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  • कोशिकांग, उनके खोजकर्ता एवं कार्य  (Cell organelles, their discoverers and functions)

    कोशिकांग, उनके खोजकर्ता एवं कार्य (Cell organelles, their discoverers and functions)

    प्रत्येक जीव का जीवन एक कोशिका से आरम्भ होता है | यदि वह इसी एक कोशिका के सहारे अपने जीवन को चलाता रहता है तो उसे एककोशिकीय जीव (Unicellular) जीव कहा जाता है, परन्तु अधिकांश जीवों में यह कोशिका विभाजन करती है और अंत में बहुकोशिकीय जीव बन जाता है | कोशिका जीवधारियों की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई होती है |

    वास्तविक केन्द्रक की उपस्थिति के आधार पर कोशिकाएँ दो प्रकार की होती हैं

    1. प्रोकैरियोटिक 2. यूकैरियोटिक

    सबसे पहले कोशिका का पता रॉबर्ट हुक 1665 में लगाया तथा अपनी पुस्तक माइक्रोग्राफिया में कोशिका का वर्णन किया |

    ल्यूवेनहॉक ने सबसे पहले उन्नत सूक्ष्मदर्शी से तालाब के जल में स्वतंत्र रूप से जीवित कोशिका का पता लगाया |

    कोशिकांग

    कोशिका का एक बड़ा भाग है, जो कोशिका झिल्ली या प्लाज्मा झिल्ली से घिरा एक तरल पदार्थ होता है। इसमें बहुत से कोशिका के घटक होते हैं, जिसे कोशिका अंग (Cell organelles) कहते हैं, जो कोशिका के लिए विशिष्ट कार्य करते हैं। कोशिकाद्रव्य तथा केन्द्रक दोनों को मिलाकर जीवद्रव्य कहलाता है। यह कोशिकाद्रव्य चिपचिपा, रंगहीन तथा कणिकामय होती है। यहाँ एन्जाइम की प्रचुरता होती है।

    कोशिकाद्रव्य में स्थित कोशिकांग (Cell organelles) कोशिकाओं के निर्णायक कार्य करते हैं।

    कोशिकांग, उनके खोजकर्ता एवं कार्य

    कोशिकांगखोजकर्ताकार्य
    हरितलवकशिम्परप्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन का निर्माण।
    माइटोकॉण्ड्रियाकॉलिकरकोशिकीय श्वसन द्वारा ATP का निर्माण।
    अन्तःप्रद्रव्यी जालिकापोर्टरप्रोटीन संश्लेषण (RER में) एवं लिपिड, ग्लाइकोजन तथा स्टीरॉइड संश्लेषण (SER में)।
    गॉल्जीकायकैमिलो गॉल्जीशुक्राणु के एक्रोसोम का निर्माण, हॉर्मोन स्रावण, पदार्थों का संचय एवं स्थानान्तरण।
    कोशिका भित्तिरॉबर्ट हुकमुख्यतया सेलुलोज की बनी, कैल्शियम व मैग्नीशियम पेक्टेट की बनी मध्य पटलिका कोशिकाओं के बीच सीमेन्ट का कार्य करती है।
    जीवद्रव्यपुरकिन्जेजीवन की भौतिक आधारशिला।
    कोशिका झिल्ली का तरल मोजैक मॉडलसिंगर एवं निकोलसनआकृति प्रदान करना व पदार्थों का आदान-प्रदान
    क्वान्टासोमपार्क एवं पोनप्रकाश-संश्लेषण की इकाई।
    राइबोसोमपैलेडप्रोटीन का संश्लेषण
    तारककायटी. बोवेरीकोशिका विभाजन के समय एस्टर किरणों का विकास।
    लाइसोसोमडी. डुवेबाह्य कोशिका पदार्थों तथा आन्तर कोशिका पदार्थों का पाचन, आत्महत्या की थैली।
    परॉक्सीसोमटॉल्बर्टप्रकाश श्वसन
    सूक्ष्मनलिकाएँडी रॉर्बटिससीलिया, कशाभिका, तारककाय एवं कोशिका कंकाल का निर्माण।
    केन्द्रकरॉबर्ट ब्राउनकोशिका का नियन्त्रक
    केन्द्रिकाफोन्टानाrRNA तथा राइबोसोम का संश्लेषण
    गुणसूत्रवाल्डेयरजननिक लक्षणों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानान्तरण
  • गुणसूत्र की खोज, संरचना, आकार, आकृति, रासायनिक संगठन, प्रकार एवं कार्य (Chromosome in Hindi सम्पूर्ण जानकारी)

    गुणसूत्र की खोज, संरचना, आकार, आकृति, रासायनिक संगठन, प्रकार एवं कार्य (Chromosome in Hindi सम्पूर्ण जानकारी)

    इस आर्टिकल में हम गुणसूत्र यानी क्रोमोसोम के बारे में विस्तृत में बतायेगे | गुणसूत्र क्या होते है ? गुणसूत्र की खोज कितने की ?, गुणसूत्रों की सरंचना कैसी होती है ? क्रोमोसोम का आकर कैसा होता है; गुणसूत्र किस आकृति में पाए जाते है ; गुणसूत्रों का रासायनिक संगठन क्या है ? गुणसूत्र कितने प्रकार के होते है ? और सबसे प्रमुख गुणसूत्रों के कार्य क्या होते है ? प्रमुख जीवों में गुणसूत्र की संख्या कितनी होती है ? जीन क्या होते है ? जीनोम क्या होते है और कैसे ये गुणसूत्रों से संबध रखते है ? आदि | साथ ही हम बात करेगे की कैसे स्तनधारी जीवों में एक्स (X) गुण सूत्र और वाई (Y) गुणसूत्र की भूमिका महत्वपूर्ण होती है |

    गुणसूत्र (Chromosome) क्रोमोसोम क्या होते है ?

    गुणसूत्र या क्रोमोसोम (Chromosome) सभी वनस्पतियों व जीवों की कोशिकाओं में पाये जाने वाले तंतु रूपी पिंड होते हैं, जो आनुवांशिक गुणों को निर्धारित व संचारित करने के लिए जाने जाते हैं। गुणसूत्र कोशिका के केन्द्रक (Nucleus) में सूक्ष्म सूत्र जैसा भाग है जो वंशागति के लिए आवश्यक है। क्रोमैटिन कोशिका विभाजन के समय सिकुड़कर छोटे और मोटे धागों का रुप ले लेते हैं। इन्हीं धागों को ही गुणसूत्र या क्रोमोसोम कहा जाता है, जिसमें कोशिका विभाजन नहीं होता है उसमें यह क्रोमैटिन पदार्थ के रूप में विद्यमान रहता है। गुणसूत्र (क्रोमोसोम) में आनुवंशिक गुण होते हैं, जो माता-पिता से DNA अणु के रूप में अगली सन्तति में जाते हैं। DNA अणु में कोशिका के निर्माण और संगठन की सभी आवश्यक सूचनाएँ होती हैं। गुणसूत्रों को ही अनुवांशिक लक्षणों का वाहक कहा जाता है।

    कोशिका के मध्य में गोलाकार या अण्डाकार रचना होती है, जिसे केन्द्रक कहा जाता है। कोशिका का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग, जो कोशिका के प्रबन्धक के रूप में भूमिका निभाता है। केन्द्रक के चार भाग होते हैं – केन्द्रक कला, केन्द्रक द्रव्य, केन्द्रिका तथा क्रोमैटिन। केन्द्रकद्रव्य में धागेनुमा पदार्थ जाल के समान होती है, जो क्रोमैटिन कहलाता है। यह DNA, हिस्टोन प्रोटीन तथा नॉन-हिस्टोन प्रोटीन का बना होता है।

    गुणसूत्र की खोज किसने की

    स्ट्रासबर्गर ने 1875 ई मे गुणसूत्र की खोज किया। सर्वप्रथम क्रोमोसोम ( रंगीन काय ) शब्द का प्रयोग वाल्डेयर ने 1889 में किया।

    गुणसूत्र (Chromosome) की सरंचना

    प्रत्येक गुणसूत्र में जेली के समान एक गाढ़ा द्रव होता है, जिसे मैट्रिक्स कहा जाता है। इसी मैट्रिक्स में दो परस्पर लिपटे महीन एवं कुण्डलित सूत्र, जिसे क्रोमैनिमेटा (Chromonemata) कहा जाता है। प्रत्येक क्रोमैनिमेटा एक अर्द्ध-गुणसूत्र (Chromatid) कहलाता है। ये दोनों क्रोमैटिड गुणसूत्रबिंदु (सेन्ट्रोमीयर) नामक स्थान पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं |

    गुणसूत्र की संरचना में निम्न भाग पाए जाते है :

    अर्धगुणसूत्र या क्रोमेटिड (Chromatid)

    कोशिका विभाजन की मेटाफेज (Metaphase) में गुण सूत्र के दो लंबवत भाग एक ही गुणसूत्रबिंदु से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। इनको अर्धगुणसूत्र या क्रोमेटिड कहते है। ऐनाफेज अवस्था के दौरान गुणसूत्रबिंदु का विभाजन होने से यह दोनों क्रोमेटिड पृथक हो जाते हैं, और पुत्रीगुणसूत्र (Daughter Chromosome) बनाते हैं।

    क्रोमोनिमेटा (Chromonemata)

    इंटरफ़ेज (Interphase) में गुण सूत्र अत्यधिक कुंडली अवस्था में दिखाई देता है, इन्हें वर्ण-गुणसूत्र या क्रोमोनिमेटा (Chromonemata) कहते है ।

    क्रोमोमियर (Chromomere)

    क्रोमोनिमेटा पर बिंदु के जैसी अत्यधिक कुंडली (Coiled) संरचनाएं दिखाई देती है, जिन्हें क्रोमोमियर (Chromomere) कहा जाता है।

    गुणसूत्रबिंदु (Centromere)

    क्रोमोसोम की लंबाई में एक स्थान पर यह थोड़ा संकरा होता है, इस भाग को प्राथमिक संकीर्णन (Primary Constriction) या गुणसूत्रबिंदु (Centromere)  कहा जाता हैं। गूणसूत्र बिन्दु (Centromere) की स्थिति के आधार पर गुणसूत्र अकेन्द्री (अर्थात् सेन्ट्रोमीयर रहित), अन्त:केन्द्री (सेन्ट्रोमीयर एक किनारे पर), अग्रकेन्द्री (सेन्टीमीटर किनारे के समीप) मध्यकेन्द्री (सेन्ट्रोमीयर मध्य में) तथा उपमध्यकेन्द्री (अर्थात् सेन्ट्रोमीयर मध्य भाग से थोड़ा दूर) होते हैं।

    काइनेटोकोर (Kinetochore)

    गुणसूत्रबिंदु पर पाई जाने वाला प्रोटीन काइनेटोकोर (Kinetochore) कहलाता है । कोशिका विभाजन के दौरान तर्कू तंतु (Spindal Fibers) काइनेटोकोर से ही जुड़ते हैं ।

    द्वितीयक संकीर्णन (Secondary Constriction)

    कुछ गुणसूत्रों में प्राथमिक संकीर्णन (Primary Constriction) के अलावा एक अन्य संकरा भाग भी पाया जाता है, जिसे द्वितीयक संकीर्णन कहते हैं।

    अनुषंघी सैटेलाइट क्रोमोसोम (Satellite Chromosome)

    ऐसे गुण सूत्र जिनमें द्वितीयक संकीर्णन (Secondary Constriction) पाया जाता है, उनके द्वितीयक संकीर्णन के ऊपर की एक छोटी भुजा सेटेलाइट (Satellite) कहलाती है और इन्हें ही सैटेलाइट गुणसूत्र (Satellite Chromosome) कहा जाता हैं।

    टिलोमीयर (Telomere)

