Category: कैमिस्ट्री

  • प्राकृतिक एस्टर और उसके प्रकार

    Natural esters

    प्राकृतिक एस्टर Renewable प्राकृतिक स्रोतों (natural resources) से बनाए जाते हैं,उदाहरण के लिए MIDEL eN 1204 (रेपसीड/कैनोला) और MIDEL eN 1215 (सोयाबीन)

    तेल व वसा

    तेल व वसा उच्च वसीय अम्लों (Higher fatty acids) व असंतृप्त अम्लों के ग्लिसरॉल के साथ बनने वाले एस्टर हैं। अधिकतर तेल व वसा पामिटिक, स्टिऐरिक, व औलिइक अम्लों में ग्लिसरॉल के मिश्रण के फलस्वरूप बनते है।

    साधारण ताप पर जो ग्लिसराइड ठोस अवस्था में पाये जाते हैं, वसा (Fat) कहलाते हैं व जो ग्लिसराइड द्रव अवस्था में पाये जाते हैं, तेल (Oil) कहलाते हैं।

    तेल व वसा में अंतर उनके गलनांकों के आधार पर भी किया जाता है। इसके अनुसार, जिन ग्लिसराइडों का गलनांक 20°C से कम होता है वे तेल (Oil) कहलाते हैं तथा जिनका गलनांक इससे अधिक होता है, वसा (Fat) कहलाते हैं

    मोम

    तेल और वसा के समान मोम भी प्रकृति में पाया जाने वाला एस्टर है परन्तु यह एस्टर ग्लिसराइड में भिन्न होता है। इसमें उच्च वसीय अम्लों के अणु ग्लिसरॉल के स्थान पर उच्च मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉल से संयुक्त होकर एस्टर बनाते हैं।

    मोम की कुछ महत्त्वपूर्ण किस्में निम्नलिखित हैं

    1. शहद की मक्खी का मोमः इसमें मुख्य रूप से मिरीसिल पामिटेट रहता है।

    2. कार्नोबा मोमः यह ताड़ के पत्तों से प्राप्त किया जाता है। इसमें मिरीसिल सेराटेट होता है।

    3. स्पर्मेटी मोमः यह स्पर्म व्हेल से प्राप्त किया जाता है। इसमें सेटिल पामिटेड रहता है।

    4. पैराफिन मोमः यह उच्च हाइड्रोकार्बनों का मिश्रण होता है। यह पेट्रोलियम से प्राप्त किया जाता है। प्लास्टिकः प्लास्टिक दो प्रकार के होते हैं:

  • साबुन और अपमार्जक (Soap & Detergent) क्या है ?

    साबुन और अपमार्जक (Soap & Detergent) क्या है ?

    What are Soap & Detergent ?

    साबुन (Soap)

    साधारणतः साबुन उच्च वसा-अम्लों (Higher fatty acids) के सोडियम लवण हैं। इन उच्च वसा अम्लों में पामिटिक अम्ल, स्टिएरिक अम्ल तथा ओलेइक अम्ल उल्लेखनीय है। पामिटिक अम्ल में बने साबुन को ‘सोडियम पामिटेट’ कहते हैं।

    अच्छे साबुन की विशेषताएं:

    (1) इसमें मुक्त क्षार उपस्थित नहीं रहना चाहिए।

    (2) यह ऐल्कोहॉल में विलेय होना चाहिए।

    (3) इसमें नमी की उपस्थिति 10% से अधिक नहीं होनी चाहिए।

    (4) प्रयोग करते समय इसको चटकना नहीं चाहिए।

    अपमार्जक (Detergents)

    साबुन द्वारा कपड़ों की धुलाई में अधिक परिश्रम करना पड़ता है तथा कठोर जल के साथ यह कठिनाई और अधिक हो जाती है। इस कठिनाई को दूर करने के लिए रसायनशास्त्रियों ने अनेक प्रयास किए। अंततः वे साबुन से भिन्न प्रकार की सफाई करने वाले पदार्थ के निर्माण में सफल हुए। इस पदार्थ को अपमार्जक अथवा साबुनरहित साबुन कहते हैं

    अपमार्जकों के प्रकार और उनके उदाहरण

    अपमार्जकों के प्रकार उदाहरण
    सोडियम ऐल्किल सल्फेट सोडियम लौरिल सल्फेट 
    चतुष्क अमोनिया लवण ट्राइ मेथिल स्टिऐरिम अमोनिया ब्रोमाइड 
    अंशतः एस्टरीकृत यौगिकपेंटा एरिथ्रटोल मोनोस्टिऐरेट 
    प्रतिस्थापित ऐल्किल सल्फोनेट  सोडियम p-डोडेसिल बेंजीन सल्फोनेट 

  • पेट्रोलियम और गैस के प्रकार

    Type of Petroleum and Gas

    पेट्रोलियम (Petroleum)

    पेट्रोलियम एक प्राकृतिक ईंधन है। यह भू-पर्पटी (Earth’s Crust) के बहुत नीचे अवसादी परतों के बीच पाया जाने वाला संतृप्त हाइड्रोकार्बनों का काले भूर रंग का गाढ़ा तैलीय द्रव है।

    आधुनिक समय में इसकी अत्यधिक महत्ता के कारण ही इसे काला सोना (Black gold), द्रव सोना (Liquid gold), आदि की संज्ञा दी गई। पेट्रोलियम से इसके विभिन्न अवयवों को प्रभाजी आसवन विधि (Fractional distillation method) द्वारा अलग-अलग किया जाता है।

    डीजल (Deisel)

    सिटी डीजल (City Diesel)

    सिटी डीजल को अल्ट्रा लो सल्फर डीजल (USLD-Ultra Low Sulphur Diesel) के नाम से भी जाना जाता है जो कि डीजल का एक अत्यधिक स्वच्छ रूप है। इसके दहन से वायुमंडल में कम प्रदूषण फैलता है क्योंकि इसमें सल्फर की मात्रा काफी कम रहती है।

    हरित डीजल (Green Diesel)

    हरित डीजल या ग्रीन डीजल एक उच्च कोटि का डीजल है जिसे यूरो-4 (Euro-4) मानक की मान्यता प्राप्त है। डीजल की सभी श्रेणियों में यह सबसे अच्छा माना जाता है और वायुमंडलीय प्रदूषण भी अन्य की अपेक्षा काफी कम करता है

    गैस (Gas)

    द्रवित पेट्रोलियम गैस (L.P.G.)

