Author: The Vigyan Team

  • पेगासस क्या है ? इजराइल के NSO Group का ये स्पाईवेयर कैसे काम करता है? Pegasus सॉफ्टवेयर कैसे फोन के जरिए करता है लोगों की जासूसी

    पेगासस क्या है ? इजराइल के NSO Group का ये स्पाईवेयर कैसे काम करता है? Pegasus सॉफ्टवेयर कैसे फोन के जरिए करता है लोगों की जासूसी

    Pegasus एक जासूसी सॉफ्टवेयर (Spyware) का नाम है | जासूसी सॉफ्टवेयर होने की वजह से इसे स्पाईवेयर भी कहा जाता है | इसे इजरायली सॉफ्टवेयर कंपनी NSO Group ने बनाया है | इसे Trident और Q Suite जैसे अन्य नामों से जाना जाता है।

    क्या है पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus Spyware) ?

    यह सॉफ्टवेयर टारगेट के फोन में जाकर डेटा लेकर इसे सेंटर तक पहुंचाता है | इससे एंड्रॉयड (android) और आईओएस (IOS) दोनों को टारगेट किया जा सकता है| इस सॉफ्टवेयर के फोन में इंस्टॉल होते ही फोन सर्विलांस (surveillance) डिवाइस के तौर पर काम करने लगता है | इजरायली कंपनी के अनुसार इसे क्रिमिनल और टेररिस्ट को ट्रैक करने के लिए बनाया गया है | कंपनी इसे सिर्फ सरकारों (governments) को ही कंपनी बेचती है | इसके सिंगल लाइसेंस के लिए 70 लाख रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं | फोन की खामी का फायदा उठा Pegasus को इंस्टॉल किया जाता है | इसके लिए कई तरीकों का यूज किया जाता है | Pegasus Spyware कई देशों की कानूनी और इंटेलिजेंस एजेंसियों को बेचा गया है |

    Pegasus के जरिए ग्लोबली 50,000 से ज्यादा फोन को टारगेट करने का आरोप है जिसमे 300 भारतीय भी शामिल हैं | Kaspersky का कहना है कि Android के लिए Pegasus जीरो-डे कमजोरियों पर निर्भर नहीं करता है। इसके बजाय, यह Framaroot नाम के एक प्रसिद्ध रूटिंग विधि का इस्तेमाल करता है।

    एनएसओ ग्रुप के अनुसार पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus Spyware) का इस्तेमाल

    एनएसओ ग्रुप अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर बताता है कि वह सरकारी एजेंसियों की मदद करने, आतंकवाद और अपराध को रोकने और उसकी जांच करने के लिए सॉफ्टवेयर बनाता है. कंपनी यह भी कहती है कि उसके पास संविदात्मक दायित्व हैं जिसके लिए उसके ग्राहकों को अपने उत्पादों के उपयोग को गंभीर अपराधों की रोकथाम और जांच तक सीमित करने की आवश्यकता है और यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनका उपयोग मानव अधिकारों का उल्लंघन करने के लिए नहीं किया जाएगा

    क्या कर सकता है पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus Spyware)?

    Pegasus spyware यूज़र के एसएमएस मैसेज और ईमेल को पढ़ने, कॉल सुनने, स्क्रीनशॉट लेने, कीस्ट्रोक्स रिकॉर्ड करने और कॉन्टेक्ट्स व ब्राउज़र हिस्ट्री तक पहुंचने में सक्षम है। यह हैकर फोन के माइक्रोफोन और कैमरे को हाईजैक कर सकता है, इसे रीयल-टाइम सर्विलांस डिवाइस में बदल सकता है। चूँकि पेगासस एक जटिल और महंगा मैलवेयर है, जिसे विशेष रुचि के व्यक्तियों की जासूसी करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, इसलिए औसत यूज़र्स को इसका टार्गेट होने का डर नहीं है।

    पेगासस पासवर्ड, कॉन्टैक्ट्स, टेक्स्ट मैसेज, कैलेंडर डिटेल्स और यहां तक कि मैसेजिंग ऐप का इस्तेमाल करके की गई वॉयस कॉल जैसी जानकारी चुरा सकता है। इसके अलावा, यह फोन के कैमरे और माइक्रोफ़ोन के साथ-साथ लाइव लोकेशन को ट्रैक करने के लिए जीपीएस का उपयोग करके भी जासूसी कर सकता है।

    पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus Spyware) को पहली बार कब खोजा गया था?

    पेगासस स्पाइवेयर को पहली बार 2016 में iOS डिवाइस में खोजा गया था और फिर Android पर थोड़ा अलग वर्ज़न पाया गया। Kaspersky का कहना है कि शुरुआती दिनों में, इसका अटैक एक एसएमएस के जरिए होता था। पीड़ित को एक लिंक के साथ एक SMS मिलता था। यदि वह उस लिंक पर क्लिक करता है, तो उसका डिवाइस स्पाइवेयर से संक्रमित हो जाता था।

    हालांकि, पिछले आधे दशक में, पेगासस सोशल इंजीनियरिंग पर निर्भर अपेक्षाकृत क्रूड सिस्टम से सॉफ्टवेयर के रूप में विकसित हुआ है, जो यूज़र के लिंक पर क्लिक किए बिना ही फोन का एक्सेस ले सकता है, या साइबर वर्ल्ड की भाषा में कहें, तो यह ज़ीरो-क्लिक एक्सप्लॉइट (exploit) करने में सक्षम है।

    पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus Spyware) फोन को कैसे संक्रमित करता है?

    पेगासस डिवाइस का एक्सेस इस तरह लेता है कि इसकी भनक यूजर तक को नहीं पड़ती | ज़ीरो-क्लिक एक्सप्लॉइट्स iMessage, WhatsApp और FaceTime जैसे लोकप्रिय ऐप में मौजूद बग्स पर निर्भर करते हैं, जो यूज़र के डेटा को प्राप्त और सॉर्ट करने का काम करते हैं और कभी-कभी ऐसा अज्ञात स्रोतों के जरिए होता है। इस बग्स का इस्तेमाल कर एक बार ब्रीच मिलने के बाद, पेगासस ऐप के प्रोटोकॉल का उपयोग करके डिवाइस में आसानी से घुसपैठ की जा सकती है।

    Zero-click exploits के अलावा, OCCRP ने एक अन्य तरीके के बारे में भी बताया है। रिपोर्ट का कहना है कि यह सॉफ्टवेयर डिवाइस का चुपचाप एक्सेस लेने के लिए “नेटवर्क इंजेक्शन” नाम के एक अन्य तरीके का उपयोग भी करता है। टार्गेट की वेब ब्राउज़िंग उन्हें विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए स्पैम लिंक पर क्लिक करने की आवश्यकता के बिना हमला करने के लिए खुला छोड़ सकती है। इसमें यूज़र के एक ऐसी वेबसाइट पर जाने का इंतज़ार किया जाता है, जो पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है। एक बार जब यूज़र किसी असुरक्षित साइट के लिंक पर क्लिक करता है, तो NSO Group का सॉफ्टवेयर फोन तक पहुंच प्राप्त कर लेता है और अटैक को ट्रिगर कर लेता है।

    क्या पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus Spyware) iPhone को भी हैक कर सकता है ?

    जुलाई 2021 में, मानवाधिकार समूह एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International) द्वारा गहन विश्लेषण के साथ-साथ प्रोजेक्ट पेगासस खुलासे के व्यापक मीडिया कवरेज हिस्से ने खुलासा किया कि पेगासस का अभी भी हाई-प्रोफाइल व्यक्तियों के खिलाफ व्यापक रूप से उपयोग किया जा रहा था। यह दिखाता है कि पेगासस आईओएस 14.6 तक के सभी updated IOS Versions को zero click iMessage exploit के माध्यम से हैक करने में सक्षम था।

    Amnesty International ने बताया था कि NSO Group के इस स्पाइवेयर ने नए आईफोन मॉडल, विशेष रूप से iPhone 11 और iPhone 12 को iMessage के जरिए Zero-click exploit कर दिया। स्पाइवेयर आईफोन में डाउनलोड किए गए एप्लिकेशन को कॉपी कर सकता है और ऐप्पल के सर्वर के जरिए खुद को पुश नोटिफिकेशन के रूप में ट्रांस्मिट कर सकता है। एनएसओ स्पाइवेयर द्वारा हजारों आईफोन हैंडसेट को संभावित रूप से प्रभावित किया गया है।

    पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus spyware) द्वारा जासूसी

    एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus spyware) का इस्तेमाल कथित तौर पर भारतीयों की जासूसी करने के लिए किया जाता था। 2019 में WhatsApp ने इस मामले को प्रकाश में लाया। उसने मई 2019 में भारत सहित दुनिया भर के 20 देशों में पत्रकारों, कार्यकर्ताओं, वकीलों और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों पर कथित तौर पर जासूसी करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पेगासस स्पाइवेयर के लिए इजरायली स्पाइवेयर निर्माता NSO ग्रुप पर मुकदमा दायर किया। WhatsApp ने खुलासा किया कि उसने कई भारतीय उपयोगकर्ताओं से संपर्क किया है, जिनके बारे में माना जाता है कि उनको पेगासस स्पाइवेयर का उपयोग करके अवैध जासूसी का लक्ष्य बनाया गया है।

    हालाँकि पेगासस के उपयोग के बारे में प्रतीत होने वाली पुष्टि व्हाट्सएप द्वारा एनएसओ समूह पर मुकदमा चलाने के बाद हुई। पेगासस के उपयोग पर लंबे समय से व्हाट्सएप साइबर हमले में संदेह किया गया था जिसे पहली बार 2019 में रिपोर्ट किया गया था।

    पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus Spyware) द्वारा फोन के हैक होने पर पता लगाने का कोई तरीका?

    संगठित अपराध और भ्रष्टाचार रिपोर्टिंग परियोजना (OCCRP) की रिपोर्ट है कि आखिरकार, जैसे-जैसे जनता इन तरीकों के बारे में अधिक जागरूक हो गई है और गलत स्पैम को बेहतर ढंग से पहचानने में सक्षम हो गई, ज़ीरो-क्लिक एक्सप्लॉइट्स से बचने के समाधान भी खोजे जा चुके हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल के शोधकर्ताओं ने एक टूल विकसित किया है, जो यह बता सकता है कि आपका फोन स्पाईवेयर से संक्रमित हुआ है या नहीं।

    मोबाइल वैरिफिकेशन टूलकिट (MVT) का उद्देश्य यह पहचानने में मदद करना है कि पेगासस ने डिवाइस को संक्रमित किया है या नहीं। यूं तो यह Android और iOS दोनों डिवाइसों पर काम करता है, लेकिन इसके लिए कुछ कमांड लाइन नॉलेज की आवश्यकता होती है। MVT के समय के साथ ग्राफिकल यूज़र इंटरफेस (GUI) प्राप्त करने की उम्मीद भी है, जिसके बाद इसे समझना और चलाना आसान हो जाएगा।

    क्या कंपनी पेगासस को बंद करने पर विचार कर रही है ?

    हाल ही में खबर आई थी कि NSO ग्रुप लिमिटेड पर अपने कर्जों के चलते डिफॉल्ट होने का खतरा मंडरा रहा है | ऐसे में कंपनी अपनी विवादित ‘पेगासस’ को बंद करने और उसे बेचने पर विचार कर रही है | हलाकि NSO के प्रवक्ता ने इस पर कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार किया | कंपनी पर दुनियाभर के तमाम देशों में यूजर्स के डेटा का गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगा है | आरोप है कि कंपनी ने डेटा को विभिन्न देशों की सरकारों को दिया, जिन्होंने राजनीतिक विरोधियों, पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की जासूसी करने में इसका इस्तेमाल किया |

  • Microsoft Activision Blizzard Deal                     माइक्रोसॉफ्ट और एक्टिविजन ब्लिजार्ड में हुई बड़ी डील, 68.7 अरब डॉलर में हुआ समझौता

    Microsoft Activision Blizzard Deal माइक्रोसॉफ्ट और एक्टिविजन ब्लिजार्ड में हुई बड़ी डील, 68.7 अरब डॉलर में हुआ समझौता

    माइक्रोसॉफ्ट ने घोषणा की है कि वह गेम पब्‍लिशर एक्टिविजन ब्लिजार्ड (Activision Blizzard) को 68.7 अरब डॉलर (लगभग 5,10,990 करोड़ रुपये) में खरीदेगी।

    गेमिंग की दुनिया की सबसे बड़ी डील?

    माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) ने घोषणा की है कि माइक्रोसॉफ्ट गेम पब्‍लिशर एक्टिविजन ब्लिजार्ड (Activision Blizzard) को 68.7 अरब डॉलर (लगभग 5,10,990 करोड़ रुपये) में खरीदेगी।

    माइक्रोसॉफ्ट की यह डील अगर सफल होती है तो यह डील कंपनी को निन्टेंडो (Nintendo) से भी बड़ी वीडियो-गेम कंपनी बना देगी।

    माइक्रोसॉफ्ट की एक्टिविजन के साथ डील को कंपनी की अब तक की सबसे बड़ी डील माना जा रहा है। यह माइक्रोसॉफ्ट की पिछले 46 साल की सबसे बड़ी डील है। माइक्रोसॉफ्ट इस डील के लिए प्रति शेयर 95 डॉलर का भुगतान करेगा। ऐसा माना जा रहा है कि माइक्रोसॉफ्ट मेटावर्स की दुनिया में खुद को मजबूत बनाने के लिए इस तरह की डील करेगी।

    Xbox गेमिंग सिस्टम बनाने वाली ‘Microsoft’ ने कहा है कि कैंडी क्रश, कॉल ऑफ ड्यूटी, ओवरवॉच और डियाब्लो जैसे गेम बनाने वाली कंपनी को हासिल करना गेमर्स के लिए अच्छा होगा। कंपनी मेटावर्स के लिए भी अपनी महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाएगी।

    जानते है क्या यह डील गेमर्स के लिए अच्छी साबित होगी?

    इस बारे में एनालिस्‍ट विल मैककॉन-वाइट ने कहा कि ‘Microsoft इंटलेक्‍चुअल प्रॉपर्टी की अपनी वैराइटी को बढ़ाना चाहती है। उनका टारगेट वीडियो गेम को व्यापक ऑडियंस तक पहुंचाना है।’

    दूसरी ओर, माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनी द्वारा गेम के कंटेंट को कंट्रोल करने की संभावना भी है। इससे यह चिंता पैदा होती है कि क्या कंपनी एक्टिविजन ब्लिजार्ड द्वारा बनाए गए गेम्‍स को अपने कॉम्‍पिटिटर्स के लिए प्रतिबंधित कर सकती है।

    एनालिस्‍ट माइकल पच्टर कहते हैं कि Microsoft अपनी Xbox सब्‍सक्रिप्‍शन सर्विस में एक्टिविजन ब्लिजार्ड के गेम्‍स ला सकती है। इनमें से कुछ एक्सक्लूसिव हो सकते हैं। हालांकि उनका कहना है कि एंटीट्रस्‍ट रेगुलेटर माइक्रोसॉफ्ट को सोनी के प्लेस्टेशन से इन गेम्‍स को दूर रखने की अनुमति नहीं देंगे।

    माइक्रोसॉफ्ट और मेटा

    माइक्रोसॉफ्ट ऐसा कहता है। कुछ ऐसे तरीके भी हैं जिनसे कंपनी को मेटा जैसे कॉम्पिटिटर्स के साथ प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिल सकती है। 

    इस डील को रेगुलेटर और कॉम्‍पिट‍िटभी र्स द्वारा रोकने के लिए दबाव बना सकते हैं। बाकी टेक कंपनियों जैसे- मेटा, गूगल, एमेजॉन और ऐपल ने अमेरिका और यूरोप में एंटीट्रस्ट नियामकों का ध्यान आकर्षित किया है। लेकिन ‘एक्टिविजन ब्लिजार्ड’ डील इतनी बड़ी है कि माइक्रोसॉफ्ट खुद ही रेगुलेटर की नजर में आ जाएगी। 

    माना जा रहा है कि इस डील से माइक्रोसॉफ्ट को एक्टिविजन के करीब 40 करोड़ मासिक गेमिंग यूजर्स मिलेंगे।

    इस डील के बाद माइक्रोसॉफ्ट को उम्मीद है कि कंपनी Xbox कंसोल के कारोबार का तेज विस्तार कर सकेगी। और प्रतिद्वंद्वी सोनी कॉर्प के PlayStation के साथ बेहतर प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिलेगी। Xbox के साथ एक्टिविज़न का एक लंबा इतिहास रहा है।

  • जैव विकास तथा जैव विकास के सिद्धांत (Bio Evolution and theories of Bio Evolution)

    जैव विकास तथा जैव विकास के सिद्धांत (Bio Evolution and theories of Bio Evolution)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की जैव विकास ((Bio evolution) क्या है ? जैव विकास के प्रमुख सिद्धांत (theories of Bio evolution) क्या है ? जीवन का विकास क्या है ? जैव विकास के संबंधित प्रमुख परिकल्पनाएँ कोन – कोनसी है ? जैव विकास के प्रमुख आधार क्या है ? जैव विकास की विशेषताएं क्या है ? आनुवंशिकता एवं जैव विकास के बीच संबंध क्या है ? आदि

    जीवन की उत्पत्ति (Origin of Life) और जैव विकास (Bio evolution)

    जैव विकास एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में होने वाला आनुवंशिक (Genetic) परिवर्तन है। पृथ्वी के प्रारंभ से ही निम्नकोटि के जीवों का क्रमिक परिवर्तनों द्वारा निरंतर अधिकाधिक जटिल जीवों की उत्पत्ति वास्तविक रूप से जैव विकास ही है। जैव विकास के अनुसार पृथ्वी पर पहले की पूर्वज जातियों के जैव विकास के द्वारा ही, नई-नई जातियां उत्पन्न हुई और हो रही हैं। 

    पृथ्वी का उद्गम लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व हुआ, जबकि इस पर जीवन की उत्पत्ति लगभग 3.5 – 4 अरब वर्ष पूर्व हुई। जीवन की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कई विचार धाराएं प्रचलित हैं, अरस्तू द्वारा प्रतिपादित स्वत:जनन के सिद्धान्त के अनुसार, निम्न वर्ग के जीवधारी निर्जीव पदार्थों से स्वतः पैदा हो जाते हैं।

    17 वीं शताब्दी के दौरान फ्रांसिस्को रेड्डी ने दो अलग-अलग बर्तनों, जिनमें एक खुला तथा दूसरा बन्द उसमें मांस का नमूना रखा। इस परीक्षण के निष्कर्ष में खुले बर्तन वाले मांस में कीड़े दिखाई दिए, जवकि बन्द बर्तन में नहीं। इससे अरस्तू के जीवन की स्वत: उत्पत्ति सिद्धान्त कमजोर पड़ा फिर लुई पाश्चर के प्रयोग से स्वत: जनन सिद्धान्त धराशायी हो गया। जीवन की उत्पत्ति के सम्बन्ध में ओपेरिन एवं हेल्डेन द्वारा आधुनिक सिद्धान्त, प्रकृतिवाद या जैव-रसायन विकास (Bio-chemical evolution) सिदान्त  प्रतिपादित किया गया।

    ओपेरिन ने 1936 में अपनी पुस्तक द ऑरिजिन ऑफ लाइफ (The Origin of Life) में इस सिद्धान्त का विस्तारपूर्वक वर्णन किया,  जिसके अनुसार आदिकाल में हाइड्रोजन गैस अधिक मात्रा में होने के कारण पृथ्वी का वायुमण्डल अपचायक था तथा इसमें ऑक्सीजन अनुपस्थित थी। तापमान कम होने पर हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, कार्बन आदि परमाणुओं के आपस में संयोग से इसके अणु बने। इस प्रक्रम में पहले जटिल कार्बनिक यौगिक तथा कोएसरवेट एवं न्यूक्लियोप्रोटीन्स का निर्माण हुआ।

    स्टैनले मिलर अपने विख्यात प्रयोग में उसने पृथ्वी के प्रारम्भिक वायुमण्डल जैसी स्थितियों को पैदा करते हुए एवं बन्द फ्लास्क (स्वान आकार के) में विद्युत धारा को अमोनिया, मीथेन, हाइड्रोजन और वाष्प के मिश्रण में से गुजारकर कार्बोहाइड्रेड एवं अमीनो अम्लों का मिश्रण प्राप्त किया। इन पदार्थों में अभिक्रिया के परिणास्वरूप पॉलीसैकेराइड, प्रोटीन, लिपिड एवं न्यूक्लिक अम्ल बने।

    न्यूक्लिक अम्ल में अभिक्रिया कर स्वप्रतिकृतियन की क्षमता थी। इनके विकास से निर्जीव एवं सजीव के बीच की एक सीमा निर्धारित हो गई और आगे चलकर प्रारम्भिक कोशिकाएँ, संश्लेषण वृद्धि तथा परिवर्धन करने लगी, जिसकी परिणति पोषण-विधियों के विकास के साथ सम्पन्न हुई। परजीविता, मृतजीविता, प्राणो सदृश पोषण विधियों के पश्चात् स्वपोषी पोषण विधि का भी विकास हुआ। ये स्वपोषी जीव दो प्रकार के रसायन-संश्लेषी तथा प्रकाश-संश्लेषी थे। इसकी अन्तिम कड़ी के रूप में वायुमण्डल का निर्माण हुआ तथा ऑक्सीजन की उपस्थिति से यह काफी महत्वपूर्ण हो गया।

    जैविक विकास (Biological Evolution) क्या है ?

    जीवन की उत्पत्ति आदिसागर के जल में न्यूक्लियोप्रोटीन्स के विषाणु, जैसे कणों के रूप में, आज से लगभग 3.7 अरब वर्ष पूर्व, पृथ्वी के इतिहास के प्रीकैम्ब्रियन महाकल्प में हुई और ये प्रारम्भिक जीव परपोषी एवं अवायवीय थे। इनकी कोशिका आज के विषाणु तथा माइकोप्लाज्मा के समान थी। कुछ समय संग्राहक का रूप ले लिया तथा आनुवंशिक कोड के बाद कोशिका के DNA ने आनुवंशिक सूचनाओं के द्वारा RNA एवं प्रोटीन-संश्लेषण से जुड़ गया।

    ऐसा माना जाता है कि प्रारम्भिक जीव रसायनी परपोषी थे, जो जटिल कार्बनिक पदार्थों के किण्वन से ऊर्जा प्राप्त करते थे। तदन्तर पर्णहरिम के विकास से प्रकाश-स्वपोषी जीवों का विकास हुआ। प्रारम्भिक प्रकाश-स्वपोषी-जीव-अवायवीय थे जो 3.5 अरब पूर्व वायवीय प्रकाश-स्वपोषी जीवों में रूपान्तरित हो गए।

    लिन मारगुलिस के अनुसार, कुछ अवायवीय परभक्षी के कोशिकाओं ने प्रारम्भिक वायवीय जीवाणुओं का भक्षण किया और प्रथम यूकैरियोटिक कोशिका बन गई। परभक्षी कोशिका, जिसने वायवीय जीवाणु तथा प्रकाश-संश्लेषी नीली-हरी शैवाल कोशिका का भक्षण किया। वह यूकैरियोटिक पादप कोशिका बन गई अर्थात् वायवीय जीवाणु माइटोकॉण्ड्रिया तथा नीले-हरे शैवाल हरितलवक के रूप में स्थापित हो गए।

    जैव विकास के सिद्धान्त (Theories of Organic Evolution)

    जैव विकास एक विकासीय घटना है, जो क्रमिक एवं सतत् प्रक्रिया के अनुरूप सरल से जटिल जीवों की ओर होती है। जीवन की उत्पत्ति से संबंधित सबसे प्राचीन परिकल्पना, स्वतः उत्पादन की है, जबकि आधुनिक परिकल्पना प्रकृतिवाद की है। 

    इसके अन्तर्गत उपार्जित लक्षणों की वंशागति पर आधारित लैमार्कवाद, प्राकृतिक चयन सिद्धान्त पर आधारित डार्विनवाद तथा उत्परिवर्तन पर आधारित ह्यूगो डी व्रीज का सिद्धान्त प्रमुख रूप से शामिल है।

    लैमार्कवाद (Lamarckism) क्या है ?

    फ्रांसीसी वैज्ञानिक जीन बैप्टिस्ट डी लैमार्क ने 1809 ई. में फिलोसफी जूलोजिक (Philosophie Zoologique) नामक प्रसिद्ध पुस्तक में उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धान्त प्रस्तुत किया।

    इस सिद्धान्त के अनुसार, प्रत्येक जीव अपने जीवन काल में जिस वातावरण में रहता है, उसके प्रभाव से अनेक लक्षण उपार्जित करता है। यही उपार्जित लक्षण उसकी सन्तानों में पहुँच जाते हैं तथा धीरे-धीरे नई जाति (new species) बन जाती है। इस सिद्धान्त के अनुसार, जिस अंग का लगातार प्रयोग होता है वह धीरे-धीरे आकार में बढ़ जाता है तथा जिस अंग का प्रयोग नहीं होता है या काफी कम होता है उसका क्रमशः ह्यस होता जाता है तथा अन्त में वह समाप्त हो जाता है; जैसे-अवशेषी अंग।

    लैमार्क का सिद्धान्त मूलतः चार अवधारणाओं पर आधारित है, जो इस प्रकार हैं:

    बड़े होने की प्रवृति

    वातावरण का सीधा प्रभाव

    अंगों के उपयोग एवं उसके अनुप्रयोग का प्रभाव

    उपार्जित लक्षणों की वंशागति

    लैमार्क के अनुसार, वर्तमान जिराफों के पूर्वज छोटी गर्दन एवं छोटी टाँगों वाले थे तथा वृक्षों की पत्तियाँ खाते थे, जिसके लिए उसे गर्दन ऊपर करनी पड़ती थी। ऊँचे वृक्षों की पत्तियाँ खाने के प्रयास में जिराफ की गर्दन एवं अगली टाँगें लम्बी हो गईं। अत: इस आधार पर किसी अंग के सक्रियता से उस अंग का विकास होता है। अंगों के कम उपयोग का उदाहरण लैमार्क ने साँपों में दिया, जिनके पैर गायब हो गए।

    लैमार्कवाद की सबसे अधिक आलोचना जर्मन वैज्ञानिक वीजमान ने की, जिन्होंने अपने प्रयोग में 21 पीढ़ियों तक चूहों की पूँछ काटकर आपस में प्रजनन करवाया, परन्तु किसी भी पीढ़ी में पूंछ विहीन चूहे उत्पन्न नहीं हुए। इससे प्रमाणित होता है कि वातावरण से प्राप्त उपार्जित लक्षणों की वंशागति नहीं होती है। वीजमान ने जननद्रव्य की निरन्तरता का सिद्धान्त प्रतिपादित किया।

    जैव विकास के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

    * पेलिओजोइक महाकल्प को प्राचीन जीवन का उद्भव काल भी कहते हैं।

    * डेवोनियन कल्प को मछलियों का युग भी कहा जाता है।

    * कार्बोनिफेरस कल्प को उभयचरों का युग कहा जाता है।

    * मीसोजोइक महाकल्प को सरीसृपों का युग भी कहा जाता है।

    * सीनोजोइक महाकल्प को स्तनधारियों का युग भी कहा जाता है।

    * प्लीस्टोसीन युग को मानव युग कहा जाता है।

    डार्विनवाद (Darwinism) क्या है ?

