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  • क्‍या पृथ्‍वी पर पानी एस्‍टरॉयड लाए? क्या है एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) ?

    क्‍या पृथ्‍वी पर पानी एस्‍टरॉयड लाए? क्या है एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) ?

    Resource

    https://iopscience.iop.org/article/10.3847/2041-8213/ac83bd

    https://www.sciencealert.com/asteroid-ryugu-reveals-ancient-grains-of-stardust-older-than-the-solar-system

    करीब 6 साल के एक जापानी अंतरिक्ष मिशन में जुटाए गए गए दुर्लभ नमूनों का विश्लेषण करने के बाद वैज्ञानिकों ने कहा है कि हमारे सौर मंडल के बाहरी किनारों से एस्‍टरॉयड्स द्वारा पानी पृथ्वी पर लाया गया हो सकता है।

    जीवन की उत्पत्ति और ब्रह्मांड के निर्माण पर रोशनी डालने के लिए रिसर्चर्स साल 2020 में एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) से पृथ्वी पर लाए गए मटेरियल की जांच कर रहे हैं।

    एक एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, 5.4 ग्राम (0.2 औंस) वजन वाली चट्टान और धूल को एक जापानी स्‍पेस प्रोब, “हायाबुसा -2′ (Hayabusa-2) ने इकट्ठा किया था। यह प्रोब उस आकाशीय पिंड पर उतरा था और उसने पिंड के सर्फेस पर एक ‘प्रभावक’ (impactor) को फायर किया था। इस मटीरियल से जुड़ी स्‍टडी प्रकाशित होने लगी हैं।

    एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) क्या है ?

    यह सी-प्रकार के क्षुद्रग्रह 162173 रयुगु का रंगीन दृश्य है, जिसे हायाबुसा 2 के बोर्ड पर ओएनसी-टी कैमरे द्वारा देखा गया है।

    संयुक्त राज्य अमेरिका में सोकोरो, न्यू मैक्सिको के पास लिंकन लैब के ईटीएस (Lincoln Lab’s ETS ) में लिंकन नियर-अर्थ क्षुद्रग्रह अनुसंधान (Lincoln Near-Earth Asteroid Research) के साथ खगोलविदों द्वारा 10 मई 1999 को रयुगु की खोज की गई थी। इसे अनंतिम पदनाम 1999 JU3 दिया गया था | इसका व्यास लगभग 1 किलोमीटर (0.62 मील) है और यह दुर्लभ वर्णक्रमीय प्रकार Cb (rare spectral type Cb) की एक काली वस्तु है, जिसमें C-प्रकार के क्षुद्रग्रह (C-type asteroid) और B-प्रकार के क्षुद्रग्रह ((B-type asteroid)) दोनों के गुण हैं।

    28 सितंबर 2015 को माइनर प्लैनेट सेंटर (Minor Planet Center ) द्वारा आधिकारिक तौर पर क्षुद्रग्रह का नाम “रयुगु” रखा गया था।

    यह नाम रियोगो-जो (ड्रैगन पैलेस) (Ryūgū-jō (Dragon Palace) को संदर्भित करता है, जो की एक जापानी लोककथा में एक जादुई महल होता है जो पानी के नीचे स्थित होता है | इस लोक कथा में, मछुआरा उरशिमा तारो (Urashima Tarō ) एक कछुए की पीठ पर इस जादुई महल की यात्रा करता है, और जब वह वापस उस महल से लौटता है, तो अपने साथ एक रहस्यमय बॉक्स लेकर आता है, जैसे हायाबुसा 2 इस एस्‍टरॉयड के नमूनों के साथ वापस पृथ्वी पर आया था |

    हायाबुसा-2 अंतरिक्ष यान जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (Japan Aerospace Exploration Agency (JAXA) द्वारा दिसंबर 2014 में लॉन्च किया गया था और 27 जून 2018 को यह सफलतापूर्वक क्षुद्रग्रह (asteroid) पर पहुंचा। 6 दिसंबर 2020 को एक कैप्सूल एस्‍टरॉयड के samples के साथ ऑस्ट्रेलिया में लैंड हुआ ।

    एस्‍टरॉयड रयुगु से क्या पाया वैज्ञानिकों ने ?

    इस साल जून में रिसर्चर्स के एक समूह ने कहा था कि उन्हें कार्बनिक पदार्थ मिला है, जिससे पता चलता है कि पृथ्वी पर जीवन के कुछ बिल्डिंग ब्‍लॉक्‍स, अमीनो एसिड अंतरिक्ष में बने हो सकते हैं।

    नेचर एस्ट्रोनॉमी जर्नल में प्रकाशित एक नए पेपर में वैज्ञानिकों ने कहा है कि एस्‍टरॉयड ‘रयुगु’ (Ryugu) के सैंपल इस बात पर रोशनी डाल सकते हैं कि अरबों साल पहले पृथ्वी पर महासागर कैसे बने। जापान और अन्य देशों के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस अध्ययन में कहा गया है कि वाष्पशील और ऑर्गनिक रिच C-टाइप के एस्‍टरॉयड, पृथ्वी के पानी के प्रमुख सोर्सेज में से एक हो सकते हैं। उनके मुताबिक पृथ्वी पर वाष्पशील पदार्थ (ऑर्गेनिक्स और पानी) का होना अभी भी बहस का विषय है। खास बात यह है कि स्‍टडी में पहचाने गए रयुगु एस्‍टरॉयड के पार्टिकल्‍स में पाए जाने वाले कार्बनिक पदार्थ संभवत: वाष्पशील पदार्थ के एक अहम सोर्स हो सकते हैं। 

