अंतरिक्ष मौसम भौतिक विज्ञानी डॉ. तमिथा स्कोव (Dr Tamitha Skov) के मुताबिक, सूरज से सांप के आकार जैसी एक सोलर फ्लेयर (Snake like filament) मंगलवार यानी 19 जुलाई पृथ्वी को हिट करेगी. इससे कई सैटेलाइट प्रभावित हो सकते हैं. जीपीएस, टीवी संचार और रेडियो का काम भी बाधित हो सकता है | यह एक तरह का सौर्य तूफान है जो पृथ्वी को सीधे तौर पर प्रभावित हो सकता है कि मोबाइल जैसी डिवाइस काम करना बंद कर दें |
Direct Hit! A snake-like filament launched as a big #solarstorm while in the Earth-strike zone. NASA predicts impact early July 19. Strong #aurora shows possible with this one, deep into mid-latitudes. Amateur #radio & #GPS users expect signal disruptions on Earth's nightside. pic.twitter.com/7FHgS63xiU
इस सोलर फ्लेयर (Solar flare) से इलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडिएशन और गर्मी बहुत बढ़ जाती है. हालांकि, पृथ्वी पर इससे गर्मी तो नहीं बढ़ेगी, लेकिन इलेक्ट्रो मैग्नेटिक फील्ड पर असर पड़ सकता है और सिगनल बंद हो सकते हैं |
वैज्ञानिकों के मुताबिक, इन दिनों सूरज काफी सक्रिय रहा है. इस वजह से जियोमैग्रेटिक तूफान (Geomagnetic storms) आ रहे हैं. जिसे वैज्ञानिक भाषा में (M class) एम-क्लास और (X class) एक्स-क्लास के फ्लेयर्स बोलते हैं. यह सबसे मजबूत वर्ग की फ्लेयर्स भेज रहा है, क्योंकि इस समय सूरज एक्टिव है. जो अगले 8 सालों तक रहेगा. इस वजह से सौर तूफानों के आने की आशंका बनी रहेगी |
सौर तूफान लाखों किलोमीटर प्रतिघंटे की गति से आता है |
सूरज पर बने धब्बे से कोरोनल मास इजेक्शन (Coronal Mass Ejection- CME) होता है. यानी सूर्य की सतह पर एक तरह का विस्फोट. इससे अंतरिक्ष में कई लाख किलोमीटर प्रति घंटे की गति से एक अरब टन आवेषित कण (Charged Particles) फैलते हैं. ये कण जब धरती से टकराते तब कई सैटेलाइट नेटवर्क, जीपीएस सिस्टम, सैटेलाइट टीवी और रेडियो संचार को बाधित करते हैं |
सूरज पर धब्बे दिखाई देने का कारण
जब सूरज के किसी हिस्से में दूसरे हिस्से की तुलना में गर्मी कम होती है, तब वहां पर धब्बे बन जाते हैं. ये दूर से छोटे-बड़े काले और भूरे रंग के धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं | एक धब्बा कुछ घंटों से लेकर कुछ हफ्तों तक रह सकता है | धब्बों अंदर के अधिक काले भाग को अम्ब्रा (Umbra) और कम काले वाले बाहरी हिस्से को पेन अम्ब्रा (Pen Umbra) कहते हैं |
इस आर्टिकल में फलों से जुड़े सारे तथ्यों के बारे में बात करेगे | फल क्या होते है (What is Fruit), फलों के कितने प्रकार है, फलों की विशेषताएँ क्या क्या है, फलों के क्या गुण है आदि महत्वपुर्ण जानकारी इस आर्टिकल में जानेगे |
फल (Fruits)
फल पादप का मुख्य अंग है फल का निर्माण निषेचन(FERTILIZATION) के पश्चात जायांग के अण्डाशय(OVARY) से होता हैं।परिपक्व अण्डाशय ही फल कहलाता है। फल में मुख्यतया दो भाग फलभित्ति (Pericap) तथा बीज (seed) होते हैं। केवल अण्डाशय से विकसित होने वाले फल सत्य फल (True Fruit) तथा पुष्प के अन्य भाग; जैसे-पुष्पासन, बाह्यदल इत्यादि में विकसित फल कूट फल (false fruit) कहलाते हैं। जैसे – सेब, शहतूत, नाशपाती आदि मे निषेचन के बिना अण्डाशय का फल के रूप में रुपान्तरण अनिषेकफलन कहलाता है।
ये फल प्रायः बीज रहित होते हैं उदाहरण केला, पपीता, नारंगी अंगर, अनानास आदि। फल नए बीजों की रक्षा करता है तथा बीज के प्रकीर्णन में सहायता करता है।
फल की संरचना (STRUCTURE OF FRUITS)
एक फल में फलभित्ती (PERICARP) (Pericarp) और बीज होते हैं। अंडाशय की दीवार से फलभित्ती (PERICARP) विकसित होती है। फलभित्ती को बाह्य फलभित्ती (Epicarp), मध्य फलभित्ती (Mesocarp) और अन्तः फलभित्ती (Endocarp) में विभेदित किया जाता है।
बीज का निर्माण निषेचन के बाद बिजाण्ड (OVULE) से होता हैं। बीजांड का बीजावरण (SEED COAT) फलभित्ती के पास होता है। बाह्य फलभित्ती (Epicarp) – यह सबसे बाहरी स्त्तर होता है। जो पतला नरम या कठोर होता है। यह फल का छिलका बनती है। मध्य फलभित्ती (Mesocarp)– यह मोटी गूदेदार तथा खाने योग्य होती है, जैसी की आम का मध्य का पीला खाने योग्य भाग लेकिन नारियल में रेशेदार जटा होती है। अन्तः फलभित्ती (Endocarp)- यह सबसे भीतरी स्तर है आम नारियल बेर में यह कठोर लेकिन खजूर, संतरा में पतली झिल्ली के रूप में होती है। बीजावरण अन्तः फलभित्ती के पास होता है।
फलों के प्रकार (Type of Fruits)
आवृतबीजियों के फलों में बहुत विभिन्नताएं पाई जाती है, मोटे तौर पर ये तीन श्रेणियों में रखे जाते है |
(i) सरल फल (Simple Fruit)
(ii) गुदेदार फल (Succulent fruits)
(iii) शुष्क फल (Dry Fruit)
सरल फल (Simple Fruit)
ये फल एकाण्डपी या बहुअण्डपी एवं युक्ताण्डपी अण्डाशय से विकसित होते है। ये फल गूदेदार या शुष्क होते हैं। इसके अन्तर्गत मूंगफली, सिंघाड़ा, काजू जैसे शुष्क फल एवं आम, नींबू आदि जैसे गूदेदार फल आते हैं।
अष्ठिफल (Drupe)
यह एकबीजी फल है, जो एकाण्डपी या बहुअण्डपी व युक्ताअण्डपी अण्डाशय से विकसित होते हैं। इन फलों में फलभित्ति बाह्य, मध्य तथा अन्त:फलभित्ति में विभाजित होती है तथा अन्त:फलभित्ति काष्ठीय होती है। उदाहरण आम, बेर, पिस्ता।
बेरी (Berry)
बेरी (Berry) एक या अनेक बीजधारी फल है, जो बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी व उर्ध्ववती या अधोवर्ती अण्डाशय से विकसित होते हैं।
गुदेदार फल (Succulent fruits)
फलभित्ति बाह्य, मध्य तथा अन्तःफलभित्ति में विभेदित होती है।
उदाहरण: टमाटर, पपीता, अंगूर, मिर्च।
पोम (Pome)
यह कूट फल है क्योकि इसमें अण्डाशय के साथ-साथ पुष्पासन भी फल बनाने में सहायता करता है।
मुख्य फल पंचअण्डपी व युक्ताण्डपी अण्डाशय से बनता है, परन्तु खाने योग्य नहीं है, पुष्पासन जो अण्डाशय के चारों ओर रसीला व गुदेदार भाग बनाता है, खाया जाता है। उदाहरण सेब, लौकाटा।
पेपो (Pepo)
यह प्राय बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी, अधोवर्ती तथा भित्तीय बीजाण्डन्यास युक्त अण्डाशय से विकसित होता है। बाह्य फल भित्ति दृढ़ छिलका बनाती है, तथा मध्य व अन्तःफलभित्ति रसीली तथा खाने योग्य होती है। उदाहरण: कुकुरबिटेसी कुल के पौधे।
हेस्पेरिडियम (Hesperidium)
ये फल बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्व अण्डाशय से विकसित होते हैं।
अण्डाशय में स्तम्भीय बीजाण्डन्यास होता है। बाह्य फल भित्ति मोटी एवं छिलके के रूप में होती है, जिसमें अनेक तेल ग्रन्थियाँ पाई जाती है।
अत:फलभित्ति झिल्ली के रूप में प्रत्येक फाँक के ऊपर रहती है, इससे अनेक सरस ग्रन्थिल रोम निकलते हैं, जो फल का खाने योग्य भाग बनाते हैं। उदाहरण सन्तरा, नींबू ।
शुष्क फल (Dry Fruit) के प्रकार
शुष्क फल तीन प्रकार के होते है
(i) स्फोटक
(ii) अस्फोटक
(iii) भिदुरफल
स्फोटक शुष्क फल की विशेषताएँ और प्रकार
इस फल के परिपक्व हो जाने पर फलभित्ति फट जाती है |
स्फोटक शुष्क फल के निम्न प्रकार है :
फली (Legume or pod)
यह उर्ध्ववर्ती, एकाण्डपी, एककोष्ठीय अण्डाशय से विकसित होते हैं परिपक्व फल शिखर से आधार की ओर दोनों सीवन से फटते हैं, उदाहरण: फेबेसी कुल के सदस्य।
फॉलिकिल (Follicle)
यह उर्ध्वर्ती, एकाण्डपी, एककोष्ठीय अण्डाशय से विकसित होते हैं, परन्तु परिपक्व फल अधर सीवन से फटते हैं। उदाहरण: मदार डेल्फिनियम।
सिलिक्यूआ (Siliqua)
यह बहुबीजी तथा द्विकोष्ठी फल है, जो द्विअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्ववर्ती अण्डाशय से विकसित होता है। स्फुटन नीचे से ऊपर की ओर होता है तथा बीज आभाषीपट या रेप्लम पर लगे होते हैं। उदाहरण – क्रूसीफेरी|
सिलिक्यूला (Silicula) छोटे, चौड़े व चपटे सिलिक्यूआ, उदाहरण: कैप्सेला
सम्पुट (Capsule)
यह बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्ववर्ती कभी-कभी अधोवर्ती अण्डाशय से विकसित होता है। इन फलों का स्फुटन विभिन्न प्रकार से होता है । उदाहरण: रन्ध्री-पोस्त, कोष्टविदारक-कपास, षटविदारक-लाइनम, पटभंजक, धतूरा तथा अनुप्रस्थ, पोर्टुलाका
अस्फोटक शुष्क फल की विशेषताएँ और प्रकार
अस्फोटक शुष्क फलों मेंफल के परिपक्व होने पर फलभित्ति नहीं फटती है |
ऐकीन (Achene)
ये फल एककोष्ठीय तथा एकबीजी होते हैं, और एकाण्डपी व उर्ध्ववर्ती अण्डाशय से विकसित होते हैं। इनकी फलभित्ति बीजावरण से अलग होती है। उदाहरण: क्लीमेटिस, नार्विलिया ।
कैरिओप्सिस (Caropsis)
ये एककोष्ठीय तथा एकबीजी फल हैं, जो एकाण्डपी, उर्ध्व अण्डाशय, से विकसित होते हैं, इनकी फलभित्ति बीजावरण से संयुक्त रहती है। उदाहरण- ग्रेमिनी कुल के पौधे ।
सिप्सेला (Cypsella)
ये एककोष्ठीय तथा एकबीजी फल हैं, जो द्विअण्डपी, युक्ताअण्डपी, अधोवर्ती, अण्डाशय से विकसित होते हैं इनकी फलभित्ति बीजावरण से पृथक रहती है इनमें बाह्यदल पैपस के रूप में रूपान्तरित होते हैं जो प्रकीर्णन की पैराशूट प्रक्रिया में सहायक है। उदाहरण: कम्पोजिटी कुल के सदस्य।
नट (Nut)
एककोष्ठीय तथा एकबीजी फल, जो द्वि या बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्ववर्ती अण्डाशय से विकसित होते हैं फलभित्ति कठोर एवं काष्ठीय। उदाहरण: काजू सिंघाड़ा, लीची।
समारा (Samara)
ये एकबीजी फल है, जो द्विअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्व अण्डाशय से विकसित होते हैं। इनकी फलभित्ति पँख के सामन चपटी होती है और वायु द्वारा प्रकणन में सहायक है। उदाहरण: होलोप्टेरा, हिप्टेज
भिदुरफल
परिपक्व होने के साथ-साथ दो बीजों के बीज की फलभित्ति के अन्दर की ओर धँस जाने से फल बहुत से एक बीज युक्त फलांशुकों में विभक्त हो जाते हैं।
लोमेन्टम (Lomentum)
ये फली के रूपान्तरण है, जो एकाण्डपी, एककोष्ठीय तथा उर्ध्व अण्डाशय से विकसित होते हैं। ये एकबीजी फलांशुकों (mericarps) में विभाजित हुए रहते हैं। उदाहरण: मूँगफली, छुईमई, बबूला
रेग्मा (Regma)
ये फल त्रिअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्वअण्डाशय से विकसित होते हैं। फल परिवक्व होने पर तीन अस्फोटी बीजयुक्त गोलाणुओं (Cocci) में विभाजित हो जाते हैं, उदाहरण: रिसिनस, जिरेनियम
क्रीमोकार्प (Cremocarp)
ये फल द्विकोष्ठीय एवं द्विबीजी होते हैं और द्विअण्डपी, युक्ताण्डपी अधोवर्ती अण्डाशय से विकसित होते हैं। अण्डाशय के पकने पर फल दो अस्फोटी भागों में बँट जाता है, जिन्हें फलाँशुक कहते हैं,
उदाहरण: अम्बेलीफेरी कुल के सदस्य।
कार्सेरूलस (Carcerulus)
ये फल द्विअण्डपी या बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्ववर्ती अण्डाशय से विकसित होते हैं। कूट पर के बन जाने से इनमें अनेक एकबीजी फलांशुक बन जाते हैं। उदाहरण: ओसिमम, ऐबूटिलोन ।
द्विसमारा
ये फल द्विअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्व अण्डाशय से विकसित होते हैं। इनमें फलभित्ति फैलकर दो चपटे पक्ष बनाती है। परिपक्व होने पर फल, दो एकबीजी भागों में विभाजित हो जाता है। उदाहरण: एसर, हिप्टेज ।
पुंजफल (Aggregate Fruits)
ये वास्तव में लघुफलों (fruitlets) के समूह हैं, जो बहुअण्डपी, वियुक्ताण्डपी अण्डपों से विकसित होते हैं। प्रत्येक अण्डप (carpel) से एक लघुफल बनता है। ये निम्न प्रकार के होते हैं :
फॉलिकिलों का पुंज (Etaerio of follicles)
इस फल में प्रत्येक लघुफल एक फॉलिकिल होता है, और सभी लघुफल बढ़े हुए पुष्पासन पर एक गुच्छे के रूप में लगे रहते हैं। उदाहरण: मदार, सदाबहार।
सरस फलों का पुंज (Etaerio of Berries)
इसेमें बहुत से सरस फल एक गूदेदार पुष्पासन के चारों ओर लगे रहते हैं। उदाहरण: पॉलीऐल्थिया, शरीफा ।
अष्ठिफलों का पुंज (Etaerio of drupes)
बहुत से छोटे-छोटे अष्ठिफल पुष्प के विभिन्न अण्डपों से विकसित होते हैं, और गूदेदार पुष्पासन पर लगे रहते हैं। उदाहरण: रसभरी।
ऐकीनों का पुंज (Etaerio of Achenes)
प्रत्येक लघुफल ऐकीन होता है। उदाहरण: नारवेलिया, क्लीमेटिस, गुलाब।
संग्रथित फल (Composite Fruit)
(संग्रथित फल सम्पूर्ण पुष्पक्रम से विकसित होते हैं, इन्हें इन्फ्रक्टेसेन्स (Enfructescence) भी कहते हैं।
ये दो प्रकार के होते हैं:
सोरोसिस (Sorosis)
शूकी, स्पेडिक्स या कैटकिन पुष्पक्रमों से विकसित होते हैं। प्रत्येक पुष्प के सहपत्र तथा परिदल मांसल तथा रसीले हो जाते हैं तथा इनका पुष्पावली वृन्त भी मोटा तथा मांसल हो जाता है। उदाहरण कटहल, अनानास, शहतूत।
साइकोनस (Syconus)
यह हाइपेन्थोडियम पुष्पक्रम से विकसित होता है। आशय नाशपाती के आकार की खोखली गुहा बनाते हैं, जिसके ऊपर छोटे-छोटे शल्कों से घिरा एक छिद्र होता है। पुष्पासन गूदेदार खाने योग्य भाग बनाता है।
फलों के गुण, उपयोग और फायदे (Fruits Benefits in Hindi)
फल हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत उपयोगी होते हैं। फलों से से हमारे शरीर में खनिज और विटामिन्स की पूर्ती होती है, जो कि हमारे शरीर को अच्छी तरह से काम करने लिए बेहद ज़रूरी होते हैं।
फाइबर युक्त फल पाचन शक्ति को बढ़ाने में मदद करते हैं। फल खाने से पर्याप्त ऊर्जा भी मिलती है।
फल स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं जैसे हीट स्ट्रोक, हाई बीपी (उच्च रक्तचाप), कैंसर, हृदय रोग और मधुमेह से लड़ने की क्षमता प्रदान करते हैं।
लगभग सभी फलो में पोषक तत्व पाए जाते हैं। शरीर के रोग ग्रसित होने पर स्वस्थ आहार और फल रोगों से निजात दिलाते हैं।
फलों में न केवल महत्वपूर्ण विटामिन और खनिज पाए जाते हैं, बल्कि इनके सेवन से पाचन तंत्र भी स्वस्थ रहता है। यद्यपि किसी भी प्रकार का फल आपके संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है, लेकिन विशिष्ट पोषक तत्वों की अधिक मात्रा वाले फल अन्य किस्मों की तुलना में अधिक फायदेमंद होते हैं।
