Category: कैमिस्ट्री

  • आयन (Ions) क्या है ?

    आयन (Ions) क्या है ?

    What is Ions ?

    विद्युत आवेशयुक्त परमाणु या परमाणुओं के समूह को आयन कहा जाता है

    उदाहरण के लिए, सोडियम आयन (Na+), मैग्नीशियम आयन (Mg++), क्लोराइड आयन (CT), सल्फेट आयन (SO4), तथा कार्बोनेट आयन (CO3), आदि।

    आयन दो प्रकार के होते हैं

    धनायन (Cation)

    जिस आयन पर धन आवेश (Positive charge) होता है, उसे ‘धनायन’ कहते हैं।

    उदाहरण के लिए, सोडियम आयन (Na+) और मैग्नीशियम आयन (Mg++) धनायन हैं। धन आयन का निर्माण परमाणु से एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों के निकल जाने से होता है।

    सभी धातु तत्वों के आयन धनायन होते हैं। सिर्फ हाइड्रोजन (H+) और अमोनियम आयन (NH4+) अधातु तत्वों के बने होते हैं।

    ऋणायन (Anion)

    जिस आयन पर ऋण आवेश होता है, उसे ऋणायन कहते हैं।

    उदाहरण के लिए, क्लोराइड आयन (CI), ऑक्साइड आयन (O), सल्फेट आयन (SO4), कार्बोनेट आयन (CO3), आदि ऋणायन हैं। ऋणायनों का निर्माण किसी परमाणु द्वारा एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों के ग्रहण करने के कारण होता है।

    सभी अधातुओं के आयन ऋणायन (Anion) होते हैं।

    सामान्यतः धातु तत्वों के परमाणुओं में एक या एक से अधिक इलेक्ट्रॉन त्यागकर धनायन में बदल जाने की प्रवृत्ति के कारण ये विद्युत धनात्मक तत्व कहलाते हैं। इसके विपरीत अधातु तत्वों के परमाणुओं में एक या एक से अधिक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके ऋणायन में बदल जाने की प्रवृत्ति के कारण ये ‘विद्युत ऋणात्मक तत्व’ कहलाते है l

  • अक्रिय गैसों का इलेक्ट्रिॉनिक विन्यास

    अक्रिय गैसों का इलेक्ट्रिॉनिक विन्यास

    Electronic Configurations of Inert Gases

    प्रकृति में पाये जाने वाले अक्रिय गैसों की संख्या 6 है। ये गैसें है—हीलियम (He), निऑन (Ne), ऑर्गन (Ar), क्रिप्टॉन (Kr), जेनॉन (Xe) तथा रेडॉन (Rn)।

    हीलियम (He) को छोड़कर सभी अक्रिय गैसों के परमाणुओं की बाह्यतम कक्षा में 8 इलेक्ट्रॉन होते हैं। परमाणु की बाह्यतम कक्षा में 8 इलेक्ट्रॉनों का समूह सर्वाधिक स्थायी होता है। 8 इलेक्ट्रॉनों के समूह को ‘अष्टक’ (Octet) कहते हैं।

    अक्रिय गैसों को छोड़कर अन्य जितने भी तत्व हैं, उनके परमाणु की बाह्यतम कक्षा अस्थायी होती है, क्योंकि उनमें 8 से कम इलेक्ट्रॉन होते हैं। वे अपनी बाहयतम कक्षा में अपने निकटतम अक्रिय गैस की भांति इलेक्ट्रॉन प्राप्त कर लेने की प्रवृत्ति रखते हैं, ताकि वे स्थायी बन जाये। इसी कारण तत्वों के बीच रासायनिक संयोग होता है।

    रासायनिक बंधन (Chemical Bonding)

    किसी अणु में उपस्थित अवयवी परमाणुओं को परस्पर बांधकर अणु को विशेष ज्यामितीय आकार में रखने वाले बल को रासायनिक बंधन कहते हैं।

    अष्टक पूर्ण करने की प्रक्रिया (Process of Completion of the Octet)

    कोई भी परमाणु अक्रिय गैसों की इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था तीन प्रकार से प्राप्त करता है:

    1. किसी दूसरे परमाणु को अपना एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों का त्याग करके

    2. किसी दूसरे परमाणु से एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों को प्राप्त करके

    3. किसी दूसरे परमाणु के साथ एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों का साझा करके

  • परमाणु रिएक्टर (Atomic Reactor) क्या है ?

    परमाणु रिएक्टर (Atomic Reactor) क्या है ?

    What is Atomic Reactor ?

