Author: The Vigyan Team

  • Lava Lamp Experiment | घर में बनाएँ

    Lava Lamp Experiment | घर में बनाएँ

    आवश्यक वस्तुएँ

    1. एक फ्लास्क या एक Bottle
    2. वनस्पति तेल
    3. खाद्य कलर (रंग)
    4. Fizzy Tablet (alka seltzer)(किसी भी मैडिसिन स्टोर पर मिल जाएगी)
    5. अगर Tablet नहीं मिलती है तो आप बेकिंग सोडा और सिरका प्रयोग कर सकते हैं !

    क्या करना है

    • फ्लास्क को अधिकतर वनस्पति तेल से भरें।
    • शेष फ्लास्क में पानी भर दें। पानी तेल के नीचे नीचे तक डूब जाएगा और छोटे, साफ बूँदों जैसा दिखेगा।
    • अब रंग डालें जो भी आपका मनपसंद हो, लाल या नीला हो तो ज़्यादा अच्छा है !
    • खाद्य रंग पानी आधारित है, इसलिए यह उस पानी को भी डुबोएगा और रंग देगा जो अब फ्लास्क के नीचे है।
    • एक अल्का-सेल्टज़र (Fizzy Tablets) टैबलेट को कुछ छोटे टुकड़ों में तोड़ें, और उन्हें एक-एक करके फ्लास्क में डालें।
    • यदि Fizzy Tablets ना हों तो आप सिरके में कलर ड़ाल कर भी लावा लैंप बना सकते हैं |
    • आपका लावा लैंप तैयार है !
  • गीतांजलि राव – नन्ही आविष्कारक

    गीतांजलि राव – नन्ही आविष्कारक

    गीतांजलि राव (जन्म 19 नवंबर 2005) एक अमेरिकी आविष्कारक, लेखक, वैज्ञानिक और इंजीनियर, और विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (एसटीईएम) प्रमोटर हैं।

    राव को उनके Innovations और “Innovation Workshops” के लिए 2020 में टाइम टॉप यंग इनोवेटर नामित किया गया था, 4 दिसंबर, 2020 को टाइम पत्रिका के कवर पर Feature किया गया था और उन्हें “किड ऑफ द ईयर” नामित किया गया !

    पहला आविष्कार

    • राव पहली बार एक विज्ञान किट से प्रभावित हुई थीं जब उनके चाचा ने उन्हें 4 साल की उम्र में दिया था।
    • जब वह 10 वर्ष की थी, राव ने समाचार देखते हुए चकमक जल संकट के बारे में सुना और पानी में सीसा की मात्रा को मापने के तरीकों में दिलचस्पी ली।
    • इसके कारण उन्होंने कार्बन नैनोट्यूब पर आधारित टेथिस नामक एक उपकरण विकसित किया जो ब्लूटूथ के माध्यम से पानी की गुणवत्ता की जानकारी भेज सकता था।
    • 2017 में, राव ने डिस्कवरी एजुकेशन 3M यंग साइंटिस्ट चैलेंज जीता और उनके आविष्कार, टेथिस के लिए $ 25,000 से सम्मानित किया गया। टेथिस में 9 वोल्ट की बैटरी, एक लीड सेंसिंग यूनिट, एक ब्लूटूथ एक्सटेंशन और एक प्रोसेसर होता है।
    • यह कार्बन नैनोट्यूब का उपयोग करता है, जिसका प्रतिरोध सीसे की उपस्थिति में बदल जाता है। उन्होंने मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी वेबसाइट को पढ़ते हुए कार्बन नैनोट्यूब के बारे में सीखा। वह एक व्यवहार्य विधि के रूप में टेथिस की क्षमता की जांच करने के लिए वैज्ञानिकों और चिकित्सा पेशेवरों के साथ काम करने की योजना बना रही है।

    अन्य उपलब्धियां

    • वह 3 बार TEDx स्पीकर हैं। सितंबर 2018 में, राव को संयुक्त राज्य पर्यावरण संरक्षण एजेंसी के राष्ट्रपति के पर्यावरण युवा पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
    • राव को मई 2019 में टीसीएस इग्नाइट इनोवेशन स्टूडेंट चैलेंज के लिए शीर्ष “स्वास्थ्य” स्तंभ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, जो कि एपिओन नामक एक नैदानिक ​​उपकरण विकसित करने के लिए था, जो कि प्रिस्क्रिप्शन ओपिओइड की लत के शुरुआती निदान के लिए आनुवंशिक इंजीनियरिंग में प्रगति पर आधारित था।
    • राव ने “काइंडली” नामक एक ऐप विकसित किया जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करता है जो प्रारंभिक अवस्था में साइबरबुलिंग का पता लगा सकता है।
    • वह एक कुशल पियानोवादक भी हैं।
    • वह वर्तमान में स्काउट्स की सदस्य हैं और उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका में स्काउटिंग एसटीईएम कार्यक्रम में दाखिला लिया है, और अपने पायलट का लाइसेंस प्राप्त करने पर काम कर रही हैं।
    • 2020 में, राव TIME पत्रिका का किड ऑफ़ द ईयर पदनाम प्राप्त करने वाली पहली बालिका बनीं !
  • विषाणु (Virus) क्या है ? वायरस क्या है (हिंदी में)

    विषाणु (Virus) क्या है ? वायरस क्या है (हिंदी में)

    What is Virus ?

    विषाणु (वायरस) अतिगृश्य, परजीवी, अकोशिकीय और विशेष न्यूक्लियोप्रोटीन (Nucleoproteins) कण हैं। ये सजीव एवं निर्जीव के मध्य की कड़ी है। वायरस या विषाणु बहुत छोटे रोगाणु होते हैं, जो प्रोटीन की खोल के अंदर अनुवांशिक सामग्री से बने होते हैं। एक वायरस की अनुवांशिक सामग्री आरएनए या डीएनए हो सकती है, जो आम तौर पर प्रोटीन, लिपिड (Lipid) या ग्लाइकोप्रोटीन (Glycoproteins) की खोल से घिरी रहती है या तीनों का थोड़ा-थोड़ा संयोजन (Combination) होता है।

    वायरस के अस्तित्व की खोज रूसी वैज्ञनिक इवानोस्की ने 1892 में तम्बाकू के पौधों से चितेरी रोग के कारण का निरीक्षण करते समय की थी। 1898 में फ्रेडरिक लोफ्लर और पॉल फ्रॉश ने शोध में देखा कि पशुओं में पैर और उनके मुंह की बीमारी का कारण कोई बैक्टीरिया से भी छोटा संक्रामक है। यह वायरस की प्रकृति का पहला संकेत था l विषाणु (वायरस) एक ऐसा जेनेटिक तत्व जो जीवित और निर्जीव अवस्थाओं के बीच में कहीं आता है।

    विषाणु (वायरस) की विशेषताएं क्या है ?

    What are the characteristics of Virus ?

