Category: कैमिस्ट्री

  • विद्युत अपघट्य एवं विद्युत अनपघट्य क्या है ?

    What are Electrolytes and Non-electrolytes ?

    वे यौगिक जो द्रवित अवस्था या जलीय घोल को अवस्था में विद्युत के चालक होते हैं, विद्युत अपघट्य कहलाते हैं

    जैसे—अम्ल, क्षार और लवण विद्युत अपघट्य होते हैं।

    वे यौगिक जो द्रवित अवस्था या जलीय घोल की अवस्था में विद्युत के अचालक होते हैं, ‘विद्युत अनपघट्य’ कहलाते हैं,

    जैसे—चीनी, यूरिया, क्लोरोफॉर्म, आदि।

    विद्युत अपघटनी सेल (Electrolytic Cell) क्या है ?

    What is Electrolytic Cell ?

    जिस बर्तन में विद्युत अपघट्य का घोल लेकर विद्युत अपघटन की क्रिया सम्पन्न करायी जाती है, उसे विद्युत अपघटनी सेल कहते हैं

    इस सेल में धातु की दो प्लेटें या तार डुबा दिए जाते हैं, जिन्हें इलेक्ट्रोड (Electrode) कहते हैं। ये इलेक्ट्रोड किसी बैटरी के ध्रुवों से जोड़ दिए जाते हैं जो इलेक्ट्रोड बैटरी के धन-ध्रुव से जोड़ा जाता है, उसे कैथोड (Cathode) कहते हैं।

    घोल में विद्युत अपघट्य अंशत: या पूर्णतः विघटित होकर आवेशयुक्त परमाणुओं या मूलकों में टूट जाते हैं, जिन्हें आयन (Ions) कहते हैं। धन आवेशयुक्त आयन को धनायन (Cation) तथा ऋण आवेशयुक्त आयन को ऋणायन (Anion) कहते हैं। विद्युत धारा प्रवाहित करने पर धनायन कैथोड पर और ऋणायन एनोड पर मुक्त होते हैं। कैथोड पर अवकरण (Reduction) तथा एनोड पर ऑक्सीकरण (Oxidation) की प्रतिक्रिया होती है।

    विद्युत अपघटन के उपयोग

    1. विद्युत लेपन में (Electro Plating): निम्न कोटि की धातु को सुरक्षित रखने या उसको आकर्षक बनाने के लिए उस पर एक उच्च कोटि की धातु की एक पतली अस्तर चढ़ाने की क्रिया को विद्युत लेपन’ कहते हैं।

    2. विद्युत मुद्रण में (Electro Typing): मुद्रण उद्योग में काम आने वाले ब्लॉक (Blocks) विद्युत अपघटन विधि से ही तैयार किये जाते हैं।

    3. धातुओं के विद्युत शोधन में (Electro Refining of Metals): कई धातुएं, जैसे ताँबा, चांदी, सोना, इत्यादि विद्युत अपघटन क्रिया द्वारा ही शुद्ध रूप में प्राप्त की जाती हैं।

    4. विद्युत धातुकर्म विज्ञान में (Electrometallurgy): अनेक धातुओं, जैसे—सोडियम, पोटैशियम, ऐलुमिनियम, कैल्सियम, मैग्नीशियम, आदि को उनके यौगिकों का विद्युत अपघटन करके निष्कर्षित किया जाता है।

    5. धातुओं के तुल्यांकी भार ज्ञात करने में।

    6. रासायनिक यौगिकों के निर्माण में: विद्युत अपघटन द्वारा अनेक औषधियां एवं कार्बनिक तथा अकार्बनिक योगिक तैयार किये जाते हैं। उदाहरण के लिए, सोडा, कास्टिक सोडा, हाइड्रोजन परॉक्साइड, क्लोरोफॉर्म, आयडोफार्म, ऐथेन, ऐसीटिलीन, आदि इसी विधि से तैयार किये जाते है।

    गैल्वेनिक सेल क्या है ? (

    गैल्वेनिक सेल वह युक्ति है जिसके द्वारा रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है। उदाहरण के लिए, डेनियल सेल (Daniel cell) एक प्रारूपी गैल्वेनिक सेल है। इस सेल में एक पात्र होता है जिसमें CuSO4, का सान्द्र घोल भरा रहता है और इसमें तांबे की एक छड़ डूबी रहती है, इसके अंदर एक सरन्ध्र पात्र रहता है जिसमें तनु सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4) भरा रहता है और इसमें एक जस्ते की छड़ डूबी रहती है।

    इलेक्ट्रोड (Electrodes)

    प्रत्येक सेल दो भागों का बना होता है। प्रत्येक को अर्द्धसेल (Half cell) या इलेक्ट्रोड (Electrode) कहते हैं। एक इलेक्ट्रोड पर ऑक्सीकरण तथा दूसरे इलेक्ट्रोड पर अवकरण प्रतिक्रिया होती है। जिस इलेक्ट्रोड पर ऑक्सीकरण प्रतिक्रिया होती है, उसको ‘ऐनोड (Anode) तथा जिस इलेक्ट्रोड पर अवरकण प्रतिक्रिया होती है, उसको ‘कैथोड’ कहा जाता है। डेनियल सेल में जस्ता ऐनोड तथा कॉपर कैथोड होता है।

  • दहनशील या ज्वलनशील पदार्थ क्या है ?

    What are Combustible Substances ?