फलों के छिलकों में फाइबर की अधिक मात्रा होती है जो कि हमारे शरीर की उत्सर्जन प्रक्रिया में बहुत उपयोगी होती है। हालांकि कुछ रेशेदार फलों के छिलके जिन्हें खाया नही जा सकता हैं जैसे कि नींबू, केले, खरबूज़े और नारंगी लेकिन इनके बाक़ी हिस्सों पर्याप्त मात्रा में फाइबर उपस्थित होता है।
फल 90-95% पानी की मात्रा से भरपूर होते हैं, जिससे शरीर से नाइट्रोजनयुक्त अवांछित विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में आसानी होती है।
फलों से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य
विक्टोरिया एमाजोनिका की पत्तियाँ सबसे बड़ी होती हैं।
अपस्थानिक जड़े मूलांकुर (radicle) के अतिरिक्त पौधों की शाखाओं तथा पत्तियों से निकलती हैं।
जब एक ही पौधे पर अलिंगी, द्विलिंगी तथा एकलिंगी पुष्प पाये जाते हैं, तो इसे सर्वांगी (polygamous) कहते हैं; जैसे-आम (Mangifera indica), पॉलीगोनम ।
जब पुष्प में केवल पुंकेसर हो तो इसे पुंकेसरी (staminate) तथा जब केवल मादा जननांग हो तो इसे स्त्रीकेसरी कहते हैं। गोभी का सम्पूर्ण पुष्पक्रम भोजन के रूप में उपयोग होता है।
किसी स्थान पर वर्ष की विभिन्न ऋतुओं में जलवायु के क्रमिक परिवर्तन के कारण कैम्बियम की सक्रियता बदलती रहती है, जिसके कारण बसन्त ऋतु में मोटी वाहिकाएँ तथा शरद ऋतु में पतली वाहिकाएँ मिलती हैं इसके फलस्वरुप स्पष्ट वार्षिक वलय बनते हैं, जो एक वर्ष की वृद्धि को प्रदर्शित करते हैं। इन वलयों को गिनकर पेड़ की आयु ज्ञात की जाती है। वार्षिक वलय का अध्ययन डेन्ड्रोक्रोनोलॉजी (Dendrochronology) कहलाती है।
कैम्बियम के द्वारा पौधे के बाहरी ओर कॉर्क का निर्माण होता है। परिपक्व होने पर ये मृत हो जाती है और सुबेरिन नामक पदार्थ जमा हो जाता है। बोतलों में प्रयुक्त कॉर्क इसका उदाहरण है, जो क्यूरकस सूबर नामक पौधे से प्राप्त होता है।
इस आर्टिकल में हम जानेगे की पुष्प या फल क्या है ? क्योकि पुष्पीय पौधों में पुष्प एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंग है। तो हम पुष्प के प्रकार, पुष्प की मुख्य विशेषताएं और पुष्प के उपयोग के बारे में बतायेगे | साथ ही हम जानेगे की परागण, निषेचन, पुंकेसर, बीजाण्डासन क्या होते है और यह किस प्रकार पुष्प से सम्बंधित है |
पुष्प (Flower)
पुष्पीय पौधों में पुष्प एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंग है। आकारकीय (Morphological) रूप से पुष्प एक रूपान्तरित प्ररोह (स्तम्भ) है जिस पर गाँठे तथा रूपान्तरित पुष्पी पत्तियाँ लगी रहती हैं। पुष्प प्रायः तने या शाखाओं के शीर्ष अथवा पत्ती के अक्ष (Axil) में उत्पन्न होकर प्रजनन (Reproduction) का कार्य करती है तथा फल एवं बीज उत्पन्न करता है।
पुष्प या फूल एक रूपान्तरित प्ररोह है। इसमें जनन अंग तथा सहायक अंग उपस्थित होते हैं। जिस पुष्प में दोनों जनन अंग अर्थात नर और मादा हो, तो उसे द्विलिंगी पुष्प तथा जब केवल एक जननांग (नर या मादा उपस्थित होते हैं तो उसे एकलिंगी कहते हैं। एक ही पौधे पर नर तथा मादा दोनों पुष्प होने पर पौधा उभयलिंगाश्रयी, जबकि नर तथा मादा पुष्प अलग-अलग पौधों पर उपस्थित उपस्थित होने एकलिंगीश्रयी कहलाता है।
पुष्प की रचना
पुष्प एक डंठल द्वारा तने से सम्बद्ध होता है। इस डंठल को वृन्त या पेडिसेल (Pedicel) कहते हैं। वृन्त के सिरे पर स्थित चपटे भाग को पुष्पासन या थेलामस (Thalamus) कहते हैं। इसी पुष्पासन पर पुष्प के विविध पुष्पीय भाग (Floral Parts) एक विशेष प्रकार के चक्र (Cycle) में व्यवस्थित होते हैं।
पुष्प (Flower) के मुख्य भाग
पूर्ण पुष्प में चार मुख्य भाग निम्न है :
बाह्य दलपुंज (Calyx),
दलपुंज (Corolla),
पुमंग (Androecium)
जायांग (Gynoecium)
पूर्ण पुष्प में चार मुख्य भाग बाह्य दलपुंज एवं दलपुंज (दोनों सहायक अंग) तथा पुमंग एवं जायांग (दोनों आवश्यक अंग) उपस्थित होते हैं। तने से पुष्पों को जोड़ने वाले अंग वृन्त पुष्प का डण्ठल होता है।
1. बाह्य दलपुंज (Calyx)
यह पुष्प का सबसे बाहरी चक्र होता है। बाह्यदलपुंज एक दूसरे से स्वतन्त्र (polysepalous) या एक दूसरे से जुड़े हो सकते हैं। कुछ पौधों जैसे सिंघाड़ा में बाह्य दलपुंज काँटों में रूपान्तरित हो जाते हैं। कम्पोजिटी कुल के पौधों में रोमों के समान हो जाते है, जिन्हें रोमगुच्छ कहते हैं।
2. दलपुंज (Corolla)
यह अनेक इकाइयों अर्थात् दलों से मिलकर बनता है, जो विभिन्न वर्णकों के कारण चमकीले होते हैं तथा फूलों को आकर्षक रूप प्रदान करते हैं।
3. पुमंग (Androecium)
पुमंग (Androecium) पुष्प का नर जनन अंग है, जो पुंकेसरों (stamens) का बना होता है। पुंकेसर पुतन्तु (filament), परागकोष (anther) तथा योजी (connective) से मिलकर बना होता है।
पुंकेसर
अधिकांश पुंकेसरों में दो परागकोष होते हैं, जिन्हें द्विकोष्ठी कहते हैं परन्तु मालवेसी कुल में एककोष्ठी (monothecous) पुंकेसर मिलते हैं।
– पुष्प में पुंकेसर स्वतन्त्र अर्थात् पृथक पुंकेसरी या संयुक्त अर्थात् संघी हो सकते हैं; जैसे
1. एकसंघी सभी पुंकेसरी एक समूह में, उदाहरण गुड़हला
2. द्विसंघी पुंकेसरों के पुतन्तु परस्पर जुड़कर दो समूह बनाते हैं, उदाहरण मटर
3. यहुसंघी पुतन्तु संयुक्त होकर दो से अधिक समूह बनाते हैं, उदाहरण बॉम्बेक्सा
4. युक्तकोषी पुंकेसर अपने परागकोषों से जुड़े होते हैं और उनके पुतन्तु स्वतन्त्र होते हैं, उदाहरण कम्पोजिटी।
5. युक्तपुंकेसरी पुंकेसरों के परागकोष तथा पुतन्तु दोनों आपस में पूरी तरह जुड़े होते हैं, और उनके में पुंतन्तु स्वतन्त्र होते हैं, उदाहरण कम्पोजिटी।
– जब पुंकेसर दल से जुड़े होते है, तो इन्हें दललग्न, जैसे धतूरा व बैगन, जब परिदल से जुड़े होते हैं, तो इन्हें परिदललग्न; जैसे-प्याज व लहसुन तथा जब जायाँग के साथ जुड़े होते हैं, तो इन्हें पुंजायाँगी कहते हैं; जैसे-मदार।
द्विदिघ्री (Didynamous) अवस्था में 4 पुंकेसर में से 2 के पुतन्तु बड़े तथा दो के छोटे होते हैं; के सदस्य। जैसे-लेबिऐटी कुल के सदस्य
चतुदीघ्री (Tetradynamous) अवस्था में 6 पुंकेसरों में से 2 बाहर वाले पुंकेसरों के पुंतन्तु छोटे तथा चार अन्दर वाले पुंकेसरों के पुतन्तु बड़े होते हैं; जैसे-क्रूसीफेरी कुल के सदस्य ।
4. जायाँग (Gynoecium)
यह पुष्प का मादा जनन अंग है, जो अनेक अण्डपों से मिलकर बना होता है। अण्डपों की संख्या के आधार पर जायाँग एकाअण्डपी; जैसे-मटर, द्विअण्डपी; जैसे-सरसों, त्रिअण्डपी; जैसे-कुकुरबिटा, पंचाण्डपी; जैसे-गुड़हल और बहुअण्डपी; जैसे- पैपेवर आदि होता है।
उर्ध्ववर्ती (Superior) अवस्था में अण्डाशय बाह्यदलों, दलों तथा पुंकेसरों से ऊपर होता है, जबकि अधोवर्ती (inferior) अवस्था में पुष्पासन अण्डाशय से संगलित हो जाता है और बाह्यदल, दल तथा पुंकेसर अण्डाशय के ऊपर लगे होते हैं।
अण्डप
अण्डप के मुख्यतया तीन भाग होते हैं
1. अण्डाशय (Ovary) अण्डप के आधार का फूला हुआ भाग अण्डाशय कहलाता है।
2. वर्तिका (Style) अण्डाशय के ऊपर वाले भाग, लम्बी और पतली संरचना वर्तिका कहलाती है।
3. वर्तिकाग्र (Stigma) यह वर्तिका का शीर्ष भाग होता है।
पुष्प का कार्य
पुष्प का मुख्य कार्य लिंगीय प्रजनन द्वारा फल तथा उसके अन्दर बीज का निर्माण करना है।
परागण
परागकणों का पुंकेसर से वर्तिकाग्र पर स्थानान्तरण परागण कहलाता है। यह दो प्रकार से होता है:
– स्व-परागण (Self-pollination) में एक पुष्प के परागण उसी पुष्प अथवा उसी पौधे के दूसरे पुष्प की वर्तिकाग्र पर पहुंचते हैं।
– पर-परागण (Cross-pollination) में एक पुष्प के परागकण उसी जाति के दूसरे पौधों के पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं। पर-परागण की क्रिया वायु, जल, कीट तथा जन्तुओं के द्वारा होती है। पर-परागण के अन्तर्गत वायु द्वारा परागण अर्थात् । एनिमोफिली; जैसे-गेहूँ, मक्का आदि में, जल द्वारा अर्थात् हाइड्रोफिला; जैसे-हाइड्रिला में, कीटों द्वारा अर्थात् एन्टोमोफिली।
• अधिकांश पुष्पों में सर्वाधिक सफल परागण कीटों के माध्यम से ही होता है। इस क्रिया में पराग कणों की न्यूनतम क्षति होती है। पुष्पों में उपस्थित मकरन्द (nectas) कीटों का प्रिय भोजन है। पक्षियों द्वारा परागण अर्थात् ऑर्निथोफिली सेमल वृक्ष में, चमगादड़ द्वारा अर्थात चिरोप्टेरोफिली जैसे कदम्ब वृक्ष में, घोघों द्वारा अर्थात् मैलेकोफिली परागण; जैसे-अरवी में, हाथी द्वारा रफ्लेशिया में आदि परागण विधियाँ आती हैं।
परागण की विधियां (Methods of pollination)
वायु परागण (Anemophilous): वायु द्वारा परागण
कीट परागण (Entomophilous): कीट द्वारा परागण
जल परागण (Hydrophilous): जल द्वारा परागण
जन्तु परागण (zoophilous): जन्तु द्वारा परागण
पक्षी परागण (Ornithophilous): पक्षियों द्वारा परागण
मेलेकोफिलस (Malacophilous): घोंघे द्वारा परागण
चिरोप्टोफिलस (Chiroptophilous): चमगादड़ द्वारा परागण
निषेचन (Fertilization)
परागण के पश्चात निषेचन की क्रिया प्रारम्भ होती है। परागनली (Pollen tube) बीजाण्ड (ovule) में प्रवेश करके बीजाण्डासन को भेदती हुई भ्रूणपोष (Endosperm) तक पहुँचती है और परागकणों को वहीं छोड़ देती है। इसके पश्चात् एक नर युग्मक एक अण्डकोशिका से संयोजन करता है। इसे ही निषेचन कहते हैं। अब निषेचित अण्ड (Fertilized egg) युग्मनज (zygote) कहलाता है। यह युग्मनज बीजाणुभिद की प्रथम इकाई है।
निषेचन के पश्चात बीजाण्ड से बीज, युग्मनज से भ्रूण (embryo) तथा अण्डाशय से फल का निर्माण होता है। आवृत्तबीजी पौधों (Angiospermic plants) में निषेचन को त्रिक संलयन (Triple fusion) कहते हैं।
निषेचन के पश्चात् पुष्प में होने वाले परिवर्तन
निषेचन के पश्चात् पुष्प में निम्नलिखित प्रकार के परिवर्तन देखने को मिलते हैं-
बाह्य दलपुंज (Calyx): यह प्रायः मुरझाकर गिर जाता है। अपवाद-मिर्च।
दलपुंज (Corolla): यह मुरझाकर गिर जाता है।
पुंकेसर (stamen): यह मुरझाकर झड़ जाता है।
वर्तिकाग्र (stigma): यह मुरझा जाती है।
वर्तिका (style): यह मुरझा जाती है।
अण्डाशय (Ovary): यह फल में परिवर्तित हो जाती है।
अण्डाशय भित्ति (Ovary wall): यह फलाभित्ति (Pericarp) में परिवर्तित हो जाती है।
त्रिसंयोजक केन्द्रक (Triple fused nucleus): यह भ्रूणपोष (Endosperm) में परिवर्तित हो जाती है।
अण्डकोशिका (Egg cells): यह भ्रूण (embryo) में परिवर्तित हो जाता है।
बीजाण्डसन (Nucellus): यह पेरीस्पर्म (Perisperm) में परिवर्तित हो जाती है।
बीजाण्ड (Ovule): यह बीज (seed) में परिवर्तित हो जाती है।
बीजाण्डासन (Placentation)
बीजाण्डों के वितरण को बीजाण्डन्यास कहते हैं। बीजाण्डासन पुष्पासन (thalamus) या अधर सेवनी (ventral suture) से उत्पन्न विशेष प्रकार का ऊतक है। बीजाण्डन्यास निम्न प्रकार के होते हैं:
1. सीमान्त (Marginal)
यह एकाण्डपी अण्डाशय में पाया जाता है, इसमें बीजाण्ड अण्डाशय की सीवन (suture) पर लगे होते हैं। जैसे-लेग्युमिनासा कुल के सदस्य।
2. भित्तीय (Pnrietal)
यह द्वि, त्रि या बहुअण्डपी तथा एक कोष्ठी अण्डाशय में पाया जाता है, बीजाण्ड अण्डाशय की भीतरी भित्ति पर लगे होते हैं; जैसे-सरसों, मूली, आरजीमॉन।
3. स्तम्भीय या अक्षवर्ती (Axile)
यह द्वि, त्रि, बहुअण्डपी अण्डाशय में पाया जाता है। बीजाण्डासन अण्डाशय के केन्द्रीय अक्ष पर उत्पन्न होता है; जैसे-गुड़हल, टमाटर, लिली।
4. आधारिक (Basal)
अण्डाशय एक कोष्ठकीय होता है तथा बीजाण्डासन अण्डाशय के आधार पर लगा होता है, प्रत्येक बीजाण्डासन पर केवल बीजाण्ड जुड़ा होता है; जैसे-सूरजमुखी गेहूँ।
5. मुक्त स्तम्भीय (Free central)
बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी तथा कोष्ठकी अण्डाशय में पाया जाता है, बीजाण्ड अण्डाशय के केन्द्रीय अक्ष पर लगे होते हैं; जैसे-सैपोनेरिया, प्राइमुला।
6. परिभित्तीय (Superficial)
यह बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी तथा बहुकोष्ठकीय अण्डाशय में पाया जाता है, इसमें बीजाण्ड अण्डपों की भीतरी दीवार की विभाजन भित्तियों पर उत्पन्न होते हैं; जैसे-वाटर लिली।
इस आर्टिकल में हम जानेगे कि पुष्पक्रम किसे कहते हैं अथवा Inflorescence meaning in Hindi ? क्या है, साथ ही हम जानेगे कि पुष्पक्रम (Inflorescence) कितने प्रकार के होते है, Inflorescence के उदाहरण क्या क्या है, एकल पुष्प क्या होता है, असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence), ससीमाक्षी पुष्पक्रम (Cymose Inflorescence) और मिश्रित पुष्पक्रम (Mixed Inflorescence) क्या है, इनकी विशेषताएं और उदाहरण क्या क्या है आदि |
पुष्पक्रम क्या है? What Is Inflorescence In Hindi | पुष्पक्रम की परिभाषा
प्रत्येक जाति के पुष्पीय पौधे पर पुष्प कुछ निश्चित क्रम में व्यवस्थित होते है। पौधे की शाखा के शीर्ष पर पुष्प के उत्पन्न होने और व्यवस्थित होने की विधि (ढंग) को “पुष्पक्रम” कहते है। पुष्पक्रम का अक्ष पुष्पाक्ष कहलाता है | दुसरे शब्दों में पुष्प अक्ष (Floral Axis) या पुष्पाक्ष पर पुष्पों के लगने की व्यवस्था को पुष्पक्रम (Inflorescence) कहते हैं।
जिस शाखा पर पुष्प लगते है, उस शाखा को पुष्पावली वृन्त (Peduncle) कहते हैं। तथा एक पुष्प जिस वृन्त के द्वारा शाखा से जुड़ा रहता है, उसे पुष्प वृन्त (Pedicel) कहते हैं। पुष्पक्रम का प्रत्येक फूल पुष्पक कहलाता है।
जब पुष्पावली वृन्त (Peduncle) चपटा या गोल होता है, तो उसे पात्र (receptacle) कहते हैं। कभी-कभी पुष्पावली वृन्त (Peduncle) मूलज पत्तियों (radical leaves) के बीच से निकलता है, तब इसे पुष्पदंड (Scape) कहते हैं।
एकल पुष्प क्या होता है ?
