Author: The Vigyan Team

  • ब्रायोफाइटा क्या है l   (Bryophytes ब्रायोफाइट्स (in Hindi) उदाहरण, लक्षण, प्रकार, विशेषताएँ और गुण

    ब्रायोफाइटा क्या है l (Bryophytes ब्रायोफाइट्स (in Hindi) उदाहरण, लक्षण, प्रकार, विशेषताएँ और गुण

    इस आर्टिकल में हम ब्रायोफाइटा (Bryophytes) के बारे में निम्न तथ्य जानेगे :

    • ब्रायोफाइटा (Bryophytes) क्या है ?
    • ब्रायोफाइटा (Bryophytes) के सामान्य लक्षण क्या है ?
    • ब्रायोफाइटा (Bryophytes) की विशेषताएँ क्या है ?
    • ब्रायोफाइटा (Bryophytes) के गुण और महत्त्व क्या है ?

    ब्रायोफाइटा (Bryophytes)

    ब्रायोफाइटा (Bryophyta) वनस्पति जगत का एक बड़ा वर्ग है और यह एम्ब्रियोफाइटा का सबसे साधारण व आद्य समूह है। पौधों के वर्गीकरण में ब्रायोफाइटा का स्थान शैवाल (Algae) और टेरिडोफाइटा (Pteridophyta) के बीच में आता है। ब्रायोफाइटा प्रथम स्थलीय पौधे हैं, जो शैवाल से विकसित हुए हैं। डासोनियाँ ब्रायोफाइटा का सबसे बड़ा पौधा है जिसकी ऊँचाई 40 से 70 सेमी. है।

    ब्रायोफाइटा की मुख्य  लक्षण, विशेषताए और उसके गुण

    ब्रायोफाइटा को पादप जगत के उभयचर भी कहा जाता है क्योंकि ये भूमि पर जीवित रहते है , परन्तु लैंगिक जनन के लिए जल पर निर्भर होते है।

    इसके अन्तर्गत वे सभी पौधें आते हैं जिनमें वास्तविक संवहन ऊतक (vascular tissue) नहीं होते, जैसे मोसेस (mosses), हॉर्नवर्ट (hornworts) और लिवरवर्ट (liverworts) आदि।

    ब्रायोफाइटा सर्वाधिक सरल छोटे स्थलीय पौधे हैं, जो आर्द्र स्थानों में विकसित होते हैं।

    पादप का शरीर थैलस या पर्णिल अर्थात् तना तथा पत्ती सदृश रचनाओं में विभेदित होता है परन्तु वास्तविक तना एवं पत्ती नहीं होता है।

    ये पौधे मूलाभास (राइजोड) के द्वारा मिट्टी से जुड़े होते हैं। इसमें जड़, पुष्प तथा बीज का अभाव होता है। इनमें युग्मकोद्भिद् अवस्था प्रभावी होती है।

    अधिकतर ब्रायोफाइटा में क्लोरोफिल पाया जाता है, जिससे वे स्वपोषी होते हैं। इनमें लैंगिक तथा अलैंगिक दोनों प्रकार का जनन होता है।

    ब्रायोफाइटा को पादप जगत के उभयचर के रूप में जाना जाता है अर्थात् ऐसे पौधे स्थलीय होते हैं, जिसे निषेचन के लिए जल की अत्यधिक आवश्यकता होती है।

    ब्रायोफाइटा में जल तथा लवण के संवहन हेतु संवहन ऊतक नहीं होते हैं। इसमें पदार्थों का संवहन एक कोशिका से दूसरे कोशिका में होता है।

    ब्रायोफाइटा के अन्तर्गत लिवरवर्ट तथा मॉस आते हैं। मॉस मिट्टी को बाँधे रखता है तथा मृदा अपरदन को रोकते हैं।

    कोयले सदृश पीट ईंधन, मॉस और स्फैगनम जैसे ब्रायोफाइट के हजारों वर्षों तक भूमि के नीचे दबकर रहने से निर्मित होते हैं।

    पौधे की सतह पर क्यूटिकिल का अभाव होता है। (जिसके फलस्वरूप पौधे से पानी के वाष्पीकरण का विशेष प्रतिबन्ध नहीं रह पाता तथा जल की अत्यधिक हानि होती है ऐसी स्थिति का उनकी वृद्धि पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है।)

    युग्मकोद्भिद् (gametophyte)

    इस समुदाय का पौधा युग्मकोद्भिद् होता है ये पौधे स्थली होने के साथ ही छायादार स्थानों पर उगते हैं और इन्हें अपने जीवन में पर्याप्य आर्द्रता की आवश्यकता होती है, निषेचन के लिये जल आवश्यक है। अतः कुछ वैज्ञानिक ब्रायोफाइटा समुदाय को वनस्पति जगत् का एम्फीबिया कहते हैं। ये पौधे थैलेफाइटा से अधिक विकसित होते हैं।

    इन पौधों का और अधिक विकास तभी संभव हुआ, जब उनमें संवहनी ऊतक का विकास हो गया। संवहन तन्त्र की जड़ से जल तथा खनिज, लवणों को पत्ती तक तथा पत्ती से शर्करा को पौधे की अन्य कोशिकाओं तक पहुँचाने का कार्य करता है। इसी गुण के कारन ट्रैकियोफाइटा का विकास संभव हुआ।

    लैंगिक जनन (reproduction)

    यह पादप युग्मकोदृभिद पीढ़ी पर आश्रित होती है। कायिक जनन विखंडन द्वारा होता है। अगुणित युग्मकोद्भिद पादप में नर लैंगिक अंग को पुंधानी कहते है। जिसमे समसूत्री विभाजन द्वारा पुमंग बनते है , जो अगुणित होते है। मादा लैंगिक अंग स्त्रीधानी कहलाते है। जिनमे अगुणित अण्ड बनता है। पुमंग व अण्ड के संलयन से युग्मनज बनता है।

    युग्मनज से एक बहुकोशिकीय बिजानुभिद विकसित होता है जो द्विगुणित होता है तथा पाद , सिटा व कैप्सूल में विभक्त होता है।  बीजाणुभिद में अर्द्धसूत्री विभाजन से अगुणित बीजाणु बनते है जो अंकुरित होकर अगुणित नया पादप बनाते है।

    ब्रायोफाइटा के प्रकार

    ब्रायोफाइटा को तीन वर्गों में बाँटा गया है:

    हिपैटिसी या हिपैटिकॉप्सिडा (Hepaticopsida)

    इस वर्ग के पौधों का शरीर यकृत के समान हरे रंग का होता है। इसलिए इसे लिवरवर्ट्स भी कहते हैं। पौधों के शरीर को सूकाय कहते हैं। वह चपटा होता है। सूकाय में जड़, तना, पत्तियाँ नहीं होती है। इसकी निचली सतह के अनेक एककोशिकीय मूलांग निकले होते हैं। मूलांग का कार्य स्थिरता प्रदान करना तथा भूमि से पानी एवं खनिज लवणों का अवशोषण करना है।

    जैसे : रिक्सिया तथा मार्केन्शिया आदि।

    ऐंथोसिरोटी, या ऐंथोसिरोटॉप्सिडा (Anthocerotopsida) और मार्केन्टीऑफायटा

    इसमें पौधे बहुत ही साधारण और पृष्ठाधरी रूप से विभेदित (dorsiventrally differentiated) होते हैं, पर मध्यशिरा (mid rib) नहीं होती। इन पौधों का शरीर सूकायक होता है। इनके बीजाणुद्भिद् में सीटा अनुपस्थित होता है। इस उपवर्ग में एक ही गण ऐंथेसिरोटेलीज है, जिसमें पाँच या छह वंश और लगभग 300 जातियाँ हैं। इनमें ऐंथोसिरोस (Anthoceros) और नोटोथिलस (Notothylas) प्रमुख वंश हैं। ये पौधे संसार के कई भागों में पाए जाते हैं। भारत में यह हिमालय की तराई तथा पर्वत पर और कुछ जातियाँ नीचे मैदान में भी पाई जाती हैं।