    गुणसूत्रों का आखरी छोर (End tip) टिलोमीयर कहलाता है।

    गुणसूत्र का रासायनिक संगठन

    गुणसूत्र में डीएनए (DNA) और प्रोटीन पाए जाते हैं।

    यह प्रोटीन दो प्रकार के होते हैं-

    हिस्टोन प्रोटीन  (Histon Protein)

    नॉन हिस्टोन प्रोटीन ((Non Histon Protein)

    हिस्टोन प्रोटीन (Histon Protein)

    यह क्षारीय प्रोटीन (Alkali Protein) होते हैं जिनमे लाइसिन और आर्जिनिन (Lysine and Arginine) अमीनो अम्ल की मात्रा अधिक होती है। हिस्टोन डीएनए को उलझने से रोकते हैं और डीएनए को होने वाले नुकसान से बचाते हैं। इसके अलावा, हिस्टोन जीन विनियमन और डीएनए प्रतिकृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हिस्टोन के बिना, गुणसूत्रों में अवांछित डीएनए बहुत लंबा होगा।

    हिस्टोन प्रोटीन पांच प्रकार के होते हैं जिनका नाम निम्न है

    • H1
    • H2A
    • H2B
    • H3
    • H4

    इनमें से H2A, H2B H3, H4 के दो-दो इकाई जुड़कर हिस्टोन अष्टक (Histon Octamere) का निर्माण करते हैं। इनको कॉड कण (Core Partical) भी कहा जाता है।

    न्यूक्लियोसोम

    हिस्टोन अष्टक के साथ डीएनए की लगभग दो कुंडली तथा H1 हिस्टोन जुड़कर एक संरचना बनाती है, जिसे न्यूक्लियोसोम (Nucleosome) कहा जाता है।

    एक न्यूक्लियोसोम यूकेरियोट्स (eukaryotes) में डीएनए पैकेजिंग की बुनियादी संरचनात्मक इकाई है | कोशिका केन्द्रक के भीतर फिट होने के लिए डीएनए का न्यूक्लियोसोम में संघनित होना जरुरी होता है |

    लगभग 6 न्यूक्लियोसोम (Nucleosome) आपस में जुड़ कर सोलेनोइड (Solenoid) नामक संरचना का निर्माण करते हैं। सोलेनोइड की अवधारणा आउडेट के द्वारा दी गई तथा न्यूक्लियोसोम प्रतिरूप कोर्नबर्ग (Roger David Kornberg) तथा थॉमस के द्वारा दिया गया।

    गुणसूत्रों की आकृति

    गुणसूत्रबिन्दु की स्थिति और गुणसूत्रभुजा (Chromosomal arm) की लंबाई के आधार पर, गुणसूत्रों को चार समूहों में वर्गीकृत किया जाता है :

    1. अग्र केन्द्रकी (Telocentric)
    2. अग्रबिंदु या उप-अन्तकेन्द्रकी (Acrocentric)
    3. उप-मध्यकेन्द्रकी (Submetacentric)
    4. मध्यकेन्द्रकी (Metacentric)

    अग्र केन्द्रकी गुणसूत्र (Telocentric chromosome)

    टेलोसेंट्रिक गुणसूत्रों में, गुणसूत्रबिन्दु (Centromere)  गुणसूत्र के अंतिम सिरे (टिप) पर स्थित होता है। इस प्रकार के गुणसूत्र कोशिका विभाजन की एनाफेज (Anaphase) अवस्था में ’i’ आकार की संरचना के रूप में दिखाई देते हैं। इन गुणसूत्रों में केवल एक गुणसूत्रभुजा (Chromosomal arm) होता है। इस प्रकार के chromosome में बहुत दुर्लभ होते हैं और इन्हें केवल बहुत कम प्रजातियों में देखा गया है।

    अग्रबिंदु या उपअन्तकेन्द्रकी गुणसूत्र (Acrocentric chromosome )

    गुणसूत्रबिन्दु (Centromere) क्रोमोसोम के एक छोर पर इस तरह से स्थित होते है कि इनकी एक बहुत ही छोटी भुजा (P arm) और एक असाधारण लंबी भुजा (Q arm) होती है। कोशिका विभाजन की  मेटाफ़ेज़ अवस्था (Metaphase) में ये ‘J ‘आकार की संरचनाओं के रूप में दिखाई देते हैं।

    टिड्डियों के कुल Acrididae में ऐसे गुण सुत्रों को देखा गया जिससे इनका नाम Acrocentric क्रोमोसोम रखा गया है।

    सभी एक्रोकेंट्रिक क्रोमोसोम SAT-गुणसुत्र होते है।

    SAT-गुणसुत्र  ऐसे गुणसूत्र होते है जिनमें प्राथमिक संकीर्णन के अलावा एक अन्य द्वितीयक संकीर्णन (Secondary Constriction) भी पाया जाता है जिससे गुणसूत्र के एक छोर पर एक घुंडी जैसी संरचना दिखती जिसे सेटेलाइट कहते है और ऐसे गुणसूत्र SAT-गुणसुत्र कहलाते है ।
    मानव में, गुणसूत्र संख्या 13, 15, 21 और 22  ऐसे ही गुण सूत्र होते हैं।

    उप-मध्यकेन्द्रकी गुणसूत्र (Submetacentric chromosome)

    सेंट्रोमियर क्रोमोसोम के केंद्र या मध्य से थोडा दूर स्थित होता है। इसमें दो असमान भुजा (Chromosome arm) होती है एक भुजा छोटी और एक बड़ी भुजा होती है। सबमेटासेंट्रिक गुणसूत्र कोशिका विभाजन के ऐनाफेज (Anaphase) अवस्था में L आकार की संरचनाओं के रूप में दिखाई देते हैं। मानव गुणसूत्रों के अधिकांश submetacentric chromosome होते हैं।

    मध्यकेन्द्रकी गुणसूत्र (Metacentric chromosome)

    गुणसूत्रबिन्दु (centromere) क्रोमोसोम के बिल्कुल केंद्र में स्थित होता है। इस प्रकार गुणसूत्रों के दो बराबर आकार की भुजाएँ होती है।

    मेटासेंट्रिक गुणसूत्र कोशिका विभाजन के एनाफेज (Anaphase) में V आकार की संरचनाओं के रूप में दिखाई देंगे।

    इन गुणसूत्रों को एक आदिम प्रकार (Primitive) का गुणसूत्र माना गया है। जो प्रोकैरियोट में पाया जाया है |

    उभयचर में एवं मानव के गुणसूत्र संख्या 1 और 3 मध्यकेन्द्रकी गुणसूत्र होते हैं।

    गुणसूत्रों के प्रकार ( Type of Chromosomes)

    गुणसूत्र चार प्रकार के होते हैं-

    अलिंग गुणसूत्र (Autosomal Chromosome)

    यह लिंग से संबंधित लक्षणों को छोड़कर सभी प्रकार के कायिक लक्षणों (Somatic symptoms) का निर्धारण करते हैं। इनकी संख्या मानव में 44 होती है।

    लिंग गुणसूत्र (Sex Chromosome)

    यह लिंग का निर्धारण (Sex determination) करते है इनकी संख्या में दो होती है। पुरुष में XY तथा मादा में XX।

    सहायक गुणसूत्र (Acessory Chromosome)

    यह गुणसूत्रों के छोटे-छोटे टुकड़े होते हैं, जिनमें गुणसूत्रबिंदु नहीं पाया जाता। सहायक गुणसूत्र अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) में भाग नहीं लेते। अनुवांशिक रूप से निष्क्रिय होते हैं। इनकी खोज विल्सन द्वारा की गई। मनुष्यों में, प्रत्येक 1500 में लगभग एक व्यक्ति में एक सहायक गुणसूत्र होता है, और इनमें से कुछ मानसिक या शारीरिक असामान्यताओं (mental or physical abnormalities) से जुड़े होते हैं

    विशालकाय गुणसूत्र (Giant  chromoses)

    पॉलीटीन गुणसूत्र (Polytene Chromosome)

    इसकी खोज ई.जी. बालबियानी (E.G. balbiani) ने डायप्टेरा (diapteron) कीटों के लार्वा की लार ग्रंथि में की। पॉलीटीन गुणसूत्र कोल्लर (koller) द्वारा दिया गया। इसमें कई क्रोमोनिमा (chromonema) होते हैं, इसलिए इसे पॉलीटीन गुणसूत्र कहा जाता है।

    इनके कई क्रोमोनिमा क्रोमोमियर से जुड़े रहते हैं। प्रत्येक क्रोमोनिमा में पफ क्षेत्र और गैर-पफ (पफ विहीन) क्षेत्र (puffed region & non-puffed regions) होते हैं। पफ क्षेत्र में बालबियानी छल्ले (Balabiani rings) होते हैं जो डीएनए, आरएनए और प्रोटीन से बने होते हैं।

    ड्रोसोफिला मेलेनोगैस्टर में इनकी आमाप 2000 um होती है। इन गुणसूत्रों में गहरी व हल्की अनुप्रस्थ पट्टियों का विशिष्ट अनुक्रम होता है। गहरी पट्टियाँ यूक्रोमेटिन तथा हल्की पट्टियाँ हेटेरोक्रोमेटिन कहलाती है। इन गुणसूत्रों में गहरी पट्टियों पर लूपनुमा पफ बन जाते हैं। इन विशिष्ट लूपों को बालबियनी लूप कहते हैं। इन लूपों में mRNA का संश्लेषण होता है। गैर-पफ क्षेत्र छल्ले के होते हैं लेकिन वे बैंड (पट्टी) और इंटरबैंड से बने होते हैं। ये क्रोमोसोम एंडोमाइटोसिस (endomostosi) द्वारा बनते हैं। ये कीटों के लार्वा में कायान्तरण (मेटामॉर्फोसिस – metamorphosis) को बढ़ावा देते हैं।

    लैंपब्रश गुणसूत्र (Lampbrush Chromosomes)

    कशेरुकियों के परिवर्धनशील अण्डाणु के गुणसूत्रों का आकार लैम्प साफ करने वाले ब्रश जैसा हो जाता है। लैम्प (Lamp) की सफाई करने वाले ब्रश की तरह दिखाई देने के कारण इनको लैंप ब्रश गुणसूत्र (Lampbrush Chromosome) नाम दिया गया। इन गुणसूत्रों का मुख्य केन्द्रीय कुछ DNA का तथा लूप DNA व RNA के बने होते हैं। इनकी खोज रुकर्ट ने की। लैम्पब्रश गुणसूत्र स्तनधारियों को छोड़कर अधिकांश जानवरों के बढ़ते oocytes (अपरिपक्व अंडे) में पाए जाने वाले गुणसूत्र का एक विशेष रूप है | ये शार्क, उभयचर, सरीसृप और पक्षियों के प्राथमिक अण्डक (oocytes) में अर्द्धसूत्री विभाजन के प्रोफेज-I की डिप्लोटिन अवस्था में पाये जाते है। वे अण्डों योक के संश्लेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसमें एक मुख्य अक्ष होता है जिसमें डीएनए और प्रोटीन से बने दो क्रोमोनिमा (chromonema) होते हैं।

    जीन (Gene)

    जीनशब्द को जोहन्सन ने दिया था। आधुनिक शोधों के अनुसार, एक जीन, DNA के एक ऐसा खण्ड है, जो किसी एक विशिष्ट प्रकार की प्रोटीन (एन्जाइम) के संश्लेषण का नियमन करता है। इस भाग को सिस्ट्रॉन कहते हैं।

    इन्हीं जीनों के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में आनुवंशिक लक्षण हस्तान्तरित होते हैं। अतः जीन ही आनुवंशिक गुणों हेतु उत्तरदायी हैं।

    जीनोम (Genome)

    जीनोम (Genome) एक अगुणित गुणसूत्रों के समुच्चय को जीनोम कहते हैं; जैसे-एक युग्मक में उपस्थित कुल गुणसूत्र।

    कैरियोटाइप किसी जाति के कुल गुणसूत्रों की आकारिकी को कैरियोटाइप कहा जाता है।

    इसके अन्तर्गत निम्न लक्षण निहित हैं:

    (i) गुणसूत्रों की संख्या (ii) गुणसूत्रों की कुल लम्बाई (iii) प्रत्येक गुणसूत्र की लम्बाई तथा व्यास (iv) लघु व वृहत् भुजा का अनुपात।

    इडिओग्राम (Idiograms )

    जब किसी जाति के कैरियोटाइप को विशिष्ट चित्रों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है, तो इन चित्रों को इडिओग्राम कहते हैं।

    कुछ प्रमुख जीवों में गुणसूत्रों की संख्या

    किसी भी जाति में सभी जीवो में गुणसूत्रों की संख्या एक समान होती है। भिन्न-भिन्न यानि अलग जातियों के जीवो में इनकी संख्या अलग-अलग होती है। कुछ जीवों उपस्थित गुणसूत्रों की संख्या निम्न होता है।

    जीवसंख्याजीवसंख्या
    ऐस्कैरिस मैगासिफेलस190मानव46
    अमीबा250गोरिल्ला48
    मटर14चिम्पैन्जी48
    मक्का20चूहा40
    गेहूँ42घोड़ा64
    आलू48कुत्ता78
    मेंढक26घरेलू मक्खी12
    बिल्ली38

    गुणसूत्रों के कार्य – Works of Chromosome

    जीवों में गुणसूत्रों का प्रमुख कार्य निम्न है :

    अनुवांशिकता में प्रमुख भूमिका

    गुणसूत्र अनुवांशिकता का वाहक है जिसमें विभिन्न प्रकार की प्रकार की क्रियाओं के लिए संदेश निहित होते हैं। यह प्रोटीन की बहुत से जटिल अणुओं के द्वारा बनते हैं

    जनन की इकाई के रूप में

    गुणसूत्रों के प्रतिलिपिकरण द्वारा संतति गुणसूत्र बन जाते हैं, जो उत्पन्न संतति कोशिकाओं में पहुंचते हैं।

    एक्स (X) गुण सूत्र और वाई (Y) गुणसूत्र की भूमिका

    स्तनधारी जीवों, जिसमें मनुष्य भी शामिल हैं, में लिंग निर्धारण करने वाले दो गुणसूत्रों – एक्स (X) गुण सूत्र और वाई (Y) गुणसूत्र की भूमिका होती है। पुरुषों में एक Y और एक X गुण सूत्र होता है, जबकि महिलाओं में दो X गुणसूत्र होते हैं। किसी पिता का Y गुणसूत्र बिना किसी बदलाव के उसके पुत्रों में जाता है। इसलिए, Y गुणसूत्र के अध्ययन से किसी भी पुरुष के पितृवंश समूह का पता लगाया जा सकता है। Y गुणसूत्र को पुरुष निर्धारण गुणसूत्र के रूप में जाना जाता है। यह अपने साथी X की तुलना में एक छोटा गुणसूत्र है।

    मनुष्य – 46 (23 जोडें) गुणसूत्र

    एक नये अध्ययन में, भारतीय वैज्ञानिकों ने Y क्रोमोसोम के बारे में चौंकाने वाला खुलासा किया है, जो बताता है कि लिंग निर्धारण के अलावा कुछ अन्य प्रक्रियाओं में भी Y क्रोमोसोम की भूमिका हो सकती है। इस अध्ययन में, वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि वाई गुणसूत्र पुरुष प्रजनन में शामिल अन्य गुणसूत्रों पर जीन को नियंत्रित करता है।

    Y गुणसूत्र पर डीएनए अनुक्रम कई प्रतियों में मौजूद होते हैं और उनमें से बहुत कम प्रोटीन के लिए कोडिंग का काम करते हैं। अब तक यह समझा जाता था कि वे Y गुणसूत्रों पर कुछ प्रोटीन कोडिंग जीन्स के लिए पैकिंग सामग्री के रूप में कार्य करते हैं। कोई स्पष्ट कार्य नहीं होने के कारण, Y गुणसूत्र के डीएनए के अधिकांश भाग को व्यर्थ माना जाता था। सीएसआईआर-कोशिकीय एवं आणविक जीवविज्ञान केन्द्र (सीसीएमबी) के वैज्ञानिक प्रोफेसर राशेल जेसुदासन के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में Yगुणसूत्र डीएनए के आश्चर्यजनक अभिनव नियामक कार्यों के बारे खुलासा किया गया है।

    चूहों के Y क्रोमोसम पर किए गए इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया है कि डीएनए के एक गुच्छे का चूहे के वाई गुणसूत्र पर दोहराव होता है, जो वृषण या शुक्र-गन्थि में, विशेष रूप से प्रजनन के लिए आवश्यक अन्य गुणसूत्रों से व्यक्त जीन को नियंत्रित करता है। उन्होंने यह भी दिखाया है कि ये दोहराव प्रजाति-विशिष्ट हैं, यानी वे अन्य प्रजातियों में मौजूद नहीं हैं। शोधकर्ताओं का कहना यह भी है कि ये दोहराव छोटे आरएनए (RNA) के एक वर्ग को जन्म देते हैं, जिन्हें पीआईआरएनए (piRNA) कहा जाता है।

    प्रोफेसर जेसुदासन कहते हैं – “मानव Y गुणसूत्र पर हमारे पहले के अध्ययनों में देखा गया है कि Y गुणसूत्र पर लिंग और प्रजाति-विशिष्ट दोहराव प्रजनन के लिए महत्वपूर्ण गुणसूत्र संख्या-1 से संचरित प्रोटीन-कोडिंग RNA को नियंत्रित करता है। इस अध्ययन में, Y गुणसूत्र और अन्य गुणसूत्रों के बीच परस्पर क्रिया की यह पहली रिपोर्ट है। इस प्रकार, दो अध्ययनों को समेकित करते हुए, हम Y गुणसूत्र द्वारा प्रजनन से जुड़े जीनों का अधिक व्यापक विनियमन देख सकते हैं।”

    वे कहते हैं – “जैसे-जैसे प्रजातियां विकसित होती हैं, ये दोहराव भी साथ-साथ विकसित होते रहते हैं, और धीरे-धीरे प्रजातियों के प्रजनन को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं रहते हैं। इस प्रकार, ऐसा प्रतीत होता है कि ये दोहराव प्रजातियों की पहचान और विकास-क्रम का आधार हैं।”

    स्त्रोत : विज्ञान प्रसार

  • कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) की संरचना, आकार,  भाग  एवं कार्य | केन्द्रक कला, केन्द्रक द्रव्य, केन्द्रिका, क्रोमैटिन तथा गुणसूत्र के प्रकार Nucleus and Chromosome in Hindi

    कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) की संरचना, आकार, भाग एवं कार्य | केन्द्रक कला, केन्द्रक द्रव्य, केन्द्रिका, क्रोमैटिन तथा गुणसूत्र के प्रकार Nucleus and Chromosome in Hindi

    इस आर्टिकल में हम कोशिका केंद्र (Cell Nucleus) के बारे में जानेगें | कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) क्या है ? कोशिका में कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) की क्या भूमिका है ? कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) की संरंचना कैसी होती है ? केन्द्रक के कितने भाग होते है ? और सबसे प्रमुख कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) के प्रमुख कार्य क्या क्या है ? इसके अलावा इस आर्टिकल में हम जानेगें कि केन्द्रक कला या केन्द्रक झिल्ली क्या है ? केन्द्रक द्रव्य क्या होता है ? केन्द्रिका क्या है और उसकी केन्द्रक में क्या भूमिका है ? साथ ही हम बात करेगें कि क्रोमैटिन तथा गुणसूत्र के बारे में |

    कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) क्या है ? What is Cell Nucleus ?

    कोशिका द्रव्य में स्थित वह संरचना जो जीवद्रव्य की क्रियाओं को संचालित करता है अर्थात कोशिका का नियंत्रण करता है, केंद्रक कहलाता है | केंद्रक कोशिका का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग है जो कोशिका के प्रबन्धक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। केंद्रक में कोशिका की वंशानुगत जानकारी होती है और कोशिका के विकास और प्रजनन को नियंत्रित भी करती है| यह एक यूकेरियोटिक सेल का कमांड सेंटर है और आमतौर पर यह एक कोशिकांग (organelle) का सबसे प्रमुख संगठन है | स्तनधारीयों की RBC व पादपों की चालनी बलिकाओं को छोड़कर सभी जीवित कोशिकाओं में केन्द्रक पाया जाता है |

    केन्द्रक कोशिका के लगभग मध्य में स्थित गोलाकार और अण्डाकार सरंचना होती है जिसका व्यास 5u – 20u तक होता है, प्राय: एक कोशिकाओं में एक ही केंद्रक पाया जाता है , परन्तु कुछ सजीवो में एक से अधिक केन्द्रक भी पाये जाते है | जैसे : पैरामिशियम , वाउचेरिया आदि | केन्द्रक एक दो स्तरीय आवरण से घिरी सरंचना है जिसे केन्द्रक कला कहते है | जिसमे खनिज लवण, एंजाइमस, DNA, RNA, क्रोमेटिन धागे (गुणसूत्र) आदि पाए जाते है |

    केन्द्रक कोशिका विभाजन द्वारा वृद्धि, गुणसूत्र में उपस्थित जीन द्वारा आनुवांशिक लक्षणों (माता पिता के गुणों) को अगली पीढ़ी तक पहुचाने एवं कोशिका की सभी उपापचयी क्रियाओं का नियंत्रण एवं नियमन करने का कार्य करता है | अत: यह कोशिका के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक है | केन्द्रक को कोशिका का निदेशक (Director of cell) भी कहते है।

    केन्द्रक (Cell Nucleus) की खोज

    केन्द्रक की खोज 1831 में रोबर्ट ब्राउन ने आर्किक पादप कोशिकाओ के रूप में की थी | केन्द्रक को रॉबर्ट ब्राउन ने आर्किड के जड़ो की कोशिकाओं में देखा और उनको Nucleus (न्यूक्लियस) नाम दिया। केन्द्रक के अध्ययन को Karyology कहा जाता है। फ्लेमिंग ने इसे क्रोमैटिन नाम दिया।

    न्यूक्लियोप्लाज्मिक इंडेक्स (Nucleoplasmic Index) क्या है ?

