Author: The Vigyan Team

  • हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) की सरंचना एवं कार्यों का वर्णन | Chloroplast in Hindi (हरित लवक की सम्पूर्ण जानकारी in Hindi)

    हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) की सरंचना एवं कार्यों का वर्णन | Chloroplast in Hindi (हरित लवक की सम्पूर्ण जानकारी in Hindi)

    इस आर्टिकल में हम जानेगें कि हरित लवक या क्लोरोप्लास्ट क्या होते है ? हरित लवक या क्लोरोप्लास्ट की सरंचना कैसी होती है ? हरित लवक या क्लोरोप्लास्ट के प्रमुख कार्य क्या है ? हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) को पादप कोशिका का रसोईघर क्यों कहा जाता है ? आदि

    हरित लवक को समझने के लिए सबसे पहले हम जानेगे कि लवक क्या होते है ?

    लवक पादप कोशिकाओं के कोशिका द्रव में पाए जाने वाले गोल या अंडाकार रचना हैं । इनमें पादपों के लिए महत्त्वपूर्ण रसायनों का निर्माण होता है। लवक तीन प्रकार के अर्थात् हरितलवक (Chloroplast) , अवर्णी लवक ((Leucoplast) तथा वर्णी लवक (Chromoplasts) होते हैं।

    हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट – Chloroplast) क्या होते है ?

    जिस लवक में पर्णहरित ( क्लोरोफिल ) वर्णक होता है, उसे हरित लवक ( क्लोरोप्लास्ट ) कहते है। इनके कारण पत्तियों का रंग हरा होता है जिससे पेड़ पौधे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा भोजन बनाते है।

    हरितलवक दोहरी झिल्ली से परिबद्ध कोशिकांग है। हरितलवक ऐसा कोशिकांग है जो सौर ऊर्जा यानी प्रकाशीय ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलता है। हरित लवक केवल सुकेन्द्रिक पादप कोशिकाओं में और शैवालीय कोशिकाओं में पाए जाते है। माना जाता है कि नील हरित शैवाल नाम के जीवाणुओं से हरितलवकों का विकास हुआ।

    1883 में, एंड्रियास फ्रांज विल्हेम शिम्पर (Andreas Franz Wilhelm Schimper ) ने हरितलवक को “क्लोरोप्लास्टिड्स” (क्लोरोप्लास्टिडन) (chloroplastids” (Chloroplastiden) का नाम दिया | 1884 में, एडुआर्ड स्ट्रासबर्गर (Eduard Strasburger ) ने इसे “क्लोरोप्लास्ट” (क्लोरोप्लास्टन) नाम दिया ।

    हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) की सरंचना

    हरितलवक की आन्तरिक संरचना जटिल होती है। हरितलवक दोहरे झिल्ली से घिरे होते हैं, जो लाइपोप्रोटीन की बनी होती है। प्रत्येक झिल्ली की मोटाई 50A° होती है। इनकी चौड़ाई 10A° से 30A° तक हो सकती है। इसके अन्दर की ओर एक तरल पारदर्शी दानेदार पदार्थ होता है, जिसे स्ट्रोमा कहा जाता है। इस स्ट्रोमा में अनेक एन्जाइम, राइबोसोम आदि पदार्थ पाए जाते हैं।

    माइटोकॉण्ड्रिया की तरह लवक में अपना DNA और राइबोसोम होते हैं।

    शैवालों में यह सर्पिलाकार, फीतासदृश, प्यालेनुमा, ताराकार, मेखला या पट्टिकावत या बिम्ब सदृश होते हैं। उच्च विकसित पौधों में ये गोलाकार, अण्डाकार लम्बे या बिम्बाकार होते हैं। ये 2μ से 8μ तक या कभी-कभी 100μ तक लम्बे तथा 3μ से 6μ तक व्यास वाले (मोटे) होते हैं।

    वस्तुतः इसमें बाहरी झिल्ली सपाट परन्तु भीतरी झिल्ली गोल पटलिका होती है, जिसे थायलेकॉइड कहते हैं। अनेक स्थानों पर यह थायलेकॉइड एक के ऊपर लगी होती है, जो ग्रेनम कहलाती है। ग्रेनाओं को जोड़ने वाली पटलिकाएँ स्ट्रोमा पटलिकाएँ कहलाती हैं।

    प्रत्येक थाइलेकयिड दो इकाई कलाओं की बनी होती है। इसके दोनों बाहरी स्तर प्रोटीन के अणुओं के बने होते हैं। इनके मध्य में पर्णहरित (chlorophyll) तथा फॉस्फोलिपिड के स्तर होते हैं। पर्णहरित के प्रत्येक अणु में एक शीर्ष तथा एक पूँछ होती है।

    थाइलेकॉयड की कला पर छोटे-छोटे दाने उपस्थित होते हैं, जिन्हें क्वान्टासोम (quantasome) कहते हैं। ये प्रकाश अभिक्रिया की सबसे छोटी और आधारभूत इकाई हैं। प्रत्येक क्वान्टासोम में लगभग 200 अणु पर्णहरिम होते हैं।

    हरितलवक में प्रकाश-संश्लेषण की प्रकाशिक अभिक्रिया ग्रेना में, जबकि प्रकाशहीन अभिक्रिया स्ट्रोमा में होती है।

    हरितलवकों में पर्णहरिम के साथ-साथ सामान्यतया पर्णपीतक (कैरोटिन -carotene) व पर्णपीत (जैन्थोफिल-xanthophyll) वर्णक भी पाये जाते हैं। हरितलवक में प्रकाश-संश्लेषण सम्बन्धी एन्जाइम, सहएन्जाइएम विटामिन E व K तथा सूक्ष्म मात्रा में Mg, Fe, Cu, Mn व Zn भी यौगिकों के रूप में मिलते हैं।