    यह प्रोपेन, ब्यूटेन तथा आइसो ब्यूटेन, आदि हाइड्रोकार्बनों का मिश्रण है एवं घरों में रसोई गैस के रूप में प्रयुक्त होता है। यह प्राकृतिक गैस तथा पेट्रोलियम के प्रभाजी आसवन से प्राप्त होता है। एल.पी.जी. के रिसाव की पहचान के लिए उसमें कुछ दुर्गन्धयुक्त पदार्थ, जैसे—मरकेप्टन, आदि मिला दिया जाता है।

    संपीडित प्राकृतिक गैस (C.N.G.)

    सी.एन.जी. (Compressed Natural Gas) अर्थात् संपीडित प्राकृतिक गैस धरती के भीतर पाये जाने वाले हाइड्रोकार्बनों का मिश्रण है जिसमें 80% से 90% मात्रा मिथेन गैस की होती है। यह गैस पेट्रोल तथा डीजल की तुलना में कार्बन मोनोऑक्साइड 70%, नाइट्रोजन ऑक्साइड 87% और जैविक गैसों का लगभग 89% कम उत्सर्जन करती है।

    गैसोहोल (Gasohol)

    पेट्रोल तथा ऐल्कोहॉल के मिश्रण को ‘गैसोहोल’ कहा जाता है। यह गन्ने के रस से प्राप्त ऐल्कोहॉल को पेट्रोल में मिलाकर प्राप्त किया जाता है। इसमें पेट्रोल और ऐल्कोहॉल की मात्रा क्रमश: 10% और 90% होती है। इसकी खोज ब्राजील में की गई है।

    अपस्फोटन एवं ऑक्टेन संख्या (Knocking and Octane Number)

    कुछ ईंधन ऐसे होते हैं जिनका वायु मिश्रण इंजनों के सिलिण्डर में ज्वलन समय के पहले हो जाता है जिससे ऊष्मा पूर्णतया कार्य में परिवर्तित न होकर धात्विक ध्वनि (Matallic sound) उत्पन्न करने में नष्ट हो जाती है। यही धात्विक ध्वनि अपस्फोटन कहलाती है। ऐसे ईंधन जिनका अपस्फोटन अधिक होता है, उपयोग के लिए अच्छा नहीं माना जाता है।

    अपस्फोटन कम करने के लिए ऐसे ईंधनों में कुछ ऐसे यौगिक मिश्रित कर दिये जाते हैं जिससे इनका अपस्फोटन कम हो जाता है। ऐसे यौगिकों को ही ‘अपस्फोटरोधी यौगिक’ (Anti knocking compound) कहते हैं। किसी ईंधन के अपस्फोटन को ऑक्टेन संख्या (Octane number) के द्वारा व्यक्त किया जाता है। जिस किसी ईंधन का ऑक्टेन संख्या जितनी अधिक होती है, उसका अपस्फोटन उतना ही कम होता है तथा वह उतना ही अच्छा ईंधन माना जाता है

    ईंधन की ऑक्टेन संख्या को बढ़ाने लिए उसमें अपस्फोटनरोधी यौगिक मिलाये जाते हैं। ट्रेटाइथाइल लेड या TEL सबसे अच्छा अपस्फोटनरोधी यौगिक है। BTX (Benzene Toluene xylene) भी एक अच्छा अपस्फोटनरोधी यौगिक है।

    कुछ अन्य महत्वपुर्ण गैस के प्रकार

    आंसु गैस (Tear Gas): आंसु गैस का प्रयोग कभी-कभी अनियंत्रित भीड़ को तीतर-बीतर करने के लिए किया जाता है। इस गैस के मानव नेत्र के सम्पर्क में आने से आंखों में जलन पैदा होती है एवं आंसु टपकने लगते हैं। एल्फा क्लोरो एसीटोफिनॉन, एक्रोलिन, आदि कुछ प्रमुख आंसु गैस है। इसे ग्रीनस में भरकर प्रयोग किया जाता है।

    मस्टर्ड गैस (Mustard Gas): यह एक विषैली गैस है, जिसका प्रयोग प्रथम विश्व युद्ध के समय रासायनिक हथियार के रूप में किया गया था। जब एथिलीन की अभिक्रिया सल्फर मोनोक्लोराइड के साथ करायी जाती है, तो मस्टर्ड गैस प्राप्त होती है। इसमें सरसों तेल (Mustard oil) की तरह झांस (Smell) होती है जिस कारण इसका यह नाम पड़ा। इसकी वाष्प त्वचा पर फफोला पैदा करती है तथा फेफड़ों को अत्यधिक प्रभावित करती है। इसकी वाष्प रबड़ को भी पार कर जाती है।

    ल्यूइसाइट (Lewisite): मस्टर्ड गैस की तरह यह भी एक अत्यंत ही जहरीली गैस है जिसका उपयोग द्वितीय विश्व युद्ध में रासायनिक हथियार (Chemical weapons) के रूप में किया गया था।

    क्लोरोपिक्रिन (Chloropicrin): यह एक विषैली गैस है जिसका प्रयोग युद्ध काल में किया जाता है।

    मिथाइल आइसोसायनेट (Methyl Isocynate): यह एक विषैली गैस है। भोपाल में कीटनाशक दवा बनाने वाली कम्पनी यूनियन कार्बाइड कारखाने से इसी गैस का रिसाव दुर्घटनावश हुआ था जिससे काफी संख्या में लोग प्रभावित हुए थे।

    मार्श गैसः मिथेन को मार्श गैस के नाम से जाना जाता है। यह तालाबों के रूके हुए जल और दलदली स्थानों पर बुलबुलों के रूप में निकलता है। दलदली स्थानों पर नीचे दबी हुई वनस्पति और जैव पदार्थों के जीवाणु विच्छेदन से इसकी उत्पत्ति होती है।

    क्लैथरेट (Clathret): यह समुद्र की तलहटी में भारी मात्रा में जमा ईंधन है जो मूल रूप से पानी के अणुओं में फंसी मिथेन गैस है। इसका उपयोग रेफ्रिजरेटरों में प्रशीतक, वातानुकूलित संयंत्रों, इलेक्ट्रॉनिक उद्योग, ऑप्टिकल उद्योग तथा फार्मेसी उद्योग में व्यापक रूप से होता है।

    गोबर गैस (Gobar Gas): गीले गोबर के सड़ने से ज्वलनशील मिथेन गैस बनती है जो वायु की उपस्थिति में सुगमता से जलती है।

  • कार्बनिक यौगिक और उसके प्रकार क्या है ?

    What is an organic compound and its types ?