    हायाबुसा-2 को साल 2014 में लगभग 300 मिलियन किलोमीटर दूर ‘रयुगु’ एस्‍टरॉयड की ओर लॉन्‍च किया गया था। दो साल पहले ही यह पृथ्वी की कक्षा में लौटा था। नेचर एस्ट्रोनॉमी में पब्लिश हुई स्‍टडी में रिसर्चर्स ने मिशन द्वारा प्कीराप्त की गई खोजों को महत्वपुर्ण बताया है ।

  • रेडियो टेलीस्कोप का इस्‍तेमाल कर वैज्ञानिक लगायेगे ‘एलियंस’ और नये ग्रहों का पता

    रेडियो टेलीस्कोप का इस्‍तेमाल कर वैज्ञानिक लगायेगे ‘एलियंस’ और नये ग्रहों का पता

    Resource: https://www.sciencealert.com/scientists-have-found-a-new-way-to-detect-alien-worlds-beyond-our-solar-system

    बीते कुछ वर्षों में साल से वैज्ञानिकों ने अपना फोकस एक्‍सोप्‍लैनेट की ओर बढ़ा दिया है। ऐसे ग्रह जो सूर्य के अलावा अन्य तारों की परिक्रमा करते हैं उन्हें एक्सोप्लैनेट (exoplanets) कहलाते हैं। वैज्ञानिक लगातार नये ग्रहों की खोज इस उम्मीद में करते रहते है की शायद उन्‍हें वहां जीवन के संकेत मिल जाएंगे।

    एक्‍सोप्‍लैनेट को कैसे खोजा जाता है ?

    ज्‍यादातर एक्‍सोप्‍लैनेट को ट्रांजिट मेथड (transit method) द्वारा खोजा गया है। इसमें एक ऑप्टिकल टेलीस्कोप समय के साथ किसी तारे की चमक को मापता है। अगर तारे की चमक बहुत कम है, तो यह संकेत हो सकता है कि कोई ग्रह उसके सामने से गुजरा है। ट्रांजिट मेथड एक पावरफुल टूल है, लेकिन इसकी अपनी कुछ सीमाएं हैं। इसके लिए ऑप्टिकल टेलीस्‍कोप चाहिए और तारे के पास से ग्रह को गुजरना चाहिए ।

    एक्सोप्लैनेट का पता लगाने का नया मेथड

    नई मेथड खगोलविदों को रेडियो टेलीस्कोप का इस्‍तेमाल करके एक्सोप्लैनेट का पता लगाने में मदद कर सकती है। Sciencealert की रिपोर्ट के अनुसार, रेडियो तरंग दैर्ध्य (Wavelengths) पर एक्सोप्लैनेट को ऑब्‍जर्व करना आसान नहीं है। ज्‍यादातर ग्रह बहुत ज्‍यादा रेडियो लाइट उत्सर्जित नहीं करते हैं और तारे ऐसा करते हैं। हालांकि तारों से निकलने वाले फ्लेयर्स (stellar flares) के कारण रेडियो लाइट में भी अंतर हो सकता है। लेकिन बृहस्पति जैसे बड़े गैस ग्रह रेडियो ब्राइट (radio bright) हो सकते हैं। इसकी वजह इनका मजबूत चुंबकीय क्षेत्र है। बृहस्पति ग्रह की रेडियो लाइट इतनी चमकदार है कि आप इसे घर में मौजूद रेडियो टेलीस्कोप से पहचान सकते हैं।

    बृहस्पति गृह की रेडियो इमेज (Radio image of Jupiter). (Imke de Pater; Michael H. Wong, UC Berkeley; Robert J. Sault, University of Melbourne)

    एस्‍ट्रोनॉमर्स ने कई और ग्रहों से रेडियो सिग्‍नल्‍स का पता लगाया है। स्‍टडी के दौरान टीम ने यह समझने की कोशिश की कि इस तरह के सिग्‍नल कैसे हो सकते हैं। उन्होंने अपने मॉडल को मैग्नेटोहाइड्रोडायनामिक्स (MHD) पर आधारित किया। यह बताता है कि चुंबकीय क्षेत्र और आयनित गैसें कैसे आपस में इंटरेक्‍ट करती हैं। अपनी स्‍टडी को वैज्ञानिकों ने HD 189733 के रूप में पहचाने के गए ग्रह सिस्‍टम पर अप्‍लाई किया। उन्होंने सिम्‍युलेट किया कि कैसे एक तारे की हवा ने ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र इंटरेक्‍ट किया।

    वैज्ञानिकों को कई दिलचस्‍प चीजें पता चलीं। उन्‍हें पता चला कि रेडियो ऑब्‍जर्वेशन अपने तारे के सामने से गुजरने वाले किसी ग्रह के ट्रांजिशन का पता लगा सकते हैं। हालांकि ऐसे सिग्‍नल काफी फीके होंगे और उन्‍हें पकड़ने के लिए नई जेनरेशन वाले रेडियो टेलिस्‍कोप की जरूरत होगी। लेकिन अगर हम उनका पता लगाते हैं, तो ग्रहों के रेडियो सिग्नल हमें सिस्टम में कम से कम एक ग्रह का सटीक ऑर्बिटल माप देंगे। इससे एक्सोप्लैनेट की संरचना और इंटीरियर को समझने में मदद मिलेगी।

