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  • इसरो का आदित्य-एल1 (Aditya L1 Mission) मिशन (सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में)

    इसरो का आदित्य-एल1 (Aditya L1 Mission) मिशन (सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में)

    इसरो का Aditya L1 Mission (आदित्य-एल1 मिशन (संस्कृत से : आदित्य, “सूर्य”) सूर्य के अवलोकन के लिए समर्पित पहला भारतीय मिशन है जो इसरो द्वारा 2 सितंबर 2023 को लांच किया गया, साथ ही इसरो द्वारा स्थापित पहली सोलर ऑब्जर्वेटरी भी है जिसके जरिए सूर्य का अध्ययन किया जाएगा ।

    Aditya L1 मिशन की लांचिंग और प्रमुख चरण (Launch and key phases of Aditya L1 mission)

    2 सितंबर 2023 को 11:50 IST पर पीएसएलवी सी57 पर आदित्य-एल1 लॉन्च किया गया | इसरो के चंद्रमा मिशन की सफल लैंडिंग के दस दिन बाद  ही Aditya L1 ने सफलतापूर्वक अपनी इच्छित कक्षा हासिल कर ली और 12:57 IST पर अपने चौथे चरण से अलग हो गया । निगार शाजी इस महत्वकांशी परियोजना की निदेशक हैं।

    योजना के अनुसार, प्रक्षेपण के लगभग 63 मिनट बाद पीएसएलवी द्वारा आदित्य-एल1 को निचली-पृथ्वी की कक्षा में तैनात किया गया। प्रक्षेपण के बाद एल1 तक की यात्रा में लगभग 110 दिन लगने का अनुमान है, इस दौरान अंतरिक्ष यान को इस गुरुत्वाकर्षण स्थिर बिंदु तक पहुंचने के लिए आवश्यक वेग देने के लिए पांच और manoeuvre दिए जाएंगे। इनमे से दो manoeuvre पुरे हो चुके है |

    आदित्य-एल1 अंतरिक्ष यान सूर्य का अध्ययन करने के लिए अपने साथ कुल सात उपकरण लेकर गया है, जिनमें से चार सूर्य से प्रकाश का निरीक्षण करेंगे, बचे हुए तीन उपकरण प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्र के यथास्थान मापदंडों को मापेंगे | इस अंतरिक्ष यान को लैग्रेंजियन बिंदु 1 (एल1) पर एक प्रभामंडल कक्षा में स्थापित किया जाएगा, जो सूर्य की दिशा में पृथ्वी से 15 लाख किमी दूर है| यह सूर्य के चारों ओर समान सापेक्ष स्थिति में चक्कर लगाएगा. इस कारण लगातार सूर्य पर नजर रख सकता है |

    L1 पर पहुंचने पर, आदित्य-L1 स्थान के चारों ओर एक कक्षा में खुद को “बांधने” के लिए एक और चाल को अंजाम देगा। इसरो के अनुसार, प्रक्षेपण के लगभग 127 दिन बाद स्थापित कक्षा अनियमित आकार की होगी और सूर्य और पृथ्वी को जोड़ने वाली रेखा के लगभग लंबवत (perpendicular to a line joining the sun and Earth) में होगी।

    Aditya L1 मिशन के पीछे की कहानी (The story behind Aditya L1 mission)

    आदित्य-एल1 का सफल प्रक्षेपण 15 वर्षों से अधिक की योजना का परिणाम है | मिशन की शुरुआत जनवरी 2008 में अंतरिक्ष विज्ञान सलाहकार समिति (एडीसीओएस) (Advisory Committee for Space Sciences (ADCOS)) की एक अवधारणा के रूप में हुई थी, एक छोटे 400 किलोग्राम (880 पाउंड) उपग्रह के रूप में जो पृथ्वी की low-Earth orbit कक्षा में रहेगा। रणनीति बनाने के डेढ़ दशक में इस मिशन का पैमाना काफी बढ़ गया और इस वृद्धि को प्रतिबिंबित करने के लिए जुलाई 2019 में इसे एक नया नाम  —  “आदित्य-एल1”  —  दिया गया।

    क्या करेगा Aditya L1 मिशन ? What will Aditya L1 mission do?

    आदित्य-एल1 पृथ्वी से लगभग 1.5 मिलियन किमी की दूरी पर पृथ्वी और सूर्य के बीच एल1 लैग्रेंज बिंदु (Lagrange point 1 ) के चारों ओर एक प्रभामंडल (Earth-sun system) कक्षा में परिक्रमा करेगा जहां यह सौर वायुमंडल, सौर चुंबकीय तूफान और पृथ्वी के चारों ओर के वातावरण पर उनके प्रभाव का अध्ययन करेगा।

    आदित्य एल-1 सूर्य के वायुमंडल, सूर्य के परते (layers) जैसे फोटोस्फेयर (photosphere – प्रकाशमंडल), क्रोमोस्फेयर (chromosphere) और सबसे बाहरी लेयर कोरोना ( the corona) की अलग-अलग कलर बैंड में स्टडी करेगा। इसरो का कहना है कि आदित्य ए-1 पेलोड के सूट कोरोनल हीटिंग, कोरोनल मास इजेक्शन, प्री-फ्लेयर और फ्लेयर गतिविधियों और उनकी विशेषताओं, अंतरिक्ष मौसम की गतिशीलता, कण और मैग्नेटिक फील्ड से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी इकट्ठा करेगा।

    आदित्य-एल1 अंतरिक्ष यान सूर्य के करीब नहीं आएगा, पृथ्वी से लगभग 1.5 मिलियन किमी की दुरी से ही यह सूर्य का अध्ययन करेगा | यह दुरी पृथ्वी और सूर्य के बीच के कुल स्थान का लगभग 1% है | इसरो के अनुसार, L1 पर प्लेसमेंट अंतरिक्ष यान को सूर्य का दृश्य देखने की अनुमति देगा जो ग्रहण (eclipses) या प्रच्छाया (occultations) से निर्बाध है।

    क्या सूर्य का अध्ययन पृथ्वी से संभव है ? Is it possible to study the Sun from Earth?