    चार्ल्स डार्विन के जैव विकास के सम्बन्ध में विचार विस्तारपूर्वक उनकी पुस्तक ‘ओरिजिन ऑफ स्पीशीज बाइ नेचुरल सेलेक्शन’ (प्राकृतिक चयन द्वारा जातियों का विकास) में सन् 1859 में प्रकाशित हुए।

    डार्विनवाद के मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं:

    जीवों में सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता प्रत्येक जीव जाति में सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता होती है। उदाहरण के लिए, फल-मक्खी (ड्रोसोफिला) एक बार में 200 अण्डे देती हैं, जिससे 10-14 दिनों में वह मक्खियाँ बन जाती हैं। यदि सभी अण्डों से उत्पन्न मक्खियाँ जीवित रहें एवं जनन करें, तो 40-45 दिनों में इसकी संख्या लगभग 20 करोड़ हो जाएगी।

    जीवन संघर्ष सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता के बावजूद प्रकृति में प्रत्येक जाति के जीवधारियों की संख्या लगभग स्थिर रहती है। इसका कारण यह है कि जीवधारियों को अपने अस्तित्व को बनाए रखने, वृद्धि करने एवं जनन करने के लिए भोजन, प्रकाश, वास-स्थान, जनन के लिए साथी आदि की आवश्यकता होती है। परन्तु ये सब प्रकृति में सीमित हैं। अर्थात् जीवधारियों को पैदा होते ही इनके लिए संघर्ष करना पड़ता है।

    जैव विकास के बारे में डार्विन की व्याख्या का आधार एच एम एस बीगल नामक जहाज पर की गई समुद्री यात्रा के समय का प्राकृतिक अवलोकन एवं माल्थस का जनसंख्या सिद्धान्त था।

    अपनी यात्रा के दौरान डार्विन ने गैलापैगोज द्वीप समूह पर 20 प्रकार की चिड़ियाएँ देखीं। बाद ये चिड़ियाएँ डार्विन की फिन्चिस के नाम से प्रसिद्ध हुई।

    विभिन्नताएँ एवं उनकी वंशागति संसार में सभी जीवधारियों में विभिन्नताएँ पाई जाती हैं। एक ही माता-पिता की सन्तानें भी बिल्कुल एक जैसी नहीं होती हैं। विभिन्नताएँ केवल रंग रूप में ही नहीं बल्कि विभिन्न लक्षणों के लिए हो सकती हैं, जैसे-दौड़ने की शक्ति, रोगों से लड़ने की शक्ति, कार्य क्षमता आदि, जो भिन्नताएँ किसी जीवधारी का अस्तित्व बनाए रखने में सहयोगी होती हैं, ये लाभदायक विभिन्नताएँ अगली पीढ़ियों में पहुँचती हैं।

    योग्यतम की उत्तरजीविता व प्राकृतिक चयन जीवन संघर्ष में वही जीवधारी सफल होते है, जिनमें परिस्थितियों के अनुकूल विभिन्नताएँ होती है और जनन करके जनसंख्या में वृद्धि करते हैं। अधिक-से-अधिक अनुकूल लक्षणों वाले जीवधारियों (योग्यतम) का एक प्रकार से प्रकृति द्वारा चयन होता है। इसी को योग्यतम की उत्तरजीविता या प्राकृतिक चयन (Natural Selection) कहते हैं, जिसे हरबर्ट स्पेन्सर ने सामाजिक विकास के सन्दर्भ में योग्यतम की अतिजीविता (Survival of the Fittest) कहा।

    नई जातियों की उत्पत्ति वातावरण या परिस्थितियाँ निरन्तर बदलती रहती हैं। फलस्वरूप निरन्तर नए लक्षणों का प्राकृतिक चयन होता रहता है। उपयोगी विभिन्नताएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी इकट्ठी होती रहती हैं और काफी समय बाद (सैकड़ों-हजारों वर्षों बाद) उत्पन्न जीवधारियों के लक्षण मूल जीवधारियों से इतने भिन्न हो जाते हैं कि एक नई जाति बन जाती है।

    विभिन्नताओं के कारण, उत्पत्ति तथा आनुवंशिकता की व्याख्या न होने, अवशेषी अंगों की उपस्थिति न होने आदि के कारण डार्विनवाद की आलोचना की गई।

    नव-डार्विनवाद क्या है ?

    नव-डार्विनवाद के अनुसार लैंगिक जनन करने वाले जीवों की सन्तानों में उत्परिवर्तन के कारण विभिन्नताएँ होती हैं। प्रकृति इनमें से लाभदायक विभिन्नताओं का चयन करती है। एक जाति के विभिन्न समूहों के प्रजनन काल भिन्न होने के कारण लैंगिक पृथक्करण हो जाता है, जिसके फलस्वरूप नयी जातियों का विकास होता है। पेपर्ड मॉथ की ग्रे किस्म का औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् काली किस्म में रूपान्तरित होना प्राकृतिक चयन का उदाहरण है।

    ह्यूगो डी व्रीज का उत्परिवर्तन वाद  (Mutation Theory of Hugo de Vries)

    ह्यूगो डी वीज नामक वैज्ञानिक ने 1901 ई. में इवनिंग प्रिमरोज (ऑइनोथेरा लैमार्कियाना) में उत्परिवर्तन (mutation) की खोज की और उत्परिवर्तन सिद्धान्त दिया, जिसके अनुसार नई जाति की उत्पत्ति अचानक एक ही बार में होने वाली स्पष्ट एवं स्थायी (वंशागत) आकस्मिक परिवर्तनों (उत्परिवर्तनों) के कारण होती है।

    उत्परिवर्तन वाद सिदांत की प्रमुख विशेषताएं

    नई जातियों की उत्पत्ति एक ही बार में स्पष्ट एव स्थायी (वंशागत) आकस्मिक परिवर्तनों (उत्परिवर्तनों) के परिणामस्वरूप होती है, न कि छोटी-छोटी व अस्थिर विभिन्नताओं के प्राकृतिक चयन द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचय व क्रमिक विकास के फलस्वरूप है।

    सभी जीवधारियों में उत्परिवर्तन की प्राकृतिक प्रवृत्ति होती है, जो कभी कम या अधिक या लुप्त हो सकती है।

    उत्परिवर्तन अनिश्चित होते हैं। ये किसी एक अंग विशेष में अथवा अनेक अंगों में एक साथ ठत्पन्न हो सकते हैं। परिणामस्वरूप अंग अचानक लुप्त या अधिक विकसित हो सकते हैं।

    एक ही जाति के विभिन्न सदस्यों में विभिन्न प्रकार के उत्परिवर्तन हो सकते हैं।

    उपरोक्त उप्परिवर्तनों के परिणामस्वरूप अचानक ऐसे जीवधारी उत्पन्न हो सकते हैं, जो जनक से इतने अधिक भिन्न हों कि उन्हें नई जाति माना जा सके।

    प्रकृति में स्वयं होने वाले उत्परिवर्तन प्राकृतिक (spontaneous) तथा X-किरणों, α-किरणों, β-किरणों या रासायनिक पदार्थों (जैसे-मस्टर्ड गैस) आदि के द्वारा प्रेरित किए जाने वाले उत्परिवर्तन कृत्रिम (induced) कहलाते हैं।

    जाति निर्माण (Speciation)

    जाति अन्तः प्रजनन करने वाले ऐसे जीवों का समूह है, जो एक या अनेक जनसंख्याओं में रहते हैं।

    किसी जनसंख्या के सारे सदस्यों की जीन मिलकर उस जनसंख्या की जीन राशि (gene pool) बनाते हैं।

    एक जननिक रूप से समांग जनसंख्या का दो या अधिक जनसंख्याओं, जो आनुवंशिक रूप से भिन्न तथा जननिक पृथक्करण युक्त हो, में टूटना जाति निर्माण या स्पीसिएशन (speciation) कहलाता है।

    जाति निर्माण मुख्यतया दो प्रकार से होता है:

    एलोपैट्रिक स्पीसिएशन

    एक जाति को कुछ जनसंख्याओं का भौगोलिक पृथक्करण (geographical isolation) हो जाता है। हजारों वर्षों बाद ये दो जनसंख्याएँ विकास के क्रम में भिन्न हो जाती हैं। जब ये दो जनसंख्याएँ दोबारा सम्पर्क में आती हैं तब इनके बीच प्रजनन नहीं होता है। इस प्रकार प्रत्येक जनसंख्या एक नई जाति वन जाती है।

    सिम्पैट्रिक स्पीसिएशन

    जब एक जाति को, एक ही भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाली दो जनसंख्याएँ जननिक रूप से पृथक् हो जाती है, तब ये जनसंख्या धीरे-धीरे एक-दूसरे से भिन्न होती चली जाती हैं और अलग जातियाँ बन जाती हैं।

    जैव विकास के प्रमाण (Evidences of Organic Evolution)

    आकारिकी एवं शारीरिकी से प्रमाण

    समजात अंग (Homologous organs)

    ऐसे अंग, जो रचना और उत्पत्ति में समान परन्तु कार्य में भिन्न हो; जैसे-मेंढक, पक्षी एवं मनुष्य के अग्रपाद।

    समवृति अंग (Analogous organs)

    ऐसे अंग, जो समान कार्यों में उपयोग होने के कारण समान दिखाई पड़ते हैं, लेकिन उनकी मूल रचना एवं भ्रूणीय प्रक्रिया में भिन्नता पाई जाती है समवृति अंग कहलाते हैं; जैसे-पक्षियो एवं कीटों के पंखा

    अवशेषो अंग (Vestigial organs)

    वे अंग, जो वे पूर्वजों में कार्यशील थे, परन्तु वर्तमान में कार्यविहीन है; जैसे-साँपों के अल्पविकसित पाद, कोबी पक्षी के पंख, मनुष्य के त्वचा के वाल, वर्माफॉर्म एपेन्डिक्स आदि। जीवों में कभी-कभी अचानक कोई ऐसा लक्षण विकसित हो जाता है, जो वर्तमान जातीय लक्षण न होकर किसी निम्न वर्गीय पूर्वव जाति का होता है इसो क्रिया को प्रत्यावर्तन (atavism) कहते हैं।

    संयोजक जातियों से प्रमाण

    कुछ जीव-जन्तुओं में उनसे कम विकसित निन्न वर्गीय जातियों के तथा उनसे अधिक विकसित उच्च वर्गीय जातियों के लक्षणों का सम्मिश्रण पाया जाता है।

    उदाहरण             संयोजक कड़ी

    आर्किऑटेरिक्स – सरीसृपों एवं पक्षियों

    निओपिलिना   – मौलस्का एवं एनीलिडा

    पेरीपेटस      – एनीलिडा एवं ऑर्थोपोडा

    प्रोटोथीरिया    – सरीसृप एवं स्तनधारी

    यूग्लीना      –  पादप एवं जन्तु

    आनुवंशिकी से प्रमाण

    विभिन्न जातियों के सदस्यों में परस्पर संकरण जातियों के घनिष्ट विकासीय सम्बन्धों को प्रमाणित करता है, जैसे – घोड़े तथा गधे से वर्णसंकर खच्चर का बनना।

    तुलनात्मक कार्यिकी एवं जैव-रसायन से प्रमाण (Evidences from Comparative Physiology and Biochemistry)

    फ्लोकिन एवं वाल्ड ने जन्तुओं एवं पादपों की कार्यिकी एवं जैव-रसायन से सम्बन्धित प्रमाण प्रस्तुत किए

    प्रारम्भिक जीवों से लेकर जटिलतम स्तनियों तक जीवद्रव्य के समान रासायनिक संयोजन, प्रोटोजोआ से स्तनियों तक अधिकांश जन्तुओं में ट्रिप्सिन नामक एन्जाइम की उपस्थिति, एमाइलेस की उपस्थिति, सभी कशेरुकियों में थायरॉक्सिन हॉर्मोन की उपस्थिति तथा हीमोग्लोबिन से बनाए गए | हिमेटिन रवों की आकृति एवं माप में समानता, मानव व चिम्पैंजी में रुधिर सीरम प्रोटीन में समानता आदि जैव विकास को दर्शाते हैं।

    बायोजेनेटिक नियम अथवा पुनरावृत्ति सिद्धान्त या भ्रौणिकी से प्रमाण

    हैकेल ने इस सिद्धान्त को प्रतिपादित किया जिसके अनुसार, व्यक्तिवृत्त में जातिवृत्त की पुनरावृत्ति होती है अर्थात् जन्तु अपनी भ्रूणावस्था में पूर्वजों की अवस्थाओं को दोहराते हैं। (Ontogeny Repeats Phylogeny)

    जीवाश्म

    प्राचीन जीवों के शेष बचे भार्गों; जैसे – हड्डी दाँत, शैल आदि को जीवाश्म कहते हैं। ये मुख्यतया अवसादी चट्टानों में पाए जाते हैं। जीवाश्म की आयु यूरेनियम लैड विधि, रेडियोधर्मी कार्बन विधि, फिसन ट्रैक तथा इलेक्ट्रॉन चक्रण रेजोनेन्स आदि विधियों द्वारा ज्ञात की जाती है। कॉपोलाइट ऐसे जीवाश्म होते हैं, जिनमें जन्तुओं के मल में फॉस्फेट लवणों का संचय होता है।

    मानव का विकास (Human Evolution) – सम्पूर्ण जानकारी

    मानव या होमीनिड वंश, जो मनुष्य व कपियों के पूर्वज थे, का उद्भव आज से लगभग 2.4 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ। होमीनिड वंश का विकास एशिया तथा अफ्रीका में हुआ।

    * डार्विन ने अपनी पुस्तक ‘डेसेन्ट ऑफ मैन एण्ड सेलेक्शन इन रिलेशन टू सैक्स’ (Descent of Man and Selection in Relation to Sex) में मानव का विकास कपियों जैसे पूर्वज से होने के सिद्धान्त का वर्णन किया।

    * लिनियस ने मनुष्य को वानरों व कपियों के साथ रखा तथा उसे वैज्ञानिक नाम होमो सेपियन्स (Homo sapiens) दिया, जिसका अर्थ है –  बुद्धिमान प्राणी।

    मानव का वर्गीकरण

    संघ  – कॉर्डेटा

    वर्ग – स्तनधारी

    गण – प्राइमेट

    उपगण – एन्थ्रोपोइडिया

    कुल – होमीनिडी

    वंश – होमो

    जाति – सेपियन्स

    उपजाति – सेपिएन्स

    – गज-श्रूज (Elephant shrews) मानव के प्रारम्भिक पूर्वज माने जाते हैं।

    – गिब्बन भारत में पाया जाने वाला अकेला कपि है।

    • मानव व कपियों का विकास एक सम्मिलित पूर्वज से हुआ था।

    . प्रोप्लिओपिथेकस मानव-पूर्व पूर्वज है, जिसके जीवाश्म लगभग 3.5 करोड़ वर्ष पूर्व ओलिगोसीन युग की चट्टानों में मिले हैं। इसमें मनुष्य व कपि दोनों के लक्षण हैं।

    – मायोसीन में पाए जाने वाले कपि लिम्नोपिथेकस को गिब्बन का पूर्वज माना जाता है।

    आधुनिक चिम्पैन्जी का पूर्वज प्रोकोंसल को माना जाता है

    प्रोकोंसल के जीवाश्म लीकी द्वारा पूर्वी अफ्रीका से प्राप्त किए गए।

    ड्रायोपिथेकस (Dryopithecus)

    . ड्रायोपिथेकस अफ्रीकेन्स (Dryopithecus Africans) का जीवाश्म अफ्रीका और यूरोप की चट्टानों से प्राप्त हुआ ।

    • इसे मनुष्य एवं कपि दोनों का पूर्वज माना जाता है।

    • यह चिम्पैन्जी से करीबी समानता दिखाता है।

    • यह मायोसीन के समय 250 लाख साल पहले जीवित था।

    • यह शाकाहारी था और कोमल फलों व पत्तियों को खाता था।

    रामापिथेकस (Ramapithecus)

    लेविस (Lewis) ने 1932 में भारत की शिवालिक पहाड़ी की प्लीयोसीन चट्टानों से रामापिथेकस के जीवाश्म को खोजा।

    यह 14-15 मिलियन वर्ष पहले पश्च-मायोसीन से प्लायोसीन युग में जीवित था।

    रामापिथेकस अपनी पिछली टाँगों पर सीधा खड़ा होकर चलता था।

    यह आधुनिक मानव की तरह कठोर नट व बीज खाता था।

    ऑस्ट्रेलोपिथेकस (Australopithecus)

    इसे प्रथम कपि मानव माना जाता है।

    यह लगभग 4 से 1.5 मिलियन वर्ष पहले प्लीस्टोसीन युग के दौरान गुफाओं में रहता था।

    इसकी कपाल क्षमता 500-700 घन सेमी थी। .

    यह पूरी तरह द्विपद (bipedal) होमोनिड था।

    जबड़े तथा दाँत मनुष्य के समान थे और यह सर्वाहारी था। .

    इसकी खोज एल. बी. वी. लिकी ने की थी।

    जावा मानव (होमो इरेक्टस इरेक्टस)

    • जावा मानव का विकास पूर्व तथा मध्य प्लीस्टोसीन में लगभग 600000 वर्ष पूर्व हुआ।

    • इसका जीवाश्म जावा के त्रिनिल स्थान से प्राप्त हुआ, जिसे डुबॉइस ने खोजा।

    होमो इरेक्टस इरेक्टस नाम मेयर (1950) ने दिया।

    • इसके जबड़े बड़े तथा भारी लेकिन आधुनिक मानव के लगभग समान थे

    • इसकी कपाल क्षमता लगभग 40 घन सेमी थी।

     औसत शारीरिक सम्बाई 170 सेमी तथा भार 70 किग्रा था।

    यह सर्वाहारी था इसने सबसे पहले नि का उपयोग भोजन पकान, अपनी रक्षा करने तथा शिकार में किया था।

    पेकिंग मानव (होमो इरेक्टस पेकिनेंन्सिंस)

    पैकिंग मानत की खोज पाईनै 1924 में चीन के पैकिंग (बीजिंग) की।

    पैकिंग मानव के जीवाश्म लगभग 6 लाख वर्ष पुराने थे।

    इराकी कपाल गुहा का आयराम लगभग 850-1200 घन सेमी था।

    ये जावा मानव की तरह सर्वाहारी तथा कनीयल थे। इनमें ठोड़ी अनुपस्थित थी।

    ये पत्थर के औजारों को शिकार करने तथा अपनी रक्षा के लिए प्रयोग करते थे।

    निएन्डरथल मानव (होमो सेपियन्स निएन्डरथेलेन्सिस)

    जर्मनी की निएन्डर घाटी से 1856 में सी फूलरॉट ने निएन्डरथल मानव के जीवाश्म प्राप्त किए थे। ये सबसे पुराने जीवाश्म है।

    इनका विकास लगभग 150000 वर्ष पूर्व हुआ था और लगभग 25000 वर्ष पहले ये विलुप्त हो गए।  इनकी कपाल गुहा का आयतन 1450 घन सेमी था।

    इनका जबड़ा गहरा, ठोड़ी रहित और खोपड़ी की अस्थियाँ चौड़ी थी।

    ये सर्वाहारी और केनिबल थे और आग का प्रयोग खाना पकाने व गर्म रखने के लिए करते थे।

    ये वास्तविक मनुष्य थे, जिनमें संस्कृति की उत्पत्ति हुई और ये हथियार बनाना भी जानते थे।

    क्रो-मैग्नॉन मानव (होमो सेपियन्स फॉसिलिस)

    ये लगभग 50000 वर्ष पूर्व उत्पन्न हुए तथा 20000 वर्ष पूर्व विलुप्त हो गए। इनके जीवाश्म क्रो-मैग्नॉन (फ्रांस) के पत्थरों से मैक प्रीगर ने 1868 में प्राप्त किया।

    इनकी कपाल गुहा का आयतन 1660 घन सेमी था, जो कि आधुनिक मानव से भी अधिक था अर्थात् ये आधुनिक मानव से अधिक बुद्धिमान थे।

    ये गुफाओं में सुन्दर चित्रकारी करते थे। निएन्डरथल व क्रो-मैग्नॉन दोनों ही आधुनिक मानव के सीधे पूर्वज माने जाते हैं।

    आधुनिक मानव (होमो सेपियन्स)

    लगभग 10000 वर्ष पूर्व आखिरी हिम युग (glacial period) के पश्चात् आधुनिक मानव का विकास क्रो-मैग्नॉन मानव से हुआ।

    इनकी कपाल गुहा का आयतन लगभग 1460 घन सेमी होता है।

    इनमें सेरीब्रम अत्यधिक विकसित होता है। आधुनिक मानव की कुछ प्रजातियाँ निम्न हैं:

    (a) नीग्रोइड्स (Negroids)

    (b) कॉकेसोइड्स (Caucasoids)

    (c) मोन्गोलॉयड्स (Mongoloids)

    डॉ. शैपीरो के अनुसार, होमो सेपियन्स सेपियन्स धीरे-धीरे होमो सेपियन्स फ्युचुरिस में विकसित हो जाएगा इस मानव का मस्तिष्क अधिक उन्नत व जटिल होगा, सिर गुम्बद के आकार का होगा, यह अधिक लम्बा होगा तथा शरीर बाल रहित होगा।

  • आनुवंशिकता किसे कहते है ? आनुवंशिकी (Genetics) की परिभाषा क्या है ? hereditary meaning in Hindi | Biology in Hindi

    आनुवंशिकता किसे कहते है ? आनुवंशिकी (Genetics) की परिभाषा क्या है ? hereditary meaning in Hindi | Biology in Hindi

    इस आर्टिकल में हम जानेगे कि आनुवंशिकता क्या है ? आनुवंशिकी क्या है ? जेनेटिक्स के प्रमुख नियम क्या है ? आनुवंशिक विज्ञान किससे सम्बन्धी है ? मेण्डलवाद(Mendelism) क्या है और इसके प्रमुख नियम कोनसे है ? प्रभाविता का नियम का नियम क्या है ? पृथक्करण का नियम क्या है ? स्वतन्त्र अपव्यूहन का नियम क्या है ? प्रतीप संकरण (Back Cross) और परिक्षार्थ संकरण (Test Cross) क्या होते है ? जीनों में अन्योन्य क्रिया (Interaction in Genes) क्या होती है ? उत्परिवर्तन (Mutation) क्या है ? गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन (Chromosomal Mutation) क्या है ? जीन उत्परिवर्तन (Gene Mutation) क्या होते है ? DNA की संरचना (Structure of DNA) कैसी होती है ? सहलग्नता (Linkage) क्या होती है ? वर्णान्धता (Colour Blindness) क्या होती है ? वाटसन एवं क्रिक मॉडल क्या है ? और साथ ही हम बात करेगे की आनुवंशिक कोड (Genetic Code) क्या होते है और किस तरह महत्वपुर्ण होते है ? साथ ही हम जानेगे मानव जीनोम (Human Genome) क्या है और कैसे यह विज्ञान जगत में महत्वपुर्ण है ? आदि

    आनुवंशिकी Genetics

    जीव विज्ञान की वह शाखा जिसके अंतर्गत आनुवांशिक लक्षणों के संतान में पहुंचने की रीतियों एवं आनुवंशिक समानता एवं विभिन्नताओं का अध्ययन करते हैं आनुवंशिक विज्ञान या आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) कहलाती है।”

    प्रत्येक जीव में बहुत से ऐसे गुण होते हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी माता-पिता से उनकी संतानों में संचारित होते रहते हैं। ऐसे गुणों को आनुवंशिक गुण (Hereditary characters) या पैतृक गुण कहते हैं। जीवों के इन मूल गुणों का संचरण आनुवंशिकता कहलाता है। दूसरे शब्दों में वंशागत लक्षणों (Inherited Characters) का अध्ययन आनुवंशिकता (Heredity) कहलाता है। इसी के कारण ही प्रत्येक जीव के गुण अपने माता-पिता के गुणों के समान होते हैं।  

    जीवों में प्रजनन के द्वारा संतान उत्पन्न करने की अद्भुत क्षमता होती है। संतानों में कुछ लक्षण माता-पिता से पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचते रहते हैं, जिन्हें आनुवंशिक लक्षण कहते हैं। इन्हें आनुवंशिक गुण (Hereditary characters) या पैतृक गुण भी कहा जाता है | इन गुणों का संचरण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जनकों के युग्मकों (Gametes) के द्वारा होता है।

    डब्ल्यू वाटसन ने 1905 में सर्वप्रथम ‘जेनेटिक्स (Genetics)’ शब्द का प्रयोग किया। आनुवंशिकी के क्षेत्र में मार्गन, ब्रिजेज, मूलर, सटन, बीडल, नौरेनबर्ग एवं डॉ. हरगोविन्द खुराना का कार्य अविस्मरणीय है।

    आणविक आनुवंशिकी

    प्रत्येक जीव में गुणसूत्रों की संख्या निश्चित होती है। गुणसूत्र हिस्टोन प्रोटीन एवं न्यूक्लिक अम्ल (डीएनए व आरएनए) से बना होता है। डीएनए एवं आरएनए दोनों ही न्यूक्लियोटाइड के बहुलक होते हैं। न्यूक्लियोटाइड निम्नलिखित पदार्थों से मिलकर बनते हैंः

    1. शर्करा

    2. नाइट्रोजीनस झार

    3. फॉस्फेट

    आनुवंशिक अभियांत्रिकी

    यह एक ऐसी आनुवंशिक तकनीक है जिसमें जीवों के जीन का परिचालन किया जाता है, जिसकी वजह से इसमें जेनेटिक कोड स्थायी रूप से बदल जाते हैं।

    डीएनए की सफलतापूर्वक ग्राफ्टिंग सर्वप्रथम पॉलवर्ग द्वारा की गई थी। इसे डीएनए ैट-40 (सिमियन वायरस-40) से लिया गया था और इसे बैक्टीरिया के डीएनए से मिलाया गया।

    मेण्डलवाद (Mendelism)

    ग्रेगर जॉन मेंडल (1822-84) ने मटर के पौधे पर संकरण का प्रयोग कर आनुवंशिकी के क्षेत्र में एक नयी अवधारणा की शुरूआत की। मेंडल को आनुवंशिकी का जनक या आनुवंशिकी का पिता (Father of Genetics) कहा जाता है। ग्रेगर जॉन मेंडल (Gregor John Mendel) ने अपने वैज्ञानिक खोजों से आधुनिक आनुवंशिकी (Modern genetics) की नींव डाली।

    ग्रेगर जॉन मेंडल (Gregor John Mendel, 1822-84) आस्ट्रिया देश के ब्रून (Brunn) नामक स्थान में ईसाइयों के एक मठ के पादरी थे।

    मेण्डल ने ‘मटर’ (Pisum sativum) के पौधों पर किए गए अपने प्रयोगों पर आधारित निष्कर्षों को आनुवंशिकता के नियमों के रूप में 1865 में “प्रोसिडिंग ऑफ द नैचुरल हिस्ट्री सोसायटी ऑफ बून” पत्रिका में प्रकाशित किया।  मटर के पौधों पर किए गए अपने प्रयोगों के निष्कर्षों को उन्होंने 1866 ई. में Annual proceedings of the natural history society or brunn में प्रकाशित कराया, परन्तु विज्ञान जगत में 34 वर्षों तक इस पर ध्यान नहीं दिया गया।  मेण्डल के कार्यों के महत्त्व को 1900 में ह्यूगो डी ब्रीज (हॉलैण्ड), कार्ल कॉरेन्स (जर्मनी) और एरिक वान शारमैक (आस्ट्रिया) ने विश्व के समक्ष रखा।

