विकसित होने वाले फल सत्य फल (True Fruit) तथा पुष्प के अन्य भाग; जैसे-पुष्पासन, बाह्यदल इत्यादि में विकसित फल कूट फल (false fruit) कहलाते हैं। जैसे – सेब, शहतूत, नाशपाती आदि मे निषेचन के बिना अण्डाशय का फल के रूप में रुपान्तरण अनिषेकफलन कहलाता है।

    ये फल प्रायः बीज रहित होते हैं उदाहरण केला, पपीता, नारंगी अंगर, अनानास आदि। फल नए बीजों की रक्षा करता है तथा बीज के प्रकीर्णन में सहायता करता है।

    फल की संरचना (STRUCTURE OF FRUITS)

    एक फल में फलभित्ती (PERICARP) (Pericarp) और बीज होते हैं। अंडाशय की दीवार से फलभित्ती (PERICARP) विकसित होती है। फलभित्ती को बाह्य फलभित्ती (Epicarp), मध्य फलभित्ती  (Mesocarp) और अन्तः फलभित्ती  (Endocarp) में विभेदित किया जाता है।

    बीज का निर्माण  निषेचन के बाद  बिजाण्ड (OVULE) से होता हैं। बीजांड का बीजावरण (SEED COAT) फलभित्ती के पास होता है।
    बाह्य फलभित्ती  (Epicarp) – यह सबसे बाहरी स्त्तर होता है। जो पतला नरम या कठोर होता है। यह फल का छिलका बनती है।
    मध्य फलभित्ती  (Mesocarp)–  यह मोटी गूदेदार तथा खाने योग्य होती है, जैसी की आम का मध्य का पीला खाने योग्य भाग लेकिन नारियल में रेशेदार जटा होती है।
    अन्तः फलभित्ती (Endocarp)- यह सबसे भीतरी स्तर है आम नारियल बेर में यह कठोर लेकिन खजूर, संतरा में पतली झिल्ली के रूप में होती है।  बीजावरण अन्तः फलभित्ती के पास होता है।

    फलों के प्रकार (Type of Fruits)

    आवृतबीजियों के फलों में बहुत विभिन्नताएं पाई जाती है, मोटे तौर पर ये तीन श्रेणियों में रखे जाते है |

    (i) सरल फल (Simple Fruit)

    (ii) गुदेदार फल (Succulent fruits)

    (iii) शुष्क फल (Dry Fruit)

    सरल फल (Simple Fruit)

    ये फल एकाण्डपी या बहुअण्डपी एवं युक्ताण्डपी अण्डाशय से विकसित होते है। ये फल गूदेदार या शुष्क होते हैं। इसके अन्तर्गत मूंगफली, सिंघाड़ा, काजू जैसे शुष्क फल एवं आम, नींबू आदि जैसे गूदेदार फल आते हैं।

    अष्ठिफल (Drupe)

    यह एकबीजी फल है, जो एकाण्डपी या बहुअण्डपी व युक्ताअण्डपी अण्डाशय से विकसित होते हैं। इन फलों में फलभित्ति बाह्य, मध्य तथा अन्त:फलभित्ति में विभाजित होती है तथा अन्त:फलभित्ति काष्ठीय होती है। उदाहरण आम, बेर, पिस्ता।

    बेरी (Berry)

    बेरी (Berry) एक या अनेक बीजधारी फल है, जो बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी व उर्ध्ववती या अधोवर्ती अण्डाशय से विकसित होते हैं।

    गुदेदार फल (Succulent fruits)

    फलभित्ति बाह्य, मध्य तथा अन्तःफलभित्ति में विभेदित होती है।

    उदाहरण: टमाटर, पपीता, अंगूर, मिर्च।

    पोम (Pome)

    यह कूट फल है क्योकि इसमें अण्डाशय के साथ-साथ पुष्पासन भी फल बनाने में सहायता करता है।

    मुख्य फल पंचअण्डपी व युक्ताण्डपी अण्डाशय से बनता है, परन्तु खाने योग्य नहीं है, पुष्पासन जो अण्डाशय के चारों ओर रसीला व गुदेदार भाग बनाता है, खाया जाता है। उदाहरण सेब, लौकाटा।

    पेपो (Pepo)

    यह प्राय बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी, अधोवर्ती तथा भित्तीय बीजाण्डन्यास युक्त अण्डाशय से विकसित होता है। बाह्य फल भित्ति दृढ़ छिलका बनाती है, तथा मध्य व अन्तःफलभित्ति रसीली तथा खाने योग्य होती है। उदाहरण: कुकुरबिटेसी कुल के पौधे।

    हेस्पेरिडियम (Hesperidium)

    • ये फल बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्व अण्डाशय से विकसित होते हैं।
    • अण्डाशय में स्तम्भीय बीजाण्डन्यास होता है। बाह्य फल भित्ति मोटी एवं छिलके के रूप में होती है, जिसमें अनेक तेल ग्रन्थियाँ पाई जाती है।
    • अत:फलभित्ति झिल्ली के रूप में प्रत्येक फाँक के ऊपर रहती है, इससे अनेक सरस ग्रन्थिल रोम निकलते हैं, जो फल का खाने योग्य भाग बनाते हैं। उदाहरण सन्तरा, नींबू ।

    शुष्क फल (Dry Fruit) के प्रकार

    शुष्क फल तीन प्रकार के होते है

    (i)   स्फोटक

    (ii)  अस्फोटक

    (iii)  भिदुरफल

    स्फोटक शुष्क फल की विशेषताएँ और प्रकार

    इस फल के परिपक्व हो जाने पर फलभित्ति फट जाती है |

    स्फोटक शुष्क फल के निम्न प्रकार है :

    फली (Legume or pod)

    यह उर्ध्ववर्ती, एकाण्डपी, एककोष्ठीय अण्डाशय से विकसित होते हैं परिपक्व फल शिखर से आधार की ओर दोनों सीवन से फटते हैं, उदाहरण: फेबेसी कुल के सदस्य।

    फॉलिकिल (Follicle)

    यह उर्ध्वर्ती, एकाण्डपी, एककोष्ठीय अण्डाशय से विकसित होते हैं, परन्तु परिपक्व फल अधर सीवन से फटते हैं। उदाहरण: मदार डेल्फिनियम।

    सिलिक्यूआ (Siliqua)

    यह बहुबीजी तथा द्विकोष्ठी फल है, जो द्विअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्ववर्ती अण्डाशय से विकसित होता है। स्फुटन नीचे से ऊपर की ओर होता है तथा बीज आभाषीपट या रेप्लम पर लगे होते हैं। उदाहरण – क्रूसीफेरी|

    सिलिक्यूला (Silicula) छोटे, चौड़े व चपटे सिलिक्यूआ, उदाहरण: कैप्सेला

    सम्पुट (Capsule)

    यह बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्ववर्ती कभी-कभी अधोवर्ती अण्डाशय से विकसित होता है। इन फलों का स्फुटन विभिन्न प्रकार से होता है । उदाहरण: रन्ध्री-पोस्त, कोष्टविदारक-कपास, षटविदारक-लाइनम, पटभंजक, धतूरा तथा अनुप्रस्थ, पोर्टुलाका

    अस्फोटक शुष्क फल की विशेषताएँ और प्रकार

    अस्फोटक शुष्क फलों मेंफल के परिपक्व होने पर फलभित्ति नहीं फटती है |

    ऐकीन (Achene)

    ये फल एककोष्ठीय तथा एकबीजी होते हैं, और एकाण्डपी व उर्ध्ववर्ती अण्डाशय से विकसित होते हैं। इनकी फलभित्ति बीजावरण से अलग होती है। उदाहरण: क्लीमेटिस, नार्विलिया ।

    कैरिओप्सिस (Caropsis)

    ये एककोष्ठीय तथा एकबीजी फल हैं, जो एकाण्डपी, उर्ध्व अण्डाशय, से विकसित होते हैं, इनकी फलभित्ति बीजावरण से संयुक्त रहती है। उदाहरण- ग्रेमिनी कुल के पौधे ।

    सिप्सेला (Cypsella)

    ये एककोष्ठीय तथा एकबीजी फल हैं, जो द्विअण्डपी, युक्ताअण्डपी, अधोवर्ती, अण्डाशय से विकसित होते हैं इनकी फलभित्ति बीजावरण से पृथक रहती है इनमें बाह्यदल पैपस के रूप में रूपान्तरित होते हैं जो प्रकीर्णन की पैराशूट प्रक्रिया में सहायक है। उदाहरण: कम्पोजिटी कुल के सदस्य।

    नट (Nut)

    एककोष्ठीय तथा एकबीजी फल, जो द्वि या बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्ववर्ती अण्डाशय से विकसित होते हैं फलभित्ति कठोर एवं काष्ठीय। उदाहरण: काजू सिंघाड़ा, लीची।

    समारा (Samara)