पुष्प का निर्माण पादप के शीर्षस्थ (terminal) अथवा कक्षस्थ कलिका (axillary bud) से होता है। जब पुष्प शाखा पर एक ही होता है, तो उसे एकल पुष्प कहते हैं। परंतु जब शाखा पर अनेक पुष्प होते हैं, तो ऐसे पुष्पों का समूह पुष्पक्रम कहलाता हैं। (i) एकल शीर्षस्थ : अकेला शीर्षस्थ पुष्प मुख्य तने या उसकी शाखाओं के शीर्ष पर विकसित होता है , उदाहरण पॉपी। (ii) एकल कक्षस्थ : ये पुष्प पत्ती (उदाहरण : पिटुनिया) के कक्ष में या पुष्पावलि वृन्त के शीर्ष (उदाहरण : चाइना रोज = शू पुष्प = हिबिस्कस रोजा – सिनेनसिस) पर अकेले पाए जाते है।
पुष्पक्रम (Inflorescence) के प्रकार (Different Types Of Inflorescence in Hindi)
पुष्पक्रम मुख्यत: तीन प्रकार के होते है :
(1) असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence)
(2) ससीमाक्षी पुष्पक्रम (Cymose Inflorescence)
(3) मिश्रित पुष्पक्रम (Mixed Inflorescence)
असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence) क्या है ?
असीमाक्षी या अनिश्चित वृद्धि का पुष्पक्रम पाशर्व या कक्षस्थ पुष्प रखता है जो अग्राभिसारी क्रम (आधार की ओर पुराने और शीर्ष पर नए) में उत्पन्न होते है। इस प्रकार के पुष्पक्रम में पुष्प अक्ष (Floral Axis) की वृद्धि रुकती नही है और अनिश्चित वृद्धि करता है। इसमें नीचे के फूल बड़े जबकि ऊपर की तरफ छोटे होते जाते है। इसमे नये फूल ऊपर या बीच में जबकि पुराने फूल सबसे नीचे होते है। उदाहरण – मूली , सरसों , घास , केला , सहतूत, सरसों, सोयाबीन इत्यादि।
असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence in hindi) के मुख्य प्रकार
रेसीम (Raceme) – सरसों के पौधे में यह पुष्पक्रम पाया जाता है। इसमें मुख्य लम्बे अक्ष से pedicle जुड़े होते है और इससे फूल लगे होते है। उदाहरण :गुलमोहर, गेहूं इत्यादि।
स्पाइक (Spike) – यह एक अनिश्चित और अशाखित पुष्पक्रम है जो Sessile (बिना डंठल के) फूलों में मिलता है।
ओक (Catkin) – ओक में यही पुष्पक्रम पाया जाता है। इसमें लम्बे अक्ष पर उभयलिंगी फूल लगे होते है।
Umbel – इसे shortened Racemose भी कहते है। यह गाजर वंश के पौधो में पुष्पक्रम पाया जाता है।
Spikelet – इसमें पुष्पक्रम शाखित केंद्रीय अक्ष पर होता है।
Head – इसे flattened Racemose कहा जाता है। इसमें मुख्य अक्ष मोठा और चौड़ा हो जाता है जिसे receptacle कहते है। फूलों में pedicles नही होते है।
ससीमाक्षी पुष्पक्रम क्या है? (Cymose Inflorescence in Hindi)
इस प्रकार के पुष्पक्रम में पुष्प अक्ष की वृद्धि सीमित होती है। इस प्रकार के पुष्प क्रम में मुख्य अक्ष सिमित वृद्धि वाला होता है और शीर्ष पर एक पुष्प बन जाने के कारण शीर्ष की वृद्धि रुक जाती है। शीर्षस्त पुष्प के नीचे शाखाएँ निकलती है व उनके शीर्ष पर भी पुष्प बन जाता है। ससीमाक्षी में पुष्पक्रम तलाभिसारी होता है। उदाहरण – गुडहल , मकोय , पॉपी , चमेली ,आक आदि।
ससीमाक्षी पुष्पक्रम के मुख्य प्रकार
Uniparous Cyme – इसे monochasial पुष्पक्रम भी कहते है। मुख्य अक्ष फूल में समाप्त होता है और इसके आधार से एक दूसरी पार्श्व शाखा निकलती है। फूल basipetal व्यवस्था में शीर्ष में मौजूद होते है। उदाहरण : ड्रोसेरा (Drosera).
Dichasial Cyme – इसे द्विशाखी पुष्पक्रम भी कहते है। इसके peduncle के शीर्ष पर फूल लगता है जबकि आधार पर दो पार्श्व शाखाएं निकलती है। उदाहरण : चमेली
Multiparous Cyme – इसे बहुशाखी पुष्पक्रम कहते है।
Cymose Capitulum (कैपिटुलम) – इसमें पुष्पावली वृन्त (Peduncle) कम वृद्धि करता है और टॉप पर बड़ा फूल लगता है। जबकि इसके पार्श्व में छोटे फूल होते है।
ससीमाक्षी पुष्पक्रम के कुछ उदाहरण
शूकी बॉस एवं लटजीरा
अनुशूकी गेहूँ
मन्जरी बीटुला एवं मोरस
स्थूल मन्जरी कोलोकेशिया
समशिख केसिया
छतक हाइड्रोकोटाइल
मुण्डक सूरजमुखी, जीनिया (पुष्पाक्ष छोटा एवं चपटा होता है जिसे पात्र (receptacle) कहते हैं। मुण्डक में बाहर की ओर रश्मि पुष्पक एवं केन्द्र की ओर बिम्ब पुष्पक होते हैं।
मिश्रित या यौगिक पुष्पक्रम (Compound Inflorescence) क्या है ?
जिस पौधे के पुष्प अक्ष पर ससीमाक्षी और असीमाक्षी दोनों प्रकार के पुष्पक्रम पाये जाते है, उसे मिश्रीत पुष्पक्रम (Compound Inflorescence) कहते है।
मिश्रित पुष्पक्रम के प्रकार
थिरसस : साइमोस समूह अग्रभिसारी रूप से विन्यस्त होते है। उदाहरण : विटिस विनिफेरा (ग्रेप वाइन)
मिश्रित स्पेडिक्स : स्पेडिक्स मांसल अक्ष पर अग्राभिसारी रूप से विन्यस्त साइमोस पुष्पक्रम रखता है।
पेनिकिल ऑफ़ स्पाइकलेट्स : स्पाइकलेंट संयुक्त रेसीम में विन्यस्त होते है। उदाहरण : जई , चावल।
कॉरिम्ब ऑफ़ कैपिटुला : उदाहरण : एगीरेटम
अन्य प्रकार जैसे अम्बेल ऑफ़ कैपिटूला , साइम ऑफ़ कैपिटुला (उदाहरण : वनिर्जिया ) , साइम ऑफ़ अम्बेल (उदाहरण : लेटाना) , साइम ऑफ़ क्रोरिम्ब आदि।
विशिष्ट पुष्पक्रम
विशिष्ट पुष्पक्रम निम्न प्रकार के होते है :
कटोरिया (Cyathium) सहपत्रों के आपस में जुड़ने से कटोरे की आकृति का सहपत्र चक्र (involucre) बनता है इसकी बाहरी सतह पर मकरन्द ग्रन्थियाँ, बीच में केवल जायाँग द्वारा प्रदर्शित मादा पुष्प तथा उसके चारों ओर एक तन्तुकीय पुंकेसर द्वारा प्रदर्शित नर पुष्प होते हैं; जैसे – यूफोरबिएसी कुल के सदस्य।
कूट चक्रक (Verticillaster) – यह द्विशाखी ससीमाक्ष का परिवर्तित रूप है। तने की प्रत्येक पर्वसन्धि पर निकली विपरीत पत्तियों के कक्ष में अवृन्त पुष्प निकलते हैं जिसके नीचे से दोनों ओर दो पुष्प निकलते हैं; जैसे – तुलसी, साल्विया
हाइपेन्थोडियम (Hypanthodium) पुष्पाक्ष अथवा आशय एक छिद्रयुक्त गूदेदार तथा खोखली गुहा की भाँति हो जाता है और छिद्र शल्कों से ढका रहता है।
पुष्पक्रम (Inflorescence) से सम्बन्धित महत्वपुर्ण प्रश्न :
प्रश्न : असीमाक्षी पुष्पक्रम और ससीमाक्षी पुष्पक्रम में क्या अंतर है ? Difference between Racemose and Cymose Inflorescence?
उत्तर: असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose) में ससीमाक्षी पुष्पक्रम (cymose) की तुलना में मुख्य अक्ष में अत्यधिक वृद्धि होती है।
असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose – रेसमोस) में, मुख्य अक्ष अनिश्चित काल तक बढ़ता रहता है और फूल बाद में पैदा होते हैं। ससीमाक्षी पुष्पक्रम (cymose – सायमोज) में, फूल पुष्प अक्ष पर अंतिम रूप से पैदा होते हैं और मुख्य अक्ष के विकास को निर्धारित करते हैं।
असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose) में फूल अग्राभिसारी (acropetal) (नीचे से ऊपर की तरफ बढ़ना) क्रम में व्यवस्थित होते है। जबकि ससीमाक्षी पुष्पक्रम (cymose) में पुष्प तलाभिसारी (basipetal) क्रम में होते है।
असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose) में सबसे पुराना फूल पुष्पक्रम अक्ष के आधार पर होता है जबकि ससीमाक्षी पुष्पक्रम (cymose) में पुष्पक्रम अक्ष के सबसे ऊपर होता है।
फूलों के Flowering (खिलना या उगना) का समय भी पुष्पक्रम को निर्धारित करता है।
प्रश्न : असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence) कोनसे फूलों में पाया जाता है ? Racemose Inflorescence is present in which flower?
उत्तर : मूली , सरसों , घास , केला , सहतूत, सरसों, सोयाबीन
प्रश्न : ससीमाक्षी पुष्पक्रम कोनसे फूलों में पाया जाता है ? Cymose Inflorescence is present in which flower?
उत्तर : गुड़हल, चमेली
प्रश्न : पुष्पक्रम से क्या आशय है? ये कितने प्रकार के होते है? What is inflorescence? How many types of inflorescence?
उत्तर : प्रत्येक जाति के पुष्पीय पौधे पर पुष्प कुछ निश्चित क्रम में व्यवस्थित होते है। पौधे की शाखा के शीर्ष पर पुष्प के उत्पन्न होने और व्यवस्थित होने की विधि (ढंग) को “पुष्पक्रम” कहते है। पुष्पक्रम का अक्ष पुष्पाक्ष कहलाता है | दुसरे शब्दों में पुष्प अक्ष (Floral Axis) या पुष्पाक्ष पर पुष्पों के लगने की व्यवस्था को पुष्पक्रम (Inflorescence) कहते हैं। पुष्पक्रम मुख्यत: तीन प्रकार के होते है :
(1) असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence)
(2) ससीमाक्षी पुष्पक्रम (Cymose Inflorescence)
(3) मिश्रित पुष्पक्रम (Mixed Inflorescence)
प्रश्न : कटोरिया पुष्पक्रम पर टिप्पणी
उत्तर : कटोरिया (Cyathium) सहपत्रों के आपस में जुड़ने से कटोरे की आकृति का सहपत्र चक्र (involucre) बनता है इसकी बाहरी सतह पर मकरन्द ग्रन्थियाँ, बीच में केवल जायाँग द्वारा प्रदर्शित मादा पुष्प तथा उसके चारों ओर एक तन्तुकीय पुंकेसर द्वारा प्रदर्शित नर पुष्प होते हैं; जैसे – यूफोरबिएसी कुल के सदस्य।
प्रश्न : हाइपेन्थोडियम पुष्पक्रम क्या है ?