    मेण्डल द्वारा लिए गए लक्षणों के प्रभावी तथा अप्रभावी रूप

    लक्षणप्रभावीअप्रभावी
    पौधे की ऊँचाई                      लम्बा बोना 
    पुष्प की स्थिति कक्षस्थ अग्रस्थ 
    फली का रंगहरा पीला 
    फली की प्रकृति फूली हुई संकुचित 
    बीज का आकार गोल झुर्रीदार 
    पुष्प का रंग लाल सफ़ेद 
    बीजपत्र का रंग पीला हरा 

    मेण्डल ने मटर के पौधे में सात जोड़े लक्षण लिए, जो चार अलग-अलग गुणसूत्रों पर उपस्थित थे।

    मेण्डल के आनुवंशिकता के नियम

    मेण्डल ने मटर के विभिन्न गुणों वाले पौधों के बीज का संकरण कराकर वंशागति के तीन महत्वपूर्ण नियमों का प्रतिपादन किया। इन्हें ‘मेण्डल के आनुवंशिकता के नियम’ के नाम से जाना जाता है। इस नियम के अनुसार युग्मकों के निर्माण के समय कारकों (जीन) के जोड़े के कारक अलग-अलग हो जाते हैं और इनमें से केवल एक कारक ही युग्मक में पहुंचता है। दोनों कारक एक साथ युग्मक में कभी नहीं जाते । इस नियम को युग्मकों की शुद्धता का नियम भी कहा जाता है। मेंडल के नियमों में पहला एवं दूसरा एकसंकरीय क्रॉस के आधार पर तथा तीसरा नियम द्विसंकरीय क्रॉस के आधार पर आधारित है।

    ये तीनों नियम इस प्रकार है:

    प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)

    एक जोड़ा विपरीत गुणों वाले शुद्ध पिता और माता में संकरण कराने से प्रथम पीढ़ी में प्रभावीगुण (dominant character) प्रकट होते हैं, जबकि अप्रभावीगुण (recessive character) छिप जाते हैं। जैसे, लाल पुष्प वाले पौधे का सफेद पुष्प वाले पौधे से संकरण कराने पर प्रथम पीढ़ी (R) में केवल लाल में पुष्प वाले पौधे पैदा होते हैं, जबकि सफेद रंग वाला लक्षण दब जाता है। लालरंगप्रभावी (dominant) लक्षण है, जबकि सफेदरंगअप्रभावी (recessive) लक्षण है।

    पृथक्करण का नियम (Law of Segregation)

    इसके अनुसार, युग्मकों के निर्माण के समय कारकों (जीन) के जोड़े के कारक अलग-अलग हो जाते हैं और इनमें से केवल एक कारक ही किसी एक युग्मक में पहुँचता है।

    इस नियम को शुद्धता का नियम (Law of Purity) भी कहते हैं। जब F पीढ़ी के संकर पौधों में स्वपरागण कराया जाता है, तो द्वितीय पीढ़ी में पैतृक लक्षण 3 : 1 के अनुपात में पृथक हो जाते हैं।

    फीनोटिपिक अनुपात = 3:1

    जीनोटिपिक अनुपात = 1 : 2 : 1

    स्वतन्त्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment)

    इस नियम के अनुसार, जब दो जीव दो या दो से अधिक लक्षणों में एक-दूसरे से भिन्न होते हैं, तो उनमें से एक लक्षण की वंशागति पर दूसरे लक्षण की, वंशागति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

    जब गोल पीले बीज वाले पौधे का झुरींदार हरे बीज वाले पौधे से संकरण कराया जाता है, तो F1  पीढ़ी में सभी गोल पीले बीज वाले पौधे उगते हैं, परन्तु F2 पीढ़ी में 9 : 3 : 3 : 1 का फिनोटिपिक अनुपात प्राप्त होता है।

    फीनोटिपिक अनुपात – 9 : 3 : 3 : 1

    जीनोटिपिक अनुपात -1:2:2:4:1:2:1:2:1

    प्रतीप संकरण (Back Cross)

    विषमयुग्मजी F1 संकर का समयुग्मजी प्रभावी जनक से क्रॉस प्रतीप संकरण कहलाता है।

    परिक्षार्थ संकरण (Test Cross)

    विषमयुग्मजी F1 संकर का समयुग्मजी अप्रभावी जनक के साथ क्रॉस परिक्षार्थ संकरण कहलाता है। इस क्रॉस से पता किया जाता है कि कोई पौधा समयुग्मजी है या विषमयुग्मजी।

    परीक्षार्थ संकरण में एकसंकर क्रॉस का अनुपात 1:1 तथा द्विसंकर क्रॉस का अनुपात 1 : 1 : 1 : 1 प्राप्त होता है।

    फिनोटाइप जीवधारी के जो लक्षण प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देते हैं, उसे फिनोटाइप कहते हैं, उदाहरण पौधे का लम्बापन।

    जीनोटाइप जीवधारी के आनुवंशिक संगठन को उसका जीनोटाइप कहते हैं, जो करकों का बना होता है। उदाहरण TT (कोशिकाओं में दो कारक-दोनों लम्बे लक्षण वाले) जीनोटाइप कहलाता है।

    मेण्डलवाद के अपवाद (Exceptions of Mendelism)

    अपूर्ण प्रभाविता (Incomplete dominance) – कुछ लक्षणों की आनुवंशिकता के दौरान मेण्डल का प्रभाविता का नियम पूरी तरह काम नहीं करता। E पीढ़ी की संतति में कोई भी लक्षण पूर्णतया प्रभावी नहीं होता है अर्थात् मध्यवर्ती होता है, इसे अपूर्ण प्रभाविता कहते हैं।

    स्नैपड्रैगन (snapdragon) तथा गुलाबाँस (4 O’ Clock) में लाल (RR) और सफेद (rr) फूलों वाली किस्मों के बीच संकरण के फलस्वरूप F1 पीढ़ी में गुलाबी फूल उत्पन्न होते हैं। इसका कारण यह है कि लाल रंग सफेद पर पूरी तरह प्रभावी नहीं है। अब यदि F1 पीढ़ी के गुलाबी पुष्पों में स्वपरागण होने दिया तो F2पीढ़ी में फीनोटाइप अनुपात 25% लाल (RR), 50% गुलाबी (Rr) व 25% सफेद (rr) प्राप्त होता है।

    सहप्रभाविता (Co-dominance) – इसमें दोनों ही जनकों के लक्षण पृथक रूप से F1 पीढ़ी में प्रकट होते हैं। उदाहरण यदि एक लाल रंग के पशु को श्वेत रंग के पशु से क्रॉस कराया जाता है तो F1 पीढ़ी में चितकबरी सन्तान पैदा होती है।

    बहुविकल्पता (Multiple allelism) – मेण्डल के अनुसार जीन के दो ही विकल्पी रूप होते हैं, परन्तु एक ही जीन के एक ही लोकस पर दो से अधिक एलील हो सकते हैं, जो बहुविकल्पी कहलाते हैं; जैसे – मनुष्य में रुधिर वर्ग A, B, AB और O के लिए तीन एलील (IAIBIO) एक ही लोकस पर स्थित होते हैं।

    जीनों में अन्योन्य क्रिया (Interaction in Genes)

    कभी-कभी दो या दो से अधिक जीन अन्योन्य क्रिया द्वारा एक ही लक्षण को प्रभावित करती है। इस प्रकार की अन्योन्य क्रिया के दौरान कुछ जीन योगात्मक (additive), कुछ पूरक (complementary) तथा कुछ निरोधक (inhibitory) होते हैं।

    पूरक जीन (Complementary gene)

    जब दो नॉन एलीलिक जीन अकेले-अकेले एक ही लक्षण को अभिव्यक्त करते हैं परन्तु एक साथ होने पर पूर्णतया भिन्न लक्षण प्रदर्शित करते हैं, तो ऐसे जीन पूरक जीन कहलाते हैं। उदाहरण लेथाइरस ऑडोरेटस में CCPP से बैंगनी पुष्प, जबकि ccPP एवं CCpp से सफेद पुष्प उत्पन्न होते हैं। इसमें द्विसंकर अनुपात 9 : 7 प्राप्त होता है।

    अनुलिपिक जीन (Duplicate geno)

    एक ही गुणसूत्र पर समान प्रभाव दिखने वाले दो जीन अनुलिपिक जीन कहलाते हैं। उदाहरण के तौर पर कैपसेला फलों का प्रकार A तथा B जीन से नियन्त्रित होता है। इसमें द्विसंकर अनुपात 15 : 1 प्राप्त होता है।

    प्रबलता (Epistasis)

    इसमें एक जीन दूसरे नॉन-एलीलिक जीन के प्रभाव को छिपा देता है। अप्रभावी प्रबलता में 9 : 3 : 4 का द्विसंकर अनुपात, जबकि प्रभावी प्रबलता में 12 : 3 : 1 का द्विसंकर अनुपति प्राप्त होता है।

    संदमक जीन (Inhibitory gene)

    पृथक गुणसूत्रों पर उपस्थित प्रभावी जीन पारस्परिक क्रिया से दूसरे जीन के लक्षण को अप्रभावी कर देते हैं। इसी कारण द्विसंकर क्रॉस का अनुपात बदलकर 13 : 3 हो जाता है।

    बहुजीनी या मात्रात्मक वंशागति (Polygenic or Quantitative inheritance)

    जब एक लक्षण एक से अधिक जीनों द्वारा नियन्त्रित होता है। गेहूँ में केरनल रंग के लिए बहुजीनी वंशागति, जिसमें द्वितीय पीढ़ी में 1: 4:6:4:1 का अनुपात प्राप्त होता है।

    बाह्य केन्द्रकीय वंशागति

    माइटोकॉण्ड्रिया तथा हरितलवक में उपस्थित आनुवंशिक कारक को प्लाज्मा जीन तथा उसके समूह को प्लाज्मोन कहते हैं। युग्मनज को अधिकांश कोशिकाद्रव्य मादा युग्मक से प्राप्त होता है इसलिए संतति प्रायः मादा जनक के समान होती है। घोंघे की खोल में कुण्डलन तथा मक्का में कोशिकाद्रव्यी नर नपुंसकता की वंशागति बाह्य केन्द्रकीय आनुवंशिक पदार्थ द्वारा ही होती है।

    उत्परिवर्तन (Mutation) क्या होते है ? उत्परिवर्तन (Mutation) के प्रकार

    किसी जाति के पौधों या जन्तुओं में, जो आकस्मिक विभिन्नताएँ उत्पन्न हो जाती हैं, उन्हें उत्परिवर्तन कहते हैं अर्थात् जीन अथवा गुणसूत्र की संरचना या संख्या में वंशागत परिवर्तन होना उत्परिवर्तन कहलाता है।

    प्रकृति में अपने-आप होने वाले उत्परिवर्तन प्राकृतिक (spontaneous) तथा X,  β, γ एवं UV-किरणों सहित रासायनिक पदार्थों (मस्टर्ड गैस, इथाइल मीथेन सल्फोनेट, मिथाइल मीथेन सल्फोनेट) आदि के द्वारा प्रेरित किए जाने वाले उत्परिवर्तन कृत्रिम (induced) कहलाते हैं।

    उत्परिवर्तन (Mutation) के प्रकार

    आकार के आधार पर उत्परिवर्तन दो प्रकार के होते हैं

    (i) गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन

    (ii) जीन उत्परिवर्तन

    गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन (Chromosomal Mutation) क्या होते है ?

    इसके अन्तर्गत संरचनात्मक गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन एवं संख्यात्मक गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन आते हैं।

    संरचनात्मक गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन गुणसूत्र के किसी भाग की हानि (अभाव), किसी भाग के द्विगुणन, एक गुणसूत्र के किसी भाग का दूसरे गुणसूत्र पर स्थानान्तरण तथा प्रतिपन (180° पर घूमने) के कारण होता है, जबकि संख्यात्मक गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन एक या अधिक गुणसूत्र की कमी या अधिकता के कारण या फिर गुणसूत्रों की संख्या या उनके जीनोम के गुणांक में होने से होता है।

    संरचनात्मक गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन एवं संख्यात्मक गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन विशेषताएँ और अन्तर

    संरचनात्मक                                                संख्यात्मक
    अमाव सिरे पर या अन्तराली भाग में गुणसूत्र की हानि होती है, यह समयुग्मी अवस्था में हानिकारक होता है, समजात गुणसूत्रों में सिनैप्सिस के समय पता चलता है।एन्यूप्लॉइडी इसमें द्विगुणित गुणसूत्रों की संख्या से एक या अधिक गुणसूत्र कम या अधिक हो जाते हैं; जैसे-मोनोसोमी (2n – 1), नलीसोमी (2n – 2), ट्राइसोमी (2n + 1), टेट्रासोमी (2n + 2) आदि। मानव में डाउन सिन्ड्रोम, एडवार्ड सिन्ड्रोम, पटाऊ सिन्ड्रोम, क्लाइनफेल्टर सिन्ड्रोम ट्राइसोमी के उदाहरण हैं।
    द्विगुणन कुछ जीनों के दो या अधिक बार एक ही गुणसूत्र में जुड जाने से उत्पन्न उदाहरण ड्रोसोफिला में बार आँखें।यूप्लॉइडी जीवों में गुणसूत्रों की संख्या, उनके जीनोम के गुणांक में होती है, इसलिए ये डिप्लॉइड, पॉलीप्लॉइड होते हैं। पॉलीप्लॉइडी दो प्रकार की होती हैं
    स्थानान्तरण एक गुणसूत्र का भाग दूसरे असमजात गुणसूत्र पर स्थानान्तरित होता है, साधारण (एक गुणसूत्र में हानि, जबकि असमजात गुणसूत्र में जोड़) या पार (असमजात गुणसूत्रों में आदान-प्रदान) हो सकता है।स्वबहुगुणिता बहुगुणित गुणसूत्र एक ही जाति के होते हैं यह F, संकर में कोल्चीसीन से गुणसूत्रों की संख्या दुगुनी करके उत्पन्न की जाती है। इसके कारण पत्तियों, फूलों तथा फलों का आकार बड़ा हो जाता है।
    प्रतिपन गुणसूत्र का कोई भाग 180° पर घूम जाता है। यदि इसमें सेन्ट्रोमीटर भाग लेता है, तो इसे पेरासेन्ट्रिक और यदि सेन्ट्रोमीयर भाग नहीं लेता, तो पैरासेन्ट्रिक प्रतिपन कहते हैं।परबहुगुणिता ये विभिन्न जातियों अथवा वंशों के संकरण से बनते हैं। उदाहरण रेफेनोफ्रेसिका, रेफेनस सटाइवस तथा बॅसिका ओलेरेशिया के संकरण से प्राप्त की गयी थी तथा ट्रिटिकेल, ट्रिटिकम ड्यूरम व सिकेल सिरेल के संकरण से बनाया गया है।

    जीन उत्परिवर्तन (Gene Mutation) क्या होते है ?

    यह न्यूक्लियोटाइड के प्रकार या उनके क्रम में बदलाव के कारण होता है। गेहूँ की सरबती सोनारा, सोनारा 64 में गामा किरणों द्वारा उत्परिवर्तन से पैदा की गई है।

    विस्थापन   फ्रेमशिफ्ट  टॉटोमेराइजेशन
    ट्रांजिशन एक प्यूरीन क्षार (A और G) का दूसरे प्यूरीन क्षार या एक पिरीमिडीन क्षार ( और C) का दूसरे पिरीमिडीन क्षार से विस्थापनन्यूक्लियोटाइड की श्रृंखला में एक क्षार कम या अधिक हो जाने पर पॉलीपेप्टाइड बनाने की सूचना पार्श्व दिशाओं में खिसक जाती है और बनने वाली पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला पूर्णरूप से बदल जाती है। उदाहरण थेलेसीमिया रोगDNA या RNA में प्यूरीन तथा पिरीमिडीन क्षार के किसी में प्रोटॉन व इलेक्ट्रॉन की पुनर्व्यवस्था।
    ट्रांसवर्जन एक प्यूरीन क्षार का पिरीमिडीन क्षार से या पिरीमिडीन क्षार का प्यूरीन क्षार से विस्थापन।  

    जीन और डीएनए से जुड़े कुछ महत्वपुर्ण फैक्ट्स

    • जीन DNA का एक खण्ड है, जो प्रोटीन संश्लेषण को नियन्त्रित करता है।
    • बेन्जर ने ‘सिस्ट्रॉन’ अर्थात् जीन की कार्यात्मक इकाई, ‘रिकॉन’ अर्थात रिकॉम्बिनेशन की इकाई तथा ‘म्यूटॉन’ अर्थात् उत्परिवर्तन की इकाई शब्दों का प्रतिपादन किया।
    • यूकैरियोट में जीन सतत् नहीं होते वरन् इन्ट्रॉन और एक्सॉन में विभक्त होते हैं। ऐसे जीन विभक्त जीन (split gene) कहलाते हैं।
    • विपुन्सन’ द्विलिंगी पुष्प में परागकोशों के पकने एवं फटने से पूर्व ही उनको पृथक करना है।
    • ‘ऑक्सोट्रॉफ’ एक उत्परिवर्ती (mutant) जीव है, जिसमें एक या अधिक आवश्यक यौगिकों को संश्लेषित करने की क्षमता समाप्त हो चुकी है।
    • ‘क्लोन’ एक ही जनक से अलैंगिक जनन द्वारा बनने वाला जीव।
    • एच. जे. मुलर ने ड्रोसोफिला में सर्वप्रथम X-rays से उत्परिवर्तन किया।
    • ‘सौपरिवेशकी’ उत्तम परिस्थितियाँ उत्पन्न कर मानव समाज को सुधारना।

    सहलग्नता (Linkage) क्या है ?

    यह मेण्डल के स्वतन्त्र अपव्यूहन नियम का अपवाद है। जब दो विभिन्न लक्षण एक ही गुणसूत्र में बँधे होते हैं, तो उनकी वंशागति स्वतन्त्र न होकर एक साथ ही होती है। इसी को मॉर्गन ने ‘सहलग्नता’ कहा। \

    गुणसूत्र पर दो जीन, जितने निकटवर्ती होंगे (दूरी जितनी कम होगी) उनके बीच सहलग्नता उतनी ही तीव्र होगी। सहलग्न समूहों की संख्या अगुणित समूह में उपस्थित गुणसूत्रों की संख्या के बराबर होती है। पूर्ण सहलग्नता (complete linkage) में पैतृक संयोजन दो या तीन पीढ़ी में लगातार प्राप्त होते हैं, जबकि अपूर्ण सहलग्नता (incomplete linkage) में सहलग्न जीन विनियम (crossing over) के कारण अलग हो जाते हैं और 50% से कम पुनर्संयोजन (recombinant) मिलते हैं। सहलग्नता से जीनों का पुनयोजन सीमित रह जाता है। अत: जातीय लक्षणों के एक साथ बने रखने में सहायक होती है। वर्णान्धता (colour blindness) तथा हीमोफीलिया (haemophilia) मानव में लिंग सहलग्नता के उदाहरण हैं।

    वर्णान्धता (Colour Blindness) क्या है ?

    इस रोग से ग्रसित व्यक्ति लाल व हरे रंग का भेद नहीं कर पाता। इसका जीन X-गुणसूत्र पर उपस्थित होता है तथा अप्रभावी होता है।

    उदाहरण एक वर्णान्ध स्त्री का विवाह एक सामान्य पुरुष से होने पर उससे उत्पन्न सन्तानों में पुत्रों में वर्णान्धता के गुण होंगे, जबकि पुत्रियाँ वाहक (सामान्य) होंगी।

    हीमोफीलिया या ब्लीडर रोग (Haemophilia or Bleeder’s Disease)

    इस रोग में रोगी के खून का थक्का नहीं जम पाता है या काफी देर से बनता है। यह रोग अप्रभावी X- सहलान जीन के कारण होता है। उदाहरण हीमोफिलिक पुरुष और सामान्य स्त्री से उत्पन्न सन्तानों में से सभी पुत्रियाँ वाहक, जबकि सभी पुत्र सामान्य होंगे।

    लिंग-निर्धारण (Sex-Determination)

    मनुष्य में XY प्रकार के गुणसूत्रों द्वारा लिंग निर्धारण होता है। मनुष्य की प्रत्येक कोशिका में 46 गुणसूत्र अर्थात् 23 जोड़े होते हैं, जिनमें 22 जोड़े नर तथा मादा में एक समान होते हैं। इन 22 जोड़ों को अलिंगसूत्री युग्म या सहसूत्री युग्म (autosomes) कहते हैं। 23वें जोड़े को लिंग गुणसूत्र कहते हैं, जिसे पुरुष में XY से प्रदर्शित करते हैं, जबकि स्त्रियों में इसे XX से प्रदर्शित करते हैं।

    शुक्रजनन में अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा दो प्रकार के शुक्राणु बनते हैं आधे वे, जिनमें 23वीं जोड़ी का X- गुणसूत्र आता है अर्थात् (22 + X) और आधे वे, जिनमें 28वाँ जोड़ा Y- गुणसूत्र (22 + Y) जाता है। स्त्रियों में एक समान प्रकार का गुणसूत्र अर्थात् (22 + X) तथा (22 + X) वाले अण्डाणु पाए जाते हैं। निषेचन के दौरान यदि अण्डाणु X- गुणसूत्र वाले शुक्राणु से मिलता है, तो इससे बनने वाली सन्तान लड़की होगी। इसके विपरीत यदि अण्डाणु Y- गुणसूत्र वाले शुक्राणु से निपेचित होगा, तब सन्तान लड़का होगा अर्थात् पुरुष का Y-गुणसूत्र सन्तान में लिंग निर्धारण के लिए उत्तरदायी है।

    मधुमक्खियों में लिंग-निर्धारण इस बात पर निर्भर करता है कि सन्तान का विकास निपेचित अण्ड से हो रहा है या अनिषेचित अण्ड से। निषेचित अण्ड द्विगुणित (diploid) होता है इससे मादा मधुमक्खी का विकास होता है। मधुमक्खी के अनिषेचित अण्ड अगुणित होते हैं इनसे ड्रोन (drone) बनते हैं। मेलेन्ड्रियम, कोक्सीनिया, स्फीरोकार्पस नामक पौधों में लिंग निर्धारण की क्रिया का अध्ययन किया गया है।

    DNA की संरचना (Structure of DNA)

    DNA में उपस्थित नाइट्रोजनी क्षारक चार प्रकार के होते हैं; जैसे – एडीनीन (A), ग्वानीन (G), थायमीन (T) एवं साइटोसीन (C)

    सन् 1953 में वाटसन और क्रिक द्वारा DNA का द्विकुण्डलित प्रतिरूप बनाया जिसके अनुसार,

    (i) DNA का प्रत्येक अणु दो कुण्डलित पॉलिन्यूक्लियोटाइड शृंखलाओं का बना होता है। ये दोनों श्रृंखलाएँ एक-दूसरे पर सर्पिल क्रम में लिपटी होती हैं।

    (ii) प्रत्येक पॉलिन्यूक्लियोटाइड श्रृंखला में डीऑक्सीराइबोज शर्करा और फॉस्फेट समूह एकान्तर क्रम में जुड़कर श्रृंखला का आधार तैयार करती है। फॉस्फेट समूह एक तरफ की शर्करा के 5′ कार्बन पर तथा दूसरी ओर 3’ कार्बन पर फॉस्फो डाइएस्टर बन्ध द्वारा जुड़ी होती है। दोनों शृखलाएँ प्रतिसमानान्तर दिशा में कुण्डलित होती हैं।

    (iii) एडीनीन और थायमिन के बीच दो हाइड्रोजन बन्ध तथा साइटोसीन और ग्वानीन के बीच तीन हाइड्रोजन बन्ध होते हैं।

    (iv) एक ही शृंखला में किन्हीं दो न्यूक्लियोटाइड्स के बीच 3.4 Å की दूरी होती है।

    वाटसन एवं क्रिक मॉडल

    DNA का द्विगुणन

    वाटसन एवं क्रिक ने DNA द्विगुणन की अर्धसरक्षी विधि (semiconservative method) का प्रतिपादन किया का द्विगुणन समारंभन बिन्दु (initiation point) से शुरू होता है। हेलिकेस एन्जाइम DNA के दोनों रज्जुओं को पृथक कर देता है तथा प्रत्येक रज्जुक, एकल रज्जुक बन्धन प्रोटीन (single strand binding protein) की सहायता से DNA स्थिर हो जाता है |

    टोपोआइसोमेरेस एन्जाइम रज्जुक में कुण्डलन के तनाव को समाप्त करता है। प्रत्येक रज्जुक फर्म (template) की तरह कार्य करता है। बहुलीकरण (polymerization) से पूर्व प्राइमेस एन्जाइम की सहायता से रज्जुक के 3′ छोर के पूरक RNA प्राइमर का संश्लेषण होता है, जिससे आगे DNA पॉलीमरेस-III द्वारा बहुलीकरण होता है।

    अग्रग रज्जुक (Leading strand) पर 5′ → 3′ दिशा में सतत् (continuous) संश्लेषण होता है, जबकि पश्चगामी रज्जुक (lagging strand) पर छोटे-छोटे टुकड़ों, जिन्हें ओकाजाकी टुकड़े कहते हैं, में असतत् (discontinuous) संश्लेषण होता है। प्रत्येक ओकाजाकी टुकड़े के लिए एक अलग RNA प्राइमर बनता है।

    ओकाजाको टुकड़े के पूर्ण निर्मित होने पर DNA पॉलीमरेस-I द्वारा RNA प्राइमर को हटा दिया जाता है और DNA लाइगेज एन्जाइम ओकाजाकी टुकड़ों को जोड़ने का कार्य करता है।

    DNA एवं RNA में अन्तर

    DNARNA
    इसमें डीऑक्सीराइबोज़ शर्करा होती है।इसमें राइबोज शर्करा होती है।
    क्षार, एडीनीन, ग्वानीन, थायमीन तथा साइटोसीन होते हैं।थायमीन के स्थान पर यूरेसिल होता है।
    मुख्यतया केन्द्रक तथा कुछ मात्रा में माइटोकॉण्ड्रिया व हरितलवक में पाया जाताकेन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य दोनों में पाया जाता है।
    आनुवंशिक लक्षणों की वंशागति का कार्य करता है।कुछ विषाणुओं में आनुवंशिक पदार्थ तथा प्रोटीन संश्लेषण (सभी जीवों में) का कार्य करता है।

    आनुवंशिक कोड (Genetic Code) क्या होते है ?