    हरितलवक का रासायनिक विश्लेषण

    हरितलवक के रासायनिक विश्लेषण में पाया गया है कि इसके शुष्क भार में 30-35% प्रोटीन होता है, जिसमें 80% अघुलनशील प्रोटीन होता है। लिपिड्स में वसा 50% स्टीरॉल 20%, मोम 16% तथा फॉस्फेट 2.7% तक होते हैं। दो प्रकार के पर्णहरिम-a (पीला) 75% एवं पर्णहरिम-b (हरा-कला) 25% होता है। जैन्थोफिल 75% व कैरीटीन 25% होता है। हरितलवक में RNA 3-4% तक तथा DNA 0.02-0.1% तक होता है।

    हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) की विशेषताएं

    हरित लवक केवल पादप कोशिकाओं में और शैवालीय कोशिकाओं में पाए जाते है।

    हरित लवक जन्तुओं में अनुपस्थित होते हैं।

    पत्तियों में इनकी मात्रा सबसे अधिक होती है विभिन्न जाति के पौधों में इनका आकार अलगअलग होता है।

    हरे रंग के पदार्थ हरितलवक के कारण इसका रंग हरा होता है।

    हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) को पादप कोशिका की रसोईघर क्यों कहा जाता है ?

    हरितलवक कोशिका का वह कोशिकांग है जहां प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा कार्बोहाइड्रेट का संश्लेषण होता है और भोजन बनाता है। इसलिए हरितलवक को पादप कोशिका की रसोई कहते हैं।

    हरित लवक के प्रमुख कार्य

    हरित लवक प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा कार्बोहाइड्रेटस का निर्माण करते हैं। इनमें ग्लूकोज से मण्ड, प्रोटीन, वसाएँ, विटामिन हार्मोन्स आदि का निर्माण भी होता है।

    जल का आयनीकरण एवं CO2 अपचयन के लिए NADPH + H+ की उपलब्धि कराना हरितलवक का ही कार्य है।

    जल के आयनीकरण से प्राप्त ऑक्सीजन को प्रत्येक जीवधारी के लिए श्वसन हेतु उपलब्ध कराना भी हरित लवक का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है।

    प्रकाश संश्लेषण की प्रकाश अभिक्रिया फॉस्फोरिलेशन व हिल अभिक्रिया क्वान्टासोमों में होती है। हाइड्रोजन का स्थानान्तरण स्ट्रोमा में होता है।

    हरित लवक प्रकाश ऊर्जा को फोटॉन (photon) के रूप में अवशोषित करता है और एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट (Adenosine triphosphate – ATP (एटीपी) बनते हैं। एटीपी को क्लोरोप्लास्ट के थायलाकोइड झिल्ली में संश्लेषित किया जाता है।

  • लवक – हरित लवक, वर्णीलवक, अवर्णीलवक की संरचना और कार्य  | Plastid in Hindi (लवक की सम्पूर्ण जानकारी in Hindi)

    लवक – हरित लवक, वर्णीलवक, अवर्णीलवक की संरचना और कार्य | Plastid in Hindi (लवक की सम्पूर्ण जानकारी in Hindi)

    लवक (Plastid) क्या होता है ? What is Plastid ?

    लवक केवल पादप कोशिकाओं में स्थित होते हैं। लवक पादप कोशिकाओं के कोशिका द्रव में पाए जाने वाले गोल या अंडाकार रचना हैं । इनमें पादपों के लिए महत्त्वपूर्ण रसायनों का निर्माण होता है। लवक तीन प्रकार के अर्थात् हरितलवक (Chloroplast) , अवर्णी लवक ((Leucoplast) तथा वर्णी लवक (Chromoplasts) होते हैं।

    हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) नामक हरे रंग के लवक में जीव जगत की सबसे महत्त्वपूर्ण जैव रासायनिक क्रिया प्रकाश-संश्लेषण होती है। हरे रंग को छोड़कर अन्य रंगों वाले लवकों को वर्णी लवक (क्रोमोप्लास्ट) कहते हैं, इनसे ही फूलों एवं फलों को रंग प्राप्त होता है। रंगहीन लवकों को अवर्णी लवक (लिउकोप्लास्ट) कहते हैं जिनका मुख्य कार्य भोजन संग्रह में मदद करना है। आकृति यह अंडाकार गोलाकार तन्तुनुमा होता है जो पूरे कोशिका द्रव्य मे फैले रहता है जो दो पर्टो से घिरा रहता है। इसके भीतर पाए जाने वाले खाली स्थान को stroma कहते है जो एक तरल पदार्थ से भरा रहता है जिसे matrix कहाँ जाता है।

    लवक कितने प्रकार के होते है ?

    लवक तीन प्रकार के होते है :

    1. हरितलवक (Chloroplast)
    2. अवर्णी लवक (Leucoplast)
    3. वर्णी लवक (Chromoplasts)

    हरितलवक (Chloroplast)

    हरे रंग के पदार्थ हरितलवक के कारण इसका रंग हरा होता है। यह हरितलवक दोहरे झिल्ली से घिरे होते हैं, जो लाइपोप्रोटीन की बनी होती है। इसके अन्दर की ओर एक तरल पारदर्शी पदार्थ होता है, जिसे स्ट्रोमा कहा जाता है। इस स्ट्रोमा में अनेक एन्जाइम, राइबोसोम आदि पदार्थ पाए जाते हैं। माइटोकॉण्ड्रिया की तरह लवक में अपना DNA और राइबोसोम होते हैं।

    वस्तुतः इसमें बाहरी झिल्ली सपाट परन्तु भीतरी झिल्ली गोल पटलिका होती है, जिसे थायलेकॉइड कहते हैं। अनेक स्थानों पर यह थायलेकॉइड एक के ऊपर लगी होती है, जो ग्रेनम कहलाती है। ग्रेनाओं को जोड़ने वाली पटलिकाएँ स्ट्रोमा पटलिकाएँ कहलाती हैं।