    कार्बन के रासायनिक यौगिकों को कार्बनिक यौगिक कहते हैं

    प्रकृति में इनकी संख्या 10 लाख से भी अधिक है। Life सिस्टम में कार्बनिक यौगिकों की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है। इनमें हाइड्रोजन भी रहता है।

    ऐतिहासिक तथा परंपरा गत कारणों से कुछ कार्बन के यौगकों को कार्बनिक यौगिकों की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। इनमें कार्बनडाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड प्रमुख हैं। सभी जैव अणु जैसे कार्बोहाइड्रेट, अमीनो अम्ल, प्रोटीन, आरएनए तथा डीएनए कार्बनिक यौगिक ही हैं।

    कार्बनिक यौगिक एवं प्रकार

    मिथेन

    यह एक कार्बनिक गैस है। इसे ‘मार्श गैस’ के नाम से भी जाना जाता है। प्राकृतिक रूप से यह सब्जियों के विघटन से प्राप्त की जाती है। प्रयोगशाला में यह सोडियम ऐसीटेट को सोडालाइम के साथ गर्म करके प्राप्त किया जाता है। ऐल्युमिनियम कार्बाइड पर जल की प्रतिक्रिया से व्यापारिक स्तर पर मिथेन प्राप्त किया जाता है। यह प्राकृतिक गैस का प्रमुख अवयव है। उसमें यह 90% मात्रा में मौजूद रहता है। हवा के साथ यह विस्फोटक मिश्रण बनाता है जिस कारण कोयले की खानों में प्रायः भयानक विस्फोट हुआ करते हैं। इसका उपयोग गैसीय ईंधन के रूप में, कार्बनिक यौगिकों के निर्माण में, कार्बन ब्लैक बनाने में, हाइड्रोजन के औद्योगिक उत्पादन, आदि में होता है।

    एथीलिन

    इसका उपयोग पॉलीथीन प्लास्टिक बनाने, मस्टर्ड गैस बनाने, निश्चेतक के रूप में, ऑक्सी एथीलिन ज्वाला उत्पन्न करने, आदि में होता है।

    ऐसीटिलीन

    इसका उपयोग प्रकाश उत्पन्न करने, कपूर बनाने, निश्चेतक के रूप में, धातुओं को काटने जोड़ने में, बेजीन के संश्लेषण में, कच्चे फलों को कृत्रिम रूप से पकाने, आदि में होता है। इसकी खोज अमेरिकी वैज्ञानिक विल्सन ने की थी।

    क्लोरो फ्लोरो कार्बन (Chloro Fluoro Carbon)

    सी.एफ.सी. का पूरा नाम क्लोरो फ्लोरो कार्बन (Chloro Fluoro Carbon) होता है। यह क्लोरीन, फ्लोरीन तथा कार्बन परमाणुओं के यौगिकों का संघटन है। यह ओजोन परत के क्षरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सी.एफ.सी. (CFC) को ‘फ्रिऑन’ (Freon) भी कहा जाता है

    इथाइल ऐल्कोहॉल

    यह एक रंगहीन द्रव है जो अत्यधिक ज्वलनशील होता है। इसके पीने से मानव शरीर में उत्तेजना पैदा होती है। इस कारण इसका उपयोग मादक द्रव या शराब (Wine) के रूप में किया जाता है। यह फलों व स्टार्चयुक्त अनाजों से प्राप्त किया जाता है। औद्योगिक दृष्टि से इसका उत्पादन किण्वन विधि द्वारा किया जाता है। इसका उपयोग मोटर व हवाई जहाजों में ईंधन के रूप में, पारदर्शक साबुन बनाने में, इत्र व अन्य सुगन्धित पदार्थ बनाने में, शराब, आदि के निर्माण में किया जाता है।

    मिथाइल ऐल्कोहॉल (Methyl Alcohol)

    यह एक विषैला द्रव होता है। जिसकी गंध शराब की तरह होती है। इसके सेवन से व्यक्ति अंधा हो जाता है तथा अधिक मात्रा में पी लेने से मृत्यु तक भी हो सकती है। जहरीली शराब पीने वाले अधिकांश लोगों की मृत्यु इसी मिथाइल ऐल्कोहॉल के कारण होती है। इसका उपयोग पेट्रोल के साथ मिलाकर ईंधन के रूप में, कृत्रिम रंग बनाने में तथा वार्निश, आदि के विलायक के रूप में होता है।

    इथिलीन ग्लाइकॉल (Ethylene Glycol)

    यह एक डाइहाइड्रिक ऐल्कोहॉल है तथा अपने मीठे स्वाद के कारण इस नाम से पुकारे जाते हैं। ठंडे प्रदेशों में हिमांक कम करने के लिए इसका उपयोग कारों के रेडियेटरों में किया जाता है।

    ग्लिसरौल (Glycerol)

    यह प्रोपेन का ट्राइहाड्रॉक्सी व्युत्पन्न है। इसका व्यापारिक नाम ग्लिसरीन (Glycerine) है। यह मुक्त अवस्था में शक्कर के किण्वन घोल (Fermented sugar solution) तथा रक्त (Blood) में अल्प मात्रा में पाया जाता है। संयुक्त अवस्था में यह वसा तथा वनस्पति तेलों में उच्च कार्बनिक अम्लों के ईस्टर (ग्लिसराइड) के रूप में पाया जाता है। सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल की उपस्थिति में यह सान्द्र नाइट्रिक अम्ल के साथ अभिक्रिया कर ग्लिसरौल ट्राइनाइट्रेट (ट्राइनाइटो) ग्लिसरीन या TNG बनता है। TNG एक शक्तिशाली विस्फोटक है जिसका उपयोग डाइनामाइट (Dynamite) एवं अन्य विस्फोटक बनाने में होता है। ग्लिसरौल का उपयोग पारदर्शक साबुन, जूतों की पॉलिश, छापे की स्याही, शृंगार की सामग्रियां बनाने, अनेक कार्बनिक यौगिकों के बनाने में, शक्तिवर्द्धक दवा बनाने, स्नेहक के रूप में, परिरक्षक के रूप में प्रतिहिमीभूत (Antifreeze), आदि के रूप में होता है।

    डाईथाइल ईथर (Diethyl Ether)

    ईथर श्रेणी के सदस्यों में डाईथाइल ईथर सबसे महत्त्वपूर्ण है। इसे सिर्फ ईथर भी कहा जाता है। इसका उपयोग निश्चेतक (Anaesthetic agent) के रूप में होता है। यह क्लोरोफॉर्म से अच्छा निश्चेतक माना जाता है।

    क्लोरोफॉर्म

    इसकी खोज सर्वप्रथम 1831 में लीबिग ने की। श्वास के साथ इसका वाष्प लेने से बेहोशी होती है। यही कारण है, कि इसका उपयोग निश्चेतक के रूप में होता हैं।

    आयोडोफॉर्म

    यह उर्ध्वपातित होता है। यह एक तीव्र कीटाणुनाशक (Bactericidal) पदार्थ है। अत: जीवाणुनाशक (Antiseptic) की तरह इसका उपयोग दवा में होता है।

    पायरीन

    कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCL) को पायरीन के नाम से जाना जाता है जो बिजली से लगी आग बुझाने के काम आता है।