    आनुवंशिक कोड mRNA अणुओं में स्थित नाइट्रोजनी क्षारों का वह क्रम है, जिसमें प्रोटीन संश्लेषण के लिए संदेश निहित (कूटित) होते हैं। एक अमीनो अम्ल के लिए संदेश देने वाला न्यूक्लियोटाइड का समूह कोडॉन कहलाता है। आनुवंशिक कोड की खोज नौरेनबर्ग एवं मथाई ने की थी।

    1. AUG तथा GUG (कभी-कभी) प्रारम्भिक कोडॉन, जबकि UAA, UGA, UAG समापन कोडॉन हैं। 2. जेनेटिक कोड अपभ्रष्टता (degeneracy), कोमाविहीन, सार्वत्रिकता, नॉन-ओवरलेपिंग होता है।

    3. जेनेटिक कोड असंदिग्धता दर्शाता है अर्थात् एक विशिष्ट कोडॉन एक ही अमीनो अम्ल को कोड करता है।

    4. एच सी क्रिक ने वोवल हाइपोथेसिस प्रस्तुत की, जिसके अनुसार, एक कोडॉन की विशिष्टता प्रथम दो क्षारकों द्वारा निर्धारित होती है।

    मानव आनुवंशिक रोग

    रंजकहीनताइसमें टाइरोसीनेज एन्जाइम अनुपस्थित
    एल्केप्टोन्यूरियाहोमोजेन्टिसिक अम्ल ऑक्सीडेज में उत्परिवर्तन
    दात्र कोशिका अरक्तताहीमोग्लोबिन में ग्लूटामिक अम्ल के स्थान पर वैलीन
    फिनाइलकीटोनूरियाफिनाइलएलेनीन हाइड्रोक्सीलेज की अनुपस्थिति
    थैलेसीमियाहीमोग्लोविन संश्लेषण की कमी
    डाउन्स सिन्ड्रोम21वीं जोड़ी गुणसूत्र की ट्राइसोमी
    एडवार्ड सिन्ड्रोम18वीं जोड़ी गुणसूत्र की ट्राइसोमी
    टर्नर सिन्ड्रोममादा में 45 (44+XO) गुणसूत्र
    क्लाइनफेल्टर सिन्ड्रोम44+ XXY गुणसूत्र
    क्राइ-डू-चैट सिन्ड्रोमपाँचवें गुणसूत्र की छोटी भुजा में हानि
    पटाऊ सिन्ड्रोम13वें गुणसूत्र की ट्राइसोमी

    प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis) एवं क्रिया

    पॉलीपेप्टाइड शृंखला के निर्माण हेतु सर्वप्रथम DNA के अणु के एक विशिष्ट खण्ड के द्वारा सूचना न्यूक्लियोटाइड के त्रिक (triplot) संकेतों के रूप में mRNA पर अनुलेखित हो जाती है। mRNA पर अनुलेखित सूचना का अनुवादन (RNA के द्वारा अमीनो अम्लों को निश्चित क्रम में जोड़कर प्रोटीन के रूप में किया जाता है अर्थात् प्रोटीन संश्लेषण में आनुवंशिक कोड द्वारा सूचनाओं का DNA से mRNA में अनुलेखन तथा mRNA से प्रोटीन में अनुलिपीकरण होता है।

    DNA (जीन्स) का प्रोटीनों तक सूचना का यह अप्रत्यक्ष प्रवाह सैन्ट्रल डोग्मा कहलाता है। तथापि कुछ प्रतिगामी विषाणुओं (rotrovirusos), जैसे HIV, रॉस सारकोमा वाइरस में RNA से DNA का संश्लेषण होता है, जिसे टेमिन एवं बाल्टीमोर ने खोजा।

    जॉर्ज बीडल एवं एडवर्ड टेटम ने न्यूरोस्पोरा क्रासा पर आनुवंशिक प्रयोग किए तथा एक जीन-एक एन्जाइम परिकल्पना प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार, एक जीन-एक एन्जाइम को नियन्त्रित करता है।

    प्रोटीन संश्लेषण की दो क्रियाएँ

    अनुलेखनअनुलिपीकरण
    DNA पर, RNA पॉलीमरेज की सहायता से RNA का बनना।राइबोसोम पर mRNA के निर्देश tRNA व अमीनो अम्लों की सहायता से प्रोटीन का बनना। 
    प्रोकिरियोट में एक ही RNA पॉलीमरेज से तीनों RNA (अर्थात् mRNA, tRNA व rRNA) का संश्लेषण होता है, जबकि युकैरियोट में RNA पॉलीमरेज-I से rRNA, RNA पॉलीमरेज-II से mRNA तथा RNA पॉलीमरेज-III से tRNA का संश्लेषण होता है।एक विशिष्ट अमीनो अम्ल ATP एन्जाइम से क्रिया कर AA-AMP एन्जाइम कॉम्पलैक्स बनाता है, जो tRNA के 3′ छोर पर जुड़ता है अमीनो अम्ल का सक्रियण अमीनो एसाइल tRNA सिन्थेटेस एन्जाइम द्वारा उत्प्रेरित होता है।
    DNA के जिस रज्जुक पर RNA का संश्लेषण होता है, उसे एक निश्चित अमीनो अम्ल के लिए विशिष्ट IRNA होता है। टेम्पलेट रज्जुक या एन्टीसेन्स या नॉन-कोडिंग रज्जुक कहते हैं।एक निश्चित अमीनो अम्ल के लिय विशिष्ट tRNA होता है |
    ई. कोलाई में RNA पॉलीमरेज पाँच पॉलीपेप्टाइड शृंखलाओ 2 α β β’ तथा ω से मिलकर बना होता है।mRNA समारम्भन कारक (Initiation factor) की उपस्थिति में राइबोसोम की छोटी इकाई से जुड़ जाता है। 
    जीवाणु RNA पॉलीमरेज आरम्भ स्थल से कुछ पहले प्रोमोटर भाग, जो 20-200 क्षारकों का एक विशिष्ट क्रम है, पर जुड़ता है।प्रोटीन संश्लेषण मेथयोनीन अमीनो अम्ल से आरम्भ होता है 
    जीवाणु में mRNA के प्रथम क्षारक से 5-10 क्षारक बायीं ओर कन्सेन्सस अनुक्रम युक्त प्रिनो बॉक्स होता है, जबकि यूकैरियोट में TATA बॉक्स या होगनेस बॉक्स होता है।प्रोकैरियोट में तीन समारम्भन कारक (initiation factor), जबकि यूकैरियोट में नौ समारम्भन कारक होते हैं।
    RNA का संश्लेषण 5’   3’ दिशा में होता है।समारम्भन कोडॉन के लिए विशेष अमीनो एसाइल tRNA कॉम्पलेक्स राइबोसोम की P-site तक पहुँचता है और इसका एन्टीकोडॉन भाग mRNA के कोडॉन से हाइड्रोजन बन्धों द्वारा जुड़ जाता है। यह क्रिया GTP की उपस्थिति में होती है।

    येनोटस्की ने एक जीन-एक पॉलीपेप्टाइड विचार धारा प्रस्तुत की।

    1. पहले कृत्रिम जीन का निर्माण हरगोविन्द खुराना ने 1970 में यीस्ट एलेनीन tRNA के लिए किया था

    2. ग्रिफिथ ने सर्वप्रथम प्रमाणित किया कि DNA एक आनुवंशिक पदार्थ है।

    जम्पिंग जीन

    इस जीन की खोज बारबरा मैकक्लिनटॉक ने की थी। इसका अर्थ- किसी जीन का अपने स्थान से न निकलकर उसी गुणसूत्र में दूसरे स्थान पर या दूसरे किसी गुणसूत्र में जाकर जुड़ जाना है और इस प्रकार नए लक्षण प्रारूपों को जन्म देती है। आभासी जीन वे जीन, जो कार्यात्मक जीन के समजात होते हैं परन्तु अभाव, जुड़ाव या प्रोमोटर भाग की अक्रियाशीलता के कारण कार्यात्मक उत्पाद पैदा करने में असमर्थ होती है।

    मानव जीनोम (Human Genome)

    डॉ. वाटसन मानव जीनोम परियोजना के प्रमुख निर्देशक थे इस सन्दर्भ में अमेरिकी सरकार ने 1988 में मानव जीनोम परियोजना नाम की परियोजना शुरू की। इस परियोजना के अध्यक्ष डा. कालिंस ने अप्रैल 2000 में घोषणा की कि अब तक मानव जीनोम के 3 अरब क्षार जोड़ों में से दो अरब क्षार जोड़ों की डिकोडिंग हो चुकी है। अभी हाल में हैदराबाद में स्थित सेन्टर फॉर सेल एण्ड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (CCMB) में एक ह्यमन जीन डायमर्सिटी प्रोजेक्ट शुरू किया गया है, जिसमें अण्डमान व निकोबार द्वीप समूह पर रहने वाली चार प्राचीन जनजातियों के जीनोम का पता लगाया जाएगा।

    स्मार्ट फैक्ट्स

    एलील या युग्मविकल्पी (allele) एक ही जीन के दो या अधिक विकल्प; जैसे-लम्बापन (T) और बौनापन (t) एक दूसरे के एलील हैं।

    एकसंकर क्रॉस (Monohybrid cross) एक जोड़ी लक्षणों को लेकर कराया गया क्रॉस

    व्युत्पन्न क्रॉस (Reciprocal cross) जनक, पादपों की लैंगिकता को परस्पर बदलकर कराया गया क्रॉस।

    घातक जीन (Lethal gene) जीन, जो किसी जीव की मृत्यु का कारण बनते हैं।

    एपिस्टेटिक जीन (Epistatic gene) एक जीन, जो दूसरे नॉन एलिलिक जीन के प्रभाव को छिपा देता है।

  • कोशिका विभाजन (Cell Division) क्या है ?  कोशिका चक्र क्या है ? | अर्द्धसूत्री विभाजन एवं समसूत्री विभाजन in Hindi

    कोशिका विभाजन (Cell Division) क्या है ? कोशिका चक्र क्या है ? | अर्द्धसूत्री विभाजन एवं समसूत्री विभाजन in Hindi

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की कोशिका विभाजन (cell division) क्या होता है ? koshika vibhajan के प्रकार क्या है ? koshika vibhajan क्यों जरूरी है ? साथ ही हम जानेगे कि समसूत्री कोशिका विभाजन और अर्द्धसूत्री विभाजन क्या है | समसूत्री कोशिका विभाजन और अर्द्धसूत्री विभाजन की परिभाषा, उनमे अंतर और उनके प्रकार क्या है ? आदि

    कोशिका विभाजन (Cell Division) क्या है ?

    कोशिका विभाजन का आशय उस प्रक्रिया से है, जिसके अन्तर्गत एक कोशिका से दो कोशिकाओं का निर्माण होता है, जिससे जीवों में प्रजनन और वृद्धि सम्भव हो पाती है। इस घटना में पहले DNA का द्विगुणन और फिर केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य का विभाजन होता है।  कोशिका विभाजन सभी जीवों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसमे कोशिका विभाजन के दौरान डीएनए प्रतिकृति व कोशिका वृद्धि होती है। ये सभी प्रक्रियाएं जैसे कोशिका विभाजन, डीएनए प्रतिकृति और कोशिका वृद्धि एक दूसरे के साथ समायोजित होकर, इस प्रकार संपन्न होती हैं कि कोशिका विभाजन सही होता है व संतति कोशिकाओं में इनकी पैतृक कोशिकाओं वाला जीनोम होता है।

    कोशिका विभाजन के प्रकार

    कोशिका विभाजन प्रमुख रुप से तीन प्रकार का होता है

    1. असूत्री विभाजन – प्रोकैरियोटिक जीवों में

    2. सूत्री विभाजन या समसूत्री विभाजन – कायिक कोशिकाओं में

    अर्द्धसूत्री विभाजन – जननिक कोशिकाओं में

    कोशिका विभाजन और कोशिका चक्र

    सभी सजीवों की कोशिकाएं दो भागों में विभाजित होकर जनन करती है, जिसमे प्रत्येक पैतृक कोशिका विभाजित होकर दो नई संतति कोशिकाओं का निर्माण करती है ये नव निर्मित संतति कोशिकाएं स्वयं वृद्धि एवं पुन: विभाजन करती है |

    कोशिका चक्र क्या है ?

    कोशिका विभाजन सभी जीवों के लिय एक महत्वपुर्ण प्रक्रिया है | एक कोशिका विभाजन के दौरान डीएनए प्रतिकृति व कोशिका वृद्धि होती है कोशिका अपने जीनोम का द्विगुणन व अन्य संघटकों का संश्लेषण और तत्पश्चात विभाजित होकर दो नई संतति कोशिकाओं का निर्माण करती है, इसे कोशिका चक्र कहते है | यद्यपि कोशिका वृद्धि (कोशिकाद्रव्यीय वृद्धि के संदर्भ में) एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें डीएनए का संश्लेषण कोशिका चक्र की किसी एक विशिष्ट अवस्था में होता है। कोशिका विभाजन के दौरान, प्रतिकृति गुणसूत्र (डीएनए) जटिल घटना क्रम के द्वारा संतति केंद्रकों में वितरित हो जाते हैं। ये सारी घटनाएं आनुवंशिक नियंत्रण के अंतर्गत होती हैं।

    एक प्ररूपी (यूकेरियोटिक) चक्र का उदाहरण मनुष्य की कोशिका के संवर्द्धन में होता है, जो लगभग प्रत्येक चौबीस घंटे में विभाजित होती है। यद्यपि कोशिका चक्र की यह अवधि एक जीव से दुसरे जीव एवं कोशिका से दूसरी कोशिका प्रारूप के लिए बदल सकती है। उदाहरणार्थ- यीस्ट के कोशिका चक्र के पूर्ण होने मेंलगभग नब्बे मिनट लगते हैं।

    कोशिका चक्र की प्रावस्थाएँ

    कोशिका चक्र की अवधि एक जीव से दुसरे जीव एवं कोशिका से दूसरी जीव एवं कोशिका से दूसरी कोशिका प्रारूप के लिय बदल सकती है | कोशिका चक्र की दो मूल प्रावस्थाए होती है जो निम्न है :

    • अंतरावस्था (Interphase)
    • एम (M) प्रावस्था (सूत्री विभाजन) (Mitosis Phase)

    अन्तरावस्था (interphase)

    सूत्री विभाजन के प्रारम्भ से पहले एक अन्तरावस्था (interphase) होती है इसमें G1, S तथा G2,  उप-अवस्थाएँ होती हैं। अंतरावस्था को विश्राम अवस्था भी कहते है | यह वह प्रावस्था जिसमे कोशिका विभाजन के लिय तैयार होती है तथा इस दौरान क्रमबद्ध तरीके से कोशिका वृद्धि एवं डीएनए का प्रतिकृतिकरण दोनों होते है अंतरावस्था को तीन प्रावस्थाओं या उप-अवस्थाएँ में विभाजित किया जाता है :

    1. पश्च सूत्री अन्तरकाल प्रावस्था (G1 Phase या जी1 प्रावस्था)

    2. संश्लेषण प्रावस्था (S Phase या एस प्रावस्था)

    3. पुर्व – सूत्री विभाजन अंतरालकाल प्रावस्था (G2 Phase या जी2 प्रावस्था)

    G1 – प्रोटीन एवं RNA का संश्लेषण होता है।

    S – इसमें DNA का द्विगुणन एवं हिस्टोन प्रोटीन का संश्लेषण होता है।

    G2 – RNA व प्रोटीन का संश्लेषण होता है।

    G0 – इसमें कोशिका विशेषीकृत हो जाती है और इसके बाद कोशिका विभाजन नहीं होता।

    जी1 प्रावस्था में कोशिका उपापचयी रूप में सक्रिय होती है, एवं लगातार वृद्धि करती है, परन्तु इसका डीएनए प्रतिकृति नही करता है | एस प्रावस्था या संश्लेषण प्रावस्था के दौरान डीएनए का निर्माण एवं इसकी प्रतिकृति होती है | इस दौरान डीएनए की मात्रा दुगुनी हो जाती है |

    प्राणी कोशिका में एस प्रावस्था के दौरान केन्द्रक में डीएनए का जैसे ही प्रतिकृतिकरण प्रारम्भ होता है वैसे ही तारककेंद्र का कोशिकाद्रव्य में प्रतिकृतिकरण होने लगता है, कोशिका वृद्धि के साथ सूत्री विभाजन हेतु जी2 प्रावस्था के दौरान प्रोटीन का निर्माण होता है |

    जो कोशिकाएं आगे विभाजित नही होती है जी1 प्रावस्था से निकल कर निष्क्रिय अवस्था में पहुचती है, जिसे कोशिका चक्र की शांत अवस्था (G0) कहते है |

    प्राणियों में सूत्री विभाजन केवल द्विगुणित कायिक कोशिकाओं में ही दिखाई देता है | इसके विपरीत पादपों में सूत्री विभाजन अगुणीत एवं द्विगुणीत दोनों कोशिकाओं में दिखाई देता है |

    सूत्री कोशिका विभाजन या समसूत्री विभाजन (Mitosis)

    सभी जन्तुओं और पौधों में, जनन कोशिकाएँ एवं अन्य सारी कोशिकाएँ सूत्री विभाजन से विभाजन करती हैं। इस कोशिका विभाजन की खोज डब्ल्यू. फ्लेमिंग ने की। यह सभी प्रकार के कायिक कोशिकाओं (vegetative cells) में होती है। इसमें एक द्विगुणित मातृ-कोशिका से दो समान सन्तति कोशिकाएँ बनती हैं। सूत्री विभाजन की प्रक्रिया दो भागों केन्द्रक विभाजन एवं कोशिकाद्रव्य विभाजन में सम्पन्न होती है।

    सूत्री विभाजन  (एम (M) प्रावस्था) उस अवस्था को व्यक्त करता है, जिसमे वास्तव में कोशिका विभाजन या समसूत्री विभाजन होता है, और अंतरावस्था दो क्रमिक एम प्रावस्थाओं के बीच की प्रावस्था को व्यक्त करता है, कोशिका चक्र की कुल अवधि की 95 प्रतिशत से अधिक की अवधि अंतरावस्था में ही व्यतीत होती है |

    सूत्री विभाजन  का आरम्भ केन्द्रक के विभाजन (Kayokinesis कैरियो काईनेसिस) और इसका अंत कोशिका द्रव्य विभाजन (Cytokinesis साईटो काईनेसिस) के साथ होता है

    विधा के लिए सूत्री विभाजन को केंद्रक विभाजन की चार अवस्थाओं में विभाजित किया गया है।

    केन्द्रक विभाजन (Kayokinesis)

    इस विभाजन की प्रक्रिया चार अवस्थाओं में सम्पन्न होती है | यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि कोशिका विभाजन एक प्रगतिशील प्रक्रिया है और इसकी विभिन्न अवस्थाओं के बीच स्पष्ट रूप से विभाजन करना मुश्किल है। केन्द्रक विभाजन यानि केरियोकाइनेसिस को चार अवस्थाओं में विभाजित किया गया है :

    • पूर्वावस्था (Prophase)।
    • मध्यावस्था (Metaphase)।
    • पश्चावस्था (Anaphase)।
    • अंत्यावस्था (Telophase)।

    पूर्वावस्था (Prophase)

    अंतरावस्था की व G1 अवस्था के बाद पूर्वावस्था केरियोकाइनेसिस का पहला पड़ाव है। वास्तविक कोशिका विभाजन की शुरूआत इसी अवस्था से होती है। इसमें प्रत्येक गुणसूत्र लम्बाई में पूरी तरह से दो बराबर भागों में बैट जाती है। इस आधे भाग को अर्द्धगुणसूत्र कहा जाता है। ये अर्द्धगुणसूत्र सेन्ट्रोमीयर पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं और केन्द्रक कला तथा केन्द्रिका नष्ट हो जाती है। कोशिका विभाजन का यह सबसे लम्बा चरण होता है।

    पूर्वावस्था के पूर्ण होने के दौरान की घटनाओं की विशेषताएं

    • गुणसूत्रीय द्रव्य संघनित होकर ठोस गुणसूत्र बन जाता है। गुणसूत्र दो अर्धगुणसूत्रों से बना होता है, जो आपस में सेंट्रोमियर से जुड़े रहते हैं। 
    • अंतरावस्था के समय जिस तारककाय का द्विगुण हुआ है वह कोशिका में विपरीत ध्रुव की ओर जाने लगता है। प्रत्येक तारककाय सूक्ष्म नलिकाओं को विकरित करता है, जिसे तारक (एस्टर) कहते हैं। ये तन्तु व तारक मिलकर समसूत्री विभाजन यंत्र बनाते हैं। पूर्वावस्था के अंत में यदि कोशिका को सूक्ष्मदर्शी से देखा जाता है तो इसमें गॉल्जीकाय, अंतर्द्रव्यी जालिका, केंद्रिका व केंद्रक आवरण दिखाई नहीं देता है।

    मध्यावस्था (Metaphase)

    केंद्रक आवरण के पूर्णरूप से विघटित होने के साथ समसूत्री विभाजन की द्वितीय अवस्था प्रारंभ होती है, इसमें गुणसूत्र कोशिका के कोशिका द्रव्य में फैल जाते हैं। इस अवस्था तक गुणसूत्रों का संघनन पूर्ण हो जाता है यह अवस्था काफी छोटी होती है उच्च पादपों में अतारकीय (Anastral) और जन्तुओं में तारकीय (astral) सूत्री विभाजन होता है।  यही वह अवस्था है जब गुणसूत्रों की आकृति का अध्ययन बहुत ही सरल तरीके से किया जा सकता है। 

    मध्यावस्था गुणसूत्र दो संतति अर्धगुणसूत्रों से बना होता है जो आपस में गुणसूत्रबिंदु से जुड़े होते हैं गुणसूत्रबिंदु के सतह पर एक छोटा बिंब आकार की संरचना मिलती है जिसे काइनेटोकोर कहते हैं। गुणसूत्र के सेन्ट्रोमीयर से कुछ तन्तु (टेक्टाइल तन्तु) ध्रुवों से जुड़े रहते हैं।  सूक्ष्म नलिकाओं से बने हुए तर्कुतंतु के जुड़ने का स्थान ये संरचनाएं (काइनेटीकोर) हैं, जो दूसरी ओर कोशिका के केंद्र में स्थित गुणसूत्र से जुड़े होते हैं। इस अवस्था में गुणसूत्र मध्य रेखा पर आकर एकत्र हो जाते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र का एक अर्धगुणसूत्र एक ध्रुव से तर्कुतंतु द्वारा अपने काइनेटोकोर के द्वारा जुड़ जाता है, वहीं इसका संतति अर्धगुणसूत्र तर्कुतंतु द्वारा अपने काइनेटोकोर से विपरीत ध्रुव से जुड़ा होता है। मध्यावस्था में जिस तल पर गुणसूत्र पंक्तिबद्ध हो जाते हैं, उसे मध्यावस्था पट्टिका कहते हैं।

    मध्यावस्था की मुख्य विशेषता

    • तर्कुतंतु गुणसूत्र के काइनेटोकोर से जुड़े रहते हैं।
    • गुणसूत्र मध्यरेखा की ओर जाकर मध्यावस्था पट्टिका पर पंक्तिबद्ध होकर ध्रुवों से तर्कुतंतु से जुड़ जाते हैं।

    पश्चावस्था (anaphase)

    सूत्री विभाजन के अन्तर्गत इस अवस्था में सर्वाधिक कम समय (2-3 मिनट) लगता है। इस अवस्था में अर्धगुणसूत्र अलग हो जाते हैं और सन्तति गुणसूत्रों (daughter chromosomes) के मध्य प्रतिकर्षण ( बल या टेक्टाइल तन्तुओं के ध्रुवों की ओर खिंचाव के कारण ये विपरीत ध्रुवों की ओर गति करते हैं।

    पश्चावस्था की विशेषताएं

    • गुणसूत्रबिंदु विखंडित होते हैं और अर्धगुणसूत्र अलग होने लगते हैं।
    • अर्धगुणसूत्र विपरीत ध्रुवों की ओर जाने लगते हैं।

    अन्त्यावस्था (Telophase)

    इस चरण में में नवजात गुणसूत्र के प्रत्येक जोड़े के चारों ओर एक केन्द्रक झिल्ली का निर्माण होता है और एक पूर्ण कोशिका का निर्माण होता है। इसके साथ ही सन्तति गुणसूत्र ध्रुवों पर एकत्र हो जाते हैं। इस सम्बन्ध में को जन्तु कोशिकाओं में सन्तति कोशिकाओं को पृथक करने के लिए संकुचन होता है, परन्तु पादप कोशिकाओं में संकुचन के स्थान पर कोशिका प्लेट बनती हैं।

    अन्त्यावस्था की मुख्य घटनाएं

    • गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों की ओर एकत्रित हो जाते हैं और इनकी पृथक पहचान समाप्त हो जाती है। 
    • गुणसूत्र समूह के चारों तरफ केंद्रक झिल्ली का निर्माण हो जाता है। 
    • केंद्रिका, गॉल्जीकाय व अंतर्द्रव्यी जालिका का पुनर्निर्माण हो जाता है।

    कोशिका द्रव्य विभाजन (Cytokinesis)

    केन्द्रक विभाजन के बाद कोशिकाद्रव्य का विभाजन होता है। सूत्री विभाजन के दौरान द्विगुणित गुणसूत्रों का संतति केंद्रकों में संपृथकन होता है जिसे केंद्रक विभाजन (Karyokinesis) कहते हैं।  कोशिका विभाजन संपन्न होने के अंत में कोशिका स्वयं एक अलग प्रक्रिया द्वारा दो संतति कोशिकाओं में विभाजित हो जाती है, इस प्रक्रिया को कोशिकाद्रव्य विभाजन कहते हैं। प्राणी कोशिका का विभाजन जीवद्रव्यकला में एक खांच बनने से संपन्न होता है। खांचों के लगातार गहरा होने व अंत में केंद्र में आपस में मिलने से कोशिका का कोशिकाद्रव्य दो भागों में बँट जाता है। यद्यपि पादप कोशिकाएं जो अपेक्षाकृत अप्रसारणीय कोशिका भित्ति से घिरी होती हैं अतः इनमें कोशिकाद्रव्य विभाजन दूसरी भिन्न प्रक्रियाओं द्वारा संपन्न होता है। पादप कोशिकाओं में नई कोशिका भित्ति निर्माण कोशिका के केंद्र से शुरू होकर बाहर की ओर पूर्व स्थित पार्श्व कोशिका भित्ति से जुड़ जाता है। नई कोशिकाभित्ति निर्माण एक साधारण पूर्वगामी रचना से प्रारंभ होता है जिसे कोशिका पट्टिका कहते हैं, जो दो सन्निकट कोशिकाओं की भित्तियों के बीच मध्य पट्टिका को दर्शाती है। कोशिकाद्रव्य विभाजन के समय कोशिका अंगक जैसे सूत्रकणिका (माइटोकॉड्रिया) व प्लैस्टिड लवक का दो संतति कोशिकाओं में वितरण हो जाता है। कुछ जीवों में केंद्रक विभाजन के साथ कोशिकाद्रव्य का विभाजन नहीं हो पाता है। इसके परिणामस्वरूप एक ही कोशिका में कई केंद्रक बन जाते हैं। ऐसी बहुकेंद्रकी कोशिका को संकोशिका कहते हैं  नारियल का तरल भ्रूणपोश इसका एक उदाहरण है । यह पादप कोशिकाओं में फ्रेग्मोप्लास्ट से, कोशिका के मध्य से बाहर की ओर कोशिका प्लेट के निर्माण द्वारा तथा जन्तुओं में कोशिका कला के मध्यवर्ती स्थान से अन्तर्वलन (invagination) द्वारा होता है।

    जन्तु और पादप कोशिकाओं के सूत्री विभाजन में विभिन्नताएँ

    पादप कोशिकाजन्तु कोशिका
    सेन्ट्रियोल अनुपस्थित होते हैं।सेन्ट्रियोल उपस्थित होते हैं।
    एस्टर नहीं बनते हैं।एस्टर बनते हैं।
    कोशिका विभाजन में एक कोशिका प्लेट बनता हैकोशिका विभाजन में कोशिकाद्रव्य का निर्माण और दो भागों में बँटते हैं।