    धरती पर वायुमंडल है जो सूर्य से आने वाली ज्यादातक खतरनाक रेडिएशन को अवशोषित कर लेता है। इसलिए धरती से सूर्य का अध्ययन सही से नहीं किया जा सकता। सूर्य की स्टडी के लिए स्पेस में जाना जरूरी है और इसी कारण कई देश पहले भी अपने सोलर स्पेसक्राफ्ट लॉन्च कर चुके हैं। अमेरिका, जापान, चीन और यूरोपीय यूनियन की स्पेस एजेंसियां सूर्य की स्टडी कर रही हैं। नासा ने 2018 में पार्कर सोलर प्रोब लॉन्च किया था।

    चीन और भारत के सूर्य के अध्ययन से जुड़े सैटेलाइट में अन्तर

    हाल ही चीन ने भी सूर्य के अध्ययन से जुड़ा एक सैटेलाइट लॉन्च किया। चीन ने 8 अक्टूबर 2022 को नेशनल स्पेस साइंस सेंटर से एडवांस स्पेस बेस्ड सोलर ऑब्जर्वेटरी (ASO-S) या कुआफू-1 लॉन्च किया था। आदित्य L-1 से अगर इसकी तुलना करें तो सबसे बड़ा अंतर इसकी पृथ्वी से ऊंचाई है। ASO-S जहां धरती से 720 किमी की ऊंचाई पर है तो वहीं आदित्य L-1 की दूरी धरती से लगभग 15 लाख किमी होगी। चीन का ASO-S 859 किग्रा है। वहीं भारत का आदित्य L1 का वजन 400 किग्रा है। आदित्य एल-1 और ASO-S की धरती से दूरी सबसे खास है। क्योंकि चीन का स्पेसक्राफ्ट धरती के ऑर्बिट में है, लेकिन इसरो का आदित्य इससे बिल्कुल बाहर होगा। यानी जो चीन ने नहीं किया वह भारत करेगा।

    चीन का ASO-S दुनिया का पहला स्पेसक्राफ्ट रहा है जो सोलर फ्लेयर और कोरोनल मास इजेक्शन की एक साथ स्टडी करने में सक्षम है। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह सैटेलाइट सूर्य की मैग्नोटिक फील्ड, सोलर फ्लेयर और कोरोनल मास इजेक्शन से जुड़ा 500 जीबी का डेटा रोज धरती पर भेजता है। वहीं सूर्य में बड़ी हलचल होने पर यह हर सेकंड तस्वीर भेजता है। वहीं, आदित्य एल-1 सोलर कोरोना की स्टडी करेगा। इसके अलावा आदित्य L-1 एक्स-रे के जरिए स्टडी करेगा।

    आदित्य-एल1 मिशन के प्रमुख वैज्ञानिक उद्देश्य (Major scientific objectives of Aditya-L1 mission)

    • सौर ऊपरी वायुमंडलीय (क्रोमोस्फीयर और कोरोना) गतिशीलता का अध्ययन।
    • क्रोमोस्फेरिक और कोरोनल हीटिंग का अध्ययन, आंशिक रूप से आयनित प्लाज्मा की भौतिकी, कोरोनल द्रव्यमान इजेक्शन की शुरुआत, और फ्लेयर्स
    • सूर्य से कण गतिशीलता के अध्ययन के लिए डेटा प्रदान करने वाले इन-सीटू कण और प्लाज्मा वातावरण का निरीक्षण करें।
    • सौर कोरोना का भौतिकी और इसका तापन तंत्र।
    • कोरोनल और कोरोनल लूप प्लाज्मा का निदान: तापमान, वेग और घनत्व।
    • सीएमई का विकास, गतिशीलता और उत्पत्ति।
    • कई परतों (क्रोमोस्फीयर, बेस और विस्तारित कोरोना) पर होने वाली प्रक्रियाओं के अनुक्रम की पहचान करें जो अंततः सौर विस्फोट की घटनाओं की ओर ले जाती हैं।
    • सौर कोरोना में चुंबकीय क्षेत्र टोपोलॉजी और चुंबकीय क्षेत्र माप।
    • अंतरिक्ष मौसम के लिए ड्राइवर (सौर हवा की उत्पत्ति, संरचना और गतिशीलता)।

    आदित्य-एल1 पेलोड

    आदित्य-एल1 के उपकरणों को सौर वातावरण मुख्य रूप से क्रोमोस्फीयर और कोरोना का निरीक्षण करने के लिए ट्यून किया गया है। इन-सीटू उपकरण एल1 पर स्थानीय वातावरण का निरीक्षण करेंगे। जहाज पर कुल सात पेलोड हैं जिनमें से चार सूर्य की रिमोट सेंसिंग करते हैं और तीन इन-सीटू अवलोकन करते हैं।