    ये एकबीजी फल है, जो द्विअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्व अण्डाशय से विकसित होते हैं। इनकी फलभित्ति पँख के सामन चपटी होती है और वायु द्वारा प्रकणन में सहायक है। उदाहरण: होलोप्टेरा, हिप्टेज

    भिदुरफल

    परिपक्व होने के साथ-साथ दो बीजों के बीज की फलभित्ति के अन्दर की ओर धँस जाने से फल बहुत से एक बीज युक्त फलांशुकों में विभक्त हो जाते हैं।

    लोमेन्टम (Lomentum)

    ये फली के रूपान्तरण है, जो एकाण्डपी, एककोष्ठीय तथा उर्ध्व अण्डाशय से विकसित होते हैं। ये एकबीजी फलांशुकों (mericarps) में विभाजित हुए रहते हैं। उदाहरण: मूँगफली, छुईमई, बबूला

    रेग्मा (Regma)

    ये फल त्रिअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्वअण्डाशय से विकसित होते हैं। फल परिवक्व होने पर तीन अस्फोटी बीजयुक्त गोलाणुओं (Cocci) में विभाजित हो जाते हैं, उदाहरण: रिसिनस, जिरेनियम

    क्रीमोकार्प (Cremocarp)

    ये फल द्विकोष्ठीय एवं द्विबीजी होते हैं और द्विअण्डपी, युक्ताण्डपी अधोवर्ती अण्डाशय से विकसित होते हैं। अण्डाशय के पकने पर फल दो अस्फोटी भागों में बँट जाता है, जिन्हें फलाँशुक कहते हैं,

    उदाहरण: अम्बेलीफेरी कुल के सदस्य।

    कार्सेरूलस (Carcerulus)

    ये फल द्विअण्डपी या बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्ववर्ती अण्डाशय से विकसित होते हैं। कूट पर के बन जाने से इनमें अनेक एकबीजी फलांशुक बन जाते हैं। उदाहरण: ओसिमम, ऐबूटिलोन ।

    द्विसमारा

    ये फल द्विअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्व अण्डाशय से विकसित होते हैं। इनमें फलभित्ति फैलकर दो चपटे पक्ष बनाती है। परिपक्व होने पर फल, दो एकबीजी भागों में विभाजित हो जाता है। उदाहरण: एसर, हिप्टेज ।

    पुंजफल (Aggregate Fruits)

    ये वास्तव में लघुफलों (fruitlets) के समूह हैं, जो बहुअण्डपी, वियुक्ताण्डपी अण्डपों से विकसित होते हैं। प्रत्येक अण्डप (carpel) से एक लघुफल बनता है। ये निम्न प्रकार के होते हैं :

    फॉलिकिलों का पुंज (Etaerio of follicles)

    इस फल में प्रत्येक लघुफल एक फॉलिकिल होता है, और सभी लघुफल बढ़े हुए पुष्पासन पर एक गुच्छे के रूप में लगे रहते हैं। उदाहरण: मदार, सदाबहार।

    सरस फलों का पुंज (Etaerio of Berries)

    इसेमें बहुत से सरस फल एक गूदेदार पुष्पासन के चारों ओर लगे रहते हैं। उदाहरण: पॉलीऐल्थिया, शरीफा ।

    अष्ठिफलों का पुंज (Etaerio of drupes)

    बहुत से छोटे-छोटे अष्ठिफल पुष्प के विभिन्न अण्डपों से विकसित होते हैं, और गूदेदार पुष्पासन पर लगे रहते हैं। उदाहरण: रसभरी।

    ऐकीनों का पुंज (Etaerio of Achenes)

    प्रत्येक लघुफल ऐकीन होता है। उदाहरण: नारवेलिया, क्लीमेटिस, गुलाब।

    संग्रथित फल (Composite Fruit)

    (संग्रथित फल सम्पूर्ण पुष्पक्रम से विकसित होते हैं, इन्हें इन्फ्रक्टेसेन्स (Enfructescence) भी कहते हैं।

    ये दो प्रकार के होते हैं:

    सोरोसिस (Sorosis)

    शूकी, स्पेडिक्स या कैटकिन पुष्पक्रमों से विकसित होते हैं। प्रत्येक पुष्प के सहपत्र तथा परिदल मांसल तथा रसीले हो जाते हैं तथा इनका पुष्पावली वृन्त भी मोटा तथा मांसल हो जाता है। उदाहरण कटहल, अनानास, शहतूत।

    साइकोनस (Syconus)

    यह हाइपेन्थोडियम पुष्पक्रम से विकसित होता है। आशय नाशपाती के आकार की खोखली गुहा बनाते हैं, जिसके ऊपर छोटे-छोटे शल्कों से घिरा एक छिद्र होता है। पुष्पासन गूदेदार खाने योग्य भाग बनाता है।

    फलों के गुण, उपयोग और फायदे (Fruits Benefits in Hindi)

    • फल हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत उपयोगी होते हैं। फलों से से हमारे शरीर में खनिज और विटामिन्स की पूर्ती होती है, जो कि हमारे शरीर को अच्छी तरह से काम करने लिए बेहद ज़रूरी होते हैं।
    • फाइबर युक्त फल पाचन शक्ति को बढ़ाने में मदद करते हैं। फल खाने से पर्याप्त ऊर्जा भी मिलती है।
    • फल स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं जैसे हीट स्ट्रोक, हाई बीपी (उच्च रक्तचाप), कैंसर, हृदय रोग और मधुमेह से लड़ने की क्षमता प्रदान करते हैं।
    • लगभग सभी फलो में पोषक तत्व पाए जाते हैं। शरीर के रोग ग्रसित होने पर स्वस्थ आहार और फल रोगों से निजात दिलाते हैं।
    • फलों में न केवल महत्वपूर्ण विटामिन और खनिज पाए जाते हैं, बल्कि इनके सेवन से पाचन तंत्र भी स्वस्थ रहता है। यद्यपि किसी भी प्रकार का फल आपके संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है, लेकिन विशिष्ट पोषक तत्वों की अधिक मात्रा वाले फल अन्य किस्मों की तुलना में अधिक फायदेमंद होते हैं।
    • फलों के छिलकों में फाइबर की अधिक मात्रा होती है जो कि हमारे शरीर की उत्सर्जन प्रक्रिया में बहुत उपयोगी होती है। हालांकि कुछ रेशेदार फलों के छिलके जिन्हें खाया नही जा सकता हैं जैसे कि नींबू, केले, खरबूज़े और नारंगी लेकिन इनके बाक़ी हिस्सों पर्याप्त मात्रा में फाइबर उपस्थित होता है।
    • फल 90-95% पानी की मात्रा से भरपूर होते हैं, जिससे शरीर से नाइट्रोजनयुक्त अवांछित विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में आसानी होती है।

    फलों से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य

    • विक्टोरिया एमाजोनिका की पत्तियाँ सबसे बड़ी होती हैं।
    • अपस्थानिक जड़े मूलांकुर (radicle) के अतिरिक्त पौधों की शाखाओं तथा पत्तियों से निकलती हैं।
    • जब एक ही पौधे पर अलिंगी, द्विलिंगी तथा एकलिंगी पुष्प पाये जाते हैं, तो इसे सर्वांगी (polygamous) कहते हैं; जैसे-आम (Mangifera indica), पॉलीगोनम ।
    • जब पुष्प में केवल पुंकेसर हो तो इसे पुंकेसरी (staminate) तथा जब केवल मादा जननांग हो तो इसे स्त्रीकेसरी कहते हैं। गोभी का सम्पूर्ण पुष्पक्रम भोजन के रूप में उपयोग होता है।
    • किसी स्थान पर वर्ष की विभिन्न ऋतुओं में जलवायु के क्रमिक परिवर्तन के कारण कैम्बियम की सक्रियता बदलती रहती है, जिसके कारण बसन्त ऋतु में मोटी वाहिकाएँ तथा शरद ऋतु में पतली वाहिकाएँ मिलती हैं इसके फलस्वरुप स्पष्ट वार्षिक वलय बनते हैं, जो एक वर्ष की वृद्धि को प्रदर्शित करते हैं। इन वलयों को गिनकर पेड़ की आयु ज्ञात की जाती है। वार्षिक वलय का अध्ययन डेन्ड्रोक्रोनोलॉजी (Dendrochronology) कहलाती है।
    • कैम्बियम के द्वारा पौधे के बाहरी ओर कॉर्क का निर्माण होता है। परिपक्व होने पर ये मृत हो जाती है और सुबेरिन नामक पदार्थ जमा हो जाता है। बोतलों में प्रयुक्त कॉर्क इसका उदाहरण है, जो क्यूरकस सूबर नामक पौधे से प्राप्त होता है।
  • पुष्प या फूल (Flowers) , पुष्प के प्रकार, मुख्य विशेषताएँ, परागण | निषेचन | पुंकेसर | बीजाण्डासन (Placentation) और अण्डप | Flowers in Hindi (detailed सम्पूर्ण जानकारी)