उत्तर : हाइपेन्थोडियम (Hypanthodium) पुष्पाक्ष अथवा आशय एक छिद्रयुक्त गूदेदार तथा खोखली गुहा की भाँति हो जाता है और छिद्र शल्कों से ढका रहता है।
प्रश्न : कूटचक्रक और सायथियम पुष्पक्रम में अन्तर लिखिए।
उत्तर : कूट चक्रक (Verticillaster) – यह द्विशाखी ससीमाक्ष का परिवर्तित रूप है। तने की प्रत्येक पर्वसन्धि पर निकली विपरीत पत्तियों के कक्ष में अवृन्त पुष्प निकलते हैं जिसके नीचे से दोनों ओर दो पुष्प निकलते हैं; जैसे – तुलसी, साल्विया
सायथियम (Cyathium – कटोरिया) सहपत्रों के आपस में जुड़ने से कटोरे की आकृति का सहपत्र चक्र (involucre) बनता है इसकी बाहरी सतह पर मकरन्द ग्रन्थियाँ, बीच में केवल जायाँग द्वारा प्रदर्शित मादा पुष्प तथा उसके चारों ओर एक तन्तुकीय पुंकेसर द्वारा प्रदर्शित नर पुष्प होते हैं; जैसे – यूफोरबिएसी कुल के सदस्य।
जड़ (Root) मूलांकुर (radicle) से निर्मित विभिन्न शाखाओं में फैलकर, भूमि के अन्दर प्रकाश से दूर (negatively phototropic), जल की तलाश में, गुरुत्व की ओर वृद्धि करता है। जड़ें मृदा से जल एवं विभिन्न प्रकार के खनिज लवणों का अवशोषण करते हैं।
जड़ पौधे का वह भाग है जो बीजों के अंकुरण के समय मूलांकर (Radicle) से विकसित होता है और प्रकाश के विपरीत (negatively phototropic) लेकिन जल एवं भूमि की तरफ बढ़ता है |
जड़ें मृदा से जल एवं विभिन्न प्रकार के खनिज लवणों का अवशोषण करते हैं।
मूलांकुर से विकसित प्रथम जड़ प्राथमिक जड़, जबकि सभी शाखाएँ द्वितीयक जड़ कहलाते हैं। जड़ो में एककोशिकीय मूलरोम पाए जाते हैं।
जड़ों में सन्धियाँ, पर्वसन्धियाँ, पत्तियाँ आदि नहीं पाई जाती है। जडें नकारात्मक प्रकाशानुवर्ती और धनात्मक गुरुत्वानुवर्ती होती हैं।
मूसला जड़ वह जड़ है, जिसमें मूलांकुर (Radicle) विकसित होकर एक मुख्य या प्राथमिक जड़ (Primary root) का निर्माण करता है, जो अन्य शाखाओं से मोटी होती है तथा अधिक गहराई तक जाती है। इससे कई शाखाएँ निकलती हैं, जिन्हें द्वितीयक जड़ (Secondary root) कहते हैं।
द्वितीयक जड़ों से निकलने वाली शाखाओं को तृतीयक जड़ (Tertiary root) कहते हैं।
इस प्रकार बनी प्राथमिक जड़ तथा इसकी शाखाओं को मूसला जड़ तन्त्र (Tap root system) कहतेहैं।
ऐसी जड़ें द्विबीजपत्री पौधों में पायी जाती हैं तथा भूमि में बहुत गहराई तक वृद्धि करके पौधे को मजबूती से खड़ा रखती हैं। यह जड़, चना, मटर, गाजर, मूली, सरसों, आम, नीम इत्यादि पौधों में पायी जाती है।
मूसला जड़ (Tap Root) के प्रकार
1. तर्कुरूप (Fusiform) इस प्रकार की जड़ें बीच से मोटी और किनारों पर पतली होती है जैसे-मूली।
2. कुम्भी रूप (Napiform) ये जड़ें शीर्ष पर मोटी और फूली हुई होती है तथा नीचे की ओर पतली होती है जैसे – शलजम (Turnip), चुकन्दर (Beet)
3. शंकु रूप (Conical) इस प्रकारी की मूसला जड़े आधार की ओर मोटी तथा नीचे की ओर क्रमशः पतली होती हैं।जैसे-गाजर।
4. श्वसन मूल (Pneumatophores (न्यूमेटाफ़ोर) root) – राइजोफोरा (Rhizophora), सुन्दरी (Sundari) आदि पौधे जो दलदली स्थानों पर उगते हैं, में भूमिगत मुख्य जड़ों से विशेष प्रकार की जड़ें निकलती हैं, जिसे न्यूमेटाफोर कहते हैं। ये खूंटी के आकार की होती हैं, जो ऊपर वायु में निकल आती हैं। इनके ऊपर अनेक छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिन्हें न्यूमेथोडस (Pneumathodes) कहते हैं।
अपस्थानिक जड़ (Adventitious root or Fibrous root system)
कुछ पौधों में अकुंरण के कुछ समय बाद मूलांकुर (Redicle) की वृद्धि रुक जाती है और प्रांकुर के आधार या तने की निचली पर्वसन्धियों से रेशे के रूप में जड़ें विकसित हो जाती हैं, उन्हें ही अपस्थानिक या रेशेदार जड़ (Fibrous root) कहते हैं। इस प्रकार से बने जड़ गुच्छ को अपस्थानिक जड़ तन्त्र (Adventitious root system) कहते हैं।
अपस्थानिक जड़ मूलांकुर की वृद्धि एक जाने के कारण जड़े शाखाओ, तनों के आधारीय भागों तथा पत्तियों में निकलती है। यह प्रायः एकबीजपत्री (monocot plants) पौधों में पाई जाती है जैसे-धान, गेहूँ, मक्का, ज्वार, बाजरा, गन्ना इत्यादि।
कुछ द्विबीजपत्री पादकों जैसे बरगद, पान, अमरबेल इत्यादि में भी अपस्थानिक जड़ें पायी जाती हैं। ये जड़ें भूमि में गहराई तक न जाकर केवल ऊपरी सतह तक फैली होती हैं।
विभिन्न प्रकार की अपस्थानिक जड़ें
भोजन संग्रह, पौधों को यांत्रिक सहारा (Mechanical support) प्रदान करने अथवा अन्य विशिष्ट कार्यों को करने के उद्देश्य से अपस्थानिक जड़ें अनेक प्रकार से रूपांतरित हो जाती हैं।
मूसला तथा अपस्थानिक जड़ों में अन्तर (Difference between Tap root and Adventitious roots)
मूसला जड़ (Tap root)
अपस्थानिक जड़
मूसला जड़ की प्राथमिक जड़ समाप्त नहीं होती तथा यह क्रमश: पतली होती जाती है।
अपस्थानिक जड़ों की प्राथमिक जड़ बनने के तुरन्त बाद समाप्त हो जाती है और प्ररोह के अन्तिम भाग से अनेक रेशेदार जड़ें निकलती हैं।
यह भूमि के अन्दर गहराई तक जाती है ।
यह भूमि की ऊपरी सतह पर ही स्थित होती है ।
यह बीज के मूलांकुर से पैदा होती है।
यह पौधे के प्ररोह भाग (वायवीय भाग) से पैदा होती है।
इसकी प्राथमिक जड़ से अनेक शाखाएँ निकलती हैं। उदाहरण- मटर, चना, अरहर इत्यादि की जड़ें।
इसकी प्राथमिक जड़ विलुप्त हो जाती हैं। उदाहरण-गेहूँ, जौ, धान, मक्का इत्यादि की जड़ें ।
जड़ की विशेषताएँ (Characteristics of root)
जड़ पौधों के अक्ष का अवरोही (Descending) भाग है, जो मूलांकुर (Radicle) से विकसित होता है।
जड़ सदैव प्रकाश से दूर भूमि में वृद्धि करती है।
भूमि में रहने के कारण ही जड़ों का रंग सफेद अथवा मटमैला होता है।
जड़ों पर तनों के समान पर्व (Nodes) एवं पर्व सन्धियाँ (Internodes) नहीं पायी जाती है।
जड़ों पर पत्र एवं पुष्प कलिकाएँ भी नहीं होती हैं। अतः ये पतियाँ, पुष्प एवं फल धारण नहीं करती हैं।
जड़ें सामान्यतः धनात्मक गुरुत्वानुवर्ती (Positive geotropic) तथा ऋणात्मक प्रकाशानुवर्ती (Negative phototropic) होती हैं।
जड़ का सिरा मूल गोप (Root cap) द्वारा सुरक्षित रहता है।
जड पर एककोशिकीय रोम (Unicellular hairs) होते हैं।
जड़ों के कार्य (Functions of Roots)
जड़ें मूल रोमों की सहायता से जल एवं खनिज लवणों का अवशोषण करते है।
(जलोद्भिद् में मूल रोमों का अभाव होता है) पिस्टिया व लेमना पौधों में मूल गोप की जगह मूल पॉकेट (root pocket) पाया जाता है।
मूल रोम (Root hairs) तथा जड़ों के कोमल भाग जल और घुलित खनिज लवण का अवशोषण करते हैं।
यह पौधों को भूमि में स्थिर रखती है।
कुछ जड़ें अपने अंदर भोज्य पदार्थों का संग्रह करते हैं प्रतिकूल परिस्थितियों में इन संचित भोज्य पदार्थों का पौधों द्वारा उपयोग किया जाता है।
एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री जड़ में अन्तर
एकबीजपत्री जड़
इसमें द्वितीयक वृद्धि नहीं पाई जाती है।
इसमें पिथ पूर्ण विकसित होता है।
परिरम्भ से केवल पार्थ मूलों का निर्माण करती है।
इनके संवहन पूल की संख्या सामान्यतया छ: से अधिक होती है।
इसमें कैम्बियम का अभाव होता है। ।
द्विबीजपत्री जड़
इसमें द्वितीयक वृद्धि पाई जाती है।
इसमें पिथ अल्प विकसित होता है।
परिरम्भ पार्श्व मूलों तथा द्वितीयक विभज्योतक दोनों का निर्माण करती है।
इनके संवहन पूल की संख्या सामान्यतया छः से कम होती है।
इस आर्टिकल में जीवधारियों की बनावट के साथ उत्तक के बारे में विस्तृत रूप से जानेगें | पादप उत्तक क्या है उसके प्रकार क्या है इसके बारे में जानेगें | साथ ही स्थायी उत्तक (Permanent Tissue) और जटिल स्थायी उत्तक (Complex Permanent Tissue) को समझेगें | जाइलम क्या है ?, फ्लोएम क्या है ? जाइलम और फ्लोएम में क्या अंतर है ? विशिष्ट स्थायी उत्तक (Special Permanent Tissue) क्या है उसके प्रकार क्या है और वह पोधो के लिय किस प्रकार सहायक है ? रबरक्षीरी (Laticiferous glands) ग्रंथिया क्या होती है और किस प्रकार बनती है आदि के बारे में बात करेगे |
उत्तक क्या है (What is Tissues)
बहुकोशिकीय जीवों में विभिन्न शारीरिक कायों के सम्पादन हेतु समान उत्पत्ति, संरचना एवं कार्यो वाली कोशिकाओं का समूह संगठित होता है। कोशिकाओं का यह विशेष समूह जिसे ऊतक (tissue) कहते हैं, निश्चित कार्य हेतु जिम्मेदार होते हैं। ऊतक शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम विचट (Witchet) ने किया। जीव विज्ञान की वह शाखा, जिसमें ऊतकों का अध्ययन किया जाता है उसे औतिकी (Histology) कहते हैं।
विभिन्न कोशिकाएँ मिलकर ऊतक बनते है। ऊतकों का समूह मिलकर अंग, अंगों का समूह अंगतन्त्र बनाता है और अगतन्त्र मिलकर जीव के जीवन प्रक्रिया को सुचारु रूप से चलाते हैं।
बहुकोशिकीय जीवों का यह संगठन पादपों और प्राणियों में अलग-अलग प्रकार का होता है।
जैसा कि हम जानते है कि पादप भी जीवित होते हैं, और जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ उनको भी होती हैं, जिनकी पूर्ति के लिए उनमें अनेक प्रकार के कार्य होते हैं। किंतु पादपों का शरीर और शरीर में होने वाली क्रियाएँ जंतुओं से पूर्णतः भिन्न होती हैं। अतः पादप ऊतक भी जंतु ऊतकों से भिन्न होते हैं जो अपने शरीर में होने वाली क्रिया-विधियों के लिए अनुकूलित होते हैं।
जेवियर बिचैट (Xavier Bichat ) ने 1801 anatomy (शरीर रचना विज्ञान) के अध्ययन के दौरान ऊतक (Tissue) शब्द की शुरुआत की। बिचैट ने 21 प्रकार के प्राथमिक ऊतकों की पहचान की, जिनसे मानव शरीर के अंगों की रचना होती है ।
पादप तथा जंतु ऊतक (Plant and Animal Tissues)
विभज्योतक (Meristematic Tissue) – इनमें विभाजन की अपार क्षमता पाई जाती है। स्थायी ऊतक (Permanent Tissue) – ये विभाजन की क्षमता खो कर विभिन्न प्रकार के कार्यों को संपादित करते हैं।
स्थायी ऊतक को पुनः उनकी संरचना की जटिलता के आधार पर दो प्रकारों में बाँटा जाता है-
सरल स्थायी ऊतक (Simple Permanent Tissue) जटिल स्थायी ऊतक (Complex Permanent Tissue)
सरल स्थायी ऊतकों को पुनः उनकी कोशिकाओं की प्रवृत्यिों एवं अंतराकोशिकीय अवकाश के आधार पर तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-
पादप ऊतक दो प्रकार के विभज्योत्तक ऊतक और स्थायी ऊतक होते है
विभज्योत्तक ऊतक (Meristematic Tissue)
इस ऊतक की कोशिकाओं में तीव्र गति से विभाजन (सूत्री विभाजन) होने की प्रवृत्ति होती है। यह ऊतक पौधों के वर्धी भागों, जैसे तने तथा जड़ों के अग्र सिरे (apical rogion) में पाए जाते हैं। यह ऊतक पौधों की लम्बाई एवं मोटाई बढ़ाने हेतु उत्तरदायी होते हैं। यह मुख्यतया तीन प्रकार के होते हैं:
शीर्षस्थ अथवा अग्रही विभज्योत्तक (Apical Meristematic Tissue)
यह ऊतक जड़ एवं तने के अग्र (शीर्ष) भाग तथा पत्तियों के कक्षों में स्थित कलिकाओं में ऊतक पाया जाता है। यह ऊतक मुख्य रूप से पौधों की लम्बाई में वृद्धि के लिए उत्तरदायी होते हैं। उदाहरण – प्ररोह शीर्ष तथा मूल शीर्ष
पार्श्व विभज्योत्तक (Lateral Meristematic Tissue)
ये ऊतक पौधों के तने एवं जड़ों के पार्श्व भागों में पाए जाते है, जो पौधों की मोटाई के लिए विशेष महत्व रखती है। इसी में जाइलम और फ्लोएम, जैसे संवहनी तन्त्र पाए जाते हैं। उदाहरण – संवहन कैम्बियम तथा कॉर्क कैम्बियम
ये ऊतक हमेशा पर्व सन्धि (nodes) पर पाए जाते हैं तथा इन ऊतकों के कारण पौधों की लम्बाई में वृद्धि होती है। ये वास्तव में शीर्षस्थ विभज्योत्तकों के अवशेष है, जो बीच में स्थायी ऊतकों के आ जाने के कारण अलग हो जाते हैं। शाकाहारी जन्तुओं द्वारा घासों के अग्र भाग खा लिए जाने पर, उसमें अन्तर्वेशी विभज्योत्तक के माध्यम से ही वृद्धि होती है।
स्थायी ऊतक (Permanent Tissue)
विभज्योत्तक ऊतक परिपक्व होने पर स्थायी ऊतकों में परिवर्तित हो जाती है। किन्तु स्थायी ऊतकों में विभाजन की क्षमता नहीं होती है। इन ऊतकों की कोशिकाएँ मृत अथवा जीवित, पतली या मोटी भित्ति वाली होती है। यह तीन प्रकार की होती हैं :
साधारण स्थायी ऊतक (Simple Permanent Tissue)
इस ऊतक की यही विशेषता होती है कि इसमें एक ही प्रकार की आकृति तथा एक ही तरह के कार्य करने वाली (homogeneous) कोशिकाओं का समूह होता है। ये तीन प्रकार के होते हैं :
मृदूतक (Parenchyma)
यह ऊतक पौधों के मुलायम भागों तथा विभिन अंगों (बाहरी त्वचा तथा फल के गूदे आदि) में पाए जाते हैं। इसका मुख्य कार्य खाद्य पदार्थों जैसे मण्ड, प्रोटीन तथा वसा का संग्रह करना है। कुछ पौधों जैसे नागफनी तथा यूफोरबिया के माँसल तनों तथा पत्तियों में जल संग्रह का कार्य करते हैं। यदि इनमें हरित लवण उपस्थित होता है तो यह प्रकाश-संश्लेषण करते हैं और क्लोरेनकाइमा कहलाते हैं।
स्थूलकोणोत्तक (Collenchyma)
यह ऊतक मृदूतक का ही रूपान्तरित रूप है तथा यह शाकीय पौधों की बाहरी त्वचा के नीचे और पत्तियों के पर्णवृन्तों में पाए जाते है। इसकी कोशिकाएँ जीवित, रिक्तिकायुक्त एवं कोशिकाद्रव्य युक्त होती है। इसकी कोशका भित्तियों के कोनों पर सेलुलोज तथा पेक्टिन के जमाव के कारण असमान रूप से मोटी होती है। इसका मुख्य कार्य पौधों को यान्त्रिक बल तथा लचीलापन प्रदान करने तथा हरितलवक की उपस्थिति में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया करना है ।
दृढ़ोतक (Sclerenchyma)
यह ऊतक मोटी कोशिका भित्ति तथा लिग्निन युक्त मृत (dead), लम्बी, संकरी तथा दोनों सिरों पर नुकीली होती है। यह ऊतक पौधों को यान्त्रिक दृढ़ता प्रदान करता है। इसकी कोशिका भित्ति में अनेक जगहों पर सेलुलोज का जमाव नहीं होता है चूँकि इन स्थानों पर जीवद्रव्य तन्तु होते हैं। ऐसे स्थान सरल गर्त (simple pits) कहलाते हैं। लिग्निन युक्त होने के कारण इसका तन्तु अत्यन्त ही दृढ़ होता है, जिसे स्क्लेरिड्स कहते हैं। अखरोट तथा नारियल की अन्तः फल भित्तियों में तथा लेग्युमिनोसी कुल के बीजों के बीजाकरण में यह ऊतक पाए जाते हैं।
जटिल स्थायी ऊतक (Complex Permanent Tissue)
इस प्रकार के ऊतक एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से बने होते हैं। इसे संवहन ऊतक भी कहा जाता है क्योंकि पादपों में यह संवहन का कार्य करते हैं। इसके अन्तर्गत जाइलम एवं फ्लोएम जैसे संवहनीय ऊतक आते हैं।
1. जाइलम (Xylem) क्या है ?