    वैज्ञानिक जांच की उनकी प्रमुख क्षमता के साथ पेलोड।

    Photo courtesy – ISRO (https://www.isro.gov.in/Aditya_L1.html
  • इसरो का चंद्रयान-3 मिशन (Hindi में ) | Launching of Chandrayaan-3 Mission by ISRO

    इसरो का चंद्रयान-3 मिशन (Hindi में ) | Launching of Chandrayaan-3 Mission by ISRO

    तेजी से हो रहे वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के इस युग में, अंतरिक्ष अन्वेषण ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ का विस्तार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अंतरिक्ष अनुसंधान और अन्वेषण में कदम रखने वाले कई देशों में से, भारत अपने अभूतपूर्व मिशनों के साथ एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में उभरा है।

    भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) (Indian Space Research Organisation (ISRO) के सबसे महत्वपुर्ण मिशनों में से एक चंद्रयान-3 (Chandrayaan-3) का बहुप्रतीक्षित प्रक्षेपण 14 जुलाई 2023 को दोपहर 2.35 बजे सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र ((Satish Dhawan Space Centre), श्रीहरिकोटा से होगा, जो चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सॉफ्ट-लैंडिंग करने वाले दुनिया के पहले मिशन के रूप में इतिहास रचने के लिए तैयार है। इस आर्टिकल में हम इस महत्वाकांक्षी मिशन की जटिलताओं, इसके महत्व, उद्देश्यों और भारत के लिए इसका क्या अर्थ है, इस पर प्रकाश डालता है।

    Chandrayaan-3 Integrated Module
    चंद्रयान-3 इंटीग्रेटेड मॉड्यूल

    चंद्रयान-3 मिशन क्या है? What is Chandrayaan-3 Mission ?

    चंद्रयान-3 इसरो का तीसरा चंद्र मिशन है । यह मिशन 2019 के चंद्रयान-2 मिशन का follow up Mission है | चंद्रयान-2 मिशन आंशिक रूप से विफल हो गया था क्योंकि इसके लैंडर और रोवर चंद्रमा पर सॉफ्ट-लैंडिंग नहीं कर सके थे ।

    चंद्रयान-3 मिशन का प्राथमिक उद्देश्य चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित लैंडिंग (safe landing) और roving (चन्द्रमा की सतह पर घुमने की अपनी क्षमता को प्रदर्शित करना है। इस मिशन में एक लैंडर/रोवर (lander/rover) और एक प्रोपल्शन मॉड्यूल (propulsion module) शामिल है। प्रोपल्शन मॉड्यूल, एक बॉक्स जैसी संरचना है जो एक बड़े सौर पैनल और एक मुख्य थ्रस्टर नोजल(thruster nozzle) के साथ, लैंडर (lander) को चंद्र कक्षा में ले जाती है । यह संचार रिले उपग्रह (communications relay satellite) के रूप में कार्य करते हुए चंद्रमा के चारों ओर कक्षा में रहता है ।

    चंद्रयान 3 प्रोपल्शन मॉड्यूल, जिसका उपयोग रिले उपग्रह के रूप में किया जाएगा (Photo: Wikipedia)

    इस रोवर में भूकंपमापी (seismometer), ऊष्मा प्रवाह प्रयोग (heat flow experiment) और स्पेक्ट्रोमीटर (spectrometers) है जो चन्द्रमा की सतह और कक्षा से कई प्रयोग (scientific measurements) करेगा । इसरो प्रमुथ एस सोमनाथ ने 10 जुलाई 2023 को कहा कि चंद्रयान-2 के सफलता आधारित डिजाइन की बजाय चंद्रयान-3 में ‘विफलता आधारित डिजाइन’ का विकल्प चुना गया है | उन्होंने कहा कि इस बात पर ध्यान केंद्रित किया गया कि क्या विफल हो सकता है और इसकी सुरक्षा कैसे की जाए और सफल लैंडिंग सुनिश्चित की जाए |

    इसरो का चंद्रयान मिशन (ISRO’s Chandrayaan Mission)

    चंद्रयान-1 (Chandrayaan-1)

    चंद्रयान मिशन की शुरुआत इसरो ने चंद्रयान-1 मिशन के साथ शुरू की | चंद्रयान-1, चंद्रमा के लिए भारत का पहला मिशन, 22 अक्टूबर 2008 को सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) से सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया था।, जो 312 दिनों तक संचालित हुआ और अपने नियोजित उद्देश्यों में से 95% को पूरा किया, जिसमें चन्द्रमा पर मिट्टी में पानी के अणुओं की व्यापक उपस्थिति की महत्वपूर्ण खोज भी शामिल थी।

    अंतरिक्ष यान चंद्रमा के रासायनिक, खनिज और फोटो-भूगर्भिक मानचित्रण के लिए चंद्रमा की सतह से 100 किमी की ऊंचाई पर चंद्रमा के चारों ओर परिक्रमा कर रहा था। अंतरिक्ष यान में भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, स्वीडन और बुल्गारिया में निर्मित 11 वैज्ञानिक उपकरण थे। सभी प्रमुख मिशन उद्देश्यों के सफल समापन के बाद, मई 2009 के दौरान कक्षा को 200 किमी तक बढ़ा दिया गया है। उपग्रह ने चंद्रमा के चारों ओर 3400 से अधिक परिक्रमाएं कीं और मिशन तब समाप्त हुआ जब 29 अगस्त को अंतरिक्ष यान के साथ संचार टूट गया था |