    पुष्प या फूल (Flowers) , पुष्प के प्रकार, मुख्य विशेषताएँ, परागण | निषेचन | पुंकेसर | बीजाण्डासन (Placentation) और अण्डप | Flowers in Hindi (detailed सम्पूर्ण जानकारी)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की पुष्प या फल क्या है ? क्योकि पुष्पीय पौधों में पुष्प एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंग है। तो हम पुष्प के प्रकार, पुष्प की मुख्य विशेषताएं और पुष्प के उपयोग के बारे में बतायेगे | साथ ही हम जानेगे की परागण, निषेचन, पुंकेसर, बीजाण्डासन क्या होते है और यह किस प्रकार पुष्प से सम्बंधित है |

    पुष्प (Flower)

    पुष्पीय पौधों में पुष्प एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंग है। आकारकीय (Morphological) रूप से पुष्प एक रूपान्तरित प्ररोह (स्तम्भ) है जिस पर गाँठे तथा रूपान्तरित पुष्पी पत्तियाँ लगी रहती हैं। पुष्प प्रायः तने या शाखाओं के शीर्ष अथवा पत्ती के अक्ष (Axil) में उत्पन्न होकर प्रजनन (Reproduction) का कार्य करती है तथा फल एवं बीज उत्पन्न करता है।

    पुष्प या फूल एक रूपान्तरित प्ररोह है। इसमें जनन अंग तथा सहायक अंग उपस्थित होते हैं। जिस पुष्प में दोनों जनन अंग अर्थात नर और मादा हो, तो उसे द्विलिंगी पुष्प तथा जब केवल एक जननांग (नर या मादा उपस्थित होते हैं तो उसे एकलिंगी कहते हैं। एक ही पौधे पर नर तथा मादा दोनों पुष्प होने पर पौधा उभयलिंगाश्रयी, जबकि नर तथा मादा पुष्प अलग-अलग पौधों पर उपस्थित उपस्थित होने एकलिंगीश्रयी कहलाता है।

    पुष्प की रचना

    पुष्प एक डंठल द्वारा तने से सम्बद्ध होता है। इस डंठल को वृन्त या पेडिसेल (Pedicel) कहते हैं। वृन्त के सिरे पर स्थित चपटे भाग को पुष्पासन या थेलामस (Thalamus) कहते हैं। इसी पुष्पासन पर पुष्प के विविध पुष्पीय भाग (Floral Parts) एक विशेष प्रकार के चक्र (Cycle) में व्यवस्थित होते हैं।

    पुष्प (Flower) के मुख्य भाग

    पूर्ण पुष्प में चार मुख्य भाग निम्न है :

    1. बाह्य दलपुंज (Calyx),
    2. दलपुंज (Corolla),
    3. पुमंग (Androecium)
    4. जायांग (Gynoecium)

    पूर्ण पुष्प में चार मुख्य भाग बाह्य दलपुंज एवं दलपुंज (दोनों सहायक अंग) तथा पुमंग एवं जायांग (दोनों आवश्यक अंग) उपस्थित होते हैं। तने से पुष्पों को जोड़ने वाले अंग वृन्त पुष्प का डण्ठल होता है।

    1. बाह्य दलपुंज (Calyx)

    यह पुष्प का सबसे बाहरी चक्र होता है। बाह्यदलपुंज एक दूसरे से स्वतन्त्र (polysepalous) या एक दूसरे से जुड़े हो सकते हैं। कुछ पौधों जैसे सिंघाड़ा में बाह्य दलपुंज काँटों में रूपान्तरित हो जाते हैं। कम्पोजिटी कुल के पौधों में रोमों के समान हो जाते है, जिन्हें रोमगुच्छ कहते हैं।

    2. दलपुंज (Corolla)

    यह अनेक इकाइयों अर्थात् दलों से मिलकर बनता है, जो विभिन्न वर्णकों के कारण चमकीले होते हैं तथा फूलों को आकर्षक रूप प्रदान करते हैं।

    3. पुमंग (Androecium)

    पुमंग (Androecium) पुष्प का नर जनन अंग है, जो पुंकेसरों (stamens) का बना होता है। पुंकेसर पुतन्तु (filament), परागकोष (anther) तथा योजी (connective) से मिलकर बना होता है।

    पुंकेसर

    अधिकांश पुंकेसरों में दो परागकोष होते हैं, जिन्हें द्विकोष्ठी कहते हैं परन्तु मालवेसी कुल में एककोष्ठी (monothecous) पुंकेसर मिलते हैं।

    – पुष्प में पुंकेसर स्वतन्त्र अर्थात् पृथक पुंकेसरी या संयुक्त अर्थात् संघी हो सकते हैं; जैसे

    1. एकसंघी सभी पुंकेसरी एक समूह में, उदाहरण गुड़हला

    2. द्विसंघी पुंकेसरों के पुतन्तु परस्पर जुड़कर दो समूह बनाते हैं, उदाहरण मटर

    3. यहुसंघी पुतन्तु संयुक्त होकर दो से अधिक समूह बनाते हैं, उदाहरण बॉम्बेक्सा

    4. युक्तकोषी पुंकेसर अपने परागकोषों से जुड़े होते हैं और उनके पुतन्तु स्वतन्त्र होते हैं, उदाहरण कम्पोजिटी।

    5. युक्तपुंकेसरी पुंकेसरों के परागकोष तथा पुतन्तु दोनों आपस में पूरी तरह जुड़े होते हैं, और उनके में पुंतन्तु स्वतन्त्र होते हैं, उदाहरण कम्पोजिटी।

    – जब पुंकेसर दल से जुड़े होते है, तो इन्हें दललग्न, जैसे धतूरा व बैगन, जब परिदल से जुड़े होते हैं, तो इन्हें परिदललग्न; जैसे-प्याज व लहसुन तथा जब जायाँग के साथ जुड़े होते हैं, तो इन्हें पुंजायाँगी कहते हैं; जैसे-मदार।

    द्विदिघ्री (Didynamous) अवस्था में 4 पुंकेसर में से 2 के पुतन्तु बड़े तथा दो के छोटे होते हैं; के सदस्य। जैसे-लेबिऐटी कुल के सदस्य

    चतुदीघ्री (Tetradynamous) अवस्था में 6 पुंकेसरों में से 2 बाहर वाले पुंकेसरों के पुंतन्तु छोटे तथा चार अन्दर वाले पुंकेसरों के पुतन्तु बड़े होते हैं; जैसे-क्रूसीफेरी कुल के सदस्य ।

    4. जायाँग (Gynoecium)

    यह पुष्प का मादा जनन अंग है, जो अनेक अण्डपों से मिलकर बना होता है। अण्डपों की संख्या के आधार पर जायाँग एकाअण्डपी; जैसे-मटर, द्विअण्डपी; जैसे-सरसों, त्रिअण्डपी; जैसे-कुकुरबिटा, पंचाण्डपी; जैसे-गुड़हल और बहुअण्डपी; जैसे- पैपेवर आदि होता है।

    उर्ध्ववर्ती (Superior) अवस्था में अण्डाशय बाह्यदलों, दलों तथा पुंकेसरों से ऊपर होता है, जबकि अधोवर्ती (inferior) अवस्था में पुष्पासन अण्डाशय से संगलित हो जाता है और बाह्यदल, दल तथा पुंकेसर अण्डाशय के ऊपर लगे होते हैं।

    अण्डप

    अण्डप के मुख्यतया तीन भाग होते हैं

    1. अण्डाशय (Ovary) अण्डप के आधार का फूला हुआ भाग अण्डाशय कहलाता है।

    2. वर्तिका (Style) अण्डाशय के ऊपर वाले भाग, लम्बी और पतली संरचना वर्तिका कहलाती है।

    3. वर्तिकाग्र (Stigma) यह वर्तिका का शीर्ष भाग होता है।

    पुष्प का कार्य

    पुष्प का मुख्य कार्य लिंगीय प्रजनन द्वारा फल तथा उसके अन्दर बीज का निर्माण करना है।

    परागण

    परागकणों का पुंकेसर से वर्तिकाग्र पर स्थानान्तरण परागण कहलाता है। यह दो प्रकार से होता है:

    स्व-परागण (Self-pollination) में एक पुष्प के परागण उसी पुष्प अथवा उसी पौधे के दूसरे पुष्प की वर्तिकाग्र पर पहुंचते हैं।

    पर-परागण (Cross-pollination) में एक पुष्प के परागकण उसी जाति के दूसरे पौधों के पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं। पर-परागण की क्रिया वायु, जल, कीट तथा जन्तुओं के द्वारा होती है। पर-परागण के अन्तर्गत वायु द्वारा परागण अर्थात् । एनिमोफिली; जैसे-गेहूँ, मक्का आदि में, जल द्वारा अर्थात् हाइड्रोफिला; जैसे-हाइड्रिला में, कीटों द्वारा अर्थात् एन्टोमोफिली।