    वायरस की मूल संरचना

    ये नाभिकीयअम्लऔरप्रोटीन(न्यूक्लिओप्रोटीन्स) से मिलकर बनते हैं, जो जन्तुओं व पादपों के गुणसूत्रों के न्यूक्लिओप्रोटीन्स के समान होते हैं। ये जन्तुओं, पेड़-पौधों व वैक्टीरिया सभी में पाये जाते हैं।

    वायरस बेहद छोटे, व्यास में लगभग 20 – 400 नैनोमीटर तक होते हैं। मिमिवायरस के रूप में जाना जाने वाला सबसे बड़ा वायरस 500 नैनोमीटर के व्यास तक होता है।

    शरीर के बाहर तो ये मृत-जैसे होते हैं लेकिन शरीरकेअंदरजीवितहोजाते हैं। इन्हे क्रिस्टल के रूप में इकट्ठा किया जा सकता है। एक वायरस बिनाकिसीसजीवमाध्यमकेपुनरुत्पादन नहीं कर सकता है।

    वायरस अन्य जीवों से अलग स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में नहीं रह सकते क्योंकि उन्हें पुनरुत्पादन के लिए एक जीवित कोशिका पर निर्भर रहना पड़ता है।

    यह सैकड़ों वर्षों तक सुसुप्तावस्था में रह सकता है और जब भी एक जीवित माध्यम या धारक के संपर्क में आता है, तो उस जीव की कोशिका को भेद कर अन्दर चला जाता है और जीव को बीमार कर देता है l  एक बार जब वायरस जीवित कोशिका में प्रवेश कर जाता है, वह कोशिकाकेमूलआरएनएएवंडीएनएकीजेनेटिकसंरचनाकोअपनीजेनेटिकसूचनासेबदलदेता है और संक्रमित कोशिका अपने जैसे संक्रमित कोशिकाओं का पुनरुत्पादन शुरू कर देती है। जिससे वायरस का शरीर में तेजी से प्रसार होता है l

    वायरस कोशिकाएं नहीं बल्कि गैर-जीवित, संक्रामक कण होते हैं। वे विभिन्न प्रकार के जीवों में कैंसर समेत कई बीमारियों को जन्म देने में सक्षम हैं।

    वायरल रोग जनक न केवल मनुष्यों और जानवरों को संक्रमित करते हैं, बल्कि पौधों, बैक्टीरिया इत्यादि को भी संक्रमित करते हैं। ये बेहद छोटे कण बैक्टीरिया से लगभग 1000 गुना छोटे होते हैं और लगभग किसी भी पर्यावरण में पाए जा सकते हैं।

    अधिकांश वायरस जन्तुओं व पौधों में घातक रोग उत्पन्न करते हैं। इनको क्रिस्टलीय अवस्था में अलग करके मंचित किया जा सकता है, किन्तु ये केवल जीवित कोशिका के अंदर वृद्धि कर सकते हैं।

    वे जीवित, सामान्य कोशिकाओं को कमजोर करते है और उन कोशिकाओं का उपयोग अपने जैसे अन्य वायरस की संख्या बढ़ाने के लिए करते हैं।

    वायरस कोशिकाओं को मार सकता हैं, उन्हें क्षति पहुंचा सकता हैं या उनकी जेनेटिक संरचना को बदल सकते हैं । विभिन्न वायरस आपके शरीर में कुछ कोशिकाएं जैसे आपके लिवर, श्वसन तंत्र या खून पर हमला करते हैं और स्वस्थ शरीर को बीमार कर देते है ।

    कुछ सबसे साधारण या सबसे प्रसिद्ध वायरस में ह्यूमन इम्यूनो डेफिशियेंसी वायरस (Human Immunodeficiency Viruses – HIV-एचआईवी) जो एड्स का कारण बनता है, हर्पीस सिम्पलेक्स वायरस (Herpes Simplex Virus), जो ठंडे घावों, चेचक, मल्टीपल स्क्लेरोसिस (Multiple sclerosis (MS)) का कारण बनता है और ह्यूमन पेपिलोमा वायरस (Human papillomavirus (HPV) जो अब वयस्क महिलाओं में गर्भाशय ग्रीवा (CERVIX) के कैंसर का एक प्रमुख कारण माना जाता है, इत्यादि शामिल है।

    आम सर्दी जुकाम भी एक वायरस के कारण होता है। चूंकि अभी भी नए-नए विषाणुओं की उत्पत्ति का मुद्दा रहस्य से घिरा हुआ है, इन वायरस या विषाणु के कारण होने वाली बीमारियां और उन्हें ठीक करने के तरीके अभी भी विकास के शुरुआती चरणों में हैं।

    निर्जीव जैसे लक्षण

    विषाणु कोशिकीय रूप में नहीं होते हैं तथा इनमें कोशिकीय अंग नहीं पाये जाते।

    इनमें पोषण, श्वसन, बुद्धि, उत्सर्जन और उपापचय क्रियाएँ नहीं होती है।

    इनके रवे को क्रिस्टल बनाकर निर्जीव पदार्थ की भाँति बोतलों में भरकर वर्षों तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

    प्रत्येक वाइरस प्रोटीन खोल (capsid) में बंद RNA या DNA का अणु होता है।

    सजीव जैसे लक्षण

    विषाणु में न्यूक्लिक अम्ल का द्विगुणन होता है। – किसी जीवित कोशिका में पहुँचते ही ये सक्रिय हो जाते हैं और एन्जाइमों का संश्लेषण करने लगते हैं।

    सजीव कोशिकाओं की भाँति इनमें भी RNA अथवा DNA मिलता है।

    विषाणु (Virus) के प्रकार – (Type of Virus)

    वायरस को उसके होस्ट के प्रकार के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। इसी आधार पर होम्स ने 1948 में वायरस को तीन समूहों में विभाजित किया है। वे हैं:

    जन्तु विषाणु (Animal Virus – एनिमल वायरस)

    वायरस जो मनुष्य सहित पशुओं की कोशिका को संक्रमित करते हैं, उन्हें जन्तु विषाणु कहा जाता है।

    उदाहरण के लिए, इन्फ्लूएंजा वायरस (Influenza Virus), रैबीज वायरस (Rabies Virus), मम्प्स वायरस (Mumps Virus) (जिससे गलसुआ रोग होता है), पोलियो वायरस (Polio Virus), स्माल पॉक्स वायरस (Small Pox Virus), हेपेटाइटिस वायरस (Hepatitis Virus), राइनो वायरस (Rhino Virus) (सामान्य सर्दी जुकाम वाला वायरस) आदि। इनकी आनुवंशिक सामग्री आरएनए या डीएनए होता है।

    मुख्य प्रकार के वायरल संक्रमण और इसमें शामिल सबसे उल्लेखनीय प्रजातियों का अवलोकन

    पादप विषाणु (प्लांट वायरस – Plant Virus)

    पौधों को संक्रमित करने वाले वायरस को पादप विषाणु कहा जाता है। इनकी अनुवांशिक सामग्री आरएनए होता है जो प्रोटीन की खोल में रहता है।