    जैसे : एन्थोसिरास में।

    मसाइ (Musci) या ब्रायॉप्सिडा (Bryopsida)

    इसमें उच्च उच्च श्रेणी के ब्रायोफाइट्स आते हैं। ये ठण्डे एवं नम स्थानों पर तथा पुरानी दीवारों पर समूहों में पाए जाते हैं। इसमें तना तथा पत्ती जैसी रचना पाई जाती है। मूल की जगह पर बहुकोशिकीय मूलांग होते हैं। मॉस का पौधा युग्मकोद्भिद् होता है। इसका बीजाणुद्भिद् आंशिक रूप से युग्मकोद्भिद् पर निर्भर रहता है।

    जैसे : मॉस में।

    स्फैगनम नामक मॉस का उपयोग कटे हुए पौधों के अंगों को नम रखने के लिए किया जाता है। मॉस को स्थल वनस्पति का पुरोगामी कहा जाता है। इसका आशय यह है कि मॉस लाइकेन के साथ सतह पर एक पर्त बनाते हैं तथा मृत्यु के बाद सतह पर ह्यमस की परत जम जाती है, जिस पर अन्य पौधे उगते हैं।

    Water moss (Fontinalis).

    ब्रायोफाइटा का महत्व

    1. शाकाहारी स्तनधारी कुछ ब्रायोफाइट्स पौधे का प्रयोग भोजन के रूप में करते है

    2. स्फेगमन व अन्य जाति के ब्रायोफाइटा को ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।

    3. इनमें पानी रोकने की क्षमता होती है इसलिए पैकिंग व सजीवो के स्थानान्तरण में उपयोग किया जाता है। साथ ही जल अवशोषण की क्षमता अधिक होने की वजह से ये बाढ़ रोकने में मदद करते हैं

    4. ये अनुक्रमण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।

    5. पूर्तिरोधी अर्थात् ऐण्टिसेप्टिक होने के कारण स्फैगनम का उपयोग सर्जिकल ड्रेसिंग के लिए किया जाता है। स्फैगनम के पौधों से स्फैगनाल नामक प्रतिजैविक प्राप्त किया जाता है।

    6. ब्रायोफाइट्स दुनिया के विभिन्न हिस्सों के जनजातीय लोगों के बीच लोकप्रिय उपाय हैं। आदिवासी लोग इन पौधों का उपयोग अपने दैनिक जीवन में विभिन्न बीमारियों को ठीक करने के लिए करते हैं।

    7.  ब्रायोफाइट्स का उपयोग अफ्रीका, अमेरिका, यूरोप, पोलैंड, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, तुर्की, जापान, दक्षिण, उत्तर और पूर्वी भारत, चीन, ताइवान के विभिन्न आदिवासी समुदायों द्वारा यकृत विकारों, त्वचा रोगों, हृदय रोगों, ज्वरनाशक, रोगाणुरोधी, घाव भरने और कई अन्य बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है।

    8. इन उपयोगों के अलावा कुछ ब्रायोफाइट्स में विभिन्न कैंसर सेल लाइनों के खिलाफ एंटीट्यूमर गतिविधियां (antitumor activities) का गुण होता है जो कि बहुत ही महत्वपुर्ण है और कैंसर जैसे रोग के इलाज के लिय इस पर और अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।

    ब्रायोफाइटा से जुड़े हुए कुछ प्रश्न और उनके जवाब

    प्रश्न  – ब्रायोफाइटा का अर्थ क्या है?

    उत्तर – ब्रायोफाइटा के अन्तर्गत वे सभी पौधें आते हैं जिनमें वास्तविक संवहन ऊतक (vascular tissue) नहीं होते, जैसे मोसेस (mosses), हॉर्नवर्ट (hornworts) और लिवरवर्ट (liverworts) आदि। ब्रायोफाइटा (Bryophyta) वनस्पति जगत का एक बड़ा वर्ग है और यह एम्ब्रियोफाइटा का सबसे साधारण व आद्य समूह है। एंजियोस्पर्म के बाद ब्रायोफाइट्स भूमि पौधों का दूसरा सबसे बड़ा समूह है। पौधों के वर्गीकरण में ब्रायोफाइटा का स्थान शैवाल (Algae) और टेरिडोफाइटा (Pteridophyta) के बीच में आता है। यह पृथ्वी पर लगभग हर जगह पाया जाता है परन्तु इसका मानव जीवन में खास उपयोग नही है l ब्रायोफाइटा प्रथम स्थलीय पौधे हैं, जो शैवाल से विकसित हुए हैं। डासोनियाँ ब्रायोफाइटा का सबसे बड़ा पौधा है जिसकी ऊँचाई 40 से 70 सेमी. है।

    प्रश्नब्रायोफाइटा का आर्थिक महत्व क्या है?

    उत्तर – ब्रायोफाइटा वर्ग के पोधों में जल अवशोषण (water absorption) की क्षमता अधिक होने की वजह से ये बाढ़ (flood) रोकने में मदद करते हैं l इस वर्ग के पौधे मृदा अपरदन (soil erosion) को रोकने में भी सहायता होते हैं। स्फेगमन (Sphagnum) व अन्य जाति के ब्रायोफाइटा को ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। पूर्तिरोधी अर्थात् ऐण्टिसेप्टिक होने के कारण स्फैगनम का उपयोग सर्जिकल ड्रेसिंग (surgical dressing) के लिए किया जाता है। स्फैगनम के पौधों से स्फैगनाल नामक प्रतिजैविक प्राप्त किया जाता है। आदिवासी लोग इन पौधों का उपयोग अपने दैनिक जीवन में विभिन्न बीमारियों को ठीक करने के लिए करते हैं। कुछ ब्रायोफाइट्स में विभिन्न कैंसर सेल लाइनों के खिलाफ एंटीट्यूमर गतिविधियां (antitumor activities) का गुण होता है जो कि बहुत ही महत्वपुर्ण है और कैंसर जैसे रोग  के इलाज के लिय किया जाता है l

  • फेसबुक – रे-बैन स्टोरीज स्मार्ट ग्लास – चश्मा से चलते फिरते फोटो और विडियो कैप्चर कर सकेगे यूजर

    फेसबुक – रे-बैन स्टोरीज स्मार्ट ग्लास – चश्मा से चलते फिरते फोटो और विडियो कैप्चर कर सकेगे यूजर

    Ray-Ban and Facebook introduce Ray-Ban Stories -Smart Glasses

    फेसबुक (Facebook) कंपनी ने प्रसिद्ध चश्मा कंपनी रे-बैन (Ray-Ban) के साथ मिलकर एक ऐसा चश्मा (smart glass) विकसित किया है जिस से यूजर अपनी आँखों से जो भी देख रहा है उसका फोटो और विडियो बना सकेगा और उसको अपने सोशल मीडिया फ्रेंड्स के साथ शेयर भी कर सकेगा l कंपनी ने इस चश्मा को रे-बैन स्टोरीज स्मार्ट ग्लास (Ray-Ban Stories – Smart Glass) का नाम दिया है l फेसबुक ने रे-बैन के साथ मिलकर इस रे-बैन स्टोरीज स्मार्ट ग्लास को 20 अलग-अलग कॉम्बिनेशन में लॉन्च किया गया है।

    रे-बैन स्टोरीज स्मार्ट ग्लास की खासियत क्या है ?