    वे पदार्थ जो जलते हैं, ‘दहनशील या ज्वलनशील पदार्थ कहलाते हैं, जैसे कार्बन, गंधक, मोमबत्ती, मैग्नीशियम, इत्यादि।

    दहन के अपोषक (Non-supporter Combustion)

    जो पदार्थ दहन की क्रिया में सहायक नहीं होते हैं, उन्हें ‘दहन का अपोषक‘ कहते हैं, जैसे कार्बन डाइऑक्साइड l

    रॉकेट ईंधन (Rocket Fuels)

    रॉकेट ईधन को प्रणोदक (Propellants) कहते हैं। रॉकेट के प्रणोदन (Propulsion) के लिए प्रणोदक ऊर्जा प्रदान करते है।

    प्रणोदक वैसे ईंधन हैं, जिनके जलने पर अत्यधिक मात्रा में गैसें एवं ऊर्जा उत्पन्न होती है तथा इनका दहन बहुत तीव्र गति से होता है एवं दहन के पश्चात् कोई अवशेष नहीं बचता है।

    प्रणोदक के दहन के फलस्वरूप उत्पन्न गैसें रॉकेट के पिछले भाग से जेट (Jet) के रूप में बहुत तीव्र गति से बाहर निकलती हैं जिससे रॉकेट का इच्छित दिशा में प्रणोदन होता है।

    प्रणोदक दो प्रकार के होते हैं:

    1. द्रव प्रणोदक (Liquid propellants) तथा 2. ठोस प्रणोदक (Solid propellants) |

    ऐल्कोहॉल, द्रव हाइड्रोजन, द्रव अमोनिया, किरोसिन, हाइड्राजीन, आदि द्रव प्रणोदक के प्रमुख उदाहरण हैं।

    बायो गैस (Bio Gas)

    जानवरों और पेड़ पौधों से प्राप्त व्यर्थ पदार्थ सूक्ष्म जीवों द्वारा जल की उपस्थिति में आसानी से सड़ते हैं और इस प्रक्रिया में मिथेन, कार्बन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन, हाइड्रोजन सल्फाइड, आदि गैसे निकलती हैं। इस गैसीय मिश्रण को बायो गैस कहते हैं।

    इसमें लगभग 65% मिथेन होता है। यह एक उत्तम गैसीय इंधन है। बायो गैस जलने पर धुआं उत्पन्न नहीं करता है, साथ ही साथ इसके जलने से पर्याप्त ऊष्मा प्राप्त होती है l

  • ईंधन (Fuels) क्या है ?

    What is fuels ?

    एक ईंधन कोई भी ऐसी सामग्री है जिसे अन्य पदार्थों के साथ प्रतिक्रिया करने के लिए बनाया जा सकता है ताकि यह ऊर्जा को ऊष्मीय ऊर्जा के रूप में छोड़े या किसी काम के लिए इस्तेमाल किया जा सके।

    ईंधन के प्रकार

    कोल गैस (Coal Gas)

    यह कई दहनशील गैसों का मिश्रण होता है। इसका संघटन कोयले की किस्म और भंजक स्रवण के ताप पर निर्भर करता है। इसकी औसत प्रतिशत रचना इस प्रकार है-हाइड्रोजन-55%, मिथेन-30%, कार्बन मोनोआक्साइड-4%, असंतृप्त हाइड्रोकार्बन-3%, तथा अज्वलनशील अशुद्धियां-8%

    भाप अंगार गैस (Water Gas)

    यह कार्बन मोनोआक्साइड और हाइड्रोजन का आण्विक मिश्रण होता है। इसमें अशुद्धियों के रूप में CO2, H2O और N2, इसे रक्त तप्त कोक पर भाप की धारा प्रवाहित करके प्राप्त किया जाता है। इसका कैलोरी मान प्रोड्यूशर गैस से अधिक होता है। यह अकेले अथवा कोल गैस के साथ मिलकर ईंधन के रूप में प्रयोग में लायी जाती है। यह हाइड्रोजन गैस बनाने के काम आती है जो अमोनिया के औद्योगिक उत्पादन में उपयोगी है। इससे मिथाइल ऐल्कोहॉल भी बनाया जाता हैं।

    वायु अंगार गैस (Producer Gas)

    यह कार्बन मोनोआक्साइड (CO) तथा नाइट्रोजन (N2) का मिश्रण होता है जिसमें आयतनानुसार दो भाग नाइट्रोजन और एक भाग कार्बन-मोनोआक्साइड होता है। इसमें अशुद्धि के रूप में थोड़ा कार्बन डाइऑक्साइड मौजूद रहता है। इसका कैलोरी मान अन्य ईंधनों की तुलना में सबसे कम होता है। यह एक सस्ता ईंधन है जो जलकर उच्च ताप देता है। कांच के निर्माण तथा धातु निष्कर्षण में इसका बहुत उपयोग होता है।

    तेल गैस (Oil Gas)

    यह सरल, संतृप्त एवं असंतृप्त हाइड्रोकार्बन का मिश्रण होता है, जैसे -मिथेन, ऐसीटिलीन, इथिलीन, आदि। यह मिट्टी के तेल (Kerosine oil) या पेट्रोलियम के भंजक स्त्रावण द्वारा तैयार की जाती है। इस गैस में वायु मिलाकर प्रयोगशाला में बर्नर जलाये जाते हैं।

    प्राकृतिक गैस (Natural Gas)