    • अधिकांश पुष्पों में सर्वाधिक सफल परागण कीटों के माध्यम से ही होता है। इस क्रिया में पराग कणों की न्यूनतम क्षति होती है। पुष्पों में उपस्थित मकरन्द (nectas) कीटों का प्रिय भोजन है। पक्षियों द्वारा परागण अर्थात् ऑर्निथोफिली सेमल वृक्ष में, चमगादड़ द्वारा अर्थात चिरोप्टेरोफिली जैसे कदम्ब वृक्ष में, घोघों द्वारा अर्थात् मैलेकोफिली परागण; जैसे-अरवी में, हाथी द्वारा रफ्लेशिया में आदि परागण विधियाँ आती हैं।

    परागण की विधियां (Methods of pollination)

    1. वायु परागण (Anemophilous): वायु द्वारा परागण
    2. कीट परागण (Entomophilous): कीट द्वारा परागण
    3. जल परागण (Hydrophilous): जल द्वारा परागण
    4. जन्तु परागण (zoophilous): जन्तु द्वारा परागण
    5. पक्षी परागण (Ornithophilous): पक्षियों द्वारा परागण
    6. मेलेकोफिलस (Malacophilous): घोंघे द्वारा परागण
    7. चिरोप्टोफिलस (Chiroptophilous): चमगादड़ द्वारा परागण

    निषेचन (Fertilization)

    परागण के पश्चात निषेचन की क्रिया प्रारम्भ होती है। परागनली (Pollen tube) बीजाण्ड (ovule) में प्रवेश करके बीजाण्डासन को भेदती हुई भ्रूणपोष (Endosperm) तक पहुँचती है और परागकणों को वहीं छोड़ देती है। इसके पश्चात् एक नर युग्मक एक अण्डकोशिका से संयोजन करता है। इसे ही निषेचन कहते हैं। अब निषेचित अण्ड (Fertilized egg) युग्मनज (zygote) कहलाता है। यह युग्मनज बीजाणुभिद की प्रथम इकाई है।

    निषेचन के पश्चात बीजाण्ड से बीज, युग्मनज से भ्रूण (embryo) तथा अण्डाशय से फल का निर्माण होता है। आवृत्तबीजी पौधों (Angiospermic plants) में निषेचन को त्रिक संलयन (Triple fusion) कहते हैं।

    निषेचन के पश्चात् पुष्प में होने वाले परिवर्तन

    निषेचन के पश्चात् पुष्प में निम्नलिखित प्रकार के परिवर्तन देखने को मिलते हैं-

    1. बाह्य दलपुंज (Calyx): यह प्रायः मुरझाकर गिर जाता है। अपवाद-मिर्च।
    2. दलपुंज (Corolla): यह मुरझाकर गिर जाता है।
    3. पुंकेसर (stamen): यह मुरझाकर झड़ जाता है।
    4. वर्तिकाग्र (stigma): यह मुरझा जाती है।
    5. वर्तिका (style): यह मुरझा जाती है।
    6. अण्डाशय (Ovary): यह फल में परिवर्तित हो जाती है।
    7. अण्डाशय भित्ति (Ovary wall): यह फलाभित्ति (Pericarp) में परिवर्तित हो जाती है।
    8. त्रिसंयोजक केन्द्रक (Triple fused nucleus): यह भ्रूणपोष (Endosperm) में परिवर्तित हो जाती है।
    9. अण्डकोशिका (Egg cells): यह भ्रूण (embryo) में परिवर्तित हो जाता है।
    10. बीजाण्डसन (Nucellus): यह पेरीस्पर्म (Perisperm) में परिवर्तित हो जाती है।
    11. बीजाण्ड (Ovule): यह बीज (seed) में परिवर्तित हो जाती है।

    बीजाण्डासन (Placentation)

    बीजाण्डों के वितरण को बीजाण्डन्यास कहते हैं। बीजाण्डासन पुष्पासन (thalamus) या अधर सेवनी (ventral suture) से उत्पन्न विशेष प्रकार का ऊतक है। बीजाण्डन्यास निम्न प्रकार के होते हैं:

    1. सीमान्त (Marginal)

    यह एकाण्डपी अण्डाशय में पाया जाता है, इसमें बीजाण्ड अण्डाशय की सीवन (suture) पर लगे होते हैं। जैसे-लेग्युमिनासा कुल के सदस्य।

    2. भित्तीय (Pnrietal)

    यह द्वि, त्रि या बहुअण्डपी तथा एक कोष्ठी अण्डाशय में पाया जाता है, बीजाण्ड अण्डाशय की भीतरी भित्ति पर लगे होते हैं; जैसे-सरसों, मूली, आरजीमॉन।

    3. स्तम्भीय या अक्षवर्ती (Axile)

    यह द्वि, त्रि,  बहुअण्डपी अण्डाशय में पाया जाता है। बीजाण्डासन अण्डाशय के केन्द्रीय अक्ष पर उत्पन्न होता है; जैसे-गुड़हल, टमाटर, लिली।

    4. आधारिक (Basal)

    अण्डाशय एक कोष्ठकीय होता है तथा बीजाण्डासन अण्डाशय के आधार पर लगा होता है, प्रत्येक बीजाण्डासन पर केवल बीजाण्ड जुड़ा होता है; जैसे-सूरजमुखी गेहूँ।

    5. मुक्त स्तम्भीय (Free central)

    बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी तथा कोष्ठकी अण्डाशय में पाया जाता है, बीजाण्ड अण्डाशय के केन्द्रीय अक्ष पर लगे होते हैं; जैसे-सैपोनेरिया, प्राइमुला।

    6. परिभित्तीय (Superficial)

    यह बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी तथा बहुकोष्ठकीय अण्डाशय में पाया जाता है, इसमें बीजाण्ड अण्डपों की भीतरी दीवार की विभाजन भित्तियों पर उत्पन्न होते हैं; जैसे-वाटर लिली।

  • पुष्पक्रम (Inflorescence) किसे कहते हैं? परिभाषा , पुष्पक्रम के प्रकार, उदाहरण  Inflorescence in Hindi | What Is Inflorescence

    पुष्पक्रम (Inflorescence) किसे कहते हैं? परिभाषा , पुष्पक्रम के प्रकार, उदाहरण Inflorescence in Hindi | What Is Inflorescence

    इस आर्टिकल में हम जानेगे कि पुष्पक्रम किसे कहते हैं अथवा Inflorescence meaning in Hindi ? क्या है, साथ ही हम जानेगे कि पुष्पक्रम (Inflorescence) कितने प्रकार के होते है, Inflorescence के उदाहरण क्या क्या है, एकल पुष्प  क्या होता है, असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence), ससीमाक्षी पुष्पक्रम (Cymose Inflorescence) और मिश्रित पुष्पक्रम (Mixed Inflorescence) क्या है, इनकी विशेषताएं और उदाहरण क्या क्या है आदि |

    पुष्पक्रम क्या है? What Is Inflorescence In Hindi | पुष्पक्रम की परिभाषा

    प्रत्येक जाति के पुष्पीय पौधे पर पुष्प कुछ निश्चित क्रम में व्यवस्थित होते है। पौधे की शाखा के शीर्ष पर पुष्प के उत्पन्न होने और व्यवस्थित होने की विधि (ढंग) को “पुष्पक्रम” कहते है। पुष्पक्रम का अक्ष पुष्पाक्ष कहलाता है | दुसरे शब्दों में पुष्प अक्ष (Floral Axis) या पुष्पाक्ष पर पुष्पों के लगने की व्यवस्था को पुष्पक्रम (Inflorescence) कहते हैं।

    जिस शाखा पर पुष्प लगते है, उस शाखा को पुष्पावली वृन्त (Peduncle) कहते हैं। तथा एक पुष्प जिस वृन्त के द्वारा शाखा से जुड़ा रहता है, उसे पुष्प वृन्त (Pedicel) कहते हैं। पुष्पक्रम का प्रत्येक फूल पुष्पक कहलाता है।

    जब पुष्पावली वृन्त (Peduncle) चपटा या गोल होता है, तो उसे पात्र (receptacle) कहते हैं।
    कभी-कभी पुष्पावली वृन्त (Peduncle) मूलज पत्तियों (radical leaves) के बीच से निकलता है, तब इसे पुष्पदंड (Scape) कहते हैं।

    एकल पुष्प क्या होता है ?