    वह संयंत्र जिसमें नाभिकीय ऊर्जा को ऊष्मा में परिवर्तित कर विद्युत ऊर्जा प्राप्त की जाती है, ‘परमाणु रिएक्टर या नाभिकीय रिएक्टर’ (Nuclear reactor) कहलाता है, इसमें होने वाली विखंडन श्रृंखला अभिक्रिया नियंत्रित (Controlled) रहती है।

    परमाणु रिएक्टर के मुख्य भाग निम्नलिखित हैं:

    1. कोर (Core)

    2. मंदक (Moderator)

    3. शीतलक (Coolant) तथा

    4. परिरक्षण (Shielding)

    नाभिकीय रिएक्टरों में मंदक के रूप में भारी जल (D2O) तथा ग्रेफाइट का प्रयोग किया जाता है, जबकि शीतलक के रूप में सोडियम और पोटैशियम के द्रवित मिश्रधातु का उपयोग होता है। जब ग्रेफाइट का उपयोग मंदक के रूप में होता है, तब रिएक्टर को परमाणु पाइल (Atomic pile) कहते हैं, किन्तु भारी जल का मंदक के रूप में उपयोग होने पर वह स्वीमिंग पुल रिएक्टर (Swimming pool reactor) कहलाता है।

    नाभिकीय रिएक्टर में यूरेनियम या प्लूटोनियम का उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है, जबकि कैडमियम छड़ का उपयोग नियंत्रक छड़ के रूप में होता है। विश्व का सबसे पहला नाभिकीय रिएक्टर इटली के वैज्ञानिक प्रोफेसर एनरिको फर्मी (Enrico fermi) के निर्देशन में शिकागो विश्वविद्यालय में बनाया गया था

    नाभिकीय रिएक्टर के उपयोग

    1. नाभिकीय रिएक्टर से प्राप्त नाभिकीय ऊर्जा की विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करके विद्युत उत्पादन के लिए विद्युत गृह बनाये जाते हैं।

    2. नाभिकीय रिएक्टर में अनेक प्रकार के रेडियो समस्थानिक उत्पन्न होते हैं, जिनका उपयोग चिकित्सा-विज्ञान, कृषि, रोगों के उपचार, उद्योग-धन्धों, आदि में किये जाते हैं।

  • रेडियोसक्रिय समस्थानिकों की उपयोगिता क्या है ?

    रेडियोसक्रिय समस्थानिकों की उपयोगिता क्या है ?

    Applications of Radio Isotopes ?

    रेडियोसक्रिय समस्थानिक जिसे रेडियोआइसोटोप (Radio Isotopes), रेडियोन्यूक्लाइड (radionuclide), या रेडियोधर्मी न्यूक्लाइड (radioactive nuclide) भी कहा जाता है, एक ही रासायनिक तत्व की कई प्रजातिया होती है जो विभिन्न द्रव्यमानों के साथ, जिनके नाभिक अस्थिर होते हैं और अल्फा, बीटा और गामा किरणों के रूप में विकिरण उत्सर्जित करके अतिरिक्त ऊर्जा को समाप्त कर देते हैं।

    किसी परमाणु के नाभिक में से एक α कण तथा दो β कणों के निकल जाने से प्राप्त होने वाले परमाणु की परमाणु संख्या वही रहती है जो मूल परमाणु की है, लेकिन इसका परमाणु द्रव्यमान मूल परमाणु के द्रव्यमान से 4 इकाई कम हो जाता है अर्थात् मूल परमाणु और नए परमाणु दोनों एक दूसरे के समस्थानिक (Isotopes) होते हैं।

    रेडियोसक्रियता की इकाई (Unit of Radioactivity)

    रेडियोसक्रियता की इकाई को ‘क्यूरी’ (Curie) कहते हैं। किसी रेडियोसक्रिय पदार्थ का वह परिमाण जिसमें प्रति सेकण्ड 3.70 x 1010 विखंडन होते हैं, क्यूरी कहलाता है।

    रेडियो आइसोटोप डेटिंग (Radio Isotope Dating)

    किसी रेडियोसक्रिय समस्थानिक की मात्रा की किसी पत्थर के नमूने, काष्ठ या जैव अवशेष में मापन करके उनके आयु का निर्धारण करना ‘रेडियो आइसोटोप डेटिंग’ (Radio isotope dating) कहलाता है। कार्बन डेटिंग (Carbon dating) रेडियो आइसोटोप डेटिंग का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।