    सूत्री कोशिका विभाजन का महत्त्व (Importance of Mitosis)

    सूत्री विभाजन या मध्यवर्तीय विभाजन केवल द्विगुणित कोशिकाओं में होता है। यद्यपि कुछ निम्न श्रेणी के पादपों एवं सामाजिक कीटों में अगुणित कोशिकाएं भी सूत्री विभाजन द्वारा विभाजित होती हैं। सूत्री विभाजन के कारण जीवों की वृद्धि तथा विकास सम्भव हो पाता है। यह अलैंगिक जनन का आधार है। इससे सन्तति कोशिकाओं (daughter cells) में गुणसूत्रों की संख्या मातृ कोशिका के समान होती हैं। इसके साथ ही सन्तति कोशिकाओं के गुण भी मातृ कोशिका के ही समान होता है। बहुकोशिकीय जीवधारियों की वृद्धि सूत्री विभाजन के कारण होती है। कोशिका वृद्धि के परिणामस्वरूप केंद्रक व कोशिकाद्रव्य के बीच का अनुपात अव्यवस्थित हो जाता है। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि कोशिका विभाजित होकर केंद्रक कोशिकाद्रव्य अनुपात को बनाए रखे। सूत्री विभाजन का एक महत्वपूर्ण योगदान यह है कि इसके द्वारा कोशिका की मरम्मत होती है। अधिचर्म की उपरी सतह की कोशिकाएं, आहार नाल की भीतरी सतह की कोशिकाएं एवं रक्त कोशिकाएं निरंतर प्रतिस्थापित होती रहती है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis)

    इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम फॉर्मर एवं मूरे ने किया। लैंगिक प्रजनन द्वारा संतति के निर्माण में दो युग्मकों का संयोजन होता है, जिनमें अगुणित गुणसूत्रों का एक समूह होता है। युग्मक का निर्माण विशिष्ट द्विगुणित कोशिकाओं से होता है। यह विशिष्ट प्रकार का कोशिका विभाजन है, जिसके द्वारा बनने वाली अगुणित संतति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है। इस प्रकार के विभाजन को अर्धसूत्री विभाजन कहते हैं।  यह विभाजन केवल जनन कोशिकाओं (reproductive cells) में होता है। इस विभाजन में गुणसूत्रों की संख्या कम होकर आधी रह जाती है, इसलिए इसे न्यूनकारी कोशिका विभाजन (reduction division) भी कहा जाता है।

    अर्धसूत्री विभाजन की मुख्य विशेषताएं

    अर्द्धसूत्री विभाजन केन्द्रक विभाजन का रूप है। सूत्री विभाजन की तरह इसमें मुख्य कोशिका में अन्तरावस्था के क्रम में ही DNA रेप्लीकेशन होता है, परन्तु यह केन्द्रक विभाजन (nucleus division) तथा कोशिका विभाजन (cell division) के दो चरणों में पूरा होता है, जिसे अर्द्धसूत्री I और अर्द्धसूत्री II के नाम से जाना जाता है। यह विभाजन जन्तु में शुक्राणु और अण्डाणु के बनने (gametogenesis) के दौरान और पौधों में स्पोर (spore) बनने के क्रम में होता है। यह विभाजन द्विगुणित (diploid) जनन कोशिकाओं में होता है, जिसके परिणामस्वरूप चार अगुणित कोशिकाएँ (haploid cells) बनती हैं।

    अर्धसूत्री विभाजन की अवस्थाएँ

    अर्धसूत्री Iअर्धसूत्री II
    पूर्वावस्था Iपूर्णावस्था II
    मध्यावस्था Iमध्यावस्था II
    पश्चावस्था Iपश्चावस्था II
    अंत्यावस्था Iअंत्यावस्था II

    अर्द्धसूत्री विभाजन। (Meiosis।)

    इसे न्यूनकारी विभाजन (reduction division) भी कहा जाता है।

    इसकी चार अवस्थाएँ होती हैं

    पूर्वावस्था I (Prophase I)

    अर्धसूत्री विभाजन I की पूर्वावस्था की तुलना समसूत्री विभाजन की पूर्वावस्था से की जाए तो, यह अधिक लंबी व जटिल होती है। गुणसूत्रों के व्यवहार के आधार पर इसे पाँच प्रावस्थाओं में उपविभाजित किया गया है जैसे-तनुपट्ट (लेप्टोटीन), युग्मपट्ट (जाइगोटीन), स्थूलपट्ट (पैकेटीन), द्विपट्ट (डिप्लोटीन) व पारगतिक्रम (डायकाइनेसिस)।

    साधारण सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखने पर तनुपट्ट (लिप्टोटीन) अवस्था के दौरान गुणसूत्र धीरे-धीरे स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं। गुणसूत्र का संहनन (कॉम्पैक्शन) पूरी तनुपट्ट अवस्था के दौरान जारी रहता है। इसके उपरांत पूर्वावस्था I का द्वितीय चरण प्रारंभ होता है, जिसे युग्मपट्ट कहते हैं। इस अवस्था के दौरान गुणसूत्रों का आपस में युग्मन प्रारंभ हो जाता है और इस प्रकार की संबद्धता को सूत्रयुग्मन कहते हैं।

    लेप्टोटीन

    इसमें केन्द्रक जाल संघनित होकर गुणसूत्र बनाते हैं। एक ही प्रकार के गुण रखने वाले गुणसूत्र समजात गुणसूत्र कहलाते हैं।

    युग्मपट्ट (जाइगोटीन) 

    इस उप-अवस्था में समजात गुणसूत्र युग्म बनाते हैं। इस क्रिया को सिनेप्सिस (synapsis) कहते हैं। इस प्रकार के गुणसूत्रों के युग्मों को समजात गुणसूत्र कहते हैं। इस अवस्था का इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मलेखी यह दर्शाता है कि गुणसूत्र सूत्रयुग्मन के साथ एक जटिल संरचना का निर्माण होता है, जिसे सिनेप्टोनिमल सम्मिश्र कहते हैं। जिस सम्मिश्र का निर्माण एक जोड़ी सूत्रयुग्मित समजात गुणसूत्रों द्वारा होता है, उसे युगली (bivalent) अथवा चतुष्क (tetrad) कहते हैं। यद्यपि ये अगली अवस्था में अधिक स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। पूर्वावस्था I की उपर्युक्त दोनों अवस्थाएं स्थूलपट्ट (Pachytene) अवस्था से अपेक्षाकृत कम अवधि की होती हैं। इस अवस्था के दौरान प्रत्येक युगली गुणसूत्र के चार अर्ध गुणसूत्र चतुष्क के रूप में अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं।

    इस अवस्था में पुनर्योजन ग्रंथिकाएं दिखाई देने लगती हैं जहाँ पर समजात गुणसूत्रों के असंतति अर्धगुणसूत्रों के बीच विनिमय (क्रासिंग ओवर) होता है। विनिमय दो समजात गुणसूत्रों के बीच आनुवंशिक पदार्थों के आदान-प्रदान के कारण होता है। विनिमय एंजाइम द्वारा नियंत्रित प्रक्रिया है व जो एंजाइम इस प्रक्रिया में भाग लेता है, उसे रिकाम्बीनेज कहते हैं। दो गुणसूत्रों में आनुवंशिक पदार्थों का पुनर्योजन जीन विनिमय द्वारा अग्रसर होता है। समजात गुणसूत्रों के बीच पुनर्योजन स्थूलपट्ट अवस्था के अंत तक पूर्ण हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप विनिमय स्थल पर गुणसूत्र जुड़े हुए दिखाई पड़ते हैं। द्विपट्ट (डिप्लोटीन) के प्रारंभ में सिनेप्टोनीमल सम्मिश्र का विघटन हो जाता है और युगली के समजात गुणसूत्र विनिमय बिंदु के अतिरिक्त एक दूसरे से अलग होने लगते हैं।

    विनिमय बिंदु पर X आकार की संरचना को काएज्मेटा कहते हैं। कुछ कशेरुकी प्राणियों के अडंकों में द्विपट्ट महीनों या वर्षों बाद समाप्त होती है।

    अर्धसूत्री पूर्वावस्था I की अंतिम अवस्था पारगतिक्रम (डायाकाइनेसिस) कहलाती है। जिसमें काएज्मेटा का उपांतीभवन हो जाता है, जिसमें काएज्मेटा का अंत होने लगता है। इस अवस्था में गुणसूत्र पूर्णतया संघनित हो जाते हैं व तर्कुतंतु एकत्रित होकर समजात गुणसूत्रों को अलग करने में सहयोग प्रदान करते हैं। पारगतिक्रम के अंत तक केंद्रिका अदृश्य हो जाती है और केंद्रक-आवरण झिल्ली भी विघटित हो जाता है। पारगतिक्रम मध्यावस्था की ओर पारगमन को निरूपित करता है।

    पैकेटीन

    इस उप-अवस्था में गुणसूत्र के लम्बाई में फटने के कारण समजात गुणसूत्र जोड़े में चार क्रोमैटिड दिखाई देते हैं। इस स्थिति को चर्तुसंयोजक (tetrad) कहा जाता है। समजात गुणसूत्रों के अबहन अर्द्धगुणसूत्रों के मध्य विनियम (crossing over) भी होता है।

    डिप्लोटीन

    इसमें समजात गुणसूत्र का प्रत्येक अर्द्धगुणसूत्र एक-दूसरे से अलग होने लगता है, परन्तु कुछ स्थानों पर एक-दूसरे के साथ क्रॉस रखता है, जिसे क्याज्मेटा कहते हैं।

    डाइकाइनेसिस

    इस उप-अवस्था में केन्द्रक तथा केन्द्रक कला लुप्त हो जाती हैं तथा क्याज्मेटा गुणसूत्र के सिरे की ओर खिसकने लगते हैं, जिसे टर्मिनेलाइजेशन (terminalization) कहते हैं।

    मध्यावस्था I (Metaphase I)

    इसमें तर्कु उपकरण बन जाता है तथा तर्कु तन्तु गुणसूत्रों के सेन्ट्रोमीटर से जुड़ जाते हैं।

    पश्चावस्था I (Anaphase I)

    तर्कु तन्तुओं के संकुचन के कारण समजात गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों पर जाने लगते हैं और प्रत्येक ध्रुव पर गुणसूत्र की संख्या आधी हो जाती है।

    अन्त्यावस्था I (Telophase I)

    इस अवस्था में केन्द्रक तथा केन्द्रक कला प्रकट हो जाती है। कोशिकाद्रव्य विभाजन शुरू हो जाता है और कोशिका की इस अवस्था को कोशिका द्विक कहते हैं। कोशिकाद्रव्य विभाजन द्वारा दो कोशिकाएँ बनती हैं, जो अन्त्यावस्था में प्रवेश करती है, परन्तु इसमें DNA का द्विगुणन नहीं होता है। उसके बाद पूर्वावस्था II आती है जो पूर्वावस्था I से काफी सरल होती है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन || (Meiosis II)

    अर्द्धसूत्री I के बाद यह अवस्था शुरू होती है। दोनों के मध्य की अवस्था विरामावस्था कहलाती है। इस चरण में चार अवस्थाएँ होती हैं, जो सूत्री विभाजन के समान होता है।

    पूर्वावस्था II (Interphase II)

    अर्धसूत्री विभाजन II गुणसूत्र के पूर्ण लंबा होने के पहले व कोशिकाद्रव्य विभाजन के तत्काल

    बाद प्रारंभ होता है। इसमें केन्द्रिका और केन्द्रक आवरण विखर जाते हैं साथ ही अर्द्धगुणसूत्र छोटे और मोटे हो जाते हैं तथा तर्कु (spindle fibre) बन जाते हैं।

    मध्यावस्था II (Metaphase II)

    इसमें केन्द्रिका और केन्द्रक झिल्ली विलुप्त हो जाती है। तर्क बन जाती है और गुणसूत्र तर्क के मध्य रेखा (equator) पर सेन्ट्रोमीयर द्वारा चिपक जाते हैं।

    पश्चावस्था II (Anaphase II)

    इसमें सेन्ट्रियोल पहले सेन्ट्रोमीयर्स को और फिर क्रोमैटिड्स को विपरीत ध्रुवों पर खींचते हैं।

    अन्त्यावस्था II (Telophase II)

    यह अवस्था अर्धसूत्री विभाजन की अंतिम अवस्था है, जिसमें गुणसूत्रों के दो समूह पुनः केंद्रक आवरण द्वारा घिर जाते हैं। कोशिकाद्रव्य विभाजन के उपरांत चार अगुणित संतति कोशिकाओं का कोशिका चतुष्टय बन जाता है। इस तरह इसमें चार नई कोशिकाओं का निर्माण होता है। गुणसूत्र कुण्डली से खुलकर, सीधे, लम्बे और एक समान हो जाते है। तकुं (spindle fibre) विलुप्त हो जाते हैं और सेन्टियोल दोहरे हो जाते हैं। केन्द्रक आवरण केन्द्रक के चारों ओर फिर से बनते हैं, जहाँ गुणसूत्र संख्या अविभाजित कोशिका में मौजूद गुणसूत्रों की संख्या की आधी (haploid) की होती है। जीव को एक अविभाजित कोशिका से चार नए कोशिकाओं का निर्माण करते हैं।

    मुख्यतया अगुणित जीवन चक्र वाले पौधों; जैसे-यूलोथ्रिक्स में युग्मनज में अर्द्धसूत्री विभाजन, द्विगुणित जीवन चक्र वाले पौधों में युग्मकी अर्द्धसूत्री विभाजन तथा उच्च वर्ग के पौधों में बीजाणुक अर्द्धसूत्री विभाजन (sporic meiosis) होता है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन का महत्त्व (Importance of Melosis)

    अर्द्धसूत्री विभाजन में विनिमय (crossing over) द्वारा नई किस्मों का विकास होता है। चूंकि एक जाति के समस्त जीवों में पीढ़ी दर पीढ़ी गुणसूत्रों की संख्या सदैव स्थिर रहती है, जो अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा ही सम्भव हो पाता है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन के मौलिक लक्षण

    समसूत्री एवं अर्द्धसूत्री विभाजन में अंतर (Differences between Mitosis and Meiosis)

    समसूत्री विभाजनअर्द्धसूत्री विभाजन
    यह शरीर के कायिक कोशिकाओं एवं लैंगिक कोशिकाओं में होता है।यह केवल लैंगिक कोशिकाओं में होता है।
    कोशिका के गुणसूत्रों में कोई परिवर्तन नहीं होता है।इसमें सन्तति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या आधी रह जाती है।
    यह प्रक्रिया चार अवस्थाओं में सम्पन्न होती है।यह दो उपविभाजनों में पूरा होता है जिसमें पहला न्यूनकारी (reductional) तथा प्रत्येक विभाजन में 4-5 अवस्थाएँ होती हैं।
    गुणसूत्रों के आनुवंशिक पदार्थ में आदान-प्रदान नहीं होता है इसलिए सन्तति कोशिकाओं में भी उसी प्रकार के गुणसूत्र होते हैं, जैसे जनक कोशिका में।गुणसूत्रों के बीच आनुवंशिक पदार्थ का आदान-प्रदान होता है इसलिए सन्तति कोशिकाओं के गुणसूत्र में कुछ भाग पितृ कोशिका से तथा कुछ भाग मातृ कोशिका से आ जाता है अतःसन्तति कोशिका के गुणसूत्र, जनकों के गुणसूत्र से भिन्न होते हैं।
    सन्तति कोशिका में जनक जैसे ही गुणसूत्र होने के कारण आनुवंशिक विविधता नहीं होती है lसन्तति कोशिकाओं में जनकों से भिन्न गुणसूत्र होने के कारण आनुवंशिक विविधता होती है।
    एक जनक (parents) से दो सन्तति कोशिकाएँ (daughter) बनती हैं।एक जनक से चार सन्तति कोशिकाएँ बनती हैं।

  • कोशिका (Cell) से जुड़े महत्वपुर्ण प्रश्न और उत्तर | कोशिका (Koshika) के सवाल और जवाब | जीव विज्ञान प्रश्नोतरी | Cell Biology Topics | कोशिका विज्ञान से जुडी जानकारी |

    कोशिका (Cell) से जुड़े महत्वपुर्ण प्रश्न और उत्तर | कोशिका (Koshika) के सवाल और जवाब | जीव विज्ञान प्रश्नोतरी | Cell Biology Topics | कोशिका विज्ञान से जुडी जानकारी |

    कोशिका संबंधी महत्वपूर्ण प्रश्न – जीव विज्ञान प्रश्नोतरी | Cell Biology Topics – इस आर्टिकल में हमने कोशिका से जुड़े कुछ महत्वपुर्ण प्रश्नों को उनके उत्तर सहित शामिल किया है | आर्टिकल में हमने कोशिका से जुड़े जितने भी परीक्षा की दृष्टि से Koshika – important question and answers को जोड़ा है | साथ ही कोशिका संबंधी महत्वपूर्ण प्रश्न- जीव विज्ञान प्रश्नोत्तरी | Cell Biology Topics, कोशिका विज्ञान के महत्वपूर्ण प्रश्न (cell biology topics) – प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाने वाले कोशिका विज्ञान (cytology) या कोशिका जैविकी (cell biology general science questions) विषयक महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (biology gk questions) आदि इसमें सम्मिलित किये गये है |

    कोशिका से क्या समझते हैं ?

    कोशिका जीवधारियों की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई होती है | कोशिका प्राय: स्वत: जनन की सामर्थ्य रखती है। यह विभिन्न पदार्थों का वह छोटे-से-छोटा संगठित रूप है जिसमें वे सभी क्रियाएँ होती हैं जिन्हें सामूहिक रूप से हम जीवन कहतें हैं। सजीवों की सभी जैविक क्रियाएँ कोशिकाओं के भीतर होती हैं। प्रत्येक जीव का जीवन एक कोशिका से आरम्भ होता है | यदि वह इसी एक कोशिका के सहारे अपने जीवन को चलाता रहता है तो उसे एककोशिकीय जीव (Unicellular) जीव कहा जाता है, परन्तु अधिकांश जीवों में यह कोशिका विभाजन करती है और अंत में बहुकोशिकीय जीव बन जाता है |

    कोशिका कितनी होती है?

    कुछ सजीव जैसे जीवाणुओं के शरीर एक ही कोशिका से बने होते हैं, उन्हें एककोशकीय जीव कहते हैं जबकि कुछ सजीव जैसे मनुष्य का शरीर अनेक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है उन्हें बहुकोशकीय सजीव कहते हैं। मानव शरीर में लगभग 60-90 ट्रिलियन सेल से बना होता है।

    कोशिका की खोज किसने की और कब की?

    कोशिका की खोज सर्वप्रथम रॉबर्ट हुक ने 1665 में की। उन्होंने कार्क की एक महीन काट में मधुमक्खी के छत्ते के समान कोठरियाँ देखी जिन्हें उन्होंने कोशिका (सेल-Cell) का नाम दिया। हुक की इस खोज ने कोशिकाओं को जीवन की सबसे छोटी इकाइयों के रूप में समझने के लिए प्रेरित किया तथा कोशिका सिद्धांत की नींव रखी | 1939 ई० में श्लाइडेन तथा श्वान ने कोशिका सिद्धान्त प्रस्तुत किया जिसके अनुसार सभी सजीवों का शरीर एक या एकाधिक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है तथा सभी कोशिकाओं की उत्पत्ति पहले से उपस्थित किसी कोशिका से ही होती है।

    कोशिका सिद्धान्त किसने प्रस्तुत किया ?

    1939 ई० में श्लाइडेन तथा श्वान ने कोशिका सिद्धान्त प्रस्तुत किया जिसके अनुसार सभी सजीवों का शरीर एक या एकाधिक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है तथा सभी कोशिकाओं की उत्पत्ति पहले से उपस्थित किसी कोशिका से ही होती है।

    कोशिका प्रायः छोटी होती है क्यों?

    कोशिका के बड़े होने के साथ सतह का आयतन अनुपात छोटा हो जाता है। इस प्रकार, यदि कोशिका एक निश्चित सीमा से आगे बढ़ेगी तो पर्याप्त सामग्री कोशिका झिल्ली को पार करने में सक्षम नहीं हो पायेगी यही कारण है कि कोशिकाओं का आकार आम तौर पर छोटा होता है।

    कोशिका का कार्य क्या है?

    सजीवों की सभी जैविक क्रियाएँ कोशिकाओं के भीतर होती हैं। कोशिकाओं के भीतर ही आवश्यक आनुवांशिक सूचनाएँ होती हैं जिनसे कोशिका के कार्यों का नियंत्रण होता है तथा सूचनाएँ अगली पीढ़ी की कोशिकाओं में स्थानान्तरित होती हैं। कोशिका जीवधारियों की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई होती है | कोशिका प्राय: स्वत: जनन की सामर्थ्य रखती है। यह विभिन्न पदार्थों का वह छोटे-से-छोटा संगठित रूप है जिसमें वे सभी क्रियाएँ होती हैं जिन्हें सामूहिक रूप से हम जीवन कहतें हैं।

    कोशिका का सबसे बड़ा कोशिकांग कौन सा है?

    केंद्रक कोशिका का सबसे बड़ा कोशिकांग है। कोशिका द्रव्य में स्थित वह संरचना जो जीवद्रव्य की क्रियाओं को संचालित करता है अर्थात कोशिका का नियंत्रण करता है, केंद्रक कहलाता है | केंद्रक कोशिका का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग है जो कोशिका के प्रबन्धक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। केंद्रक में कोशिका की वंशानुगत जानकारी होती है और कोशिका के विकास और प्रजनन को नियंत्रित भी करती है|

    यूकेरियोटिक से आप क्या समझते हैं?

    इस प्रकार की कोशिकाओं में पूर्ण विकसित केन्द्रक अर्थात् केन्द्रक कला और केन्द्रिका युक्त तथा पूर्ण विकसित कोशिकांग पाए जाते हैं। इस प्रकार की कोशिकाओं के गुणसूत्र में DNA तथा हिस्टोन प्रोटीन से बनी इकाई न्यूक्लिओसोम पाई जाती हैं। ये कोशिका अर्थात् वास्तविक केन्द्रक वाली यूकैरियोटिक कोशिकाएँ अधिकांश शैवाल, उच्च पादप एवं जन्तुओं में पाई जाती हैं।

    प्रोकैरियोटिक कोशिका क्या है ?

    प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में केन्द्रक कला नहीं होती है। इस प्रकार केन्द्रकीय पदार्थ कोशिकाद्रव्य में बिखरा होता है। गुणसूत्र के स्थान पर हिस्टोन प्रोटीन रहित DNA के धागे होते हैं। ऐसी कोशिकाओं में पूर्ण रूप से विकसित कोशिकांगों का अभाव रहता है। ये कोशिकाएँ अर्थात् वास्तविक केन्द्रक रहित प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ नीले-हरे शैवाल, माइकोप्लाज्मा और जीवाणु में पाई जाती हैं।

    मानव शरीर की सबसे छोटी कोशिका कौन है?

    शुक्राणु मानव शरीर की सबसे छोटी कोशिका होती है। यह एक नर जनन कोशिका है ।

    कोशिका कला कहाँ पाई जाती है?

    केन्द्रक कोशिका के लगभग मध्य में स्थित एक गोलाकार या अण्डाकार संरचना होती है। सामान्यतया एक कोशिका में एक ही केन्द्रक पाया जाता है। केन्द्रक एक दोस्तरीय आवरण से घिरी संरचना है जिसे केन्द्रक कला कहते हैं। कोशिका कला या कोशिका झिल्ली (cell membrane) कोशिका की सबसे बाहरी परत, जो उसके विभिन्न घटकों को बाहरी वातावरण से अलग करती है।

    सबसे छोटी कोशिका का नाम क्या है?

    माइकोप्लाज़्मा को सबसे छोटी जीवित कोशिका के रूप में जाना जाता है लेकिन इसमें कोशिका भित्ति नहीं होती है। ये एककोशिकीय जीव हैं जो ऑक्सीजन के बिना जीवित रह सकते हैं।

    रॉबर्ट हुक ने कोशिका की खोज कैसे की?

    कोशिका की खोज सबसे पहले सन् 1665 में “रॉबर्ट हुक”(Robert Hooke) ने किया था रॉबर्ट हुक ने कंपाउंड माइक्रोस्कोप की मदद से बोतल की काॅर्क की महीन टुकड़ों में मधुमक्खी के छत्ते के समान कोठरियां देखी, जिसको उन्होंने “कोशिका” का नाम दिया इसलिए उन्हें कोशिका (Cell) के खोजकर्ता कहा जाता है

    कोशिका चक्र क्या है ?

    कोशिका चक्र, या कोशिका-विभाजन चक्र, एक कोशिका में होने वाली घटनाओं की श्रृंखला है जो इसे दो कोशिकाओं (daughter cell) में विभाजित करने का कारण बनती है।

    कोशिका चक्र का क्रम क्या है?

    एक कोशिका चक्र घटनाओं की एक श्रृंखला है जो एक कोशिका के बढ़ने और विभाजित होने पर घटित होती है अर्थात घटनाओं का वह अनुक्रम जिसमे कोशिका अपने जीनोम का द्विगुणन एवं अन्य संघटको का संश्लेषण होता है और इसके बाद विभाजित होकर दो नयी संतति कोशिकाओं का निर्माण करती है, कोशिका चक्र कहलाती है। कोशिका चक्र की दो मूल प्रावस्थाएँ होती है अर्थात सम्पूर्ण प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होती है, प्रथम चरण में कोशिका के केन्द्रक का विभाजन होता है। इस प्रक्रिया को केन्द्रक-विभाजन (कैरियोकाइनेसिस) कहते हैं। विभाजन के द्वितीय चरण में कोशिका-द्रव्य का विभाजन होता है। इस प्रक्रिया को कोशिका-द्रव्य विभाजन कहते हैं।

    मनुष्य में कोशिका चक्र कितने समय का होता है?

    मनुष्य में कोशिका चक्र 24 घंटे का होता है |

    कोशिका चक्र का सबसे लंबा चरण कौन सा है?

    कोशिका चक्र की सम्पूर्ण प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होती है, प्रथम चरण में कोशिका के केन्द्रक का विभाजन होता है। इस प्रक्रिया को केन्द्रक-विभाजन (कैरियोकाइनेसिस) कहते हैं। विभाजन के द्वितीय चरण में कोशिका-द्रव्य का विभाजन होता है। इस प्रक्रिया को कोशिका-द्रव्य विभाजन कहते हैं।

    कोशिका चक्र का प्रशांत प्रावस्था Go क्या है?

    वे कोशिकाएँ जो आगे विभाजित नहीं होती हैं तथा निष्क्रिय अवस्था में पहुँचती हैं, जिसे कोशिका, चक्र की प्रशांत अवस्था (G0) कहा जाता है। इस अवस्था की कोशिका उपापचयी रूप से सक्रिय होती है, लेकिन विभाजित नहीं होती, इनमें विभाजन जीव की आवश्यकता के अनुसार होता है।

    यीस्ट को कोशिका चक्र पूरा करने में कितना समय लगता है?

    यीस्ट के कोशिका चक्र के पूर्ण होने में लगभग नब्बे मिनट लगते हैं।

    जीवद्रव्य क्या है ?