    पुष्प का निर्माण पादप के शीर्षस्थ (terminal) अथवा कक्षस्थ  कलिका (axillary bud) से होता है।
    जब पुष्प शाखा पर एक ही होता है, तो उसे एकल पुष्प कहते हैं। परंतु जब शाखा पर अनेक पुष्प होते हैं, तो ऐसे पुष्पों का समूह पुष्पक्रम कहलाता हैं। (i) एकल शीर्षस्थ : अकेला शीर्षस्थ पुष्प मुख्य तने या उसकी शाखाओं के शीर्ष पर विकसित होता है , उदाहरण पॉपी। (ii)  एकल कक्षस्थ : ये पुष्प पत्ती (उदाहरण : पिटुनिया) के कक्ष में या पुष्पावलि वृन्त के शीर्ष (उदाहरण : चाइना रोज = शू पुष्प = हिबिस्कस रोजा – सिनेनसिस) पर अकेले पाए जाते है।

    पुष्पक्रम (Inflorescence) के प्रकार  (Different Types Of Inflorescence in Hindi)

    पुष्पक्रम मुख्यत: तीन प्रकार के होते है :

    (1) असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence)

    (2) ससीमाक्षी पुष्पक्रम (Cymose Inflorescence)

    (3) मिश्रित पुष्पक्रम (Mixed Inflorescence)

    असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence) क्या है ?

    असीमाक्षी या अनिश्चित वृद्धि का पुष्पक्रम पाशर्व या कक्षस्थ पुष्प रखता है जो अग्राभिसारी क्रम (आधार की ओर पुराने और शीर्ष पर नए) में उत्पन्न होते है। इस प्रकार के पुष्पक्रम में पुष्प अक्ष (Floral Axis) की वृद्धि रुकती नही है और अनिश्चित वृद्धि करता है। इसमें नीचे के फूल बड़े जबकि ऊपर की तरफ छोटे होते जाते है। इसमे नये फूल ऊपर या बीच में जबकि पुराने फूल सबसे नीचे होते है। उदाहरण – मूली , सरसों , घास , केला , सहतूत, सरसों, सोयाबीन इत्यादि।

    असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence in hindi) के मुख्य प्रकार

    •  रेसीम (Raceme) – सरसों के पौधे में यह पुष्पक्रम पाया जाता है। इसमें मुख्य लम्बे अक्ष से pedicle जुड़े होते है और इससे फूल लगे होते है। उदाहरण :गुलमोहर, गेहूं इत्यादि।
    • स्पाइक (Spike) – यह एक अनिश्चित और अशाखित पुष्पक्रम है जो Sessile (बिना डंठल के) फूलों में मिलता है।
    • ओक (Catkin) – ओक में यही पुष्पक्रम पाया जाता है। इसमें लम्बे अक्ष पर उभयलिंगी फूल लगे होते है।
    • Umbel – इसे shortened Racemose भी कहते है। यह गाजर वंश के पौधो में पुष्पक्रम पाया जाता है।
    • Spikelet – इसमें पुष्पक्रम शाखित केंद्रीय अक्ष पर होता है।
    • Head – इसे flattened Racemose कहा जाता है। इसमें मुख्य अक्ष मोठा और चौड़ा हो जाता है जिसे receptacle कहते है। फूलों में pedicles नही होते है।

    ससीमाक्षी पुष्पक्रम क्या है? (Cymose Inflorescence in Hindi)

    इस प्रकार के पुष्पक्रम में पुष्प अक्ष की वृद्धि सीमित होती है। इस प्रकार के पुष्प क्रम में मुख्य अक्ष सिमित वृद्धि वाला होता है और शीर्ष पर एक पुष्प बन जाने के कारण शीर्ष की वृद्धि रुक जाती है।  शीर्षस्त पुष्प के नीचे शाखाएँ निकलती है व उनके शीर्ष पर भी पुष्प बन जाता है।  ससीमाक्षी में पुष्पक्रम तलाभिसारी होता है। उदाहरण – गुडहल , मकोय , पॉपी , चमेली ,आक आदि।

    ससीमाक्षी पुष्पक्रम के मुख्य प्रकार

    • Uniparous Cyme – इसे monochasial पुष्पक्रम भी कहते है। मुख्य अक्ष फूल में समाप्त होता है और इसके आधार से एक दूसरी पार्श्व शाखा निकलती है। फूल basipetal व्यवस्था में शीर्ष में मौजूद होते है। उदाहरण : ड्रोसेरा (Drosera).
    • Dichasial Cyme – इसे द्विशाखी पुष्पक्रम भी कहते है। इसके peduncle के शीर्ष पर फूल लगता है जबकि आधार पर दो पार्श्व शाखाएं निकलती है। उदाहरण : चमेली
    • Multiparous Cyme – इसे बहुशाखी पुष्पक्रम कहते है।
    • Cymose Capitulum (कैपिटुलम) – इसमें पुष्पावली वृन्त (Peduncle) कम वृद्धि करता है और टॉप पर बड़ा फूल लगता है। जबकि इसके पार्श्व में छोटे फूल होते है।

    ससीमाक्षी पुष्पक्रम के कुछ उदाहरण

    • शूकी बॉस एवं लटजीरा
    • अनुशूकी गेहूँ
    • मन्जरी बीटुला एवं मोरस
    • स्थूल मन्जरी कोलोकेशिया
    • समशिख केसिया
    • छतक हाइड्रोकोटाइल
    • मुण्डक सूरजमुखी, जीनिया (पुष्पाक्ष छोटा एवं चपटा होता है जिसे पात्र (receptacle) कहते हैं। मुण्डक में बाहर की ओर रश्मि पुष्पक एवं केन्द्र की ओर बिम्ब पुष्पक होते हैं।

    मिश्रित या यौगिक पुष्पक्रम (Compound Inflorescence) क्या है ?

    जिस पौधे के पुष्प अक्ष पर ससीमाक्षी और असीमाक्षी दोनों प्रकार के पुष्पक्रम पाये जाते है, उसे मिश्रीत पुष्पक्रम (Compound Inflorescence) कहते है।

    मिश्रित पुष्पक्रम के प्रकार

    • थिरसस : साइमोस समूह अग्रभिसारी रूप से विन्यस्त होते है। उदाहरण : विटिस विनिफेरा (ग्रेप वाइन)
    • मिश्रित स्पेडिक्स : स्पेडिक्स मांसल अक्ष पर अग्राभिसारी रूप से विन्यस्त साइमोस पुष्पक्रम रखता है।
    • पेनिकिल ऑफ़ स्पाइकलेट्स : स्पाइकलेंट संयुक्त रेसीम में विन्यस्त होते है। उदाहरण : जई , चावल।
    • कॉरिम्ब ऑफ़ कैपिटुला : उदाहरण : एगीरेटम
    • अन्य प्रकार जैसे अम्बेल ऑफ़ कैपिटूला , साइम ऑफ़ कैपिटुला (उदाहरण : वनिर्जिया ) , साइम ऑफ़ अम्बेल (उदाहरण : लेटाना) , साइम ऑफ़ क्रोरिम्ब आदि।

    विशिष्ट पुष्पक्रम

    विशिष्ट पुष्पक्रम निम्न प्रकार के होते है :

    कटोरिया (Cyathium) सहपत्रों के आपस में जुड़ने से कटोरे की आकृति का सहपत्र चक्र (involucre) बनता है इसकी बाहरी सतह पर मकरन्द ग्रन्थियाँ, बीच में केवल जायाँग द्वारा प्रदर्शित मादा पुष्प तथा उसके चारों ओर एक तन्तुकीय पुंकेसर द्वारा प्रदर्शित नर पुष्प होते हैं; जैसे – यूफोरबिएसी कुल के सदस्य।

    कूट चक्रक (Verticillaster) – यह द्विशाखी ससीमाक्ष का परिवर्तित रूप है। तने की प्रत्येक पर्वसन्धि पर निकली विपरीत पत्तियों के कक्ष में अवृन्त पुष्प निकलते हैं जिसके नीचे से दोनों ओर दो पुष्प निकलते हैं; जैसे – तुलसी, साल्विया

    हाइपेन्थोडियम (Hypanthodium) पुष्पाक्ष अथवा आशय एक छिद्रयुक्त गूदेदार तथा खोखली गुहा की भाँति हो जाता है और छिद्र शल्कों से ढका रहता है।

    पुष्पक्रम (Inflorescence) से सम्बन्धित महत्वपुर्ण प्रश्न :

    प्रश्न : असीमाक्षी पुष्पक्रम और ससीमाक्षी पुष्पक्रम में क्या अंतर है ? Difference between Racemose and Cymose Inflorescence?

    उत्तर: असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose) में ससीमाक्षी पुष्पक्रम (cymose) की तुलना में मुख्य अक्ष में अत्यधिक वृद्धि होती है।

    असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose – रेसमोस) में, मुख्य अक्ष अनिश्चित काल तक बढ़ता रहता है और फूल बाद में पैदा होते हैं। ससीमाक्षी पुष्पक्रम (cymose – सायमोज) में, फूल पुष्प अक्ष पर अंतिम रूप से पैदा होते हैं और मुख्य अक्ष के विकास को निर्धारित करते हैं।

    असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose) में फूल अग्राभिसारी (acropetal) (नीचे से ऊपर की तरफ बढ़ना) क्रम में व्यवस्थित होते है। जबकि ससीमाक्षी पुष्पक्रम (cymose) में पुष्प तलाभिसारी (basipetal) क्रम में होते है।

    असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose) में सबसे पुराना फूल पुष्पक्रम अक्ष के आधार पर होता है जबकि ससीमाक्षी पुष्पक्रम (cymose) में पुष्पक्रम अक्ष के सबसे ऊपर होता है।

    फूलों के Flowering (खिलना या उगना) का समय भी पुष्पक्रम को निर्धारित करता है।

    प्रश्न : असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence) कोनसे फूलों में पाया जाता है ?  Racemose Inflorescence is present in which flower?