    What are the specifications of Ray-Ban Stories: Smart glasses 

    अपने फेसबुक ब्लॉग (https://tech.fb.com/) के जरिये फेसबुक ने बताया की रे-बैन स्टोरीज स्मार्ट ग्लास में 5 मेगापिक्सेल का ड्यूल इंटीग्रेटेड (dual integrated) कैमरा है। जिससे आप जो भी अपनी आँखों से देख रहे होते है उसको आसानी से कैप्चर कर सकते है l फोटो के साथ साथ इसमें यूजर कैप्चर बटन का इस्तेमाल करके या फेसबुक असिस्टेंट वॉयस कमांड (Facebook Assistant voice commands) के साथ हैंड्स-फ्री (Hands Free) का इस्तेमाल करके 30 सेकंड तक के वीडियो भी रिकॉर्ड कर सकता है l इसके अलावा यूजर इसमें म्यूजिक सुन सकता है और फोन कॉल को अटेंड कर सकता है ।

    ब्लॉग में कंपनी ने कहा कि जब भी आप अपने स्मार्ट ग्लास का इस्तेमाल करके फोटो लेते हैं या वीडियो रिकॉर्ड करते हैं तो एक हार्ड-वायर्ड कैप्चर LED (hard-wired capture LED ) की रोशनी होगी जिससे आपके सामने वाले को पता लगेगा की आप फोटो या विडियो बना रहे है ।

    रे-बैन स्टोरीज स्मार्ट ग्लास – बेहतर म्यूजिक का मजा

    Ray-Ban Stories Smart Glass – Enjoy richer voice and sound transmission

    रे-बैन स्टोरीज स्मार्ट ग्लास इन-बिल्ट स्पीकर्स के साथ आता हैं और इसके तीन-माइक्रोफोन ऑडियो ऐरे (three-microphone audio array) आपके कॉल और वीडियो को एक बेहतर वॉयस और साउंड ट्रांसमिशन (richer voice and sound transmission) देते है और यूजर एक्सपीरियंस को बढ़ाते है । कंपनी ने स्मार्ट ग्लास में बीमफॉर्मिंग टेक्नोलॉजी (Beamforming technology) का इस्तेमाल किया है जो आपके कॉल के दौरान बैकग्राउंड में हो रहे शोर को कम करता है और आपके कॉलिंग को ज्यादा आसान बनाता है ।

    रे-बैन स्टोरीज स्मार्ट ग्लास – अपने दोस्तों और सोशल मीडिया फॉलोअर्स के साथ स्टोरी और मेमोरी शेयर करे

    Ray-Ban Stories Smart Glass – share story and memory with friends

    रे-बैन स्टोरीज को नए फेसबुक व्यू ऐप (new Facebook View app) के साथ जोड़ा गया है ताकि यूजर्स अपनी फेसबुक पोस्ट, स्टोरीज (stories) और मेमोरी (memories) को दोस्तों और अपने सोशल मीडिया फॉलोअर्स के साथ शेयर कर सकें।

    फेसबुक व्यू ऐप (Facebook View app)

    फेसबुक व्यू ऐप (Facebook View app) जो iOS और एंड्रॉइड पर उपलब्ध है वो रे-बैन स्टोरीज स्मार्ट ग्लास से कैप्चर किए गए कंटेंट को फोन में इंपोर्ट (import), एडिट (edit) और शेयर (share) करने का आप्शन (option) देगा । यह कंटेंट को आपके फ़ोन की मेमोरी में सेव करने का option भी देगा जिसको बाद में आप edit करके शेयर कर सकते है l

    रे-बैन की स्टोरीज क्लासिक रे-बैन स्टाइल्स में 20 फॉर्म्स में मिलती हैं। वेफरर (Wayfarer), वेफेयरर लार्ज (Wayfarer Large), राउंड (Round) और क्लियर सन लेंस (Clear Sun Lense) की एक सीरीज के साथ 5 कलर में आता है। रे-बैन स्टोरीज़ स्मार्ट चश्मा एक विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए पोर्टेबल चार्जिंग केस के साथ आते हैं, जिसके जरिये आप अपने चश्मे को आसानी से रिचार्ज कर सकते हैं और पूरी तरह से चार्ज होने पर आप इस चश्मा को तीन दिनों तक पहन सकते है।

    रे-बैन स्टोरीज स्मार्ट ग्लास की कीमत क्या है ?

    What is price of Ray-Ban Stories Smart Glass ?

    कंपनी ने रे-बैन स्टोरीज स्मार्ट ग्लास की कीमत अभी $299 USD (लगभग 21,000 रुपए) रखी है और यह 20 स्टाइल कॉम्बिनेशन में ऑनलाइन मिलेगा। भारत में अभी यह चश्मा लांच नही हुआ है l फ़िलहाल फेसबुक ने इसे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, आयरलैंड, इटली और यूके के कुछ चुनिंदा रिटेल स्टोर्स में बेचने के लिय रखा है ।

    Full Article के लिए यहाँ जाये – https://tech.fb.com/ray-ban-and-facebook-introduce-ray-ban-stories-first-generation-smart-glasses/

  • शैवाल या एल्गी (Algae) क्या है ? परिभाषा, वर्गीकरण और आर्थिक महत्त्व

    शैवाल या एल्गी (Algae) क्या है ? परिभाषा, वर्गीकरण और आर्थिक महत्त्व

    What is Algae? Definition, Classification and Importance

    शैवाल को सामान्यतया प्रोटिस्टा जगत (Kingdom Protista) के अन्तर्गत रखा जाता है। अधिकांश शैवालों के लक्षण पौधों से मिलते-जुलते है; जैसे – पर्णहरिम की उपस्थिति में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया द्वारा स्वयं भोजन निर्माण करना। उपर्युक्त सारणी के आधार पर हम कह सकते हैं कि शैवाल का वर्गीकरण मोनेरा (Monera), प्रोटिस्टा (Protista) एवं पादप (Plantae) जगत के अन्तर्गत किया गया है। पादप जगत के अन्तर्गत शैवालों के तीन समूह निम्नलिखित हैं :

    लाल शैवाल (Red Algae)

    इसकी कोशिकाओं में (r-फाइकोइरिथ्रिन – Rph8ycoerythrin) नामक लाल वर्णक अधिकता से मिलते हैं। इसकी कोशिका भित्ति में कैल्शियम कार्बोनेट (Calcium Carbonate) होता है, जिससे इसका आवरण कठोर एवं पृथक होता है। अधिकांश लाल शैवाल समुद्री होते हैं परन्तु कुछ शैवाल मीठे पानी जैसे नदी, तालाब, झील आदि में भी पाए जाते हैं। समुद्री तट पर उच्च ज्वार तथा निम्न ज्वारीय तलों के बीच अधिकांशतया लाल शैवाल ही होती है।

    भूरा शैवाल (Brown Algae)

    इस शैवाल का रंग भूरा फ्यूकोजैन्थिन (Fucoxanthin) नामक वर्णकों के कारण होता है। इन्हें पादप जगत के फीयोफाइटा (Pheophyta) में रखा गया है। भूरे शैवाल अधिकांशतया समुद्री तथा बहुकोशिकीय होते हैं। इस वर्ग में समुद्री घास (sea ​​grass) आते हैं।

    हरे शैवाल (Green Algae)