  • क्या पृथ्वी पर बढ़ रही है एक दिन की लंबाई ? कारण और परिणाम

    क्या पृथ्वी पर बढ़ रही है एक दिन की लंबाई ? कारण और परिणाम

    पृथ्वी (Earth) पर दिन रहस्यमयी तरीके से लंबा हो रहा है यानी धरती के दिन का समय बढ़ रहा है और वैज्ञानिकों को यह रहस्यमय लग रहा है क्योकीं वैज्ञानिक इसके पीछे जुड़े कारण पर अभी तक नही पहुच पा रहे है |

    दुनिया भर के एटॉमिक क्लॉक्स ने गणना करके यह बताया है कि पृथ्वी के दिन का समय रहस्यमयी तरीके से बढ़ रहा है इससे न सिर्फ हमारे समय की कैलकुलेशन पर असर पड़ेगा, बल्कि जीपीएस, नेविगेशन और संचार संबंधी कई अन्य तकनीकों में भी समस्या आएगी |

    धरती के दिन की गणना उसकी धुरी पर लगने वाले चक्कर से होती आई है लेकिन धरती के अपनी धुरी पर घूमने की गति लगातार बढ़ रही है | पिछले कुछ दशकों से हमारे दिन की लंबाई छोटी हो रही थी | जून 2022 में सबसे छोटे दिन का रिकॉर्ड भी दर्ज किया गया यानी पिछली आधी सदी में यह सबसे छोटा दिन था लेकिन साल 2020 के बाद और इस रिकॉर्ड के गठन के बाद अब धरती ने गति धीमी हो रही है और दिन लंबे हो रहे हैं जिसकी वजह वैज्ञानिकों को पता नहीं है |

    सामान्य फोन या घड़ी में तो 24 घंटे का सटीक समय दिखा रहे है लेकिन पृथ्वी के 24 घंटे में लगने वाला चक्कर अब कुछ समय ज्यादा ले रहा है | आमतौर पर यह बदलाव करोड़ों सालों में होता है | हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे की वजह धरती पर आने वाले भूकंप (Earthquake) और तूफान (Storm) भी हो सकते हैं |

    पिछले कई करोड़ वर्षों से धरती के घूमने की गति धीमी हो रही है और इसके पीछे चंद्रमा से निकलने वाले टाइड्स का घर्षण है | हर एक सदी में 2.3 मिलिसेकेंड धरती के दिन के समय में जुड़ रहा है |

    कुछ करोड़ साल पहले धरती का दिन सिर्फ 19 घंटे का होता था लेकिन पिछले 20 हजार सालों से दूसरी प्रक्रिया शुरू हो गई जो कि विपरीत दिशा में है इस वजह से धरती की गति बढ़ने लगी | यह प्रक्रिया तब शुरू हुई जब जब Ice Age  में ध्रुवीय बर्फ के पिघलने से सरफेस प्रेशर कम हो रहा था और धरती का मैंटल धीरे-धीरे ध्रुवों की तरफ खिसक रहा था |

    इसे एक उदाहरण से समझते है जैसे कोई बैले डांसर अपने घूमने की गति बढ़ाने के लिए अपने हाथों को अपने शरीर के करीब रख लेती है ताकि वह अपनी धुरी यानी पैर पर तेजी से गोल घूम सके | इसी तरह हमारी पृथ्वी के घूमने की गति तब बढ़ जाती है, जब उसका मैंटल धुरी के नजदीक पहुंचता है इसकी वजह से धरती का हर दिन 0.6 मिलिसेकेंड्स कम हो जाता है| धरती के एक दिन में 86,400 सेकेंड्स होते हैं |

    पिछले कई दशकों से धरती की आंतरिक संरचना और सतह के बीच एक संबंध बना हुआ है | अगर बड़े भूकंप आते हैं तो ये धरती के दिन की लंबाई को बदल देते हैं  भले ही अंतर कम समय का हो | जैसे साल 2011 में जापान में आए 8.9 तीव्रता के भूकंप ने धरती की घूमने की गति को 1.8 मिलिसेकेंड बढ़ा दिया था | इसके अलावा कई ऐसी छोटी घटनाएं होती रहती हैं, जो धरती के दिन के समय को बदलते हैं. जैसे- जलवायु परिवर्तन, मौसमों में बदलाव आदि | ये धरती के घूमने की गति को हर दिशा से प्रभावित करती हैं |

    हर 15 दिन पर या महीने में टाइडल साइकिल (fortnightly and monthly tidal cycles) यानी लहरों की गति भारी मात्रा में ग्रह के चारों तरफ मूवमेंट करती हैं | इनकी वजह से भी पृथ्वी के दिन का समय कम या ज्यादा होता है | समुद्र की लहरों की वजह से होने वाला बदलाव आमतौर पर 18.6 वर्षों में एक बार होता है | वायुमंडल के मूवमेंट का सबसे ज्यादा असर धरती की गति पर पड़ता है | इसके अलावा बर्फबारी, बारिश, जमीन से पानी निकालना ये चीजें भी धरती की गति पर असर डालती हैं |

    पृथ्वी अचानक धीमी क्यों हो रही है?