    कार्बन डेटिंग के द्वारा जीवाश्मों, मृत पेड़-पौधों, आदि की आयु का अंकन किया जाता है। निर्जीव वस्तुओं, जैसे—पृथ्वी, पुरानी चट्टानों, आदि की आयु ज्ञात करने के लिए यूरेनियम का प्रयोग किया जाता है। इस यूरेनियम द्वारा आयु अंकन (Dating by uranium) कहते हैं। अधिक पुरानी चट्टानों के लिए पोटैशियम ऑर्गन डेटिंग विधि भी अधिक उपयुक्त सिद्ध हुई है। मृत पेड़-पौधों और जानवरों का आयु निर्धारण उनमें 6C14 और 6C12 का अनुपात ज्ञात करके किया जाता है।

    रेडियोसक्रिय समस्थानिकों की उपयोगिता (Applications of Radio Isotopes)

    1. रेडियोसक्रिय समस्थानिकों का उपयोग मृत पेड़-पौधों, जानवरों तथा पत्थर के पुराने नमूने की आयु ज्ञात करने में किया जाता है। इस विधि को रेडियो आइसोटोप डेटिंग कहते हैं।

    2. रेडियो समस्थानिकों का उपयोग औषधियों में ट्रेसर (Tracer) के रूप में किया जाता है। इस विधि द्वारा मानव शरीर में किसी प्रकार के ट्यूमर का पता लगाया जाता है।

    3. जमीन के अंदर बिछाई गई जल पाइप नालियों, गैस पाइप नालियों तथा तेल पाइप नालियों में किसी प्रकार के छेद या रिसाव का पता लगाने के लिए रेडियोसक्रिय समस्थानिकों का उपयोग होता है।

    4. रेडियोसक्रिय समस्थानिकों का उपयोग पौधों में उर्वरकों की क्रिया जानने में किया जाता है।

    5. रासायनिक अभिक्रियाओं की क्रियाविधि निर्धारण में रेडियोसक्रिय समस्थानिकों का उपयोग किया जाता है l

    6. कैंसर जैसे अनेक रोगों से ग्रस्त कोशिकाओं (Cells) को नष्ट करने में रेडियोसक्रिय समस्थानिकों का उपयोग किया जाता है। उदाहरणार्थ, कोबाल्ट के समस्थानिक Co60 का उपयोग कैंसर के इलाज में तथा मस्तिष्क में विकसित होने वाली ट्यूमर (Tumor) को नष्ट करने में किया जाता है।

    7. रेडियोसक्रिय समस्थानिकों का उपयोग पाचन तंत्र का अध्ययन करने में भी किया जाता है।

    8. रेडियोसक्रिय आयोडीन का उपयोग थायरॉइड ग्रंथि में उत्पन्न विकार ज्ञात करने में किया जाता है।

    9. रेडियोसक्रिय फॉस्फोरस का उपयोग अस्थि रोगों के इलाज में होता है।

    10. रेडियोसक्रिय सोडियम के द्वारा शरीर में रक्त प्रवाह का वेग मापा जाता है।

    11. रेडियोसक्रिय लोहा का उपयोग एनीमिया (अरक्तता) रोग ज्ञात करने में होता है।

    12. रेडियोसक्रिय यूरेनियम (U28) का उपयोग पृथ्वी का आयु निर्धारण में किया जाता है।

    13. कम क्रियाशील रेडियोसक्रिय किरणों का उपयोग अनाज, फल, सब्जियों, आदि के रोगाणुनाशन (Disinfection) में किया जाता है।

  • रेडियोसक्रिय विखंडन क्या है ?

    रेडियोसक्रिय विखंडन क्या है ?

    What is Radioactive Disintegration ?

    रेडियोसक्रिय तत्वों के नाभिक से रेडियोसक्रिय तत्वों के स्वत: उत्सर्जन की प्रक्रिया को रेडियोसक्रिय विखंडन या रेडियोसक्रिय क्षय (Radioactive decay) कहा जाता है

    चूंकि यह क्रिया स्वाभाविक रूप से स्वत: होती है, अत: इसे प्राकृतिक विखण्डन (Natural disintegration) भी कहते हैं। इस क्रिया में α-, β– और γ– किरणों का उत्सर्जन होता है।

    1913 ई. में सॉडी (Soddy), फॉजान्स (Fajans) तथा रदरफोर्ड (Rutherford) ने रेडियोसक्रिय विखंडन से सम्बन्धित सिद्धांत का प्रतिपादन किया। इसके अनुसार,

    1. रेडियोसक्रिय तत्वों के परमाणु अस्थायी होते हैं जो स्वत: विखडित होकर नये तत्वों में परिवर्तित होते रहते है l