    चंद्रयान-2 (Chandrayaan-2)

    चंद्रयान-2 या चंद्रयान द्वितीय, चंद्रयान-1 के बाद चन्द्रमा पर खोजबीन करने वाला इसरो का दूसरा अभियान था, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसन्धान संगठन (इसरो) ने विकसित किया था | अभियान को जीएसएलवी संस्करण 3 प्रक्षेपण यान द्वारा प्रक्षेपित (लॉन्च) किया गया था और इस अभियान में भारत में निर्मित एक चंद्र कक्षयान (ऑरबिटर), एक रोवर एवं एक लैंडर शामिल हैं।

    भारत ने चंद्रयान-2 को 22 जुलाई 2019 को श्रीहरिकोटा रेंज से भारतीय समयानुसार दोपहर 02:43 बजे सफलता पूर्वक प्रक्षेपित किया था | यह यान 20 अगस्त 2019 को चंद्रमा की कक्षा में पहुंचा और विक्रम लैंडर की लैंडिंग के लिए कक्षीय स्थिति निर्धारण करना शुरू किया। लैंडर और रोवर को 6 सितंबर 2019 को चंद्रमा के निकट, दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में लगभग 70° दक्षिण के अक्षांश पर उतरने और एक चंद्र दिवस (Lunar day) के लिए वैज्ञानिक प्रयोग करने के लिए निर्धारित किया गया था, जो पृथ्वी के दो सप्ताह के बराबर है लेकिन 6 सितंबर 2019 को उतरने का प्रयास करते समय लैंडर अपने इच्छित प्रक्षेपवक्र (intended trajectory) से भटक जाने पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इसरो को सौंपी गई विफलता विश्लेषण रिपोर्ट के अनुसार, दुर्घटना एक सॉफ्टवेयर (software glitch) गड़बड़ी के कारण हुई थी।

    चंद्रयान-2 लैंडर और रोवर चंद्रमा पर लगभग 70° दक्षिण के अक्षांश पर स्थित दो क्रेटरों मज़िनस सी (craters Manzinus C) और सिमपेलियस एन (Simpelius N) के बीच एक ऊँचे मैदान पर उतरने का प्रयास करना था। पहियेदार रोवर चंद्र सतह पर चलने और जगह का रासायनिक विश्लेषण करने के लिए बनाया गया था। रोवर द्वारा एकत्र किए गए आंकड़ों को चंद्रयान-2 कक्षयान के माध्यम से पृथ्वी पर भेजने की योजना थी ।

    इन दो मिशनों से मिले अनुभवों और सीखों के आधार पर, इसरो अब चंद्रयान-3 के लिए तैयारी कर रहा है, जिसका लक्ष्य चंद्रमा पर सफल लैंडिंग करना है।

    भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है चंद्रयान-3?

    चंद्रयान-3 इसरो के लिए सिर्फ एक और मिशन नहीं है; यह भारत की अंतरिक्ष अनुसंधान यात्रा में एक महत्वपूर्ण कदम है। सफल होने पर, यह मिशन चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित रूप से उतरने और घूमने में भारत की क्षमता को प्रदर्शित करेगा, यह उपलब्धि अब तक केवल संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और चीन ने ही हासिल की है। इसके अलावा, मिशन से प्राप्त अंतर्दृष्टि चंद्रमा, विशेषकर इसके दक्षिणी ध्रुव के बारे में जानकारी में हमारी समझ में महत्वपूर्ण योगदान देगी। इस प्रकार, चंद्रयान-3 की सफलता भारत के लिए वैज्ञानिक और भू-राजनीतिक दोनों निहितार्थ रखती है।

    चंद्रयान-3 मिशन

    चंद्रयान-3 लैंडर और रोवर का नाम क्या है?

    चंद्रयान-3 के लैंडर का नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के नाम पर विक्रम रखा गया है। यह चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर के समान होगा, लेकिन सुरक्षित लैंडिंग सुनिश्चित करने के लिए इसमें सुधार किए गये है । उदाहरण के लिए, लैंडर में पांच के बजाय चार थ्रस्टर इंजन (thruster engines) होंगे, अधिक मजबूत पैर (robust legs), बड़े सौर पैनल होंगे और यह अधिक ईंधन ले जाएगा। इस 1.75 टन के लैंडर विक्रम में चंद्रयान-3 का रोवरया अंतरिक्ष अन्वेषण वाहन प्रज्ञान (Pragyaan) होगा जिसका संस्कृत में अर्थ ‘’ज्ञान ( ‘wisdom’)’ होता है । प्रज्ञान 26 किलोग्राम का 6 पहियों वाला रोबोटिक वाहन है जो आधा किलोमीटर तक यात्रा कर सकता है। विक्रम के विपरीत, प्रज्ञान केवल लैंडर से संचार करने में सक्षम है। यह कार्य करने के लिए सौर ऊर्जा का उपयोग करता है।

    चंद्रयान-3 चंद्रमा पर कब उतरेगा?