    थायलेकॉइड की भीतरी सतह पर क्वान्टासोम पाए जाते हैं, जिसमें हरितलवक अणु होते हैं ये प्रकाश-संश्लेषण की आधारभूत इकाई है। इसे पादप कोशिका का रसोईघर कहा जाता है। हरितलवक में प्रकाश-संश्लेषण की प्रकाशिक अभिक्रिया ग्रेना में, जबकि प्रकाशहीन अभिक्रिया स्ट्रोमा में होती है।

    क्लोरोप्लास्ट वाली पादप कोशिकाएँ

    हरितलवक को आकृति के आधार पर वर्गीकरण निम्न है :

    • क्लोमाइडोमोनास –   कपनुमा
    • स्पाइरोगाइरा (तालाब की रेशम ) – फीताकार
    • ऊडोगोनियम –  जालिकावृत
    • यूलोथ्रिक्स (तालाब की ऊन ) – मेखलाकार
    • उच्च पादप – अण्डकार या तश्तरीनुमा
    • जिग्नीमा – तारकार स्टार्च कार

    अवर्णी लवक (Leucoplast)

    यह एक रंगहीन लवक, जो जड़ों और भूमिगत तनों में पाए जाते हैं। ये स्टार्च के रूप में भोजन का संग्रह करते हैं, ये मुख्यतया तीन ये प्रकार के होते हैं :

    अवर्णी लवक (ल्यूकोप्लास्ट) को तीन भागों में बांट गया है।

    a. एमाइलोप्लास्ट
    b. एलयुरोप्लास्ट
    c. इलियोप्लास्ट

    एमाइलोप्लास्ट, जो जड़ों भूमिगत तनों तथा चावल, गेहूँ तथा मक्का के बीज में पाए जाते हैं तथा स्टार्च का संग्रहण करते हैं। इलायोप्लास्ट बीज में वसा का संग्रहण करते हैं। प्रोटीनोप्लास्ट, इनमें प्रोटीन संग्रहण होता है, जो बीजों में पाए जाते हैं।

    अवर्णी लवक ( एमाइलोप्लास्ट )

    वर्णी लवक (Chromoplasts)

    ये पौधों के रंगीन भागों, पुष्पों की पंखुड़ियों तथा फलों की भित्तियों में पाए जाते हैं। ये पीले, लाल तथा नारंगी रंग के लवक हैं।

    उदाहरण टमाटर में लाइकोपेन, गाजर में कैरोटीन, चुकन्दर में विटानीन आदि वर्णक के कारण इसका रंग निर्धारित होता है।

    वर्णीलवक के उदाहरण निम्न है :

    • टमाटर का लाल रंग लाइकोपीन (Lycopene) लवक के कारण
    • गाजर में कैरोटीन (Carotine)  के कारण
    • चुकन्दर में बिटानीन (Betanin)  के कारण
    • मिर्च का लाल रंग कैप्सेथीन  के कारण
  • माइक्रोबॉडीज (Microbodies) क्या है ? माइक्रोबॉडीज की सरंचना,  प्रकार एवं कार्य (in Hindi)

    माइक्रोबॉडीज (Microbodies) क्या है ? माइक्रोबॉडीज की सरंचना, प्रकार एवं कार्य (in Hindi)

    इस आर्टिकल में हम बात करेगें माइक्रोबॉडीज के बारे में | माइक्रोबॉडीज क्या होते है ? माइक्रोबॉडीज का हमारे शरीर में क्या कार्य होता है ? माइक्रोबॉडीज के प्रकार और सरंचना क्या होती है आदि |

    माइक्रोबॉडीज (Microbodies) क्या है ?

    ये इकाई झिल्ली युक्त छोटे कोशिकांग हैं, जो ऑक्सीकरण क्रियाओं (श्वसन के अतिरक्त अन्य) में भाग लेते हैं। इनमें क्रिस्टलीय कोर तथा कणीय मैट्रिक्स होता है। यह परॉक्सीसोम तथा ग्लाइऑक्सीसोम प्रकार का होता है। ग्लाइऑक्सीसोम्स, ग्लाइऑक्सीलेट चक्र द्वारा वसा के ऑक्सीकरण में भाग लेता है, जबकि परॉक्सीसोम प्रकाश श्वसन में भाग लेता है इसमें उपस्थित कैटेलेज एन्जाइम हाइड्रोजन परॉक्साइड के विघटन का कार्य करता है। ये पौधों, प्रोटोजोआ, और जानवरों की कोशिकाओं में पाया जाता है।

    माइक्रोबॉडीज एक परत वाली झिल्ली से घिरी थैलियां होती है । यह कोशिका के कोशिका द्रव्य (cytoplasm) में पाए जाते हैं, और केवल इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप के उपयोग से ही दिखाई देते हैं। इनका निर्माण एंडोप्लास्मिक जालिका वGalgi bodies से थैलियों(Vesicles) के टूटने से होता है। यह छोटे अंगक (Small Organelles) लगभग 0.2-1.5 माइक्रोमीटर व्यास के होते हैं । ये एक एकल फॉस्फोलिपिड बाइलेयर झिल्ली से घिरे होते है  और उनमें एंजाइम और अन्य प्रोटीन सहित इंट्रासेल्युलर सामग्री का एक मैट्रिक्स होता है, लेकिन उनमें कोई आनुवंशिक सामग्री नहीं होती है जो उन्हें स्वयं-प्रतिकृति की अनुमति देती है। 

    माइक्रोबॉडीज कितने प्रकार के होते है ? (Type of Microbodies)

    माइक्रोबॉडीज के दो प्रकार होते हैं –

    1. परऑक्सीसोम (Peroxisome)
    2. ग्लाइऑक्सीसोम (Glyoxysomes)

    परऑक्सीसोम (Peroxisome)

    ये (0.3-1.5μm) व्यास के लगभग सूक्ष्म गोलाकार कोशिकांग है जो एक परत वाली झिल्ली (Single Layered Membrane) से घिरे होते हैं । इनकी खोज Tolbert ने 1969 में की थी। 