    2. α-कण और β-कण रेडियोसक्रिय तत्व के परमाणु के नाभिक से उत्पन्न होते हैं।

    3. रेडियोसक्रिय परिवर्तन दो प्रकार के होते हैं:

    i.   α परिवर्तनः α कण के निकलने से होने वाले परिवर्तन को ‘α परिवर्तन’ कहते हैं।

    ii.  β परिवर्तनः । कण के निकलने से होने वाले परिवर्तन को ‘β परिवर्तन’ कहते हैं।

    किसी परमाणु नाभिक में एक कण के निकल जाने से प्राप्त होने वाले परमाणु का द्रव्यमान मूल परमाणु के द्रव्यमान से 4 कम हो जाता है और परमाणु संख्या 2 कम हो जाती है।

    किसी परमाणु के नाभिक में से एक α कण तथा दो β कणों के निकल जाने से प्राप्त होने वाले परमाणु की परमाणु संख्या वही रहती है जो मूल परमाणु की है, लेकिन इसका परमाणु द्रव्यमान मूल परमाणु के द्रव्यमान से 4 इकाई कम हो जाता है अर्थात् मूल परमाणु और नए परमाणु दोनों एक दूसरे के समस्थानिक (Isotopes) होते हैं।

    अर्द्धआयु काल (Half Life Period)

    वह समयांतराल जिसमें किसी रेडियोसक्रिय तत्व में उपस्थित परमाणु की संख्या विखंडित होकर प्रारंभिक संख्या की आधी हो जाती है, उस तत्व की अर्द्धआयु काल कहलाता है

    रेडियोसक्रिय पदार्थ की अर्द्धआयु कुछ सेकण्डों से लेकर लाखों वर्षों तक हो सकती है। उदाहरण के लिए, पोलोनियम के एक समस्थानिक (84Po214) की अर्द्धआयु 10.4 सेकण्ड होती है जबकि यूरेनियम के समस्थानिक की अर्द्धआयु 4.5×109 वर्ष होती है।

  • अल्फा-किरण (α-rays), बीटा-किरण (β-rays) तथा गामा-किरण (γ-rays)

    अल्फा-किरण (α-rays), बीटा-किरण (β-rays) तथा गामा-किरण (γ-rays)

    What are Alpha, Beta and Gama rays ?

    अल्फा-किरण (α-rays)

    i. ये किरणे अति सूक्ष्म धन आवेशित कणों की बनी होती हैं। इस कारण विद्युत क्षेत्र से होकर गमन करते समय ये किरणें विद्युत क्षेत्र के ऋण ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं।

    ii. प्रयोग के आधार पर यह पाया गया है, कि α-कण वस्तुत: द्विआवेशयुक्त हीलियम आयन (He++) हैं। इनकी मात्रा हाइड्रोजन परमाणु की मात्रा से चार गुनी अधिक होती है।

    iii. ये कण अत्यंत तीव्र वेग से रेडियोसक्रिय तत्वों के नाभिक से बाहर निकलते हैं। इसका वेग प्रकाश के वेग का लगभग 1/10 भाग होता है

    iv. इन कणों का द्रव्यमान अधिक होने के कारण इनकी गतिज ऊर्जा अधिक होती है।

    v. इन किरणों को किसी गैस से होकर प्रवाहित करने पर ये आयनित कर देती हैं।

    vi. अधिक द्रव्यमान होने के कारण इन किरणों की भेदन क्षमता (Penetrating power) कम होती है। मिमी. मोटी ऐलुमिनियम की एक पत्तर इन्हें रोक सकती है।

    vii. ये किरणे फोटोग्राफिक प्लेट को प्रभावित करती हैं तथा जिंक सल्फाइड या बेरियम प्लैटिनोसायनाइड में स्फुरदीप्ति (Phosphorescence) उत्पन्न करती है।

    viii. ये किरणें जीव कोशिकाओं (Living cells) को नष्ट कर देती हैं

    बीटा-किरण (β-rays)

    i. ये किरणें ऋण आवेशयुक्त अत्यंत सूक्ष्म कणों की बनी होती हैं। इस कारण विद्युत क्षेत्र से होकर गमन करते समय ये किरणें विद्युत क्षेत्र के धन ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं।

    ii. इन कणों के लिए आवेश और द्रव्यमान का अनुपात e/m कैथोड किरणों में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों के समान होता है।

    iii. इन किरणों का द्रव्यमान हाइड्रोजन परमाणु के द्रव्यमान का 1/1840 होता है।

    iv. इन कणों का वेग प्रकाश के वेग का लगभग 9/10 वां भाग होता है अर्थात् इनका वेग α-कण के वेग का नौ गुना होता है।

