Tag: Sun

  • इसरो का आदित्य-एल1 (Aditya L1 Mission) मिशन (सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में)

    इसरो का आदित्य-एल1 (Aditya L1 Mission) मिशन (सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में)

    इसरो का Aditya L1 Mission (आदित्य-एल1 मिशन (संस्कृत से : आदित्य, “सूर्य”) सूर्य के अवलोकन के लिए समर्पित पहला भारतीय मिशन है जो इसरो द्वारा 2 सितंबर 2023 को लांच किया गया, साथ ही इसरो द्वारा स्थापित पहली सोलर ऑब्जर्वेटरी भी है जिसके जरिए सूर्य का अध्ययन किया जाएगा ।

    Aditya L1 मिशन की लांचिंग और प्रमुख चरण (Launch and key phases of Aditya L1 mission)

    2 सितंबर 2023 को 11:50 IST पर पीएसएलवी सी57 पर आदित्य-एल1 लॉन्च किया गया | इसरो के चंद्रमा मिशन की सफल लैंडिंग के दस दिन बाद  ही Aditya L1 ने सफलतापूर्वक अपनी इच्छित कक्षा हासिल कर ली और 12:57 IST पर अपने चौथे चरण से अलग हो गया । निगार शाजी इस महत्वकांशी परियोजना की निदेशक हैं।

    योजना के अनुसार, प्रक्षेपण के लगभग 63 मिनट बाद पीएसएलवी द्वारा आदित्य-एल1 को निचली-पृथ्वी की कक्षा में तैनात किया गया। प्रक्षेपण के बाद एल1 तक की यात्रा में लगभग 110 दिन लगने का अनुमान है, इस दौरान अंतरिक्ष यान को इस गुरुत्वाकर्षण स्थिर बिंदु तक पहुंचने के लिए आवश्यक वेग देने के लिए पांच और manoeuvre दिए जाएंगे। इनमे से दो manoeuvre पुरे हो चुके है |

    आदित्य-एल1 अंतरिक्ष यान सूर्य का अध्ययन करने के लिए अपने साथ कुल सात उपकरण लेकर गया है, जिनमें से चार सूर्य से प्रकाश का निरीक्षण करेंगे, बचे हुए तीन उपकरण प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्र के यथास्थान मापदंडों को मापेंगे | इस अंतरिक्ष यान को लैग्रेंजियन बिंदु 1 (एल1) पर एक प्रभामंडल कक्षा में स्थापित किया जाएगा, जो सूर्य की दिशा में पृथ्वी से 15 लाख किमी दूर है| यह सूर्य के चारों ओर समान सापेक्ष स्थिति में चक्कर लगाएगा. इस कारण लगातार सूर्य पर नजर रख सकता है |

    L1 पर पहुंचने पर, आदित्य-L1 स्थान के चारों ओर एक कक्षा में खुद को “बांधने” के लिए एक और चाल को अंजाम देगा। इसरो के अनुसार, प्रक्षेपण के लगभग 127 दिन बाद स्थापित कक्षा अनियमित आकार की होगी और सूर्य और पृथ्वी को जोड़ने वाली रेखा के लगभग लंबवत (perpendicular to a line joining the sun and Earth) में होगी।

    Aditya L1 मिशन के पीछे की कहानी (The story behind Aditya L1 mission)

    आदित्य-एल1 का सफल प्रक्षेपण 15 वर्षों से अधिक की योजना का परिणाम है | मिशन की शुरुआत जनवरी 2008 में अंतरिक्ष विज्ञान सलाहकार समिति (एडीसीओएस) (Advisory Committee for Space Sciences (ADCOS)) की एक अवधारणा के रूप में हुई थी, एक छोटे 400 किलोग्राम (880 पाउंड) उपग्रह के रूप में जो पृथ्वी की low-Earth orbit कक्षा में रहेगा। रणनीति बनाने के डेढ़ दशक में इस मिशन का पैमाना काफी बढ़ गया और इस वृद्धि को प्रतिबिंबित करने के लिए जुलाई 2019 में इसे एक नया नाम  —  “आदित्य-एल1”  —  दिया गया।

    क्या करेगा Aditya L1 मिशन ? What will Aditya L1 mission do?