    उदाहरण के लिए, तंबाकू मोजेक वायरस (Tobacco Mosaic Virus), पोटैटो वायरस (आलू विषाणु), बनाना बंची टॉप वायरस (Banana bunchy top Virus), टोमॅटो येलो लिफ कर्ल वायरस (Tomato Yellow Leaf Curl Virus) (टमाटर की पत्ती ), बीट येलो वायरस (Beat Yellow Virus) और टर्निप येलो वायरस (Turnip Yellow Virus) इत्यादि हैं।

    जीवाणुभोजी (Bacteriophage – बैक्टीरियोफेज)

    वायरस जो जीवाणु या बैक्टीरिया की कोशिकाओं को संक्रमित करते हैं उन्हें बैक्टीरियोफेज या बैक्टीरिया खाने वाले (जीवाणुभोजी) के रूप में जाना जाता है। उनमें आनुवांशिक सामग्री के रूप में डीएनए होता है।

    बैक्टीरियोफेज की कई किस्में हैं। आम तौर पर, प्रत्येक प्रकार का बैक्टीरियोफेज केवल एक प्रजाति या बैक्टीरिया के केवल एक स्ट्रेन पर हमला करता है।

    Structure of Bacteriophage. Created with BioRender.com

    वायरस कैसे फैलता है – How the Virus Spreads?

    वायरस पर्यावरण से या अन्य व्यक्तियों के माध्यम से मिट्टी से पानी में या हवा में पहुंच कर नाक, मुंह या त्वचा में किसी भी कट के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं और संक्रमित करने के लिए किसी कोशिका की तलाश करते हैं।

    उदाहरण के लिए एक सर्दी जुकाम या फ्लू का विषाणु उन कोशिकाओं को target करता है जो श्वसन (यानी फेफड़ों) या पाचन नली (यानी पेट) में होती हैं। एचआईवी (ह्यूमन इम्यूनोडेफिशियेंसी वायरस) जो एड्स का कारण होता है, हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली की टी-कोशिकाओं (एक प्रकार की सफेद रक्त कोशिकाएं जो संक्रमण और बीमारी से लड़ती हैं) पर हमला करता है।

    विषाणु और जीवाणु संक्रमण दोनों मूल रूप से मनुष्यों में एक ही तरह से फैलते हैं।

    वायरस मनुष्यों में निम्नलिखित कुछ तरीकों से फैल सकते हैं

    वायरस किसी अन्य व्यक्ति के हाथ को छूने या हाथ मिलाने से फैल सकता है। यदि कोई व्यक्ति गंदे हाथों से भोजन को छूता है तो वायरस आंत में भी फैल सकता है।

    जिस व्यक्ति को सर्दी जुकाम है उस व्यक्ति की खांसी या छींक से वायरस संक्रमण फैल सकता है।

    शरीर के तरल पदार्थ जैसे कि खून, लार और वीर्य और ऐसे ही अन्य तरल पदार्थों के इंजेक्शन या यौन संपर्क द्वारा संचरण से वायरस, विशेष रूप से हेपेटाइटिस या एड्स जैसे वायरल संक्रमण अन्य व्यक्तियों में फैल सकते हैं।

    Corona Virus – Covid -19 (कोरोना वायरस) क्या है ?

    कोरोनावायरस रोग 2019 से एक नई उभरती हुई संक्रामक बीमारी है जो वर्तमान में दुनिया भर में फैल गई है। यह महामारी दिसंबर 2019 में आए एक नए कोरोनावायरस के कारण हुई थी, और अब यह एक वैश्विक महामारी (Global Pandemic) में बदल गई है।

    Covid – 19 बीमारी नोवेल कोरोनावायरस (Novel Coronavirus), सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम कोरोनावायरस 2 (Severe Acute Respiratory Syndrome Coronavirus 2 (SARS-CoV-2) की वजह से होती है l यह कोरोनावायरस की β family से संबंधित है।

    SARS-CoV-2 की बाहरी संरचना का वैज्ञानिक रूप से सटीक परमाणु मॉडल। प्रत्येक “गेंद” (Ball) एक परमाणु है

    यह मनुष्यों को संक्रमित करने वाला सातवां ज्ञात कोरोनावायरस है; इनमें से चार कोरोनावायरस (229E, NL63, OC43, और HKU1) केवल सामान्य सर्दी के मामूली लक्षण पैदा करते हैं। इसके विपरीत, अन्य तीन, SARS-CoV, MERS-CoV, और SARS-CoV-2, क्रमशः 10%, 37% और 5% की मृत्यु दर के साथ गंभीर लक्षण और यहां तक कि मृत्यु का कारण बन सकते हैं।

    SARS-CoV-2 का स्पाइक (S) प्रोटीन, जो Receptor Recognition और कोशिका झिल्ली संलयन प्रक्रिया (Cell Membrane Fusion Process) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है l

    यह दो सबयूनिट्स, S1 और S2 से बना है। S1 सबयूनिट में एक रिसेप्टर-बाइंडिंग डोमेन (Receptor-Binding Domain) होता है जो होस्ट रिसेप्टर एंजियोटेंसिन-कनवर्टिंग एंजाइम 2 (Angiotensin-Converting Enzyme 2)  को पहचानता है और बांधता है, जबकि S2 सबयूनिट दो-हेप्टैड रिपीट डोमेन के माध्यम से छह-हेलिकल बंडल (Six-Helical Bundle) बनाकर वायरल सेल मेम्ब्रेन फ्यूजन (Viral Cell Membrane Fusion) की मध्यस्थता करता है।

    कोरोना कैसे फैलता है ?

    कोरोना आमतौर पर एक संक्रमित व्यक्ति की सांस की बूंदों (droplets) के माध्यम से दूसरे व्यक्ति में फैलता है l जब किसी संक्रमित व्यक्ति को खांसी या छींक आती है तो ये बूंदें जो लोग उनके पास है, उन लोगों के मुंह या नाक में जा सकती हैं । फैलने की संभावना तब अधिक होती है जब लोग एक दूसरे के साथ संपर्क में होते हैं (जब लगभग 6 फीट से कम दूरी होती है)।

    इसमे यह भी संभव होता है कि कोई संक्रमित व्यक्ति किसी सतह या वस्तु को छूता है तो वह वायरस रह जाते है और बाद में एक स्वस्थ उस जगह को छूकर अपने हाथ मुंह, नाक या आंखों को छूने से भी फैलता है । फिर भी इसे वायरस फैलने का मुख्य कारण नहीं माना जा रहा है और इस पर अभी research चल रहे है ।