    v. इनकी गतिज ऊर्जा α-कणों से बहुत कम होती है, क्योंकि इनका द्रव्यमान कम होता है।

    vi. कम गतिज ऊर्जा के कारण इनकी आयतन क्षमता कणों की अपेक्षा कम होती है।

    vii. उच्च वेग और कम द्रव्यमान होने के कारण इनकी भेदन क्षमता (Penetrating power) α कणों से 100 गुनी अधिक होती है। इनको रोकने के लिए 0.01 मीटर मोटी ऐलुमिनियम की चादर आवश्यक होती है।

    viii. इनकी गतिज ऊर्जा कम होने के कारण इन किरणों में जिंक सल्फाइड एवं बेरियम प्लेटिनोसायनाइड जैसे लवणों में स्फुरदीप्ति उत्पन्न करने की क्षमता नहीं के बराबर होती है।

    ix. किसी विद्युत क्षेत्र से होकर गुजरने पर ये धन-ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं, किन्तु किरणों की अपेक्षा इनका विचलन अधिक होता है।

    x. इन किरणों में जीव कोशिकाओं (Living cells) को नष्ट करने की क्षमता होती है

    गामा किरण ( – rays)

    i. ये किरणें विद्युतत: उदासीन होती हैं। इस कारण विद्युत क्षेत्र से होकर गमन करते समय किरणें विचलित नहीं होती हैं।

    ii. ये किरणें अति लघु तरंगदैर्घ्य वाली विद्युत चुम्बकीय तरंग है।

    iii. ये किरणें कणों की नहीं बनी होती हैं।

    iv. इनका वेग प्रकाश के वेग के लगभग बराबर होता है।

    V. इनकी मात्रा शून्य होती है। अत: गामा किरणे अद्रव्य (Non-material) प्राकृतिक वाली होती है।

    vi. अति उच्च वेग से गतिशील होने के कारण गामा किरणों की भेदन क्षमता (Penetrating power) α- और β-किरणों की तुलना में सबसे अधिक होती है।

    vii. इन किरणों का द्रव्यमान नहीं के बराबर होने के कारण इनका फोटाग्राफिक प्लेट एवं जिंक सल्फाइड या बेरियस प्लैटिनोसायनाइड पर प्रभाव बहुत कम पड़ता है।

    viii. इन किरणों में जीव-कोशिकाओं को नष्ट करने की शक्ति होती है

    ix. गतिज ऊर्जा का मान बहुत कम होने के कारण इन किरणों में गैसों को आयनित करने की क्षमता बहुत कम होती है।

  • रेडियोसक्रिय किरणें (Radioactive Rays) क्या है ?

    रेडियोसक्रिय किरणें (Radioactive Rays) क्या है ?

    What is Radioactive Rays ?

    रेडियोसक्रिय पदार्थों से निकलने वाली अदृश्य किरणों को रेडियोसक्रिय किरणें (Radioactive rays) कहते हैं

    रेडियोसक्रिय पदार्थों से निकलने वाली इन किरणों को रदरफोर्ड ने 1902 ई. में चुम्बकीय तथा विद्युत क्षेत्र से प्रवाहित करके पाया कि कुछ किरणों विद्युत क्षेत्र के धन ध्रुव की ओर मुड़ जाती है तथा अन्य किरणों पर चुम्बकीय एवं विद्युत क्षेत्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और ये सीधे गमन करती हुई निकल जाती हैं।

    रदरफोर्ड ने इन किरणों को क्रमश: अल्फा-किरण (α-rays), बीटा-किरण (β-rays) तथा गामा-किरण (γ-rays) कहा

    रेडियोसक्रिय किरणों के गुण

    अल्फा (α) किरणों के गुण

    i. ये किरणे अति सूक्ष्म धन आवेशित कणों की बनी होती हैं। इस कारण विद्युत क्षेत्र से होकर गमन करते समय ये किरणें विद्युत क्षेत्र के ऋण ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं।

    ii. प्रयोग के आधार पर यह पाया गया है, कि α-कण वस्तुत: द्विआवेशयुक्त हीलियम आयन (He++) हैं। इनकी मात्रा हाइड्रोजन परमाणु की मात्रा से चार गुनी अधिक होती है।

    iii. ये कण अत्यंत तीव्र वेग से रेडियोसक्रिय तत्वों के नाभिक से बाहर निकलते हैं। इसका वेग प्रकाश के वेग का लगभग 1/10 भाग होता है।