    यूरिया (Urea)

    यूरिया को सर्वप्रथम 1773 में मूत्र से प्राप्त किया गया था। वोहलर (Wohler) ने 1828 में । इसे अमोनियम सायनेट से प्रयोगशाला में संश्लेषित किया था। यह एक प्रकार का कार्बनिक यौगिक था, जिसे प्रयोगशाला में संश्लेषित किया गया। यूरिया में 46% नाइट्रोजन की मात्रा पायी जाती है। यह एक ठोस रंगहीन, गंधहीन पदार्थ है जो जल में विलेय है। यह जीव जन्तुओं के मूत्र में उपस्थित रहता है। इसका मुख्य उपयोग उर्वरक के रूप में होता है। इसके अतिरिक्त नाइट्रोजन गैस, बेरोनल दवा बनाने में, यूरिया प्लास्टिक बनाने में भी इसका प्रयोग किया जाता है।

    फॉर्मेलीन (Formalin)

    यह एक उत्तम परिरक्षक (Preservatives) के रूप में प्रयुक्त होता है।

    फॉर्मिक अम्ल

    यह लाल चींटी (Red ants) तथा मधुमक्खी में पाया जाता है। सर्वप्रथम यह लाल चींटी को जल के साथ स्रावित करके बनाया गया था, इसी कारण इसे फॉर्मिक अम्ल कहा गया क्योंकि लैटिन (Latin) भाषा में लाल चींटी का नाम फॉर्मिकस (Formicus) है। इसका उपयोग रोगाणुनाशी के रूप में, गठिया रोग की दवा के रूप में, रबड़ उद्योग, चमड़ा उद्योग, कपड़ा उद्योग, आदि में होता है।

    ऐसीटिक अम्ल (Acetic Acid)

    यह अनेक फलों के रसों में मुक्त अवस्था में पाया जाता है। यह विशेष रूप से सिरके (Vinegar) में पाया जाता है। इसे व्यापारिक स्तर पर पाइरोलिग्यिस अम्ल (Pyrolignious acid) से प्राप्त किया जाता है। सेलुलोज ऐसीटेट के रूप में इसका उपयोग फोटोग्राफिक फिल्म तथा रेयान (Rayon) बनाने । में होता है। इसका 4-6% तनु घोल ‘सिरका’ (Vinegar) कहलाता है।

    ऑक्जैलिक अम्ल

    यह पोटैशियम लवण के रूप में प्रायः वनस्पतियों में पाया जाता है। पोटैशियम हाइड्रोजन लवण के रूप में यह ऑक्जैलिस (Oxalis) तथा रूमेक्स (Rumex) परिवार के पौधों में पाया जाता है। कैल्सियम ऑक्जैलेट (Calcium oxalate) के रूप में यह प्रायः पौधों के कोशिकाओं (Cells) में पाया जाता है। थोड़ी मात्रा में यह मूत्र में भी पाया जाता है। मानव गुर्दे (Kidney) में कैल्सियम ऑक्जैलेट के एकत्रित होने के कारण ही पथरी (Stone) की बीमारी पैदा होती है। फेरस ऑक्जैलेट के रूप में इसका उपयोग फोटोग्राफी में होता है। इससे कपड़े में लगे स्याही के धब्बे दूर किये जाते हैं।

    एसीटोऐसटिक अम्ल

    यह एक रंगहीन द्रव है। यह अपघटित होकर एसीटोन व कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित हो जाती हैं। मधुमेह के रोगियों के मूत्र में इसकी अधिकता पायी जाती है।

    साइट्रिक अम्ल

    यह एक मोनोहाइड्रोक्सी अम्ल है जो जल में हाइड्रोजन बंधों के कारण अधिक विलेय परन्तु कार्बनिक विलायकों में अविलेय होता है। यह खट्टे दूध में उपस्थित रहता है। मांसपेशियों में इसी अम्ल के एकत्रित होने के कारण थकावट का अनुभव होता है।

    टार्टरिक अम्ल (Tartaric Acid)

    यह डाइहाइड्रॉक्सी डाइकोर्बेक्सिलिक अम्ल है जो इमली तथा अंगूर में उपस्थित रहता है। इसका उपयोग बैकिंग पाउडर बनाने में किया जाता है।

    बेंजीन (Benzene)

    यह सभी ऐरोमैटिक यौगिकों का जन्मदाता माना जाता है। इसका उपयोग घोलक के रूप में, ऊनी कपड़ों की शुष्क धुलाई में, पेट्रोल के साथ मिलाकर मोटर ईंधन के रूप में, अनेक एरोमैटिक यौगिक के निर्माण में, विस्फोटकों के निर्माण, आदि में होता है।

    नाइट्रोबेंजीन

    इसे मिरबेन का तेल (Oil of Mirbance) भी कहा जाता हैं, इसका उपयोग ट्राइनाइट्रोबेंजीन (TNB) नामक विस्फोटक के निर्माण में होता है।

    ऐनिलीन

    इसका उपयोग रबड़ उद्योग में, औषधियों के निर्माण में तथा अनेक रंजकों (Dyes) के उत्पादन में होता है।

    फिनॉल (Phenol)

    इसे कार्बोलिक अम्ल (Carbolic acid) भी कहा जाता है। इसका उपयोग पिक्रिक अम्ल जा (विस्फोटक), फिनॉल्फथैलीन, बेकेलाइट, सैलोल, एस्प्रीन, सैलिसिलिक अम्ल, आदि के निर्माण में होता है।

    बेन्जल्डिहाइड

    इसका उपयोग स्वादिष्ट मसाला बनाने व रासायनिक क्रियाओं में किया जाता है।

    बेन्जोइक अम्ल (Benzoic Acid)

    इसका प्रयोग खाद्य पदार्थों के संरक्षण में किया जाता है।

    सैलिसिलिक अम्ल (Salicylic Acid)

    इसका उपयोग दर्द निवारक दवाओं के निर्माण में होता है।

    टॉलूईन (Toluene)

    इसका उपयोग टी.एन.टी. (TNT) विस्फोटक के निर्माण में, घोलक के रूप में, शुष्क धुलाई (Dry cleaning) में, सैकरीन (Saccharin) एवं क्लोरामिन-टी (Chloramine-T) नामक दवाओं के निर्माण में तथा पेट्रोल एवं बेंजीन के साथ प्रतिहिमीभूत (Antifreeze) के रूप में होता है।

    सैकरीन (Sachrin)

    चीनी से 550 गुना मीठा होता है जिसका प्रयोग शर्बतों में तथा मधुमेह (डायबिटीज) के रोगियों के लिए चीनी की जगह किया जाता है। इसका भोज्य मान (Caloric value) कुछ भी नहीं होता है।