  • स्विस वैज्ञानिकों 62.8 खरब तक मापा पाई का मान

    स्विस वैज्ञानिकों 62.8 खरब तक मापा पाई का मान

    • रेखा गणित में वृत्त की परिधि की लंबाई व व्यास की लंबाई के अनुपात को पाई कहा जाता है। इसका मान 3.14159 के बराबर होता है। पाई अपरिमेय राशि और गणितीय नियतांक है।
    • ग्राब्यूंडन विश्वविद्यालय (स्विट्जरलैंड) के वैज्ञानिकों ने गणितीय संख्या पाई को 62.8 खरब तक नापा
    • ऐसा करके उन्होने एक नया विश्व रेकॉर्ड बनाया है।
    • इसके लिए सुपर कंप्यूटर का प्रयोग किया गया।
    • गणना में 108 दिन और नौ घंटे का समय लगा।
    • अभी वैज्ञानिक गिनीज बुक ऑफ रेकॉर्ड में इसके दर्ज होने का इंतजार कर रहे हैं।
    • हालांकि तक पाई की गणना के आखिरी 10 अंक ही सार्वजनिक किए जाएंगे, जो 7817924264 आए हैं।
    • गणना के लिए 510 टेराबाइट (टीबी) का स्टोरेज इस्तेमाल किया गया।
    • इसमें 16 टीबी की 38 हार्डडिस्क तथा अन्य उपकरण शामिल हैं।
    • वैज्ञानिकों ने सॉलिड स्टेट ड्राइव (एसएसडी) के बजाय हार्डडिस्क का उपयोग किया, क्योंकि एसएसडी में गहन गणना स्टोर करते समय मामूली अंतर आने का खतरा था।
    • पाई की गणना का पिछला रेकॉर्ड अमरीका के अलबामा राज्य में टिमोथी मुलिकन ने जनवरी 2020 में बनाया था। उन्होंने पाई की 50 खरब तक गणना की। उस गणना में करीब आठ महीने लगे थे। गूगल ने 2019 में क्लाउड तकनीक के जरिए इससे आधी गणना की थी।
  • विज्ञान के ये तथ्य आपके होश उड़ा देंगे !

    विज्ञान के ये तथ्य आपके होश उड़ा देंगे !

    शिशुओं में वयस्कों की तुलना में लगभग 100 अधिक हड्डियाँ होती हैं

    • जन्म के समय शिशुओं में लगभग 300 हड्डियाँ होती हैं, जिनमें से कई के बीच उपास्थि होती है। उम्र के साथ, कई हड्डियाँ आपस में जुड़ जाती हैं, और आखिर में 206 हड्डियाँ बन जाती हैं जो एक औसत वयस्क कंकाल बनाती हैं।

    गर्मियों के दौरान एफिल टॉवर 15 सेमी लंबा हो सकता है

    • जब किसी पदार्थ को गर्म किया जाता है, तो उसके कण अधिक गति करते हैं और अधिक स्थान घेरते हैं – इसे थर्मल विस्तार के रूप में जाना जाता है। इसके विपरीत, तापमान में गिरावट के कारण यह फिर से सिकुड़ जाता है।
    • उदाहरण के लिए, थर्मामीटर के अंदर पारा का स्तर बढ़ जाता है और गिर जाता है क्योंकि पारा की मात्रा परिवेश के तापमान के साथ बदल जाती है। यह प्रभाव गैसों में सबसे अधिक नाटकीय होता है लेकिन तरल पदार्थ और ठोस जैसे लोहे में भी होता है। इस कारण से, पुल जैसे बड़े ढांचे को विस्तार जोड़ों के साथ बनाया गया है जिससे बिना किसी नुकसान के विस्तार हो सके।

    पृथ्वी के 20% ऑक्सीजन का उत्पादन अमेज़ॅन वर्षावन द्वारा किया जाता है

    • हमारा वायुमंडल लगभग 75 प्रतिशत नाइट्रोजन और 21 प्रतिशत ऑक्सीजन से बना है, जिसमें विभिन्न अन्य गैसें कम मात्रा में मौजूद हैं।
    • 5.5 मिलियन वर्ग किलोमीटर (2.1 मिलियन वर्ग मील) को कवर करते हुए, अमेज़ॅन वर्षावन एक ही समय में बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हुए, पृथ्वी के ऑक्सीजन के एक महत्वपूर्ण अनुपात को चक्रित करता है।

    प्रकाश को सूर्य से पृथ्वी तक आने में 8 मिनट 19 सेकंड का समय लगता है

    • अंतरिक्ष में, प्रकाश 300,000 किलोमीटर (186,000 मील) प्रति सेकंड की गति से यात्रा करता है। इस ख़तरनाक गति पर भी, हमारे और सूर्य के बीच 150 मिलियन विषम किलोमीटर (93 मिलियन मील) की दूरी तय करने में काफी समय लगता है। और सूर्य के प्रकाश को प्लूटो तक पहुंचने में लगने वाले साढ़े पांच घंटे की तुलना में आठ मिनट अभी भी बहुत कम हैं।

    कुछ धातुएं इतनी प्रतिक्रियाशील होती हैं कि पानी के संपर्क में आने पर फट जाती हैं

    • पोटेशियम, सोडियम, लिथियम, रूबिडियम और सीज़ियम सहित कुछ धातुएँ इतनी प्रतिक्रियाशील होती हैं कि हवा के संपर्क में आने पर वे तुरंत ऑक्सीकरण (या धूमिल) हो जाती हैं।
    • पानी में गिराए जाने पर वे विस्फोट भी कर सकते हैं! सभी तत्व रासायनिक रूप से स्थिर होने का प्रयास करते हैं – दूसरे शब्दों में, एक पूर्ण बाहरी इलेक्ट्रॉन शेल होने के लिए।

    पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए 2.3 अरब वर्षों में यह बहुत गर्म होगा

    • आने वाले करोड़ों वर्षों में, सूर्य उत्तरोत्तर तेज और गर्म होता रहेगा। केवल 2 अरब वर्षों में, तापमान इतना अधिक होगा कि हमारे महासागरों का वाष्पीकरण हो जाएगा, जिससे पृथ्वी पर जीवन असंभव हो जाएगा। हमारा गृह आज के मंगल के समान विशाल मरुस्थल बन जाएगा। हालांकि ये अभी सिर्फ अनुमान ही है !

    इन्फ्रारेड कैमरों द्वारा ध्रुवीय भालू को नहीं देखा जा सकता

    • थर्मल कैमरे किसी भी वस्तु या जन्तु को उसके द्वारा उत्सर्जित गर्मी के रूप में पहचानते हैं, लेकिन ध्रुवीय भालू गर्मी के संरक्षण में विशेषज्ञ होते हैं। त्वचा के नीचे ब्लबर की मोटी परत होने के कारण भालू गर्म रहते हैं। वे सबसे सर्द आर्कटिक दिन को सहन कर सकते हैं। परंतु इंफ्रारेड कैमरे द्वारा उन्हें देखा नहीं जा सकता !

    पृथ्वी एक विशालकाय चुम्बक है

    • पृथ्वी का आंतरिक कोर ठोस लोहे का एक गोला है, जो तरल लोहे से घिरा हुआ है। तापमान और घनत्व में परिवर्तन इस लोहे में धाराएँ बनाते हैं, जो बदले में विद्युत धाराएँ उत्पन्न करते हैं। पृथ्वी की स्पिन द्वारा पंक्तिबद्ध, ये धाराएं एक चुंबकीय क्षेत्र बनाती हैं, जिसका उपयोग दुनिया भर में कंपास सुइयों द्वारा किया जाता है।
  • माइकोप्लाज्मा क्या है ?

    माइकोप्लाज्मा क्या है ?

    What is Mycoplasma ?