    iv. इन कणों का द्रव्यमान अधिक होने के कारण इनकी गतिज ऊर्जा अधिक होती है।

    v. इन किरणों को किसी गैस से होकर प्रवाहित करने पर ये आयनित कर देती हैं।

    vi. अधिक द्रव्यमान होने के कारण इन किरणों की भेदन क्षमता (Penetrating power) कम होती है। मिमी. मोटी ऐलुमिनियम की एक पत्तर इन्हें रोक सकती है।

    vii. ये किरणे फोटोग्राफिक प्लेट को प्रभावित करती हैं तथा जिंक सल्फाइड या बेरियम प्लैटिनोसायनाइड में स्फुरदीप्ति (Phosphorescence) उत्पन्न करती है।

    viii. ये किरणें जीव कोशिकाओं (Living cells) को नष्ट कर देती हैं।

    बीटा (β) किरणों के गुण

    i. ये किरणें ऋण आवेशयुक्त अत्यंत सूक्ष्म कणों की बनी होती हैं। इस कारण विद्युत क्षेत्र से होकर गमन करते समय ये किरणें विद्युत क्षेत्र के धन ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं।

    ii. इन कणों के लिए आवेश और द्रव्यमान का अनुपात e/m कैथोड किरणों में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों के समान होता है।

    iii. इन किरणों का द्रव्यमान हाइड्रोजन परमाणु के द्रव्यमान का 1/1840 होता है।

    iv. इन कणों का वेग प्रकाश के वेग का लगभग 9/10 वां भाग होता है अर्थात् इनका वेग α-कण के वेग का नौ गुना होता है।

    v. इनकी गतिज ऊर्जा α-कणों से बहुत कम होती है, क्योंकि इनका द्रव्यमान कम होता है।

    vi. कम गतिज ऊर्जा के कारण इनकी आयतन क्षमता कणों की अपेक्षा कम होती है।

    vii. उच्च वेग और कम द्रव्यमान होने के कारण इनकी भेदन क्षमता (Penetrating power) α कणों से 100 गुनी अधिक होती है। इनको रोकने के लिए 0.01 मीटर मोटी ऐलुमिनियम की चादर आवश्यक होती है।

    viii. इनकी गतिज ऊर्जा कम होने के कारण इन किरणों में जिंक सल्फाइड एवं बेरियम प्लेटिनोसायनाइड जैसे लवणों में स्फुरदीप्ति उत्पन्न करने की क्षमता नहीं के बराबर होती है।

    ix. किसी विद्युत क्षेत्र से होकर गुजरने पर ये धन-ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं, किन्तु किरणों की अपेक्षा इनका विचलन अधिक होता है।

    x. इन किरणों में जीव कोशिकाओं (Living cells) को नष्ट करने की क्षमता होती है।

    गामा (γ) किरणों के गुण

    i. ये किरणें विद्युतत: उदासीन होती हैं। इस कारण विद्युत क्षेत्र से होकर गमन करते समय किरणें विचलित नहीं होती हैं।

    ii. ये किरणें अति लघु तरंगदैर्घ्य वाली विद्युत चुम्बकीय तरंग है।

    iii. ये किरणें कणों की नहीं बनी होती हैं।

    iv. इनका वेग प्रकाश के वेग के लगभग बराबर होता है।

    V. इनकी मात्रा शून्य होती है। अत: गामा किरणे अद्रव्य (Non-material) प्राकृतिक वाली होती है।

    vi. अति उच्च वेग से गतिशील होने के कारण गामा किरणों की भेदन क्षमता (Penetrating power) α- और β-किरणों की तुलना में सबसे अधिक होती है।

    vii. इन किरणों का द्रव्यमान नहीं के बराबर होने के कारण इनका फोटाग्राफिक प्लेट एवं जिंक सल्फाइड या बेरियस प्लैटिनोसायनाइड पर प्रभाव बहुत कम पड़ता है।

    viii. इन किरणों में जीव-कोशिकाओं को नष्ट करने की शक्ति होती है।

    ix. गतिज ऊर्जा का मान बहुत कम होने के कारण इन किरणों में गैसों को आयनित करने की क्षमता बहुत कम होती है।

  • रेडियोसक्रियता (Radioactivity) क्या है ?

    रेडियोसक्रियता (Radioactivity) क्या है ?

    What is Radioactivity ?