    पेट्रोलियम के कुओं से निकलने वाली गैसों में मुख्य रूप से मिथेन तथा इथेन (क्रमश: 83% एवं 16%) होती है जो ज्वलनशील होने के कारण ईंधन के रूप में प्रयुक्त की जाती है। प्राप्त ऊष्मा की मात्रा के आधार पर प्राकृतिक गैस सर्वश्रेष्ठ ईंधन है। प्राकृतिक गैस तेल के कुओं से भी उपफल (By product) के रूप में प्राप्त किया जाता है। इस गैस का प्रधान अवयव मिथेन (CH) होता है। प्राकृतिक गैस का उपयोग कृत्रिम उर्वरकों के उत्पादन में किया जाता है।

    कोयला (Coal)

    कोयला पृथ्वी के अंदर व्यापक रूप से पाया जाने वाला जीवाश्मीय ईंधन है। इसमें 60-90% मुक्त कार्बन तथा उसके यौगिक के अतिरिक्त नाइट्रोजन, गंधक, लोहा, आदि के यौगिक भी उपस्थित रहते हैं।

    कोयला मुख्यत: 4 प्रकार के होते हैं—पीट (Peat). लिग्नाइट (Lignite), बिटुमिनस (Bituminous) तथा एन्थ्रासाइट (Anthracite)|

    पीट कोयला निर्माण की प्रथम अवस्था होती है। एन्थ्रासाइट सर्वोत्तम किस्म का कोयला होता है, जबकि बिटुमिनस कोयले की सामान्य किस्म है। संसार का अधिकांश कोयला बिटुमिनस किस्म का होता है। लिग्नाइट को भूरा कोयला (Brown coal) कहा जाता है। एन्थ्रासाइट कोयले की अंतिम अवस्था होती है। एन्थासाइट कोयला जलने पर धुआँ नहीं देता है और काफी ऊष्मा उत्पन्न करता है। बिटुमिनस कोयला इंजन में जलाने तथा कोल गैस बनाने में काम आता है। वायु की अनुपस्थिति में कोयले को गर्म करने पर कोक, अलकतरा और कोल गैस प्राप्त होते हैं। इस प्रक्रिया को कोयले का भंजक स्त्रावण’ (Destructive distillation of coal) कहते हैं।

    कच्चे पेट्रोलियम के प्रभाजी आसवन या स्त्रावण द्वारा निम्नलिखित पदार्थ प्राप्त होते हैं ऐस्फाल्ट (Asphalt), स्नेहक तेल (Lubricating oil), पेराफिन मोम (Paraffin was), ईंधन तेल (Fuel oil), डीजल तेल (Diesel oil), मिट्टी का तेल (Kerosine oil), पेट्रोल (Petrol), पेट्रोलियम गैस (Petroleum gas), इत्यादि।

    पेट्रोलियम गैस इथेन, प्रोपन और ब्यूटेन का मिश्रण होता है। इसका मुख्य अवयव नार्मल एवं आइसो ब्यूटेन होता है जो तेजी से जलकर ऊष्मा प्रदान करता है। दाब बढ़ाने पर नार्मल एवं आइसो ब्यूटेन आसानी से द्रवीभूत हो जाता है। अतः द्रव रूप में इसे सिलिंडरों में भरकर द्रवित पेट्रोलियम गैस (Liquified petroleum gas) के नाम से जलावन के लिए उपभोक्ता को दिया जाता है।

  • pH मूल्य (pH Value) क्या है ?

    pH मूल्य (pH Value) क्या है ?

    What is pH Value ?

    pH मूल्य एक संख्या होती है जो पदार्थों की अम्लीयताक्षारीयता को प्रदर्शित करती है। इसका मान हाइड्रोजन आयन (H+) के सांद्रण के व्युत्क्रम के लघुगुणक (Logarithm) के बराबर होता है।

    pH की अवधारणा को पहली बार 1909 में कार्ल्सबर्ग प्रयोगशाला में डेनिश रसायनज्ञ सोरेन पेडर लॉरिट्ज़ सोरेंसन द्वारा पेश किया गया था और इलेक्ट्रोकेमिकल कोशिकाओं (electrochemical cells) के संदर्भ में परिभाषाओं और मापों को समायोजित करने के लिए 1924 में आधुनिक पीएच में बदला गया था।

    pH का मान 0 से 14 के बीच होता है। जिन विलयनों के pH का मान 7 से कम होता है, वे अम्लीय होते है। जिन विलयनों का pH मान 7 से अधिक होता है, वे क्षारीय होते हैंउदासीन विलयनों के pH का मान 7 होता है। pH मूल्य का उपयोग ऐल्कोहॉल, चीनी, कागज, आदि उद्योगों में होता है।

    जलीय घोल (aqueous solutions) का pH मूल्य एक ग्लास इलेक्ट्रोड (glass electrode) और एक pH मीटर, या color-changing indicator से मापा जा सकता है। रसायन विज्ञान, कृषि विज्ञान, चिकित्सा, जल उपचार और कई अन्य अनुप्रयोगों में पीएच के माप महत्वपूर्ण हैं।

  • लवण (Salt) क्या है ?

    लवण (Salt) क्या है ?

    What is Salt ?