    कोशिका का एक बड़ा भाग है, जो कोशिका झिल्ली या प्लाज्मा झिल्ली से घिरा एक तरल पदार्थ होता है। इसमें बहुत से कोशिका के घटक होते हैं, जिसे कोशिका अंग कहते हैं, जो कोशिका के लिए विशिष्ट कार्य करते हैं। कोशिकाद्रव्य तथा केन्द्रक दोनों को मिलाकर जीवद्रव्य कहलाता है। यह कोशिकाद्रव्य चिपचिपा, रंगहीन तथा कणिकामय होती है। यहाँ एन्जाइम की प्रचुरता होती है।

    गॉल्जीकाय की खोज कब हुई?

    गॉल्जीकाय (Golgi apparatus also known as the Golgi complex, Golgi body) की पहचान 1897 में इतालवी वैज्ञानिक कैमिलो गोल्गी (Camillo Golgi) ने की थी और 1898 में उनके नाम गॉल्जीकाय का नाम रखा गया था | कैमिलो गोल्गी इटली का एक तंत्रिका वैज्ञानिक था, जिसने श्वेत उलूक (Barn Owl) की तंत्रकोशिकाओं में इसका पता लगाया, जो उसके नाम से ही विख्यात है। इसकी आकृति चपटी होती है तथा ये एक के बाद एक समानान्तर रूप में स्थिर रहे हैं। गॉल्जीकाय को लाइपोकॉण्ड्यिा या डिक्टियोसोम भी कहा जाता है।

    कोशिका का ट्रैफिक पुलिस किसे कहा जाता है ?

    गॉल्जीकाय को कोशिका को ‘ट्रैफिक पुलिस‘ भी कहा जाता है।

    कोशिका का कौन सा अंग आत्मघाती थैली के नाम से जाना जाता है?

    लाइसोसोम (Lysosome) को कोशिका की आत्मघाती थैली या आत्महत्या की थैली कहा जाता है | यह कोशिका का अपशिष्ट निपटाने वाला तन्त्र है। लाइसोसोम में बहुत शक्तिशाली पाचन एंजाइम (digestive enzymes) होते हैं जो कार्बनिक पदार्थ को तोड़ देते हैं। कोशिकीय उपापचय में रूकावट के कारण जब कोशिका क्षतिग्रस्त या मर हो जाती है तो लाइसोसोम फट जाते हैं और अपनी ही कोशिका को पाचित कर देते हैं या खा जाते या नष्ट हो जाते हैं। असल में लाइसोसोम कोशिका का आमाशय (पेट) होते हैं। एसिड भरी ये थैलियां फटने पर उनके एसिड तत्व कोशिका को ही नष्ट कर देते हैं।

    क्यों लाइसोसोम आत्मघाती बैग कहा जाता है?

    लाइसोसोम (lysosomes) को आत्मघाती थैली (suicide bags) इसलिए कहते हैं क्योकि यह कोशिका का अपशिष्ट निपटाने वाला तन्त्र है। लाइसोसोम में बहुत शक्तिशाली पाचन एंजाइम (digestive enzymes) होते हैं जो कार्बनिक पदार्थ को तोड़ देते हैं। कोशिकीय उपापचय में रूकावट के कारण जब कोशिका क्षतिग्रस्त या मर हो जाती है तो लाइसोसोम फट जाते हैं और अपनी ही कोशिका को पाचित कर देते हैं या खा जाते या नष्ट हो जाते हैं। असल में लाइसोसोम कोशिका का आमाशय (पेट) होते हैं। एसिड भरी ये थैलियां फटने पर उनके एसिड तत्व कोशिका को ही नष्ट कर देते हैं।

    कोशिका के किस अंगक को बिजलीघर कहते हैं और क्यों?

    चूँकि सभी आवश्यक रासायनिक क्रियाओं को करने के लिए माइटोकॉण्ड्रिया ATP के रूप में ऊर्जा प्रदान करते हैं इसिलिय माइटोकाण्ड्रिया को कोशिका का ऊर्जा संयन्त्र या बिजली घर कहा जाता है। माइटोकाण्ड्रिया में जो एन्जाइम होते है वो भोजन पदार्थो का ऑक्सीकरण करके ऊर्जा का निर्माण करते है, जो ए.टी.पी. के रूप में एकत्र होती है।

    मानव तंत्रिका कोशिका का रेखाचित्र बनाइए | | तंत्रिका कोशिकाओं द्वारा क्या कार्य किया जाता है ?

    तंत्रिका कोशिका संदेश प्राप्त कर उनका स्थानान्तरण करती है, जिसके द्वारा यह शरीर में नियंत्रण एवं समन्वय का कार्य करती है। इस कोशिका का कार्य मस्तिष्क से सूचना का आदान प्रदान और विश्लेषण करना है किसी चीज के स्पर्श छूने, ध्वनि या प्रकाश के होने पर ये तंत्रिका कोशिका ही प्रतिक्रिया करते हैं और यह अपने संकेत मेरु रज्जु और मस्तिष्क को भेजते हैं। मोटर तंत्रिका कोशिका मस्तिष्क और मेरु रज्जु से संकेत ग्रहण करते हैं। मांसपेशियों की सिकुड़न और ग्रंथियां इससे प्रभावित होती है। एक सामान्य और साधारण तंत्रिका कोशिका में एक कोशिका यानि सोमा, डेंड्राइट और कार्रवाई होते हैं। तंत्रिका कोशिका का मुख्य हिस्सा सोमा होता है।

    माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का ऊर्जा क्यों कहते हैं?

    माइटोकॉन्ड्रिया किसी भी कोशिका के अंदर पाया जाता है जिसका मुख्य काम कोशिका के हर हिस्से में ऊर्जा पहुंचाना होता है | माइटोकाण्ड्रिया में जो एन्जाइम होते है वो भोजन पदार्थो का ऑक्सीकरण करके ऊर्जा का निर्माण करते है, जो ए.टी.पी. के रूप में एकत्र होती है। इसी कारण माइटोकांड्रिया को कोशिका का पावर हाउस भी कहा जाता है |

    अर्धस्वायत्त कोशिकांग (semi autonomous organelle) किसे कहा जाता है ?

    माइटोकॉण्ड्रिया के मैट्रिक्स में क्रैब्स चक्र के एन्जाइम, DNA, राइबोसोम तथा RNA स्थित होते हैं इसलिए माइटोकॉण्ड्रिया को अर्धस्वायत्त कोशिकांग (semi autonomous organelle) कहा जाता है।

    अर्द्धस्वशासित कोशिकांग कोनसे है ?

    माइटोकॉण्ड्रिया और हरितलवक अर्द्धस्वशासित कोशिकांग कहलाते हैं।

    पादप कोशिका और जंतु कोशिका में क्या अंतर है?

    पादप कोशिका
    कोशिका कला चारों ओर से एक भित्ति द्वारा घिरी रहती है, जिसे कोशिका भित्ति कहते हैं, जो प्रायः सेलुलोज नामक पदार्थ की बनी होती है।
    बड़ी-बड़ी रसधानियाँ होती हैं, जो कि कोशिका का काफी बड़ा भाग घेरे रहती हैं।
    लवक पाए जाते हैं (हरे हरितलवक, रंगहीन ल्यूकोप्लास्ट एवं रंगीन क्रोमोप्लास्ट)।
    अधिकांश पौधों की कोशिकाओं में सेन्ट्रोसोम नहीं पाए जाते हैं।
    अधिकांश पौधों की कोशिकाओं में लाइसोसोम नहीं मिलते।

    जन्तु कोशिका
    कोशिका कला के बाहर कोई भित्ति नहीं होती। कोशिका कला ही कोशिका की सीमा है।
    रसधानियाँ अनुपस्थित या बहुत छोटी होती हैं। अतः कोशिकाद्रव्य कोशिका में समान रूप से वितरित रहता है
    लवक नहीं पाए जाते हैं।
    अधिकांश जन्तुओं की कोशिकाओं में सेण्ट्रोसोम पाए जाते हैं।
    लाइसोसोम पाए जाते हैं।

    प्रोकैरियोटिक में कौन कौन से जीव आते हैं?

    प्रोकैरियोटिक कोशिका नीले- हरे शैवालों तथा जीवाणुओं में ये कोशिकाएं पायी जाती हैं। प्रोकैरियोटिक कोशिका में क्लोरोप्लास्ट, गॉल्जीबाड़ी, तारककाय, माइक्रोकान्ड्रिया तथा अन्तः द्रव्यीजालिका (E.R.) नहीं पायी जाती है। फिर भी 70S प्रकार के राइबोसोम्स पाये जाते हैं तथा इनमें डीएनए हिस्टोन प्रोटीन से सम्बद्ध नहीं होता है।

    प्रोकैरियोटिक जीव कौन सा होता है?

    सबसे छोटा ज्ञात प्रोकैरियोटिक जीव माइकोप्लाज्मा है। माइकोप्लाज्मा सबसे छोटे मुक्त जीव हैं और बैक्टीरिया के सबसे सरल माने जाते हैं। वे जीवाणु वर्ग मोलिक्यूट्स से संबंधित हैं, जिनके सदस्य कोशिका भित्ति की कमी और उनके प्लाज्मा जैसे रूप से प्रतिष्ठित हैं।

    माइकोप्लाज्मा क्या है ?

    माइकोप्लाज्मा सबसे छोटे मुक्त जीव हैं और बैक्टीरिया के सबसे सरल माने जाते हैं। वे जीवाणु वर्ग मोलिक्यूट्स से संबंधित हैं, जिनके सदस्य कोशिका भित्ति की कमी और उनके प्लाज्मा जैसे रूप से प्रतिष्ठित हैं। सबसे छोटा ज्ञात प्रोकैरियोटिक जीव माइकोप्लाज्मा ही है।

    सबसे लंबी कोशिका का नाम क्या है?

    मनुष्यों में सबसे लम्बी कोशिका न्यूरॉन्स जिन्हें तंत्रिका कोशिका (nerve cell) भी कहा जाता है होती है | न्यूरॉन्स या तंत्रिका कोशिकाएं 3 फीट तक लंबी हो सकती हैं। ये मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र की मूलभूत इकाइयाँ हैं । एक विशिष्ट न्यूरॉन में एक cell morphology होता है जिसे सोमा कहा जाता है, इनकी बाल जैसी संरचनाएं जिन्हें डेंड्राइट्स और एक अक्षतंतु कहा जाता है। न्यूरॉन्स पूरे शरीर में दिमाग के जरिये knowledge पहुंचाने में सक्षम होते हैं। न्यूरॉन्स में भी विशेषत: motor neuron (मोटर न्यूरॉन) सबसे बड़ी कोशिका होती है | महिलाओं के शरीर में मानव अंडाणु (human egg ) जो की एक अपवाद (exception) है, वास्तव में शरीर की सबसे बड़ी कोशिका होती है |

    महिला शरीर में सबसे बड़ी कोशिका कौन सी है?

    मानव अंडाणु (human egg ) या अंडकोशिका जो की एक अपवाद (exception) है, वास्तव में शरीर की सबसे बड़ी कोशिका है और इसे बिना सूक्ष्मदर्शी के देखा जा सकता है। अन्य मानव कोशिकाओं की तुलना में, अंडे की कोशिकाएं बहुत बड़ी होती हैं। वे व्यास में 100 माइक्रोन हैं (जो कि एक मीटर का दस लाखवां हिस्सा है) और बालों के एक कतरा के बराबर चौड़ाई में होते है।

    सबसे छोटी मानव कोशिका कोनसी होती है ?

    सेरिबैलम (Cerebellum)की ग्रेन्युल कोशिका (Granule Cell) मानव शरीर की सबसे छोटी कोशिका होती है जो 4 माइक्रोमीटर से 4.5 माइक्रोमीटर लंबी होती है। RBC का आकार भी लगभग 5 माइक्रोमीटर पाया गया है ।

    मानव शरीर की सबसे लम्बी और सबसे बड़ी कोशिका कौन सी है?

    मानव अंडाणु (human egg ) या अंडकोशिका मानव शरीर (महिलाओं में ) की सबसे बड़ी कोशिका है। तंत्रिका कोशिका शरीर में सबसे लंबी कोशिका है।

    कोशिका झिल्ली के कौन कौन से कार्य हैं?

    कोशिका झिल्ली लचीली होती है और कार्बनिक अणुओं; जैसे-ग्लाइकोप्रोटीन तथा ग्लाइकोलिपिड की बनी होती है। कोशिका झिल्ली का लचीलापन एककोशिकीय जीवों में कोशिका के बाह्य वातावरण से भोजन तथा अन्य पदार्थ ग्रहण करने में सहायता करता है। इस प्रक्रिया को एण्डोसाइटोसिस कहते हैं। अमीबा इसी प्रक्रिया द्वारा भोजन ग्रहण करता है। कोशिका झिल्ली कोशिका की आकृति का निर्माण करती है एवं जीव द्रव्य की रक्षा करती है। साथ ही कोशिका झिल्लीअन्तर कोशिकीय विसरण एवं परासरण की क्रिया को नियंत्रित करने के साथ-साथ यह विभिन्न रचनाओं के निर्माण में भी सहायता करती है। कोशिका झिल्ली को सी. क्रेमर एवं नेगेली (1855) ने कोशिका कला एवं प्लोव ने जीवद्रव्य कला कहा।

    कोशिका कला क्या है ?

    कोशिका कला या कोशिका झिल्ली कोशिका की सबसे बाहरी परत, जो उसके विभिन्न घटकों को बाहरी वातावरण से अलग करती है। कोशिका के सभी अवयव एक पतली झिल्ली द्वारा घिरे रहते हैं। यह झिल्ली आवश्यक पदार्थों को अन्दर अथवा बाहर जाने देती है। इसी को चयनात्मक पारगम्यता (selective permeability) कहते हैं। इस दृष्टि से O2 एवं CO2, कोशिका झिल्ली के आर-पार विसरण प्रक्रिया तथा जल परासरण प्रक्रिया द्वारा कोशिका के अन्दर एवं बाहर होते हैं।

    लाइसोसोम कौन बनाता है?

    लाइसोसोम मुख्यतया जन्तु कोशिकाओं में पाई जाने वाली गोल इकहरी झिल्लियों से घिरी थैलियाँ है, जिसमें 50 हाइड्रोलिटिक एन्जाइम पाए जाते हैं वे एक एकल झिल्ली से घिरे होते हैं जो मोटाई में 100 एनएम तक होती है। वे गॉल्जी तंत्र द्वारा बनते हैं और इनमें लगभग 60 विभिन्न प्रकार के अम्ल हाइड्रोलाज़ होते हैं जो विभिन्न सामग्रियों के पाचन में मदद करते हैं। , यह लगभग 5 pH पर कार्य करते हैं। यह कोशिका का अपशिष्ट निपटाने वाला तन्त्र है। लाइसोसोम में उपस्थित पाचनकारी एन्जाइम कार्बनिक पदार्थ को तोड़ देते हैं। लाइसोसोम को आत्महत्या की थैली भी कहा जाता है।

    कोशिका की खोज रॉबर्ट हुक ने कब की?

    कोशिका की खोज रॉबर्ट हुक ने 1665 में की | कोशिका जीवधारियों की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई होती है | कोशिका प्राय: स्वत: जनन की सामर्थ्य रखती है। यह विभिन्न पदार्थों का वह छोटे-से-छोटा संगठित रूप है जिसमें वे सभी क्रियाएँ होती हैं जिन्हें सामूहिक रूप से हम जीवन कहतें हैं।

    प्रोकैरियोटिक एवं यूकैरियोटिक कोशिका में क्या अंतर है?

    प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं (Prokaryotic Cell) में केन्द्रक कला नहीं होती है। इस प्रकार केन्द्रकीय पदार्थ कोशिकाद्रव्य में बिखरा होता है। गुणसूत्र के स्थान पर हिस्टोन प्रोटीन रहित DNA के धागे होते हैं। ऐसी
    कोशिकाओं में पूर्ण रूप से विकसित कोशिकांगों का अभाव रहता है। ये कोशिकाएँ अर्थात् वास्तविक केन्द्रक रहित प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ नीले-हरे शैवाल, माइकोप्लाज्मा और जीवाणु में पाई जाती हैं।
    यूकैरियोटिक कोशिका (Eukaryotic Cell) कोशिकाओं में पूर्ण विकसित केन्द्रक अर्थात् केन्द्रक कला और केन्द्रिका युक्त तथा पूर्ण विकसित कोशिकांग पाए जाते हैं। इस प्रकार की कोशिकाओं के गुणसूत्र में DNA तथा हिस्टोन प्रोटीन से बनी इकाई न्यूक्लिओसोम पाई जाती हैं। ये कोशिका अर्थात् वास्तविक केन्द्रक वाली यूकैरियोटिक कोशिकाएँ अधिकांश शैवाल, उच्च पादप एवं जन्तुओं में पाई जाती हैं।

    वनस्पति तथा जंतु कोशिका में समान रूप से क्या पाए जाते हैं?

    संरचनात्मक रूप से, पौधे और जंतु कोशिकाएं बहुत समान हैं क्योंकि वे दोनों यूकेरियोटिक कोशिकाएं हैं। इन दोनों में केन्द्रक, माइटोकॉन्ड्रिया, अन्तःप्रद्रव्यी जालिका, गॉल्जीकाय, लाइसोसोम और पेरॉक्सिसोम जैसे झिल्ली-बद्ध अंग होते हैं। दोनों में समान झिल्ली, साइटोसोल और साइटोस्केलेटल तत्व भी होते हैं। कोशिका सिदान्त वनस्पति विज्ञान शास्त्री श्लाइडेन और जन्तु विज्ञान शास्त्री श्वान ने प्रस्तुत की थी, जिसके अनुसार, सभी पौधे तथा जन्तु कोशिकाओं से बने हैं और ये जीवन की मूलभूत इकाई हैं। जीवधारियों (जन्तु एवं वनस्पति) का शरीर एक या अनेक कोशिकाओं से बने होते हैं, जो शरीर की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है तथा जीवद्रव्य इसका भौतिक आधार होता है। कोशिका सिदान्त वनस्पति विज्ञान शास्त्री श्लाइडेन और जन्तु विज्ञान शास्त्री श्वान ने प्रस्तुत की थी, जिसके अनुसार, सभी पौधे तथा जन्तु कोशिकाओं से बने हैं और ये जीवन की मूलभूत इकाई हैं। जीवधारियों (जन्तु एवं वनस्पति) का शरीर एक या अनेक कोशिकाओं से बने होते हैं, जो शरीर की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है तथा जीवद्रव्य इसका भौतिक आधार होता है।

    प्लांट सेल और एनिमल सेल में क्या अंतर है?

    पादप कोशिका (प्लांट सेल) में कोशिका कला चारों ओर से एक भित्ति द्वारा घिरी रहती है, जिसे कोशिका भित्ति कहते हैं, जो प्रायः सेलुलोज नामक पदार्थ की बनी होती है।
    पादप कोशिका (प्लांट सेल) में बड़ी-बड़ी रसधानियाँ होती हैं, जो कि कोशिका का काफी बड़ा भाग घेरे रहती हैं। पादप कोशिका (प्लांट सेल) में लवक पाए जाते हैं (हरे हरितलवक, रंगहीन ल्यूकोप्लास्ट एवं रंगीन क्रोमोप्लास्ट)। अधिकांश पौधों की कोशिकाओं में सेन्ट्रोसोम नहीं पाए जाते हैं। अधिकांश पौधों की कोशिकाओं में लाइसोसोम नहीं मिलते।
    जबकि जन्तु कोशिका ( एनिमल सेल) में कोशिका कला के बाहर कोई भित्ति नहीं होती। कोशिका कला ही कोशिका की सीमा है। जन्तु कोशिका ( एनिमल सेल) में रसधानियाँ अनुपस्थित या बहुत छोटी होती हैं। अतः कोशिकाद्रव्य कोशिका में समान रूप से वितरित रहता है | जन्तु कोशिका ( एनिमल सेल) में लवक नहीं पाए जाते हैं। अधिकांश जन्तुओं की कोशिकाओं में सेण्ट्रोसोम पाए जाते हैं। जन्तु कोशिका ( एनिमल सेल) में लाइसोसोम पाए जाते हैं।

    लाइसोसोम कैसे उत्पन्न होते हैं?

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) और गॉल्जी काय (Golgi body) के द्वारा लाइसोसोम का निर्माण के द्वारा होता है। अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) के द्वारा लाइसो सोम के एंजाइमों का निर्माण होता है। लाइसोसोम मुख्यतया जन्तु कोशिकाओं में पाई जाने वाली गोल इकहरी झिल्लियों से घिरी थैलियाँ है, जिसमें 50 हाइड्रोलिटिक एन्जाइम पाए जाते हैं, जो लगभग 5 pH पर कार्य करते हैं। यह कोशिका का अपशिष्ट निपटाने वाला तन्त्र है। लाइसोसोम में उपस्थित पाचनकारी एन्जाइम कार्बनिक पदार्थ को तोड़ देते हैं। लाइसोसोम को आत्महत्या की थैली भी कहा जाता है।

    माइटोकांड्रिया के तीन कार्य क्या है?

    माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का पावर हाउस या ऊर्जा घर कहां जाता है इसमें ऑक्सीश्वसन के दौरान निकलने वाली ऊर्जा एडिनोसीन ट्राईफॉस्फेट (ATP) के रूप में संचित रहती है और सभी आवश्यक रासायनिक क्रियाओं को करने के लिए माइटोकॉण्ड्रिया ATP के रूप में ऊर्जा प्रदान करते हैं। माइटोकॉण्ड्रिया के मैट्रिक्स में क्रैब्स चक्र के एन्जाइम, DNA, राइबोसोम तथा RNA स्थित होते हैं इसलिए माइटोकॉण्ड्रिया को अर्धस्वायत्त कोशिकांग (semi autonomous organelle) कहा जाता है।

    लवक कहाँ पाए जाते है?

    लवक पादप कोशिकाओं के कोशिका द्रव में पाए जाने वाले गोल या अंडाकार रचना हैं, इनमें पादपों के लिए महत्त्वपूर्ण रसायनों का निर्माण होता है। लवक केवल पादप कोशिकाओं में स्थित होते हैं। ये तीन प्रकार के अर्थात् हरितलवक, अवर्णी लवक तथा वर्णी लवक होते हैं। हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) नामक हरे रंग के लवक में जीव जगत की सबसे महत्त्वपूर्ण जैव रासायनिक क्रिया प्रकाश-संश्लेषण होती है।

    कौन से कोशिकांग सक्रिय श्वसन स्थल है?

    कोशिका में श्वसन की क्रिया का कार्यस्थल माइटोकॉन्ड्रिया को कहा जाता है। श्वसन ऐसी प्रक्रिया है जिसके दौरान शरीर की आवश्यकता के लिए उसकी स्तर पर कहें तो कोशिका की ऊर्जा की आपूर्ति के लिए आवश्यक एडिनोसीन ट्राईफॉस्फेट (ATP) की उत्पत्ति श्वसन की क्रिया के द्वारा की जाती है। माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का पावर हाउस या ऊर्जा घर कहां जाता है इसमें ऑक्सीश्वसन के दौरान निकलने वाली ऊर्जा एडिनोसीन ट्राईफॉस्फेट (ATP) के रूप में संचित रहती है और सभी आवश्यक रासायनिक क्रियाओं को करने के लिए माइटोकॉण्ड्रिया ATP के रूप में ऊर्जा प्रदान करते हैं।

    माइटोकॉण्ड्रिया की अन्तःकला में क्या स्थित होता है ?

    क्रेब्स चक्र का सक्सिनिक डीहाइड्रोजीनेज एन्जाइम माइटोकॉण्ड्रिया की अन्तःकला में स्थित होता है।

    कोशिका का कोनसा भाग जीवन का आधार होता है ?

    हक्सले ने बताया कि जीवद्रव्य जीवन का भौतिक आधार है।

    गॉल्जीकाय का कार्य क्या है ?

    गॉल्जीकाय पादप कोशिकाओं में कोशिका पट्ट के निर्माण में भाग लेती हैं, इसलिए कोशिका विभाजन के समय संख्या बढ़ जाती है।

    लोमासोम किसे कहते है ?

    कवकों में कोशिका भित्ति व प्लाज्मालेमा के बीच पाई जाने वाली विशेष रचना लोमासोम कहलाती है।

    टीलोमीयर क्या होते है ?

    गुणसूत्र के सिरों को टीलोमीयर कहते हैं, ये गुणसूत्रों को स्थायित्व प्रदान करते हैं।

    प्रकाश-संश्लेषण की इकाई कोशिका कोनसी है ?

    थाइलेकॉइड पर पाई जाने वाली कोशिकाएँ क्वान्टासोम प्रकाश-संश्लेषण की इकाई है। प्रत्येक क्वान्टासोम में 250-300 हरितलवक अणु उपस्थित होते हैं।

    यूकैरियोटिक कोशिका के कोशिकाद्रव्य, हरितलवक तथा माइटोकॉण्ड्रिया में किस प्रकार के राइबोसोम होते है ?

    यूकैरियोटिक कोशिका के कोशिकाद्रव्य में 80S प्रकार के राइबोसोम तथा हरितलवक तथा माइटोकॉण्ड्रिया में 70 S प्रकार के राइबोसोम उपस्थित होते हैं।

    राइबोसोम अन्तःप्रद्रव्यी जालिका से कैसे जुड़े होते है ?

    राइबोसोम अन्तःप्रद्रव्यी जालिका से एक ग्लाइकोप्रोटीन राइबोफोरीन द्वारा जुड़े होते हैं।

    सपाट अन्तःप्रद्रव्यी जालिका पर किसका संश्लेषण होता है ?

    सपाट अन्तःप्रद्रव्यी जालिका पर लिपिड का संश्लेषण होता है।

    अलग अलग जीवों में हरितलवक के आकार

    क्लोरेला एवं क्लेमाइडोमोनास में हरितलवक प्यालेनुमा, यूलोथ्रिक्स में मेखलाकार, जिग्निमा में तारेनुमा, क्लेडोफोरा एवं ऊडोगोनियम में जालिकामय एवं स्पाइरोगायरा में कुण्डलाकार होते हैं।

    ग्रेना किसमे नही पाए जाते है ?