    माइकोप्लाज्मा सूक्ष्मतम, एक कोशिकीय, बहुरूपी, प्रोकैरियोटिक जीव हैं। इन्हें “पादप जगत का जोकर’ कहा जाता है। माइकोप्लाज्मा को विभिन्न तापमान, दाब पर उत्पन्न किया जा सकता है और यह ‘तापीय‘ या ‘अतापीय‘ प्लाज्मा हो सकता है।


    माइकोप्लाज्मा की खोज नोकॉर्ड एवं रॉक्स 1898 ने की थी और इन्हें PPLO (Pleuro-Pneumonia Like Organism) कहा। माइकोप्लाज्मा अभी तक खोजी गई सबसे छोटी जीवाणु कोशिकाएं हैं ऑक्सीजन के बिना माइकोप्लाज्मा जीवित रह सकते हैं, और कई आकारों में पाए जाते है । उदाहरण के लिए, एम. जेनिटेलियम (M. Genitalium) फ्लास्क के आकार का (लगभग 300 x  600 nm) है, जबकि एम. न्यूमोनिया (M. Pneumoniae) अधिक लम्बा (लगभग 100 x 1000 nm) है। सैकड़ों माइकोप्लाज्मा की प्रजातियां जानवरों को संक्रमित करती हैं।


    इनमें कोशिका भित्ति का अभाव होता है। इसलिए कोशिका भित्ति पर क्रिया करने वाली प्रतिजैविकों, जैसे पेनिसिलिन का कोई प्रभाव नहीं होता। और प्लाज्मा झिल्ली कोशिका की बाहरी सीमा बनाती है। कोशिका भित्ति की अनुपस्थिति के कारण ये जीव अपना आकार बदल सकते हैं

    माइकोप्लाज्मा कोशिका की संरचना। जीवाणु यौन संचारित रोगों (sexually transmitted diseases), निमोनिया, एटिपिकल निमोनिया और अन्य श्वसन विकारों (respiratory disorders) का प्रेरक एजेंट (causative agent)है। कई एंटीबायोटिक दवाओं से यह अप्रभावित होते है

    माइकोप्लाज्मा का वर्गीकरण

    • सन् 1966 में अंतरराष्ट्रीय जीवाणु नामकरण समिति ने माइकोप्लाज्मा को जीवाणुओं से अलग करके वर्ग- मॉलीक्यूट्स में रखा है।
    • वर्ग- मॉलीक्यूट्स
    • गण- माइकोप्लाज्माटेल्स
    • वंश- माइकोप्लाज्मा

    माइकोप्लाज्मा के लक्षण

    आनुवंशिक सामग्री एक एकल डीएनए डुप्लेक्स है और नग्न है। (Genetic material is a single DNA duplex and is naked)

    यह राइबोसोम 70S प्रकार के होते हैं।

    इनमें DNA तथा RNA दोनों उपस्थित होते हैं।

    एक कठोर कोशिका भित्ति (Rigid Cell Wall) की कमी के कारण, Mycoplasmataceae गोल से लेकर आयताकार आकार की एक विस्तृत श्रृंखला में विपरीत हो सकता है। इसलिए उन्हें छड़, कोक्सी (spherical) या स्पाइरोकेट्स (long) के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है।

    इन जीवों पर उपापचयी क्रियाओं को प्रभावित करने वाले प्रतिजैविकों (जैसे – टेट्रासाइक्लिन, क्लोरेमफेनिकोल) आदि का प्रभाव पड़ता है।

    इनमें जनन द्विखण्डन, मुकुलन तथा एलिमेन्टरी बॉडीज द्वारा होता है।

    ये किसी जीवित जंतु या पेड़ पौधों पर आश्रित रहते हैं। तथा उनमे कई तरह की बीमारियां उत्पन्न करते हैं। कई बार ऐसे जीव मृत कार्बनिक पदार्थों पर मृतोपजीवी के रूप में भी पाए जाते हैं। यह परजीवी अथवा मृतोपजीवी दोनों प्रकार के हो सकते हैं।

    इनका आकार 100 से 500 nm तक होता है। इसलिए इन्हें जीवाणु फिल्टर से नहीं छाना जा सकता है।

    इन्हें वृद्धि के लिए स्टेरॉल की आवश्यकता होती है।

    माइकोप्लाज्मा प्रजातियां अक्सर research laboratories  में कोशिका संवर्धन (cell culture) में contaminants के रूप में पाई जाती हैं। [Mycoplasmal cell culture contamination occurs due to contamination from individuals or contaminated cell culture medium ingredients]

    कुछ माइकोप्लाज्मा का प्रजनन क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है l जन्म के समय कम वजन होना या समय से पहले जन्मे शिशु, माइकोप्लाज्मा संक्रमण के लिए, अतिसंवेदनशील होते हैं l

    माइकोप्लाज्मा की उपस्थिति पहली बार 1960 के दशक में कैंसर के ऊतकों के नमूनों में दर्ज की गई थी। तब से, कई अध्ययनों ने माइकोप्लाज्मा और कैंसर के बीच संबंध को खोजने और साथ ही कैंसर के गठन में जीवाणु कैसे शामिल हो सकता है, को साबित करने की कोशिश की l

    (A) माइकोप्लाज्मा न्यूमोनिया कोशिकाएं (Mycoplasma pneumoniae cells) (Gram Stain)

    माइकोप्लाज्मा की सिग्नेट-रिंग के आकार (signet-ring-shaped) की कोशिका ग्राम – (negative),  होती है, और कोशिका का आकार 0.2–0.3 माइक्रोन होता है और सामान्य रूप से 1.0 माइक्रोन से छोटा होता है। कोशिकाओं में कोशिका भित्ति नहीं होती है। प्रोटीन और लिपिड बाहरी कोशिका झिल्ली का निर्माण करते हैं और कोशिकाएं स्पष्ट रूप से फुफ्फुसावरणीय (pleomorphic) होती हैं, जिसमें गोलाकार, रॉड जैसी, बार जैसी, और सूक्ष्मदर्शी के नीचे दिखाई देने वाले फिलामेंटस आकारिकी होती है। typical cell एक सिग्नेट रिंग के आकार का होता है। कोशिकाएं ग्राम – (negative), हल्के बैंगनी रंग की होती हैं जिसमें गिमेसा दाग (Giemsa stain) होता है

    (B) M. Pneumoniae (एम. न्यूमोनिया) signet ring cell (Giemsa stain) – एम. न्यूमोनिया कोशिका हल्के बैंगनी रंग की होती है जिसमें गिमेसा दाग (Giemsa stain) होता है।

    (C) एम। निमोनिया आमलेट जैसी कॉलोनियां (M. pneumoniae omelet-like colonies)

    (D) एम. निमोनिया की शहतूत के आकार की कॉलोनियां (Mulberry-shaped colonies of M. Pneumonia)

    माइकोप्लाज्मा जनित पादप रोग और उनकी पहचान

    माइकोप्लाज्मा पौधों में लगभग 40 रोग उत्पन्न करते हैं। जो निम्न लक्षणों द्वारा पहचाने जा सकते हैं।