    वर्ष 1960 से अब तक धरती पर मौजूद रेडियो टेलिस्कोप्स ग्रहों के चारों तरफ मौजूद क्वासार (Quasars) और अन्य अंतरिक्षीय वस्तुओं की गणना से धरती के घूमने की गति का पता लगाते आ रहे हैं | इन रेडियो टेलिस्कोप और एटॉमिक घड़ी के आंकड़ों से पता चला है कि पिछले कुछ सालों से धरती के दिन का समय कुछ कम हो रहा था | लेकिन रोटेशन में इतना बदलाव आता है कि वैज्ञानिक कई बार धोखा खा जाते हैं |

    29 जून 2022 को सबसे छोटा दिन होने के बावजूद साल 2020 के बाद धरती के घूमने की ट्रैजेक्टरी (trajectory) में समय बढ़ा है | यह बदलाव पिछले 50 सालों में कभी नहीं देखा गया था | अभी तक इस बदलाव की सही और सटीक वजह पता नहीं चल पाई है | ये बदलाव मौसम के परिवर्तन की वजह से हो सकते है या फिर ला नीना इवेंट्स (La Niña events की वजह से | बर्फ के लगातार पिघलने की वजह से यह प्रक्रिया और बढ़ सकती है |

    वर्तमान समय के बदलाव को लेकर पहले चैंडलर वॉबल (Chandler Wobble) को वजह बताया जा रहा था | यह हर 430 दिन में होता था | लेकिन रेडियो टेलिस्कोप की जांच से पता चला कि चैंडलर वॉबल खत्म हो चुका है | एक आखिरी संभावना ये बनती है कि धरती के अंदर या बाहर कुछ बेहद खास बदलाव न हुआ हो, जो समझ में नहीं आ रहा है | लंबे समय के टाइडल इफेक्ट की वजह से भी पृथ्वी में यह परिवर्तन हो सकता है |

    क्या हमे नेगेटिव लीप सेकंड की जरूरत है ?

    धरती के घूमने की दर (Earth’s rotation rate) की वजह से कई तरह के आधुनिक एप्लीकेशन काम करते हैं. जैसे- जीपीएस, नेविगेशन सिस्टम | यदि धरती का घूमना बदलता है तो इनकी प्रणाली में दिक्कत आना शुरु हो जाएगी | हर कुछ साल पर समय की जानकारी रखने वालों को लीप सेकेंड जोड़ना पड़ेगा ताकि वो धरती की गति के साथ सामंजस्य बिठा सकें |  इस तरह अगर धरती और लंबे दिनों की ओर बढ़ेगी तो हमें निगेटिव लीड सेकेंड जोड़ना पड़ सकता है |

    निगेटिव लीप सेकेंड को अपने समय के साथ जोड़ने को वैज्ञानिक सही नहीं मानते हैं | अगर ऐसा करना पड़ेगा तो पूरी दुनिया के जीपीएस, नेविगेशन सिस्टम को अपना समय एडजस्ट करना होगा |

  • क्‍या हैं एस्‍टरॉयड (उल्कापिंड या क्षुद्रग्रह)?  क्या एस्‍टरॉयड से हो सकती है दुनिया ख़त्म?

    क्‍या हैं एस्‍टरॉयड (उल्कापिंड या क्षुद्रग्रह)?  क्या एस्‍टरॉयड से हो सकती है दुनिया ख़त्म?

    एस्‍टरॉयड (Asteroid) लगातार पृथ्वी के नजदीक से गुजरते रहते है और पृथ्वी लगातार इन एस्‍टरॉयड (Asteroid) का सामना करती रहती है।

    29 और 30 जुलाई को लगातार दो एस्‍टरॉयड पृथ्‍वी के करीब से गुजरे, जिनका साइज म‍ल्‍टीस्‍टोरी बिल्डिंग जितना था। इसके अलावा 4 अगस्त को एक और एस्‍टरॉयड पृथ्‍वी के नजदीक से होकर गया। इसमें एक हजार परमाणु बमों जितनी ताकत थी।

    जब भी कोई एस्‍टरॉयड पृथ्‍वी के करीब से गुजरता है, तो दुनियाभर की स्‍पेस एजेंसियां उसे मॉनिटर करती हैं, क्‍योंकि अंतरिक्ष में तैरती ये चट्टानें पृथ्‍वी को भारी नुकसान पहुंचा सकती हैं, आखिर डायनासोर भी तो एस्‍टरॉयड के पृथ्‍वी पर टकराने से ही खत्‍म हुए थे।

    क्‍या होते हैं एस्‍टरॉयड (Asteroids) ?