    लवण वैसे यौगिक हैं जो अम्ल में विद्यमान विस्थापनशील हाइड्रोजन परमाणुओं के धातु अथवा धातु सदृश आचरण करने वाले मूलक द्वारा पूर्ण या आंशिक रूप से विस्थापित होने पर बनते है। अम्ल और क्षारक (भस्म) की अभिक्रिया के फलस्वरूप जल के साथ बना दूसरा यौगिक ‘लवण’ कहलाता है।

    लवणों का वर्गीकरण

    सामान्य लवण (Normal Salts)

    किसी अम्लीय अणु से हाइड्रोजन परमाणुओं के पूर्णत: स्थानान्तरण द्वारा निर्मित लवण को सामान्य लवण कहते हैं। दूसरे शब्दों में, वे लवण जो अम्लीय हाइड्रोजन परमाणु या हाइड्रॉक्सिल आयन में मुक्त रहते हैं, ‘सामान्य लवण’ कहलाते है, जैसे—Na2SO2, CaSO4, Na3PO4, Na2S, NaCI, KCI, FeCI3, आदि।

    अम्लीय लवण (Acidic Salts)

    वैसे लवण जिसमें एक या एक से अधिक स्थानान्तरण योग्य हाइड्रोजन परमाणु बने रहते हैं, उन्हें ‘अम्लीय लवण’ कहते हैं, जैसे—NaHCO3, NaHSO4, आदि।

    भास्मिक लवण (Basic Salts)

    किसी अम्ल द्वारा भस्म के आंशिक उदासीनीकरण के फलस्वरूप बने हुए लवण को ‘भास्मिक लवण’ कहते हैं, जैसे—Pb(OH)CI, Bi(OH)2NO3 .CuCO3, Cu(OH)2, 2PbCO3, Pb(OH)2, Mg(OH)CI, आदि।

    मिश्रित लवण (Mixed Salts)

    वैसे लवण जिसमें एक से अधिक भास्मिक या अम्लीय मूलक उपस्थित हो, ‘मिश्रित लवण’ कहलाते हैं, जैसे—सोडियम पोटैशियम सल्फेट (NaKSO4), विरंजक चूर्ण [Ca(OCI) CI], आदि।

    द्विक युम्म लवण (Double Salts)

    दो सामान्य लवणों से निर्मित लवण को ‘द्विक या युग्म लवण’ कहते हैं। इसमें रवा जल (Water of crystallisation) भी रहता है। द्विक लवण जल में घुलकर दो प्रकार के धातु आयन निर्गत करते हैं, जैसे मोहर लवण, पोटाश एलम, आदि।

    जटिल लवण (Complex Salt)

    वैसा लवण जिसमें एक जटिल मूलक उपस्थित रहता है और जो घोल में भी अपना पृथक अस्तित्व बनाये रखता है, ‘जटिल लवण’ कहलाता है, जैसे—पोटैशियम फेरोसायनाइड, पोटैशियम मरक्यूरिक आयोडाइड, डाइएमिनो सिल्वर क्लोराइड, आदि।

    लवणों के उपयोग

    1. सोडियम क्लोराइड: मानव आहार का आवश्यक अंग, अचार के परिरक्षण में, मांस एवं मछली के संक्षारण में, अनेक रासायनिक यौगिकों के निर्माण में, आदि।

    2. सोडियम बाइकार्बोनेटः रसोईघरों में पेट की अम्लीयता को कम करने की औषधि के रूप में, बेकिंग पाउडर के रूप में, अग्निशामक यंत्रों में, आदि।

    3. सोडियम कार्बोनेट: कपड़ों की धुलाई में, कांच निर्माण में, कास्टिक सोडा के निर्माण में, अपमार्जक (डिटर्जेण्ट) चूर्ण के निर्माण में, कास्टिक सोडा के निर्माण में, अपमार्जक (डिटर्जेण्ट) चूर्ण के निर्माण में, आदि।

    4. पोटैशियम नाइट्रेटः गन पाउडर बनाने में, आतिशबाजी का सामान बनाने में, कांच उद्योग में, उर्वरक के रूप में, आदि।

    5. कॉपर सल्फेटः कीटाणुनाशक के रूप में, विद्युत लेपन में, रंगाई एवं छपाई में, कॉपर के शुद्धीकरण में, आदि।

    6. पोटाश एलम: जल के शुद्धीकरण में, औषधि निर्माण में, रंगाई में रंग बंधक के रूप में, शरीर के किसी अंग के थोड़ा कट जाने पर खून का बहना रोकने में, चमड़ा उद्योग में, आदि।

  • भस्म (क्षारक) (Bases) क्या है ?

    भस्म (क्षारक) (Bases) क्या है ?

    What is Bases ?

    भस्म धातुओं या धातुओं के सदृश आचारण करने वाले मूलकों के वे यौगिक हैं जो अम्लों से अभिक्रिया करके लवण एवं जल बनाते हैं।

    भस्म के गुण

    1. क्षार स्वाद में तीखा या कड़वा होता है।

    2. क्षार छूने में साबुन जैसा चिकना लगता है।

    3. प्रबल क्षार विद्युत का सुचालक होता है।

    4. अम्ल से प्रतिक्रिया करके लवण तथा जल देता है।

    5. क्षार लाल लिटमस को नीला तथा मिथाइल ऑरन्ज को पीला कर देता है।

    6. क्षार में तेल और गंधक को घुला लेने की क्षमता होती है।

    7. क्षार कार्बनिक पदार्थों को नष्ट कर देते हैं।

    8. क्षार फिनॉल्पथैलीन को गुलाबी कर देता है।

    9. लवण के घोल में डाले जाने पर क्षार प्रायः धातु के हाइड्रॉक्साइड को अवक्षेपित कर देते हैं।

    भस्म या क्षारक दो प्रकार के होते हैं

    1. जल में विलेय भस्म और 2. जल में अविलेय भस्म

    क्षार (Alkali)