    नैप्थैलीन (Naphthalene)

    यह एक पॉलीन्यूक्लियर हाइड्रोकार्बन है जिसकी गोलियां कीड़ों को कपड़े से दूर रखने में उपयोगी होती है।

    कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates)

    यह वनस्पतियों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। ये कई प्रकार के होते हैं, जैसे—मोनोसैकराइड, डाइसैकराइड, ट्राइसैकराइड, ऑलिगों सैकराइड। ये तुरन्त ऊर्जा प्रदान करने वाले कार्बनिक यौगिक होते हैं। ग्लूकोज, शर्करा, स्टार्च, आदि कार्बोहाइड्रेट के प्रमुख उदाहरण हैं।

    नियोप्रीन (Neoprene)

    यह 2-क्लोरोब्यूटाडाइन (2-Chirobutadiene) के बहुलीकरण से बनता है इसका उपयोग विद्युत रोधी पदार्थ (Insulating material), विद्युत तार, कनवेयर बेल्ट (Conveyor belt), खनिज तेल ले जाने वाले पाइप बनाने में किया जाता है।

    थाईकॉल

    यह दूसरा कृत्रिम रबर है जो डाइक्लोरो इथेन (Dichloro Ethane) को पॉलीसल्फाइड (Polysulphide) के अभिक्रिया से बनाया जाता है इसका उपयोग खनिज तेल ले जाने वाले पाइप बनाने में, विलायक जमा करने वाला टैंक (Solvent storage tank), आदि बनाने में किया जाता है। थाईकॉल रबर को ऑक्सीजन मुक्त करने वाले रसायनों के साथ मिलाकर रॉकेट इंजनों में ठोस ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है।

    बैकेलाइट (Bakelite)

    यह फिनॉल तथा फॉर्मेल्डिहाइड को सोडियम हाइड्रॉक्साइड की उपस्थिति में गर्म करके प्राप्त किया जाता है। इसका उपयोग रेडियो, टेलीविजन, आदि के केस, बाल्टी, आदि बनाने में किया जाता है l

    पॉलीथीन (Polythene)

    यह एक थर्मोप्लास्टिक है जो एथिलीन के बहुलीकरण से प्राप्त किया जाता है। इसका उपयोग पाइप, तार के ऊपर आवरण, पैकिंग थैलियां, आदि बनाने में किया जाता है।

    रैक्सिन (Rexin)

    यह एक कृत्रिम चमड़ा है। इसका निर्माण सेल्यूलोज नामक वनस्पति से होता है। अच्छे रैक्सिन मोटे केनवास पर पाइरोक्सिलिन का लेप देकर बनाया जाता है।

    टेफ्लॉन (Tefion)

    एथिलीन के चारों हाइड्रोजन परमाणुओं को फ्लोरीन द्वारा प्रतिस्थापित करने पर टेट्राफ्लोरो एथिलीन बनता है जिसके बहुत से अणु बहुलीकृत होकर टेफ्लॉन नामक प्लास्टिक का निर्माण करते हैं, यह एक अदहनशील पदार्थ है। यह एक अत्यंत उपयोगी प्लास्टिक है।

    नियोप्रीन (Neoprene)

    यह एक संश्लिष्ट रबड़ है। प्राकृतिक रबड़ की तरह यह जल्दी जलता नहीं है। इसका उपयोग विद्युत केबल में विद्युत अवरोध पदार्थ के रूप में होता है।

    आंसु गैस (Tear Gas)

    आंसु गैस का प्रयोग कभी-कभी अनियंत्रित भीड़ को तीतर-बीतर करने के लिए किया जाता है। इस गैस के मानव नेत्र के सम्पर्क में आने से आंखों में जलन पैदा होती है एवं आंसु टपकने लगते हैं। एल्फा क्लोरो एसीटोफिनॉन, एक्रोलिन, आदि कुछ प्रमुख आंसु गैस है। इसे ग्रीनस में भरकर प्रयोग किया जाता है।

    मस्टर्ड गैस (Mustard Gas)

    यह एक विषैली गैस है, जिसका प्रयोग प्रथम विश्व युद्ध के समय रासायनिक हथियार के रूप में किया गया था। जब एथिलीन की अभिक्रिया सल्फर मोनोक्लोराइड के साथ करायी जाती है, तो मस्टर्ड गैस प्राप्त होती है। इसमें सरसों तेल (Mustard oil) की तरह झांस (Smell) होती है जिस कारण इसका यह नाम पड़ा। इसकी वाष्प त्वचा पर फफोला पैदा करती है तथा फेफड़ों को अत्यधिक प्रभावित करती है। इसकी वाष्प रबड़ को भी पार कर जाती है।

    ल्यूइसाइट (Lewisite)

    मस्टर्ड गैस की तरह यह भी एक अत्यंत ही जहरीली गैस है जिसका उपयोग द्वितीय विश्व युद्ध में रासायनिक हथियार (Chemical weapons) के रूप में किया गया था।

    क्लोरोपिक्रिन (Chloropicrin)

    यह एक विषैली गैस है जिसका प्रयोग युद्ध काल में किया जाता है।

    मिथाइल आइसोसायनेट (Methyl Isocynate)

    यह एक विषैली गैस है। भोपाल में कीटनाशक दवा बनाने वाली कम्पनी यूनियन कार्बाइड कारखाने से इसी गैस का रिसाव दुर्घटनावश हुआ था जिससे काफी संख्या में लोग प्रभावित हुए थे।

    मार्श गैस

    मिथेन को मार्श गैस के नाम से जाना जाता है। यह तालाबों के रूके हुए जल और दलदली स्थानों पर बुलबुलों के रूप में निकलता है। दलदली स्थानों पर नीचे दबी हुई वनस्पति और जैव पदार्थों के जीवाणु विच्छेदन से इसकी उत्पत्ति होती है।

    क्लैथरेट (Clathret)

    यह समुद्र की तलहटी में भारी मात्रा में जमा ईंधन है जो मूल रूप से पानी के अणुओं में फंसी मिथेन गैस है। इसका उपयोग रेफ्रिजरेटरों में प्रशीतक, वातानुकूलित संयंत्रों, इलेक्ट्रॉनिक उद्योग, ऑप्टिकल उद्योग तथा फार्मेसी उद्योग में व्यापक रूप से होता है।

    गोबर गैस (Gobar Gas): गीले गोबर के सड़ने से ज्वलनशील मिथेन गैस बनती है जो वायु की उपस्थिति में सुगमता से जलती है।

    द्रवीभूत प्राकृतिक गैस (Liquified Natural Gas): द्रवित पेट्रोलियम गैस (LPG) की तरह ही यह प्राकृतिक गैसों का द्रवित रूप है। इसमें मुख्यतया मिथेन रहती है अर्थात् इसका मुख्य संघटक मिथेन है।