यह पतली एवं लम्बी नलिकाओं के रूप में पौधों की जड़ों से लेकर पत्तियों तक फैले होते हैं। ये जड़ों द्वारा अवशोषित जल एवं खनिज-लवणों को पत्तियों तक पहुँचाने का कार्य करता है तथा पौधों को दृढ़ता प्रदान करता है इसे प्रायः काष्ठ (wood) भी कहा जाता है। जाइलम को जटिल ऊतक इसलिए कहते हैं क्योंकि यह चार प्रकार की कोशिकाओं- वाहिनिकाओं (tracheids), वाहिकाओं (vessel), काष्ठ तन्तु (wood fibres) और काष्ठ मृदूतक (wood parenchyma) की बनी होती है।
वाहिनिकाएँ एवं वाहिकाएँ मृत कोशिकाओं की बनी होती है। वाहिकाएँ टेरिडोफाइट्स व जिम्नोस्पर्म में अनुपस्थित होती हैं।
आवृतबीजियों में उपस्थित जल एवं खनिज लवणों के संवहन हेतु इसमें अनेक वाहिनिकाएँ एवं वाहिकाएँ होती है। जाइलम के अन्तर्गत आने वाले काष्ठ मृदूतक (जीवित व अधिक मात्रा में होती है) स्टार्च तथा वसीय पदार्थों का संचय तथा जल परिवहन में सहायता करते हैं। इसकी कोशिका भित्ति सख्त तथा लिग्निनयुक्त होती है, जो पौधों को अतिरिक्त यान्त्रिक दृढ़ता प्रदान करता है। सामूहिक रूप से इसे काष्ठ तन्तु (Xylem Fibre) कहते हैं।
2. संवहन पूल (Vascular Bundle) क्या है ?
संवहन पूल कैम्बियम सहित या कैम्बियम रहित जाइलम तथा फ्लोयम का बना होता है। कैम्बियम युक्त संवहन पूल खुले (open vascular bundle), जबकि कैम्बियम रहित संवहन पूल बन्द (closed vascular bundle) कहलाते हैं।
एण्डार्क (Endarch) सेन्ट्रीफ्यूगल जाइलम (जब प्रोटोजाइलम मध्य भाग की ओर तथा मेटाजाइलम बाहर की ओर होता है)।
एक्सार्क (Exarch) सेन्ट्रीपीटल जाइलम (जब प्रोटोजाइलम बाहर की तथा मेटाजाइलम केन्द्र की ओर होता है)।
संयुक्त संवहन पूल (Conjoint vascular bundle) जाइलम व फ्लोएम एक अर्द्धव्यास पर साथ-साथ पाए जाते हैं ।
संकेन्द्री (Concentric) एक प्रकार का संवहन ऊतक है, जो दूसरे प्रकार के संवहन ऊतक को घेरे रहता है।
द्वितीयक वृद्धि
जब पौधा छोटा होता है, तब उसमें ऊतक प्राथमिक विभज्योत्तक द्वारा बनते हैं अर्थात् इनके द्वारा निर्मित ऊतकों को प्राथमिक ऊतक कहते हैं।
आयु बढ़ने के साथ द्विबीजपत्री पौधों में नई कोशिकाओं का निर्माण स्थायी मृदूतक द्वारा उत्पन्न नई विभज्योत्तक से होता है। ये नई कोशिकाएँ द्वितीयक ऊतक कहलाती हैं।
इन्हीं द्वितीयक ऊतकों के कारण पौधे के अंगों की मोटाई में वृद्धि होती है, जिसे द्वितीयक वृद्धि कहते हैं।
द्वितीयक वृद्धि एधा (cambium) एवं कॉर्क एधा (cork cambium) के कारण होती है। द्वितीयक वृद्धि केवल द्विबीजपत्री पादपों में ही पाई जाती है। इससे बनने वाले वार्षिक वलयों के आधार पर ही वृक्षों की आयु निर्धारित होती है।
3. फ्लोएम (Phloem) क्या है ?
प्रकाश-संश्लेषण में निर्मित भोज्य पदार्थ का पौधों के विभिन्न भागों में पहुँचाने का कार्य फ्लोएम संवहनीय ऊतक द्वारा संचालित होता है।
यह चार प्रकार की कोशिकाएँ-चालनी नलिकाएँ (sieve tubes), सखि कोशिकाएँ (companion cells), फ्लोएम मृदूतक (phloem parenchyma) तथा फ्लोएम तन्तु (phloem fibres) से मिलकर बनता है।
इनमें से चालनी नलिका में छिद्रित भित्ति मुख्य रूप से भोज्य पदार्थ के संवहन का कार्य करती है, जबकि अन्य शेष कोशिका उसे इस कार्य में सहायता करती है। फ्लोएम की नलिकाएँ जीवित कोशिकाएँ होती हैं तथा पौधों की यान्त्रिक दृढ़ता में विशेष योगदान नहीं करती है। चालनी नलिकाएँ परिपक्व अवस्था में अकेन्द्री (enucleate) हो जाती हैं। ये कोशिकाएँ अनावृतबीजी (gymnosperm) में अनुपस्थित होती हैं।
जाइलम (Xylem) और फ्लोएम (Phloem)में क्या अंतर है ?
1. जाइलम के ऊतक (Tissue) ट्यूबलर के आकार की संरचना के होते हैं, जिसमें क्रॉस दीवारों (Cross walls) की अनुपस्थिति होती है । यह ऊतक एक तारे के आकार जैसा दिखता है. वहीं फ्लोएम ऊतक ट्यूबलर के आकार के, लम्बें होते हैं, पतली छलनी नलिकाओं (Thin Sieve Tubes) के साथ दीवारों (Walls) की उपस्थिति के साथ संरचनाएं वाले ।
2. जाइलम एक संवहनी ऊतक है जो पानी और विघटित खनिजों को जड़ से अवशोषित कर शेष पौधे तक पहुँचाता है और फ्लोएम एक संवहनी ऊतक है जो पौधे के हरे भागों से पौधे के बाकी हिस्सों में प्रकाश संश्लेषण के दौरान तैयार घुलनशील कार्बनिक यौगिकों को स्थानांतरित करता है।
3. जाइलम मुख्य रूप से संवहनी बंडलों (Vascular Bundles) के केंद्र में स्थित होते हैं और फ्लोएम मुख्य रूप से संवहनी बंडलों की परिधि (Periphery) की ओर स्थानीयकृत होते हैं।
4. जाइलेम के फाइबर छोटे होते हैं और फ्लोएम के फाइबर बड़े होते हैं ।
5. जाइलेम जड़ों, स्टेम और पत्तियों में मौजूद होते हैं और फ्लोएम, स्टेम और पत्तियों में मौजूद होते हैं, जो बाद में जड़ों, फलों और बीजों में स्थानांतरित और विकसित होते हैं ।
6. जाइलम का मूवमेंट एक ही दिशा में होता है यानी यूनीडायरेक्शनल (Unidirectional) ऊपर की ओर, वहीं फ्लोएम का द्विदिश यानी दोनों दिशा में (Bidirectional) मूवमेंट होता है (Up and Down) ।
7. जाइलम में ट्रेकिड्स (Tracheids), Vessel Elements, जाइलम पैरेन्काइमा, और जाइलम फाइबर शामिल हैं । वहीं फ्लोएम में शामिल हैं: सह कोशिकाएं (Companion Cells), छलनी नलिकाएं (Sieve Tubes), बास्ट फाइबर (Bast Fibres), फ्लोएम फाइबर, और फ्लोएम पैरेन्काइमा ।
8. जाइलम ऊतक की कोशिकाएं पैरेन्काइमा कोशिकाओं को छोड़कर मृत कोशिकाएं (Dead cells) होती हैं और फ्लोएम ऊतक की कोशिकाएं बास्ट फाइबर को छोड़कर जीवित कोशिकाएं होती हैं।
9. जाइलम में कोशिकाओं की कोशिका भित्ति (Cell wall) मोटी होती है और फ्लोएम की कोशिकाओं की कोशिका भित्ति पतली होती है।
10. लिग्नीफाइबड (Lignified) कोशिका भित्ति (Cell wall) जाइलम में मौजूद होती हैं और फ्लोएम में कोशिका भित्ति (Cell wall) लिग्नीफाइबड (Lignified) नहीं होती है।
11. संवहनी बंडलों (Vascular Bundles) में जाइलम ऊतक की मात्रा फ्लोएम ऊतक से अधिक होती है यानी संवहनी ऊतक में फ्लोएम ऊतक की मात्रा तुलनात्मक रूप से कम होती है।
12. जाइलम ऊतक के दो प्रकार के तत्वों अर्थात जाइलम वाहिकाओं (Xylem Vessels) और वाहिनिकाओं (Tracheid) से होकर ही जल एवं खनिजों को पौधों की जड़ों से उसकी पत्तियों तक पहुंचाया जाता है और फ्लोएम की जीवित कोशिकाएं ‘चालनी नलिकाएँ’ (Sieve Tubes) कहलाती हैं. फ्लोएम में कोशिकाओं की अंतिम भित्ति पर चालनी पट्टियाँ (sieve plates) पायी जाती हैं, जिनमें छोटे–छोटे छिद्र बने होते हैं।
13. जाइलेम घुलनशील खनिज पोषक तत्वों और पानी के अणुओं को जड़ों से पौधे के अन्य हिस्सों तक पहुंचाता है और फ्लोएम भोजन और अन्य पोषक तत्वों सहित चीनी और अमीनो एसिड पत्तियों से भंडारण अंगों और पौधे के बढ़ते भागों तक पहुंचाता है।
14. जाइलेम, पौधे को यांत्रिक शक्ति (Mechanical Strength) प्रदान करता है और स्टेम को मजबूत रहने में मदद करता है वहीं जड़ों, बल्ब (Bulbs) और Tubers जैसे अंगों के भंडारण के लिए पौधों के प्रकाश संश्लेषक क्षेत्रों द्वारा संश्लेषित शर्करा का परिसंचरण करता है।
15. जाइलेम वाष्पशील (Transpiration) और प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के माध्यम से खोए हुए पानी के अणुओं की कुल मात्रा को पूरा करता है और पूरे पौधे में प्रोटीन और mRNAs के परिवहन के लिए जिम्मेदार है ।
विशिष्ट स्थायी ऊतक (Special Permanent Tissue)
बाह्य त्वचा (Epidermis) यह पादप देह की सबसे बाहर वाली पर्त है, जो मुख्यतया सुरक्षात्मक कार्य करती है। यह पादपों के सामान्य प्ररोहों (shoots) से वाष्पोत्सर्जन (transpiration) द्वारा अत्यधिक जल हानि से बचाव करती है। इसका कारण एपिडर्मिस की बाह्य सतह पर क्यूटिन अथवा सुबेरिन नामक कड़ा पदार्थ का जमा होना है, जो पौधों में वाष्पोत्सर्जन क्रिया में होने वाली जलहानि को कम करता है।
स्टोमेटा (Stomata) शाखाओं की बाह्य त्वचा में छोटे-छोटे अति सूक्ष्म छिद्र होते हैं जिन्हें रन्ध्र कहते हैं, जो सेम या गुर्दे (kidneys) के आकार की बाह्य त्वचीय कोशिकाओं से घिरे होते हैं, जिन्हें द्वार कोशिकाएँ (guard cells) कहते हैं। द्वार कोशिकाएँ जीवित, हरितलवक युक्त तथा केन्द्रयुक्त होती हैं। द्वार कोशिकाएँ और आस-पास की बाह्य कोशिकाएँ मिलकर रन्ध्री समूह (Stomatal complex) बनाती है।
बाह्य त्वचा के त्वचा रोम एककोशिकीय या बहुकोशिकीय शाखित या सरल होते हैं। यदि त्वचा रोम स्रावण का कार्य करते हैं, तो उन्हें ग्रन्थिल रोम कहते हैं, यह दो प्रकार की होती हैं
बाह्य ग्रन्थियाँ बाह्य त्वचा पर उपस्थित दंशन रोम विषैले पदार्थ का स्रावण करते हैं, जैसे-बिच्छू पौधे मकरन्दकोष (nectaries), शर्करा जैसे पदार्थ मकरन्द का स्रावण करती है। कीटभक्षी पौधों की पाचक ग्रन्थियाँ प्रोटिओलिटिक एन्जाइम का स्रावण करती हैं।
आन्तरिक ग्रन्थियाँ यह ऊतकों के अन्दर पाई जाती हैं। इसके अन्तर्गत नींबू तथा सन्तरे के फलों के छिलके में तेल ग्रन्थियाँ एवं पान की पत्तियों में श्लेष्मक स्रावी ग्रन्थियाँ, पाइनस में रेजिन एवं टेनिन का स्रावण करने वाली ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं। हाइडेथोड जल का स्रावण करने वाली ग्रन्थियाँ हैं।
रबरक्षीरी (Laticiferous glands) ग्रन्थियाँ कोशिकाएँ लम्बी, पतली भित्ति युक्त, बहुकेन्द्री, गाढ़े तरल लैटेक्स से युक्त कुछ कोशिकाओं में रबरक्षीर भरी होती हैं। ये कोशिकाएँ पतली भित्ति युक्त शाखित तथा बहुकेन्द्रकी एवं स्वतन्त्र इकाइयों के रूप में जैसे यूफोरबिया, मदार तथा कनेर में रबरक्षीरी कोशिकाएँ होती हैं।
पोस्त, रबड़ आदि में रबरक्षीरी वाहिकाएँ पाई जाती हैं, जो अनेक कोशिकाओं के मिलने तथा बीज की परतों के घुल जाने से बनती हैं।
उत्तक से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य
वास्तव में काष्ठ द्वितीयक जाइलम होता है, जो द्वितीयक वृद्धि के दौरान संवहन एधा की सक्रियता के फलस्वरूप बनता है।
पौधों के तनों एवं जड़ों में द्वितीयक वृद्धि संवहन एधा तथा कॉर्क एथा की सक्रियता के फलस्वरूप होता है।
द्वितीयक वृद्धि का आशय-पौधों के तनों या जड़ों में स्थायी पैरेन्काइमा ऊतकों द्वारा उत्पन्न नए विभज्योत्तक से है, जिसके फलस्वरूप पौधों की लम्बाई और मोटाई में वृद्धि होती है। यह वृद्धि सिर्फ द्विबीजपत्री पौधों में ही पाई जाती है, चूँकि ये उसी में ही पाए जाते हैं जबकि एकबीजपत्री पौधों में इसका अभाव होता है। कॉर्क मोटी भित्ति वाली मृत कोशिका होती है जो पौधों की तनों की परिधि पर एक पर्त के रूप में रहती है।
कॉर्क ऊतकों के लिए सुरक्षा का काम करता है।
व्यवसायिक रूप से कॉर्क का उत्पादन क्यूरकस सुबरनामक वृक्ष से होता है।
इस आर्टिकल में हम पादपों के विभिन्न अंगो के बारे में जानेगे जैसे जड़, तना, पत्ती, फूल, फल एवं बीज आदि |
पादप आकारिकी | (Plant Morphology) क्या है ?