    उत्तर : मूली , सरसों , घास , केला , सहतूत, सरसों, सोयाबीन

    प्रश्न : ससीमाक्षी पुष्पक्रम कोनसे फूलों में पाया जाता है ?  Cymose Inflorescence is present in which flower?

    उत्तर : गुड़हल, चमेली 

    प्रश्न : पुष्पक्रम से क्या आशय है? ये कितने प्रकार के होते है? What is inflorescence? How many types of inflorescence?

    उत्तर : प्रत्येक जाति के पुष्पीय पौधे पर पुष्प कुछ निश्चित क्रम में व्यवस्थित होते है। पौधे की शाखा के शीर्ष पर पुष्प के उत्पन्न होने और व्यवस्थित होने की विधि (ढंग) को “पुष्पक्रम” कहते है। पुष्पक्रम का अक्ष पुष्पाक्ष कहलाता है | दुसरे शब्दों में पुष्प अक्ष (Floral Axis) या पुष्पाक्ष पर पुष्पों के लगने की व्यवस्था को पुष्पक्रम (Inflorescence) कहते हैं। पुष्पक्रम मुख्यत: तीन प्रकार के होते है :

    (1) असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence)

    (2) ससीमाक्षी पुष्पक्रम (Cymose Inflorescence)

    (3) मिश्रित पुष्पक्रम (Mixed Inflorescence)

    प्रश्न : कटोरिया पुष्पक्रम पर टिप्पणी

    उत्तर : कटोरिया (Cyathium) सहपत्रों के आपस में जुड़ने से कटोरे की आकृति का सहपत्र चक्र (involucre) बनता है इसकी बाहरी सतह पर मकरन्द ग्रन्थियाँ, बीच में केवल जायाँग द्वारा प्रदर्शित मादा पुष्प तथा उसके चारों ओर एक तन्तुकीय पुंकेसर द्वारा प्रदर्शित नर पुष्प होते हैं; जैसे – यूफोरबिएसी कुल के सदस्य।

    प्रश्न : हाइपेन्थोडियम पुष्पक्रम क्या है ?

    उत्तर : हाइपेन्थोडियम (Hypanthodium) पुष्पाक्ष अथवा आशय एक छिद्रयुक्त गूदेदार तथा खोखली गुहा की भाँति हो जाता है और छिद्र शल्कों से ढका रहता है।

    प्रश्न : कूटचक्रक और सायथियम पुष्पक्रम में अन्तर लिखिए।

    उत्तर : कूट चक्रक (Verticillaster) – यह द्विशाखी ससीमाक्ष का परिवर्तित रूप है। तने की प्रत्येक पर्वसन्धि पर निकली विपरीत पत्तियों के कक्ष में अवृन्त पुष्प निकलते हैं जिसके नीचे से दोनों ओर दो पुष्प निकलते हैं; जैसे – तुलसी, साल्विया

    सायथियम (Cyathium – कटोरिया) सहपत्रों के आपस में जुड़ने से कटोरे की आकृति का सहपत्र चक्र (involucre) बनता है इसकी बाहरी सतह पर मकरन्द ग्रन्थियाँ, बीच में केवल जायाँग द्वारा प्रदर्शित मादा पुष्प तथा उसके चारों ओर एक तन्तुकीय पुंकेसर द्वारा प्रदर्शित नर पुष्प होते हैं; जैसे – यूफोरबिएसी कुल के सदस्य।

  • तना (Plant Stem) परिभाषा, तने के लक्षण, तने के रूपान्तरण, तने के कार्य Work of Plant Stem in Hindi

    तना (Plant Stem) परिभाषा, तने के लक्षण, तने के रूपान्तरण, तने के कार्य Work of Plant Stem in Hindi

    तना पौधे का वह भाग है जो कि भूमि एवं जल के विपरीत तथा प्रकाश (Light) की ओर वृद्धि करता है। तना प्रांकुर (Plumule) से विकसित होता है और शाखाओं, पतियों, फूल एवं फल धारण करता है।

    तना पौधे का आरोही भाग है, जो भूमि के विपरीत प्रकाश की ओर गति करता है। (Negatively geotropic but positively phototropic). तने का आकार बेलनाकार, चपटा अथवा कोणीय (Angular) होता है। तने की अग्र सिरे पर कलिकाएँ (Buds) पायी जाती हैं, जिनसे तना वृद्धि करता है।

    तने की विशेषताएं (Characteristics of stem):

    • तना पौधे को दृढ़ता प्रदान करता है, जो तना में उपस्थित जाइलम तथा दृढ़ोत्तक (soloronchyma) के कारण होता है।
    • यह शाखाओं, पत्तियों एवं पुष्पों को जन्म देता है।
    • यह जड़ों द्वारा अवशोपित जल और खनिज लवणों को अन्य भागों तक तथा पत्तियों में संश्लेपित भोजन को जड़ सहित अन्य भागों तक पहुँचाता है।
    • तनों में निश्चित पर्वसन्धियाँ (nodes) तथा पर्व (inter-nodes) होते है। शाखाएँ एवं पत्तियाँ सामान्यतया पर्वसन्धियों से ही निकलता है।
    • तना जड़ों की भाँति खाद्य संग्रह भी करती है। जैसे-आलू, हल्दी, अदरक, गन्ना आदि। तना धनात्मक प्रकाशानुवर्ती तथा ऋणात्मक गुरुत्वानुवव्रती होता है ।

    एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री तने में अन्तर

    एकबीजपत्री तनाद्विबीजपत्री तना
    इसमें कैम्बियम नहीं पाया जाता। फलतः द्वितीयक वृद्धि का अभाव होता है।इसमें कैम्बियम पाया जाता है, इसलिए द्वितीयक वृद्धि भी पाई जाती है।
    मज्जा (pith) अनुपस्थित होता है।मज्जा उपस्थित होता है।
    इसकी एपीडर्मिस पर रोम नहीं पाए जाते।इसकी एपीडर्मिस पर रोम पाए जाते हैं।
    इसकी हाइपोडर्मिस स्क्लेरेन्काइमा की बनी होती हैं।इसकी हाइपोडर्मिस कोलेन्काइमा की बनी होती है।
    इसमें संवहन बण्डल बन्द प्रकार के होते हैं।इसमें संवहन बण्डल खुलै प्रकार के होते हैं।
    इसमें मज्जा किरणे नहीं पाई जाती हैं।इसमें मज्जा किरणें पाई जाती हैं।

    तने के विभिन्न प्रकार (Type of Plant Stem)

    भूमि की स्थिति के अनुसार तने के तीन प्रकार होते है जो निम्न है :

    1. भूमिगत तना (Underground Stem)

    भूमिगत तना पौधे के तने का वह भाग जो भूमि के अंदर पाया जाता है । भूमिगत तने में पर्व सन्धियाँ, पर्ण कलिकाएँ तथा शल्क पत्र पाये जाते हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में भूमिगत तने भोजन संग्रह करने के कारण मोटा एवं मांसल हो जाता है।

    जैसे- हल्दी, अदरक, केला, फर्न, आलू, प्याज, लहसुन, कचालू, जिमीकन्द, अरबी आदि।

    भूमिगत तने का रूपान्तरण (Modifications of underground stem)

    भूमिगत तने के चार प्रकार होते हैं जो निम्न है :

    (i) प्रकन्द (Rhizorne): 

    यह मोटा, फैला हुआ भूमिगत तना होता है। इसमें कक्षस्थ तथा अग्रस्थ कलिकाएँ भी पायी जाती हैं। यह तना शाखारहित या शाखायुक्त हो सकता है। कभी-कभी इसमें अपस्थानिक जड़ (Adventitious roots) भी विकसित हो जाती है। इनमें स्पष्ट पर्व, पर्व सन्धियाँ तथा शल्क पत्र पाये जाते हैं। इस प्रकार का भूमिगत तना हल्दी, अदरक, केला, फर्न आदि पौधों में पाया जाता है।

    (ii) स्तम्भ कन्द (stem tuber): 

    यह एक प्रकार का भूमिगत तना है। यह भोजन संग्रह करने के कारण शीर्ष पर फ्ल जाता है। इस प्रकार के तने की सतह पर अनेक गड्ढ़े होते हैं, जिन्हें आंखें (eyes) कहते हैं। प्रत्येक आंख एक शल्क पत्र होता है, जो पर्व-सन्धि की स्थिति को दशतिा है तथा प्रसुप्त कलिकाएँ होती हैं। इन्हीं प्रसुप्त कलिकाओं से वायवीय (Aerial) शाखाएँ निकलती हैं जिनके अगले सिरे पर अग्रस्थ कलिका होती है जो कि अनुकूल परिस्थितियों में वृद्धि करके नए पौधे को जन्म देते हैं। इस प्रकार का तना आलू में पाया जाता है।