    परऑक्सीसोम का निर्माण golgi bodies से न होकर पूर्व स्थित pre existing Peroxisome से होता है। 

    यह उन पौधों में पाये जाते हैं जिनमे प्रकाश श्वसन की क्रिया होती है । प्रकाश श्वसन की क्रिया कुछ ही पौधों मे होती है क्योंकि कुछ पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में  कार्बन डाई आक्साइड  निकालते है।

    जंतु कोशिका में यह Liver  एवं किडनी में तथा प्रोटोजोआ में पाए जाते हैं । इसमें भी लाइसोसोम के समान एंजाइम्स पाए जाते हैं जिसमें ऑक्सीडेस तथा कैटालेस मुख्य है । 

    उपापचय क्रियाओं में ऑक्सीडेस एंजाइम आणविक ऑक्सीजन लेकर हाइड्रोजन पराक्साइड का निर्माण करते हैं। 

    कैटालेस एंजाइम उपापचय (Metabolism) के फलस्वरुप कोशिका में उत्पन्न होने वाले विषैले पदार्थ हाइड्रोजन पराक्साइड का विघटन कर देते हैं।

    कैटालेस enzyme कोशिका द्रव्य में आने वाले अन्य विषैले पदार्थों को जैसे अल्कोहलिक पेय पदार्थों और अनेक ड्रग्स का भी विघटन कर देते हैं। इसके साथ ही जंतु कोशिकाओं में वसा उपापचय का भी कार्य Peroxisomes ही करते हैं। 

    इनमें सूक्ष्म कणिकाओं वाली मैट्रिक्स (Metrix of Fine Granules) होती है जिनके केंद्र में एक समांग (Homogeneous) तथा अपारदर्शी कोर होती है। इनमें ग्लाइकोलिक अम्ल ऑक्सीडेस, Peroxidase,कैटालेस आदि अधिक मात्रा में पाए जाते हैं।

    प्रकाश श्वसन की क्रिया हरित लवक Peroxisome तथा माइटोकॉन्ड्रिया तीनों में मिलकर होती है। यह अनुक्रम प्रकाश पर निर्भर करता है और इसमें ऑक्सीजन ली जाती है। यह क्रिया प्रकाश की तीव्रता, कार्बन डाइऑक्साइड की कम सांद्रता तथा ऑक्सीजन की अधिक संस्था द्वारा Stimulate होती है। ऐसी स्थिति में हरित लवक में उत्पन्न ग्लाइकोलिक अम्ल के आधिक्य (Excess) में अणु बाहर निकलकर Peroxisome में प्रवेश करते हैं जहां उनका ऑक्सीकरण होता है।

    ग्लाइऑक्सीसोम (Glyoxysomes)

    ग्लाइऑक्सीसोम की खोज Beevers ने 1961 में की थी। यह भी एक सूक्ष्म गोलाकार कोशिकांग हैं जो एक परत वाली झिल्ली के बने होते हैं। यह प्रायः वसीय बीजों, जैसे मूंगफली तथा अरंङ की कोशिकाओं में जहां पर वसा का कार्बोहाइड्रेट में परिवर्तन होता है, पाए जाते हैं। इनमें आइसोसिट्रिक लायेस, मेलेट सिंथेटेस आदि एंजाइम्स पाए जाते हैं। वसा का कार्बोहाइड्रेट में परिवर्तन ग्लाइऑक्सीसोम में पाए जाने वाले ग्लाइऑक्सिलेट चक्र द्वारा होता है।

    माइक्रोबॉडीज के कार्य (Function of Microbodies)

    विभिन्न प्रकार के माइक्रोबॉडीज विभिन्न विशिष्ट कार्य करते हैं:

    • कोशिका में माइक्रोबॉडीज विभिन्न जैव रासायनिक प्रतिक्रियाओं में भाग लेते हैं
    • माइक्रोबॉडीज में मौजूद एंजाइम विभिन्न आवश्यक प्रतिक्रियाओं की सुविधा प्रदान करते हैं, उदा। वसा, अमीनो एसिड,अल्कोहोल (alcohol ), आदि का टूटना।
    • वे पौधों में प्रकाश-श्वसन में शामिल होते हैं
    • पेरोक्साइड का डेटोफिक्सेशन (Detoxification) माइक्रोबॉडीज में होता है
  • सेन्ट्रोसोम तारककाय (Centrosome) क्या है | तारककाय की खोज, कार्य और रासायनिक संगठन Centrioles ( सेन्ट्रियोल्स) in Hindi

    सेन्ट्रोसोम तारककाय (Centrosome) क्या है | तारककाय की खोज, कार्य और रासायनिक संगठन Centrioles ( सेन्ट्रियोल्स) in Hindi

    इस आर्टिकल में हम जानेगें की तारककाय यानी सेन्ट्रोसोम (Centrosome) जिसे तारककेंद्र भी कहते है क्या होता है ? तारककाय ( सेन्ट्रोसोम) की सरंचना क्या है ? तारककाय ( सेन्ट्रोसोम) का सायनिक संगठन क्या है ? तारककाय ( सेन्ट्रोसोम) के प्रमुख कार्य क्या है ? आदि

    सेन्ट्रोसोम तारककाय (Centrosome) क्या है ?