    केन्द्रक और कोशिका द्रव्य की मात्रा के बीच एक विशिष्ट अनुपात होता है जिसे न्यूक्लियोप्लाज्मिक इंडेक्स (NP) या केरियोप्लाज्मिक इंडेक्स (karyoplasmic index) कहा जाता है जिसे हर्टविग समीकरण के रूप में निम्न प्रकार व्यक्त किया जा सकता है –

    NP = Vn/ VcVn

    जहां

    NP = न्यूक्लियोप्लाज्मिक इंडेक्स

    Vn = केन्द्रक का आयतन

    Vc = कोशिक द्रव्य का आयतन

    कोशिका में केन्द्रक की संख्या (Numbers of Nucleus in Cell)

    आमतौर पर कोशिकाओं में एक ही केन्द्रक पाया जाता है जिसे एककेन्द्रकी कोशिका कहा जाता है। लेकिन पैरामीसियम कोडेटम द्विकेन्द्रकी होता है जबकि पैरामीसियम ऑरिलिया तीन केन्द्रक होते है | कई केन्द्रक वाली कोशिकाओं को बहुकेन्द्रकीय कोशिका कहते है

    उदाहरण म्यूकोर, Rancheria (शैवाल) तथा पशु और मानव की रेखित पेशी कोशिकाओं में जिसे सिंकटीयियम (Syncytium) कहते हैं। केन्द्रक RBC और एंजियोस्पर्म की चालनी नलिका (सिव ट्यूब) में अनुपस्थित होता है।

    केन्द्रक का आकार (Shape of Nucleus)

    केन्द्रक कोशिका के लगभग मध्य में स्थित गोलाकार और अण्डाकार सरंचना होती है जिसका व्यास 5u – 20u तक होता है

    लेकिन यह इओसीनोफिल (Eosinophil) में द्विपालित (Bilobed) होता है बेसोफिल में तीन पालियो (Trilobed) होता है और न्युट्रोफिल (Neutrophil) में बहुपालित (Multilobed) होता है यह मैक्रोफेज कोशिका (Macrophaze) में गुर्दा के आकार का होता है, Verticella में यह घोड़े की नाल के रूप का होता है।

    केन्द्रक का रासायनिक संगठन (Chemical Composition of Nucleus)

    DNA= 9-12%

    प्रोटीन (Basic protein) = 15%

    Enzyme, acid protein & neutral protein = 65%

    RNA = 5%

    लिपिड्स (Lipids) = 3%

    Minerals Ca2+, mg2+, k+ Na+ = traces

    RNA एवं DNAमें फास्फोरस (Phosphorus) उपस्थित होता है

    कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) की संरचना

    केन्द्रक दोहरी झिल्ली से घिरा कोशिकांग है इन दोनों झिल्लियो के मध्य 10-15 नैनोमीटर का रिक्त स्थान होता है, जिसे परिकेन्द्रीय अवकाश कहते है |

    केन्द्रक झिल्ली या केन्द्रक कला में निश्चित स्थानों पर छिद्र होते है, जो केन्द्रक छिद्र कहलाते है | केन्द्रक छिद्रों से RNA व प्रोटीन का परिवहन होता है |

    केन्द्रक झिल्ली के अन्दर एक पारदर्शी , अर्द्धतरल कणिकामय समान व स्वच्छ पदार्थ पाया जाता है जिसे केन्द्रक द्रव्य कहते है, इसमें RNA , DNA , प्रोटीन , एंजाइम , वसा , खनिज लवण आदि पदार्थ पाये जाते है |

    इसमें क्रोमेटिन जाल व केंद्रिका स्थित होती है | केन्द्रिका की खोज फोंटाना ने की थी | केन्द्रिका एक गोलाकार संरचना होती है , एक केन्द्रक में एक केंद्रिका या अधिक भी हो सकती है | जैसे प्याज के केन्द्रक में चार केन्द्रिकाएं होती है |

    क्रोमेटिक जाल डीएनए से बना होता है क्रोमेटिन जाल गुणसूत्र के रूप में बिखरा होता है जो मनुष्य में लगभग 20m लम्बा होता है | इसके अतिरिक्त RNA व हिस्ट्रोन प्रोटीन भी केन्द्रक में पाये जाते है |

    कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) केन्द्रक के कितने प्रकार होते है ?

    केन्द्रक के निम्न चार भाग होते हैं

    1. केन्द्रक कला या केन्द्रक झिल्ली (Nuclear membrane
    2. केन्द्रक द्रव्य (Nucleoplasm or nuclear sap)
    3. केन्द्रिका (Nucleolus)
    4. क्रोमैटिन धागे(Chromatin threads)

    केन्द्रक झिल्ली या केन्द्रक कला (Nuclear Membrane)

    केन्द्रक झिल्ली प्लाज्मा झिल्ली की भांति दोहरी झिल्ली की बनी होती है एवं केन्द्रक के चारों ओर एक आवरण बनाती है |

    केन्द्रक झिल्ली का निर्माण अर्धसूत्री विभाजन के अंत में टिलोफ़ज प्रावस्था में ER द्वारा किया जाता है।

    प्रत्येक झिल्ली लाइपोप्रोटीन से बनी एक इकाई कला होती है | प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में केन्द्रक-कला या तो अविकसित होती है या होती ही नहीं |

    प्लाज्मा झिल्ली की तरह केन्द्रक झिल्ली वरणात्मक पारगम्य होती है | यह केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य के बीच पदार्थों के आवागमन को नियन्त्रित करती है |

    केन्द्रक झिल्ली को Karyotheca भी कहा जाता है। यह 70-80Å मोटी होती है।

    केन्द्रक की बाहरी और भीतरी झिल्ली के बीच के खाली स्थान को परिकेन्द्रकीय अवकाश (पेरिन्यूक्लियर स्पेस, perinuclear space) कहा जाता है।

    केन्द्रक छिद्र (Nuclear Pore)

    केन्द्रक कला या केन्द्रक झिल्ली में छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। न्यूक्लियोपोरिन द्वारा 9 nm आकार वाले केन्द्रक छिद्र का गठन किया जाता है । इन्हीं छिद्रों द्वारा आवश्यक पदार्थों का आदान-प्रदान केन्द्रक द्रव्य तथा कोशिकाद्रव्य के बीच में होता है।

    केन्द्रक छिद्र की संरचना अष्ट कोणीय होती है केन्द्रक छिद्र में इलेक्ट्रॉन सघन वलय पाया जाता है जिसे एनूल्स कहते है। एनूल्स केन्द्रक छिद्र के साथ मिलकर रंध्र-जटिल बनती है।

    केन्द्रक लेमिना (Nuclear Lamina)

    भीतरी झिल्ली में एक रेशेदार प्रोटीन जाल होता है जिसे फाइबर लेमिना कहा जाता है जो परिधीय हेटोरोक्रोमेटिन के साथ जुड़ा होता है। लेमिना मधुमक्खी के छाते की तरह दिखती है।

    केन्द्रक लेमिना प्रोटीन लॅमिन्स (Lamins) से बना है। केन्द्रक लेमिना क्रोमेटिन के संलग्न के लिए स्थल प्रदान करता हैं।

    केन्द्रक द्रव्य (न्यूक्लियोप्लाज्म Nucleoplasm)

    केन्द्रक के मैट्रिक्स को केन्द्रकद्रव्य या केन्द्रक रस या कैरियोलिम्फ कहते है |

    केन्द्रक के अन्दर यह न्यूक्लियोप्रोटीन का बना पारदर्शी, कोलायडी, तरल पदार्थ और कणिकामय प्रोटीन का बना होता है जो केन्द्रक-कला से घिरा रहता है | इसमें केन्द्रिका और क्रोमैटिन धागे के अतिरिक्त, एंजाइम, खनिज लवण, आर.एन.ए, राइबोसोम आदि पाए जाते हैं | यह प्रकृति में acidophilic होती है। 

    केन्द्रिका (Nucleolus) क्या है ? What is Nucleolus ?

    केन्द्रक के अंदर एक या दो केन्द्रिकाएं होती हैं | यह गोल और नग्न संरचना है जो विशिष्ट बिंदु पर क्रोमेटिन से जुड़ा हुआ है जिसे न्यूक्लियोलर संगठित क्षेत्र या (Nucleolar Organiser Region) NOR कहा जाता है। ये किसी झिल्ली के अभाव में सीधे केन्द्रकद्रव्य के सम्पर्क में रहती है | केन्द्रिकाएं प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में नहीं पाई जाती हैं तथा कोशिका विभाजन के समय गायब हो जाती है |

    केन्द्रिका की खोज सर्वप्रथम फोन्टाना ने 1781 में की, उसके बाद 1840 में बोमेन ने इसे न्यूक्लिओलस नाम दिया | केन्द्रिका में प्रोटीन (85%), आर.एन.ए (10%) तथा डी.एन.ए (5%) होता है |

    प्रोटीन संश्लेषण रूप से सक्रिय कोशिकाओ में बड़े केन्द्रिका होते हैं। उदाहरण के लिए oocytes, न्यूरॉन्स आदि।

    केन्द्रिका के भाग

    रेशेदार भाग (Fibrous Part)

    न्यूक्लियोनेमा नामक तंतुओ से बना केन्द्रिका का केंद्रीय भाग होता है। न्यूक्लियोनेमा मुख्य रूप से डीएनए और प्रोटीन से बना है।

    दानेदार भाग/ कणिकीय भाग (Granular Part)

    यह कणिकाओ (आर-आरएनए + प्रोटीन) से मिलकर बना केन्द्रिका का परिधीय भाग है जो परिपक्व राइबोसोम का प्रतिनिधित्व करता है।

    मैट्रिक्स या पार्स एमोर्फा (Amorphous Matrix)

    यह प्रोटीन युक्त मैट्रिक्स आधात्री होता है जिसमें तंतु और कण दोनों होते हैं। राइबोसोमल प्रोटीन का संश्लेषण केन्द्रिका में होता है |

    क्रोमैटिन भाग (Chromatin Part)

    यह डीएनए से बना है। केन्द्रिका में दो प्रकार के क्रोमैटिन होते हैं जो इंट्रान्यूक्लियोलर क्रोमेटिन (Intranuclear) और पेरिन्यूक्लियोलर क्रोमेटिन (Perinuclear) होते हैं।

    केन्द्रिका का कार्य क्या है ? What are Functions of Nucleolus ?

    केन्द्रिका के द्वारा निम्न तीन प्रकार के कार्यों को सम्पादित किया जाता है-

    1. प्रोटीन का संश्लेषण,
    2. राइबोसोमल आरएनए का संश्लेषण,
    3. केन्द्रक से कोशिका द्रव्य में आनुवांशिक सूचनाओं (Genetic Information) का स्थानांतरण है

    केन्द्रिका को राइबोसोम का कारखाना (राइबोसोमल फैक्टरी) के रूप में जाना जाता है।

    केन्द्रिका का रासायनिक संघटन (Chemical Composition of Nucleolus)

    इस में 85% प्रोटीन, 10% आर-आरएनए, और डीएनए का 5% होता है।

    क्रोमैटिन (Chromatin)

    क्रोमैटिन (Chromatin) केन्द्रकद्रव्य में धागेनुमा पदार्थ जाल के समान होती है, जो क्रोमैटिन कहलाता है। यह DNA, हिस्टोन प्रोटीन तथा नॉन-हिस्टोन प्रोटीन का बना होता है। कोशिका विभाजन के समय सिकुड़कर ये छोटे और मोटे हो जाते हैं। इन्हीं धागों को ही क्रोमोसोम कहा जाता है, जिसमें कोशिका विभाजन नहीं होता है उसमें यह क्रोमैटिन पदार्थ के रूप में विद्यमान रहता है।

    ये दो प्रकार के होते हैं –

    1. युक्रोमेटिन (Euchromatin)
    2. हेटोरोक्रोमेटिन (Heteochromatin)

    युक्रोमेटिन (Euchromatin)

    यह आनुवंशिक रूप से सक्रिय होता है यह अभिरंजित करने पर हल्का अभिरंजित होता है इसमें हिस्टोन (Histon) प्रोटीन कम मात्रा में होता है,जिससे ये कम संघनित होता है। यह ट्रांसक्रिप्शन (अनुलेखन) के लिए सक्रिय होता है, इनमें सामान्य रूप से प्रतिकृति (Replication) और जीन विनिमय ( Crossing over) पाया जाता है।

    हेटोरोक्रोमेटिन (Heteochromatin)

    यह आनुवंशिक रूप से निष्किय होता है यह अभिरंजित करने पर गाढ़ा अभिरंजित होता है यह अत्यधिक संघनित (Condense) होता है, जो देर से प्रतिकृति, उच्च घनत्व और कम जीन विनिमय दर्शाता है। इसमें अधिक हिस्टोन और कम अम्लीय प्रोटीन होता है |

    गुणसूत्र (Chromosome) क्या होते है ?