    प्रकृति में पाये जाने वाले वे तत्व जो स्वत: विखंडित होकर कुछ अदृश्य किरणों का उत्सर्जन करते रहते हैं रेडियोसक्रिय तत्व कहलाते हैं तथा यह घटना ‘रेडियोसक्रियता’ कहलाती है। रेडियोसक्रिय तत्वों से निकलने वाली अदृश्य किरणें ‘रेडियोसक्रिय किरणें’ कहलाती है।

    रेडियोसक्रियता की खोज (Discovery of Radioactivity)

    1896 ई. में फ्रांस के वैज्ञानिक हेनरी बेकरेल (Henery Becquerel) ने सर्वप्रथम रेडियोसक्रियता का पता लगाया

    हेनरी बेकरेल ने पाया कि यूरेनियम तथा यूरेनियम लवणों से कुछ अदृश्य किरणें स्वतः उत्सर्जित होते हैं। प्रारम्भ में इन दृश्य किरणों को बेकरेल किरणें (Becquerel rays) कहा गया।

    1898 ई. में मैडम क्यूरी (Madam Curie) तथा उनके पति पियरे क्यूरी (Pierre Curie) ने यह सुझाव दिया कि यूरेनियम और इसके यौगिकों से बेकरेल किरणों का निकलना एक परमाणुजनित क्रिया (Atomic phenomenon) है और यह विशिष्ट गुण यूरेनियम की रासायनिक स्थिति या भौतिक अवस्था पर निर्भर नहीं करता है। 1898 ई. में ही मैडम क्यूरी एवं स्मीट (Schimidt) ने अन्य रेडियोसक्रिय पदार्थों की खोज के क्रम में बतलाया कि थोरियम धातु के तत्व में भी रेडियोसक्रियता पायी जाती है

    सन् 1902 में मैडम क्यूरी तथा उनके पति पियरे क्यूरी ने पता लगाया कि यूरेनियम के खनिज पिच ब्लैंड (Pitch blend) में यूरेनियम की अपेक्षा लगभग चार गुनी अधिक रेडियोसक्रिय तत्व उपस्थित है। इस अनुमान के आधार पर इस वैज्ञानिक दम्पत्ति ने अपने कठिन और जोखिम भरे अनुसंधान के फलस्वरूप सन् 1903 में पिच ब्लैंड से रेडियम (Radium) नामक एक अत्यंत रेडियोसक्रिय तत्व की खोज की

    आज तक विभिन्न तत्वों के 1,000 से अधिक रेडियोधर्मी समस्थानिक (radioactive isotopes) ज्ञात हैं। इनमें से लगभग 50 प्रकृति में पाए जाते हैं; शेष कृत्रिम रूप से परमाणु प्रतिक्रियाओं (nuclear reactions) के प्रत्यक्ष उत्पादों के रूप में या परोक्ष रूप से इन उत्पादों के रेडियोधर्मी वंशज (radioactive descendants) के रूप में उत्पादित होते हैं। रेडियोधर्मी समस्थानिकों (Radioactive isotopes) में कई उपयोगी अनुप्रयोग होते हैं।

    रेडियोसक्रियता दो प्रकार की होती है :

    प्राकृतिक रेडियोसक्रियता (Natural Radioactivity)

    रेडियोसक्रिय तत्वों के परमाणु के नाभिक स्वत: विखंडित होकर अन्य तत्वों के परमाणुओं में परिवर्तित होते रहते हैं। यह क्रिया स्वाभाविक रूप से चलती रहती है तथा इसमें रेडियोसक्रिय किरणों का उत्सर्जन होता है, इसे प्राकृतिक रेडियोसक्रियता कहते हैं,

    उदाहरण के लिए, यूरेनियम, रेडियम, थोरियम, आदि तत्वों का विखंडन स्वयं होता रहता है। अत: इन तत्वों में पायी जाने वाली रेडियोसक्रियता ‘प्राकृतिक रेडियोसक्रियता’ कहलाती है।

    कृत्रिम रेडियोसक्रियता (Artificial Radioactivity)

    कृत्रिम रेडियोसक्रियता वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा उस तत्व पर तीव्र वेग वाले कणों (प्रोट्रॉन, ड्यूट्रॉन, अल्फा कण, आदि) से प्रहार किया जाता है

    उदाहरण के लिए, मैग्नीशियम जो एक स्थायी तत्व है, पर अल्फा कणों (2He4) से प्रहार करने पर एक अस्थायी और रेडियोसक्रिय तत्व सिलिकन (14Si27) बनता है तथा न्यूट्रॉन (0n1) मुक्त होता है, फिर यह (14Si27) स्वतः परिवर्तित होकर स्थायी ऐलुमिनियम में बदल जाता है।

  • समभारिक, समन्यूट्रॉनिक और समइलेक्ट्रॉनिक क्या है ?

    समभारिक, समन्यूट्रॉनिक और समइलेक्ट्रॉनिक क्या है ?

    What is Isobars, Isotones and Isoelectronic ?