    वैसे भस्म जो जल में विलेय होते हैं, क्षार (Alkali) कहलाते हैं, जैसे सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH), पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड (KOH), कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड [Ca(OH)2], अमोनियम हाइड्रॉक्साइड (NH4OH) आदि।

    नोट: सभी क्षार भस्म (क्षारक) होते हैं, लेकिन सभी भस्म क्षार नहीं होते। इसका कारण यह है कि सभी भस्म जल में विलेय नहीं होते हैं।

    जल में अविलेय क्षारक (Water Insoluble Bases)

    जल में अविलेय क्षारक अम्ल के साथ अभिक्रिया करके लवण और जल तो बनाते हैं, परन्तु क्षार के अन्य गुण प्रदर्शित नहीं करते हैं, जैसे—जिंक ऑक्साइड, फेरस ऑक्साइड, फेरिक ऑक्साइड, ऐलुमिनियम ऑक्साइड, कॉपर हाइड्रॉक्साइड तथा फेरस हाइड्रॉक्साइड, आदि।

    भस्मों व क्षारों के उपयोग

    1. कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड: घरों में चूना पोतने में, गारा एवं प्लास्टर बनाने में, ब्लीचिंग पाऊडर (विरंजक चूर्ण) बनाने में, जल को मृदु बनाने में, अम्ल के जलन पर मरहम पट्टी करने में, चमड़े के ऊपर के बाल साफ करने में, मिट्टी की अम्लीयता दूर करने में, आदि।

    2. कास्टिक सोडाः साबुन बनाने में, पेट्रोलियम के शुद्धीकरण में, कपड़ा एवं कागज बनाने में, दवा निर्माण में, घरों एवं कारखानों को साफ करने में, आदि।

    3. पोटैशियम हाइड्रॉक्साइडः प्रयोगशाला में प्रतिकर्मक के रूप में, मुलायम साबुन के निर्माण में, CO2, तथा SO2, जैसे गैसों के अवशोषक के रूप में, आदि।

    4. कैल्सियम ऑक्साइड: मकान बनाने में, गारे के रूप में, कास्टिक सोडा के निर्माण में, सोडियम कार्बोनेट के निर्माण में, ब्लीचिंग पाउडर के निर्माण में, आदि।

    5. मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइडः पेट की अम्लीयता को दूर करने में, अम्ल विषाक्तीकरण (Poisoning) के एण्टीडोट (Antidote) के रूप में, चीनी उद्योग में मोलासिस से चीनी तैयार करने में, आदि।

    6. मैग्नीशियम ऑक्साइडः औषधि निर्माण में, रबड़ पूरक के रूप में, बायलरों के प्रयोग में, आदि।

    नोटः भस्म या क्षार का pH मान 7 से अधिक होता है।

  • अम्ल (Acids) क्या है ?

    अम्ल (Acids) क्या है ?

    What is Acids ?

    अम्ल वे यौगिक पदार्थ हैं जिनमें एक या एक से अधिक विस्थापनशील हाइड्रोजन परमाणु विद्यमान हों तथा जिन्हें अंशत: या पूर्णतः धातुओं या धातुओं के सदृश आचरण करने वाले मूलकों द्वारा विस्थापित करने पर लवण का निर्माण होता हो, जो क्षारक या क्षार से अभिक्रिया कर लवण एवं जल बनाते हों, जिनके जलीय घोल नीले लिटमस को लाल करते हों तथा जो स्वाद में खट्टे हों।

    अम्ल के गुण:

    1. अम्ल स्वाद में खट्टा होता है।

    2. अच्छे एवं प्रबल अम्ल विद्युत के सुचालक होते हैं।

    3. अम्ल धातु से क्रिया करके हाइड्रोजन गैस मुक्त करते हैं।

    4. भस्म एवं क्षार से प्रतिक्रिया करके लवण और जल बनाता है।

    5. नीले लिटमस पत्र तथा मिथाइल ऑरन्ज को लाल कर देता है।

    अम्ल दो प्रकार के होते हैं:

    ऑक्सी अम्ल (Oxy Acids)

    जिन अम्लों में हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन दोनों उपस्थित रहते हैं उन्हें ‘ऑक्सी अम्ल’ कहते हैं, जैसे—सल्फ्यूरिक अम्ल (H.SO), फॉस्फोरिक अम्ल (H.PO), नाइट्रिक अम्ल (HNO.), नाइट्रस अम्ल (HNO,), आदि।

    हाइड्रा अम्ल (Hydra Acids)

    जिन अम्लों में केवल हाइड्रोजन उपस्थित रहता है, ‘हाइड्रा अम्ल’ कहलाता है। हाइड्रा अम्ल में ऑक्सीजन अनुपस्थित होता है, जैसे हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCI), हाइड्रोनोमिक अम्ल (HBr), हाइड्रोआयोडिक अम्ल (HI), हाइड्रोसायनिक अम्ल (HCN), आदि।

    अम्लों के उपयोगः

    1. सल्फ्यूरिक अम्ल का उपयोग: पेट्रोलियम के शोधन में, कई प्रकार के विस्फोट बनाने में, रंग व औषधिया बनाने में संचायक बैटरियों में, आदि।

    2. नाइट्रिक अम्ल का उपयोग: औषधियों के निर्माण में, उर्वरक बनाने में, फोटोग्राफी में, विस्फोटक पदार्थों के निर्माण में, अम्लराज बनाने में, प्रयोगशाला में अभिकर्मक के रूप में, आदि।