    क्रोमेटिन पदार्थ से बने धागेनुमा संरचना को गुणसूत्र कहते है | 875 में स्ट्रोंगन्सबर्गर ने गुणसूत्र की खोज की तथा 1888 में वाल्डेयर ने क्रोमोसोम नाम दिया | णसूत्रो की संख्या अलग अलग जीवों में अलग अलग होती है जैसे – मनुष्य में 46  | त्येक गुणसूत्र दो अर्द्धगुणसूत्रों से मिलकर बना होता है , दोनों अर्द्धगुणसूत्र एक बिन्दु पर पर आपस में जुड़े होते है जिसे गुणसूत्र बिन्दु या सेन्ट्रोमीगर या काइने टोकोर कहते है | गुणसूत्र पर रेखीय क्रम में जीन पाये जाते है |

    प्रत्येक गुणसूत्र में जेली के समान एक गाढ़ा द्रव होता है, जिसे मैट्रिक्स कहा जाता है। इसी मैट्रिक्स में दो परस्पर लिपटे महीन एवं कुण्डलित सूत्र, जिसे क्रोमैनिमेटा कहा जाता है। प्रत्येक क्रोमैनिमेटा एक अर्द्ध-गुणसूत्र (chromatid) कहलाता है। ये दोनों क्रोमैटिड सेन्ट्रोमीयर नामक स्थान पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं, क्रोमोसोम में आनुवंशिक गुण होते हैं, जो माता-पिता से DNA अणु के रूप में अगली सन्तति में जाते हैं। DNA अणु में कोशिका के निर्माण और संगठन की सभी आवश्यक सूचनाएँ होती हैं। प्राथमिक संकिर्णन के अतिरिक्त अन्य संकीर्णन को द्वितीयक संकीर्णन कहते है , द्वितीयक संकीर्णन के आगे के भाग को सेटेनाइट कहते है |

    ‘जीन’ शब्द को जोहन्सन ने दिया था। आधुनिक शोधों के अनुसार, एक जीन, DNA के एक ऐसा खण्ड है, जो किसी एक विशिष्ट प्रकार की प्रोटीन (एन्जाइम) के संश्लेषण का नियमन करता है। इस भाग को सिस्ट्रॉन कहते हैं।

    इन्हीं जीनों के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में आनुवंशिक लक्षण हस्तान्तरित होते हैं। अतः जीन ही आनुवंशिक गुणों हेतु उत्तरदायी हैं।

    गुणसूत्र (Chromosome) के प्रकार (Type of Chromosome )

    मध्यकेन्द्रकी : जब गुणसूत्र बिन्दु गुणसूत्रों के बीचो बीच होता है जो दोनों भुजाएं समान होती है जिसे मध्यकेन्द्रकी गुणसूत्र कहते है |

    उपमध्यकेन्द्रकी : जब गुणसूत्र बिन्दु गुणसूत्रों में मध्य से हटकर होता है तथा एक भुजा बड़ी व दूसरी भुजा छोटी है , उपमध्य केन्द्रकी गुणसूत्र कहलाता है |

    अग्रबिन्दु : जब गुणसूत्र बिन्दु गुणसूत्र में बिल्कुल किनारे पर स्थित होता है जिससे एक भुजा बहुत छोटी व दूसरी भुजा बहुत बड़ी होती है इसे अग्र बिन्दु गुणसूत्र कहते है |

    अंतकेन्द्री : जब गुणसूत्र बिन्दु गुणसूत्र के शीर्ष पर स्थित होता है तो एक भुजा नाम मात्र की व दूसरी भुजा अव्यन्त: बड़ी होती है जिसे अन्तकेन्द्री कहते है |

    केन्द्रक से जुड़े कुछ महत्वपुर्ण प्रश्न और उनके जवाब

    केन्द्रक किसमे नही पाया जाता है ?

    प्रश्न : किसमे केन्द्रक नही पाया जाता है ?

    प्रश्न : कोनसी कोशिका में केन्द्रक नही पाया जाता है ?

    प्रश्न : कोनसे जीव में केन्द्रक नही पाया जाता है ?

    प्रश्न : किस प्रकार की कोशिका में केन्द्रक नही पाया जाता है ?

    प्रश्न : कोनसे पेड़ या पादप में केन्द्रक नही पाया जाता है ?

    प्रश्न : कोनसे जानवर में केंदक नही पाया जाता है ?

    प्रश्नों के उत्तर

    स्तनधारीयों की लाल रक्त कोशिकाओं RBC (red blood cells) व पादपों की चालनी बलिकाओं (plant cell sieve tubes) को छोड़कर सभी जीवित कोशिकाओं में केन्द्रक पाया जाता है | क्योकि केन्द्रक कोशिका में पाया जाता है | स्तनधारी लाल रक्त कोशिकाओं (एरिथ्रोसाइट्स) में न तो केन्द्रक होता है और न ही माइटोकॉन्ड्रिया।

    प्रोकैरियोटिक कोशिका ऐसी कोशिका होती है जिसमें केंद्रक नहीं होता है तथा इनमें कोशिकांग भी सुविकसित नहीं होता है प्रोकरयोटिक कोशिका में कोशिका भित्ति म्यूरॉन की बनी होती है इनके गुणसूत्र में हिस्टोन प्रोटीन नहीं पाया जाता है उदाहरण – जीवाणु ( Bacteria ) , साइनोबैक्टीरिया अर्कीबैक्टीरिया , विषाणु ( Virus ) , बैक्टीरियोफेज , माइकोप्लाज्मा ( PPLO ) , नील हरित शैवाल ( Blue green algae ) रिकेट्सिया की कोशिकाएं आदि |

    यूकैरियोटिक कोशिका में केंद्रक पाए जाते हैं इनमें कोशिकांग पूर्ण रूप से विकसित होता है यूकैरियोटिक कोशिका के गुणसूत्र में हिस्टोन प्रोटीन पाया जाता है तथा ये क्षारीय प्रकृति के होते हैं।

    उदाहरण – सभी जन्तु कोशिका , प्रोटोजोआ , जीव, पादप कोशिका, जन्तु आदि।

    RBC में केन्द्रक क्यों नहीं पाया जाता?

    प्रश्न – RBC में केन्द्रक क्यों नहीं पाया जाता?

    प्रश्न – लाल रक्त कोशिका में केन्द्रक का न होना कितना फायदेमंद है ?

    उत्तर – लाल रक्त कोशिका (RBC – red blood cells) में केंद्रक का अनुपस्थिति होना लाल रक्त कोशिकाओं को अपना कार्य करने के लिय अनुकूलन बनाता है। यह लाल रक्त कोशिका को अधिक हीमोग्लोबिन रखने की अनुमति देता है और इसलिए, यह अधिक ऑक्सीजन अणु ले जाता है। यह कोशिका को अपने विशिष्ट द्वि-अवतल आकार (distinctive bi-concave shape) की भी अनुमति देता है जो प्रसार में सहायता करता है।

    प्रश्नों के उत्तर

    कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) से जुड़े महत्वपुर्ण प्रश्न

    निम्न महत्वपूर्ण प्रश्नों के जवाब आपको इस आर्टिकल में मिलेगे :

    केन्द्रक क्या है ?

    कोशिकीय केन्द्रक (Cell Nucleus) क्या है ?

    केन्द्रक का कोशिका में क्या कार्य है ?

    केन्द्रक के कितने भाग होते है ?

    केन्द्रक की सरंचना और कार्य क्या है ?

    केन्द्रक छिद्र क्या है ?

    कोशिका के केंद्र में विधमान तरल पदार्थ क्या कहलाता है ?

    केन्द्रक का चित्र

    केन्द्रक झिल्ली या केन्द्रक कला किसे कहते है ?

    केन्द्रक द्रव्य (Nucleoplasm or nuclear sap) क्या है ?

    केन्द्रिका (Nucleolus) क्या है ?

    क्रोमैटिन धागे(Chromatin threads) क्या है ?

    गुणसूत्र क्या होते है और उनके प्रकार क्या है ?

    बिना नाभिकीय झिल्ली वाली कोशिका का कहलाती है ?

    केन्द्रक को कोशिका का निदेशक (Director of cell) क्यों कहा जाता है ?

  • वैज्ञानिकों ने खोजा शरीर का नया अंग

    वैज्ञानिकों ने खोजा शरीर का नया अंग

    वैज्ञानिकों ने हाल ही में शरीर के एक ऐसे हिस्से का खुलासा किया है जिसका वर्णन पहले कभी नहीं किया गया था | मास्सेटर में मांसपेशियों की एक गहरी परत, जो निचले जबड़े को ऊपर उठाती है और चबाने के लिए महत्वपूर्ण होती है। आधुनिक शरीर रचना विज्ञान पाठ्यपुस्तकों में दो परतों, एक गहरी और एक सतही होने के रूप में बड़े पैमाने पर पेशी का वर्णन किया गया है।

    “हालांकि, कुछ ऐतिहासिक ग्रंथों में तीसरी परत के संभावित अस्तित्व का भी उल्लेख है, लेकिन वे इसकी स्थिति के अनुसार बेहद असंगत हैं,” एनाटॉमी का इतिहास पत्रिका के ऑनलाइन संस्करण में 2 दिसंबर को प्रकाशित एक नई रिपोर्ट में लेखकों ने लिखा है। इसलिए टीम ने यह जांचने का फैसला किया कि क्या प्रमुख जबड़े की मांसपेशियों में एक छिपी, सुपर-गहरी परत हो सकती है, जैसा कि ऐतिहासिक ग्रंथों से पता चलता है।

    ऐसा करने के लिए, उन्होंने 12 मानव शवों के सिरों को विच्छेदित किया जिन्हें फॉर्मलाडेहाइड में संरक्षित किया गया था; रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने 16 “ताजा” शवों का सीटी स्कैन भी लिया और एक जीवित विषय से एमआरआई स्कैन की समीक्षा की। इन परीक्षाओं के माध्यम से, उन्होंने द्रव्यमान पेशी की “शारीरिक रूप से विशिष्ट” तीसरी परत की पहचान की।

  • हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) की सरंचना एवं कार्यों का वर्णन | Chloroplast in Hindi (हरित लवक की सम्पूर्ण जानकारी in Hindi)

    हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) की सरंचना एवं कार्यों का वर्णन | Chloroplast in Hindi (हरित लवक की सम्पूर्ण जानकारी in Hindi)

    इस आर्टिकल में हम जानेगें कि हरित लवक या क्लोरोप्लास्ट क्या होते है ? हरित लवक या क्लोरोप्लास्ट की सरंचना कैसी होती है ? हरित लवक या क्लोरोप्लास्ट के प्रमुख कार्य क्या है ? हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) को पादप कोशिका का रसोईघर क्यों कहा जाता है ? आदि

    हरित लवक को समझने के लिए सबसे पहले हम जानेगे कि लवक क्या होते है ?

    लवक पादप कोशिकाओं के कोशिका द्रव में पाए जाने वाले गोल या अंडाकार रचना हैं । इनमें पादपों के लिए महत्त्वपूर्ण रसायनों का निर्माण होता है। लवक तीन प्रकार के अर्थात् हरितलवक (Chloroplast) , अवर्णी लवक ((Leucoplast) तथा वर्णी लवक (Chromoplasts) होते हैं।

    हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट – Chloroplast) क्या होते है ?