    इसरो अधिकारियों के अनुसार, चंद्रयान-3 अपने प्रक्षेपण के लगभग एक महीने बाद चंद्रमा की कक्षा में पहुंचेगा और इसके लैंडर, विक्रम और रोवर, प्रज्ञान के 23 अगस्त या 24 अगस्त, 2023 को चंद्रमा पर उतरने की संभावना है। नवीनतम मिशन कमोबेश चंद्रयान-2 जैसा ही है जिसका लक्ष्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास 70 डिग्री अक्षांश पर लैंडिंग करना है । अगर सब कुछ ठीक रहा तो चंद्रयान-3 चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सॉफ्ट-लैंडिंग करने वाला दुनिया का पहला मिशन बन जाएगा। इससे  पहले, इसे प्रोपल्शन मॉड्यूल द्वारा चंद्र कक्षा में ले जाया जाएगा, जो रहेगा चंद्रमा के चारों ओर कक्षा में, संचार रिले उपग्रह के रूप में कार्य करता है।

    चंद्रयान-3 मिशन कब शुरू हुआ और कब ख़त्म होगा?

    चंद्रयान-3 मिशन 14 जुलाई, 2023 को भारत के पूर्वी तट से दूर श्रीहरिकोटा के अंतरिक्ष बंदरगाह से लॉन्च होने वाला है। मिशन की समाप्ति तिथि चंद्रमा की सतह पर रोवर की लैंडिंग और उसके बाद के संचालन की सफलता पर निर्भर करती है। यह देखते हुए कि लैंडर और रोवर को एक चंद्र दिन की अवधि के लिए संचालित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जो लगभग 14 पृथ्वी दिनों के बराबर है, मिशन सितंबर 2023 की शुरुआत में समाप्त हो सकता है।

    क्यों महत्वपूर्ण है चन्द्रमा का दक्षिणी धुव्र

    चंद्रयान-3 मिशन के माध्यम से इसरो चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव का अन्वेषण क्यों करना चाहता है?

    चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव का पता लगाने का इसरो का निर्णय इस क्षेत्र की अद्वितीय भूविज्ञान और वैज्ञानिक खोजों की क्षमता से प्रेरित है। भूमध्यरेखीय क्षेत्र के विपरीत जहां पिछले अंतरिक्ष यान उतरे हैं, दक्षिणी ध्रुव काफी हद तक अछूता है। इसके कुछ हिस्से स्थायी रूप से छाया में रहते हैं, जिससे पहली बार चंद्रमा की बर्फ का नमूना लेने की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा, चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के आसपास के बड़े गड्ढों में प्रारंभिक सौर मंडल की संरचना के बारे में सुराग हो सकते हैं।

    वैज्ञानिक चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव का अन्वेषण क्यों करना चाहते हैं?

    वैज्ञानिक विशेष रूप से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव में रुचि रखते हैं क्योंकि यह चंद्रमा के एक बिल्कुल नए क्षेत्र का अध्ययन करने का मौका प्रदान करता है। इस क्षेत्र का भूविज्ञान अमेरिकी अपोलो मिशन के दौरान अध्ययन किए गए क्षेत्रों से बहुत अलग है। इस क्षेत्र की खोज से चंद्रमा के तापीय गुणों, भूकंपीयता, गैस और प्लाज्मा वातावरण और तात्विक संरचना के बारे में जानकारी मिल सकती है। ये डेटा न केवल चंद्रमा, बल्कि व्यापक ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ को आगे बढ़ाने में सहायक साबित हो सकते हैं।

    चंद्रयान-3 –  महत्वपूर्ण तथ्य

    चंद्रयान-3 कई ‘प्रथम’ मिशनों का मिशन है। यह चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सॉफ्ट-लैंड करने वाला पहला मिशन होगा और संचार उपग्रह के रूप में प्रोपल्शन मॉड्यूल का उपयोग करने वाला पहला मिशन होगा। मिशन का लक्ष्य पिछली कमियों को दूर करना और सफल चंद्र लैंडिंग हासिल करना है, जो भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इसके साथ ही, मिशन कई वैज्ञानिक प्रयोग भी करेगा, जिसमें चंद्रमा की सतह की रासायनिक संरचना का अध्ययन करना, थर्मल गुणों को मापना और भूकंपीय अध्ययन करना शामिल है। इनमें से प्रत्येक प्रयोग चंद्रमा के बारे में हमारी समझ में योगदान देगा और भविष्य के चंद्र अभियानों के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा।

    चंद्रयान-3 मिशन और भविष्य

    चंद्रयान-3 भारत की अंतरिक्ष अन्वेषण यात्रा में एक ऐतिहासिक मिशन होगा । यह पिछली असफलताओं से उबरने और वैज्ञानिक ज्ञान और तकनीकी कौशल की खोज जारी रखने के देश के दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। यह मिशन देश की आशाओं और दुनिया की निगाहों को सामने रखता है क्योंकि यह चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की ऐतिहासिक यात्रा की तैयारी कर रहा है। चंद्रयान-3 की सफलता ब्रह्मांड की हमारी खोज में एक नए आयाम पर पहुचाने में सक्षम है |

  • अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने 2022 में जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप से खोजे 200 से ज्यादा ग्रह

    अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने 2022 में जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप से खोजे 200 से ज्यादा ग्रह

    अंतरिक्ष को अनंत माना जाता है। इसमें अनगिनत खगोलीय पिंड (Celestial bodies) हैं जिनकी बहुत थोड़ी संख्या ही अब तक ज्ञात थी। खगोलीय पिंड (Celestial bodies) यानी एक प्राकृतिक वस्तु (object) जो पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर स्थित है, जैसे धूमकेतु (comet), क्षुद्रग्रह (asteroid), चंद्रमा (moon), ग्रह (planet), सूर्य (sun) या तारा (star) ।