    यह मुख्य रूप से जंतु कोशिका में केंद्र के निकट तारे समान आकृति में पाई जाती है । इसके अलावा कुछ शैवालों तथा कवकों में दो जोड़े सेन्ट्रियोल्स (Centrioles) की बनी एक रचना होती है इसलिए इसे डिप्लोसोम (Diplosome) भी कहा जाता है। यह खोखली सूक्ष्मबेलनाकार रचनाएं होती है।तो एक युग्म के रूप में उपस्थित रहतीं हैं।

    प्रत्येक सेन्ट्रियोल्स सूक्ष्मनलिकाओं से निर्मित तीन तन्तुओं के नौ समूहों का बना होता है दो जोड़े सेन्ट्रियोल्स (तारककेन्द्रों) सेन्ट्रोस्फीयर (Centrosphere) से घिरे होते हैं। इस सम्पूर्ण रचना को सेन्ट्रोसोम कहा जाता है। कोशिका विभाजन के समय सेन्ट्रोसोम दो जोड़े सेन्ट्रियोल्स में विभाजित हो जाता है, जो दो विपरीत ध्रुवों पर चले जाते हैं।

    तारककाय सेन्ट्रोसोम की खोज

    सेंट्रोसोम की खोज संयुक्त रूप से वाल्थर फ्लेमिंग ने 1875 में [12] [13] और एडौर्ड वैन बेनेडेन ने 1876 में की थी और बाद में बाद में थियोडोर बोवेरी (T. Boweri) द्वारा इसका वर्णन और नामकरण तारककाय (सेन्ट्रोसोम) 1888 में किया गया।

    तारककाय (सेन्ट्रोसोम) की संरचना (Structure)

    प्रत्येह सेन्ट्रोसोम दो जोड़े तारककेन्द्रों (Centrioles) का बना होता है प्रत्येक जोड़े के दो सेन्ट्रिओल डिप्लोसोम(Diplosome) कहलाते है तथा एक-दूसरे से 90° का कोण बनाते हुए स्थित होते है।

    प्रत्येक तारककेन्द्रों (centrioles) त्रिक तन्तुओं (Triplet Fibres) के नौ समूहों (Nine Sets) का बना होता है।

    यह त्रिक तन्तु एक मध्य नाभि(Hub) के चारों ओर स्थित होते है। प्रत्येक त्रिक तन्तु  में तीन सूक्ष्म नलिकाएँ (Microtubules) एक रेखा में स्थित होती है। इस प्रकार के नौ त्रिक तन्तु रवाहीन(Amorphous), इलेक्ट्रॉनडेन्स पदार्थ में धँसे रहते है। यह इलेक्ट्रॉनडेन्स पदार्थ a नलिकाओं से केंद्रों की ओर जाकर केंद्र में नाभि(Hub) से जुड़ जाता है। प्रत्येक तारक काय कोकली विधि से बनी होती है यह एक या दोनों सिरों से खुली रहती है इसको देखने पर एक गाड़ी के पहिए के जैसी रचना प्रतीत होती है 

    तारक काय के सभी 9 त्रिक समूह एक समान होते हैं।

    सेन्ट्रोस्फीयर (Centriosphere) और डिप्लोसोम (Diplosome)

    कोशिका द्रव्य का क्षेत्र जो डिप्लोसोम को घेरे रहता है उसे सेन्ट्रोस्फीयर (Centrosphere)  कहते हैं। सेन्ट्रोस्फीयर व तारककाय से बनता है सेन्ट्रोसोम कहलाता है।  तारककाय या सेन्ट्रोडल्स का युग्म डिप्लोसोम कहलाता है

    Centrioles में RNA (सम्भवतः DNA) भी उपथित होते है लेकिन इनके कार्य अभी ज्ञात नहीं है।

    तारककाय सेन्ट्रोसोम का रासायनिक संगठन

    तारक काय सूक्ष्म नलिकाओं से रचित होती है। यह सूक्ष्मनलिकाएं ट्यूब्यूलिन (Tubulin ) नामक संरचनात्मक प्रोटीन से बनी होती है।

    तारककाय (सेन्ट्रोसोम) के प्रमुख कार्य  (Main Function of Centrosome)

    • तारक केंद्र कोशिकाओं में सूक्ष्म नलिकाओं के संगठन में सहायक होते हैं
    • शुक्राणु की  पूूंछ के का निर्माण करता है।
    • जंतु कोशिका में कोशिका विभाजन के समय तर्कु तंतुओं का निर्माण करती है।
    • सूक्ष्म जीवो में पाए जाने वाले अंगों जैसे कशाभिका ( Flagella ) व पक्ष्माभ (Cilia ) का निर्माण होता है
    • तारककाय  सूत्री विभाजन(Mitosis) के समय दो जोड़े Centrioles में विभाजित हो जाता है जिसमें से एक जोड़ा Centrioles एक ध्रुव (Pole) पर उसी स्थान पर रह जाता है तथा दूसरा जोड़ा Centrioles घूमकर दूसरे ध्रुव की ओर चला जाता है। इस प्रकार तारककाय (Centrosome) कोशिका विभाजन में भाग लेता है।
  • कार्बन क्रेडिट क्या होता है?

    कार्बन क्रेडिट क्या होता है?

    कार्बन क्रेडिट की संकल्पना क्योटो प्रोटोकॉल से उद्भूत हुई, संयुक्त राष्ट्र की पहल पर ग्लोबल वार्मिंग की चुनौती से निबटने हेतु 1992 में यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेन्शन ऑन क्लाइमेट चेंज अस्तित्व में आया !

    इसने जलवायु परिवर्तन के खतरों से निबटने हेतु एक अंतरराष्ट्रीय समझौते का मसौदा तैयार करने के लिए बातचीत शुरू की फतेह जापान के क्योटो शहर में 11 दिसंबर 1997 को हुए UNFCC के तीसरे सम्मेलन में क्योटो प्रोटोकॉल को स्वीकार किया गया

    क्या है कार्बन क्रेडिट

    कार्बन क्रेडिट एक तरह का सर्टिफिकेट है जो कार्बन उत्सर्जन करने का सर्टिफिकेट देता है. ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन घटाने के लिए इसे तैयार किया गया है. आप जितना कार्बन उत्सर्जन करेंगे, उतना ही ज्यादा आपको ऐसे प्रोजेक्ट में खर्च करने होंगे जो उत्सर्जन को घटाएं.