    एस्टेरॉयड (Asteroids) को हिन्दी में उल्कापिंड या क्षुद्रग्रह भी कहते हैं। इसे मीटीऑराइट ( meteorite ) भी कहते हैं। एस्टेरॉयड को किसी ग्रह या तारे का टूटा हुआ टुकड़ा माना जाता है। ये पत्थर या धातु के टूकड़े होते हैं जो एक छोटे पत्थर से लेकर एक मील बड़ी चट्टान तक और कभी-कभी तो एवरेस्ट के बराबर तक हो सकते हैं। आकाश में कभी-कभी एक ओर से दूसरी ओर अत्यंत वेग से जाते हुए अथवा पृथ्वी पर गिरते हुए जो पिंड दिखाई देते हैं उन्हें उल्का और साधारण बोलचाल में टूटते हुए तारे‘ अथवा ‘लूका‘ कहते हैं।

    नासा के अनुसार, इन्‍हें लघु ग्रह भी कहा जाता है। जैसे हमारे सौर मंडल के सभी ग्रह सूर्य का चक्‍कर लगाते हैं, उसी तरह एस्‍टरॉयड भी सूर्य की परिक्रमा करते हैं। लगभग 4.6 अरब साल पहले हमारे सौर मंडल के शुरुआती गठन से बचे हुए चट्टानी अवशेष एस्‍टरॉयड हैं । वैज्ञानिक अभी तक 11 लाख 13 हजार 527 एस्‍टरॉयड का पता लगा चुके हैं।  हमारे सौर मंडल में करीब 20 लाख एस्ट्रेरॉयड घूम रहे हैं। NASA के पास पृथ्वी के आसपास 140 मीटर या उससे बड़े करीब 90 प्रतिशत एस्टेरॉयड को ट्रैक की क्षमता है।

    अतीत में इन उल्कापिंडों से कई बार जीवन लगभग समाप्त हो चुका है। एक बार फिर मंडरा रहा है डायनासोर के जमाने का खतरा। अंतरिक्ष में भटक रहा सबसे बड़ा उल्का पिंड ‘2005 वाय-यू 55’ है लेकिन फिलहाल खतरा एस्टेरॉयड एपोफिस से है।

    इस तरह का सबसे पिछला प्रलयंकारी पिंड साढ़े छह करोड़ साल पहले टकराया था। उसने न जाने कितने जीव-जंतुओं की प्रजातियों का पृथ्वी पर से अंत कर दिया। डायनासॉर इस टक्कर से लुप्त होने वाली सबसे प्रसिद्ध प्रजाति हैं। समस्या यह है कि हम नहीं जानते कि कब फिर ऐसा ही हो सकता है।’ वह लघु ग्रह सेनफ्रांसिस्को की खाड़ी जितना बड़ा था और आज के मेक्सिको में गिरा था। इस टक्कर से जो विस्फोट हुआ, वह दस करोड़ मेगाटन टीएनटी के बराबर था। पृथ्वी पर वर्षों तक अंधेरा छाया रहा।

    1994 में एक ऐसी ही घटना घटी थी। पृथ्वी के बराबर के 10-12 उल्का पिंड बृहस्पति ग्रह से टकरा गए थे जहां का नजारा महाप्रलय से कम नहीं था। आज तक उस ग्रह पर उनकी आग और तबाही शांत नहीं हुई है।

    वैज्ञानिक मानते हैं कि यदि बृहस्पति ग्रह के साथ जो हुआ वह भविष्य में कभी पृथ्वी के साथ हुआ तो तबाही तय हैं, लेकिन यह सिर्फ आशंका है। आज वैज्ञानिकों के पास इतने तकनीकी साधन हैं कि इस तरह की किसी भी उल्का पिंड की मिसाइल द्वारा दिशा बदल दी जाएगी। इसके बावजूद फिर भी जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग तबाही का एक कारण बने हुए हैं।

    मंगल और बृहस्‍पति के बीच घूमते हैं ज्‍यादातर एस्‍टरॉयड

    ज्‍यादातर एस्‍टरॉयड एक मुख्‍य एस्‍टरॉयड बेल्‍ट में पाए जाते हैं, जो मंगल और बृहस्‍पति ग्रह के बीच है। इनका साइज 10 मीटर से 530 किलोमीटर तक हो सकता है। अबतक खोजे गए सभी एस्‍टरॉयड का कुल द्रव्‍यमान पृथ्‍वी के चंद्रमा से कम है।

    ज्‍यादातर एस्‍टरॉयड का आकार अनियमित होता है। कुछ लगभग गोलाकार होते हैं, तो कई अंडाकार दिखाई देते हैं। कुछ एस्‍टरॉयड तो ऐसे भी हैं, जिनका अपना चंद्रमा है। कई के दो चंद्रमा भी हैं। वैज्ञानिकों ने डबल और ट्रिपल एस्‍टरॉयड सिस्‍टम की खोज भी की है, जिनमें ये चट्टानों एक-दूसरे के चारों ओर घूमती रहती हैं। 

    एस्‍टरॉयड को तीन वर्गों- सी, एस और एम टाइप में बांटा गया है। सीटाइप (चोंड्राइट Chondrite) एस्‍टरॉयड सबसे आम हैं। ये संभवतः मिट्टी और सिलिकेट चट्टानों से बने होते हैं और दिखने में गहरे रंग के होते हैं। ये सौर मंडल की सबसे पुरानी चीजों में एक हैं। एसटाइप के एस्टरॉयड सिलिकेट मटेरियल और निकललौह से बने होते हैं। वहीं M-Type (एम टाइप) एस्टरॉयड मैटलिक (निकललौह) हैं। इनकी संरचना सूर्य से दूरी पर निर्भर करती है। 

    आज वैज्ञानिकों के पास इतने तकनीकी साधन हैं कि इस तरह की किसी भी उल्का पिंड की मिसाइल द्वारा दिशा बदल दी जाएगी। इसके बावजूद फिर भी जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग तबाही का एक कारण बने हुए हैं |

  • नासा ने खोजी 4 गुना बड़ी ‘पृथ्‍वी’, क्‍या इस ग्रह पर संभव हो पायेगा इंसानी जीवन ?