    आदित्य-एल1 पृथ्वी से लगभग 1.5 मिलियन किमी की दूरी पर पृथ्वी और सूर्य के बीच एल1 लैग्रेंज बिंदु (Lagrange point 1 ) के चारों ओर एक प्रभामंडल (Earth-sun system) कक्षा में परिक्रमा करेगा जहां यह सौर वायुमंडल, सौर चुंबकीय तूफान और पृथ्वी के चारों ओर के वातावरण पर उनके प्रभाव का अध्ययन करेगा।

    आदित्य एल-1 सूर्य के वायुमंडल, सूर्य के परते (layers) जैसे फोटोस्फेयर (photosphere – प्रकाशमंडल), क्रोमोस्फेयर (chromosphere) और सबसे बाहरी लेयर कोरोना ( the corona) की अलग-अलग कलर बैंड में स्टडी करेगा। इसरो का कहना है कि आदित्य ए-1 पेलोड के सूट कोरोनल हीटिंग, कोरोनल मास इजेक्शन, प्री-फ्लेयर और फ्लेयर गतिविधियों और उनकी विशेषताओं, अंतरिक्ष मौसम की गतिशीलता, कण और मैग्नेटिक फील्ड से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी इकट्ठा करेगा।

    आदित्य-एल1 अंतरिक्ष यान सूर्य के करीब नहीं आएगा, पृथ्वी से लगभग 1.5 मिलियन किमी की दुरी से ही यह सूर्य का अध्ययन करेगा | यह दुरी पृथ्वी और सूर्य के बीच के कुल स्थान का लगभग 1% है | इसरो के अनुसार, L1 पर प्लेसमेंट अंतरिक्ष यान को सूर्य का दृश्य देखने की अनुमति देगा जो ग्रहण (eclipses) या प्रच्छाया (occultations) से निर्बाध है।

    क्या सूर्य का अध्ययन पृथ्वी से संभव है ? Is it possible to study the Sun from Earth?

    धरती पर वायुमंडल है जो सूर्य से आने वाली ज्यादातक खतरनाक रेडिएशन को अवशोषित कर लेता है। इसलिए धरती से सूर्य का अध्ययन सही से नहीं किया जा सकता। सूर्य की स्टडी के लिए स्पेस में जाना जरूरी है और इसी कारण कई देश पहले भी अपने सोलर स्पेसक्राफ्ट लॉन्च कर चुके हैं। अमेरिका, जापान, चीन और यूरोपीय यूनियन की स्पेस एजेंसियां सूर्य की स्टडी कर रही हैं। नासा ने 2018 में पार्कर सोलर प्रोब लॉन्च किया था।

    चीन और भारत के सूर्य के अध्ययन से जुड़े सैटेलाइट में अन्तर

    हाल ही चीन ने भी सूर्य के अध्ययन से जुड़ा एक सैटेलाइट लॉन्च किया। चीन ने 8 अक्टूबर 2022 को नेशनल स्पेस साइंस सेंटर से एडवांस स्पेस बेस्ड सोलर ऑब्जर्वेटरी (ASO-S) या कुआफू-1 लॉन्च किया था। आदित्य L-1 से अगर इसकी तुलना करें तो सबसे बड़ा अंतर इसकी पृथ्वी से ऊंचाई है। ASO-S जहां धरती से 720 किमी की ऊंचाई पर है तो वहीं आदित्य L-1 की दूरी धरती से लगभग 15 लाख किमी होगी। चीन का ASO-S 859 किग्रा है। वहीं भारत का आदित्य L1 का वजन 400 किग्रा है। आदित्य एल-1 और ASO-S की धरती से दूरी सबसे खास है। क्योंकि चीन का स्पेसक्राफ्ट धरती के ऑर्बिट में है, लेकिन इसरो का आदित्य इससे बिल्कुल बाहर होगा। यानी जो चीन ने नहीं किया वह भारत करेगा।

    चीन का ASO-S दुनिया का पहला स्पेसक्राफ्ट रहा है जो सोलर फ्लेयर और कोरोनल मास इजेक्शन की एक साथ स्टडी करने में सक्षम है। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह सैटेलाइट सूर्य की मैग्नोटिक फील्ड, सोलर फ्लेयर और कोरोनल मास इजेक्शन से जुड़ा 500 जीबी का डेटा रोज धरती पर भेजता है। वहीं सूर्य में बड़ी हलचल होने पर यह हर सेकंड तस्वीर भेजता है। वहीं, आदित्य एल-1 सोलर कोरोना की स्टडी करेगा। इसके अलावा आदित्य L-1 एक्स-रे के जरिए स्टडी करेगा।