    लेकिन 2022 ऐसा साल रहा जिसमें अंतरिक्ष के क्षेत्र में बड़ी क्रांति आई। वैज्ञानिकों ने इस साल हमारे सोलर सिस्टम के बाहर भी सैकड़ों ग्रह खोज डाले। और इसका सबसे बड़ा श्रेय जाता है जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (James Webb Space Telescope) को। इसके आने के बाद से वैज्ञानिकों की आंखों की पहुंच अंतरिक्ष में करोड़ों प्रकाश वर्ष आगे तक चली गई।

    जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (James Webb Space Telescope)

    जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST) अब तक का सबसे शक्तिशाली टेलीस्कोप है, जिसे अंतरिक्ष में लॉन्च किया गया है। JWST को 25 दिसंबर 2021 में लॉन्च किया गया था और लांच के बाद से ही इसने सितारों और आकाशगंगाओं के निर्माण की जांच शुरू कर दी है । जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप – जिसे कभी-कभी JWST या वेब (Webb) कहा जाता है, NASA का सबसे बड़ा और सबसे शक्तिशाली अंतरिक्ष विज्ञान टेलीस्कोप है।

    अमेरिकन स्पेस एजेंसी नासा (National Aeronautics and Space Administration – NASA) ने यूरोपियन स्पेस एजेंसी (European Space Agency – ESA) और कैनेडियन स्पेस एजेंसी (Canadian Space Agency – CSA) के सहयोग से JWST को develop और डिजाईन किया है ।

    नोट: जेम्स वेब कौन है? (Who is James Webb) – जेम्स एडविन वेब एक अमेरिकी सरकार के अधिकारी थे, जिन्होंने 1949 से 1952 तक राज्य के अवर सचिव (Undersecretary of State) के रूप में कार्य किया। वह 14 फरवरी, 1961 से 7 अक्टूबर, 1968 तक नासा के दूसरे नियुक्त प्रशासक भी थे।

    जेम्स वेब किस लिए प्रसिद्ध है? – जेम्स एडविन वेब ने फरवरी 1961 से अक्टूबर 1968 तक अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के प्रशासक के तौर पर बेहतरीन कार्य किया था।

    नए एग्जोप्लेनेट्स (Exoplanet) की खोज

    एग्जोप्लेनेट (Exoplanet) ऐसे ग्रहों को कहा जाता है हमारे सौर मंडल की सीमा के बाहर मौजूद हैं। अब तक खोजे गए एग्जोप्लेनेट्स (Exoplanet) की संख्या अब 5235 हो गई है। एस्ट्रोनॉमर्स ने इस साल 200 के लगभग एग्जोप्लेनेट्स की खोज की है।

    जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की मदद से यह संभव हो पाया है। इसने हबल टेलीस्कोप को भी पीछे छोड़ दिया है। हालांकि, हबल टेलीस्कोप अभी भी अपना काम कर रहा है। नासा ने एक ट्वीट में यह जानकारी दी है कि अकेले 2022 में ही उसने सैकड़ों एग्जोप्लेनेट्स का पता लगा लिया है।

    हबल स्पेस टेलीस्कोप (Hubble Space Telescope)

    एक स्पेस टेलीस्कोप है जिसे 1990 में पृथ्वी की निचली कक्षा में लॉन्च किया गया था और यह अभी भी ऑपरेशन में है। यह पहला अंतरिक्ष टेलीस्कोप नहीं था, लेकिन यह सबसे बड़े और सबसे बहुमुखी में से एक टेलिस्कोप है, जो एक महत्वपूर्ण शोध उपकरण (vital research tool) और खगोल विज्ञान के लिए वरदान के रूप में प्रसिद्ध है।

    नए एग्जोप्लेनेट्स (Exoplanet) की बनावट

    नासा के मुताबिक, 2022 की शुरुआत में उनके पास खोजे गए एग्जोप्लनेटेस् की संख्या 5000 के करीब थी। लेकिन 2022 के खत्म होते होते उन्होंने 200 से ज्यादा एग्जोप्लेनेट्स खोज डाले और यह संख्या 5235 पर पहुंच गई। इनमें से 4% ग्रह ऐसे हैं जिन पर पृथ्वी और मंगल की तरह ही चट्टाने पाई जाती हैं। इस उपलब्धि से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि 2023 में और अधिक एग्जोप्लेनेट्स को अंतरिक्ष वैज्ञानिक खोज सकने में कामयाब हो जाएंगे।

    एग्जोप्लेनेट्स की बनावट में बहुत भिन्नता पाई जाती है। इनमें से कुछ आकार में बहुत छोटे होते हैं, तो कुछ दिखने में धरती जैसे लगते हैं और इनकी सतह पर भी रेत और चट्टानें पाई जाती हैं। 2022 में खोजा गया सबसे लेटेस्ट प्लेनेट नेप्च्यून (Neptune) जैसा दिखता है। इसका नाम HD 109833 b बताया गया है। यह एक जी-टाइप तारे के गिर्द घूमता है।