    नासा ने खोजी 4 गुना बड़ी ‘पृथ्‍वी’, क्‍या इस ग्रह पर संभव हो पायेगा इंसानी जीवन ?

    अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) ने एक नया पृथ्वी जैसा ग्रह खोजा है। यह काफी दूर हमारी आकाशगंगा के बाहरी इलाके में है। ‘रॉस 508 बी’ (ROSS 508 b) नाम के इस नए सुपर अर्थ (Super Earth) ने खगोलविदों की उम्मीदें बढ़ा दी हैं, क्‍योंकि यह अपने लाल बौने तारे के रहने योग्‍य जोन में स्थित है। पृथ्‍वी जैसे इस ग्रह की खोज में सुबारू टेलीस्कोप (Subaru Telescope) ने भूमिका निभाई जिस पर इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोग्राफ का इस्‍तेमाल करते हुए ग्रह को खोजा गया। 

    पृथ्‍वी से बाहर जीवन की मौजूदगी की बात आती है, तो एक्‍सोप्‍लैनेट (Exoplanets) सबसे बड़े संभावित उम्‍मीदवारों के रूप में नजर आते हैं । ऐसे ग्रह जो सूर्य के अलावा अन्य तारों की परिक्रमा करते हैं, एक्सोप्लैनेट कहलाते हैं। वैज्ञानिकों ने ऐसे कई एक्‍सोप्‍लैनेट को अब तक खोजा है, जो पृथ्‍वी की तरह ही चट्टानी हैं। हालांकि विस्‍तृत शोध में वहां जीवन की संभावनाएं नजर नहीं आईं, क्‍योंकि कई ग्रहों का तापमान बहुत अधिक है।

    रॉस 508 बी‘ (ROSS 508 b) को पृथ्‍वी से भी बड़ी संभावित चट्टानी दुनिया माना जा रहा है, लेकिन यह अपने रहने योग्‍य जोन से मूव कर रहा है। इसके बावजूद उम्‍मीदें बरकरार हैं, क्‍योंकि यह ग्रह अपनी सतह पर पानी को बनाए रखता है, जिससे जीवन की संभावना को बल मिलता है। नासा ने बताया है कि ‘रॉस 508 बी (ROSS 508 b)‘ एक सुपर अर्थ एक्सोप्लैनेट है। यह M-टाइप तारे की परिक्रमा करता है, जो पृथ्वी से लगभग 37 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है। इस ग्रह का द्रव्यमान 4 पृथ्‍वी के बराबर है और ग्रह को अपने तारे की एक परिक्रमा करने में 10.8 दिन लगते हैं।

    कैसे खोजते है ऐसे ग्रहों को वैज्ञानिक

    सवाल उठता है कि आखिर वैज्ञानिक उन ग्रहों को कैसे ढूंढते हैं, जो रहने लायक हो सकते हैं। इसका जवाब हैं गोल्डीलॉक्स जोन (Goldilocks Zone) या वासयोग्य क्षेत्र (Habitable Zone) ।

    ये ऐसे जोन होते हैं जिनसे होकर गुजरने वाले ग्रहों में जीवन की संभावना हो सकती है। नासा ने कहा है कि यह ऐसा ग्रह है, जो अपनी सतह पर पानी बनाए रखने में सक्षम हो सकता है और भविष्य में M क्‍लास वाले बौने तारों के आसपास जीवन की संभावना का अध्ययन करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।

    हाल में एक अध्ययन से पता चला है कि विभिन्‍न परिस्थितियों में भी कई अरबों वर्षों तक लिक्विड वॉटर, एक्सोप्लैनेट की सतह पर मौजूद रह सकता है। पृथ्वी की तरह जीवन दे सकने वाले एक्सोप्लैनेट की खोज में लिक्विड वॉटर यानी पानी की भूमिका महत्‍वपूर्ण है। बर्न यूनिवर्सिटी, ज्यूरिख यूनिवर्सिटी और नेशनल सेंटर ऑफ कॉम्पीटेंस इन रिसर्च (NCCR) के रिसर्चर्स ने समझाया है कि रहने योग्य एक्सोप्लैनेट की खोज के लिए इस दृष्टिकोण की बेहद जरूरत है।

  • गुरुत्व का नया सिद्धांत जो सुलझा सकता है डार्क मैटर का रहस्य

    गुरुत्व का नया सिद्धांत जो सुलझा सकता है डार्क मैटर का रहस्य

    गुरुत्व के नए सिद्धांत (New Gravity Theory) के बारे में दावा किया गया है कि इसके जरिए खगोलीय परिघटनाओं की पूरी व्याख्या की जा सकती है और डार्क मैटर (Dark Matter) जैसे किसी अदृश्य पदार्थ के अस्तित्व की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. मिलग्रोमैन गतिकी (Milgromian Dynamics) नाम का यह सिद्धांत गैलेक्सी के घूर्णन की व्याख्या के साथ उसका पूर्वानुमान तक लगा सकता है जिसके लिए अभी तक वैज्ञानिक डार्क मैटर को जिम्मेदार बता रहे थे |