    आदित्य-एल1 मिशन के प्रमुख वैज्ञानिक उद्देश्य (Major scientific objectives of Aditya-L1 mission)

    • सौर ऊपरी वायुमंडलीय (क्रोमोस्फीयर और कोरोना) गतिशीलता का अध्ययन।
    • क्रोमोस्फेरिक और कोरोनल हीटिंग का अध्ययन, आंशिक रूप से आयनित प्लाज्मा की भौतिकी, कोरोनल द्रव्यमान इजेक्शन की शुरुआत, और फ्लेयर्स
    • सूर्य से कण गतिशीलता के अध्ययन के लिए डेटा प्रदान करने वाले इन-सीटू कण और प्लाज्मा वातावरण का निरीक्षण करें।
    • सौर कोरोना का भौतिकी और इसका तापन तंत्र।
    • कोरोनल और कोरोनल लूप प्लाज्मा का निदान: तापमान, वेग और घनत्व।
    • सीएमई का विकास, गतिशीलता और उत्पत्ति।
    • कई परतों (क्रोमोस्फीयर, बेस और विस्तारित कोरोना) पर होने वाली प्रक्रियाओं के अनुक्रम की पहचान करें जो अंततः सौर विस्फोट की घटनाओं की ओर ले जाती हैं।
    • सौर कोरोना में चुंबकीय क्षेत्र टोपोलॉजी और चुंबकीय क्षेत्र माप।
    • अंतरिक्ष मौसम के लिए ड्राइवर (सौर हवा की उत्पत्ति, संरचना और गतिशीलता)।

    आदित्य-एल1 पेलोड

    आदित्य-एल1 के उपकरणों को सौर वातावरण मुख्य रूप से क्रोमोस्फीयर और कोरोना का निरीक्षण करने के लिए ट्यून किया गया है। इन-सीटू उपकरण एल1 पर स्थानीय वातावरण का निरीक्षण करेंगे। जहाज पर कुल सात पेलोड हैं जिनमें से चार सूर्य की रिमोट सेंसिंग करते हैं और तीन इन-सीटू अवलोकन करते हैं।

    वैज्ञानिक जांच की उनकी प्रमुख क्षमता के साथ पेलोड।

    Photo courtesy – ISRO (https://www.isro.gov.in/Aditya_L1.html
  • क्या पृथ्वी पर बढ़ रही है एक दिन की लंबाई ? कारण और परिणाम

    क्या पृथ्वी पर बढ़ रही है एक दिन की लंबाई ? कारण और परिणाम

    पृथ्वी (Earth) पर दिन रहस्यमयी तरीके से लंबा हो रहा है यानी धरती के दिन का समय बढ़ रहा है और वैज्ञानिकों को यह रहस्यमय लग रहा है क्योकीं वैज्ञानिक इसके पीछे जुड़े कारण पर अभी तक नही पहुच पा रहे है |

    दुनिया भर के एटॉमिक क्लॉक्स ने गणना करके यह बताया है कि पृथ्वी के दिन का समय रहस्यमयी तरीके से बढ़ रहा है इससे न सिर्फ हमारे समय की कैलकुलेशन पर असर पड़ेगा, बल्कि जीपीएस, नेविगेशन और संचार संबंधी कई अन्य तकनीकों में भी समस्या आएगी |

    धरती के दिन की गणना उसकी धुरी पर लगने वाले चक्कर से होती आई है लेकिन धरती के अपनी धुरी पर घूमने की गति लगातार बढ़ रही है | पिछले कुछ दशकों से हमारे दिन की लंबाई छोटी हो रही थी | जून 2022 में सबसे छोटे दिन का रिकॉर्ड भी दर्ज किया गया यानी पिछली आधी सदी में यह सबसे छोटा दिन था लेकिन साल 2020 के बाद और इस रिकॉर्ड के गठन के बाद अब धरती ने गति धीमी हो रही है और दिन लंबे हो रहे हैं जिसकी वजह वैज्ञानिकों को पता नहीं है |

    सामान्य फोन या घड़ी में तो 24 घंटे का सटीक समय दिखा रहे है लेकिन पृथ्वी के 24 घंटे में लगने वाला चक्कर अब कुछ समय ज्यादा ले रहा है | आमतौर पर यह बदलाव करोड़ों सालों में होता है | हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे की वजह धरती पर आने वाले भूकंप (Earthquake) और तूफान (Storm) भी हो सकते हैं |