    नोट: नेपच्यून सूर्य से आठवां ग्रह है और सौरमंडल का सबसे दूर का ज्ञात ग्रह है। व्यास की दृष्टि से यह सौर मंडल का चौथा सबसे बड़ा ग्रह, तीसरा सबसे विशाल ग्रह और सबसे घना विशालकाय ग्रह है। यह पृथ्वी के द्रव्यमान का 17 गुना है, और इसके निकट-जुड़वां यूरेनस से थोड़ा अधिक भारी है

    एग्जोप्लेनेट (Exoplanet) में नए क्या मिला

    अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को दो एग्जोप्लेनेट ऐसे भी मिले हैं जिन पर अधिकतर मात्रा में पानी मौजूद हो सकता है। इन पर प्रत्य़क्ष रूप से पानी की खोज नहीं हुई है। बल्कि इनके आकार और घनत्व की तुलना जब दूसरे मॉडल्स के साथ की गई तो पता चला कि इनके घनत्व का आधे से ज्यादा हिस्सा ऐसे पदार्थ से बना है जो चट्टानों से तो हल्का है, लेकिन हाइड्रोजन और हीलियम जैसे गैसीय पदार्थों से भारी है। इसलिए बहुत संभावना जताई गई है इन पर पानी मौजूद हो सकता है। अगर ऐसा हो पाता है तो पृथ्वी के अलावा भी किसी अन्य ग्रह पर जीवन पाया जा सकता है।

    जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (James Webb Space Telescope) के बारे जानने के लिए नासा की official वेबसाइट – https://webb.nasa.gov/

  • नासा जब अपना पहला अस्टोरोइड-Asteroid (क्षुद्रग्रह) का नमूना लिया  

    नासा जब अपना पहला अस्टोरोइड-Asteroid (क्षुद्रग्रह) का नमूना लिया  

    अक्टूबर 2020 में, नासा के अंतरिक्ष यान ओएसआईआरआईएस-रेक्स (OSIRIS-Rex) पृथ्वी से 321 मिलियन किलोमीटर दुरी तय करके बेन्नू नामक 4.5 अरब साल पुराने क्षुद्रग्रह से चट्टानों का सैंपल लिया । यह पहला मिशन जो था जो पृथ्वी से इतनी दूर जाकर एक एक क्षुद्रग्रह को छुआ। इस क्राफ्ट को वैज्ञानिक टीम धरातल पर उतरना चाहती थी लेकिन सतह बहुत ही ज्यादा पथरीली थी इसकी बाद वैज्ञानिकों ने एक रोबोटिक हाथ का इस्तेमाल करते हुए एक चट्टान अस्टोरोइड की उठा ली |

    जब फ्लैप ने नमूना लेने के बाद बंद होना चाहिए था उसी वक्त बड़ी रॉक की वजह से वह पूरा बंद नही हो पाया जिस वजह से कुछ सैंपल रह गये | हालाकिं नासा को भरोसा है कि वे 400 ग्राम और 1 किलो से अधिक नमूना सामग्री ले पाने में सक्षम हुए है, जो न्यूनतम लक्ष्य द्रव्यमान (60 ग्राम से अधिक) से ज्यादा है |

    क्यों है जरूरी अस्टोरोइड नमूना ?

    विशेषज्ञों का मानना ​​है कि इसमें पानी और प्रीबायोटिक सामग्री हो सकती है, जो जीवन का निर्माण खंड है। साथ ही लौटाई गई सामग्री से वैज्ञानिकों को सौर मंडल के गठन और विकास, ग्रह निर्माण के प्रारंभिक चरणों, और कार्बनिक यौगिकों के स्रोत के बारे में अधिक जानने में सक्षम होने की उम्मीद है जिससे पृथ्वी पर जीवन का निर्माण हुआ।

    ओएसआईआरआईएस-रेक्स (OSIRIS-Rex) क्या है ?

    OSIRIS-REx (Origins, Spectral Interpretation, Resource Identification, Security, Regolith Explorer) (उत्पत्ति, स्पेक्ट्रल व्याख्या, संसाधन पहचान, सुरक्षा, रेजोलिथ एक्सप्लोरर) नासा का क्षुद्रग्रह-अध्ययन ( asteroid-study) और नमूना-वापसी (sample-return) मिशन है। इस मिशन का प्राथमिक लक्ष्य 101955 बेन्नू (101955 Bennu) से कम से कम 60 ग्राम (2.1 औंस) का एक नमूना प्राप्त करना है |

    OSIRIS-Rex के बारे में जाने –

    https://www.nasa.gov/osiris-rex

    मिशन ओएसआईआरआईएस-रेक्स (OSIRIS-Rex)

    OSIRIS-REx को 8 सितंबर 2016 को लॉन्च किया गया था, 22 सितंबर 2017 को इसने पृथ्वी से उड़ान भरी, और 3 दिसंबर 2018 को बेन्नू अस्टोरोइड पर पहुचा । इसने अगले कई महीने सतह का विश्लेषण करने में बिताए ताकि एक उपयुक्त जगह का पता लगाया जा सके जिससे नमूना निकाला जा सके। 20 अक्टूबर 2020 को, OSIRIS-REx ने बेन्नू की सतह को छुआ और सफलतापूर्वक एक नमूना एकत्र किया। ओएसआईआरआईएस-आरईएक्स के 24 सितंबर 2023 को अपने नमूने के साथ पृथ्वी पर लौटने की उम्मीद है और बाद में 99942 एपोफिस (99942 Apophis क्षुद्रग्रह) का ओएसआईआरआईएस-एपेक्स (OSIRIS-APEX ) (‘एपोफिस एपेक्स) के रूप में अध्ययन करने के लिए अपना नया मिशन शुरू करेगा, जो 2029 में उस क्षुद्रग्रह पर पहुंचेगा।

    101955 बेन्नू (101955 Bennu) क्या है ?