    एल.एस.डी. (L.S.D.): इसका पूरा नाम लाइसर्जिक अम्ल डाइथाइलेमाइड है। यह एक भ्रम उत्पन्न करने वाली दवा है।

    एस्पीरिन (Aspirin): एसीटाइल सैलिसिलिक अम्ल को ‘एस्पीरिन’ कहा जाता है। यह एक ज्वरनाशी तथा पीड़ानाशी दवा है।

    पैरल्डिहाइडः इसका उपयोग नींद लाने वाली दवा के रूप में होता है।

    यूरोट्रोपीन: इसका उपयोग मूत्र रोग की दवा के रूप में होता है।  

    क्लोरेटोन: इसका उपयोग पहाड़ी यात्रा या समुद्री यात्रा में चक्कर आने से रोकने की दवा के रूप में होता है।

    गेमेक्सेन: इसका रासायनिक नाम बेंजीन हेक्साक्लोराइड प्राकृतिक स्रोत (Benzen hexachloride या B.H.C.) है। यह एक प्रबल कीटाणुनाशक है।

    क्लोरल: यह एक तैलीय व रंगहीन द्रव है। इसका रासायनिक नाम ट्राइक्लोरोऐसीटल्डिहाइड है। इसका मुख्य उपयोग डी.डी.टी. (D.D.T.) बनाने में किया जाता है।

    डी.डी.टी. (D.D.T.): इसका पूरा नाम डाइक्लोरो डाइफिनाइल टाइक्लोरोइथेन है। यह एक प्रमख कीटाणुनाशक (Germicide) है। इसे क्लोरल से बनाया जाता है।  

  • कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के कार्बनिक यौगिक

    Organic Compounds of Carbon, Hydrogen And Oxygen

    कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के संयोग से अनेक कार्बनिक यौगिकों का निर्माण होता है l

    इन यौगिकों में ऐल्कोहॉल (Alcohols), ईथर (Ethers), एस्टर (Ester), एल्डहाइड (Aldehydes), काटोन काबीनक अम्ल (Carboxylic acids), आदि उल्लेखनीय है।

    ऐल्कोहॉल (Alcohols)

    ये कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से बने सरल यौगिक होते हैं। किसी ऐल्केन से एक या अधिक हाइड्रोजन परमाणुओं को उतने ही हाइड्रॉक्सिल मूलकों द्वारा प्रतिस्थापित करने पर जो यौगिक प्राप्त होते हैं, उन्हें ‘ऐल्कोहॉल’ कहा जाता है

    जिन ऐल्कोहॉल के अणुओं में केवल एक हाइड्रोक्सिल मूलक रहता है, वे ‘मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉल’ कहलाते हैं, जैसे—मिथेनॉल, एथेनॉल, इत्यादि।

    जिन ऐल्कोहॉल अणुओं में दो हाइड्रॉक्सिल मूलक रहते है, वे ‘डाइहाइड्रिक ऐल्कोहॉल’ कहलाते हैं, जैसे—ग्लाइकॉल।

    ऐल्डिहाइड (Aldehydes)

    जिन कार्बनिक यौगिकों में CHO अभिक्रियाशील मूलक उपस्थित रहता है, उन्हें ऐल्डिहाइड कहा जाता है। फॉर्मल्डिहाइड, ऐसीटल्डिहाइड, प्रोपायोनल्डिहाइड, आदि कुछ प्रमुख ऐल्डिहाइड कार्बनिक यौगिक हैं।

    कीटोन (Ketones)

    जिन कार्बनिक यौगिक में >C=0 अभिक्रियाशील मूलक उपस्थित रहता है, उन्हें कीटोन कहा जाता है। ऐसीटोन या डाइमिथाइल कीटोन, मिथाइल इथाइल कीटोन, डाइइथाइल कीटोन, आदि प्रमुख कीटोन है।

    कार्बोक्सिलिक अम्ल

    जिन कार्बनिक यौगिकों में COOH अभिक्रियाशील मूलक उपस्थित होता है, उन्हें ‘कार्बोक्सिलिक अम्ल’ कहा जाता है। फॉर्मिक अम्ल, ऐसीटिक अम्ल, प्रोपायोनिक अम्ल, ब्यूटिरिक अम्ल, आदि कुछ प्रमुख कार्बोक्सिलिक अम्ल हैं।

    एस्टर

    जिन कार्बनिक यौगिकों में COOR अभिक्रियाशील मूलक उपस्थित रहता है, उन्हें एस्टर कहते हैं—मिथाइल फॉर्मेट, इथाइल फॉर्मेट, मिथाइल ऐसीटेड, इथाइल ऐसीटेट, आदि कुछ प्रमुख एस्टर है। कृत्रिम सुगन्धित पदार्थ बनाने में इथाइल एसीटेट का प्रयोग किया जाता है

    ईथर

    जिन कार्बनिक यौगिकों में -0- अभिक्रियाशील मूलक उपस्थित रहता है, उन्हें ‘ईथर’ कहते हैं। डाइमिथाइल ईथर, डाइइथाइल ईथर, आदि कुछ प्रमुख ईथर यौगिक है। डाइइथाइल ईथर का उपयोग निश्चेतक के रूप में किया जाता है, इसे सिर्फ ईथर भी कहा जाता है

  • हाइड्रोकार्बन (Hydrocarbon) क्या है ?

    What is Hydrocarbon ?

    कार्बन एवं हाइड्रोजन के संयोग से बनने वाले कार्बनिक यौगिकों को ‘हाइड्रोकार्बन’ कहा जाता है। पेट्रोलियम हाइड्रोइकार्बन का प्रमुख प्राकृतिक स्रोत है।

    हाइड्रोकार्बन को दो वर्गों में विभाजित किया गया है।

    1. ऐलिफैटिक हाइड्रोकार्बन (Aliphatic hydrocarbons)

    2. ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (Aromatic hydrocarbons)

    खुली श्रृखला वाले हाइड्रोकार्बन को ऐलिफैटिक हाइड्रोकार्बन तथा बन्द श्रृंखला वाले हाइड्रोकार्बन को एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन कहते हैं। एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन में विशेष प्रकार का गंध पाया जाता है जबकि ऐलिफैटिक हाइड्रोकार्बन गंधहीन होता है।

    ऐलिफैटिक हाइड्रोकार्बन को पुनः दो वर्गों में विभाजित किया गया है

    संतृप्त हाइड्रोकार्बन या ऐल्केन या पैराफिन (Saturated Hydrocarbons or Alkane or Paraffin)