    (iii) शल्क कन्द (Bulb): 

    इस प्रकार का भूमिगत तना बहुत से छोटे-छोटे शल्क पत्रों (scaly leaves) से मिलकर बना होता है। यह शल्क पत्र जल तथा भोजन संग्रह करने के कारण मांसल (fleshy) हो जाते हैं। इस प्रकार के भूमिगत तने की बाहरी परत शुष्क (dry) होती है। यह तना संकेन्द्रीय क्रम में व्यवस्थित शल्क पत्र लिये हुए पाये जाते हैं। प्याज (Onion) तथा लहसुन (Garlic) इस प्रकार के भूमिगत तने का उत्तम उदाहरण है।

    (iv) घनकन्द (Corm): 

    इस प्रकार का भूमिगत तन प्रकन्द (Rhizome) का संघनित रूप है। यह भूमि के नीचे उर्ध्व दिशा में वृद्धि करता है। इसमें अधिक मात्रा में भोजन संचित हो जाता है। शल्क पत्रों के कक्षा में कलिकाएँ पायी जाती हैं जबकि इसके आधार से अपस्थानिक जड़ें निकलती हैं। कचालू एवं जिमीकन्द में इस प्रकार का भूमिगत तना देखने को मिलता है।

    2. अर्द्धवायवीय तना (Sub Aerial Stem):

    जब तने का कुछ भाग भूमि के अन्दर तथा कुछ भाग भूमि के बाहर वायु में पाया जाता है, तब इस प्रकार के तने की अर्द्धवायवीय तना कहते हैं। जैसे – दूब घास, मर्सीलिया, पैसीफ्लोरा, अरुई, जलकुम्भी, समुद्री सोख, गुलदाऊदी, पिपरमिन्ट आदि।

    अर्द्धवायवीय तने में कायिक जनन के लिए कलिकाएँ पायी जाती हैं, जिनसे पार्श्व शाखाओं (Lateral branches) की उत्पत्ति होती है।

    अर्द्धवायवीय तने का रूपान्तरण (Modification of sub aerial stem):

    अर्द्धवायवीय तने के चार प्रकार होते हैं जो निम्न है :

    (i) उपरिभूस्तरी (Runner)-

    यह भूमि की सतह के समानान्तर फैला हुआ अर्द्धवायवीय तना है। इस प्रकार के तने में लम्बे एवं पतले पर्व (Inter nodes) पाये जाते हैं। पर्वसन्धियों से ऊपर की ओर शाखाएँ एवं तना तथा भूमि के अन्दर अपस्थानिक जड़ें निकलती हैं दूब घास, मर्सीलिया आदि में उपरिभूस्तरी तना पाया जाता है।

    (ii) भूस्तरी (Stolon): 

    इस प्रकार का अर्द्धवायवीय तना भूमि के अन्दर क्षैतिज दिशा में वृद्धि करता है। इस प्रकार के तने पर पर्व (Internode) तथा पर्व सन्धियाँ (Nodes) पाये जाते हैं। पर्व सन्धियों से नीचे की ओर अपस्थानिक जड़ें तथा ऊपर की ओर शाखाएँ विकसित होती हैं। अरुई तथा पैसीफ्लोरा में इस प्रकार का अर्द्धवायवीय तना पाया जाता है।

    (iii) भूस्तारिका (offset): 

    इस प्रकार का अर्द्ध वायवीय तना उपरिभूस्तरी (Runner) की तरह ही होता है, परन्तु इनके पर्व (nodes) मोटे तथा छोटे होते हैं। पर्व सन्धियों से ऊपर पतियाँ एक स्वतंत्र पौधे की भाँति होती है। जलकुम्भी भूस्तारिका का अच्छा उदाहरण है।

    (iv) अन्तः भूस्तरी (suckers):

    इस प्रकार के अर्द्धवायवीय तने में भूस्तरी (stolon) तने की तरह एक पार्श्व शाखा होती है, परन्तु यह ऊपर की ओर तिरछा बढ़ता है और एक नए पौधे को जन्म देता है। यह भूस्तरी (stolon) की तुलना में छोटा होता है। इस प्रकार का अर्द्धवायवीय तना गुलदाऊदी, पिपरमिण्ट आदि में देखने को मिलता है।

    3. वायवीय तना (Aerial stem): 

    जब सम्पूर्ण तना भूमि के ऊपर स्थित होता है, तो ऐसे तने को वायवीय तना कहते हैं। इस प्रकार के तने में शाखाएँ, पत्तियाँ, पर्व, पर्वसन्धियाँ, कलिकाएँ, फल, फूल सभी पाये जाते हैं। उदाहरण- गुलाब, अंगूर, नागफनी, रस्कस, कोकोलोवा आदि।

    वायवीय तने का रूपांतरण (Modification of Aerial Stem):

    वायवीय तने के पांच प्रकार होते हैं जो निम्न है :

    (i) कटक स्तम्भ (stem thorn): 

    इस प्रकार के तने में कक्षस्थ कलिकाएँ काँटे (thorn) के रूप में परिवर्तित हो जाती हैं। इन काँटों पर पत्ती, शाखा एवं पुष्प विकसित होते हैं। नींबू, वोगेनविलिया आदि पौधों में कटक स्तम्भ पाये जाते हैं।

    (ii) स्तम्भ प्रतान (stem tendril): 

    इस प्रकार के तने में पत्तियों के कक्ष से निकली शाखा बनाने वाली कलिका एक कुण्डलित, तन्तु बना लेती है जो कमजोर तने वाले पौधों के आरोहण में सहायता करती है। यह तन्तु (Filament) ही स्तम्भ प्रतान कहलाता है। अंगूर तथा कुकुरबिटेसी कुल के पौधों में स्तम्भ प्रतान पाया जाता है।

    (iii) पर्णकाय स्तम्भ (Phyloclade): 

    यह एक हरा, चपटा तथा कभी-कभी गोल-सा तना होता है जो कि पत्तियों की भाँति कार्य करता है। इसकी पत्तियाँ कॉटे रूपी संरचना में परिवर्तित हो जाती हैं। यह रूपान्तरण पौधों से होने वाले जल हानि को रोकता है। पर्णकाय स्तम्भ अनिश्चित वृद्धि वाले शाखा से विकसित होता है। नागफनी (Opuntia) तथा केजुराइना (Casurina) पर्णकाय स्तम्भ का उत्तम उदाहरण है।

    (iv) पर्णाभ पर्त (Cladode): 

    कुछ पौधों की पर्त सन्धियाँ से छोटी, हरी, बेलनाकार अथवा चपटी शाखाएँ निकलती हैं। इस प्रकार की शाखाएँ पत्तियों के कक्ष से निकलती हैं, जो स्वयं शल्क पत्र (scaly leaves) में रूपांतरित हो जाती हैं। ऐसा रूपांतरण पौधों में वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करने के उद्देश्य से होता है। प्रकाश संश्लेषण की क्रिया हरे तने एवं उसकी शाखाओं के द्वारा सम्पादित होती है। तनों के इस प्रकार के रूपान्तरण को पर्णाभ पर्व (Cladode) कहते हैं। सतावर (Asparagus), रस्कस (Ruscus) पणभि पर्व का सुन्दर उदाहरण हैं।

    (v) पत्र प्रकलिका (Bulbil): 

    कुछ पौधों की कक्षस्थ एवं पुष्प कलिकाएँ विशेष छोटे आकार की रचना में रूपांतरित हो जाती हैं, जिन्हें पत्र-प्रकलिका (Bulbil) कहते हैं। ये पत्र-प्रकलिका अपने मातृ पौधे (Mother plant) से अलग होकर मिट्टी में गिर जाती हैं तथा अनुकूल परिस्थितियों में विकसित होकर नए पौधों को जन्म देती हैं। अलोय (Aloe), अगेव (Agave) आदि पौधों में पत्र-प्रकलिका देखने को मिलता है।



  • जड़ (Root) किसे कहते है, जड़ के प्रकार, विशेषताएँ तथा कार्य (what is root,  its type and function) मूसला जड़ एवं अपस्थानिक जड़ें

    जड़ (Root) किसे कहते है, जड़ के प्रकार, विशेषताएँ तथा कार्य (what is root, its type and function) मूसला जड़ एवं अपस्थानिक जड़ें

    जड़ (Root) मूलांकुर (radicle) से निर्मित विभिन्न शाखाओं में फैलकर, भूमि के अन्दर प्रकाश से दूर (negatively phototropic), जल की तलाश में, गुरुत्व की ओर वृद्धि करता है। जड़ें मृदा से जल एवं विभिन्न प्रकार के खनिज लवणों का अवशोषण करते हैं।