    पिछले कई करोड़ वर्षों से धरती के घूमने की गति धीमी हो रही है और इसके पीछे चंद्रमा से निकलने वाले टाइड्स का घर्षण है | हर एक सदी में 2.3 मिलिसेकेंड धरती के दिन के समय में जुड़ रहा है |

    कुछ करोड़ साल पहले धरती का दिन सिर्फ 19 घंटे का होता था लेकिन पिछले 20 हजार सालों से दूसरी प्रक्रिया शुरू हो गई जो कि विपरीत दिशा में है इस वजह से धरती की गति बढ़ने लगी | यह प्रक्रिया तब शुरू हुई जब जब Ice Age  में ध्रुवीय बर्फ के पिघलने से सरफेस प्रेशर कम हो रहा था और धरती का मैंटल धीरे-धीरे ध्रुवों की तरफ खिसक रहा था |

    इसे एक उदाहरण से समझते है जैसे कोई बैले डांसर अपने घूमने की गति बढ़ाने के लिए अपने हाथों को अपने शरीर के करीब रख लेती है ताकि वह अपनी धुरी यानी पैर पर तेजी से गोल घूम सके | इसी तरह हमारी पृथ्वी के घूमने की गति तब बढ़ जाती है, जब उसका मैंटल धुरी के नजदीक पहुंचता है इसकी वजह से धरती का हर दिन 0.6 मिलिसेकेंड्स कम हो जाता है| धरती के एक दिन में 86,400 सेकेंड्स होते हैं |

    पिछले कई दशकों से धरती की आंतरिक संरचना और सतह के बीच एक संबंध बना हुआ है | अगर बड़े भूकंप आते हैं तो ये धरती के दिन की लंबाई को बदल देते हैं  भले ही अंतर कम समय का हो | जैसे साल 2011 में जापान में आए 8.9 तीव्रता के भूकंप ने धरती की घूमने की गति को 1.8 मिलिसेकेंड बढ़ा दिया था | इसके अलावा कई ऐसी छोटी घटनाएं होती रहती हैं, जो धरती के दिन के समय को बदलते हैं. जैसे- जलवायु परिवर्तन, मौसमों में बदलाव आदि | ये धरती के घूमने की गति को हर दिशा से प्रभावित करती हैं |

    हर 15 दिन पर या महीने में टाइडल साइकिल (fortnightly and monthly tidal cycles) यानी लहरों की गति भारी मात्रा में ग्रह के चारों तरफ मूवमेंट करती हैं | इनकी वजह से भी पृथ्वी के दिन का समय कम या ज्यादा होता है | समुद्र की लहरों की वजह से होने वाला बदलाव आमतौर पर 18.6 वर्षों में एक बार होता है | वायुमंडल के मूवमेंट का सबसे ज्यादा असर धरती की गति पर पड़ता है | इसके अलावा बर्फबारी, बारिश, जमीन से पानी निकालना ये चीजें भी धरती की गति पर असर डालती हैं |

    पृथ्वी अचानक धीमी क्यों हो रही है?

    वर्ष 1960 से अब तक धरती पर मौजूद रेडियो टेलिस्कोप्स ग्रहों के चारों तरफ मौजूद क्वासार (Quasars) और अन्य अंतरिक्षीय वस्तुओं की गणना से धरती के घूमने की गति का पता लगाते आ रहे हैं | इन रेडियो टेलिस्कोप और एटॉमिक घड़ी के आंकड़ों से पता चला है कि पिछले कुछ सालों से धरती के दिन का समय कुछ कम हो रहा था | लेकिन रोटेशन में इतना बदलाव आता है कि वैज्ञानिक कई बार धोखा खा जाते हैं |

    29 जून 2022 को सबसे छोटा दिन होने के बावजूद साल 2020 के बाद धरती के घूमने की ट्रैजेक्टरी (trajectory) में समय बढ़ा है | यह बदलाव पिछले 50 सालों में कभी नहीं देखा गया था | अभी तक इस बदलाव की सही और सटीक वजह पता नहीं चल पाई है | ये बदलाव मौसम के परिवर्तन की वजह से हो सकते है या फिर ला नीना इवेंट्स (La Niña events की वजह से | बर्फ के लगातार पिघलने की वजह से यह प्रक्रिया और बढ़ सकती है |

    वर्तमान समय के बदलाव को लेकर पहले चैंडलर वॉबल (Chandler Wobble) को वजह बताया जा रहा था | यह हर 430 दिन में होता था | लेकिन रेडियो टेलिस्कोप की जांच से पता चला कि चैंडलर वॉबल खत्म हो चुका है | एक आखिरी संभावना ये बनती है कि धरती के अंदर या बाहर कुछ बेहद खास बदलाव न हुआ हो, जो समझ में नहीं आ रहा है | लंबे समय के टाइडल इफेक्ट की वजह से भी पृथ्वी में यह परिवर्तन हो सकता है |

    क्या हमे नेगेटिव लीप सेकंड की जरूरत है ?