    स्थल पर सबसे पहले पौधों का विकास हरे शैवालों से ही हुआ है। हरे शैवाल में क्लोरोफिल (chlorophyll) -a तथा 6 और कुछ कैरोटिनॉइड क्लोरोप्लास्ट (carotenoids chloroplasts) की ग्रेना में उपस्थित रहते हैं। इसमें सेलुलोज (Cellulose) की बनी कोशिका भित्ति होती है। तथा खाद्य पदार्थों का संचय स्टार्च के रूप में करते हैं। स्पाइरोगाइरा (Spirogyra) एक तन्तुमयी हरा शैवाल (Green Algae) है, जो अलवणी जल में पाया जाता है।

    स्मार्ट फैक्ट्स – शैवाल या एल्गी (Algae)

    शैवालों का आर्थिक महत्त्व (Economic Importance of Algae)

    • भूरे शैवाल : जैसे – लेमिनेरिया (Laminariales), फ्यूकस (Fucales (Fucoids) एवं एकलोनिया, से आयोडीन का निर्माण होता है।  
    • अगार (Agar) – अगार का उत्पादन लाल शैवाल से होता है, जो जेलिडियम (Gelidium) और ग्रेसीलेरिया (Gracilaria) नामक शैवाल से प्राप्त होता है।
    • शैवालों से प्राप्त एलीजन का उपयोग टाइप राइटरों में तथा अज्वलनशील फिल्मों के निर्माण में प्रयुक्त होता है।
    • भूरे शैवालों में पोटैशियम क्लोराइड होता है, जिसके कारण इससे पोटैशियम लवण प्राप्त होते हैं।
    • पोरफाइरा (Porphyra), अल्वा (Ulva), सरगासम (Sargassum), नॉस्टॉक (Nostoc) आदि शैवाल का उपयोग भोजन के रूप में होता है।
    • शैवाल भोजन तथा ऑक्सीजन का स्रोत होने के कारण अन्तरिक्ष यात्रियों द्वारा उपयोग होते हैं। इसमें विटामिन तथा क्लोरेला नामक प्रोटीन की प्रचुर मात्रा पाई जाती है।
    • नाइट्रोजन स्थिरीकरण (N2), जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है में नॉस्टॉक ( (Nostoc), एनाबीना (Anabaena) जैसे नीले-हरे शैवाल प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
    • मलेरिया उन्मूलन के सम्बन्ध में कुछ शैवाल; जैसे- नाइट्रेला और कारा प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
    • कैराजीनिन कोन्ड्रस क्रिस्पस (carrageen Chondrus crispus) नामक लाल शैवाल से प्राप्त होता है, यह आइसक्रीम, जैली, चॉकलेट आदि में प्रयुक्त होता है।

    हानिकारक शैवाल (Harmful Algae)

    कुछ शैवाल; जैसे-माइक्रोसिस्टिस, ऑसीलेटीरिया इत्यादि जल में जहर पैदा कर देते हैं। इससे जल प्रदूषण बढ़ता है।

    सिफेल्यूरोस नामक शैवाल चाय के पौधों पर ‘लाल किट्ट’ (red rust) नामक रोग उत्पन्न करता है।

    शैवाल पीने के पानी को दूषित कर देते हैं।

    पत्थर में काई के रूप में जमकर फिसलन पैदा करते हैं।

    लाइकेन

    लाइकेन शैवाल तथा कवक से बने होते हैं, ये सहजीवी होते हैं। शैवालांश (phycobiont) प्रकाश-संश्लेषण, जबकि कवकांश (mycobiont) शुष्कन से रक्षा तथा अवशोषण का कार्य करता है ये नंगी चटटानों पर सबसे पहले उगते हैं। रोसेला टिक्टोरिया लाइकेन से लिटमस प्राप्त होता है।

  • प्लांटी (पादप जगत) Kingdom Plante क्या है ? उसके वर्गीकरण, विशेषताएँ और प्रकार (Hindi me)

    प्लांटी (पादप जगत) Kingdom Plante क्या है ? उसके वर्गीकरण, विशेषताएँ और प्रकार (Hindi me)

    What is Kingdom Plante? Padap Jagat kya hai ?

    बहुकोशिकीय, प्रकाश-संश्लेषी, यूकैरियोटिक तथा उत्पादक जीवों को पादप जगत के अन्तर्गत रखा जाता है। पादप जगत का विस्तृत वर्गीकरण निम्न रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं।

    शैवाल (Algae)

    शैवाल को सामान्यतया प्रोटिस्टा जगत के अन्तर्गत रखा जाता है। अधिकांश शैवालों के लक्षण पौधों से मिलते-जुलते है; जैसे – पर्णहरिम की उपस्थिति में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया द्वारा स्वयं भोजन निर्माण करना। उपर्युक्त सारणी के आधार पर हम कह सकते हैं कि शैवाल का वर्गीकरण मोनेरा, प्रोटिस्टा एवं पादप जगत के अन्तर्गत किया गया है। पादप जगत के अन्तर्गत शैवालों के तीन समूह निम्नलिखित हैं:

    लाल शैवाल (Red Algae)

    इसकी कोशिकाओं में (r-फाइकोइरिथ्रिन) नामक लाल वर्णक अधिकता से मिलते हैं।

    भूरा शैवाल (Brown Algae)

    इस शैवाल का रंग भूरा फ्यूकोजैन्थिन नामक वर्णकों के कारण होता है। इन्हें पादप जगत के फीयोफाइटा में रखा गया है।

    हरे शैवाल (Green Algae)

    स्थल पर सबसे पहले पौधों का विकास हरे शैवालों से ही हुआ है। हरे शैवाल में क्लोरोफिल-a तथा 6 और कुछ कैरोटिनॉइड क्लोरोप्लास्ट की ग्रेना में उपस्थित रहते हैं।

    लाइकेन (Lichen)

    लाइकेन शैवाल तथा कवक से बने होते हैं, ये सहजीवी होते हैं। शैवालांश (phycobiont) प्रकाश-संश्लेषण, जबकि कवकांश (mycobiont) शुष्कन से रक्षा तथा अवशोषण का कार्य करता है ये नंगी चटटानों पर सबसे पहले उगते हैं। रोसेला टिक्टोरिया लाइकेन से लिटमस प्राप्त होता है।

    ब्रायोफाइटा (Bryophyta)

    सर्वाधिक सरल छोटे स्थलीय पौधे हैं, जो आर्द्र स्थानों में विकसित होते हैं। पादप का शरीर थैलस या पर्णिल अर्थात् तना तथा पत्ती सदृश रचनाओं में विभेदित होता है परन्तु वास्तविक तना एवं पत्ती नहीं होता है। ये पौधे मूलाभास (राइजोड) के द्वारा मिट्टी से जुड़े होते हैं। इसमें जड़, पुष्प तथा बीज का अभाव होता है। इनमें युग्मकोद्भिद् अवस्था प्रभावी होती है। ब्रायोफाइटा को पादप जगत के उभयचर के रूप में जाना जाता है

    ट्रेकियोफाइटा (Tracheophyta)

    वे पौधे, जिनमें संवहनी ऊतक पाए जाते हैं उन्हें ट्रेकियोफाइट कहते हैं। इनके शरीर में जड़, तना, पत्ती होते हैं। तथा जाइलम और फ्लोएम जैसे संवहनी ऊतक होते हैं। वर्ग-ट्रेकियोफाइटा के तीन प्रकार- -टेरिडोफाइटा (बीजविहीन संवहनी पौधे), अनावृतबीजी (फलविहीन बीज वाले पौधे) तथा आवृतबीजी (पुष्पी पादप, जिसमें फल तथा बीज बनते हैं) हैं।