पादप आकारिकी का अर्थ है पादप की बाह्य संरचना का अध्ययन। अर्थात् इसके अंतर्गत पादप की सभी बाहर से दिखने वाली संरचनाओं का अध्ययन किया जाता है। आकारिकी शब्द का अर्थ होता है बाह्य संरचना का अध्ययन।
एक पादप को बाहर से दिखने पर उसमें जड़ (Root), तना (Stem), पत्ते (Leaves), फूल (Flower), फल (Fruit), छाल (Bark) आदि दिखाई पड़ते हैं, पादप आकारिकी के अंदर इन्हीं संरचनाओं का अध्ययन किया जाता है।
आकारिकी जीव विज्ञान की वह शाखा होती है जो अंगों की कार्य पद्धति से अधिक महत्व उनके आकार, आकृति, रंग, रूप और रूप में रूपान्तरण, शरीर में उनके स्थान को देती है।
पादप आकारिकी के अन्तर्गत पौधों के शारीरिक आकार जैसे उसके विभिन्न अंगों जड़, तना, पत्ती, फूल, फलों एवं बीजों की रचना व उसके विकास का अध्ययन किया जाता है। पादप के विभिन्न वर्गों; जैसे
1. थैलोफाइटा (शैवाल तथा कवक) जिसमें जड़, तना तथा पत्ती) का अभाव होता है
2. ब्रायोफाइटा वर्ग मे पौधा मूलाभासों (rhizoids), (जड़ों के समान) तनों तथा पत्तियों में विभक्त होता है।
3. टैरिडोफाइट पौधों में सामान्यतया जड़, तना तथा पत्ती भाग उपस्थित होते हैं एवं उसमें संवहन ऊतक जाइलम एवं फ्लोएम युक्त होते हैं।
4. जिम्नोस्पर्म (अनावृतबीजी पौधे) का शरीर जड़, तना तथा पत्तियों में विभेदित होता है जिसमें पूर्णतया विकसित संवहन ऊतक होते हैं।
5. एन्जिमोस्पर्म (आवृतबीजी) पौधे पूर्णत: विकसित तथा अत्यन्त जटिल संरचनाओं से युक्त होते हैं। इसका शरीर जड़, तना एवं पत्तियों में विभक्त होता है। प्रत्येक आवृतबीजी (पुष्पीय) पौधे में प्राय: दो (i) एक भूमिगत मूल तत्र एवं (ii) एक वायवीय प्ररोह तन्त्र, भाग होते हैं |
जड़ तथा उसकी शाखाओं को सामूहिक रूप से मूल तन्त्र कहते हैं। जड़ तथा उसकी शाखाएँ मूल तन्त्र जबकि तना एवं उसकी शाखाएँ, पत्तियाँ, पुष्प एवं फल सम्मिलित रूप से प्ररोह तन्त्र के अन्तर्गत आते हैं।
जड़, तना तथा पत्तियाँ कायिक अंग, जबकि पुष्प और फल प्रजनन अंग होते है। पुष्प में उपस्थित जननांगों के संयोजन क्रिया के फलस्वरूप नई पीढ़ी का विकास होता है।
स्वभाव तथा पोषण के आधार पर पौधों में भिन्नता पाई जाती है। स्वभाव के आधार पर यह शाक, झाड़ी तथा वृक्ष होते है, जबकि पोषण के आधार पर स्वपोषी, परपोषी आदि होते हैं। इन सभी में पादप अंगो का कार्य मूल रूप से समान होता है। इन पौधों का प्रत्येक भाग विशेष कार्य को करने के लिए अनुकूलित होता है |
पादप आकारिकी | (Plant Morphology) के महत्वपुर्ण भाग
थैलोफाईटा का शरीर जड, तना पत्ति में विभक्त नहीं होता, इसके शरीर को थैलस कहा जाता है।
भूमि के ऊपर रहने वाला भाग प्ररोह तंत्र (Shoot system) कहलाता है।
भूमि के नीचे रहने वाला भाग जड़ तंत्र (Root System) कहलाता है।
एन्जियोस्पर्म पादपों को आकार एवं शरीर की बनावट के हिसाब से तीन प्रकारों में विभक्त किया जाता है- शाक, झाड़ी और वृक्षा
तनें विभिन्न कारणों के रूपान्तरित हो जाते हैं जिनमें से मुख्य है- भोजन का संग्रह एवं निर्माण, वाष्पोत्सर्जन कम करना, जनन सुरक्षा आदि।
कुछ पौधों के तनों में कायिक जनन (Vegetative reproduction) के लिए तनों के आकार में रूपान्तरण होता है। उदाहरण- घाँस (दूब घाँस) स्ट्रॉबेरी आदि।
भोजन संग्रह के लिए पौधों के तनों में अनेक प्रकार के रूपान्तरण होते हैं- (1) बल्ब (Bulb) – उदाहरण- प्याज (2) ट्यूबर (Tuber) -उदाहरण- आलू (3) क्राउन (Crown) – उदाहरण- मकड़ी पादप (Spider plant) (4) कोर्म (Corms) – उदाहरण- लहसून
क्लोरोफिल के अतिरिक्त भी कुछ पत्तियों में अनेक वर्णक क्रोमोप्लास्ट (Chromoplast) पाये जाते हैं।
घटपर्णी पादप की पत्तियाँ कीट भक्षण के लिए अत्यधिक रूपान्तरित होकर कलश की आकृति ले लेती हैं।
फूल पौधे का जनन अंग होता है।
फूल मुख्य रूप चार मुख्य भागों में विभक्त होता है- (1) कैलिक्स (Calyx) इसकी एक इकाई सेपल (Sepal) कहलाती है। (2) करोला (Corolla) इसकी इकाई पेटल (Petal) कहलाती है। (3) पुंकेसर (Androecium) इसकी इकाई स्टेमिन (Stemen) कहलाती है। (नर जननांग (4) स्त्रीकेसर (Gyenoecium) इसकी इकाई पिस्टिल (Pistil) कहलाती है। (मादा जननांग) अक्ष (Axis) पर फूलों के खिलने के क्रम को पुष्पविन्यास (Infloresence) कहते हैं। यह अक्ष रैकिस (Rachis) कहलाता है। पुष्पविन्यास विभिन्न पादपों में भिन्न प्रकार का होता हैं।
गोभी का फूल, सूरजमुखी का फूल तथा गेंदे का फूल एकल फूल न होकर पुष्पविन्यास होता है।
लौंग अधखिली कलियाँ होती हैं। जिन्हें इनके खिल कर फूल बनने से ठीक पहले तोड़ लिया जाता है।
रेफलिशिया दुनिया का सबसे बड़ा फूल है, जिसका व्यास लगभग एक मीटर होता है, इससे सड़े मॉस जैसी बदबू आती है।
वोल्फिया विश्व का सबसे छोटा पुष्प है।
केसर में खाने योग्य भाग इसका लंबा स्टिगमा होता है जो इसके स्त्रीकेसर का भाग है।
वास्तविक फूल मात्र एन्जियोस्पर्म पादप में पाये जाते हैं, अन्य निम्न वर्ग के पौधों में फूलों का अभाव होता है।
फलों का निर्माण दो प्रक्रियाओं के द्वारा होता है-(1) निषेचन (Fertilization) के द्वारा (2) पार्थिनोकॉर्पो (Parthenocarpy) के द्वारा अनिषेचित फूलों से बने फलों में बीजों का अभाव होता है। उदाहरण- केले के फल पार्थिनोकॉपी के द्वारा बनते है
फलों की उनकी संरचना की जटिलता के आधार पर तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1) सामान्य फल (Simple Fruit) (2) संयुक्त फल (Aggregat Fruit) (3) बहु फल (Multiple fruits) मात्र एन्जियोस्पर्म पादपों में ही फल बनते हैं।
लीची में खाने योग्य भाग ऐरिल होता है जो कि हाइलम (Hylem) के अतरिक्त रूप से बड़े और मॉसल होने के कारण बनता है। यह हाइलम बीजों के जुड़ने के अण्डाशय से जुड़ने का स्थान होता है।
सेब में जो भाग खाया जाता है, वह वास्तविक फल न होकर मिथ्या फल (Pseudo fruit) होता है, जो फूल के अण्डाशय की दीवार के फूल जाने के कारण बनता है, वास्तविक फल इसके अंदर का बीज वाला भाग होता है |
मूंगफली एक अंतभौमिक (Underground) फल है।
नारियल का पानी इसका तरल भ्रूणपोष (Liquid endosperm) होता है।
मूसला जड़ें सामान्यतः द्विबीजपत्रीय (Dicot) बड़े पादपों में पाई जाती हैं। ये भूमि में अत्यधिक गहराई तक चली जाती हैं। इनमें प्राथमिक जड़ (Primary root) द्वितीयक जड़ें (Secondary root) तृतीयक जड़ें (Tertiary root) कहते हैं।
भोजन संग्रह के लिए जड़ें रूपान्तरित होकर विभिन्न आकारें में वृद्धि करने लगती है उदाहरण- गाजर, मूली, अदरक, शकरकंद, चुकंदर, शलजम आदि जड़ों के भोजन संग्रह के लिए रूपान्तरण ही हैं।
अमरबेल की जड़ों में चूषण क्षमता आ जाती है और ये दूसरे पादप (Host plant) के ऊतकों से भोजन को चूस कर अपना पोषण करते हैं। यह प्रवृत्ति परजीविता (Parasitism) कहलाती है।
दलदली भूमि में पाई जाने वाले वाले मैंग्रूव की द्वितीयक जड़ें जमीन के बाहर निकल आती हैं और वातावरणीय नाइट्रोजन अवशोषित करती हैं। इन रूपान्तरित जड़ों को न्यूमेटोफोर (Pneumatophore) कहते हैं।
इस आर्टिकल में हम जंतुओं के पोषण और पोषक पदार्थों के बारे में बात करेगें | जंतुओं के विकास के लिए कोनसे पोषक पदार्थ आवश्यक होते है ? जंतुओं के विकास के लिय पोषक पदार्थ क्यों जरूरी है ? जैविक क्रियाओं के लिय कोनसे पोषक पदार्थ जरूरी होते है और वो जीवों के कहा से प्राप्त होते है या उन पोषक पदार्थों का स्त्रोंत क्या है ? रासायनिक संगठन के आधार पर पोषक पदार्थों के कितने प्रकार है ?
साथ ही इस आर्टिकल में हम जानेगे कि कार्बोहाइड्रेट्स क्या होते है ? वसा क्या है ? विटामिन क्या होते है ? प्रोटीन क्या होते है और इनका जीवों के शारीरिक विकास में किस प्रकार योगदान है ? खनिज लवण क्या होते है ? आदि
जन्तुओं में पोषण (Nutrition in Animals) क्यों जरूरी है ?
जन्तु अपने पोषण के लिए वनस्पतियों एवं अन्य जन्तुओं पर निर्भर होता है अर्थात् जन्तु उत्पादक न होकर उपभोक्ता होता है।
जन्तु पोषण के दो प्रकार-प्राणिसम पोषण तथा अवशोषी पोषण हैं। प्राणिसम पोषण के अन्तर्गत जन्तु भोजन को अपने शरीर के अन्दर ले जाते हैं अर्थात् निगलते हैं। इसके बाद भोजन का पाचन एवं अवशोषण होता है। वहीं अवशोषी पोषण के अन्तर्गत भोजन का अन्तर्ग्रहण न होकर उसका अवशोषण होता है। उदाहरण फफूंदी में।
जन्तुओं के पोषक पदार्थ (Nutritive Substance of Animals) कोनसे है ?
भोज्य पदार्थों में निहित वे उपयोगी रासायनिक घटक, जिनका उपयुक्त मात्रा में उपलब्ध होना शरीर के विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए अति आवश्यक है, पोषक पदार्थ कहलाते हैं। रासायनिक संगठन के आधार पर पोषक पदार्थों को निम्न भागों में बाँटा गया है
1. कार्बोहाइड्रेट्स
2. वसा
3. प्रोटीन
4. विटामिन
5. खनिज लवण
6. जल
इन पोषक तत्वों में से कार्बोहाइड्रेट तथा वसा ऊर्जा उत्पादन तथा प्रोटीन निर्माणकारी पदार्थ और विटामिन, खनिज लवण एवं जल उपापचयी नियन्त्रक हैं।
कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates)क्या है ? कार्बोहाइड्रेट्स के प्रकार, स्त्रोत और कार्य
यह कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का कार्बनिक यौगिक है, जिसका अनुपात क्रमश: 1 : 2 : 1 है यह पचने के उपरान्त ग्लूकोज में परिवर्तित हो जाते हैं। इसी ग्लूकोज के ऑक्सीकरण से र को ऊर्जा मिलती है। शरीर की कुल ऊर्जा का 50-79% मात्रा को पूर्ति कार्बोहाइड्रेट से ही होती है।
1 ग्राम कार्बोहाइड्रेट के ऑक्सीकरण से 45 किलो कैलोरी ऊर्जा की प्राप्ति होती है।
इसका सामान्य सूत्र (CH2O)n होता है। खाद्य पदार्थों में ये शर्करा, स्टार्च एवं सेलुलोज के रूप में पाए जाते हैं। कुछ कार्बोहाइड्रेट जल में घुलनशील होती है, जैसे शकंरा, जो स्वाद में मीठा होता है, जबकि स्टार्च (मण्ड) एवं सेलुलोज अघुलनशील कार्बोहाइड्रेट के प्रमुख उदाहरण हैं।
पोषण के अन्तर्गत शर्करा ग्लूकोज के रूप में बदल जाता है, जिसका भण्डारण ग्लाइकोजन के रूप में होता है। ग्लूकोज से ग्लाइकोजन बनने की क्रिया ग्लाइकोजेनेसिस कहलाती है।
सेलुलोज क्या है ?
यह पौधे की कोशिका मित्ति में पाए जाते हैं।
कपास एवं कागज शुद्ध सेलुलोज होते हैं।
यह ग्लूकोस का बहुलक है।
पशु, जैसे-गाय, भैंस, बकरी आदि में सेलुलोज का पाचन होता है, परन्तु मनुष्य में इसका पाचन नहीं होता।
कार्बोहाइड्रेट के प्रकार (Types of Carbohydrate)क्या है ?
रासायनिक संरचना के आधार पर इसे तीन श्रेणियों में बाटां गया है।
मोनोसैकेराइड्स (Monosaccharides)
इसमें कार्बोहाइड्रेट की एक ही इकाई होती है।
यह सभी कार्बोहाइड्रेट की सबसे सरल अवस्था होती है।
ये जल में घुलनशील तथा मीठो होती है। .
ग्लूकोज और फ्रक्टोस पौधों में सामान्य रूप से पाया जाने वाला मोनोसैकेराइड्स है।
इनमें से ग्लूकोज प्रकाश-संश्लेषण का मुख्य उत्पाद है तथा इससे ऊर्जा उपलब्ध होते हैं, जबकि फ्रक्टोस फलों में पाए जाते हैं।
ग्लूकोज सबसे महत्वपूर्ण मोनोसैकेराइड्स है, जो फलों में मुख्यतया अंगूर और शहद में मिलता है। फ्रक्टोस शरीर के अन्दर ग्लाइकोजन में परिवर्तित हो जाती है।
शरीर में पहुंचे सभी कार्बोहाइड्रेट्स सर्वप्रथम ग्लूकोज में जल अपघटित होते हैं।
ऑलिगोसैकेराइड्स (Oligosaccharides)
ये मोनोसैकेराइड्स के 2-10 अणुओं से मिलकर बनता है, जैसे
ग्लूकोस + ग्लूकोस = माल्टोस
ग्लूकोस + फ्रक्टोस = सुक्रोस
ग्लूकोस + ग्लैक्टोस = लैक्टोस
सुक्रोस, माल्टोस और लैक्टोस प्रमुख डाइसैकेराइड्स हैं।
सुक्रोस गन्ना, चुकन्दर, गाजर तथा मीठे फलों में पाया जाता है।
माल्टोस स्वतन्त्र रूप से नहीं वरन् बीजों की (मुख्यतया जौ) शर्करा अर्थात् माल्ट शुगर होती है।
पॉलीसैकेराइड्स (Polysaccharides)
ये जल में अघुलनशील होते हैं, जो अनेक मोनोसैकेराइड्स अणुओं के मिलने से बनता है।
ये पौधों में मुख्य रूप से सेलुलोज में पाए जाते हैं।
आवश्यकता पड़ने पर यह जल-अपघटन (hydrolysis) द्वारा ग्लूकोस में बदल जाता है। इस रूप में यह ऊर्जा उत्पादन हेतु संग्रहित ईंधन का कार्य करता है।
पॉलीसैकेराइड के प्रमुख उदाहरण
मण्ड या स्टार्च सभी प्रकार के अनाजों, सब्जियों, विशेषकर आलू, शकरकन्द आदि में मिलता है।
ग्लाइकोजन जन्तु के शरीर में संचित अवस्था में रहता है और आवश्यकता पड़ने पर इसका उपयोग होता है।
काइटिन आर्थोपोडा संघ के जन्तुओं के बाहा कंकाल का निर्माण।
सेलुलोज पौधों की कोशिका भित्ति का निर्माण करती है।
कार्बोहाइड्रेटस के कार्यकोनसे है ?