    शैवालों तथा बण्डल आच्छद कोशिकाओं की हरितलवक में ग्रेना नहीं पाये जाते हैं।

  • कोशिकांग, उनके खोजकर्ता एवं कार्य  (Cell organelles, their discoverers and functions)

    कोशिकांग, उनके खोजकर्ता एवं कार्य (Cell organelles, their discoverers and functions)

    प्रत्येक जीव का जीवन एक कोशिका से आरम्भ होता है | यदि वह इसी एक कोशिका के सहारे अपने जीवन को चलाता रहता है तो उसे एककोशिकीय जीव (Unicellular) जीव कहा जाता है, परन्तु अधिकांश जीवों में यह कोशिका विभाजन करती है और अंत में बहुकोशिकीय जीव बन जाता है | कोशिका जीवधारियों की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई होती है |

    वास्तविक केन्द्रक की उपस्थिति के आधार पर कोशिकाएँ दो प्रकार की होती हैं

    1. प्रोकैरियोटिक 2. यूकैरियोटिक

    सबसे पहले कोशिका का पता रॉबर्ट हुक 1665 में लगाया तथा अपनी पुस्तक माइक्रोग्राफिया में कोशिका का वर्णन किया |

    ल्यूवेनहॉक ने सबसे पहले उन्नत सूक्ष्मदर्शी से तालाब के जल में स्वतंत्र रूप से जीवित कोशिका का पता लगाया |

    कोशिकांग

    कोशिका का एक बड़ा भाग है, जो कोशिका झिल्ली या प्लाज्मा झिल्ली से घिरा एक तरल पदार्थ होता है। इसमें बहुत से कोशिका के घटक होते हैं, जिसे कोशिका अंग (Cell organelles) कहते हैं, जो कोशिका के लिए विशिष्ट कार्य करते हैं। कोशिकाद्रव्य तथा केन्द्रक दोनों को मिलाकर जीवद्रव्य कहलाता है। यह कोशिकाद्रव्य चिपचिपा, रंगहीन तथा कणिकामय होती है। यहाँ एन्जाइम की प्रचुरता होती है।

    कोशिकाद्रव्य में स्थित कोशिकांग (Cell organelles) कोशिकाओं के निर्णायक कार्य करते हैं।

    कोशिकांग, उनके खोजकर्ता एवं कार्य

    कोशिकांगखोजकर्ताकार्य
    हरितलवकशिम्परप्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन का निर्माण।
    माइटोकॉण्ड्रियाकॉलिकरकोशिकीय श्वसन द्वारा ATP का निर्माण।
    अन्तःप्रद्रव्यी जालिकापोर्टरप्रोटीन संश्लेषण (RER में) एवं लिपिड, ग्लाइकोजन तथा स्टीरॉइड संश्लेषण (SER में)।
    गॉल्जीकायकैमिलो गॉल्जीशुक्राणु के एक्रोसोम का निर्माण, हॉर्मोन स्रावण, पदार्थों का संचय एवं स्थानान्तरण।
    कोशिका भित्तिरॉबर्ट हुकमुख्यतया सेलुलोज की बनी, कैल्शियम व मैग्नीशियम पेक्टेट की बनी मध्य पटलिका कोशिकाओं के बीच सीमेन्ट का कार्य करती है।
    जीवद्रव्यपुरकिन्जेजीवन की भौतिक आधारशिला।
    कोशिका झिल्ली का तरल मोजैक मॉडलसिंगर एवं निकोलसनआकृति प्रदान करना व पदार्थों का आदान-प्रदान
    क्वान्टासोमपार्क एवं पोनप्रकाश-संश्लेषण की इकाई।
    राइबोसोमपैलेडप्रोटीन का संश्लेषण
    तारककायटी. बोवेरीकोशिका विभाजन के समय एस्टर किरणों का विकास।
    लाइसोसोमडी. डुवेबाह्य कोशिका पदार्थों तथा आन्तर कोशिका पदार्थों का पाचन, आत्महत्या की थैली।
    परॉक्सीसोमटॉल्बर्टप्रकाश श्वसन
    सूक्ष्मनलिकाएँडी रॉर्बटिससीलिया, कशाभिका, तारककाय एवं कोशिका कंकाल का निर्माण।
    केन्द्रकरॉबर्ट ब्राउनकोशिका का नियन्त्रक
    केन्द्रिकाफोन्टानाrRNA तथा राइबोसोम का संश्लेषण
    गुणसूत्रवाल्डेयरजननिक लक्षणों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानान्तरण
  • गुणसूत्र की खोज, संरचना, आकार, आकृति, रासायनिक संगठन, प्रकार एवं कार्य (Chromosome in Hindi सम्पूर्ण जानकारी)

    गुणसूत्र की खोज, संरचना, आकार, आकृति, रासायनिक संगठन, प्रकार एवं कार्य (Chromosome in Hindi सम्पूर्ण जानकारी)

    इस आर्टिकल में हम गुणसूत्र यानी क्रोमोसोम के बारे में विस्तृत में बतायेगे | गुणसूत्र क्या होते है ? गुणसूत्र की खोज कितने की ?, गुणसूत्रों की सरंचना कैसी होती है ? क्रोमोसोम का आकर कैसा होता है; गुणसूत्र किस आकृति में पाए जाते है ; गुणसूत्रों का रासायनिक संगठन क्या है ? गुणसूत्र कितने प्रकार के होते है ? और सबसे प्रमुख गुणसूत्रों के कार्य क्या होते है ? प्रमुख जीवों में गुणसूत्र की संख्या कितनी होती है ? जीन क्या होते है ? जीनोम क्या होते है और कैसे ये गुणसूत्रों से संबध रखते है ? आदि | साथ ही हम बात करेगे की कैसे स्तनधारी जीवों में एक्स (X) गुण सूत्र और वाई (Y) गुणसूत्र की भूमिका महत्वपूर्ण होती है |

    गुणसूत्र (Chromosome) क्रोमोसोम क्या होते है ?

    गुणसूत्र या क्रोमोसोम (Chromosome) सभी वनस्पतियों व जीवों की कोशिकाओं में पाये जाने वाले तंतु रूपी पिंड होते हैं, जो आनुवांशिक गुणों को निर्धारित व संचारित करने के लिए जाने जाते हैं। गुणसूत्र कोशिका के केन्द्रक (Nucleus) में सूक्ष्म सूत्र जैसा भाग है जो वंशागति के लिए आवश्यक है। क्रोमैटिन कोशिका विभाजन के समय सिकुड़कर छोटे और मोटे धागों का रुप ले लेते हैं। इन्हीं धागों को ही गुणसूत्र या क्रोमोसोम कहा जाता है, जिसमें कोशिका विभाजन नहीं होता है उसमें यह क्रोमैटिन पदार्थ के रूप में विद्यमान रहता है। गुणसूत्र (क्रोमोसोम) में आनुवंशिक गुण होते हैं, जो माता-पिता से DNA अणु के रूप में अगली सन्तति में जाते हैं। DNA अणु में कोशिका के निर्माण और संगठन की सभी आवश्यक सूचनाएँ होती हैं। गुणसूत्रों को ही अनुवांशिक लक्षणों का वाहक कहा जाता है।

    कोशिका के मध्य में गोलाकार या अण्डाकार रचना होती है, जिसे केन्द्रक कहा जाता है। कोशिका का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग, जो कोशिका के प्रबन्धक के रूप में भूमिका निभाता है। केन्द्रक के चार भाग होते हैं – केन्द्रक कला, केन्द्रक द्रव्य, केन्द्रिका तथा क्रोमैटिन। केन्द्रकद्रव्य में धागेनुमा पदार्थ जाल के समान होती है, जो क्रोमैटिन कहलाता है। यह DNA, हिस्टोन प्रोटीन तथा नॉन-हिस्टोन प्रोटीन का बना होता है।

    गुणसूत्र की खोज किसने की

    स्ट्रासबर्गर ने 1875 ई मे गुणसूत्र की खोज किया। सर्वप्रथम क्रोमोसोम ( रंगीन काय ) शब्द का प्रयोग वाल्डेयर ने 1889 में किया।

    गुणसूत्र (Chromosome) की सरंचना

    प्रत्येक गुणसूत्र में जेली के समान एक गाढ़ा द्रव होता है, जिसे मैट्रिक्स कहा जाता है। इसी मैट्रिक्स में दो परस्पर लिपटे महीन एवं कुण्डलित सूत्र, जिसे क्रोमैनिमेटा (Chromonemata) कहा जाता है। प्रत्येक क्रोमैनिमेटा एक अर्द्ध-गुणसूत्र (Chromatid) कहलाता है। ये दोनों क्रोमैटिड गुणसूत्रबिंदु (सेन्ट्रोमीयर) नामक स्थान पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं |

    गुणसूत्र की संरचना में निम्न भाग पाए जाते है :

    अर्धगुणसूत्र या क्रोमेटिड (Chromatid)

    कोशिका विभाजन की मेटाफेज (Metaphase) में गुण सूत्र के दो लंबवत भाग एक ही गुणसूत्रबिंदु से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। इनको अर्धगुणसूत्र या क्रोमेटिड कहते है। ऐनाफेज अवस्था के दौरान गुणसूत्रबिंदु का विभाजन होने से यह दोनों क्रोमेटिड पृथक हो जाते हैं, और पुत्रीगुणसूत्र (Daughter Chromosome) बनाते हैं।

    क्रोमोनिमेटा (Chromonemata)

    इंटरफ़ेज (Interphase) में गुण सूत्र अत्यधिक कुंडली अवस्था में दिखाई देता है, इन्हें वर्ण-गुणसूत्र या क्रोमोनिमेटा (Chromonemata) कहते है ।

    क्रोमोमियर (Chromomere)

    क्रोमोनिमेटा पर बिंदु के जैसी अत्यधिक कुंडली (Coiled) संरचनाएं दिखाई देती है, जिन्हें क्रोमोमियर (Chromomere) कहा जाता है।

    गुणसूत्रबिंदु (Centromere)

    क्रोमोसोम की लंबाई में एक स्थान पर यह थोड़ा संकरा होता है, इस भाग को प्राथमिक संकीर्णन (Primary Constriction) या गुणसूत्रबिंदु (Centromere)  कहा जाता हैं। गूणसूत्र बिन्दु (Centromere) की स्थिति के आधार पर गुणसूत्र अकेन्द्री (अर्थात् सेन्ट्रोमीयर रहित), अन्त:केन्द्री (सेन्ट्रोमीयर एक किनारे पर), अग्रकेन्द्री (सेन्टीमीटर किनारे के समीप) मध्यकेन्द्री (सेन्ट्रोमीयर मध्य में) तथा उपमध्यकेन्द्री (अर्थात् सेन्ट्रोमीयर मध्य भाग से थोड़ा दूर) होते हैं।

    काइनेटोकोर (Kinetochore)

    गुणसूत्रबिंदु पर पाई जाने वाला प्रोटीन काइनेटोकोर (Kinetochore) कहलाता है । कोशिका विभाजन के दौरान तर्कू तंतु (Spindal Fibers) काइनेटोकोर से ही जुड़ते हैं ।

    द्वितीयक संकीर्णन (Secondary Constriction)

    कुछ गुणसूत्रों में प्राथमिक संकीर्णन (Primary Constriction) के अलावा एक अन्य संकरा भाग भी पाया जाता है, जिसे द्वितीयक संकीर्णन कहते हैं।

    अनुषंघी सैटेलाइट क्रोमोसोम (Satellite Chromosome)

    ऐसे गुण सूत्र जिनमें द्वितीयक संकीर्णन (Secondary Constriction) पाया जाता है, उनके द्वितीयक संकीर्णन के ऊपर की एक छोटी भुजा सेटेलाइट (Satellite) कहलाती है और इन्हें ही सैटेलाइट गुणसूत्र (Satellite Chromosome) कहा जाता हैं।

    टिलोमीयर (Telomere)

    गुणसूत्रों का आखरी छोर (End tip) टिलोमीयर कहलाता है।

    गुणसूत्र का रासायनिक संगठन

    गुणसूत्र में डीएनए (DNA) और प्रोटीन पाए जाते हैं।

    यह प्रोटीन दो प्रकार के होते हैं-

    हिस्टोन प्रोटीन  (Histon Protein)

    नॉन हिस्टोन प्रोटीन ((Non Histon Protein)

    हिस्टोन प्रोटीन (Histon Protein)

    यह क्षारीय प्रोटीन (Alkali Protein) होते हैं जिनमे लाइसिन और आर्जिनिन (Lysine and Arginine) अमीनो अम्ल की मात्रा अधिक होती है। हिस्टोन डीएनए को उलझने से रोकते हैं और डीएनए को होने वाले नुकसान से बचाते हैं। इसके अलावा, हिस्टोन जीन विनियमन और डीएनए प्रतिकृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हिस्टोन के बिना, गुणसूत्रों में अवांछित डीएनए बहुत लंबा होगा।

    हिस्टोन प्रोटीन पांच प्रकार के होते हैं जिनका नाम निम्न है

    • H1
    • H2A
    • H2B
    • H3
    • H4

    इनमें से H2A, H2B H3, H4 के दो-दो इकाई जुड़कर हिस्टोन अष्टक (Histon Octamere) का निर्माण करते हैं। इनको कॉड कण (Core Partical) भी कहा जाता है।

    न्यूक्लियोसोम

    हिस्टोन अष्टक के साथ डीएनए की लगभग दो कुंडली तथा H1 हिस्टोन जुड़कर एक संरचना बनाती है, जिसे न्यूक्लियोसोम (Nucleosome) कहा जाता है।

    एक न्यूक्लियोसोम यूकेरियोट्स (eukaryotes) में डीएनए पैकेजिंग की बुनियादी संरचनात्मक इकाई है | कोशिका केन्द्रक के भीतर फिट होने के लिए डीएनए का न्यूक्लियोसोम में संघनित होना जरुरी होता है |

    लगभग 6 न्यूक्लियोसोम (Nucleosome) आपस में जुड़ कर सोलेनोइड (Solenoid) नामक संरचना का निर्माण करते हैं। सोलेनोइड की अवधारणा आउडेट के द्वारा दी गई तथा न्यूक्लियोसोम प्रतिरूप कोर्नबर्ग (Roger David Kornberg) तथा थॉमस के द्वारा दिया गया।

    गुणसूत्रों की आकृति

    गुणसूत्रबिन्दु की स्थिति और गुणसूत्रभुजा (Chromosomal arm) की लंबाई के आधार पर, गुणसूत्रों को चार समूहों में वर्गीकृत किया जाता है :

    1. अग्र केन्द्रकी (Telocentric)
    2. अग्रबिंदु या उप-अन्तकेन्द्रकी (Acrocentric)
    3. उप-मध्यकेन्द्रकी (Submetacentric)
    4. मध्यकेन्द्रकी (Metacentric)

    अग्र केन्द्रकी गुणसूत्र (Telocentric chromosome)

    टेलोसेंट्रिक गुणसूत्रों में, गुणसूत्रबिन्दु (Centromere)  गुणसूत्र के अंतिम सिरे (टिप) पर स्थित होता है। इस प्रकार के गुणसूत्र कोशिका विभाजन की एनाफेज (Anaphase) अवस्था में ’i’ आकार की संरचना के रूप में दिखाई देते हैं। इन गुणसूत्रों में केवल एक गुणसूत्रभुजा (Chromosomal arm) होता है। इस प्रकार के chromosome में बहुत दुर्लभ होते हैं और इन्हें केवल बहुत कम प्रजातियों में देखा गया है।

    अग्रबिंदु या उपअन्तकेन्द्रकी गुणसूत्र (Acrocentric chromosome )

    गुणसूत्रबिन्दु (Centromere) क्रोमोसोम के एक छोर पर इस तरह से स्थित होते है कि इनकी एक बहुत ही छोटी भुजा (P arm) और एक असाधारण लंबी भुजा (Q arm) होती है। कोशिका विभाजन की  मेटाफ़ेज़ अवस्था (Metaphase) में ये ‘J ‘आकार की संरचनाओं के रूप में दिखाई देते हैं।

    टिड्डियों के कुल Acrididae में ऐसे गुण सुत्रों को देखा गया जिससे इनका नाम Acrocentric क्रोमोसोम रखा गया है।

    सभी एक्रोकेंट्रिक क्रोमोसोम SAT-गुणसुत्र होते है।

    SAT-गुणसुत्र  ऐसे गुणसूत्र होते है जिनमें प्राथमिक संकीर्णन के अलावा एक अन्य द्वितीयक संकीर्णन (Secondary Constriction) भी पाया जाता है जिससे गुणसूत्र के एक छोर पर एक घुंडी जैसी संरचना दिखती जिसे सेटेलाइट कहते है और ऐसे गुणसूत्र SAT-गुणसुत्र कहलाते है ।
    मानव में, गुणसूत्र संख्या 13, 15, 21 और 22  ऐसे ही गुण सूत्र होते हैं।

    उप-मध्यकेन्द्रकी गुणसूत्र (Submetacentric chromosome)

    सेंट्रोमियर क्रोमोसोम के केंद्र या मध्य से थोडा दूर स्थित होता है। इसमें दो असमान भुजा (Chromosome arm) होती है एक भुजा छोटी और एक बड़ी भुजा होती है। सबमेटासेंट्रिक गुणसूत्र कोशिका विभाजन के ऐनाफेज (Anaphase) अवस्था में L आकार की संरचनाओं के रूप में दिखाई देते हैं। मानव गुणसूत्रों के अधिकांश submetacentric chromosome होते हैं।

    मध्यकेन्द्रकी गुणसूत्र (Metacentric chromosome)

    गुणसूत्रबिन्दु (centromere) क्रोमोसोम के बिल्कुल केंद्र में स्थित होता है। इस प्रकार गुणसूत्रों के दो बराबर आकार की भुजाएँ होती है।

    मेटासेंट्रिक गुणसूत्र कोशिका विभाजन के एनाफेज (Anaphase) में V आकार की संरचनाओं के रूप में दिखाई देंगे।

    इन गुणसूत्रों को एक आदिम प्रकार (Primitive) का गुणसूत्र माना गया है। जो प्रोकैरियोट में पाया जाया है |

    उभयचर में एवं मानव के गुणसूत्र संख्या 1 और 3 मध्यकेन्द्रकी गुणसूत्र होते हैं।

    गुणसूत्रों के प्रकार ( Type of Chromosomes)

    गुणसूत्र चार प्रकार के होते हैं-

    अलिंग गुणसूत्र (Autosomal Chromosome)

    यह लिंग से संबंधित लक्षणों को छोड़कर सभी प्रकार के कायिक लक्षणों (Somatic symptoms) का निर्धारण करते हैं। इनकी संख्या मानव में 44 होती है।

    लिंग गुणसूत्र (Sex Chromosome)

    यह लिंग का निर्धारण (Sex determination) करते है इनकी संख्या में दो होती है। पुरुष में XY तथा मादा में XX।

    सहायक गुणसूत्र (Acessory Chromosome)

    यह गुणसूत्रों के छोटे-छोटे टुकड़े होते हैं, जिनमें गुणसूत्रबिंदु नहीं पाया जाता। सहायक गुणसूत्र अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) में भाग नहीं लेते। अनुवांशिक रूप से निष्क्रिय होते हैं। इनकी खोज विल्सन द्वारा की गई। मनुष्यों में, प्रत्येक 1500 में लगभग एक व्यक्ति में एक सहायक गुणसूत्र होता है, और इनमें से कुछ मानसिक या शारीरिक असामान्यताओं (mental or physical abnormalities) से जुड़े होते हैं

    विशालकाय गुणसूत्र (Giant  chromoses)

    पॉलीटीन गुणसूत्र (Polytene Chromosome)

    इसकी खोज ई.जी. बालबियानी (E.G. balbiani) ने डायप्टेरा (diapteron) कीटों के लार्वा की लार ग्रंथि में की। पॉलीटीन गुणसूत्र कोल्लर (koller) द्वारा दिया गया। इसमें कई क्रोमोनिमा (chromonema) होते हैं, इसलिए इसे पॉलीटीन गुणसूत्र कहा जाता है।

    इनके कई क्रोमोनिमा क्रोमोमियर से जुड़े रहते हैं। प्रत्येक क्रोमोनिमा में पफ क्षेत्र और गैर-पफ (पफ विहीन) क्षेत्र (puffed region & non-puffed regions) होते हैं। पफ क्षेत्र में बालबियानी छल्ले (Balabiani rings) होते हैं जो डीएनए, आरएनए और प्रोटीन से बने होते हैं।

    ड्रोसोफिला मेलेनोगैस्टर में इनकी आमाप 2000 um होती है। इन गुणसूत्रों में गहरी व हल्की अनुप्रस्थ पट्टियों का विशिष्ट अनुक्रम होता है। गहरी पट्टियाँ यूक्रोमेटिन तथा हल्की पट्टियाँ हेटेरोक्रोमेटिन कहलाती है। इन गुणसूत्रों में गहरी पट्टियों पर लूपनुमा पफ बन जाते हैं। इन विशिष्ट लूपों को बालबियनी लूप कहते हैं। इन लूपों में mRNA का संश्लेषण होता है। गैर-पफ क्षेत्र छल्ले के होते हैं लेकिन वे बैंड (पट्टी) और इंटरबैंड से बने होते हैं। ये क्रोमोसोम एंडोमाइटोसिस (endomostosi) द्वारा बनते हैं। ये कीटों के लार्वा में कायान्तरण (मेटामॉर्फोसिस – metamorphosis) को बढ़ावा देते हैं।

    लैंपब्रश गुणसूत्र (Lampbrush Chromosomes)

    कशेरुकियों के परिवर्धनशील अण्डाणु के गुणसूत्रों का आकार लैम्प साफ करने वाले ब्रश जैसा हो जाता है। लैम्प (Lamp) की सफाई करने वाले ब्रश की तरह दिखाई देने के कारण इनको लैंप ब्रश गुणसूत्र (Lampbrush Chromosome) नाम दिया गया। इन गुणसूत्रों का मुख्य केन्द्रीय कुछ DNA का तथा लूप DNA व RNA के बने होते हैं। इनकी खोज रुकर्ट ने की। लैम्पब्रश गुणसूत्र स्तनधारियों को छोड़कर अधिकांश जानवरों के बढ़ते oocytes (अपरिपक्व अंडे) में पाए जाने वाले गुणसूत्र का एक विशेष रूप है | ये शार्क, उभयचर, सरीसृप और पक्षियों के प्राथमिक अण्डक (oocytes) में अर्द्धसूत्री विभाजन के प्रोफेज-I की डिप्लोटिन अवस्था में पाये जाते है। वे अण्डों योक के संश्लेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसमें एक मुख्य अक्ष होता है जिसमें डीएनए और प्रोटीन से बने दो क्रोमोनिमा (chromonema) होते हैं।

    जीन (Gene)

    जीनशब्द को जोहन्सन ने दिया था। आधुनिक शोधों के अनुसार, एक जीन, DNA के एक ऐसा खण्ड है, जो किसी एक विशिष्ट प्रकार की प्रोटीन (एन्जाइम) के संश्लेषण का नियमन करता है। इस भाग को सिस्ट्रॉन कहते हैं।

    इन्हीं जीनों के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में आनुवंशिक लक्षण हस्तान्तरित होते हैं। अतः जीन ही आनुवंशिक गुणों हेतु उत्तरदायी हैं।

    जीनोम (Genome)

    जीनोम (Genome) एक अगुणित गुणसूत्रों के समुच्चय को जीनोम कहते हैं; जैसे-एक युग्मक में उपस्थित कुल गुणसूत्र।

    कैरियोटाइप किसी जाति के कुल गुणसूत्रों की आकारिकी को कैरियोटाइप कहा जाता है।

    इसके अन्तर्गत निम्न लक्षण निहित हैं:

    (i) गुणसूत्रों की संख्या (ii) गुणसूत्रों की कुल लम्बाई (iii) प्रत्येक गुणसूत्र की लम्बाई तथा व्यास (iv) लघु व वृहत् भुजा का अनुपात।

    इडिओग्राम (Idiograms )

    जब किसी जाति के कैरियोटाइप को विशिष्ट चित्रों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है, तो इन चित्रों को इडिओग्राम कहते हैं।

    कुछ प्रमुख जीवों में गुणसूत्रों की संख्या

    किसी भी जाति में सभी जीवो में गुणसूत्रों की संख्या एक समान होती है। भिन्न-भिन्न यानि अलग जातियों के जीवो में इनकी संख्या अलग-अलग होती है। कुछ जीवों उपस्थित गुणसूत्रों की संख्या निम्न होता है।

    जीवसंख्याजीवसंख्या
    ऐस्कैरिस मैगासिफेलस190मानव46
    अमीबा250गोरिल्ला48
    मटर14चिम्पैन्जी48
    मक्का20चूहा40
    गेहूँ42घोड़ा64
    आलू48कुत्ता78
    मेंढक26घरेलू मक्खी12
    बिल्ली38

    गुणसूत्रों के कार्य – Works of Chromosome

    जीवों में गुणसूत्रों का प्रमुख कार्य निम्न है :

    अनुवांशिकता में प्रमुख भूमिका

    गुणसूत्र अनुवांशिकता का वाहक है जिसमें विभिन्न प्रकार की प्रकार की क्रियाओं के लिए संदेश निहित होते हैं। यह प्रोटीन की बहुत से जटिल अणुओं के द्वारा बनते हैं

    जनन की इकाई के रूप में

    गुणसूत्रों के प्रतिलिपिकरण द्वारा संतति गुणसूत्र बन जाते हैं, जो उत्पन्न संतति कोशिकाओं में पहुंचते हैं।

    एक्स (X) गुण सूत्र और वाई (Y) गुणसूत्र की भूमिका

    स्तनधारी जीवों, जिसमें मनुष्य भी शामिल हैं, में लिंग निर्धारण करने वाले दो गुणसूत्रों – एक्स (X) गुण सूत्र और वाई (Y) गुणसूत्र की भूमिका होती है। पुरुषों में एक Y और एक X गुण सूत्र होता है, जबकि महिलाओं में दो X गुणसूत्र होते हैं। किसी पिता का Y गुणसूत्र बिना किसी बदलाव के उसके पुत्रों में जाता है। इसलिए, Y गुणसूत्र के अध्ययन से किसी भी पुरुष के पितृवंश समूह का पता लगाया जा सकता है। Y गुणसूत्र को पुरुष निर्धारण गुणसूत्र के रूप में जाना जाता है। यह अपने साथी X की तुलना में एक छोटा गुणसूत्र है।

    मनुष्य – 46 (23 जोडें) गुणसूत्र

    एक नये अध्ययन में, भारतीय वैज्ञानिकों ने Y क्रोमोसोम के बारे में चौंकाने वाला खुलासा किया है, जो बताता है कि लिंग निर्धारण के अलावा कुछ अन्य प्रक्रियाओं में भी Y क्रोमोसोम की भूमिका हो सकती है। इस अध्ययन में, वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि वाई गुणसूत्र पुरुष प्रजनन में शामिल अन्य गुणसूत्रों पर जीन को नियंत्रित करता है।

    Y गुणसूत्र पर डीएनए अनुक्रम कई प्रतियों में मौजूद होते हैं और उनमें से बहुत कम प्रोटीन के लिए कोडिंग का काम करते हैं। अब तक यह समझा जाता था कि वे Y गुणसूत्रों पर कुछ प्रोटीन कोडिंग जीन्स के लिए पैकिंग सामग्री के रूप में कार्य करते हैं। कोई स्पष्ट कार्य नहीं होने के कारण, Y गुणसूत्र के डीएनए के अधिकांश भाग को व्यर्थ माना जाता था। सीएसआईआर-कोशिकीय एवं आणविक जीवविज्ञान केन्द्र (सीसीएमबी) के वैज्ञानिक प्रोफेसर राशेल जेसुदासन के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में Yगुणसूत्र डीएनए के आश्चर्यजनक अभिनव नियामक कार्यों के बारे खुलासा किया गया है।

    चूहों के Y क्रोमोसम पर किए गए इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया है कि डीएनए के एक गुच्छे का चूहे के वाई गुणसूत्र पर दोहराव होता है, जो वृषण या शुक्र-गन्थि में, विशेष रूप से प्रजनन के लिए आवश्यक अन्य गुणसूत्रों से व्यक्त जीन को नियंत्रित करता है। उन्होंने यह भी दिखाया है कि ये दोहराव प्रजाति-विशिष्ट हैं, यानी वे अन्य प्रजातियों में मौजूद नहीं हैं। शोधकर्ताओं का कहना यह भी है कि ये दोहराव छोटे आरएनए (RNA) के एक वर्ग को जन्म देते हैं, जिन्हें पीआईआरएनए (piRNA) कहा जाता है।

    प्रोफेसर जेसुदासन कहते हैं – “मानव Y गुणसूत्र पर हमारे पहले के अध्ययनों में देखा गया है कि Y गुणसूत्र पर लिंग और प्रजाति-विशिष्ट दोहराव प्रजनन के लिए महत्वपूर्ण गुणसूत्र संख्या-1 से संचरित प्रोटीन-कोडिंग RNA को नियंत्रित करता है। इस अध्ययन में, Y गुणसूत्र और अन्य गुणसूत्रों के बीच परस्पर क्रिया की यह पहली रिपोर्ट है। इस प्रकार, दो अध्ययनों को समेकित करते हुए, हम Y गुणसूत्र द्वारा प्रजनन से जुड़े जीनों का अधिक व्यापक विनियमन देख सकते हैं।”

    वे कहते हैं – “जैसे-जैसे प्रजातियां विकसित होती हैं, ये दोहराव भी साथ-साथ विकसित होते रहते हैं, और धीरे-धीरे प्रजातियों के प्रजनन को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं रहते हैं। इस प्रकार, ऐसा प्रतीत होता है कि ये दोहराव प्रजातियों की पहचान और विकास-क्रम का आधार हैं।”

    स्त्रोत : विज्ञान प्रसार

  • कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) की संरचना, आकार,  भाग  एवं कार्य | केन्द्रक कला, केन्द्रक द्रव्य, केन्द्रिका, क्रोमैटिन तथा गुणसूत्र के प्रकार Nucleus and Chromosome in Hindi

    कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) की संरचना, आकार, भाग एवं कार्य | केन्द्रक कला, केन्द्रक द्रव्य, केन्द्रिका, क्रोमैटिन तथा गुणसूत्र के प्रकार Nucleus and Chromosome in Hindi

    इस आर्टिकल में हम कोशिका केंद्र (Cell Nucleus) के बारे में जानेगें | कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) क्या है ? कोशिका में कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) की क्या भूमिका है ? कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) की संरंचना कैसी होती है ? केन्द्रक के कितने भाग होते है ? और सबसे प्रमुख कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) के प्रमुख कार्य क्या क्या है ? इसके अलावा इस आर्टिकल में हम जानेगें कि केन्द्रक कला या केन्द्रक झिल्ली क्या है ? केन्द्रक द्रव्य क्या होता है ? केन्द्रिका क्या है और उसकी केन्द्रक में क्या भूमिका है ? साथ ही हम बात करेगें कि क्रोमैटिन तथा गुणसूत्र के बारे में |

    कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) क्या है ? What is Cell Nucleus ?