    समाधान

    इसका समाधान क्या है? क्या सभी उद्योग बंद कर देने चाहिए? ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि दुनिया को चलाना जरूरी है और यह उद्योगों के बिना मुमकिन नहीं है. इसका एक हल यह हो सकता है कि अक्षय ऊर्जा के स्रोतों से उद्योगों को चलाया जाए. इसमें सोलर या विंड एनर्जी का सहारा लिया जा सकता है जिससे कि कोई कार्बन उत्सर्जन नहीं होता है. हालांकि पूरी दुनिया को अक्षय ऊर्जा स्रोत से अभी चलाना मुश्किल है क्योंकि इसमें कई वर्षों का वक्त लगेगा. ऐसे में अभी क्या किया जा सकता है?

    कार्बन क्रेडिट पर विवाद

    1997 में क्योटो प्रोटोकॉल में दुनिया भर के सभी देशों ने कार्बन उत्सर्जन घटाने पर सहमति जताई थी. उसी के हिसाब से कार्बन क्रेडिट की रूपरेखा तैयार की गई थी. इसके तहत एक सीमा तय की गई कि कंपनियां एक साल में कितना कार्बन उत्सर्जन कर सकती हैं. यूरोपीय संघ के देशों ने अपने कार्बन उत्सर्जन में बड़े स्तर पर कटौती करने का फैसला किया. इसके लिए कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य तय किया गया.

    इसी हिसाब से उद्योगों को कार्बन के लक्ष्य दिए गए. इसमें एक दिक्कत ये आई कि दुनिया के कुछ हिस्से में देशों ने कार्बन उत्सर्जन में कटौती की जबकि कुछ देशों में उत्सर्जन जारी है. इससे उत्सर्जन में कटौती करने वाले देशों की लागत में बढ़ोतरी आई है. इसे देखते हुए कार्बन क्रेडिट पर कई लोग सवाल भी उठाते हैं. एक बात जरूर है कि कार्बन क्रेडिट के नाम पर कई परियोजनाओं में निवेश किया गया जिससे हमारे पर्यावरण को स्वस्छ बनाने में मदद मिली है.

  • Night Vision (रात्रि दृष्टि) उपकरणों में कौन सी किरणों का प्रयोग किया जाता है ?

    Night Vision (रात्रि दृष्टि) उपकरणों में कौन सी किरणों का प्रयोग किया जाता है ?

    नाइट विजन उपकरणों में अवरक्त तरंगों का प्रयोग किया जाता है अवरक्त तरंगों की खोज विलियम हरशैल ने की थी

    अवरक्त किरणें, अधोरक्त किरणें या इन्फ़्रारेड वह विद्युत चुम्बकीय विकिरण है जिसका तरंग दैर्घ्य (वेवलेन्थ) प्रत्यक्ष प्रकाश से बड़ा हो एवं सूक्ष्म तरंग से कम हो।

    इसका नाम ‘अधोरक्त’ इसलिए है क्योंकि विद्युत चुम्बकीय तरंग के वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) में यह मानव द्वारा दर्शन योग्य लाल वर्ण से नीचे (या अध:) होती है।

    इसका तरंग दैर्घ्य 750 nm and 1 mm के बीच होता है। सामान्य शारिरिक तापमान पर मानव शरीर 10 माइक्रॉन की अधोरक्त तरंग प्रकाशित कर सकती है !

    यह तरंगे पदार्थों को उच्च ताप पर गर्म करने पर निकलती हैं इनका उपयोग अस्पतालों में रोगियों की सिकाई करने में एवं कोहरे में फोटोग्राफी करने में भी किया जाता है !

  • नीले हरे शैवालों की कुछ जातियों की कौन सी विशेषता उन्हें जैविक खाद के रूप में वर्धित करने में सहायक है ?

    नीले हरे शैवालों की कुछ जातियों की कौन सी विशेषता उन्हें जैविक खाद के रूप में वर्धित करने में सहायक है ?

    नीले हरे शैवालों में ऐसी क्रियाविधि होती है जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को ऐसे नए रूप में परिवर्तित कर देती है जिसे फसल के पौधे आसानी से ग्रहण कर सकते हैं !

    शैवालों के अध्ययन को फ़ाइकोलोजी कहते हैं, शैवाल प्राय पर्णहरित युक्त, संवहन ऊतक रहित, आत्मपोषी होते हैं !

    इनका प्रयोग निम्न रूपों में किया जाता है –

    • भोजन के रूप में – फोरफाइरा, अल्वा, सरगासन, लेमिनेरिया, नास्टोक
    • आयोडिन बनाने में – लेमिनेरिया, फ्यूकस, एकलोनिया आदि
    • खाद के रूप में – नोस्टोक, एनाबीना, केल्प आदि
    • औषधियों के रूप में – क्लोरेला से क्लोरेलिन नामक प्रतिजैविक एवं लेमिनेरिया से टिंचर आयोडिन वनाई जाती है !
    • अनुसंधान कार्यों में – क्लोरेला असीटेबुलेरिया, एलोनिया आदि, ये खेत में सड़कर वायु मंडलीय नाइट्रोजन को नाइट्रेट में बदल देते हैं जिससे जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है !
  • अम्लीय वर्षा के किसे कहते हैं ? कारण | प्रभाव | दुष्परिणाम

    अम्लीय वर्षा के किसे कहते हैं ? कारण | प्रभाव | दुष्परिणाम

    नाइट्रोजन के ऑक्साइड और सल्फर के ऑक्साइड वायुमंडल में जलवाष्प से अभिक्रिया कर क्रमशः नाइट्रिक अम्ल और सल्फ्यूरिक अम्ल बनाते हैं जो वर्षा के जल के साथ धरती पर गिरने लगते हैं जिससे अम्लीय वर्षा कहा जाता है !