    3. हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का उपयोगः प्रयोगशाला में, अभिकर्मक के रूप में, अम्लराज बनाने में, रंग एवं औषधि निर्माण में, आदि।

    4. एसीटिक अम्ल का उपयोगः जीवाणुनाशक के रूप में, सिरका निर्माण में, एसीटोन बनाने में, खट्टे खाद्य पदार्थ बनाने में, आदि।

    5. फार्मिक अम्ल का उपयोग: जीवाणुनाशक के रूप में, फलों को संरक्षित करने में, रबर के स्कंदन में, चमड़ा उद्योग में, आदि।

    6. ऑक्जेलिक अम्ल का उपयोगः फोटोग्राफी में, कपड़ों की छपाई व रंगाई में, चमड़े के विरंजक के रूप में, कपड़े पर स्याही के धब्बे को हटाने में, आदि।

    7. बेंजोइक अम्ल का उपयोगः दवा व खाद्य पदार्थों के संरक्षण में, आदि।

    8. साइट्रिक अम्ल का उपयोग: धातुओं को साफ करने में, खाद्य पदार्थों व दवाओं के निर्माण में, कपडा उद्योग में, आदि।

    नोटः अम्ल का pH मान 7 से कम होता है

    बफर विलयन (Buffer Solution)

    वह विलयन जो कि अम्ल या क्षार की साधारण मात्राओं को अपनी प्रभावी अम्लता या क्षारता में पर्याप्त परिवर्तन किए बिना अवशोषित कर लेता है, ‘बफर विलयन’ कहलाता है, जैसे सोडियम ऐसीटेट तथा ऐसीटिक एसिड का मिश्रण एक प्रभावी बफर विलयन है, जब उसे पानी में विलीन किया जाता है। जिस विलयन में बफर विलयन अंतर्विष्ट होता है, वह अत्यधिक मंद अम्ल के रूप में कार्य करता है।

    कार्बनिक अम्लों के प्राकृतिक स्रोत
    अम्लप्राकृतिक स्रोत
    फार्मिक अम्ल लाल चीटियों में
    साइट्रिक अम्ल खट्टे फलों में
    बेन्जोइक अम्ल घास, पत्ते एवं मूत्र में
    ऑक्जेलिक अम्ल सारेल का वृक्ष
    एसोटिक अम्ल फलों के रसों में
    टारटेरिक अम्ल इमली में
    लैक्टिक अम्ल दूध में
    ग्लूटेमिक अम्ल गेहूँ में
  • ऑक्सीकारण – अवकरण क्या है ?

    ऑक्सीकारण – अवकरण क्या है ?

    What are Oxidation and Reduction ?

    ऑक्सीकारक

    जिस पदार्थ का ऑक्सीकरण होता है, वह अवकारक (Reducing agent) कहलाता है तथा जिस पदार्थ का अवकरण होता है, वह ‘ऑक्सीकारक’ (Oxidising agent) कहलाता है।

    ऑक्सीकारक वे पदार्थ होते हैं जो इलेक्ट्रॉन ग्रहण करते हैं तथा अवकारक वे पदार्थ होते हैं जो इलेक्ट्रॉन त्याग करते हैं।

    अपचयन (Reduction)

    अपचयन वह रासायनिक प्रक्रिया है जिसके फलस्वरूप किसी तत्व या यौगिक में विद्युत धनात्मक परमाणुओं या मूलकों का अनुपात बढ़ जाता है अथवा किसी यौगिक में विद्युत ऋणात्मक परमाणुओं या मूलकों का अनुपात कम हो जाता है।

    आयनिक सिद्धान्त के आधार पर ऑक्सीकरण एवं अवकरण की परिभाषा

    ऑक्सीकरण (Oxidation): ऑक्सीकरण वह प्रक्रिया है जिसके फलस्वरूप किसी आयन पर धन आवेश बढ़ जाता है या ऋण आवेश कम हो जाता है। उदाहरण: फेरस क्लोराइड (FeCI2) से फेरिक क्लोराइड (FeCI3) के बनने में फेरस आयन (Fe++) बदलकर फेरिक आयन (Fe+++) हो जाता है अर्थात् लोहे के आयन पर धन आवेश बढ़ जाता है।

    अपचयन (Reduction): अपचयन वह रासायनिक प्रक्रिया है जिसके फलस्वरूप किसी आयन पर धन आवेश घट जाता है या ऋण आवेश बढ़ जाता है।

    ऑक्सीकारक एवं अवकारक पदार्थ (Oxidising and Reducing Agent)

    ऑक्सीकारक’ (Oxidising agent)

    जिस पदार्थ का ऑक्सीकरण होता है, वह अवकारक (Reducing agent) कहलाता है तथा जिस पदार्थ का अवकरण होता है, वह ‘ऑक्सीकारक’ (Oxidising agent) कहलाता है।

    ऑक्सीकारक वे पदार्थ होते हैं जो इलेक्ट्रॉन ग्रहण करते हैं तथा अवकारक वे पदार्थ होते हैं जो इलेक्ट्रॉन त्याग करते हैं

    कुछ मुख्य ऑक्सीकारक पदार्थ निम्न हैं: ऑक्सीजन (O2), ओजोन (O3), हाइड्रोजन परऑक्साइड (H2O2), नाइट्रिक अम्ल (HNO3), क्लोरीन (CI2), पोटैशियम परमैंगनेट (KMnO4), पोटैशियम डाइक्रोमेट (K2Cr2O7), लेड ऑक्साइड (PbO2) आदि।