    जिस लवक में पर्णहरित ( क्लोरोफिल ) वर्णक होता है, उसे हरित लवक ( क्लोरोप्लास्ट ) कहते है। इनके कारण पत्तियों का रंग हरा होता है जिससे पेड़ पौधे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा भोजन बनाते है।

    हरितलवक दोहरी झिल्ली से परिबद्ध कोशिकांग है। हरितलवक ऐसा कोशिकांग है जो सौर ऊर्जा यानी प्रकाशीय ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलता है। हरित लवक केवल सुकेन्द्रिक पादप कोशिकाओं में और शैवालीय कोशिकाओं में पाए जाते है। माना जाता है कि नील हरित शैवाल नाम के जीवाणुओं से हरितलवकों का विकास हुआ।

    1883 में, एंड्रियास फ्रांज विल्हेम शिम्पर (Andreas Franz Wilhelm Schimper ) ने हरितलवक को “क्लोरोप्लास्टिड्स” (क्लोरोप्लास्टिडन) (chloroplastids” (Chloroplastiden) का नाम दिया | 1884 में, एडुआर्ड स्ट्रासबर्गर (Eduard Strasburger ) ने इसे “क्लोरोप्लास्ट” (क्लोरोप्लास्टन) नाम दिया ।

    हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) की सरंचना

    हरितलवक की आन्तरिक संरचना जटिल होती है। हरितलवक दोहरे झिल्ली से घिरे होते हैं, जो लाइपोप्रोटीन की बनी होती है। प्रत्येक झिल्ली की मोटाई 50A° होती है। इनकी चौड़ाई 10A° से 30A° तक हो सकती है। इसके अन्दर की ओर एक तरल पारदर्शी दानेदार पदार्थ होता है, जिसे स्ट्रोमा कहा जाता है। इस स्ट्रोमा में अनेक एन्जाइम, राइबोसोम आदि पदार्थ पाए जाते हैं।

    माइटोकॉण्ड्रिया की तरह लवक में अपना DNA और राइबोसोम होते हैं।

    शैवालों में यह सर्पिलाकार, फीतासदृश, प्यालेनुमा, ताराकार, मेखला या पट्टिकावत या बिम्ब सदृश होते हैं। उच्च विकसित पौधों में ये गोलाकार, अण्डाकार लम्बे या बिम्बाकार होते हैं। ये 2μ से 8μ तक या कभी-कभी 100μ तक लम्बे तथा 3μ से 6μ तक व्यास वाले (मोटे) होते हैं।

    वस्तुतः इसमें बाहरी झिल्ली सपाट परन्तु भीतरी झिल्ली गोल पटलिका होती है, जिसे थायलेकॉइड कहते हैं। अनेक स्थानों पर यह थायलेकॉइड एक के ऊपर लगी होती है, जो ग्रेनम कहलाती है। ग्रेनाओं को जोड़ने वाली पटलिकाएँ स्ट्रोमा पटलिकाएँ कहलाती हैं।

    प्रत्येक थाइलेकयिड दो इकाई कलाओं की बनी होती है। इसके दोनों बाहरी स्तर प्रोटीन के अणुओं के बने होते हैं। इनके मध्य में पर्णहरित (chlorophyll) तथा फॉस्फोलिपिड के स्तर होते हैं। पर्णहरित के प्रत्येक अणु में एक शीर्ष तथा एक पूँछ होती है।

    थाइलेकॉयड की कला पर छोटे-छोटे दाने उपस्थित होते हैं, जिन्हें क्वान्टासोम (quantasome) कहते हैं। ये प्रकाश अभिक्रिया की सबसे छोटी और आधारभूत इकाई हैं। प्रत्येक क्वान्टासोम में लगभग 200 अणु पर्णहरिम होते हैं।

    हरितलवक में प्रकाश-संश्लेषण की प्रकाशिक अभिक्रिया ग्रेना में, जबकि प्रकाशहीन अभिक्रिया स्ट्रोमा में होती है।

    हरितलवकों में पर्णहरिम के साथ-साथ सामान्यतया पर्णपीतक (कैरोटिन -carotene) व पर्णपीत (जैन्थोफिल-xanthophyll) वर्णक भी पाये जाते हैं। हरितलवक में प्रकाश-संश्लेषण सम्बन्धी एन्जाइम, सहएन्जाइएम विटामिन E व K तथा सूक्ष्म मात्रा में Mg, Fe, Cu, Mn व Zn भी यौगिकों के रूप में मिलते हैं।

    हरितलवक का रासायनिक विश्लेषण

    हरितलवक के रासायनिक विश्लेषण में पाया गया है कि इसके शुष्क भार में 30-35% प्रोटीन होता है, जिसमें 80% अघुलनशील प्रोटीन होता है। लिपिड्स में वसा 50% स्टीरॉल 20%, मोम 16% तथा फॉस्फेट 2.7% तक होते हैं। दो प्रकार के पर्णहरिम-a (पीला) 75% एवं पर्णहरिम-b (हरा-कला) 25% होता है। जैन्थोफिल 75% व कैरीटीन 25% होता है। हरितलवक में RNA 3-4% तक तथा DNA 0.02-0.1% तक होता है।

    हरित लवक (क्लोरोप्लास्ट) की विशेषताएं

    हरित लवक केवल पादप कोशिकाओं में और शैवालीय कोशिकाओं में पाए जाते है।

    हरित लवक जन्तुओं में अनुपस्थित होते हैं।

    पत्तियों में इनकी मात्रा सबसे अधिक होती है विभिन्न जाति के पौधों में इनका आकार अलगअलग होता है।

    हरे रंग के पदार्थ हरितलवक के कारण इसका रंग हरा होता है।

    हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) को पादप कोशिका की रसोईघर क्यों कहा जाता है ?

    हरितलवक कोशिका का वह कोशिकांग है जहां प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा कार्बोहाइड्रेट का संश्लेषण होता है और भोजन बनाता है। इसलिए हरितलवक को पादप कोशिका की रसोई कहते हैं।

    हरित लवक के प्रमुख कार्य

    हरित लवक प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा कार्बोहाइड्रेटस का निर्माण करते हैं। इनमें ग्लूकोज से मण्ड, प्रोटीन, वसाएँ, विटामिन हार्मोन्स आदि का निर्माण भी होता है।

    जल का आयनीकरण एवं CO2 अपचयन के लिए NADPH + H+ की उपलब्धि कराना हरितलवक का ही कार्य है।

    जल के आयनीकरण से प्राप्त ऑक्सीजन को प्रत्येक जीवधारी के लिए श्वसन हेतु उपलब्ध कराना भी हरित लवक का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है।

    प्रकाश संश्लेषण की प्रकाश अभिक्रिया फॉस्फोरिलेशन व हिल अभिक्रिया क्वान्टासोमों में होती है। हाइड्रोजन का स्थानान्तरण स्ट्रोमा में होता है।

    हरित लवक प्रकाश ऊर्जा को फोटॉन (photon) के रूप में अवशोषित करता है और एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट (Adenosine triphosphate – ATP (एटीपी) बनते हैं। एटीपी को क्लोरोप्लास्ट के थायलाकोइड झिल्ली में संश्लेषित किया जाता है।

  • लवक – हरित लवक, वर्णीलवक, अवर्णीलवक की संरचना और कार्य  | Plastid in Hindi (लवक की सम्पूर्ण जानकारी in Hindi)

    लवक – हरित लवक, वर्णीलवक, अवर्णीलवक की संरचना और कार्य | Plastid in Hindi (लवक की सम्पूर्ण जानकारी in Hindi)

    लवक (Plastid) क्या होता है ? What is Plastid ?

    लवक केवल पादप कोशिकाओं में स्थित होते हैं। लवक पादप कोशिकाओं के कोशिका द्रव में पाए जाने वाले गोल या अंडाकार रचना हैं । इनमें पादपों के लिए महत्त्वपूर्ण रसायनों का निर्माण होता है। लवक तीन प्रकार के अर्थात् हरितलवक (Chloroplast) , अवर्णी लवक ((Leucoplast) तथा वर्णी लवक (Chromoplasts) होते हैं।

    हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) नामक हरे रंग के लवक में जीव जगत की सबसे महत्त्वपूर्ण जैव रासायनिक क्रिया प्रकाश-संश्लेषण होती है। हरे रंग को छोड़कर अन्य रंगों वाले लवकों को वर्णी लवक (क्रोमोप्लास्ट) कहते हैं, इनसे ही फूलों एवं फलों को रंग प्राप्त होता है। रंगहीन लवकों को अवर्णी लवक (लिउकोप्लास्ट) कहते हैं जिनका मुख्य कार्य भोजन संग्रह में मदद करना है। आकृति यह अंडाकार गोलाकार तन्तुनुमा होता है जो पूरे कोशिका द्रव्य मे फैले रहता है जो दो पर्टो से घिरा रहता है। इसके भीतर पाए जाने वाले खाली स्थान को stroma कहते है जो एक तरल पदार्थ से भरा रहता है जिसे matrix कहाँ जाता है।

    लवक कितने प्रकार के होते है ?

    लवक तीन प्रकार के होते है :

    1. हरितलवक (Chloroplast)
    2. अवर्णी लवक (Leucoplast)
    3. वर्णी लवक (Chromoplasts)

    हरितलवक (Chloroplast)

    हरे रंग के पदार्थ हरितलवक के कारण इसका रंग हरा होता है। यह हरितलवक दोहरे झिल्ली से घिरे होते हैं, जो लाइपोप्रोटीन की बनी होती है। इसके अन्दर की ओर एक तरल पारदर्शी पदार्थ होता है, जिसे स्ट्रोमा कहा जाता है। इस स्ट्रोमा में अनेक एन्जाइम, राइबोसोम आदि पदार्थ पाए जाते हैं। माइटोकॉण्ड्रिया की तरह लवक में अपना DNA और राइबोसोम होते हैं।

    वस्तुतः इसमें बाहरी झिल्ली सपाट परन्तु भीतरी झिल्ली गोल पटलिका होती है, जिसे थायलेकॉइड कहते हैं। अनेक स्थानों पर यह थायलेकॉइड एक के ऊपर लगी होती है, जो ग्रेनम कहलाती है। ग्रेनाओं को जोड़ने वाली पटलिकाएँ स्ट्रोमा पटलिकाएँ कहलाती हैं।

    थायलेकॉइड की भीतरी सतह पर क्वान्टासोम पाए जाते हैं, जिसमें हरितलवक अणु होते हैं ये प्रकाश-संश्लेषण की आधारभूत इकाई है। इसे पादप कोशिका का रसोईघर कहा जाता है। हरितलवक में प्रकाश-संश्लेषण की प्रकाशिक अभिक्रिया ग्रेना में, जबकि प्रकाशहीन अभिक्रिया स्ट्रोमा में होती है।

    क्लोरोप्लास्ट वाली पादप कोशिकाएँ

    हरितलवक को आकृति के आधार पर वर्गीकरण निम्न है :

    • क्लोमाइडोमोनास –   कपनुमा
    • स्पाइरोगाइरा (तालाब की रेशम ) – फीताकार
    • ऊडोगोनियम –  जालिकावृत
    • यूलोथ्रिक्स (तालाब की ऊन ) – मेखलाकार
    • उच्च पादप – अण्डकार या तश्तरीनुमा
    • जिग्नीमा – तारकार स्टार्च कार

    अवर्णी लवक (Leucoplast)

    यह एक रंगहीन लवक, जो जड़ों और भूमिगत तनों में पाए जाते हैं। ये स्टार्च के रूप में भोजन का संग्रह करते हैं, ये मुख्यतया तीन ये प्रकार के होते हैं :

    अवर्णी लवक (ल्यूकोप्लास्ट) को तीन भागों में बांट गया है।

    a. एमाइलोप्लास्ट
    b. एलयुरोप्लास्ट
    c. इलियोप्लास्ट

    एमाइलोप्लास्ट, जो जड़ों भूमिगत तनों तथा चावल, गेहूँ तथा मक्का के बीज में पाए जाते हैं तथा स्टार्च का संग्रहण करते हैं। इलायोप्लास्ट बीज में वसा का संग्रहण करते हैं। प्रोटीनोप्लास्ट, इनमें प्रोटीन संग्रहण होता है, जो बीजों में पाए जाते हैं।

    अवर्णी लवक ( एमाइलोप्लास्ट )

    वर्णी लवक (Chromoplasts)

    ये पौधों के रंगीन भागों, पुष्पों की पंखुड़ियों तथा फलों की भित्तियों में पाए जाते हैं। ये पीले, लाल तथा नारंगी रंग के लवक हैं।

    उदाहरण टमाटर में लाइकोपेन, गाजर में कैरोटीन, चुकन्दर में विटानीन आदि वर्णक के कारण इसका रंग निर्धारित होता है।

    वर्णीलवक के उदाहरण निम्न है :

    • टमाटर का लाल रंग लाइकोपीन (Lycopene) लवक के कारण
    • गाजर में कैरोटीन (Carotine)  के कारण
    • चुकन्दर में बिटानीन (Betanin)  के कारण
    • मिर्च का लाल रंग कैप्सेथीन  के कारण
  • माइक्रोबॉडीज (Microbodies) क्या है ? माइक्रोबॉडीज की सरंचना,  प्रकार एवं कार्य (in Hindi)

    माइक्रोबॉडीज (Microbodies) क्या है ? माइक्रोबॉडीज की सरंचना, प्रकार एवं कार्य (in Hindi)

    इस आर्टिकल में हम बात करेगें माइक्रोबॉडीज के बारे में | माइक्रोबॉडीज क्या होते है ? माइक्रोबॉडीज का हमारे शरीर में क्या कार्य होता है ? माइक्रोबॉडीज के प्रकार और सरंचना क्या होती है आदि |

    माइक्रोबॉडीज (Microbodies) क्या है ?