    पत्तियां पीली पड़ जाती हैं अथवा एंथोसाइएनिन वर्णक के कारण लाल रंग की हो जाती हैं।

    पत्तियों का आकार छोटा हो जाता है।

    पुष्प पत्तियाँ आकार में बदल जाते हैं।

    पर्व छोटी पड़ जाती है।

    पत्तियाँ भुरभुरी हो जाती है।

    माइकोप्लाज्मा जनित पादप रोग से प्रभावित पौधे

    चंदन का स्पाइक रोग

    आलू का कुर्चीसम रोग

    कपास का हरीतिमागम

    बैंगन का लघु पर्ण रोग

    गन्ने का धारिया रोग

    ऐस्टर येलो आदि

    माइकोप्लाजमा जनित मानव रोग

    अप्रारूपिक निमोनिया – माइकोप्लाज्मा न्यूमोनी के कारण होता है।

    माइकोप्लाज्मा जनित जंतु रोग

    भेड़ और बकरियों का एगैलेक्टिया – माइकोप्लाज्मा एगैलेक्टी के कारण होता है।

    माइकोप्लाज्मा द्वारा उत्पन्न रोग का उपचार

    माइकोप्लाज्मा द्वारा उत्पन्न रोग का उपचार टेट्रोसाइक्लिन औषधि द्वारा किया जाता है

  • मोनेरा जगत (Monera Kingdom) क्या है ?

    मोनेरा जगत (Monera Kingdom) क्या है ?

    What is Monera Kingdom ?

    इसके अन्तर्गत सभी प्रोकैरियोटिक जीव आते हैं। इस जगत में जीवाणु (बैक्टीरिया), एक्टिनोमाइसिटीज, आर्कीबैक्टीरिया और और सायनोबैक्टीरिया (नील-हरित शैवाल) आते हैं। बैक्टीरिया सर्वाधिक प्राचीन जीव हैं। ये विभिन्न पर्यावरण मृदा, जल, वायु, पादप तथा जन्तु में व्याप्त होते हैं।

    जीवाणु विभिन्न आकृतियों में मिलते हैं; जैसे – विब्रियो (कोमा), स्पाइरिलम (सर्पिलाकार)

    जीवाणु (Bacteria)बैक्टीरिया

    जीवाणुओं का अभिरंजन (Staining of Bacteria)

    ग्राम अभिरंजन की क्रिया में जीवाणुओं को क्रिस्टल वायलेट एवं आयोडीन के घोल में अभिरंजन करने पर सभी बैंगनी हो जाते हैं। इसके पश्चात् एसीटोन या एल्कोहॉल से साफ करने पर ग्राम धनात्मक जीवाणुओं में बैंगनी रंग बना रहता है, जबकि ग्राम ऋणात्मक जीवाणु रंगहीन हो जाते हैं। इसके पश्चात सेफरेनीन या कार्बोल फ्यूसीन से अभिरंजन देने पर ग्राम धनात्मक जीवाणु बैंगनी ही रहते हैं, जबकि ग्राम ऋणात्मक गुलाबी लाल हो जाते हैं।

    क्रिश्चिन ग्राम ने अभिरंजन के आधार पर जीवाणुओं को दो समूह ग्राम धनात्मक (Gram positive) व ग्राम ऋणात्मक (Gram negative) में रखा।

    ग्राम धनात्मक तथा ग्राम ऋणात्मक जीवाणुओं में अन्तर

    Difference between Gram Positive and Gram Negative Bacteria

    जीवाणुओं की संरचना (Structure of Bacteria)

    जीवाणुओं में फ्लेजेलीन नामक प्रोटीन से बनी कशाभिकाएँ होती हैं। ग्राम ऋणात्मक जीवाणुओं में रोम अथवा फिम्ब्री पाये जाते हैं।

    जीवाणुओं की कोशिका भित्ति म्यूरीन, पेप्टाइडोग्लाइकन या म्यूकोपेप्टाइड की बनी होती है। ग्राम धनात्मक जीवाणु की कोशिका भित्ति में टिकॉइक अम्ल पाया जाता है।

    कोशिका भित्ति के अन्दर जीवद्रव्य होता है, जो फॉस्फोलिपिड एवं प्रोटीन की बनी जीवद्रव्य कला से घिरा रहता है। जीवद्रव्य कला अन्तवलित होकर मीसोसोम बनाती है। जीवद्रव्य कला में इलेक्ट्रॉन अभिगमन तन्त्र (Electron Transport System-ETS) तथा ऑक्सीकीय फॉस्फोरिलीकरण के एन्जाइम पाये जाते हैं।

    जीवाणुओं में वास्तविक केन्द्रक का अभाव होता है और सामान्य गुणसूत्र नहीं होते। वलयाकार, द्विरज्जुकी DNA होता है परन्तु इसके साथ हिस्टोन प्रोटीन जुड़ी हुई नहीं होती, इस पूर्ण समूह को केन्द्रकाभ (nucleoid) या जीनोफोर (genophore) कहते हैं।

    कुछ जीवाणुओं; जैसे-ई.कोलाई में प्लाज्मिड पाया जाता है। यह लैंगिक जनन में सहायक (F-कारक), प्रतिरोधक शक्ति प्रदान करने (R-कारक) तथा कोलिसन्स संश्लेषण की क्षमता (Col-कारक) रखता है। जब प्लाज्मिड, केन्द्रकीय DNA से जुड़ा होता है, तब इपिसोम (Episome) कहलाता है।

    जीवाणु एवं पोषण (Nutrition)

    पोषण के आधार पर जीवाणु परपोषी एवं स्वपोषित होते हैं

    परपोषी (Heterotrophic)

    इनमें पर्णहरिम नहीं होता, अत: ये अन्य जीवित या मृत जीवों पर निर्भर होते हैं। ये तीन प्रकार के होते हैं जैसे – माइकोबैक्टीरियम, क्लॉस्ट्रिडियम एवं स्ट्रेप्टोकोकस ।

    1. परजीवी, जो जीवित पौधों तथा जन्तुओं से अपना भोजन लेते है,

    2. मृतोजीवी, जो मृत कार्बनिक पदार्थों से अपना भोजन लेते है; जैसे-बेसिलस माइकोइडिस

    3. सहजीवी, जो दूसरे जन्तु या पौधों के साथ रहकर एक दूसरे को लाभ पहुँचाते हैं; जैसे – राइजोबियम

    स्वपोषी (Autotrophic)

    ये CO2, H2S व अन्य पदार्थों से अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं। ये प्रकाश-संश्लेषी एवं रसायन-संश्लेषी होते हैं।

    जीवाणुओं में जनन प्रक्रिया (Reproduction system in Bacteria)


    कायिक जनन विखण्डन एवं मुकुलन द्वारा होता है।

    अलैंगिक जनन, अन्त:बीजाणुओं; जैसे-क्लॉस्ट्रिडियम एवं बैसिलस में, चलबीजाणुओं द्वारा; जैसे – राइजोबियम में तथा कोनिडिया (conidia) द्वारा जैसे – स्ट्रेप्टोमाइसिस में होता है।