यह शरीर को ऊर्जा प्रदान करने वाले मुख्य स्रोत होते हैं।
ये मण्ड के रूप में ‘संचित ईंधन’ का कार्य करते हैं।
यह वसा में बदलकर ‘संचित भोजन’ का कार्य करते हैं।
यह DNA और RNA के घटक पेन्टोज शर्करा होता है।
प्रोटीन को शरीर के निर्माणकारक कार्यों हेतु सुरक्षित रखते हैं
शरीर में वसा के उपयोग हेतु यह अत्यन्त ही आवश्यक है।
वसा (Fats)क्या है ? वसा के स्त्रोत, प्रकार और कार्य
ये कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के असंतृप्त यौगिक होते हैं किन्तु रासायनिक रूप से कार्बोहाइड्रेट से भिन्न होती है।
इसमें कार्बोहाइड्रेट्स की तुलना में ऑक्सीजन की बहुत कम मात्रा होती है। ये पानी में अघुलनशील परन्तु क्लोरोफॉर्म, बेन्जीन, पेट्रोलियम आदि कार्बनिक विलायकों में घुलनशील होती है। क्षार द्वारा इसका पायसीकरण किया जा सकता है।
वसा एक अणु ग्लिसरॉल तथा वसा अम्ल (fatty acid) के तीन अणुओं के एस्टर बन्ध द्वारा बनते हैं इसलिए इन्हें ट्राइग्लिसराइड्स कहते हैं।
शरीर की कुल ऊर्जा का 20-30% ऊर्जा वसा से प्राप्त होती है, जबकि एक ग्राम वसा के पूर्ण ऑवसीकरण से 9.3 किलो कैलोरी ऊर्जा मुक्त होती है। वसा का संचय विशिष्ट वसीय ऊतक (adipose tissues) में होता है। 20°C पर वसा तेल कहलाते हैं।
वसा के प्रकार (Type of Fats)कोनसे है ?
रासायनिक दृष्टि से वसा मुख्यतया तीन प्रकार की होती हैं-1. सरल वसा 2. संयुक्त वसा 3. व्युत्पन्न वसा।
सरल वसा (Simple Fats)
सरल वसा में केवल ग्लिसरॉल व वसा अम्ल एस्टर बन्ध द्वारा संयुक्त होते हैं।
संयुक्त वसा (Complex Fats)
इन वसाओं में अम्ल तथा एल्कोहॉल के साथ-साथ नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस भी होते हैं। इन्हें जटिल लिपिड्स (compler lipids) भी कहा जाता है।
ये मुख्यतया दो प्रकार के होते हैं – फॉस्फोलिपिड और ग्लाइकोलिपिडा
इनमें से फॉस्फोलिपिड में फॉस्फोरस का अंश होता है, जो पित्त, यकृत एवं पेशियों में संचित होती है। परन्तु ग्लाइकोलिपिड तत्रिका तत्र के ऊतक में पाई जाती है।
व्युत्पन्न वसा (Derived Fats)
ये संयुक्त वसाओं के जल अपघटन से बनती हैं, जैसे-स्टीरॉयड (लिंग हॉर्मोन, पित्त अम्ल), स्टीरॉल (कोलेस्ट्रॉल, विटामिन-D), प्रोस्टाग्लैन्डिन वसा अम्ल व्युत्पन्न है, जो अरेखित पेशियों के संकुचन, रुधिर स्कन्दन, शोघ तथा एलर्जी प्रतिक्रियाओं में भाग लेते हैं।
वानस्पतिक वसा (Plant Fats)
यह प्रकृति के मुख्य रूप से वनस्पतियों, फलों तथा बीजों में पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है।
जन्तुओं में वसा ऊतक, यकृत तथा अस्थि मज्जा में संचित रहती है। वसा अम्ल दो प्रकार के होते हैं
संतृप्त वसा और असंतृप्त वसा अम्ला अधिकतर संतृप्त वसा जन्तु वसा होता है।
सामान्य ताप पर यह ठोस होता है, जैसे-मक्खन परन्तु नारियल का तेल एवं ताड़ का तेल ही संतृप्त वनस्पति तेल के उदाहरण हैं, जबकि असंतृप्त वसा मछली के तेल एवं वनस्पति तेलों में मिलते हैं।
वसा के प्रमुख कार्य
यह ठोस रूप में शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है।
यह त्वचा के नीचे जमा होकर शरीर के ताप को बाहर नहीं निकलने देती है।
शरीर के विभिन्न अंगों की चोवें से बचाती है। – आरक्षित भोजन के रूप में।
प्लाज्मा झिल्ली के निर्माण में सहायक होती है।
प्रोटीन (Protein)क्या है ? प्रोटीन के प्रकार, स्त्रोत एवं कार्य
यह एक जटिल कार्बनिक यौगिक होता है। प्रोटीन शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1938 में वरजेलियस ने किया। शरीर की वृद्धि एवं ऊतकों के टूट-फूट की मरम्मत में प्रोटीन की भूमिका अहम होती है।
इसके अलावा शरीर में विभिन्न रासायनिक क्रियाओं के लिए उत्प्रेरक के रूप में विभिन्न एन्जाइम की भूमिका होती है, जो प्रोटीन ही होता है। प्रोटीन अमीनो अम्लों के बहुलक होते हैं इनमें लगभग 20 प्रकार के अमीना अम्ल पाए जाते हैं।
मानव शरीर में इनमें से 10 प्रकार के अमीनो अम्ल का संश्लेषण शरीर में स्वयं होता है, जबकि शेष 10 प्रकार के अमीनो अम्ल भोजन के द्वारा प्राप्त करते हैं।
कुछ आवश्यक प्रोटीनके प्रकार
शारीरिक प्रोटीन कार्य एन्जाइम्स जैव उत्प्रेरक, जैव-रासायनिक अभिक्रियाओं में सहायक हैं। हॉर्मोन्स शरीर की क्रियाओं का नियनन करते हैं।
परिवहन प्रोटीन हीमोग्लोबिन, विभिन्न पदार्थों का परिवहन करती है। संरचनात्मक प्रोटीन कोशिका एवं ऊतक निर्माण करती है।
रक्षात्मक प्रोटीन संक्रमण से रक्षा करने में सहायक है। उदाहरण-प्रतिरक्षी। संकुचन प्रोटीन ये पेशी संकुचन एवं चलन हेतु उत्तरदायी है, उदाहरण-मायोसिन, एक्टिन आदि।
प्रोटीन के कार्य
यह शरीर की वृद्धि तथा ऊतकों की मरम्मत करता है।
यह एन्जाइम तथा विटामिन का निर्माण करता है। – प्रोटीन श्वसन अंगों के निर्माण में भाग लेता है।
यह संयोजी ऊतकों, अस्थियों तथा उपास्थियों के निर्माण में भाग लेता है।
प्रोटीन की कमी से मैरेस्मस नामक रोग हो जाता है।
विटामिन (Vitamins) क्या है ? विटामिन (Vitamins) के प्रकार, स्त्रोत और उपयोग
कैसिमिर फूंक ने इस शब्द का प्रतिपादन किया। यह स्वयं ऊर्जा उत्पादन तो नहीं कर सकता परन्तु ऊर्जा सम्बन्धी रासायनिक क्रियाओं को नियन्त्रित करता है।
हमारा शरीर विटामिन – D एवं K का संश्लेषण कर सकता है, जबकि अन्य विटामिन बाह्य स्रोत (भोजन) से प्राप्त किए जाते हैं।
इनका नामकरण अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षरों के अनुसार किया गया है; जैसे-A, B, C, D, E एवं KI
विलेयता के आधार पर विटामिनों को दो वर्गों में बाँटा गया है।
1. जल में घुलनशील विटामिन – विटामिन-B समूह और विटामिन-C
2. वसा में घुलनशील विटामिन – विटामिन- A, D, E एवं KI
विटामिनों के स्रोत, कार्य एवं कमी के प्रभाव
खनिज लवण (Minerals)
खनिज लवण (Minerals) भोजन के अकार्बनिक अवयव है, जो शरीर के उपापचयी क्रिया को नियन्त्रित करते हैं। यह शरीर के ऊतकों के निर्माण के लिए कच्चा पदार्थ है और एन्जाइम तथा विटामिन के आवश्यक अंग है।
खनिज पदार्थ के मुख्य स्त्रोत और कार्य
सन्तुलित भोजन (Balanced Diet)क्या है ?
वह भोजन, जिसमें सभी पोषक तत्त्व उचित अनुपात में सम्मिलित होते हैं सन्तुलित भोजन कहलाते हैं। इसका निर्धारण प्रत्येक व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और कार्य के अनुरूप होता है।
पोषक तत्त्वों के स्रोत : एक दृष्टि में
पोषक पदार्थ
स्रोत
कार्बोहाइड्रेट
चीनी, शहद, दूध, अनाज, आलू आदि
प्रोटीन
अण्डा, दूध, पनीर, दाल, मछली आदि
वसा
घी, तेल, दूध, मांस आदि
विटामिन
मांस, मछली, दूध, गाजर, हरी सब्जी आदि
खनिज लवण
मांस, दूध, अनाज, हरी सब्जी आदि
कुपोषण (Malnutrition) क्या है ?
भोजन की आवश्यक मात्रा तथा आवश्यक तत्त्वों का समावेश न होना कुपोषण की स्थिति पैदा करती है। सामान्यतया कुपोषण की स्थिति प्रोटीन की कमी के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती है, जिसके कारण शरीर के वृद्धि एवं विकास में बाधा उत्पन्न होती है।
अपोषण (Under-nutrition)
इसका आशय भोजन में आवश्यक तत्त्वों का सर्वथा अभाव होना है, जिसके परिणामस्वरूप शरीर की आवश्यकता की पूर्ति नहीं हो पाती है।
पोषण की अधिकता के परिणाम
संतृप्त वसा की अधिकता से रुधिर में कॉलेस्टरॉल को मात्रा बढ़ जाती है, जो रुधिर वाहिनियों की दीवार पर जम जाती है। फलत: रुधिर को गति कम हो जाती है एवं रुधिर दाब बढ़ जाता है एवं हृदय सम्बन्धी रोग हो जाते हैं।
अधिक कैलोरी वाले भोजन, जैसे-घी, शक्कर आदि के सेवन से मोटापा तथा डायबिटीज की समस्या आती है।
इस आर्टिकल में हम प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के बारे में विस्तृत से जानेगे | प्रकाश संश्लेषण क्या है? (Definition of Photosynthesis in Hindi), प्रकाश संश्लेषण की अभिक्रिया क्या है ? ऑक्सीजन युक्त प्रकाश संश्लेषण क्या है ? (Photosynthesis with oxygen in Hindi), प्रकाश संश्लेषण को प्रभावित करने वाले कारक क्या है ? (factors effecting photosynthesis in Hindi), प्रकाशिक अभिक्रिया (Light Reaction) क्या है ?
प्रकाश संश्लेषण क्या है? (Definition of Photosynthesis in Hindi)
प्रकाश–संश्लेषण पृथ्वी पर होने वाली एकमात्र प्रक्रिया है जिस पर मनुष्य तथा समस्त जीवधारियों का जीवन निर्भर होता है।
इस प्रक्रिया द्वारा हरे पौधे, शैवाल तथा हरित लवक-धारी जीवाणु, अकार्बनिक अणुओं से सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में अपना भोजन (कार्बनिक पदार्थ) बनाते हैं।
प्रकाश-संश्लेषण सिर्फ हरे पौधों एवं कुछ जीवाणुओं (साइनोबैक्टीरिया) में घटित होने वाली वह क्रिया है जिसमें पौधों के हरे भाग सौर ऊर्जा को ग्रहण कर वायुमण्डल से ली गई कार्बनडाइऑक्साइड Co2 तथा भूमि से अवशोषित जल (H20) के द्वारा कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते हैं तथा आक्सीजन गैस (O2) बाहर निकालते हैं।
प्रकाश-संश्लेषण ही एकमात्र ऐसी प्राकृतिक प्रक्रिया है जो वातावरण में ऑक्सीजन छोड़ती है तथा सभी जीवित प्राणी श्वसन हेतु इसी ऑक्सीजन पर निर्भर हैं। हरितलवकों में प्रकाशसंश्लेषण क्रिया सम्पन्न होती है अथवा अन्य शब्दों में हरितलवक सौर-बैटरी की तरह कार्य करके कार्बोहाइड्रेटों का निर्माण करते हैं।
इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन एवं जल सहउत्पाद (byproduct) के रूप में निष्काषित होते हैं। यह क्रिया क्लोरोफिल को उपस्थिति में सम्पन्न होती है।
जोसेफ प्रीस्ट्ले तथा इसके पश्चात् जान इंजेनहॉज ने बताया कि पौधों में वायुमंडल से CO2 को ग्रहण करने एवं वातावरण में ऑक्सीजन छोड़ने की क्षमता है।
इंजेनहॉज ने यह भी बताया कि पौधो द्वारा ऑक्सीजन छोड़ने की प्रक्रिया सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति तथा पौधो के हरे भाग में ही होती हैं।
रॉबर्टहिल ने प्रदर्शित किया कि यदि पृथक्कृत हरितलवकों को इलेक्ट्रॉन ग्राही की उपस्थिति में प्रतिदीप्त किया जाए तो वह ऑक्सीजन मुक्त करते हैं तथा इलेक्ट्रॉन ग्राही अपचयित हो जाते हैं। इस अभिक्रिया को हिल प्रतिक्रिया कहते हैं। इसके द्वारा जल (प्रकाश अपघटन) को इलेक्ट्रॉन के स्रोत के रूप में प्रयोग करके कार्बन स्थिरीकरण द्वारा ऑक्सीजन एक उपोत्पाद के रूप में मुक्त होती है।
प्रकाश संश्लेषण का रासायनिक समीकरण
CO2 के 6 अणु, पानी (H2O) के 12 अणुओं के साथ सौर ऊर्जा की सहायता से जुड़ जाते हैं| परिणामस्वरूप कlरबोहाइडरेट (C6H12O6) या शर्करा का 1 अणु, सांस लेने लायक ऑक्सीजन और पानी के 6 अणुओं के साथ मिलता है।
इस प्रक्रिया का सबसे प्रमुख घटक क्लोरोफिल है जो हर प्रकार के पौधों में पायी जाती है। इनका मुख्य काम सूर्य की रौशनी को सोखने का होता है। यह हरे रंग की होती है सूर्य के किरणों के लाल और नीले रंगो को सोख लेते हैं। इसका एक बैक्टीरियल संस्करण भी होता है जिसको बक्टेरिओक्लोरोफिल कहते हैं|
प्रकाश-संश्लेषी वर्णक (Photosynthetic Pigments)
1. क्लोरोफिल-a, b, c, d तथा e प्रकार के होते हैं और मुख्य सौर ऊर्जा अवशेषी वर्णक हैं।
2. कैरोटिनॉइड्स अर्थात् कैरोटीन एवं जेन्थोफिल, जिसमें कैरोटीन नारंगी और पीले रंग के होते हैं। हरे पौधों में β-कैरोटीन प्रमुखता से पाया जाता है। जन्तु β-कैरोटीन को विटामिन-A में बदल देते हैं। जैन्थोफिल पौधों के हरे भागों में कैरोटीन के साथ पाए जाते हैं।
कैरोटिनॉइड्स सहायक वर्णक है तथा प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित कर क्लोरोफिल को स्थानान्तरित कर देते हैं।
3. फाइकोबिलिन लाल फाइकोइरिथ्रिन तथा नीला फाइकोसायनिन प्रमुख फाइकोबिलिन है। यह सहायक वर्णक है, जो प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित कर क्लोरोफिल को देते हैं।
प्रकाश-संश्लेषण क्रिया (Photosynthesis Process)
यह क्रिया एक उपचयन-अपचयन (oxidation redution) अभिक्रिया है। इसमें जल का उपचयन ऑक्सीजन के बनने में तथा कार्बन डाइऑक्साइड का अपचयन शर्करा के निर्माण में होता है।
प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया दो अवस्थाओं में होती हैं
1. प्रकाशिक अभिक्रिया 2. अप्रकाशिक अभिक्रिया।
प्रकाशिक अभिक्रिया (Light Reaction)
यह अभिक्रिया प्रकाश की उपस्थिति में हरितलवक के ग्रेना में होती है। इसे हिल अभिक्रिया भी कहते हैं प्रकाशिक अभिक्रिया के सम्बन्ध में रॉबर्ट इमर्सन ने विभिन्न तरंगदैथ्यों के प्रकाश में क्वाण्टम अर्थात् प्रत्येक क्वाण्टम उपलब्धि उपभोग से मुक्त हुए ऑक्सीजन अणुओं की संख्या, ज्ञात की और यह बताया कि 680 nm से अधिक तरंगदैर्ध्य में क्वाण्टम उपलब्धि में कमी आ जाती है। यह कमी दृश्य प्रकाश के लाल क्षेत्र में होने के कारण रेड ड्रॉप कहलाती है। यदि 680 nm से अधिक तरंगदैर्ध्य के साथ लघु तरंगदैर्ध्य भी दे दी जाए तो प्रकाश-संश्लेषण की दर दोनों अलग-अलग तरंगदैर्ध्या में कुल दर की तुलना में बढ़ जाती है। इसे ही इमरसन प्रभाव कहा जाता है।
प्रकाश अभिक्रिया में दो वर्णक तन्त्र भाग लेते हैं, जो क्रमशः वर्णक तन्त्र (pigment system I) तथा वर्णक तन्त्र ।। (pigment system II) कहलाते हैं।
P700 वर्णक तन्त्र I का प्रतिक्रिया केन्द्र है, जिसमें प्रकाश-रासायनिक क्रिया होती है अर्थात् यहाँ से उच्च उर्जा इलेक्ट्रॉन का उत्सर्जन होता है। वर्णक तन्त्र । का उपयोग चक्रीय प्रकाश फॉस्फोरिलेशन तथा अचक्रीय प्रकाश की फॉस्फोरिलेशन दोनों में होता है। वर्णन तन्त्र ।। 600mµ की लघु तरंगदैर्घ्य अवशोषित करता है। इस तन्त्र के प्रमुख वर्णक क्लोरोफिल-b तथा फाइकोबिलिन्स है। इस वर्णक तन्त्र का उपयोग केवल अचक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलेशन में होता है।
ग्रेना के प्रमुख कार्य क्या होते है ?