    वे तत्व जिनकी द्रव्यमान संख्याएं एक ही, किन्तु परमाणु संख्याएं भिन्न-भिन्न होती है समभारिक कहलाते है

    समभारिकों की परमाणु संख्या में भिन्नता का कारण है, उन तत्वों के नाभिकों में प्रोटॉनों की संख्या का भिन्न-भिन्न होना। समभारित एक ग्रीक भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है, समान भारी (Iso = समान, Bars = भारी)।

    समभारिक के गुण:

    1. समभारिकों के अधिकांश भौतिक गुण एक-दूसरे से भिन्न होते हैं।

    2. समभारिकों के रासायनिक गुण एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न होते हैं।

    3. समभारिकों के वे भौतिक गुण एक समान होते हैं जो परमाणु द्रव्यमान पर निर्भर करते हैं।

    नोटः रेडियोसक्रिय तत्वों के बीटा कणों के उत्सर्जन से समभारिक बनते हैं

    समन्यूट्रॉनिक (Isotones)

    वे तत्व जिनकी परमाणु संख्या एवं द्रव्यमान संख्या दोनों भिन्न-भिन्न हों, किन्तु जिनके नाभिक में न्यूट्रॉनों की संख्या समान हो, ‘समन्यूट्रॉनिक’ कहलाते हैं।

    उदाहरण

    1. फॉस्फोरस (15P31) तथा सल्फर (14S30) समन्यूट्रॉनिक है, क्योंकि इनमें से प्रत्येक के नाभिक में 16 न्यूट्रॉन है।

    2. वेनेडियम (23V51) तथा क्रोमियम (24Cr52) भी समन्यूट्रॉनिक हैं, क्योंकि इन दोनों के नाभिक में न्यूट्रॉनों की संख्या 28 है।

    समइलेक्ट्रॉनिक (Isoelectronic)

    वे आयन जिनमें इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है, ‘समइलेक्ट्रॉनिक आयन’ कहलाते हैं

    उदाहरण:

    Na+, Mg++, F, आदि समइलेक्ट्रॉनिक आयन हैं, क्योंकि इनमें से प्रत्येक में इलेक्ट्रॉनों की संख्या 10 है।

  • समस्थानिक (Isotopes) क्या है ?

    समस्थानिक (Isotopes) क्या है ?

    What is Isotopes ?

    एक ही तत्व के वे परमाणु जिनकी परमाणु संख्याएं समान, किन्तु द्रव्यमान संख्याएं भिन्न-भिन्न होती हैं, ‘समस्थानिक’ कहलाते हैं

    किसी तत्व के विभिन्न समस्थानिकी की परमाणु संख्या समान होने का कारण यह है कि उनके नाभिक में प्रोटॉन की संख्या समान होती है किन्तु उनके नाभिक में न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न-भिन्न होने के कारण उनकी द्रव्यमान संख्याएं भिन्न-भिन्न होती है।

    परमाणु संख्या (Atomic Number) : किसी तत्व के परमाणु के नाभिक में उपस्थित इकाई धन आवेशों की कुल संख्या या उस तत्व के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों कि कुल संख्या को उस तत्व की परमाणु संख्या कहते है l

    समस्थानिकों के गुण:

    • किसी तत्व के सभी समस्थानिकों के भौतिक गुण प्रायः भिन्न-भिन्न होते हैं।
    • किसी तत्व के सभी समस्थानिकों के रासायनिक गुण एक जैसे होते हैं।
    • किसी तत्व के सभी समस्थानिक आवर्त सारणी में एक ही स्थान ग्रहण करते है।
    • किसी तत्व के सभी समस्थानिकों के परमाणुओं में इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है।
    • हाइड्रोजन ही एकमात्र ऐसा तत्व है जिसके सभी समस्थानिकों के अलग-अलग नाम है।
    • पोलोनियम सर्वाधिक समस्थानिकों वाला तत्व है।
    • हाइड्रोजन का समस्थानिक ‘ट्राइटियम’ (1H3) रेडियोसक्रियता का गुण प्रदर्शित करता है।

    उदाहरण:

    1. ऑर्गन (18Ar40), पोटैशियम (19K40) तथा कैल्सियम (19Ca40) समभारिक है, क्योंकि इन तीनों की द्रव्यमान संख्याएं समान हैं।

    2. नाइट्रोजन (7N14) तथा कार्बन (6CI4) समभारिक हैं, क्योंकि इन दोनों की द्रव्यमान संख्याएं समान हैं।

    3. सोडियम ( 11Na24) तथा मैग्नीशियम (12Mg24) समभारिक हैं, क्योंकि इनकी द्रव्यमान संख्याएं समान हैं।