    संतृप्त हाइड्रोकार्बन को ‘ऐल्केन’ या ‘पैराफिन’ भी कहा जाता हैपैराफिन एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है—अल्प क्रियाशील। चूंकि संतृप्त हाइड्रोकार्बन की क्रियाशीलता बहुत कम होती है, इसलिए उन्हें पैराफिन कहा जाता है। मिथेन, इथेन, प्रोपेन, ब्यूटेन, पेन्टेन, हेक्सेन, हेप्टेन, ऑक्टेन, नीनेन, डीकेन प्रथम 10 संतृप्त हाइड्रोकार्बन है।

    संतृप्त हाइड्रोकार्बन में उपस्थित सभी कार्बन परमाणु एक-दूसरे के साथ एकल बंधन (Single bond) द्वारा जुड़े रहते है तथा कार्बन परमाणु की शेष संयोजकताएं हाइड्रोजन परमाणुओं द्वारा संतृप्त होती है।

    असंतृप्त हाइड्रोकार्बन

    वैसे ऐलिफैटिक हाइड्रोकार्बन जिनके दो कार्बन परमाणुओं के बीच द्विबंधन (Double bond) अथवा त्रिबंधक (Triple bond) होता है, उन्हें असंतृप्त हाइड्रोजन’ कहते हैं। अंसतृप्त हाइड्रोकार्बन भी दो प्रकार के होते हैं ऐल्कीन या ओलिफिन (Alkene or Olefin) तथा ऐल्काइन (Alkyne)।

  • बहुलीकरण (Polymerisation) क्या है ?

    What is Polymerisation ?

    बहुलीकरण वह रासायनिक प्रतिक्रिया है जिसमें किसी यौगिक के दो या दो से अधिक गुण मिलकर एक बड़े अणु का निर्माण करते हैं इस प्रतिक्रिया के फलस्वरूप बने यौगिक ‘बहुलीकृत यौगिक’ या ‘बहुलक’ कहलाते हैं।

    उदाहरणार्थ, ऐसीटिलीन गैस यदि लाल-तप्त तांबे की नली में प्रवाहित की जाये तो ऐसीटिलीन के तीन अणु बहुलीकृत होकर बेंजीन बनाते हैं।

    बहुलीकरण की विशेषताएं

    1. बहुलीकरण एक उत्क्रमणीय (Reversible) क्रिया है और बहुलक सरलता से आरम्भिक यौगिक में परिणित हो जाता है।

    2. बहुलक यौगिक का अणु-भार आरम्भिक यौगिक के अणु-भार का पूर्ण गुणक होता है।

    3. बहुलीकरण में एक ही प्रकार के अणु परस्पर संयोग करते हैं।

    4. बहुलीकरण में कार्बन परमाणु नया बन्धन नहीं बनाते हैं।

    5. बहुलीकरण में जल, आदि के छोटे अणु मुक्त नहीं होते हैं।

  • रासायनिक अभिक्रियाओं में ऊर्जा परिवर्तन

    Energy change in chemical reactions

    रासायनिक अभिक्रियाएँ सदा ही ऊर्जा परिवर्तन के साथ होती हैं। रासायनिक अभिक्रियाओं में भाग लने वाले अभिकारक अधिक स्थायी निम्न ऊर्जा-स्तर कर लेने की प्रवृत्ति रखते हैं। इसी प्रवृत्ति के कारण रासायनिक अभिक्रियाएँ होती हैं। रासायनिक अभिक्रिया तब होती है जब अभिकारकों की ऊर्जा प्रतिफल की ऊर्जा से अधिक हो।

    उर्जा परिवर्तन के आधार पर रासायनिक अभिक्रियाओं को दो भागों में बांटा जा सकता है।

    उष्माशोषी अभिक्रिया (Endothermic Reaction)

    वे रासायनिक अधिक्रियाएँ जिनमें उष्मा का अवशोषण होता है, ‘उष्माशोषी अभिक्रियाएँ’ कहलाती है

    उदाहरण

    1. नाइट्रोजन एवं ऑक्सीजन के मिश्रण को उच्च ताप (3,000°C) पर गर्म करने से नाइट्रिक ऑक्साइड बनता है। इस अभिक्रिया में काफी मात्रा में ऊर्जा का अवशोषण होता है।

    2. कार्बन और गंधक (सल्फर) परस्पर संयोग कर कार्बन डाइसल्फाइड बनाते हैं। इस अभिक्रिया में भी ऊष्मा का अवशोषण होता है। अत: यह एक ऊष्माशोषी अभिक्रिया है।

    ऊष्माक्षेपी अभिक्रियाएँ (Exothermic Reactions)

    वे रासायनिक अभिक्रियाएँ जिनसे ऊष्मा का उत्सर्जन होता है, ऊष्माक्षेपी अभिक्रियाएँ कहलाती हैं।

    उदाहरण

    1. नाइट्रोजन और हाइड्रोजन के परस्पर संयोग से अमोनिया बनता है तथा इस अभिक्रिया में काफी ऊर्जा मुक्त होती है। अत: अमोनिया का बनना एक ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया है।

    2. कार्बन को हवा में जलाने पर कार्बन डाइऑक्साइड बनता है, इस अभिक्रिया में भी ऊष्मा का अवशोषण होता है जो ‘ऊष्माक्षेपी अभिक्रियाएँ’ कहलाती है।

  • धातु संक्षारण (Metallic Corrosion) क्या है ?

    What is Metallic Corrosion ?

    धातु का संक्षारण एक ऑक्सीकरण-अवकरण अभिक्रिया है जिसके फलस्वरूप धातु वायुमंडल की वायु और नमी से अभिक्रिया करके अवांछनीय पदार्थों में परिवर्तित हो जाती है।

    संक्षारण की प्रक्रिया में उपयोगी धातु नमी की उपस्थिति में वायु के ऑक्सीजन द्वारा ऑक्सीकृत होकर ऑक्साइड एवं हाइड्रॉक्साइड के मिश्रण में बदल जाती है। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है जब तक कि धातु पूर्णत: समाप्त नहीं हो जाती है।

    उदाहरण

    1. लोहे को आर्द्र हवा में छोड़ देने पर कुछ समय के पश्चात् उसकी सतह पर भूरे रंग की परत का बैठ जाना।

    2. ताँबा को बहुत दिनों तक आर्द हवा में छोड़ देने पर कुछ समय के पश्चात् उसकी सतह पर हल्के हरे रंग की मलिन परत का बैठ जाना।

    कुछ धातुएं ऐसी हैं, जिनका संक्षारण नहीं के बराबर होता है। इनमें सोना, प्लेटिनम, आदि प्रमुख है। इसी कारण ये धातुएं उत्तम कोटि की तथा बहुमूल्य होती हैं।

    लोहे में जंग लगना (Rusting of Iron)

    लोहे में जंग लगना धातु संक्षारण का अच्छा उदाहरण है। वायु और नमी की उपस्थिति में लौह धातु का संक्षारण होता है, इससे लोहे की सतह पर फेरिक ऑक्साइड और फेरिक हाइड्रॉक्साइड की रंग की ढीली परत बैठ जाती है। लोहे में जंग लगना एक ऑक्सीकरण अभिक्रिया है।

    धातुओं के संक्षारण के लिए दो शर्तों का होना आवश्यक है:

    1. ऑक्सीजन या वायु की उपस्थिति तथा

    2. वायु में नमी की उपस्थिति।

    गैल्वेनीकरण (Galvanization)

    लौह धातु पर जिंक धातु की परत बैठाने की क्रिया को ‘गैल्वेनीकरण’ कहते हैं। ऐसा लोहा ‘गैल्वेनीकृत लोहा’ (Galvanized iron) कहलाता है।

  • विलयन (Solution) क्या है ?