    पिछले कुछ दशकों से विज्ञान जगत में डार्क मैटर (Dark Matter) की खूब चर्चा रही है | अभी तक इसके अस्तित्व सिद्ध किए बिना ही कई परिघटनाओं की व्याख्या में इसका उपयोग हुआ है | डार्क मैटर के बारे में बताया जाता है कि यह अदृश्य पदार्थ प्रकाश से तो अप्रभावित होता है, लेकिन गुरुत्व से नहीं | नई समीक्षा में वैज्ञानिकों ने सुझाया है कि विभिन्न पैमानों पर किए गए व्यापक अवलोकन बताते हैं कि गुरुत्व का एक वैकल्पिक सिद्धांत (New Gravity Theory), जिसे मिलग्रोमैन गतिकी (Milgromian dynamics) या मोंड भी कहते है, सभी परिघटनाओं की व्याख्या कर सकता है जिसके लिए डार्क मैटर जैसे अदृश्य की जरूरत ही नहीं होगी |

    डार्क मैटर की अवधारणा

    न्यूटन के भौतिकी के नियम सौरमडंल के ग्रहों की चाल तो सटीकता से बता पाते हैं, लेकिन  1970 के दशक में वैज्ञानिकों ने पाया कि ऐसा गैलेक्सी की चक्रिका (Galaxy Discs) के साथ नहीं हो रहा है | बाहरी किनारे पर तारों की घूमने की गति न्यूटन के सिद्धांत के द्वारा बताई गई गति से कहीं ज्यादा थी | यहीं से डार्क मैटर की अवधारणा आई जिसे उस अतिरिक्त गुरुत्व खिंचाव के लिए जिम्मेदार माना गया जो तारों को गति प्रदान कर रहा था |

    गुरुत्व और डार्क मैटर

    गुरुत्व का यह नया सिद्धांत 40 साल पहले इजराइली भौतिकविद मोर्डेहाई मिलग्रोम ने दिया था | बताया जा रहा है कि यह सिद्धांत डार्क मैटर की आवश्यकता को खत्म कर देगा | मोंड सिद्धांत में मूलतः बताया गया है कि जब गुरुत्व बहुत ही कमजोर हो जाती है, जैसा की गैलेक्सी के किनारों पर होता है, तब वह न्यूटन की भौतिकी से अलग बर्ताव करने लगती है | इस तरह से इसकी व्याख्या करना संभव हो सकेगा कि 150 गैलेक्सी के किनारों पर तारे, ग्रह और गैस आदि तेजी से क्यों घूमते हैं |

    मानक प्रतिमान से बेहतर?

    इससे भी खास बात यह है कि मोंड केवल घूर्णन वक्र की ही व्याख्या नहीं करता है,  बल्कि इससे कई मामलों में सही पूर्वानुमान भी लगाया जा सकता है  विज्ञान के दार्शनिकों का कहना है कि मोंड की पूर्वानुमान लगाने की यह क्षमता उसे मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान (standard cosmological model) से ऊपर उठा देता है जिसके अनुसार ब्रह्माण्ड में दिखाई देने वाला यानि सामान्य पदार्थ की तुलना में डार्कमैटर ज्यादा है | इस प्रतिमान के अनुसार गैलेक्सी में अनिश्चित लेकिन बहुत ही ज्यादा पदार्थ होता है. जिससे गैलेक्सी के घूर्णन की व्याख्या नहीं हो सकती है |

    मोंड के सटीक पूर्वानुमान

    गैलेक्सी के किनारे के पिडों की घूमने की गति की व्याख्या के ना होने की जिम्मेदार डार्क मैटर को ही बताया जाता रहा है |  लेकिन मोंड के अभी तक के पूर्वानुमानों की पुष्टि तक होती रही है | जहां सामान्य पदार्थ के वितरण के आधार पर गैलेक्सी के किनारों के घूर्णन की गति 100 और 300  किलोमीटर प्रतिघंटा का अनुमान लगा पता है, मोंड इसे 180-190 किलोमीटर प्रतिघंटा की गति बताता है और बाद में अवलोकन करने में पता चलता है कि वास्तविक घूर्णन की गति 188 किलोमीटर प्रतिघंटा है, तो साफ है कि ऐसे में मोंड सिद्धांत को ही प्राथमिकता दी जाएगी |

    मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान की कमजोरी

    मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान की सबसे बड़ी नाकामी गैलेक्सी बार से संबंधित है जो तारों का बनाया छड़ के आकार के इलाके होते हैं | ये इलाके सर्पिल गैलेक्सी के केंद्रीय इलाके में पाए जाते हैं | यह छड़ समय के साथ घूर्णन करती है.  यदि गैलेक्सी में विशालकाय भार डार्क मैटर मौजूद है तो उनके बार या छड़ों की गति धीमी हो जानी चाहिए, लेकिन बहुत सी गैलेक्सी के अवलोकनों में पाया गया है कि ये छड़े बहुत तेज हैं | इससे मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान पर विश्वास काफी कम हो जाता है | डार्क मैटर (Dark Matter) की गैलेक्सी में उपस्थिति कई परिघटनाओं की सही व्याख्या नहीं कर पाती है |

    डार्क मैटर का गुरुत्व का प्रभाव

    डार्क मैटर का गुरुत्व का प्रभाव तो होता है, लेकिन वे समान्य पदार्थ के गुरुत्व से प्रभावित नहीं होते हैं | इससे गणना में तो आसानी होती है, लेकिन यह वास्तविकताओं से मेल नहीं खाती है | जब इसे बाद में सिम्यूलेशन के लिए उपयोग में लाया गया तो भी विशेषताओं की सही व्याख्या नहीं हुई. इसके अलावा मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान में कई और भी खामियां पाई गई हैं |