    धरती के घूमने की दर (Earth’s rotation rate) की वजह से कई तरह के आधुनिक एप्लीकेशन काम करते हैं. जैसे- जीपीएस, नेविगेशन सिस्टम | यदि धरती का घूमना बदलता है तो इनकी प्रणाली में दिक्कत आना शुरु हो जाएगी | हर कुछ साल पर समय की जानकारी रखने वालों को लीप सेकेंड जोड़ना पड़ेगा ताकि वो धरती की गति के साथ सामंजस्य बिठा सकें |  इस तरह अगर धरती और लंबे दिनों की ओर बढ़ेगी तो हमें निगेटिव लीड सेकेंड जोड़ना पड़ सकता है |

    निगेटिव लीप सेकेंड को अपने समय के साथ जोड़ने को वैज्ञानिक सही नहीं मानते हैं | अगर ऐसा करना पड़ेगा तो पूरी दुनिया के जीपीएस, नेविगेशन सिस्टम को अपना समय एडजस्ट करना होगा |

  • रेडिएशन को रोकने के लिय पृथ्वी और सूरज के बीच बुलबुला (Space Bubbles) बनाने की तैयारी में वैज्ञानिक

    रेडिएशन को रोकने के लिय पृथ्वी और सूरज के बीच बुलबुला (Space Bubbles) बनाने की तैयारी में वैज्ञानिक

    पृथ्वी लगातार जलवायु परिवर्तन, भयानक सूखा, तूफान, हीट वेव और ग्लेशियर की वजह से समुद्री जलस्तर बढ़ने जैसे विनाश को झेल रही है और इस विनाश को रोकने के लिए एमआईटी के वैज्ञानिकों ने सूर्य और पृथ्वी के बीच ‘स्पेस बबल्स‘ बनाने का प्रस्ताव दिया है। शोधकर्ताओं की कोशिश है कि, सूरज और पृथ्वी के बीच एक विशालकाय बुलबुले (Space Bubbles) का निर्माण किया जाए, ताकि सूरज से धरती की तरफ आने वाली भयानक रेडिएशन को धरती पर पहुंचने से रोका जा सके।

    ब्राजील के आकार का बुलबुला

    वैज्ञानिकों की इस इस जियोइंजीनियरिंग के विचार के मुताबिक, ब्राजील के आकार के एक गोलाकार बुलबुले, जिसे वैज्ञानिक भाषा में इन्फ्लेटेबल बुलबुला (Inflatable Bubbles) कहा जाता है, उसका निर्माण पृथ्वी और सूर्य के बीच किया जाएगा, ताकि रेडिएशन को हमारे ग्रह से टकराने से रोका जा सकेगा। वैज्ञानिकों की टीम ने एक प्रेस रिलीज में कहा है कि, ‘हम सूरज और पृथ्वी के बीच स्पेस बबल का निर्माण करना चाहते हैं, जिसे लिक्विड सिलिकॉन (Liquid Silicon) से बनाया जाएगा और उसे विशालकाय बुलबुला बनाकर सूरज और पृथ्वी के बीच अंतरिक्ष में स्थापित कर दिया जाएगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि, ऐसा करने से सूरज से आने वाली रेडिएशन की किरणें परावर्तित हो जाएंगी और हमें अंतरिक्ष में बड़ी बड़ी फिल्म लांच करने की भी जरूरत नहीं होगी।

    क्या जलवायु परिवर्तन से निपट पायेगा यह बुलबुला  

    वैज्ञानिकों का मानना है कि, सूरज से आने वाले रेडिएशन को इस स्पेस बुलबुले के जरिए पूरी तरह से नहीं रोका जा सकता है, हां उसे रेडिएशन को कम जरूर किया जा सकता है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है, कि ये जलवायु परिवर्तन से निपटने के मौजूदा प्रयासों को रिप्लेस कर देगा। हालांकि, शोधकर्ताओं का मानना है कि, जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जो भी मौजूदा उपाए किए जा रहे हैं, उनमें से ये सबसे ज्यादा बेहतर है।