    कुछ मुख्य अवकारक पदार्थ के उदाहरण हैं: हाइड्रोजन (H2), हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S), कार्बन मोनोआक्साइड (CO), सल्फर डाइऑक्साइड (SO2), कार्बन (C), हाइड्रोजन अम्ल (HI), स्टैनस क्लोराइड (SnCI2) आदि।

    ऑक्सीकारक एवं अवकारक दोनों की तरह व्यवहार करने वाले पदार्थः हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S), हाइड्रोजन पर ऑक्साइड (H2O2), सल्फर डाइऑक्साइड (SO2), नाइट्रस अम्ल (HNO2), आदि।

    ऑक्सीकारक वह पदार्थ है जो किसी दूसरे पदार्थ की ऑक्सीकरण संख्या को बढ़ा देता है जबकि अवकारक वह पदार्थ है जो किसी दूसरे पदार्थ की ऑक्सीकरण संख्या को घटा देता है। जिस पदार्थ की ऑक्सीकरण संख्या बढ़ती है, वह अवकृत होता है अर्थात् वह ऑक्सीकारक (Oxidising agent) है

  • रासायनिक बंधन (Chemical Bonding) क्या है ?

    रासायनिक बंधन (Chemical Bonding) क्या है ?

    What is Chemical Bonding ?

    किसी अणु में उपस्थित अवयवी परमाणुओं को परस्पर बांधकर अणु को विशेष ज्यामितीय आकार में रखने वाले बल को रासायनिक बंधन कहते हैं।

    रासायनिक बंधन मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं

    1. विद्युत संयोजन बंधन या आयनिक बंधन (Electrovalent or lonic Bond)

    जब एक परमाणु से दूसरे परमाणु में इलेक्ट्रॉनों के स्थानान्तरण होने से उन दोनों परमाणुओं के बीच बंधन बनता है, तो उसे ‘विद्युत संयोजन बंधन’ कहते हैं

    इलेक्ट्रॉनों का स्थानांतरण इस प्रकार होता है, कि प्राप्त आयनों की बाह्यतम कक्षाओं की इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था अक्रिय गैसों की भांति स्थायी बन जाती है। उदाहरणार्थ, सोडियम क्लोराइड का बनना।

    सोडियम परमाणु (Na) अपनी बाह्यतम कक्षा के एक इलेक्ट्रॉन का त्याग कर अक्रिय गैस निऑन जैसी स्थायी इलेक्ट्रॉनिक संरचना प्राप्त करता है। क्लोरीन परमाणु (CI) एक इलेक्ट्रॉन प्राप्त कर अक्रिय गैस ऑर्गन जैसे स्थायी इलेक्ट्रॉनिक संरचना प्राप्त करता है। अब Na+ और CIआयनों पर विपरीत आवेशों की उपस्थिति के कारण ये दोनों आयन स्थिर विद्युत आकर्षण बल (Electrostatic force of attraction) द्वारा परस्पर जुड़कर सोडियम क्लोराइड (Na+, CI या NaCI) बनाते हैं।

    विद्युत संयोजन यौगिकों के गुण (Characters of Electrovalent Compounds)

    जिन रासायनिक यौगिक के अणु में विद्युत संयोजन बंधन या आयनिक बंधन रहता है। उन्हें विद्युत संयोजन या आयनिक यौगिक कहते है। जैसे—NaCI, MgCI2, CaO, आदि। विद्युत संयोजनकों में निम्नलिखित गुण पाये जाते हैं:

    (a) विद्युत संयोजन यौगिक या आयनिक यौगिक दो विपरीत आवेशयुक्त आयनों से निर्मित होते हैं, जैसे—Na+CL (b) वैद्यत् संयोजन या आयनिक यौगिकों में विपरीत आवेश वाले आयनों के बीच मजबूत अंतर आणविक विद्युत आकर्षण बल लगने के कारण ये उच्च घनत्व वाले ठोस होते हैं। ये कठोर और भंगुर होते हैं।

    (c) मजबूत अंतर आण्विक विद्युत आकर्षण बल से जुड़े आयनों को एक-दूसरे से पृथक करने में अत्यधिक ऊष्मीय ऊर्जा की आवश्यकता होती हैं इस कारण आयनिक यौगिकों के द्रवणांक और क्वथनांक उच्च होते हैं।

    (d) आयनिक प्रकृति वाले विद्युत संयोजन यौगिक प्रायः ध्रुवीय घोलकों (जल, द्रव, अमोनिया, आदि) में घुलनशील होते हैं, परन्तु कार्बनिक घोलकों (बेंजीन, ईथर, कार्बन टेट्राक्लोराइड, आदि) जो अध्रुवीय होते हैं, में अघुलनशील होते हैं। उदाहरण के लिए, सोडियम क्लोराइड, पोटैशियम आयोडाइड, आदि जल में घुलनशील होते हैं, परन्तु ये बेंजीन, किरोसीन तेल, पेट्रोल, आदि में अघुलनशील होते हैं।

    (e) ठोस अवस्था में आयनिक यौगिकी के अवयवी आयनों के बीच मजबूत आकर्षण बल कार्यरत रहने के कारण इनके आयन एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर गमन नहीं कर सकते हैं। इस कारण ठोस अवस्था में ये यौगिक विद्युत के कुचालक होते हैं।

    (f) आयनिक यौगिकों के अवयवी आयन गलित अवस्था में या जलीय विलयन में आयनीकृत होकर एक-दूसरे के आकर्षण बल में मुक्त हो जाते हैं। इस कारण गलित अवस्था में या जलीय विलयन में ये यौगिक विद्युत के सुचालक होते हैं तथा विद्युत अपघटन होता है।