1. सूर्य प्रकाश से क्लोरोफिल के इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर अपनी कक्षा छोड़ देते हैं। जब ये इलेक्ट्रॉन इस ऊर्जा को मुक्त करते हैं तो ADP + P संयुक्त होकर ATP बनाते है इस प्रकार सूर्य का प्रकाश ऊर्जा रसायनिक ऊर्जा में बदल जाती है।
2. उत्तेजित इलेक्ट्रॉनों द्वारा जल का हाइड्रोजन आयन (H+) और हाइड्रॉक्सिल (OH–) आयनों में अपघटन हो जाता है। जल के अपघटन के लिए ऊर्जा प्रकाश द्वारा मिलती है। इस प्रक्रिया के अन्त में ऊर्जा के रूप में ATP तथा NADPH निकलता है, जो अप्रकाशिक क्रिया में मदद करते हैं। इसमें ऑक्सीजन की विमुक्ति जल से होती है न कि Co2 से। इस प्रकार प्रकाशिक क्रिया से (1) ATP बनते हैं (2) NADPH2 बनता है (3) O2 विमुक्त होती है।
अप्रकाशिक अभिक्रिया (Dark Reaction) C3
इस क्रिया में प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती है। यह क्लोरोप्लास्ट (हरितलवक) के स्ट्रोमा में होती है। इस अभिक्रिया के लिए ऊर्जा प्रकाश अभिक्रिया से मिलती है। इस अभिक्रिया में प्रकाश अभिक्रिया के क्रम में उत्पन्न NADPH एवं ATP दोनों ही अणुओं का उपयोग कार्बन डाइऑक्साइड से कार्योहाइड्रेट के संश्लेषण के लिए किया जाता है।
मैल्विन कैल्विन एवं बेन्सन ने कैल्विन चक्र (C3 चक्र) की खोज की। इसमें राइबुलोज वाई फॉस्फेट CO2 को ग्रहण कर फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल का संश्लेषण होता है। यह प्रथम उत्पाद है।
हैच एवं स्लैक ने एकबीजपत्री पौधों (जैसे-गन्ना, मक्का, साइप्रस आदि) में C4 चक्र की खोज में इसका प्रथम स्थायी उत्पाद 4-C यौगिक ऑक्सेलो एसोटिक अम्ल है। इसमें पर्णमध्योतक कोशिकाएँ तथा पूलाच्छद कोशिकाएँ भाग लेती हैं।
C3 पौधों में प्रकाश-श्वसन उपस्थित होता है, जबकि C4 पौधों में अनुपस्थित होता है।
C3 पादपों में CO2 उपयोग की कम कार्यक्षमता के एक अणु के स्थिरीकरण के लिए 3ATP व 2NADPH23 की आवश्यकता होती है, जबकि C4 पादपों में CO2 उपयोग की अधिक कार्यक्षमता, CO2 के एक अणु के स्थिरीकरण के लिए 5ATP व दो NADPH2 की आवश्यकता होती है।
मांसलोद्भिद् पौधों, जैसे-नागफनी, अजूबा, अगेव, क्लेचू में CO2 स्थिरीकरण रात में होता है इसे CAM (क्रेसुलेसिन एसिड मेटाबॉल्जिम) कहते हैं।
प्रकाश-संश्लेषण को प्रभावित करने वाले कारक
1. प्रकाश लाल तरंगदैर्ध्य में प्रकाश-संश्लेषण की दर अधिकतम उसके बाद नीला तथा हरे तरंगदैर्ध्य में सबसे कम होती है। इसके अलावा पीली और अवरक्त प्रकाश में यह क्रिया बिल्कुल ही नहीं होती है।
2. CO2 वायुमण्डल में CO2 की मात्रा बढ़ने पर प्रकाश-संश्लेषण की दर बढ़ जाती है।
3. तापमान पौधों में प्रकाश-संश्लेषण की दर 10°C से 35°C तापमान तक बढ़ती है। इससे अधिक ताप पर एन्जाइम का विकृतिकरण (denaturation) हो जाता है।
4. प्रकाश तीव्रता प्रकाश की निम्न तीव्रता पर प्रकाश-संश्लेषण की दर बढ़ती है और जैसे-जैसे तीव्रता उच्च होती है, यह घटती है।
5. ऑक्सीजन C3 पौधों में विशेषकर अधिक तापमान पर ऑक्सीजन प्रकाश-संश्लेषण के दर को कम करती है।
6. वायुमण्डलीय प्रदूषक SO2, ओजोन, CO आदि प्रकाश-संश्लेषण दर को कम करता है।
7. खनिज लवण Mg, Mn, Fe, N, S, की कमी से प्रकाश-संश्लेषण की दर घटती है।
8. प्रकाश-संश्लेषी उत्पाद प्रकाश-संश्लेषी अन्तिम उत्पाद (मण्ड) के कोशिका में संचय होने से प्रकाश-संश्लेषी दर घट जाती है।
विभिन्न उपापचयी क्रियाओं के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा जीवों को खाद्य पदार्थों के ऑक्सीकरण से प्राप्त होती है। पोषण उन सभी क्रियाओं का योग है, जिसमें भोजन का अन्तर्ग्रहण, पाचन, अवशोषण तथा वहिष्करण होता है।
पादपों में पोषण (Nutrition in Plants)
विधि के आधार पर पौधों को दो भागों स्वपोषित तथा परपोषी अथवा विषमपोषी पौधे में बाँटा गया है।
स्वपोषित पौधे (Autotrophic Plants)
अधिकांश पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में पर्णहरित (Chlorophyl) की सहायता से वायुमण्डल से CO2 और भूमि से जल ग्रहण कर प्रकाश-संश्लेषण द्वारा कार्बनिक भोज्य पदार्थ बना लेते हैं। ये पौधे जड़ों द्वारा भूमि से विभिन्न खनिज पोषकों का अवशोषण करते हैं।
परपोषित पौधे (Heterotrophic Plants)
पर्णहरित की अनुपस्थिति के कारण ये पौधे अपना भोजन स्वयं नहीं बना पाते हैं। अत: ये अपना भोजन अन्य स्रोतों से प्राप्त करते हैं।
परजीवी पौधे अपने भोजन के लिए दूसरे जीवित पौधों अथवा जन्तुओं पर निर्भर रहते हैं। परजीवी पौधे के शरीर का कोई भी भाग परजीवी मूल (Haustorium) में रूपान्तरित हो जाता है और पोषक से भोज्य पदाथों का अवशोषण करता है।
मृतोपजीवी पौधे (Saprophytic Plants)
इस प्रकार के पौधों में पोषण जीवों के मृत, सड़े हुए शरीर से अपना भोजन प्राप्त करते हैं। अनेक कवक तथा जीवाणु मृतोपजीवी होते है।
सहजीवी पौधे (Symbiotic Plants)
इसके अन्तर्गत दो पौधे एक-दूसरे का पूरक बनकर एक-दूसरे को लाभ पहुँचाते हुए जीवित रहते हैं। इसके अन्तर्गत लाइकेन (शैवाल और कवक) सहजीवी के रूप में, मुख्य रूप से आते हैं, जिसमें कवक को शैवाल से पोषण की प्राप्ति तथा शैवाल को कवक से कवक जाल द्वारा सुरक्षा प्रदान किया जाता है। लेग्युमिनोसी कुल के पौधों की जड़ों के गाँठ में पाए जाने वाले राइजोबियम बैक्टीरिया भी सहजीवी के उदाहरण हैं, जिसमें उसे उस पौधों से पोषक तत्व प्राप्त होते हैं तथा पौधे को नाइट्रोजन तत्व की प्राप्ति होती है।
कीटभक्षी पौधे (Insectivorous Plants)
इस प्रकार के पौधे आंशिक रूप से स्वपोषी तथा परपोषी दोनों होते हैं। इसका आशय यह है कि ये पौधे पर्णहरित की उपस्थिति के कारण
अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं, परन्तु नाइट्रोजन की पूर्ति कीटों को पकड़कर तथा उनका पाचन कर पूरी करते हैं।
पौधों में पोषण के लिए अनिवार्य तत्व
डी. साउसर ने बताया कि पौधे खनिज पदार्थों पर निर्भर हैं और खनिज पदार्थों को मूल तन्त्र द्वारा मिट्टी से शोषित करते हैं। खनिज तत्वों को दो समूहों में रखते हैं।
अत्यावश्यक तत्व C, H, O, N, P, K, Mg, Ca, S (कुल = 9 तत्व)
कम आवश्यक तत्व Zn, Cu, Mn, Fe, B, Cl, Mo आदि
नाइट्रोजन पोषण
पौधों को न्यूक्लिक अम्ल, प्रोटीन तथा अन्य नाइट्रोजन युक्त पदार्थों के संश्लेषण हेतु नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है, यद्यपि 78% नाइट्रोजन वायुमण्डल में है, किन्तु पौधे वातावरण से सीधे नाइट्रोजन को गैसीय रूप में ग्रहण नहीं कर सकते हैं बल्कि नाइट्राइट (NO–2), नाइट्रेट (NO–3) व अमोनियम (NH4+) के रूप में प्राप्त करते हैं। इसलिए नाइट्रोजन के यौगिकीकरण (nitrogen fixation) का पौधों के लिए महत्त्व है।
नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation)
वायुमण्डल की मुक्त नाइट्रोजन जैविक और अजैविक विधियों द्वारा विभिन्न यौगिकों में बदल जाती है अजैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण बादलों में बिजली के चमकने से होता है।
मिट्टी में स्वतन्त्र रूप से पाए जाने वाले अवायवीय (anaerobic) जीवाणु; जैसे-क्लॉस्ट्रिडियम, वायवीय (aerobic) जीवाणु; जैसे- एजोटोबैक्टर स्वतन्त्र नीले-हरे शैवाल; जैसेनॉस्टॉक, एनाबीना आदि स्वतन्त्र नाइट्रोजन का। स्थिरीकरण करने में सक्षम होते हैं क्योंकि वे अपने निफ जीन (नाइट्रोजन स्थिरीकारक जीन) की सहायता से नाइट्रोजिनेस नामक एन्जाइम का संश्लेषण कर लेते हैं जो उत्प्रेरक का कार्य करता है।
नाइट्रोजीनेस एन्जाइम नाइट्रोजन को अमोनियम यौगिकों में अपचयित करने की क्षमता रखता है।
राइजोबियम लेग्युमिनोसेरम नामक जीवाणु लेग्युमिनोसी कुल के पौधों (जैसे-चना, मटर, मूंगफली आदि) की जड़ में प्रवेश कर ग्रन्थिकाएँ बनाता है, जिसमें लाल रंग का वर्णक लैगहीमोग्लोबिन पाया जाता है, जो प्रकृति से नाइट्रोजन लेकर नाइट्रेट में बदल देते हैं।
अमोनीकरण (Ammonification)
जीवाणु; जैसे – बैसिलस रेमोसस, बैसिलस वल्गेरिस तथा बैसिलस मायकॉइड्स द्वारा पौधे तथा जन्तुओं के मृत शरीर की प्रोटीन से अमोनिया बनाने की क्रिया अमोनीकरण कहलाती है।
नाइट्रीकरण (Nitrification)
पुष्पी पादप नाइट्रेट (NO–3) आयनों का अवशोषण करते हैं। नाइट्रोसोमोनास अथवा नाइट्रोसोकोकस नामक जीवाणु अमोनियम आयनों (NH4+) का ऑक्सीकरण करके उन्हें (NO–2) (नाइट्राइट) आयन में परिवर्तित कर देता है। फिर नाइट्रोबैक्टर नामक जीवाणुओं द्वारा इनको नाइट्रेट (NO–3) में बदलने की क्रिया नाइट्रीकरण कहलाती है।
विनाइट्रीकरण (Denitrification)
कुछ जीवाणु; जैसे – थायोबैसिलस डीनाइट्रीफिकेंस, स्यूडोमोनास डीनाइट्रीफिकेन्स आदि नाइट्रोजन और अमोनियम यौगिकों को नाइट्रोजन में परिवर्तन कर देते हैं, जो पुन: वायुमण्डल में पहुँच जाती है। इसी तरह में नाइट्रोजन चक्र चलता रहता है।
विभिन्न तत्त्वों के कार्य तथा कमी के प्रभाव
तत्व
स्त्रोंत
विशेष कार्य
न्यूनतालक्षण
N
NO–2, NO–3या NH4+
प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल, हॉर्मोन, विटामिन, हरितलवक तथा ATP के निर्माण में।
हरिमाहीनता तथा स्तम्मित वृद्धि।
K
K+
रन्ध्र के खुलने तथा बन्द होने की क्रिया में महत्त्वपूर्ण योगदान। कोशिका को स्फीत बनाए रखने में, प्रोटीन संश्लेषण में।
पत्तियों के किनारे पीले पड़ जाते हैं। ऊतकक्षयी क्षेत्र बनते हैं, पत्तियों नीचे की ओर मुड़ जाती हैं तथा तना कमजोर हो जाता है।
P
H2PO–4
कोशिका झिल्ली, प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल आदि का मुख्य अवयव।
वृद्धि निरुद्ध हो जाती है। पत्तियाँ हरे रंग की होती हैं। काल पूर्व मृत्यु।
Ca
Ca2+
झिल्ली की विभेदी पारगम्यता बनाए रखने में, कुछ एन्जाइम को क्रियाशील करने में तथा मिडिल लेमेला में कैल्शियम पेक्टेट के रूप में।
स्तम्भित वृद्धि, युवा पत्तियाँ कुरुना (molted) हो जाती हैं, पौधे स्थायी रूप से मुरझा जाते हैं।
Mg
Mg2+
फॉस्फेट उपापचय में एन्जाइम क्रियाशील करने के लिए, राइबोसोम को जोड़ने में, पर्णहरिम का मुख्य अवयव।
हरिमाहीनता, ऊतकक्षयी क्षेत्र, एन्थोसायनिन का बनना।
S
SO2+ 4
प्रोटीन, विटामिन, फेरोडोक्सिन आदि का मुख्य घटक
नई पत्तियों में हरिमाहीनता, तना सख्त, मूल तन्त्र अधिक विकसित।
Fe
Fe3+
फेरोडोक्सिन, साइटोक्रोम आदि में, केटालेज एन्जाइम को क्रियाशील करने में तथा क्लोरोफिल के संश्लेषण में।
हरिमाहीनता, शिराएँ गहरे हरे रंग की, वृन्त छोटे तथा क्लोरोफिल नहीं बनता है।
Mn
Mn2+
कार्बोक्सीलेज एन्जाइम को क्रियाशील करने में।
हरिमाहीनता तथा ऊतकक्षयी क्षेत्र, क्लोरोफिल नहीं बनता है।
B
BO3-3 याB4O2-7
परागकणों के अंकुरण में, कोशिका विभेदन में तथा कार्बोहाइड्रेट स्थानान्तरण में।
ब्राऊन हार्ट रोग, शिखाग्र काले, पत्तियाँ ताम्रक तथा भंगुर हो जाती है।
Cu
Cu2+
एन्जाइम क्रियाशीलता में।
शीर्ष ऊतकक्षयी, प्ररोह डाइ बैक रोग।
Zn
Zn2+
ऑक्सिन संश्लेषण में।
पत्तियाँ हरिमाहीन विकृत, पर्व छोटे, पुष्पन निरुद्ध।
Cl
Cl–
Na+ तथा K+ के धनायन तथा ऋणायन सन्तुलन बनाए रखने में, प्रकाश-संश्लेषण में ऑक्सीजन के निकलने की क्रिया में।
जड़ें छोटी, पत्तियाँ हरिमाहीन तथा ऊतक्क्षयी क्षेत्र बनते हैं।