    टेरिडोफाइटा (Pteridophyta)

    बीज रहित थैलीनुमा पादप, जो प्राचीनतम संवहनी पौधा है। यह मुख्यतया स्थलीय तथा छायादार और नम स्थानों पर पाया जाता है, परन्तु कुछ टेरिडोफाइट जलीय होते हैं; जैसे-एजोला, साल्वीनिया तथा मार्सिलिया आदि। टेरिडोफाइटा को मुख्यतया तीन समूहों-क्लब मॉस, हॉर्स टेल तथा फर्न में बाँटा जाता है।

    अनावृतबीजी (Gymnosperms)

    इस समूह के पौधों में बीज किसी प्रकार की संरचना से ढके हुए नहीं होते हैं अर्थात् बीज नग्न (खुला हुआ एवं अण्डाशय का अभाव) होता है। यह पौधा सदाबहार, काष्ठीय तथा लम्बा होता है। ये मरुद्भिद् स्वभाव के होते हैं, जिनमें रन्ध्र पत्ती में घुसे होते हैं तथा बाह्य त्वचा पर क्यूटिकल की पर्त चढ़ी होती है। अनावृतबीजी के अन्तर्गत शंकुधारी पौधे रखे गये हैं, जिसमें चीड़, फर, स्पूस आदि आते हैं।

    आवृतबीजी (Angiosperms)

    ये पुष्प युक्त पौधे होते हैं, जिसमें बीज सदैव फलों के अन्दर होता है। इस वर्ग के पौधों में जड़, तना, पत्ती, फूल और फल लगते हैं। ये शाक, झाड़िया या वृक्ष तीनों ही रूप में मिलते हैं। आवृतबीजी में परागकण तथा बीजाण्ड विशिष्ट रचना के रूप में विकसित होते हैं, जिन्हें पुष्प कहा जाता है, जबकि अनावृतबीजी में बीजाण्ड अनावृत होते हैं। आवृतबीजी को दो वर्गों एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री में बाँटा गया है। एकबीजपत्री बीज में बीजपत्रों की संख्या एक होती है। जबकि द्विबीजपत्री में दो बीजपत्र होते हैं।

  • क्या आप जानते है  (सीरीज 02) – मानव शरीर के  अद्भुत तथ्य

    क्या आप जानते है (सीरीज 02) – मानव शरीर के अद्भुत तथ्य

    Amazing and Interesting Science Facts about Human Body

    • एक औसत मानव शरीर हर दिन लगभग 11,000 लीटर हवा सांस के रूप में लेता और छोड़ता है ।
    • आपकी नाक और कान आपके पूरे जीवन में बढ़ते रहते हैं।
    • लगभग 80 प्रतिशत जो हमें स्वाद लगता है वो वास्तव में गंध होती है। Flavour (जायका) असल मे स्वाद और गंध का मिश्रण होता है l
    • आपकी सूंघने की शक्ति आपके स्वाद लेने के sense से लगभग 10,000 गुना अधिक शक्तिशाली होती है।
    • हमारा दिमाग शरीर द्वारा ली गई कुल ऑक्सीजन का लगभग एक चौथाई भाग इस्तेमाल करता है ।
    • एक वयस्क इंसान के दिमाग का वजन लगभग 1.5 किलोग्राम होता है। यद्यपि यह शरीर के वजन का केवल 2 प्रतिशत बनाता है, फिर भी दिमाग पूरे शरीर की ऊर्जा का लगभग 20 प्रतिशत उपयोग करता है।
    • संगीत सुनते समय, हमारे दिल की धड़कन ताल (rythm) के साथ तालमेल बिठा लेती है ।
    • त्वचा मानव शरीर का सबसे बड़ा अंग है l
    • एक वर्ष में, हमारा हृदय (heart) एक सामान्य स्विमिंग पूल को भरने जितना रक्त पंप कर देता है ।
    • आपके घर में बड़ी मात्रा में धूल वास्तव में मृत त्वचा है l हमारे शरीर से लगभग हर घंटे त्वचा के लगभग 600,000 कण निकल जाते है ।
  • कवक (फंजाई) जगत (Kingdom Fungi) क्या है ?

    कवक (फंजाई) जगत (Kingdom Fungi) क्या है ?

    What is Fungi Kingdom ?

    कवक जगत के अन्तर्गत एक या बहुकेन्द्रकीय जीव आते हैं, जो अवशोषण द्वारा गैर प्रकाश-संश्लेषक पोषण करते हैं साथ ही ऊतक विभेदन का अभाव होता है।

    विशेषताएँ :

    1. कवक में विषमपोषी पोषण होता है क्योंकि इनमें पूर्णहरिम का अभाव होता है।

    2. ये परजीवी, सहजीवी अथवा मृतोपजीवी होते हैं।

    3. यह अवशोषण के माध्यम से पोषण करते हैं। भोजन का पाचन शरीर के बाहर होता है तथा पोषक तत्व सीधे अवशोषित किए जाते हैं।

    4. इनकी कोशिका भित्ति रेशेदार पदार्थ काइटिन को बनी होती है। यह नाइट्रोजन युक्त पॉलीसेकैराइड है, जिसकी संरचना सेलुलोज के समान होती है।

    5. कवक में संचित कार्बोहाइड्रेट ग्लाइकोजन होता है न कि मण्ड (starch) यह बीजाणुओं के द्वारा प्रजनन करते हैं।

    6. कवक विश्वव्यापी है और ये वायु ,जल , मिट्टी में तथा जन्तु एवं पादपों पर पाए जाते है । ये जीव नम तथा गरम स्थानों पर सरलता से उग जाते है ।

    कवक – एक सपाट, लाल शीर्ष के साथ सफेद धब्बों वाला एक मशरूम, और जमीन पर उगने वाला एक white stem; लकड़ी पर उगने वाला लाल कप के आकार का कवक; एक प्लेट पर हरे और सफेद फफूंदीदार ब्रेड स्लाइस का ढेर

    भोजन के स्रोत के आधार पर कवक तीन प्रकार के होते है –

    मृतोपजीवी कवक

    ये कवक अपना भोजन मृत कार्बनिक पदार्थों जैसे ब्रेड, सड़े हुए फल एवं सब्जियों, गोबर इत्यादि से प्राप्त करते है । इनमें पोषण अवशोषणी या परासरणीय विधि से होता है ।

    परजीवी कवक

    ये अपना भोजन जीवित जीवों जैसे पादप, जंतु एवं मनुष्यों से प्राप्त करते है । ये कवक रोग उत्पन्न करते है । परजीवी कवक अपना पोषण चूसकांगों के द्वारा प्राप्त करते है ।

    सहजीवी

    इसके अंतर्गत ऐसे प्रकार के कवक आते है जो अपने साथ विकसित होने वाले पौधे के लिए सहायक होते है एवं ये एक दूसरे को विकसित एवं भरण पोषण के लिए मदद करते है एवं लाभ पहुचाते है| लाइकेन इसका अच्छा उदहारण है|

    कवक की सरंचना (Structure of Fungi)

    कवक के शरीर को माइसिलियम (कवक जाल) कहते है । माइसिलियम एक जालनुमा संरचना है जो कई सारे कवक तंतुओं के मिलने से बनती है । कवक तंतु को कवक की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई कहते है ।

    कवक तंतु के चारों ओर कोशिका भित्ति पाई जाती है जो काइटिन की बनी होती है । काइटिन के साथ कुछ मात्रा में सेल्युलोज, प्रोटीन एवं लिपिड पाए जाते है ।