    (g) विद्युत संयोजन यौगिकी की अभिक्रियाएँ आयनिक प्रकृति की और प्रायः तीव्र गति वाली होती हैं।

    2. सहसंयोजन बंधन (Covalent Bond)

    जब दो परमाणुओं के बीच इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी के फलस्वरूप रासायनिक बंधन बनता है, तब उसे सहसंयोजक बंधन कहते हैं। सहसंयोजन बंधन के बनने में दोनों परमाणु इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी इस प्रकार से करते हैं, कि निर्मित अणु में प्रत्येक परमाणु एक अक्रिय गैस का स्थायी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास प्राप्त कर लेता है।

    दो परमाणुओं के बीच इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी के फलस्वरूप बने रासायनिक यौगिक को ‘सहसंयोजक यौगिक’ कहते हैं। सहसंयोजक यौगिक के निम्नलिखित गुण होते हैं:

    1. अधिकांश सहसंयोजक यौगिक साधारण अवस्था में गैस या द्रव या वाष्पशील ठोस होते हैं।

    2. सहसंयोजक यौगिकों के द्रवणांक और क्वथनांक निम्न होते हैं, इसका कारण यह है, कि इनमें अंतराण्विक बल विद्युत आकर्षण बल की अपेक्षा बहुत कमजोर होते हैं।

    3. सहसंयोजक यैगिक जल में प्राय: अविलेय, परन्तु कार्बनिक विलायकों में विलेय होते हैं।

    4. सहसंयोजक यौगिक द्रवित अवस्था या विलयन की अवस्था में विद्युत के कुचालक होते हैं क्योंकि इन अवस्थाओं में ये आयन उत्पन्न नहीं करते हैं। किन्तु HCI और NH, के जलीय विलयन विद्युत के सुचालक होते हैं, क्योंकि इन विलयनों में आयन उपस्थित होते हैं।

    5. सहसंयोजन यौगिकों के साथ अभिक्रियाएँ प्रायः धीरे-धीरे होती है।

    6. सहसंयोजक यौगिक अणुओं के रूप में रहते हैं।

    इलेक्ट्रॉन की निर्जन जोड़ी

    इलेक्ट्रॉनों का ऐसा जोड़ा जो सहसंयोजन बंधन के बनने में भाग नहीं लेता है। इलेक्ट्रॉन की निर्जन जोड़ी कहलाता है। उदाहरण के लिए, जल (H2O) के बनने में ऑक्सीजन परमाणु के पास दो जोड़े इलेक्ट्रॉन शेष रह जाते हैं, जिनका साझा किसी भी परमाणु के साथ नहीं होता है। इसी प्रकार अमोनिया (NH3) में नाइट्रोजन परमाणु के पास एक जोड़ा इलेक्ट्रॉन शेष रह जाता है।

  • संयोजकता (Valency) क्या है ?

    संयोजकता (Valency) क्या है ?

    What is Valency ?

    तत्वों के परमाणुओं के परस्पर संयोजन करने की क्षमता को ही ‘संयोजकत्ता’ कहते है

    किसी तत्व की संयोजकता उसके परमाणु की बाह्यतम कक्षा में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए, सोडियम परमाणु एक इलेक्ट्रॉन का त्यागकर अक्रिय गैस निऑन जैसी इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था प्राप्त करता है।

    अत: सोडियम (Na) की संयोजकता 1 होती है। इसी प्रकार क्लोरीन परमाणु एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर अक्रिय गैस ऑर्गन जैसी इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था प्राप्त करता है। अत: क्लोरीन की संयोजकता 1 होती है।

    विद्युत संयोजन बंधन या आयनिक बंधन (Electrovalent or lonic Bond)

    जब एक परमाणु से दूसरे परमाणु में इलेक्ट्रॉनों के स्थानान्तरण होने से उन दोनों परमाणुओं के बीच बंधन बनता है, तो उसे ‘विद्युत संयोजन बंधन’ कहते हैं। इलेक्ट्रॉनों का स्थानांतरण इस प्रकार होता है, कि प्राप्त आयनों की बाह्यतम कक्षाओं की इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था अक्रिय गैसों की भांति स्थायी बन जाती है। उदाहरणार्थ, सोडियम क्लोराइड का बनना।

    विद्युत संयोजन (Electrovalent Compounds)

    जिन रासायनिक यौगिक के अणु में विद्युत संयोजन बंधन या आयनिक बंधन रहता है। उन्हें विद्युत संयोजन या आयनिक यौगिक कहते है। जैसे—NaCI, MgCI, CaO, आदि।

    सहसंयोजन बंधन (Covalent Bond)

    जब दो परमाणुओं के बीच इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी के फलस्वरूप रासायनिक बंधन बनता है, तब उसे सहसंयोजक बंधन कहते हैं। सहसंयोजन बंधन के बनने में दोनों परमाणु इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी इस प्रकार से करते हैं, कि निर्मित अणु में प्रत्येक परमाणु एक अक्रिय गैस का स्थायी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास प्राप्त कर लेता है।

    सहसंयोजक यौगिक

    दो परमाणुओं के बीच इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी के फलस्वरूप बने रासायनिक यौगिक को ‘सहसंयोजक यौगिक’ कहते हैं। सहसंयोजक यौगिक साधारण अवस्था में गैस या द्रव या वाष्पशील ठोस होते हैं।