    जीवाणुओं में लैंगिक जनन नहीं होता, परन्तु आनुवंशिक पुनर्योजन (Genetic Recombination) परन्तु होता है।

    1. रूपान्तरण (Transformation). सर्वप्रथम ग्रिफिथ ने 1928 में रूपान्तरण की खोज की तथा एवरी, मैकलियोड और मैककार्टी ने 1944 में इसका विस्तृत अध्ययन किया। इस क्रिया में एक जीवाणु कोशिका का DNA दूसरी जीवाणु कोशिका में प्रवेश कर जाता है।

    2. संयुग्मन (Conjugation) लैडरबर्ग एवं टैटम 1946 ने ई. कोलाई में इसकी खोज की, जबकि वॉलमैन एवं जैकोब 1956 ने इसका विस्तृत अध्ययन किया। संयुग्मन में दाता (= नर) का DNA (आनुवंशिक पदार्थ) ग्राही (= मादा) में संयुग्मन नलिका द्वारा चला जाता है। दाता कोशिका में लैंगिक कारक (sex factor) या उर्वरता कारक (fertility factor) होता है, जो लैंगिक रोमों के निर्माण के लिए उत्तरदायी होता है। F – कारक के मुख्य गुणसूत्र से संलग्न होने पर दाता कोशिका को Hfr (High frequency recombination) कहते हैं।

    3. पारक्रमण (Transduction) जिण्डर एवं लैडरबर्ग ने 1952 में इसको खोज की। इसमें एक जीवाणु के गुण जीवाणुभक्षी (Bacteriophage) विषाणु के DNA द्वारा दूसरे जीवाणु में स्थानान्तरित होते रहते हैं, संक्रमण के समय जीवाणुभोजी विषाणु अपना DNA जीवाणु कोशिका में प्रविष्ट करा देता है और जीवाणु कोशिका में ही विषाणु के DNA का गुणन होता है तथा जीवाणु के DNA का कुछ भाग जीवाणुभोजी विषाणु के DNA से संयुक्त हो जाता है। जीवाणु भित्ति के फटने पर विषाणु स्वतन्त्र हो जाते हैं और नयी जीवाणु कोशिका पर आक्रमण करते हैं।

    जीवाणुओं का आर्थिक महत्त्व (Economic Importance of Bacteria)

    लाभप्रद क्रियाएँ (Useful Activities)

    नाइट्रोजन स्थिरीकारी जीवाणु पृथ्वी में स्वतन्त्र रूप से; जैसे-एजोटोबैक्टर तथा क्लॉस्ट्रिडियम या सहजीवी के रूप में; जैसे-लेग्युमिनोसी कुल के पौधों की जड़ों में, राइजोबियम लेग्युमिनोसेरम, सेस्बेनिया के तने की गाँठों में एरोराइजोबियम, ऑर्डीसिया की पत्ती की गाँठो में माइकोबैक्टीरियम तथा कैजुराइना एवं रूबस पौधों की जड़ों में, फ्रेन्क्रिया आदि में रहते हैं।

    नाइट्रीकारी जीवाणु नाइट्रोसोमोनास एवं नाइट्रोबैक्टर क्रमश: अमोनिया को नाइट्राइट व नाइट्राइट को नाइट्रेट में बदलते हैं।

    अमोनीकारी जीवाणु; जैसे बैसिलस जटिल प्रोटीन को सरल अमीनो अम्लों में परिवर्तित करते हैं।

    सल्फर जीवाणु; जैसे थायोबैसिलस प्रोटीन पदार्थों के सड़ने से प्राप्त HIS को H,SO, में बदल देते हैं, जो कुछ लवणों से क्रिया करके सल्फेट बनाता है। दूध में उपस्थित जीवाणु लैक्टोस शर्करा को लैक्टिक अम्ल में परिवर्तित कर देते हैं। लेक्टोबैसिलस लैक्टिस तथा ल्यूकोनॉस्टॉक सिट्रोवोरम पनीर बनाने तथा स्ट्रेप्टोकोकस थमोफिलस व लैक्टोबैसिलस वल्गेरिस योगहर्ट बनाने में प्रयोग होते हैं।

    एसिटोबैक्टर एसिटी सिरका बनाने में, बैसिलस मैगाथीरियम तम्बाकू की पत्तियों को स्वाद तथा सुगन्ध देने में माइकोकोकस कन्डीडेंस चाय की पत्तियों को स्वाद व सुगन्ध प्रदान करने, माइक्रोकोकस ग्लूटैमिकस लाइसीन बनाने तथा लेक्टोबैसिलस डेलबुक्री लैक्टिक अम्ल बनाने में प्रयोग होते हैं।

    हानिकारक क्रियाएँ (Harmful Activities)

    अनेक विनाइट्रीकारी जीवाणु; जैसे-बैसिलस डीनाइट्रीफिकेन्स, थायोबैसिलस डीनाइट्रीफिकेन्स मृदा में उपस्थित नाइट्रेट तथा अमोनिया के लवणों को स्वतन्त्र नाइट्रोजन में बदल देते हैं।

    अनेक जीवाणु; जैसे-स्टेफिलोकोकस, साल्मोनेला आदि खाद्य विषाक्ता उत्पन्न करते हैं। DPT वेक्सीन डिफ्थीरिया, परटुसिस या काली खाँसी तथा टिटनेस की रोकथाम के लिए जबकि BCG वेक्सीन ट्यूबरकुलोसिस की रोकथाम के लिए दी जाती है।

  • जीवधारियों का वर्गीकरण

    जीवधारियों का वर्गीकरण

    Division of organisms into kingdoms (Taxonomy)

    जीवधारियों का वर्गीकरण

    जीवधारियों के वर्गीकरण के अन्तर्गत जीवधारियों को निश्चित नियमों एवं सिद्धान्तों के अनुरूप व्यवस्थित किया जाता है। सबसे पहले अरस्तू ने जन्तुओं का प्राकृतिक समानताओं और असमानताओं के आधार पर जीवधारियों का वर्गीकरण किया था। लिनियस ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘सिस्टेमा नेचुरी’ में सभी जीवधारियों को दो जगतों-पादप जगत और प्राणि जगत, में प्रस्तुत किया। इसी आधार पर आधुनिक वर्गीकरण की प्रणाली की शुरूआत हुई।

    नामकरण की द्विनाम पद्धति (Binomial System of Nomenclature)

    वर्गीकरण के जनक, कैरोलस लिनियस जीवों के नामकरण की द्विनाम पद्धति प्रतिपादित किया गया, जिसके अनुसार जीवधारी का नाम लैटिन भाषा के दो शब्दों-वंश (Generic) और जाति (Species) से मिलकर बना होता है। इसके बाद उस वैज्ञानिक का नाम लिखा जाता है, जिसने सबसे पहले उस जाति को खोजा या इस जाति को सर्वप्रथम वर्तमान नाम प्रदान किया। वंश नाम का पहला अक्षर बड़ा (capital) तथा जाति नाम के सभी अक्षर छोटे (small) लिखे जाते हैं।