    जड़ पौधे का वह भाग है जो बीजों के अंकुरण के समय मूलांकर (Radicle) से विकसित होता है और प्रकाश के विपरीत (negatively phototropic) लेकिन जल एवं भूमि की तरफ बढ़ता है |

    जड़ें मृदा से जल एवं विभिन्न प्रकार के खनिज लवणों का अवशोषण करते हैं।

    मूलांकुर से विकसित प्रथम जड़ प्राथमिक जड़, जबकि सभी शाखाएँ द्वितीयक जड़ कहलाते हैं। जड़ो में एककोशिकीय मूलरोम पाए जाते हैं।

    जड़ों में सन्धियाँ, पर्वसन्धियाँ, पत्तियाँ आदि नहीं पाई जाती है। जडें नकारात्मक प्रकाशानुवर्ती और धनात्मक गुरुत्वानुवर्ती होती हैं।

    जड़ों के प्रकार (Types of Roots)

    सामान्यतः जड़ें दो प्रकार की होती हैं-

    मूसला जड़ (Tap Root )
    अपस्थानिक जड़ (Adventitious Root)

    मूसला जड़ (Tap Root)

    मूसला जड़ वह जड़ है, जिसमें मूलांकुर (Radicle) विकसित होकर एक मुख्य या प्राथमिक जड़ (Primary root) का निर्माण करता है, जो अन्य शाखाओं से मोटी होती है तथा अधिक गहराई तक जाती है। इससे कई शाखाएँ निकलती हैं, जिन्हें द्वितीयक जड़ (Secondary root) कहते हैं।

    द्वितीयक जड़ों से निकलने वाली शाखाओं को तृतीयक जड़ (Tertiary root) कहते हैं।

    इस प्रकार बनी प्राथमिक जड़ तथा इसकी शाखाओं को मूसला जड़ तन्त्र (Tap root system) कहते हैं।

    ऐसी जड़ें द्विबीजपत्री पौधों में पायी जाती हैं तथा भूमि में बहुत गहराई तक वृद्धि करके पौधे को मजबूती से खड़ा रखती हैं। यह जड़, चना, मटर, गाजर, मूली, सरसों, आम, नीम इत्यादि  पौधों में पायी जाती है।

    मूसला जड़ (Tap Root) के प्रकार

    1. तर्कुरूप (Fusiform)
    इस प्रकार की जड़ें बीच से मोटी और किनारों पर पतली होती है जैसे-मूली।

    2. कुम्भी रूप (Napiform)
    ये जड़ें शीर्ष पर मोटी और फूली हुई होती है तथा नीचे की ओर पतली होती है जैसे – शलजम (Turnip), चुकन्दर (Beet) 

    3. शंकु रूप (Conical)
    इस प्रकारी की मूसला जड़े आधार की ओर मोटी तथा नीचे की ओर क्रमशः पतली होती हैं। जैसे-गाजर।

    4. श्वसन मूल (Pneumatophores (न्यूमेटाफ़ोर) root)  – राइजोफोरा (Rhizophora), सुन्दरी (Sundari) आदि पौधे जो दलदली स्थानों पर उगते हैं, में भूमिगत मुख्य जड़ों से विशेष प्रकार की जड़ें निकलती हैं, जिसे न्यूमेटाफोर कहते हैं। ये खूंटी के आकार की होती हैं, जो ऊपर वायु में निकल आती हैं। इनके ऊपर अनेक छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिन्हें न्यूमेथोडस (Pneumathodes) कहते हैं। 

    अपस्थानिक जड़ (Adventitious root or Fibrous root system)

    कुछ पौधों में अकुंरण के कुछ समय बाद मूलांकुर (Redicle) की वृद्धि रुक जाती है और प्रांकुर के आधार या तने की निचली पर्वसन्धियों से रेशे के रूप में जड़ें विकसित हो जाती हैं, उन्हें ही अपस्थानिक या रेशेदार जड़ (Fibrous root) कहते हैं। इस प्रकार से बने जड़ गुच्छ को अपस्थानिक जड़ तन्त्र (Adventitious root system) कहते हैं।

    अपस्थानिक जड़ मूलांकुर की वृद्धि एक जाने के कारण जड़े शाखाओ, तनों के आधारीय भागों तथा पत्तियों में निकलती है। यह प्रायः एकबीजपत्री (monocot plants) पौधों में पाई जाती है जैसे-धान, गेहूँ, मक्का, ज्वार, बाजरा, गन्ना इत्यादि। 

    कुछ द्विबीजपत्री पादकों जैसे बरगद, पान, अमरबेल इत्यादि  में भी अपस्थानिक जड़ें पायी जाती हैं। ये जड़ें भूमि में गहराई तक न जाकर केवल ऊपरी सतह तक फैली होती हैं।

    विभिन्न प्रकार की अपस्थानिक जड़ें

    भोजन संग्रह, पौधों को यांत्रिक सहारा (Mechanical support) प्रदान करने अथवा अन्य विशिष्ट कार्यों को करने के उद्देश्य से अपस्थानिक जड़ें अनेक प्रकार से रूपांतरित हो जाती हैं।

    मूसला तथा अपस्थानिक जड़ों में अन्तर (Difference between Tap root and Adventitious roots)

    मूसला जड़ (Tap root) अपस्थानिक जड़
    मूसला जड़ की प्राथमिक जड़ समाप्त नहीं होती तथा यह क्रमश: पतली होती जाती है। अपस्थानिक जड़ों की प्राथमिक जड़ बनने के तुरन्त बाद समाप्त हो जाती है और प्ररोह के अन्तिम भाग से अनेक रेशेदार जड़ें निकलती हैं।
    यह भूमि के अन्दर गहराई तक जाती है । यह भूमि की ऊपरी सतह पर ही स्थित होती है ।
    यह बीज के मूलांकुर से पैदा होती है। यह पौधे के प्ररोह भाग (वायवीय भाग) से पैदा होती है।
    इसकी प्राथमिक जड़ से अनेक शाखाएँ निकलती हैं। उदाहरण- मटर, चना, अरहर इत्यादि की जड़ें। इसकी प्राथमिक जड़ विलुप्त हो जाती हैं। उदाहरण-गेहूँ, जौ, धान, मक्का इत्यादि की जड़ें ।

    जड़ की विशेषताएँ (Characteristics of root)

    जड़ पौधों के अक्ष का अवरोही (Descending) भाग है, जो मूलांकुर (Radicle) से विकसित होता है।

    जड़ सदैव प्रकाश से दूर भूमि में वृद्धि करती है।

    भूमि में रहने के कारण ही जड़ों का रंग सफेद अथवा मटमैला होता है।

    जड़ों पर तनों के समान पर्व (Nodes) एवं पर्व सन्धियाँ (Internodes) नहीं पायी जाती है।

    जड़ों पर पत्र एवं पुष्प कलिकाएँ भी नहीं होती हैं। अतः ये पतियाँ, पुष्प एवं फल धारण नहीं करती हैं।

    जड़ें सामान्यतः धनात्मक गुरुत्वानुवर्ती (Positive geotropic) तथा ऋणात्मक प्रकाशानुवर्ती (Negative phototropic) होती हैं।

    जड़ का सिरा मूल गोप (Root cap) द्वारा सुरक्षित रहता है।

    जड पर एककोशिकीय रोम (Unicellular hairs) होते हैं।

    जड़ों के कार्य (Functions of Roots)

    जड़ें मूल रोमों की सहायता से जल एवं खनिज लवणों का अवशोषण करते है।

    (जलोद्भिद् में मूल रोमों का अभाव होता है) पिस्टिया व लेमना पौधों में मूल गोप की जगह मूल पॉकेट (root pocket) पाया जाता है।

    मूल रोम (Root hairs) तथा जड़ों के कोमल भाग जल और घुलित खनिज लवण का अवशोषण करते हैं।

    यह पौधों को भूमि में स्थिर रखती है।

    कुछ जड़ें अपने अंदर भोज्य पदार्थों का संग्रह करते हैं प्रतिकूल परिस्थितियों में इन संचित भोज्य पदार्थों का पौधों द्वारा उपयोग किया जाता है।

    एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री जड़ में अन्तर

    एकबीजपत्री जड़

    इसमें द्वितीयक वृद्धि नहीं पाई जाती है।

    इसमें पिथ पूर्ण विकसित होता है। 

    परिरम्भ से केवल पार्थ मूलों का निर्माण करती है। 

    इनके संवहन पूल की संख्या सामान्यतया छ: से अधिक होती है। 

    इसमें कैम्बियम का अभाव होता है। ।

    द्विबीजपत्री जड़

    इसमें द्वितीयक वृद्धि पाई जाती है। 

    इसमें पिथ अल्प विकसित होता है। 

    परिरम्भ पार्श्व मूलों तथा द्वितीयक विभज्योतक दोनों का निर्माण करती है।

    इनके संवहन पूल की संख्या सामान्यतया छः से कम होती है।

    इसमें कैम्बियम पाया जाता है।