    कवकों में जनन (Reproduction in Fungi)

    कवकों में कायिक जनन , अलैंगिक जनन व लैंगिक जनन पाया जाता है ।

    कायिक जनन – यह निम्न प्रकार का होता है –

    खण्डन (फ्रेग्मेंटेशन)

    जब माइसिलियम किसी भी कारण से छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाता है तो प्रत्येक टुकड़ा एक नये कवक तंतु या पूर्ण कवक का निर्माण कर लेता है, इसे ही खण्डन कहते है ।

    मुकुलन विधि

    जब कवक में कलिका के समान उभार बनता है तो यह कलिका मातृ कवक से अलग होकर एक नये कवक के रूप में कार्य करने लगती है । इस प्रक्रिया में मातृकोशिका का अस्तित्व समाप्त नहीं होता है । उदाहरण – सेक्रोमाइसीज (यीस्ट)

    विखण्डन (fission)

    जब कवक कोशिका बीच में से दो भागों में विभक्त हो जाती है , साथ ही इनका केन्द्रक दो भागों में बंट जाता है । तो इसे विखण्डन कहते है । उदाहरण – साइजोसेक्रोमाइसीज

    अलैंगिक जनन

    यह प्रक्रिया विभिन्न प्रकार के बीजाणुओं जैसे स्पोरेंजियोस्पोर , चल बीजाणु (जूस्पोर) , अचल बीजाणु (Aplanospore) तथा कोनेडिया द्वारा होता है । कोनेडिया का निर्माण सीधे कवक तंतु पर बहिर्जात रूप से होता है । प्रत्येक कोनेडिया अंकुरित होकर एक नये कवक तंतु का निर्माण करता है ।

    लैंगिक जनन

    यह जनन निषिक्तांड(ऊस्पोर) , ऐस्कस बीजाणु तथा बेसिडियम बीजाणु द्वारा होता है । विभिन्न बीजाणु सुस्पष्ट संरचनाओं में उत्पन्न होते है , जिन्हें फलनकाय कहते है ।

    कवक जगत के विभिन्न वर्ग

    फाईकोमाईसिटिज

    इस प्रकार के कवक गीले एवं आद्र स्थानों पर पाए जाते है| जैसे- सदी हुई लकड़ी, अथवा सीलन युक्त स्थान आदि| इनमे अलेंगिक जनन प्रक्रिया द्वारा जनन होता है, एवं युग्मको के मिलने से युग्माणु निर्मित होते है |

    एस्कोमाईसिटिज (Ascomycetes Fungi)

    इस प्रकार के कवक एक कोशिकी या बहुकोश्किय दोनों ही हो सकते है| इन्हें थैली कवक भी कहा जाता है| न्यूरोसपेरा इसका अच्छा उदहारण है, जिसका उपयोग विभिन्न प्रकार के रासायनिक प्रयोगों के अंतर्गत किया जाता है| इनमे भी अलेंगिक जनन पाया जाता है |

    बेसीडियोमाईसिटिज (Basidiomycete Fungi)

    ये कवक विभिन्न प्रकार के पौधो पर परजीवियों के रूप में विकसित होते है, इनमे अलेंगिक बीजाणु नहीं पाए जाते| इनके साधरण उदहारण मशरूम, पफबॉल आदि है| इनमे द्विकेंद्र्क सरंचना का निर्माण होता है, जिससे आगे चलकर बेसिडियम का निर्माण होता है |

    ड्यूटीरोमासिटिज (Deuteromycota Fungi)

    इस प्रजाति को अपूर्ण कवक की सूचि में रखा गया है, क्योकि इसकी लेंगिक प्रावस्था के आलावा और कुछ ज्ञात नहीं हो पाया है |

    लाइकेन (Lichen)

    लाइकेन को कवक के सहजीवी के रूप में जाना जाता है, क्योकि यह कवक के विकसित होने में सहायता करता है |

    कवकों का आर्थिक महत्त्व (Economic Importance of Fungi)

    1. मशरूम नामक कवक का उपयोग सब्जी के रूप में व्यापक रूप से होता है।

    2. पनीर उद्योग में एस्परजिलस नामक कवक का उपयोग होता है।

    3. यीस्ट नामक कवक में किण्वन का गुण होता है, जिसके कारण इसका उपयोग एल्कोहॉल, शराब, बीयर आदि बनाने में होता है।

    4. नाइट्रिक अम्ल का निर्माण एस्परजिलस नामक कवक से होता है।

    5. जिबरेलिन्स हॉर्मोन्स, फ्यूजेरियम मोनिलीफॉर्म नामक कवक से प्राप्त होता है।

    6. बेकरी उद्योग में सैकेरोमाइसिस सेरीविसी, कवक का उपयोग डबलरोटी बनाने में होता है।

    7. कवक अपमार्जन का कार्य करते है जो विभिन्न प्रकार के मृत अवशेषों को नष्ट करने का कार्य करने के लिए जाने जाते है|

    8. कई प्रकार के कवक सब्जी बनाने के लिए काम में लिए जाते है|

    9. कवक से प्रतिरोधी दवाइयों का निर्माण किया जाता है जो मनुष्य के प्राण बचाने में सहायक होते है|

  • प्रोटिस्टा जगत  (Protista Kingdom) क्या है ? हिंदी में

    प्रोटिस्टा जगत (Protista Kingdom) क्या है ? हिंदी में

    What is Protista Kingdom ? (in Hindi)

    प्रोटिस्टा जगत के अन्तर्गत सभी एककोशिकीय (Unicellular) यूकैरियोटिक (Eukaryotic) मुख्यतया जलीय यूकैरियोटिक आते हैं; जैसे – एककोशिकीय शैवाल, प्रोटोजोआ डाइटम इत्यादि। इन्हें प्रजीव (Parasites) अथवा प्रोटिस्ट भी कहते है l यूकेरियोट्स ऐसे जीव हैं जिनकी कोशिकाओं में एक नाभिक होता है जो एक परमाणु से घिरा रहता है।

    ये जीव अपने सारे कार्य जो कि जीवन यापन के लिए आवश्यक होते हैं एक कोशिका(single cell) से ही संपन्न करते हैं यानी शारीरिक कार्य के हिसाब से सभी प्रोटिस्टा जगत के जीव बहुकोशिकीय जीवो के शरीर के जैसे ही होते हैं। इस जगत को प्रोकैरियोटिक जीवो वाले जगत मोनेरा (Monera)  एवं यूकैरियोटिक बहुकोशिकीय जीवो (पादप तथा प्राणी) वाले जगतो के बीच में रखा जाता है।

    मोनेरा (Monera Kingdom) एककोशिकीय प्रोकैरियोटिक जीवों से बना है। अन्य चार kingdoms, प्रोटिस्टा, कवक, प्लांटे और एनिमिया सभी यूकेरियोटिक जीवों (Eukaryotic Organisms) से बने हैं।  वैज्ञानिक रॉबर्ट विटाकर (Robert H. Whittaker) द्वारा सन 1969 में प्रस्तावित प्रख्यात पांच जगत वर्गीकरण में सभी एककोशिकीय यूकैरियोटिक जीवों, एककोशीय निवही या कोलोनियल जीवों व ऐसे जीवों को जो ऊतक नहीं बनाते,को ‘प्रॉटिस्टा’ के रूप में वर्गीकृत किया गया l यह सभी यूकैरियोटिक तो हैं लेकिन इनके जीवन चक्र,पोषण स्तर, गमन या चलन की विधियां व कोशिकीय सरंचना भिन्न भिन्न हैं।