    सूरज और पृथ्वी के बीच सिलिकॉन से छाता

    अंतरिक्ष में किया गया टेस्ट शोधकर्ताओं का कहना है कि, ये एक तरह से सूरज और पृथ्वी के बीच सिलिकॉन से छाता बनाने जैसा है, जो रेडिएशन को बहुत हद तक रोक सकेगा। वहीं, एमआईटी की सेंसेबल सिटी लैब के मुताबिक, अंतरिक्ष में पृथ्वी और सूरज के बीच बुलबुले का टेस्ट किया जा चुका है और एमआईटी के वैज्ञानिकों का मानना है कि, आने वाले दिनों में सूरज के रेडिएशन को रोकने के लिए अंतरिक्ष बुलबुलों का इस्तेमाल किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि, अंतरिक्ष में किया जाने वाला ये उपाए आने वाले दिनों में काफी सुरक्षित होंगे। वैज्ञानिकों का कहना है कि, अगर हम धरती पर टकराने से पहले 1.8 प्रतिशत सौर रेडिएशन को परावर्तित कर देते हैं, तो हम आज की ग्लोबल वार्मिंग को पूरी तरह से उलट सकते हैं।

    बुलबुलों को कभी भी किया जा सकता है खत्म

    एमआईटी वैज्ञानिकों की तरफ से जारी प्रेस रिलीज में कहा गया है कि, अंतरिक्ष में पृथ्वी और सूरज के बीच जिस बुलबुले का निर्माण किया जाएगा, उसे कभी भी नष्ट किया जा सकता है। इससे सौर जियोइंजीनियरिंग समाधान पूरी तरह से प्रतिवर्ती हो जाएगा और अंतरिक्ष मलबे को काफी कम कर देगा।’ वैज्ञानिकों ने कहा कि, पृथ्वी और सूर्य के बीच का वो क्षेत्र, जहां जेम्स वेब टेलीस्कॉप स्थिति है, वहां पर अंतरिक्ष बुलबुले को रखा जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि, सूरज से निकलने वाले रेडिएशन को परावर्तित करने के लिए वो सबसे सही स्थान है।

    जेम्स अर्ली के विचारों पर आधारित है प्रयोग

    स्पेस बबल्स रिसर्च प्रोजेक्ट वैज्ञानिक जेम्स अर्ली के विचारों पर आधारित है, जिन्होंने पहले लैग्रैंगियन पॉइंट (Lagrange Point) पर एक डिफ्लेक्टिव ऑब्जेक्ट को तैनात करने का सुझाव दिया था, और खगोलविद रोजर एंजेल, जिन्होंने बबल-बेड़ा का प्रस्ताव रखा था। हालांकि जियोइंजीनियरिंग एक साइंस फिक्शन फिल्म की तरह लगती है, लेकिन इसका इस्तेमाल वास्तविक दुनिया में किया जा रहा है। पिछले साल, संयुक्त अरब अमीरात ने 122 डिग्री फ़ारेनहाइट तक के तापमान को कम करने के लिए दुबई में बारिश बनाने के लिए जियोइंजीनियरिंग का इस्तेमाल किया था। बादल का निर्माण ड्रोन तकनीक का उपयोग करके किया गया था, जिसमें बारिश करवाने के लिए बिजली का झटका दिया गया था।

    महासागरों में जियोइंजीनियरिंग का प्रस्ताव 2021 में जारी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंजीनियरिंग एंड मेडिसिन (NASEM) की एक रिपोर्ट ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए और वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को हटाने के लिए पृथ्वी के महासागरों को जियोइंजीनियरिंग करने का प्रस्ताव दिया था। इस आइडिया के तहत छोटे प्रकाश संश्लेषक के विकास को बढ़ाने के लिए उर्वरक जोड़ना, क्षारीयता को बढ़ावा देने के लिए पानी के माध्यम से विद्युत धाराओं को पारित करना और समुद्री जल के कैमिकल साइंस को बदलना शामिल है। स्कॉट डोनी, जो वर्जीनिया विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान में प्रोफेसर हैं और इस रिपोर्ट के लेखक हैं, उन्होंने एक बयान में कहा कि, ‘महासागर कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की रणनीतियों पर पहले से ही वैज्ञानिकों, गैर-सरकारी संगठनों और द्वारा चर्चा की जा रही है। संभावित जलवायु प्रतिक्रिया रणनीतियों के रूप में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है’।