    ये इकाई झिल्ली युक्त छोटे कोशिकांग हैं, जो ऑक्सीकरण क्रियाओं (श्वसन के अतिरक्त अन्य) में भाग लेते हैं। इनमें क्रिस्टलीय कोर तथा कणीय मैट्रिक्स होता है। यह परॉक्सीसोम तथा ग्लाइऑक्सीसोम प्रकार का होता है। ग्लाइऑक्सीसोम्स, ग्लाइऑक्सीलेट चक्र द्वारा वसा के ऑक्सीकरण में भाग लेता है, जबकि परॉक्सीसोम प्रकाश श्वसन में भाग लेता है इसमें उपस्थित कैटेलेज एन्जाइम हाइड्रोजन परॉक्साइड के विघटन का कार्य करता है। ये पौधों, प्रोटोजोआ, और जानवरों की कोशिकाओं में पाया जाता है।

    माइक्रोबॉडीज एक परत वाली झिल्ली से घिरी थैलियां होती है । यह कोशिका के कोशिका द्रव्य (cytoplasm) में पाए जाते हैं, और केवल इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप के उपयोग से ही दिखाई देते हैं। इनका निर्माण एंडोप्लास्मिक जालिका वGalgi bodies से थैलियों(Vesicles) के टूटने से होता है। यह छोटे अंगक (Small Organelles) लगभग 0.2-1.5 माइक्रोमीटर व्यास के होते हैं । ये एक एकल फॉस्फोलिपिड बाइलेयर झिल्ली से घिरे होते है  और उनमें एंजाइम और अन्य प्रोटीन सहित इंट्रासेल्युलर सामग्री का एक मैट्रिक्स होता है, लेकिन उनमें कोई आनुवंशिक सामग्री नहीं होती है जो उन्हें स्वयं-प्रतिकृति की अनुमति देती है। 

    माइक्रोबॉडीज कितने प्रकार के होते है ? (Type of Microbodies)

    माइक्रोबॉडीज के दो प्रकार होते हैं –

    1. परऑक्सीसोम (Peroxisome)
    2. ग्लाइऑक्सीसोम (Glyoxysomes)

    परऑक्सीसोम (Peroxisome)

    ये (0.3-1.5μm) व्यास के लगभग सूक्ष्म गोलाकार कोशिकांग है जो एक परत वाली झिल्ली (Single Layered Membrane) से घिरे होते हैं । इनकी खोज Tolbert ने 1969 में की थी। 

    परऑक्सीसोम का निर्माण golgi bodies से न होकर पूर्व स्थित pre existing Peroxisome से होता है। 

    यह उन पौधों में पाये जाते हैं जिनमे प्रकाश श्वसन की क्रिया होती है । प्रकाश श्वसन की क्रिया कुछ ही पौधों मे होती है क्योंकि कुछ पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में  कार्बन डाई आक्साइड  निकालते है।

    जंतु कोशिका में यह Liver  एवं किडनी में तथा प्रोटोजोआ में पाए जाते हैं । इसमें भी लाइसोसोम के समान एंजाइम्स पाए जाते हैं जिसमें ऑक्सीडेस तथा कैटालेस मुख्य है । 

    उपापचय क्रियाओं में ऑक्सीडेस एंजाइम आणविक ऑक्सीजन लेकर हाइड्रोजन पराक्साइड का निर्माण करते हैं। 

    कैटालेस एंजाइम उपापचय (Metabolism) के फलस्वरुप कोशिका में उत्पन्न होने वाले विषैले पदार्थ हाइड्रोजन पराक्साइड का विघटन कर देते हैं।

    कैटालेस enzyme कोशिका द्रव्य में आने वाले अन्य विषैले पदार्थों को जैसे अल्कोहलिक पेय पदार्थों और अनेक ड्रग्स का भी विघटन कर देते हैं। इसके साथ ही जंतु कोशिकाओं में वसा उपापचय का भी कार्य Peroxisomes ही करते हैं। 

    इनमें सूक्ष्म कणिकाओं वाली मैट्रिक्स (Metrix of Fine Granules) होती है जिनके केंद्र में एक समांग (Homogeneous) तथा अपारदर्शी कोर होती है। इनमें ग्लाइकोलिक अम्ल ऑक्सीडेस, Peroxidase,कैटालेस आदि अधिक मात्रा में पाए जाते हैं।

    प्रकाश श्वसन की क्रिया हरित लवक Peroxisome तथा माइटोकॉन्ड्रिया तीनों में मिलकर होती है। यह अनुक्रम प्रकाश पर निर्भर करता है और इसमें ऑक्सीजन ली जाती है। यह क्रिया प्रकाश की तीव्रता, कार्बन डाइऑक्साइड की कम सांद्रता तथा ऑक्सीजन की अधिक संस्था द्वारा Stimulate होती है। ऐसी स्थिति में हरित लवक में उत्पन्न ग्लाइकोलिक अम्ल के आधिक्य (Excess) में अणु बाहर निकलकर Peroxisome में प्रवेश करते हैं जहां उनका ऑक्सीकरण होता है।

    ग्लाइऑक्सीसोम (Glyoxysomes)

    ग्लाइऑक्सीसोम की खोज Beevers ने 1961 में की थी। यह भी एक सूक्ष्म गोलाकार कोशिकांग हैं जो एक परत वाली झिल्ली के बने होते हैं। यह प्रायः वसीय बीजों, जैसे मूंगफली तथा अरंङ की कोशिकाओं में जहां पर वसा का कार्बोहाइड्रेट में परिवर्तन होता है, पाए जाते हैं। इनमें आइसोसिट्रिक लायेस, मेलेट सिंथेटेस आदि एंजाइम्स पाए जाते हैं। वसा का कार्बोहाइड्रेट में परिवर्तन ग्लाइऑक्सीसोम में पाए जाने वाले ग्लाइऑक्सिलेट चक्र द्वारा होता है।

    माइक्रोबॉडीज के कार्य (Function of Microbodies)

    विभिन्न प्रकार के माइक्रोबॉडीज विभिन्न विशिष्ट कार्य करते हैं:

    • कोशिका में माइक्रोबॉडीज विभिन्न जैव रासायनिक प्रतिक्रियाओं में भाग लेते हैं
    • माइक्रोबॉडीज में मौजूद एंजाइम विभिन्न आवश्यक प्रतिक्रियाओं की सुविधा प्रदान करते हैं, उदा। वसा, अमीनो एसिड,अल्कोहोल (alcohol ), आदि का टूटना।
    • वे पौधों में प्रकाश-श्वसन में शामिल होते हैं
    • पेरोक्साइड का डेटोफिक्सेशन (Detoxification) माइक्रोबॉडीज में होता है
  • अब तक का सबसे पावरफुल James Webb Telescope लॉन्च, हबल टेलीस्कोप की जगह लेगा

    अब तक का सबसे पावरफुल James Webb Telescope लॉन्च, हबल टेलीस्कोप की जगह लेगा

    नासा (NASA) ने 25 दिसंबर 2021 को अब तक का सबसे शक्तिशाली टेलीस्कोप जेम्स वेब टेलीस्कोप (James Webb telescope) सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया, इस टेलीस्कोप को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी का अगला बड़ा स्पेस मिशन कहा जा रहा है

    जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप अब हबल टेलीस्कोप की जगह लेगा. NASA ने JWST को एरियन-5 ईसीए (Ariane 5 ECA) रॉकेट से लॉन्च किया. लॉन्चिंग फ्रेंच गुएना स्थित कोरोऊ लॉन्च स्टेशन से की गई.

    James Webb Telescope के उद्देश्य

    • इस टेलीस्कोप को सोलर सिस्टम के रहस्यों को सुलझाने में मदद करने के लिए डिजाइन किया गया है. ये धरती से अलग दूसरी दुनिया और सितारों के बारे में जानकारी देगा. हमारे ब्रह्मांड की रहस्यमय संरचनाओं और उत्पत्ति के बारे में भी पता लगाएगा
    • यह टेलीस्कोप ब्रह्मांड की सुदूर गहराइयों में मौजूद आकाशगंगाओं, एस्टेरॉयड, ब्लैक होल्स और सौर मंडलों आदि की खोज में मदद करेगी.
    • जेम्स वेब टेलीस्कोप का इस्तेमाल आज करीब 13.5 अरब साल पहले प्रारंभिक ब्रह्मांड में पैदा हुई पहली गैलेक्सीज को देखने के लिए होगा
    • इसके साथ ही ये टेलीस्कोप सितारों, एक्सोप्लैनेट और सोलर सिस्टम के चंद्रमाओं और ग्रहों के स्रोतों का निरीक्षण करेगा
    • टेलीस्कोप में हबल की तुलना में व्यापक स्पेक्ट्रम व्यू है और ये सोलर सिस्टम की कक्षा में भी देख सकेगा.
  • रिक्तिका या रसधानियाँ क्या होती है ? रिक्तिका के लक्षण, विशेषताएं एवं कार्य | Vacuoles – वेक्यूल in Hindi

    रिक्तिका या रसधानियाँ क्या होती है ? रिक्तिका के लक्षण, विशेषताएं एवं कार्य | Vacuoles – वेक्यूल in Hindi

    इस आर्टिकल में हम जानेंगे की रिक्तिका जिन्हें रसधानियाँ भी कहा जाता है क्या होती है ? रिक्तिका (Vacuoles) के लक्षण, विशेषताएं एवं कार्य क्या है ? आदि

    रिक्तिका (Vacuoles) किसे कहते है ? रसधानियाँ क्या है ?

    कोशिका की रसधानियाँ (vacuoles) यानी रिक्तिकाएं इकहरी झिल्ली (टोनोप्लास्ट) से घिरी तथा तरल पदार्थों से भरी रचनाएँ होती हैं। पादप कोशिका में, यह बड़े आकार में, जबकि जन्तु कोशिका में ये अनेक और बहुत ही छोटे आकार में होती है।बहुक्रियाशील ऑर्गेनेल सभी पौधों और कवक की कोशिकाओं में पाए जाते हैं, साथ ही कुछ प्रोटिस्ट, पशु और बैक्टीरिया कोशिकाओं में भी पाए जाते हैं | रिक्तिका सबसे महत्वपूर्ण सेल ऑर्गेनेल (कोशिकांग) में से एक है और कई कार्य करता है, जिसमें शामिल हैं: जल अवशोषण, सेल रंग, चयापचय से विषाक्त पदार्थों को हटाने, पोषक तत्वों का भंडारण आदि |

    रिक्तिकाएं/रसधानियाँ छोटी अथवा बड़ी हो सकती हैं। इनके अंदर ठोस या तरल पदार्थ भरा रहता है। जन्तु कोशिकाओं में रसधानियाँ छोटी होती हैं जबकि पादप कोशिकाओं में ये बड़ी होती हैं।

    “रिक्तिका” शब्द “लैटिन” “वेकस” से आया है जिसका अर्थ है “रिक्त”, क्योंकि ये माइक्रोस्कोप के साथ देखे जाने पर एक खाली जेब की तरह दिखते हैं.