    What is Solution ?

    विलयन दो या दो से अधिक पदार्थों का एक समाग मिश्रण है, जिसमें किसी निश्चित ताप पर विलेय और विलायक की आपेक्षिक मात्राएं एक निश्चित सीमा तक निरंतर परिवर्तित हो सकती हैं, जैसे नमक का जल में विलयन, चीनी का जल में विलयन, आदि।

    विलयन की विशेषताएं (Characteristics of Solution)

    1. विलयन दो या दो से अधिक पदार्थों का समांग मिश्रण है।

    2. किसी विलयन में विलेय के कणों की त्रिज्या 10-7 सेमी. से कम होती है। अत: इन कणों को सूक्ष्मदर्शी द्वारा भी नहीं देखा जा सकता है।

    3. विलयन में विलेय के कण विलायक में इस प्रकार घुलमिल जाते हैं कि एक का दूसरे से विभेद करना संभव नहीं होता है।

    4. विलयन में उपस्थित विलेय के कण छन्ना पत्र के आर-पार आ जा सकते हैं।

    5. विलयन स्थायी एवं पारदर्शक होता है

    विलेय और विलायक (Solute and Solvent) क्या है ?

    What are Solute and Solvent ?

    विलयन में जो पदार्थ अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में होता है, उसे विलायक कहते हैं तथा जो पदार्थ कम मात्रा में उपस्थित रहता है, उसे विलेय कहते हैं।

    जिस विलायक का डाइइलेक्ट्रिक नियतांक जितना अधिक होता है, वह उतना ही अच्छा विलायक माना जाता है। जल का डाइइलेक्ट्रिक नियतांक का मान अधिक होने के कारण इसे ‘सार्वत्रिक विलायक’ (Universal solvent) कहा जाता है।

    विलायकों के उपयोग

    1. औषधि उद्योग में अनेक औषधियों के निर्माण में।

    2. निर्जल धुलाई में (बेंजीन व पेट्रोल जैसे विलायकों का)।

    3. इत्र निर्माण में।

    4. रंग, रोगन को घोलने में।

    5. अनेक प्रकार के पेय व खाद्य पदार्थों के निर्माण में, आदि।

    विलेयता (Solubility) क्या है ?

    What is Solubility ?

    किसी निश्चित ताप और दाब पर 100 ग्राम विलायक में घुलने वाली विलेय की अधिकतम मात्रा को उस विलेय पदार्थ की उस विलायक में विलेयता कहते हैं।

    विलेयता पर ताप का प्रभाव

    1. सामान्यत: ठोस पदार्थों की विलेयता ताप बढ़ाने से बढ़ती है। लेकिन कुछ ऐसे भी ठोस पदार्थ हैं, जिनकी विलेयता ताप बढ़ाने से घटती है, जैसे—सोडियम सल्फेट, कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड, कैल्सियम साइट्रेट, आदि।

    2. किसी द्रव में गैस की विलेयता ताप बढ़ने से घटती है।

    विलेयता संबंधी प्रमुख तथ्य

    1. अध्रुवीय पदार्थ अध्रुवीय विलायकों में प्रायः विलेय होते हैं, उदाहरणार्थ, ब्रोमीन का कार्बन टेट्राक्लोराइड में घुलना।

    2. अध्रुवीय पदार्थ ध्रुवीय विलायकों में प्रायः अधिक विलेय होते हैं, उदाहरणार्थ, कार्बन टेट्राक्लोराइड जल में बहुत ही कम विलेय होते हैं।

    3. ध्रुवीय पदार्थ ध्रुवीय विलायकों में प्रायः विलेय होते हैं, उदाहरणार्थ, इथाइल ऐल्कोहॉल जल में काफी विलेय होता है।

    4. ध्रुवीय पदार्थ अध्रुवीय विलायकों में अधिक विलेय नहीं होते हैं, उदाहरणार्थ, सोडियम क्लोराइड । कार्बन टेट्राक्लोराइड में अल्प विलेय होता है।

    5. अणुभार में वृद्धि होने से पदार्थों की विलेयता घटती जाती है, उदाहरणार्थ, मिथाइल ऐल्कोहॉल (अणुभार =32) की तुलना में ब्यूटाइल ऐल्कोहॉल (अणुभार = 74) जल में बहुत कम विलेय है।

    कोलॉइड (Colloid)

    यह दो पदार्थों का विषमाग मिश्रण होता है

    • इसमें परिक्षेपित कणों (Dipersed particles) का आकार 10-5 सेमी. और 107 सेमी. के बीच होता है।

    • इसके कणों को नग्न आखों से नहीं देखा जा सकता, बल्कि इन्हें अति सूक्ष्मदर्शी (Ultra microscope) की सहायता से ही देखा जा सकता है।

    • इसके कण छन्ना पत्र के आर-पार आ-जा सकते हैं।

    • यह स्थायी होता है। स्थिर छोड़ देने पर इसके कणों में परिक्षेपण माध्यम से अलग हो जाने की बहुत कम प्रवृत्ति पायी जाती है। उदाहरण: दूध, गोंद, रक्त, स्याही, आदि।

    उदासीन, अम्लीय तथा क्षारीय विलयन

    ऐसा विलयन जिसमें हाइड्रोजन आयनों (HD) और हाइड्रॉक्साइड आयनों (OH) का सांद्रण समान होता है, ‘उदासीन विलयन’ कहलाता है

    ऐसा विलयन जिसमें हाइड्रोजन आयनों (H) का सांद्रण हाइड्रॉक्साइड आयनों (OH) से अधिक होता है, ‘अम्लीय विलयन’ कहलाता है

    ऐसा विलयन जिसमें हाइड्रॉक्साइड आयनों (OH) का सांद्रण हाइड्रोजन आयनों (HP) से अधिक होता है, ‘क्षारीय विलयन’ कहलाता है