    अम्लवर्षा में अम्ल दो प्रकार के वायु प्रदूषणों से आते हैं : SO2 और NO2, ये प्रदूषक प्रारंभिक रूप से कारखानों की चिमनियों, बसों व स्वचालित वाहनों के जलाने से उत्सर्जित होकर वायुमंडल में मिल जाते है।

    प्रभाव

    • अम्ल पदार्थो तथा संरचनाओं को दुर्बल बना देते है,जिससे मार्बल लाइमस्टोन सैंडस्टोन आदि से निर्मित बिल्डिंग का डैमेज होने लगता है।
    • अम्लीय बर्षा के कारण मृदा की अम्लीयता बढ़ जाती है जिसका मानव तथा जलीय जीवन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा कृषि उत्पादकता भी कम हो जाती है।
    • अम्लीयता सॉइल माइक्रोबियल फौना तथा नाइट्रोजन फिक्सेशन को भी प्रभावित करती है मृदा रसायन में परिवर्तन होने से उत्पादकता काम हो जाती है।
    • अम्लीय वर्ष के कारण स्टाइल जिंक ऑईल बेस्ट पेंट्स तथा ऑटोमोबाइल कोटिंग्स आदि संछारण होने लगता है।

    दुष्परिणाम

    • अम्लवर्षा के कारण जलीय प्राणियों की मृत्यृ खेंतो और पेड़-पौधों की वृद्धि में गिरावट, तांबा और सीसा जैसे घातक तत्वों का पानी में मिल जाना, ये सभी दुष्परिणाम देखे जा सकते है। 
    • जर्मनी व पश्चिम यूरोप में जंगलो के नष्ट होने का कारण भी अम्लवर्षा ही है। मनुष्यों पर भी इसका परिणाम गंभीर होता है।
    • अम्लीय वर्षा के कारण आगरा का ताजमहल पीला पड़ रहा है
  • गाल्जिकाय (Golgi body) क्या है ? गाल्जिकाय के कार्य और सरंचना क्या है ? in Hindi

    गाल्जिकाय (Golgi body) क्या है ? गाल्जिकाय के कार्य और सरंचना क्या है ? in Hindi

    गॉल्जीकाय (Golgi body) झिल्ली युक्त पुटिका है, जो एक-दूसरे के ऊपर समानान्तर रूप से रहती है।

    इन झिल्लियों का सम्पर्क अन्तःप्रद्रव्यो जालिका को झिल्लियो से होता है और इसलिए जटिल कोशिकीय झिल्ली तन्त्र के दूसरे भाग को बनाती हैं।

    अन्तःप्रद्रव्यो जालिका में संश्लेषित पदार्थ गॉल्जीकाय में पैक किए जाते हैं और इस रूप में उसे कोशिका के बाहर तथा अन्दर विभिन्न क्षेत्रों में भेज दिया जाता है।

    गॉल्जीकाय को लाइपोकॉण्ड्यिा या डिक्टियोसोम भी कहा जाता है।

    गॉल्जीकाय को कोशिका को ट्रैफिक पुलिस‘ भी कहा जाता है। ये कोशिका पट्ट, कोशिका भित्ति, शुक्राणु के एक्रोसोम, लयनकाय तथा हॉरमोन के संश्लेषण का कार्य करती है।

  • माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) क्या है ? माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना, संख्या और कार्य क्या है ? सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में

    माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) क्या है ? माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना, संख्या और कार्य क्या है ? सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) क्या है ? माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना क्या है, माइटोकॉन्ड्रिया के प्रकार या संख्या कितनी है और माइटोकॉण्ड्रिया का कार्य क्या है ? इसी के साथ हम जानेगे की माइटोकॉण्ड्रिया को कोशिका का शक्ति गृह क्यों कहा जाता है ?

    माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) क्या है ?

    माइटोकॉण्ड्रिया की खोज 1890 ई. में अल्टमेन (Altman) नामक वैज्ञानिक ने की थी। अल्टमेन ने इसे बायोब्लास्ट तथा बेण्डा ने माइटोकॉण्डिया कहा। जीवाणु एवं नील हरित शैवाल को छोड़कर शेष सभी सजीव पादप एवं जंतु कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य में अनियमित रूप से बिखरे हुए दोहरी झिल्ली आबंध कोशिकांगों (organelle) को सूत्रकणिका या माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) कहा जाता हैं। कोशिका के अंदर सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखने में ये गोल, लम्बे या अण्डाकार दिखते हैं।

    माइटोकॉण्ड्रिया सभी प्राणियों में और उनकी हर प्रकार की कोशिकाओं में पाई जाती हैं।

    माइटोकॉण्ड्रिया कोशिकाद्रव्य में की एक बहुत महत्वपूर्ण रचना है जो की कोशिकाद्रव्य में बिखरी रहती है। माइटोकॉण्ड्रिया दोहरी झिल्ली के आवरण से घिरी हुई रचनाएँ होती हैं। माइटोकॉण्ड्रिया का आकार (size) और आकृति (shape) परिवर्तन होता रहता है ।

    माइटोकॉण्ड्रिया की संरचना और विशेषताएँ क्या है ?

    प्रत्येक माइटोकॉण्ड्रिया एक बाहरी झिल्ली एवं एक अन्तः झिल्ली से चारों ओर घिरी रहती है तथा इसके बीच में एक तरलयुक्त गुहा होती है, जिसे माइटोकॉण्ड्रियल गुहा (Mitochondrial cavity) कहते हैं। बाहरी झिल्ली की सतह पर वृंतविहीन कण पाये जाते है, जिन्हें पारर्सन की उपइकाई (subunits of parson) कहा जाता है।

    माइटोकॉण्ड्रिया की बाहरी झिल्ली सपाट और अन्दर वाली झिल्ली मैट्रिक्स की ओर ऊँगली समान नलिकाओं (पादपों में) अथवा क्रिस्टी (जन्तुओं में) जैसी रचनाएँ बनाती हैं।

    माइटोकॉण्ड्रिया कोशिकाद्रव्य में कणों (Chondriomits), सूत्रों (Filament), छड़ों (Chondriconts) और गोलकों (Chondriospheres) के रूप में बिखरा रहता है।

    बाहरी झिल्ली

    माइटोकॉन्ड्रिया की बाहरी झिल्ली प्रोटीन और फॉस्फोलिपिड  की बनी होती है इसमें फॉस्फेटिडिल कोलीन की मात्रा अधिक होती है। इसकी मोटाई 60-70 Å होती है।