    इनमें प्रजनन लैगिक और अलैगिक दोनों ही प्रकार का होता है। प्रोटिस्टा की एक खास विशेषता है कि यह प्रोकैरियोट और आधुनिक यूकैरियोट (पादप तथा प्राणी) के मध्य कड़ी का कार्य करता है। जन्तु एवं पौधे के मध्य आने वाला युग्लिना भी इसी जगत का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता है|

    पादपों की भाँति अनेक प्रोटिस्टा प्रकाश-संश्लेषण द्वारा भोजन का निर्माण करते हैं। वस्तुतः पादपों और जन्तुओं की भांति इनकी कोशिकाएँ विभिन्न प्रकार के उतकों में संगठित नहीं होती है।

    प्रोटिस्ट के अध्ययन को प्रोटिस्टोलॉजी (Protistology) कहा जाता है

    ऊपर बाईं ओर से : लाल शैवाल (Chondrus crispus); भूरा शैवाल (Giant Kelp); ciliate (Frontonia); स्वर्ण शैवाल (Dinobryon); Foraminifera (Radiolaria); parasitic flagellate (Giardia muris); pathogenic amoeba (Acanthamoeba); amoebozoan slime mold (Fuligo septica)

    संरचना (Structure of Protists)

    प्रोटिस्टा में कोशिकाएँ एक कला द्वारा घिरी होती है। प्रकाश-संश्लेषी प्रोटिस्टा कोशिका में पर्णहरिम होते हैं प्रत्येक कोशिका में माइटोकॉण्ड्रिया, गॉल्जीकाय, केन्द्रक, गुणसूत्र आदि अंग कलाओं से घिरे हुए होते हैं। प्रोटिस्टा में गमन कशाभिका, रोमाभि और कूटपादों द्वारा होता है। इस जगत के प्राणी मृतोपजीवी या परजीवी अथवा प्रकाश संश्लेषण क्रिया के द्वारा अपना भरण पोषण करते है |

    जनन (Reproduction system in Protists)

    प्रोटिस्टा में जनन दो प्रकार की क्रियाओ लैंगिक जनन और अलेंगिक (asexual) जनन द्वारा होता है | लेंगिक प्रजनन के अंतर्गत नर एवं मादा जाइगोट का निर्माण करते है, जो युग्मक संयोजन द्वारा किया जाता है, जिससे अर्धसूत्री विभाजन फलित होता है एवं जीव का विकास सम्भव हो पाता है, जबकि अलेंगिक जनन प्रक्रिया द्विविभाजन प्रणाली द्वारा पूरी होती है, जिसमे पुटी निर्मित करके जीव का जन्म होता है|

    प्रोटिस्टा जीवो के प्रकार (Type of Protists)

    अवपक कवक

    इस प्रकार के प्रोटिस्ट जीव प्रकाश संश्लेषण वर्णक (Photosynthesis Pigment) तथा कोशिका भित्ति (Cell Wall) हीन जीव द्रव्य वाले तथा अनियमित आकार के होते हैं। जिसमें कई |केंद्रक पाए जाते हैं। शैशव अवस्था में कोशिका के चारों और भीति का अभाव होता है, लेकिन वयस्क अवस्था में लसलसे (Gluttonous) पदार्थ का एक स्तर कोशिका के चारों ओर बन जाता है। इसी कारण इन्हें अवपक कवक (Depigmented Fungus) कहते हैं। उदाहरण – फाइसेरम (Physarum polycephalum) आदि।

    स्वपोषी प्रोटिस्ट (Autotrophic protists)

    ऐसे प्रोटिस्ट जो प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की क्षमता युक्त होते हैं। अथवा इनमें पर्णहरिम (Chlorophyll) तथा दूसरे प्रकाश संश्लेषण वर्णक पाए जाते हैं। स्वपोषी यानी प्रकाश संश्लेषण प्रोटेस्ट के अंतर्गत डाइनोफ्लेजेलेट्स (Dinoflagellates), डाइटम (Diatoms) तथा यूग्नीला (Eugenila) के समान जीव आते हैं।

    प्रोटोजोअन (Protozoa) प्रोटिस्ट

    इस प्रकार के प्रोटिस्टा जगत के सदस्य अप्रकाश संश्लेषी होते हैं अर्थात इनमें प्रकाश संश्लेषी वर्णक का अभाव होता है। यह एक कोशिकीय परपोषी जन्तुसम (Cellular Host Organism) जीव होते हैं। जन्तुसम पोषण करते हैं यानी यह अपने भोजन को निकलते हैं। इनके एककोशकीय शरीर के चारों तरफ आवरण पाया जाता है। जिसे पैलिकल कहते हैं। उदाहरण – अमीबा, पेरमिसियम। अधिकांश प्रोटोजोआ को नग्न आंखों से नही देखा जा सकता है क्योकिं ये लगभग 0.01-0.05 मिमी के होते हैं, लेकिन इन्हें एक माइक्रोस्कोप की मदद से आसानी से देखा जा सकता है।

    प्रोटिस्टा जगत के अंतर्गत आने वाले जीवो के कुछ उदाहरण

    Example of some Protists

    अमीबा (Amoeba)

    ऊपर दाईं ओर से : अमीबा प्रोटीस, एक्टिनोफ्रीस सोल, एकैन्थअमीबा एसपी।, पॉम्फॉलीक्सोफ्री एसपी।, यूग्लिफा एसपी।, न्यूट्रोफिल अंतर्ग्रहण बैक्टीरिया

    अमीबा प्रोटिस्टा जगत का महत्वपूर्ण प्राणी माना जाता है, जो ताल्राबो, झीलों आदि में पाया जाता है| अमीबा के भीतर संचरण के लिए पादाभ उपस्थित रहते है, जिससे ये अपना भोजन प्राप्त करता है | अमीबा के पादाभ इसे भोजन ग्रहण करने में सहायक होते है | अमीबा का कोई मुंह नहीं है; कोशिका की सतह के किसी भी बिंदु यह  भोजन ग्रहण करते है और उसे उत्सर्जित करते है । ये भोजन के दौरान, साइटोप्लाज्म के विस्तार खाद्य कणों के चारों ओर प्रवाहित होते हैं, उन्हें घेरते हैं और एक रिक्तिका बनाते हैं जिसमें कणों को पचाने के लिए एंजाइम स्रावित होते हैं।

    अमीबा में जनन के लिए द्विविभाजन प्रणाली का उपयोग किया जाता है, अत: इसमें लेंगिक जनन का गुण नहीं पाया जाता है | प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थियों में अमीबा एनसिस्टमेंट (Encystment) द्वारा जीवित रहते हैं l चूँकि अमीबा गोलाकार होता है इसलिय वो अपना अधिकांश पानी खो देता है, और एक सिस्ट झिल्ली को स्रावित करता है जो उसे एक सुरक्षात्मक आवरण प्रदान करती है l जब पर्यावरण अनुकूल होता, तो उस झिल्ली से  अमीबा बाहर निकल जाता है।

    एंटअमीबा

    इसका आकार व् बनावट अमीबा के समान ही होता है, अधिकांशत: ये प्रदूषित जल में पाए जाते है l इसकी एक साधारण प्रजाति को हिस्टोलिका कहा जाता है | इस प्रदूषित जल के सेवन से कई बीमारियां हो सकती है l