    दरअसल, कोशिका के साइटोप्लाज्म में रिक्तिकाएं छोटे डिब्बे होते हैं, हालांकि, इन्हें मानव आंख द्वारा देखा जा सकता है, इनमें रसायन और एंजाइम होते हैं जो पदार्थों (जैसे कि भोजन और विषाक्त यौगिकों) को निकलने की अनुमति देते हैं।

    रिक्तिका के लक्षण एवं विशेषताएं

    रिक्तिका मुख्य रूप से पानी और अमीनो एसिड से बने होते हैं। इसके अलावा, रिक्तिका के भीतर के तरल पदार्थ में एंजाइम, शक्कर, खनिज लवण (पोटेशियम, सोडियम), ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड और कुछ वर्णक शामिल हैं जो पौधों और फूलों की पत्तियों के रंग के लिए जिम्मेदार हैं ।

    रिक्तिकाएं चारों ओर से एक अर्द्धपारगम्य झिल्ली (लिपिड) से घिरी रहती है, जो नमक के पानी को साइटोप्लाज्म से बाहर रखने की अनुमति देता है। जिसे टोनोप्लास्ट (Tonoplast) कहते हैं।

    वेकॉल्स तब बनते हैं जब एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम द्वारा छोड़े गए पुटिकाएं और गोलगी तंत्र द्वारा छोड़े गए एक एकल अंग में जुड़े होते हैं ।

    रिक्तिका का कोई विशिष्ट आकार या आकार नहीं होता है। ये दो विशेषताएं सेल की व्यक्तिगत जरूरतों पर निर्भर करेंगी।

    नई कोशिकाओं में छोटे रिक्तिका की एक श्रृंखला होती है; हालांकि, जब कोशिका परिपक्व होती है, तो ये छोटे जीव एकल केंद्रीय रिक्तिका में फ्यूज हो जाते हैं।

    केंद्रीय रिक्तिका कोशिका के आयतन का 90% भाग लेती है और 95% रह सकती है जब वह पानी के अवशोषण द्वारा फैलती है।

    पौधों में रिक्तिकाएं जानवरों की कोशिकाओं में लाइसोसोम के समान कार्य करती हैं, क्योंकि दोनों ऐसे थैली होते हैं जिनमें पाचन एंजाइम होते हैं।

    रिक्तिका के कार्य (Function of Vacuoles)

    • रिक्तिका को कोशिका का भण्डार घर कहा जाता है, जिसमें खनिज लवण, शर्करा, कार्बनिक अम्ल, O2 एवं Co2 आदि भरे होते हैं। इसमें स्थित रसधानी रस के कारण ही कोशिकाओं की स्फीति (turgidity) बनी रहती है। इसमें एक वर्णक एन्थोसायनिन पाया जाता है।
    • रिक्तिकाएं उन पोषक तत्वों का स्रोत होती हैं जिन्हें अंकुरण के दौरान बीज की आवश्यकता होती है ।
    • पादप कोशिकाओं की रिक्तिका में कोशिका रस (Cell sap) भरा रहता है जो कि निर्जीव पदार्थ होता है।
    • जन्तु कोशिका में रिक्तिका जल संतुलन का कार्य करती हैं।
    • पादप कोशिका में ये स्फीति (Turgidity) तथा कठोरता प्रदान करती है।
    • रिक्तिका कोशिका के साइटोप्लाज्म की अम्लता को अवशोषित करती है ।
    • रिक्तिकाएं साइटोसोल को विषाक्त पदार्थों, जैसे भारी धातुओं और हर्बिसाइड्स से बचाती हैं ।
    • कुछ एक कोशिकीय जीवों में विशिष्ट रसधानियाँ कुछ अपशिष्ट पदार्थों की शरीर से बाहर निकालने में सहायक होती हैं। पादप कोशिका का यह 90 प्रतिशत स्थान घेरता है।
    • इनमें भोज्य पदार्थ संचित रहते हैं। जलीय पौधों की रसधानियाँ गैसयुक्त होकर पौधों को तैरने में मदद करती हैं।
    • रिक्तिकाएं कवक एवं पौधों की कोशिकाओं के छोटे पुटिका होते हैं जो पानी शर्करा जैसे विभिन्न पदार्थों के भंडारण की अनुमति देते हैं। कई पुटिकाओं का संलयन रिक्तिका के विकास की अनुमति प्रदान करता है, जिनके समोच्च को प्लाज्मा झिल्ली द्वारा सीमांकित किया जाता है।
    • टर्गर एक घटना है जो तब होती है जब कोशिका आंतरिक तरल पदार्थ द्वारा निकाले गए बल के कारण सूज जाती है ।
    • यह घटना सेल की दीवार पर अधिक दबाव उत्पन्न करती है। रिक्तिकाएं पानी (हाइड्रोस्टेटिक दबाव) का उपयोग करके इस दबाव का हिस्सा छोड़ती हैं, जो सेल और पौधे की कठोरता को बनाए रखने में मदद करता है ।
    • जानवरों के विपरीत, पौधों में स्वयं उत्सर्जन की प्रणाली नहीं होती है, इसलिए यह अपशिष्ट और विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने के अन्य तरीकों पर निर्भर करता है ।
    • कोशिका अणु से छुटकारा पाने के लिए रिक्तिका का उपयोग करती है जिसकी उसे आवश्यकता नहीं है। इसे प्राप्त करने के लिए, रिक्तिका अवांछित तत्व को अवशोषित करती है और बाद में, सेल की दीवार की ओर बढ़ती है ।
    • एक बार सेल की दीवार में, रिक्तिका इसके साथ फ़्यूज़ हो जाती है, “कचरा” खोला और निष्कासित कर दिया जाता है। फिर, यह अंग कोशिका की दीवार से बंद हो जाता है और अलग हो जाता है ।
    • रिक्तिका के अंदर अम्लीय वातावरण, साथ ही साथ इस अंग में मौजूद एंजाइम बड़े अणुओं को ख़राब करने में मदद करते हैं जिन्हें रिक्तिका में भेजा जाता है ।
    • टोनोप्लास्ट साइटोप्लाज्म से रिक्तिका में हाइड्रोजन आयनों को ले जाने में हस्तक्षेप करता है, जिससे पर्यावरण की अम्लता बढ़ जाती है। इस अर्थ में, वेक्यूल जानवरों की कोशिकाओं में लाइसोसोम जैसा दिखता है ।
  • सेन्ट्रोसोम तारककाय (Centrosome) क्या है | तारककाय की खोज, कार्य और रासायनिक संगठन Centrioles ( सेन्ट्रियोल्स) in Hindi

    सेन्ट्रोसोम तारककाय (Centrosome) क्या है | तारककाय की खोज, कार्य और रासायनिक संगठन Centrioles ( सेन्ट्रियोल्स) in Hindi

    इस आर्टिकल में हम जानेगें की तारककाय यानी सेन्ट्रोसोम (Centrosome) जिसे तारककेंद्र भी कहते है क्या होता है ? तारककाय ( सेन्ट्रोसोम) की सरंचना क्या है ? तारककाय ( सेन्ट्रोसोम) का सायनिक संगठन क्या है ? तारककाय ( सेन्ट्रोसोम) के प्रमुख कार्य क्या है ? आदि

    सेन्ट्रोसोम तारककाय (Centrosome) क्या है ?

    यह मुख्य रूप से जंतु कोशिका में केंद्र के निकट तारे समान आकृति में पाई जाती है । इसके अलावा कुछ शैवालों तथा कवकों में दो जोड़े सेन्ट्रियोल्स (Centrioles) की बनी एक रचना होती है इसलिए इसे डिप्लोसोम (Diplosome) भी कहा जाता है। यह खोखली सूक्ष्मबेलनाकार रचनाएं होती है।तो एक युग्म के रूप में उपस्थित रहतीं हैं।

    प्रत्येक सेन्ट्रियोल्स सूक्ष्मनलिकाओं से निर्मित तीन तन्तुओं के नौ समूहों का बना होता है दो जोड़े सेन्ट्रियोल्स (तारककेन्द्रों) सेन्ट्रोस्फीयर (Centrosphere) से घिरे होते हैं। इस सम्पूर्ण रचना को सेन्ट्रोसोम कहा जाता है। कोशिका विभाजन के समय सेन्ट्रोसोम दो जोड़े सेन्ट्रियोल्स में विभाजित हो जाता है, जो दो विपरीत ध्रुवों पर चले जाते हैं।

    तारककाय सेन्ट्रोसोम की खोज

    सेंट्रोसोम की खोज संयुक्त रूप से वाल्थर फ्लेमिंग ने 1875 में [12] [13] और एडौर्ड वैन बेनेडेन ने 1876 में की थी और बाद में बाद में थियोडोर बोवेरी (T. Boweri) द्वारा इसका वर्णन और नामकरण तारककाय (सेन्ट्रोसोम) 1888 में किया गया।

    तारककाय (सेन्ट्रोसोम) की संरचना (Structure)

    प्रत्येह सेन्ट्रोसोम दो जोड़े तारककेन्द्रों (Centrioles) का बना होता है प्रत्येक जोड़े के दो सेन्ट्रिओल डिप्लोसोम(Diplosome) कहलाते है तथा एक-दूसरे से 90° का कोण बनाते हुए स्थित होते है।

    प्रत्येक तारककेन्द्रों (centrioles) त्रिक तन्तुओं (Triplet Fibres) के नौ समूहों (Nine Sets) का बना होता है।

    यह त्रिक तन्तु एक मध्य नाभि(Hub) के चारों ओर स्थित होते है। प्रत्येक त्रिक तन्तु  में तीन सूक्ष्म नलिकाएँ (Microtubules) एक रेखा में स्थित होती है। इस प्रकार के नौ त्रिक तन्तु रवाहीन(Amorphous), इलेक्ट्रॉनडेन्स पदार्थ में धँसे रहते है। यह इलेक्ट्रॉनडेन्स पदार्थ a नलिकाओं से केंद्रों की ओर जाकर केंद्र में नाभि(Hub) से जुड़ जाता है। प्रत्येक तारक काय कोकली विधि से बनी होती है यह एक या दोनों सिरों से खुली रहती है इसको देखने पर एक गाड़ी के पहिए के जैसी रचना प्रतीत होती है 

    तारक काय के सभी 9 त्रिक समूह एक समान होते हैं।

    सेन्ट्रोस्फीयर (Centriosphere) और डिप्लोसोम (Diplosome)

    कोशिका द्रव्य का क्षेत्र जो डिप्लोसोम को घेरे रहता है उसे सेन्ट्रोस्फीयर (Centrosphere)  कहते हैं। सेन्ट्रोस्फीयर व तारककाय से बनता है सेन्ट्रोसोम कहलाता है।  तारककाय या सेन्ट्रोडल्स का युग्म डिप्लोसोम कहलाता है

    Centrioles में RNA (सम्भवतः DNA) भी उपथित होते है लेकिन इनके कार्य अभी ज्ञात नहीं है।

    तारककाय सेन्ट्रोसोम का रासायनिक संगठन

    तारक काय सूक्ष्म नलिकाओं से रचित होती है। यह सूक्ष्मनलिकाएं ट्यूब्यूलिन (Tubulin ) नामक संरचनात्मक प्रोटीन से बनी होती है।

    तारककाय (सेन्ट्रोसोम) के प्रमुख कार्य  (Main Function of Centrosome)

    • तारक केंद्र कोशिकाओं में सूक्ष्म नलिकाओं के संगठन में सहायक होते हैं
    • शुक्राणु की  पूूंछ के का निर्माण करता है।
    • जंतु कोशिका में कोशिका विभाजन के समय तर्कु तंतुओं का निर्माण करती है।
    • सूक्ष्म जीवो में पाए जाने वाले अंगों जैसे कशाभिका ( Flagella ) व पक्ष्माभ (Cilia ) का निर्माण होता है
    • तारककाय  सूत्री विभाजन(Mitosis) के समय दो जोड़े Centrioles में विभाजित हो जाता है जिसमें से एक जोड़ा Centrioles एक ध्रुव (Pole) पर उसी स्थान पर रह जाता है तथा दूसरा जोड़ा Centrioles घूमकर दूसरे ध्रुव की ओर चला जाता है। इस प्रकार तारककाय (Centrosome) कोशिका विभाजन में भाग लेता है।