    कोशिका द्रव्य में स्थित वह संरचना जो जीवद्रव्य की क्रियाओं को संचालित करता है अर्थात कोशिका का नियंत्रण करता है, केंद्रक कहलाता है | केंद्रक कोशिका का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग है जो कोशिका के प्रबन्धक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। केंद्रक में कोशिका की वंशानुगत जानकारी होती है और कोशिका के विकास और प्रजनन को नियंत्रित भी करती है| यह एक यूकेरियोटिक सेल का कमांड सेंटर है और आमतौर पर यह एक कोशिकांग (organelle) का सबसे प्रमुख संगठन है | स्तनधारीयों की RBC व पादपों की चालनी बलिकाओं को छोड़कर सभी जीवित कोशिकाओं में केन्द्रक पाया जाता है |

    केन्द्रक कोशिका के लगभग मध्य में स्थित गोलाकार और अण्डाकार सरंचना होती है जिसका व्यास 5u – 20u तक होता है, प्राय: एक कोशिकाओं में एक ही केंद्रक पाया जाता है , परन्तु कुछ सजीवो में एक से अधिक केन्द्रक भी पाये जाते है | जैसे : पैरामिशियम , वाउचेरिया आदि | केन्द्रक एक दो स्तरीय आवरण से घिरी सरंचना है जिसे केन्द्रक कला कहते है | जिसमे खनिज लवण, एंजाइमस, DNA, RNA, क्रोमेटिन धागे (गुणसूत्र) आदि पाए जाते है |

    केन्द्रक कोशिका विभाजन द्वारा वृद्धि, गुणसूत्र में उपस्थित जीन द्वारा आनुवांशिक लक्षणों (माता पिता के गुणों) को अगली पीढ़ी तक पहुचाने एवं कोशिका की सभी उपापचयी क्रियाओं का नियंत्रण एवं नियमन करने का कार्य करता है | अत: यह कोशिका के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक है | केन्द्रक को कोशिका का निदेशक (Director of cell) भी कहते है।

    केन्द्रक (Cell Nucleus) की खोज

    केन्द्रक की खोज 1831 में रोबर्ट ब्राउन ने आर्किक पादप कोशिकाओ के रूप में की थी | केन्द्रक को रॉबर्ट ब्राउन ने आर्किड के जड़ो की कोशिकाओं में देखा और उनको Nucleus (न्यूक्लियस) नाम दिया। केन्द्रक के अध्ययन को Karyology कहा जाता है। फ्लेमिंग ने इसे क्रोमैटिन नाम दिया।

    न्यूक्लियोप्लाज्मिक इंडेक्स (Nucleoplasmic Index) क्या है ?

    केन्द्रक और कोशिका द्रव्य की मात्रा के बीच एक विशिष्ट अनुपात होता है जिसे न्यूक्लियोप्लाज्मिक इंडेक्स (NP) या केरियोप्लाज्मिक इंडेक्स (karyoplasmic index) कहा जाता है जिसे हर्टविग समीकरण के रूप में निम्न प्रकार व्यक्त किया जा सकता है –

    NP = Vn/ VcVn

    जहां

    NP = न्यूक्लियोप्लाज्मिक इंडेक्स

    Vn = केन्द्रक का आयतन

    Vc = कोशिक द्रव्य का आयतन

    कोशिका में केन्द्रक की संख्या (Numbers of Nucleus in Cell)

    आमतौर पर कोशिकाओं में एक ही केन्द्रक पाया जाता है जिसे एककेन्द्रकी कोशिका कहा जाता है। लेकिन पैरामीसियम कोडेटम द्विकेन्द्रकी होता है जबकि पैरामीसियम ऑरिलिया तीन केन्द्रक होते है | कई केन्द्रक वाली कोशिकाओं को बहुकेन्द्रकीय कोशिका कहते है

    उदाहरण म्यूकोर, Rancheria (शैवाल) तथा पशु और मानव की रेखित पेशी कोशिकाओं में जिसे सिंकटीयियम (Syncytium) कहते हैं। केन्द्रक RBC और एंजियोस्पर्म की चालनी नलिका (सिव ट्यूब) में अनुपस्थित होता है।

    केन्द्रक का आकार (Shape of Nucleus)

    केन्द्रक कोशिका के लगभग मध्य में स्थित गोलाकार और अण्डाकार सरंचना होती है जिसका व्यास 5u – 20u तक होता है

    लेकिन यह इओसीनोफिल (Eosinophil) में द्विपालित (Bilobed) होता है बेसोफिल में तीन पालियो (Trilobed) होता है और न्युट्रोफिल (Neutrophil) में बहुपालित (Multilobed) होता है यह मैक्रोफेज कोशिका (Macrophaze) में गुर्दा के आकार का होता है, Verticella में यह घोड़े की नाल के रूप का होता है।

    केन्द्रक का रासायनिक संगठन (Chemical Composition of Nucleus)

    DNA= 9-12%

    प्रोटीन (Basic protein) = 15%

    Enzyme, acid protein & neutral protein = 65%

    RNA = 5%

    लिपिड्स (Lipids) = 3%

    Minerals Ca2+, mg2+, k+ Na+ = traces

    RNA एवं DNAमें फास्फोरस (Phosphorus) उपस्थित होता है

    कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) की संरचना

    केन्द्रक दोहरी झिल्ली से घिरा कोशिकांग है इन दोनों झिल्लियो के मध्य 10-15 नैनोमीटर का रिक्त स्थान होता है, जिसे परिकेन्द्रीय अवकाश कहते है |

    केन्द्रक झिल्ली या केन्द्रक कला में निश्चित स्थानों पर छिद्र होते है, जो केन्द्रक छिद्र कहलाते है | केन्द्रक छिद्रों से RNA व प्रोटीन का परिवहन होता है |

    केन्द्रक झिल्ली के अन्दर एक पारदर्शी , अर्द्धतरल कणिकामय समान व स्वच्छ पदार्थ पाया जाता है जिसे केन्द्रक द्रव्य कहते है, इसमें RNA , DNA , प्रोटीन , एंजाइम , वसा , खनिज लवण आदि पदार्थ पाये जाते है |

    इसमें क्रोमेटिन जाल व केंद्रिका स्थित होती है | केन्द्रिका की खोज फोंटाना ने की थी | केन्द्रिका एक गोलाकार संरचना होती है , एक केन्द्रक में एक केंद्रिका या अधिक भी हो सकती है | जैसे प्याज के केन्द्रक में चार केन्द्रिकाएं होती है |

    क्रोमेटिक जाल डीएनए से बना होता है क्रोमेटिन जाल गुणसूत्र के रूप में बिखरा होता है जो मनुष्य में लगभग 20m लम्बा होता है | इसके अतिरिक्त RNA व हिस्ट्रोन प्रोटीन भी केन्द्रक में पाये जाते है |

    कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) केन्द्रक के कितने प्रकार होते है ?

    केन्द्रक के निम्न चार भाग होते हैं

    1. केन्द्रक कला या केन्द्रक झिल्ली (Nuclear membrane
    2. केन्द्रक द्रव्य (Nucleoplasm or nuclear sap)
    3. केन्द्रिका (Nucleolus)
    4. क्रोमैटिन धागे(Chromatin threads)

    केन्द्रक झिल्ली या केन्द्रक कला (Nuclear Membrane)

    केन्द्रक झिल्ली प्लाज्मा झिल्ली की भांति दोहरी झिल्ली की बनी होती है एवं केन्द्रक के चारों ओर एक आवरण बनाती है |

    केन्द्रक झिल्ली का निर्माण अर्धसूत्री विभाजन के अंत में टिलोफ़ज प्रावस्था में ER द्वारा किया जाता है।

    प्रत्येक झिल्ली लाइपोप्रोटीन से बनी एक इकाई कला होती है | प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में केन्द्रक-कला या तो अविकसित होती है या होती ही नहीं |

    प्लाज्मा झिल्ली की तरह केन्द्रक झिल्ली वरणात्मक पारगम्य होती है | यह केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य के बीच पदार्थों के आवागमन को नियन्त्रित करती है |

    केन्द्रक झिल्ली को Karyotheca भी कहा जाता है। यह 70-80Å मोटी होती है।

    केन्द्रक की बाहरी और भीतरी झिल्ली के बीच के खाली स्थान को परिकेन्द्रकीय अवकाश (पेरिन्यूक्लियर स्पेस, perinuclear space) कहा जाता है।

    केन्द्रक छिद्र (Nuclear Pore)

    केन्द्रक कला या केन्द्रक झिल्ली में छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। न्यूक्लियोपोरिन द्वारा 9 nm आकार वाले केन्द्रक छिद्र का गठन किया जाता है । इन्हीं छिद्रों द्वारा आवश्यक पदार्थों का आदान-प्रदान केन्द्रक द्रव्य तथा कोशिकाद्रव्य के बीच में होता है।

    केन्द्रक छिद्र की संरचना अष्ट कोणीय होती है केन्द्रक छिद्र में इलेक्ट्रॉन सघन वलय पाया जाता है जिसे एनूल्स कहते है। एनूल्स केन्द्रक छिद्र के साथ मिलकर रंध्र-जटिल बनती है।

    केन्द्रक लेमिना (Nuclear Lamina)

    भीतरी झिल्ली में एक रेशेदार प्रोटीन जाल होता है जिसे फाइबर लेमिना कहा जाता है जो परिधीय हेटोरोक्रोमेटिन के साथ जुड़ा होता है। लेमिना मधुमक्खी के छाते की तरह दिखती है।

    केन्द्रक लेमिना प्रोटीन लॅमिन्स (Lamins) से बना है। केन्द्रक लेमिना क्रोमेटिन के संलग्न के लिए स्थल प्रदान करता हैं।

    केन्द्रक द्रव्य (न्यूक्लियोप्लाज्म Nucleoplasm)

    केन्द्रक के मैट्रिक्स को केन्द्रकद्रव्य या केन्द्रक रस या कैरियोलिम्फ कहते है |

    केन्द्रक के अन्दर यह न्यूक्लियोप्रोटीन का बना पारदर्शी, कोलायडी, तरल पदार्थ और कणिकामय प्रोटीन का बना होता है जो केन्द्रक-कला से घिरा रहता है | इसमें केन्द्रिका और क्रोमैटिन धागे के अतिरिक्त, एंजाइम, खनिज लवण, आर.एन.ए, राइबोसोम आदि पाए जाते हैं | यह प्रकृति में acidophilic होती है। 

    केन्द्रिका (Nucleolus) क्या है ? What is Nucleolus ?

    केन्द्रक के अंदर एक या दो केन्द्रिकाएं होती हैं | यह गोल और नग्न संरचना है जो विशिष्ट बिंदु पर क्रोमेटिन से जुड़ा हुआ है जिसे न्यूक्लियोलर संगठित क्षेत्र या (Nucleolar Organiser Region) NOR कहा जाता है। ये किसी झिल्ली के अभाव में सीधे केन्द्रकद्रव्य के सम्पर्क में रहती है | केन्द्रिकाएं प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में नहीं पाई जाती हैं तथा कोशिका विभाजन के समय गायब हो जाती है |

    केन्द्रिका की खोज सर्वप्रथम फोन्टाना ने 1781 में की, उसके बाद 1840 में बोमेन ने इसे न्यूक्लिओलस नाम दिया | केन्द्रिका में प्रोटीन (85%), आर.एन.ए (10%) तथा डी.एन.ए (5%) होता है |

    प्रोटीन संश्लेषण रूप से सक्रिय कोशिकाओ में बड़े केन्द्रिका होते हैं। उदाहरण के लिए oocytes, न्यूरॉन्स आदि।

    केन्द्रिका के भाग

    रेशेदार भाग (Fibrous Part)

    न्यूक्लियोनेमा नामक तंतुओ से बना केन्द्रिका का केंद्रीय भाग होता है। न्यूक्लियोनेमा मुख्य रूप से डीएनए और प्रोटीन से बना है।

    दानेदार भाग/ कणिकीय भाग (Granular Part)

    यह कणिकाओ (आर-आरएनए + प्रोटीन) से मिलकर बना केन्द्रिका का परिधीय भाग है जो परिपक्व राइबोसोम का प्रतिनिधित्व करता है।

    मैट्रिक्स या पार्स एमोर्फा (Amorphous Matrix)

    यह प्रोटीन युक्त मैट्रिक्स आधात्री होता है जिसमें तंतु और कण दोनों होते हैं। राइबोसोमल प्रोटीन का संश्लेषण केन्द्रिका में होता है |

    क्रोमैटिन भाग (Chromatin Part)

    यह डीएनए से बना है। केन्द्रिका में दो प्रकार के क्रोमैटिन होते हैं जो इंट्रान्यूक्लियोलर क्रोमेटिन (Intranuclear) और पेरिन्यूक्लियोलर क्रोमेटिन (Perinuclear) होते हैं।

    केन्द्रिका का कार्य क्या है ? What are Functions of Nucleolus ?

    केन्द्रिका के द्वारा निम्न तीन प्रकार के कार्यों को सम्पादित किया जाता है-

    1. प्रोटीन का संश्लेषण,
    2. राइबोसोमल आरएनए का संश्लेषण,
    3. केन्द्रक से कोशिका द्रव्य में आनुवांशिक सूचनाओं (Genetic Information) का स्थानांतरण है

    केन्द्रिका को राइबोसोम का कारखाना (राइबोसोमल फैक्टरी) के रूप में जाना जाता है।

    केन्द्रिका का रासायनिक संघटन (Chemical Composition of Nucleolus)

    इस में 85% प्रोटीन, 10% आर-आरएनए, और डीएनए का 5% होता है।

    क्रोमैटिन (Chromatin)

    क्रोमैटिन (Chromatin) केन्द्रकद्रव्य में धागेनुमा पदार्थ जाल के समान होती है, जो क्रोमैटिन कहलाता है। यह DNA, हिस्टोन प्रोटीन तथा नॉन-हिस्टोन प्रोटीन का बना होता है। कोशिका विभाजन के समय सिकुड़कर ये छोटे और मोटे हो जाते हैं। इन्हीं धागों को ही क्रोमोसोम कहा जाता है, जिसमें कोशिका विभाजन नहीं होता है उसमें यह क्रोमैटिन पदार्थ के रूप में विद्यमान रहता है।

    ये दो प्रकार के होते हैं –

    1. युक्रोमेटिन (Euchromatin)
    2. हेटोरोक्रोमेटिन (Heteochromatin)

    युक्रोमेटिन (Euchromatin)

    यह आनुवंशिक रूप से सक्रिय होता है यह अभिरंजित करने पर हल्का अभिरंजित होता है इसमें हिस्टोन (Histon) प्रोटीन कम मात्रा में होता है,जिससे ये कम संघनित होता है। यह ट्रांसक्रिप्शन (अनुलेखन) के लिए सक्रिय होता है, इनमें सामान्य रूप से प्रतिकृति (Replication) और जीन विनिमय ( Crossing over) पाया जाता है।

    हेटोरोक्रोमेटिन (Heteochromatin)

    यह आनुवंशिक रूप से निष्किय होता है यह अभिरंजित करने पर गाढ़ा अभिरंजित होता है यह अत्यधिक संघनित (Condense) होता है, जो देर से प्रतिकृति, उच्च घनत्व और कम जीन विनिमय दर्शाता है। इसमें अधिक हिस्टोन और कम अम्लीय प्रोटीन होता है |

    गुणसूत्र (Chromosome) क्या होते है ?

    क्रोमेटिन पदार्थ से बने धागेनुमा संरचना को गुणसूत्र कहते है | 875 में स्ट्रोंगन्सबर्गर ने गुणसूत्र की खोज की तथा 1888 में वाल्डेयर ने क्रोमोसोम नाम दिया | णसूत्रो की संख्या अलग अलग जीवों में अलग अलग होती है जैसे – मनुष्य में 46  | त्येक गुणसूत्र दो अर्द्धगुणसूत्रों से मिलकर बना होता है , दोनों अर्द्धगुणसूत्र एक बिन्दु पर पर आपस में जुड़े होते है जिसे गुणसूत्र बिन्दु या सेन्ट्रोमीगर या काइने टोकोर कहते है | गुणसूत्र पर रेखीय क्रम में जीन पाये जाते है |

    प्रत्येक गुणसूत्र में जेली के समान एक गाढ़ा द्रव होता है, जिसे मैट्रिक्स कहा जाता है। इसी मैट्रिक्स में दो परस्पर लिपटे महीन एवं कुण्डलित सूत्र, जिसे क्रोमैनिमेटा कहा जाता है। प्रत्येक क्रोमैनिमेटा एक अर्द्ध-गुणसूत्र (chromatid) कहलाता है। ये दोनों क्रोमैटिड सेन्ट्रोमीयर नामक स्थान पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं, क्रोमोसोम में आनुवंशिक गुण होते हैं, जो माता-पिता से DNA अणु के रूप में अगली सन्तति में जाते हैं। DNA अणु में कोशिका के निर्माण और संगठन की सभी आवश्यक सूचनाएँ होती हैं। प्राथमिक संकिर्णन के अतिरिक्त अन्य संकीर्णन को द्वितीयक संकीर्णन कहते है , द्वितीयक संकीर्णन के आगे के भाग को सेटेनाइट कहते है |

    ‘जीन’ शब्द को जोहन्सन ने दिया था। आधुनिक शोधों के अनुसार, एक जीन, DNA के एक ऐसा खण्ड है, जो किसी एक विशिष्ट प्रकार की प्रोटीन (एन्जाइम) के संश्लेषण का नियमन करता है। इस भाग को सिस्ट्रॉन कहते हैं।

    इन्हीं जीनों के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में आनुवंशिक लक्षण हस्तान्तरित होते हैं। अतः जीन ही आनुवंशिक गुणों हेतु उत्तरदायी हैं।

    गुणसूत्र (Chromosome) के प्रकार (Type of Chromosome )

    मध्यकेन्द्रकी : जब गुणसूत्र बिन्दु गुणसूत्रों के बीचो बीच होता है जो दोनों भुजाएं समान होती है जिसे मध्यकेन्द्रकी गुणसूत्र कहते है |

    उपमध्यकेन्द्रकी : जब गुणसूत्र बिन्दु गुणसूत्रों में मध्य से हटकर होता है तथा एक भुजा बड़ी व दूसरी भुजा छोटी है , उपमध्य केन्द्रकी गुणसूत्र कहलाता है |

    अग्रबिन्दु : जब गुणसूत्र बिन्दु गुणसूत्र में बिल्कुल किनारे पर स्थित होता है जिससे एक भुजा बहुत छोटी व दूसरी भुजा बहुत बड़ी होती है इसे अग्र बिन्दु गुणसूत्र कहते है |

    अंतकेन्द्री : जब गुणसूत्र बिन्दु गुणसूत्र के शीर्ष पर स्थित होता है तो एक भुजा नाम मात्र की व दूसरी भुजा अव्यन्त: बड़ी होती है जिसे अन्तकेन्द्री कहते है |

    केन्द्रक से जुड़े कुछ महत्वपुर्ण प्रश्न और उनके जवाब

    केन्द्रक किसमे नही पाया जाता है ?

    प्रश्न : किसमे केन्द्रक नही पाया जाता है ?

    प्रश्न : कोनसी कोशिका में केन्द्रक नही पाया जाता है ?

    प्रश्न : कोनसे जीव में केन्द्रक नही पाया जाता है ?

    प्रश्न : किस प्रकार की कोशिका में केन्द्रक नही पाया जाता है ?

    प्रश्न : कोनसे पेड़ या पादप में केन्द्रक नही पाया जाता है ?

    प्रश्न : कोनसे जानवर में केंदक नही पाया जाता है ?

    प्रश्नों के उत्तर

    स्तनधारीयों की लाल रक्त कोशिकाओं RBC (red blood cells) व पादपों की चालनी बलिकाओं (plant cell sieve tubes) को छोड़कर सभी जीवित कोशिकाओं में केन्द्रक पाया जाता है | क्योकि केन्द्रक कोशिका में पाया जाता है | स्तनधारी लाल रक्त कोशिकाओं (एरिथ्रोसाइट्स) में न तो केन्द्रक होता है और न ही माइटोकॉन्ड्रिया।

    प्रोकैरियोटिक कोशिका ऐसी कोशिका होती है जिसमें केंद्रक नहीं होता है तथा इनमें कोशिकांग भी सुविकसित नहीं होता है प्रोकरयोटिक कोशिका में कोशिका भित्ति म्यूरॉन की बनी होती है इनके गुणसूत्र में हिस्टोन प्रोटीन नहीं पाया जाता है उदाहरण – जीवाणु ( Bacteria ) , साइनोबैक्टीरिया अर्कीबैक्टीरिया , विषाणु ( Virus ) , बैक्टीरियोफेज , माइकोप्लाज्मा ( PPLO ) , नील हरित शैवाल ( Blue green algae ) रिकेट्सिया की कोशिकाएं आदि |

    यूकैरियोटिक कोशिका में केंद्रक पाए जाते हैं इनमें कोशिकांग पूर्ण रूप से विकसित होता है यूकैरियोटिक कोशिका के गुणसूत्र में हिस्टोन प्रोटीन पाया जाता है तथा ये क्षारीय प्रकृति के होते हैं।

    उदाहरण – सभी जन्तु कोशिका , प्रोटोजोआ , जीव, पादप कोशिका, जन्तु आदि।

    RBC में केन्द्रक क्यों नहीं पाया जाता?

    प्रश्न – RBC में केन्द्रक क्यों नहीं पाया जाता?

    प्रश्न – लाल रक्त कोशिका में केन्द्रक का न होना कितना फायदेमंद है ?

    उत्तर – लाल रक्त कोशिका (RBC – red blood cells) में केंद्रक का अनुपस्थिति होना लाल रक्त कोशिकाओं को अपना कार्य करने के लिय अनुकूलन बनाता है। यह लाल रक्त कोशिका को अधिक हीमोग्लोबिन रखने की अनुमति देता है और इसलिए, यह अधिक ऑक्सीजन अणु ले जाता है। यह कोशिका को अपने विशिष्ट द्वि-अवतल आकार (distinctive bi-concave shape) की भी अनुमति देता है जो प्रसार में सहायता करता है।

    प्रश्नों के उत्तर

    कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) से जुड़े महत्वपुर्ण प्रश्न

    निम्न महत्वपूर्ण प्रश्नों के जवाब आपको इस आर्टिकल में मिलेगे :

    केन्द्रक क्या है ?

    कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) क्या है ?

    केन्द्रक का कोशिका में क्या कार्य है ?

    केन्द्रक के कितने भाग होते है ?

    केन्द्रक की सरंचना और कार्य क्या है ?

    केन्द्रक छिद्र क्या है ?

    कोशिका के केंद्र में विधमान तरल पदार्थ क्या कहलाता है ?

    केन्द्रक का चित्र

    केन्द्रक झिल्ली या केन्द्रक कला किसे कहते है ?

    केन्द्रक द्रव्य (Nucleoplasm or nuclear sap) क्या है ?

    केन्द्रिका (Nucleolus) क्या है ?

    क्रोमैटिन धागे(Chromatin threads) क्या है ?

    गुणसूत्र क्या होते है और उनके प्रकार क्या है ?

    बिना नाभिकीय झिल्ली वाली कोशिका का कहलाती है ?

    केन्द्रक को कोशिका का निदेशक (Director of cell) क्यों कहा जाता है ?

  • वैज्ञानिकों ने खोजा शरीर का नया अंग

    वैज्ञानिकों ने खोजा शरीर का नया अंग

    वैज्ञानिकों ने हाल ही में शरीर के एक ऐसे हिस्से का खुलासा किया है जिसका वर्णन पहले कभी नहीं किया गया था | मास्सेटर में मांसपेशियों की एक गहरी परत, जो निचले जबड़े को ऊपर उठाती है और चबाने के लिए महत्वपूर्ण होती है। आधुनिक शरीर रचना विज्ञान पाठ्यपुस्तकों में दो परतों, एक गहरी और एक सतही होने के रूप में बड़े पैमाने पर पेशी का वर्णन किया गया है।

    “हालांकि, कुछ ऐतिहासिक ग्रंथों में तीसरी परत के संभावित अस्तित्व का भी उल्लेख है, लेकिन वे इसकी स्थिति के अनुसार बेहद असंगत हैं,” एनाटॉमी का इतिहास पत्रिका के ऑनलाइन संस्करण में 2 दिसंबर को प्रकाशित एक नई रिपोर्ट में लेखकों ने लिखा है। इसलिए टीम ने यह जांचने का फैसला किया कि क्या प्रमुख जबड़े की मांसपेशियों में एक छिपी, सुपर-गहरी परत हो सकती है, जैसा कि ऐतिहासिक ग्रंथों से पता चलता है।

    ऐसा करने के लिए, उन्होंने 12 मानव शवों के सिरों को विच्छेदित किया जिन्हें फॉर्मलाडेहाइड में संरक्षित किया गया था; रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने 16 “ताजा” शवों का सीटी स्कैन भी लिया और एक जीवित विषय से एमआरआई स्कैन की समीक्षा की। इन परीक्षाओं के माध्यम से, उन्होंने द्रव्यमान पेशी की “शारीरिक रूप से विशिष्ट” तीसरी परत की पहचान की।