    नर एंटअमीबा का आक्रमण सिस्ट के द्वारा फलित होता है, और यदि यह गाँठ मनुष्य के शरीर में पैदा होकर फट जाए एवं पेट एवं आंतड़ियो में फ़ैल जाए तो यह गम्भीर रोग उत्पन्न कर सकते है l

    प्लाजमोडियम (Plasmodium)

    प्लास्मोडियम एककोशिकीय यूकेरियोट्स का ही एक जीनस है जो कशेरुक (vertebrates) और कीड़ों (insects) के परजीवी हैं। प्रोटिस्टा जगत के इस परजीवी को मलेरिया परजीवी भी कहा जाता है| इसका जीवन चक्र 2 मुख्य प्रवस्थाओ में सम्पन्न होता है, जिसमे से लेंगिक जनन प्रावस्था मादा एनाफिलिज मच्छर द्वारा की जाती है, जो मलेरिया वाहक कहलाती है, एवं अलेंगिक जनन प्रावस्था मानव के रक्त द्वारा सम्पन्न की जाती है |

    युग्लिना (Euglena)

    इस जीव का बाहरी आवरण बेहद लचीला होता है, जिसे पेलिकल कहा जाता है और यह प्रोटीन से निर्मित होता है |  यह जीव गंदे स्थानों, जैसे नाले, गड्ढे, गंदे पानी के जलाशयों आदि में उपस्थित रहता है| जनन के लिए द्विविभाजन प्रणाली का प्रयोग किया जाता है, एवं जल में संचरण कशाभ द्वारा किया जाता है |

    डायटम (Diatom)

    इसकी हजारो की संख्या में प्रजातिया जल में स्थित रहती हैं जो जलीय प्राणियों का भोजन करती है | डायटम तन्तु के रूप में विद्यामान हो सकते है, ये एक कोशिकीय भी हो सकते है तथा आकृतियों में भेद हो सकता है | यह जीव नाम मिटटी, जल एवं गीली जगहों पर पाया जाता है | डायटम कोशिका भित्ति निर्मित करते हैं जिसके अंदर सिलिका उपस्थित रहती है| इनमे केन्द्रक पाया जाता है, एवं ये कई प्रकार के मिनरल्स का अच्छा स्त्रोत है |

  • Tesla Bot क्या है?

    Tesla Bot क्या है?

    Tesla Bot एक ह्यूमनॉइड रोबोट है, जिसकी घोषणा हाल ही में इलोन मस्क के द्वारा की गयी है, हालांकि ये अभी नहीं बताया गया है कि ये कब तक लॉंच होगा, हालांकि टेस्ला ने अगले साल तक प्रोटोटाइप लाने का वादा किया है पर जब भी लांच हो ये एक बेहतरीन AI Robot होगा |

    • हालांकि 2019 में AI (Artificial Intelligence) को दुनिया के लिए Nuclear Bomb से भी बड़ा खतरा बताया था !
    • ये रोबोट खास तौर पर Repetitive, खतरनाक और बोरिंग काम करने के लिए बेहद उपयोगी होगा !
    • फिलहाल जो Image Tesla Bot की दिखाई गयी हैं उसमें कंधे के नीचे का शरीर पूरी तरह सफेद है जबकि सिर और गर्दन का क्षेत्र काले रंग में रंगा हुआ है !
    • जैसे ही यह कैमरे के पास आता है, इसका चेहरा दिखाई देता है जहां पर एक स्क्रीन है जिसमें चेहरे जैसी कोई संरचना नहीं है ये बताया जा रहा है कि ये स्क्रीन जरूरी जानकारियों को दिखाएगी !

    अन्य विशेषताएँ

    • टेस्ला बॉट वो हर वो काम करेगा, जिसको करने में इंसानों को महनत करनी पड़ती है, वो हर वो काम, जो असुरक्षित या फिर बोरिंग होते हैं
    • ये रोबोट 5.8 फीट (1.8 मीटर) लंबा और 125 पाउंड (57 किग्रा) वजन का होगा
    • इसके चलने की गति लगभग 5mph (8 किमी प्रति घंटे) होगी
  • भूमिगत तेल/ गैस निकालने हेतु विशेष पॉलिमर विकसित

    भूमिगत तेल/ गैस निकालने हेतु विशेष पॉलिमर विकसित

    भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर के शोधकर्ताओं की टीम ने “स्पेशलिटी फ्रिक्शन रेड्यूसर” पॉलिमर विकसित किए हैं, जो भूमिगत कुओं से तेल निकालने में मदद कर सकते हैं |

    • इस प्रकार का पॉलिमर पहली बार तैयार किया गया है। यह पॉलिमर एक्रिलामाइड आधारित पॉलिमर है।
    • एक्रिलामाइड एक प्रकार का रसायन है। ये पॉलिमर सुनिश्चित करते हैं कि भूमिगत तेल को बाहर निकालते समय घर्षण कम से कम हो, जिससे तेल को आसानी से निकाला जा सके।

    पिछले दशक के बाद से वैश्विक तेल और गैस उद्योग भूमिगत तेल निकालने के लिए फ्रैकिंग जैसे नए तरीकों पर तेजी से भरोसा कर रहा है। लेकिन कई स्थान ऐसे है जहां ड्रैग रिडक्शन के अधिक होने के कारण और तरल पदार्थो के प्रवाह गुणों के कारण तेल निकालना बेहद मुश्किल हो जाता है।

    • फ्रैकिंग वह प्रक्रिया है जिसमें जमीन की नीचे से जरूरी तेल रसायन एवं गैस को बहुत ज्यादा दबाव देकर निकाला जाता है।
    • ड्रैग रिडक्शन एक ऐसी भौतिक प्रक्रिया है, जिसके कारण घर्षण कम हो जाता है और द्रव प्रवाह बढ़ जाता है।
  • बीएचयू में उगा मलेरियारोधी चीनी पौधा

    बीएचयू में उगा मलेरियारोधी चीनी पौधा

    • चीन के अत्यधिक ठंडे क्षेत्र में पाया जाने वाला मलेरियारोधी पौधा आर्टिमिसिया अनुआ अब भारत के गर्म स्थानों में भी पनप सकेगा।
    • आर्टिमिसिया की प्रजातियों में अनुआ विशेष है।
    • इस औषधीय पौधे की पत्तियों व फूल से मस्तिष्क ज्वर व मलेरिया की दवा बनाई जाती है।
    • इस दवा के खिलाफ अभी बैक्टीरिया प्रतिरोधी क्षमता विकसित नहीं कर पाए हैं।
    • बीएचयू के वनस्पति विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने टिशू कल्चर के जरिये इसकी प्रकृति में बदलाव किया है।
    • इस पौधे की पत्ती का काढ़ा काफी फायदेमंद है और इसमें एलर्जीरोधी तत्व पाये गये हैं।
    • वनस्पति विभाग की प्रो. शशि पाण्डेय के नेतृत्व में प्रयोग हो रहा है।
    • आर्टिमिसिया अनुआ को सफलतापूर्वक प्रयोगशाला में उगाया गया।
    • पौधे में आर्टिमिसिया रसायन समुचित मात्रा में मौजूद रहा।
    • इसे पराबैगनी किरणों से उपचारित किया गया तो रसायन की मात्रा दो गुनी हो गई।
    • इसे क्षारीय भूमि में भी उगने लायक बना लिया गया है।
    • इसकी खेती बंजर जमीन पर भी की जा सकेगी। 
    • आधुनिक चिकित्सा के अलावा अब लोग पारंपरिक औषधियों से चिकित्सा की ओर लौट रहे हैं।
    • चीन में इसका सबसे पहले उपयोग बुखार की दवा के रूप में किया गया।