    लेकिन कनवरसेशन में प्रकाशित लेख में वैज्ञानिकों ने मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान और मोंड के खगोलीय अवलोकनों के परिपेक्ष्य में परीक्षण के लिए ओकाम के रेजर की अवधारणा का उपयोग किया | जिसके मुताबिक मानदंडों से मुक्त एक सिद्धांत ज्यादा आकड़ों से संगत होता है जिससे वह और जटिल हो जाता है | इसकी व्याख्या लिए उन्होंने सैद्धांतिक लचीलेपन की भी अवधारणा दी | बहराल मोंड का सिद्धांत अवलोकनों से मेल खाता हुआ संगत दिखाई देता है लेकिन अभी डार्कमैटर या मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान को खारिज करना शायद जल्दबाजी हो |

  • चीनी रिसर्चर्स जानबूझकर करेगे अंतरिक्ष यान को एस्‍टरॉयड के साथ दुर्घटनाग्रस्त

    चीनी रिसर्चर्स जानबूझकर करेगे अंतरिक्ष यान को एस्‍टरॉयड के साथ दुर्घटनाग्रस्त

    एस्‍टरॉयड्स (asteroids) का पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने के लिए चीनी रिसर्चर्स एक नई मेथड पर काम कर रहे हैं। इस मेथड के तहत 20 से ज्‍यादा बड़े एंटीना को मिलाकर एक सारणी (Array) बनाई जा रही है, ताकि एस्‍टरॉयड्स से सिग्‍नलों को बाउंस किया जा सके। प्रोजेक्‍ट का नाम चाइना फुयान अंग्रेजी में – कंपाउंड आई है, जिसे बीजिंग इंस्टि‍ट्यूट ऑफ टेक्‍नॉलजी लीड कर रहा है। इस मेथड को सितम्बर 2022 में टेस्‍ट किया जाना है l

    इसके अलावा, अप्रैल में ग्‍लोबल टाइम्‍स ने बताया था कि देश की अंतरिक्ष एजेंसी एक नया मॉनिटरिंग और डिफेंस सिस्‍टम विकसित कर रही है। इसकी टेस्टिंग जानबूझकर एक अंतरिक्ष यान को एस्‍टरॉयड के साथ दुर्घटनाग्रस्त करके की जाएगी। रिपोर्टों में आगे कहा गया है कि नया मिशन 2025 की शुरुआत में एक खतरनाक एस्‍टरॉयड की कक्षा बदलने और उस पर अटैक करने के लिए लॉन्‍च किया जाएगा।

    चीनी रिसर्चर्स के एस्‍टरॉयड्स (asteroids)  पर किये गये इस मेथड से यह जाननें में मदद मिलेगी कि स्‍पेस रॉक का कोई विशाल टुकड़ा पृथ्वी के लिए खतरा तो नहीं है। इस मेथड के तहत 20 से ज्‍यादा बड़े एंटीना को मिलाकर एक सारणी (array) बनाई जा रही है, ताकि एस्‍टरॉयड्स से सिग्‍नलों को बाउंस किया जा सके और निर्धारित किया जा सके कि वे हमारे ग्रह को प्रभावित कर सकते हैं या नहीं। इस प्रोजेक्‍ट में कुछ चीनी विश्वविद्यालय शामिल हैं। इसके बारे में सबसे पहले डिटेल चीन के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के ऑफ‍िशियल न्‍यूज पेपर- साइंस एंड टेक्‍नॉलजी डेली में पब्लिश हुई थी। 

    चीन के मंत्रालय के अनुसार, इस प्रोजेक्‍ट का नाम चाइना फुयान अंग्रेजी में – कंपाउंड आई है और इस प्रोजेक्‍ट को बीजिंग इंस्टि‍ट्यूट ऑफ टेक्‍नॉलजी लीड कर रहा है। सिग्नल बाउंसिंग के लिए चुने गए एस्‍टरॉयड पृथ्वी से 93 मिलियन मील (150 मिलियन किलोमीटर) की दूरी पर मौजूद रहेंगे। 

    स्‍पेसडॉटकॉम की रिपोर्ट के अनुसार, प्रोजेक्‍ट के तहत दो एंटीना दक्षिणी चीन के चोंगकिंग में एक साइट पर बनाए गए हैं इस एंटीना का व्‍यास 82 से 98 फीट होगा।  । सितंबर में इन्‍हें टेस्‍ट किया जाएगा। टेस्टिंग अगर सफल रहती है, तो उसके बाद इन्‍हें शुरू कर दिया जाएगा।

    बीजिंग इंस्टि‍ट्यूट ऑफ टेक्‍नॉलजी के प्रेसिडेंट लॉन्ग टेंग ने ग्लोबल टाइम्स को बताया कि यह प्रोजेक्‍ट देश की उन जरूरतों को पूरा करेगा, जिनमें पृथ्‍वी के नजदीकी इलाके की सुरक्षा और एस्‍टरॉयड के निर्माण से जुड़े शोध शामिल हैं। रिसर्चर ने कहा कि यह सिस्‍टम को पृथ्वी की कक्षा में उपग्रहों और मलबे को ट्रैक करने के लिए भी लागू किया जा सकता है।