    उदाहरण मनुष्य, जिसका वैज्ञानिक नाम होमो सेपिएन्स लिन है। इसमें पहला शब्द होमो उस वंश को प्रदर्शित करता है, जिसकी एक जाति सेपिएन्स है तथा लिन, कैरोलस लिनियस का लघु नाम है। इसका अर्थ है कि सर्वप्रथम कैरोलस लिनियस द्वारा इस जाति को होमो सेपिएन्स नाम दिया गया था। जॉन रे ने सर्वप्रथम जाति (species), वंश (genus) आदि के आधार पर जाति की संकल्पना (Concept of Species) प्रस्तुत की।

    परम्परागत द्वि-जगत वर्गीकरण का स्थान अन्ततः व्हिटेकर द्वारा सन् 1969 में प्रस्तावित पाँच जगत प्रणाली ने ले लिया। इसके अनुसार समस्त जीवों को निम्नलिखित पाँच जगतों (kingdom) में वर्गीकृत किया गया

    1. मोनेरा  (Monera)

    2. प्रोटिस्टा (Protista)

    3. प्लान्ट (Plant)

    4. फंजाई (Fungi)

    5. एनीमेलिया (Animal)

  • जीव विज्ञान के प्रमुख नियमों/सिद्धान्तों के प्रवर्तक

    जीव विज्ञान के प्रमुख नियमों/सिद्धान्तों के प्रवर्तक

    Originator – major Laws/Principles of Biology

    1. नयी कोशिकाओं की उत्पत्ति पूर्ववर्ती कोशिकाओं से होती है – रुडोल्फ विरकोव
    2. आनुवंशिकता के सिद्धान्त – मेंण्डल
    3. आधुनिक आनुवंशिकी सिद्धान्त – टी. एच. मॉर्गन
    4. उत्परिवर्तन सिद्धान्त – ह्यूगो डी वीज
    5. कोशिका सिद्धान्त – श्लाइडेन एवं श्वान
    6. उपार्जित लक्षणों की वंशानुगति का नियम – लैमार्क
    7. प्राकृतिक वरण का सिद्धान्त – डार्विन
    8. जनन द्रव्य का सिद्धान्त – वीजमान
    9. द्विनाम पद्धति एवं वर्गिकी – कैरोलस लिनियस
    10. DNA द्विकुण्डलन मॉडल – वाटसन एवं क्रिक
    11. पुनरावर्तन सिद्धान्त – हेकल
    12. गुणसूत्रीय सिद्धान्त – सटन एवं बोवेरी
    13. जीवद्रव्य जीवन का भौतिक आधार है – हक्सले
    14. जीवाशिमकी – लियानार्डो डी विन्सी
    15. सुजननिकी – एफ गाल्टन
    16. आधुनिक वनस्पति विज्ञान – लिनियस
    17. प्रतिरक्षा विज्ञान – एडवर्ड जेनर
    18. चिकित्साशास्त्र – हिप्पोक्रेटस
    19. औतिकी – मार्सेलो मैल्पीघी
    20. कवक विज्ञान – माइकेली
    21. पादप कार्यिकी – स्टीफन हेल्स
    22. जीवाणु विज्ञान – ल्यूवेनहॉक
    23. सूक्ष्मजीव विज्ञान – लुई पाश्चर
    24. भारतीय कवक विज्ञान – ई. जे. बटलर
    25. भारतीय ब्रायोलॉजी – एस. आर. कश्यप
    26. भारतीय पारिस्थितिकी – आर. मिश्रा
    27. भारतीय शैवाल विज्ञान – एम. ओ. पी. आयंगर
    28. आधुनिक भ्रूण विज्ञान – वॉन बेयर
    29. हरित क्रान्ति – नॉरमन ई. बोरलॉग
    30. भारत में हरित क्रान्ति – एम. एस. स्वामीनाथन
    31. सूक्ष्मदर्शी – एन्टोनी वॉन ल्यूवेनहॉक
    32. DNA फिंगरप्रिन्टिंग – एलैक जैफरी
    33. रुधिर परिसंचरण – विलियम हार्वे
    34. रुधिर वर्ग – कॉर्ल लैण्डस्टीनर
  • वनस्पति विज्ञान की विभिन्न शाखाएँ

    वनस्पति विज्ञान की विभिन्न शाखाएँ

    Branches of Botany

    एनाटोमी (Anatomy) – आन्तरिक संरचना का अध्ययन

    एन्थोलॉजी (Anthology) – पुष्पों का अध्ययन

    बायोमेट्रिक्स (Biometrics- जीव वैज्ञानिकों के प्रेक्षणों का गणितीय विवेचन

    साइटोलोजी (Cytology) –  कोशिकाओं का अध्ययन

    डेन्ड्रोक्रोनोलॉजी (Dendrochronology) – वृक्षों की आयु का अध्ययन

    डेन्ड्रोलॉजी (Dendrology) – वृक्षों एवं झाड़ियों का अध्ययन

    एम्बियोलॉजी (Ambiology) – युग्मकों के निर्माण, निषेचन एवं भ्रूण के परिवर्धन का अध्ययन

    इथेनोबॉटनी (Ethnobotany) – आदिवासियों द्वारा पादपों के उपयोग का अध्ययन

    एक्सोबायोलॉजी (Exobiology) – अन्य ग्रहों पर सम्भावित जीवों की उपस्थिति का अध्ययन

    जेनेटिक इंजीनियरिंग (Genetic Engineering) – कृत्रिम जीन के निर्माण एवं स्थानान्तरण का अध्ययन

    आनुवंशिकी (Genetics) – वंशागति एवं विभिन्नताओं का अध्ययन

    हिस्टोलॉजी (Histology) – ऊतकों का अध्ययन

    माइकोलॉजी (Mycology) – कवकों (फफूंद) का अध्ययन

    पेलियोबॉटनी (Paleobotany) – पादप जीवाश्मों का अध्ययन

    पेलिनोलॉजी (Paleontology) – परागकणों का अध्ययन

    पीडोलॉजी (Pedology) – मृदा सम्बन्धी अध्ययन

    पेरासिटोलॉजी (Parasitology) – पोषित तथा परजीवियों के सम्बन्धों का अध्ययन

    फाइकोलॉजी (Phycology) – शैवालों का अध्ययन

    फार्मेकोलॉजी (Pharmacology) – औषधीय पादपों का अध्ययन

    पोमोलॉजी (Pomology) – फलों का अध्ययन

    स्पर्मोलॉजी (Spermology) – बीजों का अध्ययन

    एग्रोनोमी (Agronomy) – फसली पादपों के प्रबन्धन का अध्ययन

    हॉर्टीकल्चर (Horticulture) – फल, सब्जियों तथा उद्यान पादपों का संवर्द्धन व अध्ययन

    टिश्यू कल्चर (Tissue Culture) – कृत्रिम माध्यम पर ऊतकों का संवर्द्धन व अध्ययन

    सिल्वीकल्चर (Silviculture) – वनीय वृक्षों तथा उनके उत्पादों का संवर्द्धन व अध्ययन