    इसकी बाहरी झिल्ली द्वारा बहुत बड़े अणुओं (6000 kD) का स्थानांतरण हो सकता है।

    माइटोकॉन्ड्रिया में बड़ी संख्या में धंसे हुए प्रोटीन (integral proteins) होते हैं जिन्हें पोरिन (porins) कहा जाता है।

    आंतरिक झिल्ली

    माइटोकॉन्ड्रिया की आंतरिक झिल्ली पर ऑक्सीडेटिव फॉस्फोराइलेशन के एंजाइम पाए जाते है इस झिल्ली पर एटीपी संश्लेषण की प्रक्रिया होती है।

    भीतरी झिल्ली (Inner membrane) की बाहरी सतह को सी-फेस (C-Face) तथा आंतरिक सतह को एम-फेस (M – Face) कहा जाता है।

    क्रिस्टी (Cristae)

    आंतरिक झिल्ली में कई उभार (projection) होते हैं जिन्हें क्रिस्टी (Cristae) कहा जाता है।

    क्रिस्टी में टेनिस के रेकेट के समान की संरचना होती हैं जिन्हें ऑक्सीसोम या F2 कण या आंतरिक झिल्लिका उपइकाई (inner membrane subunit) कहा जाता है।

    ऑक्सीसोम का निर्माण दो कारकों F0 तथा F1 के द्वारा होता है। F0 कण ऑक्सीसोम के आधार पर होता है।ऑक्सीसोम एटीपीस एंजाइम होते हैं जो ऑक्सीडेटिव फास्फोरिलीकरण में भाग लेता हैं। जो आंतरिक झिल्ली के साथ F1 कण के जुड़ने में मदद करता है। और F0 F1 कण  को OSCP (oligomycin sensitivity conferring protein) कहा जाता है। दो ऑक्सीसम के बीच की दूरी 100Å होती  है।

    आधात्री (Matrix)

    आंतरिक झिल्ली से घिरे हुए स्थान में भरे द्रव को मैट्रिक्स कहते है जिसमे कुल माइटोकॉन्ड्रियन प्रोटीन का लगभग 2/3 भाग होता है। ये प्रोटीन में क्रेब्स चक्र एंजाइम, श्वसनकारी एंजाइम होते है।

    विशेष माइटोकॉन्ड्रियल राइबोसोम, टी-आरएनए और माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए जीनोम की कई प्रतियां शामिल हैं।

    माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए (Mitochondrial DNA)

    माइटोकॉण्ड्रिया के मैट्रिक्स में क्रैब्स चक्र के एन्जाइम, DNA, राइबोसोम तथा RNA स्थित होते हैं इसलिए माइटोकॉण्ड्रिया को अर्धस्वायत्त कोशिकांग (semi autonomous organelle)कहा जाता है।

    इसमें माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए (mt-DNA) उपस्थिति होता है। जिसके कारण यह अपने प्रोटीन एवं एंजाइमों का निर्माण खुद कर सकता है।

    Mitochondrial DNA द्विरज्जुकी (double stranded), नग्न (naked) दानेदार (granular), गोलाकार (circular), उच्च G-C अनुपात (higher G-C ratio) वाला अणु है। माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए (mt-DNA) कोशिक के कुल डीएनए का 1% भाग होता है।

    माइटोकॉन्ड्रिया में  जीनोम (mt-DNA) का आकार छोटा होता है। लेकिन जीन की संख्या बहुत अधिक होती है।

    mt-DNA का आकार जानवरों की तुलना में पौधे में अधिक होता है।

    mt-DNA में उत्परिवर्तन से लेबर ऑप्टिक न्यूरोपैथी(Labour Optic Neuropathy) विकार उत्पन्न होता है। जिसमें नेत्र की दृक तंत्रिका (Optic Nerve) से जुड़े न्यूरॉन क्षतिग्रस्त हो जाते हैं।

    mt-डीएनए का उपयोग Phylogenetic संबंधों के अध्ययन के लिए किया जाता है।

    माइट्रोकान्ड्रिया के द्वारा मानव इतिहास का अध्ययन और खोज भी की जा सकती है, क्योंकि उनमें पुराने गुणसूत्र उपलब्ध होते हैं। शोधकर्ता वैज्ञानिकों ने पहली बार कोशिका के इस ऊर्जा प्रदान करने वाले घटक को एक कोशिका से दूसरी कोशिका में स्थानान्तरित करने में सफलता प्राप्त की है। माइटोकांड्रिया में दोष उत्पन्न हो जाने पर मांस-पेशियों में विकार, एपिलेप्सी, पक्षाघात और मंदबद्धि जैसी समस्याएं पैदा हो जाती हैं

    माइटोकॉन्ड्रिया के कार्य

    इसमें कोशकीय श्वसन (Cellular respiration)  होता है।

    न्यूरॉन्स में पाए जाने वाले माइटोकॉन्ड्रिया न्यूरोहोर्मोन के निर्माण में मदद करते हैं।

    विटललोजेनेसिस (Vitellogenesis) के दौरान माइटोकॉन्ड्रिया में mitochondrial kinase एंजाइम पीतक (Yolk) को घना और अघुलनशील बनाता है।

    माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का पावर हाउस क्यों कहा जाता है ?

    माइटोकॉन्ड्रिया में एटीपी का संश्लेषण (ATP production), एटीपी का भंडारण (ATP storage) और एटीपी का परिवहन (transport) होता है। ये तीनों कार्य माइटोकॉन्ड्रिया में होने के कारण माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का पावर हाउस (कोशिका का शक्ति गृह  (Power house of the cell) कहा जाता है।

    चूँकि सभी आवश्यक रासायनिक क्रियाओं को करने के लिए माइटोकॉण्ड्रिया ATP के रूप में ऊर्जा प्रदान करते हैं। इसे कोशिका का बिजलीघर भी कहा जाता है,