    101955 बेन्नू 11 सितंबर 1999 को लीनियर प्रोजेक्ट द्वारा खोजे गए अपोलो समूह में एक कार्बनयुक्त क्षुद्रग्रह है। यह एक संभावित खतरनाक वस्तु है जो सेंट्री रिस्क टेबल पर सूचीबद्ध है | इस क्षुद्रग्रह का 2178 और 2290 के बीच इसके पृथ्वी से टकराने की 1,800 में 1 संचयी संभावना है। विशेषकर 24 सितंबर 2182 को सबसे बड़ा जोखिम माना गया है | इसका नाम प्राचीन मिस्र के पौराणिक पक्षी बेन्नू के नाम पर रखा गया है, जो सूर्य, सृष्टि और पुनर्जन्म से जुड़ा है।

  • क्‍या पृथ्‍वी पर पानी एस्‍टरॉयड लाए? क्या है एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) ?

    क्‍या पृथ्‍वी पर पानी एस्‍टरॉयड लाए? क्या है एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) ?

    Resource

    https://iopscience.iop.org/article/10.3847/2041-8213/ac83bd

    https://www.sciencealert.com/asteroid-ryugu-reveals-ancient-grains-of-stardust-older-than-the-solar-system

    करीब 6 साल के एक जापानी अंतरिक्ष मिशन में जुटाए गए गए दुर्लभ नमूनों का विश्लेषण करने के बाद वैज्ञानिकों ने कहा है कि हमारे सौर मंडल के बाहरी किनारों से एस्‍टरॉयड्स द्वारा पानी पृथ्वी पर लाया गया हो सकता है।

    जीवन की उत्पत्ति और ब्रह्मांड के निर्माण पर रोशनी डालने के लिए रिसर्चर्स साल 2020 में एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) से पृथ्वी पर लाए गए मटेरियल की जांच कर रहे हैं।

    एक एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, 5.4 ग्राम (0.2 औंस) वजन वाली चट्टान और धूल को एक जापानी स्‍पेस प्रोब, “हायाबुसा -2′ (Hayabusa-2) ने इकट्ठा किया था। यह प्रोब उस आकाशीय पिंड पर उतरा था और उसने पिंड के सर्फेस पर एक ‘प्रभावक’ (impactor) को फायर किया था। इस मटीरियल से जुड़ी स्‍टडी प्रकाशित होने लगी हैं।

    एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) क्या है ?

    यह सी-प्रकार के क्षुद्रग्रह 162173 रयुगु का रंगीन दृश्य है, जिसे हायाबुसा 2 के बोर्ड पर ओएनसी-टी कैमरे द्वारा देखा गया है।

    संयुक्त राज्य अमेरिका में सोकोरो, न्यू मैक्सिको के पास लिंकन लैब के ईटीएस (Lincoln Lab’s ETS ) में लिंकन नियर-अर्थ क्षुद्रग्रह अनुसंधान (Lincoln Near-Earth Asteroid Research) के साथ खगोलविदों द्वारा 10 मई 1999 को रयुगु की खोज की गई थी। इसे अनंतिम पदनाम 1999 JU3 दिया गया था | इसका व्यास लगभग 1 किलोमीटर (0.62 मील) है और यह दुर्लभ वर्णक्रमीय प्रकार Cb (rare spectral type Cb) की एक काली वस्तु है, जिसमें C-प्रकार के क्षुद्रग्रह (C-type asteroid) और B-प्रकार के क्षुद्रग्रह ((B-type asteroid)) दोनों के गुण हैं।

    28 सितंबर 2015 को माइनर प्लैनेट सेंटर (Minor Planet Center ) द्वारा आधिकारिक तौर पर क्षुद्रग्रह का नाम “रयुगु” रखा गया था।

    यह नाम रियोगो-जो (ड्रैगन पैलेस) (Ryūgū-jō (Dragon Palace) को संदर्भित करता है, जो की एक जापानी लोककथा में एक जादुई महल होता है जो पानी के नीचे स्थित होता है | इस लोक कथा में, मछुआरा उरशिमा तारो (Urashima Tarō ) एक कछुए की पीठ पर इस जादुई महल की यात्रा करता है, और जब वह वापस उस महल से लौटता है, तो अपने साथ एक रहस्यमय बॉक्स लेकर आता है, जैसे हायाबुसा 2 इस एस्‍टरॉयड के नमूनों के साथ वापस पृथ्वी पर आया था |

    हायाबुसा-2 अंतरिक्ष यान जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (Japan Aerospace Exploration Agency (JAXA) द्वारा दिसंबर 2014 में लॉन्च किया गया था और 27 जून 2018 को यह सफलतापूर्वक क्षुद्रग्रह (asteroid) पर पहुंचा। 6 दिसंबर 2020 को एक कैप्सूल एस्‍टरॉयड के samples के साथ ऑस्ट्रेलिया में लैंड हुआ ।

    एस्‍टरॉयड रयुगु से क्या पाया वैज्ञानिकों ने ?

    इस साल जून में रिसर्चर्स के एक समूह ने कहा था कि उन्हें कार्बनिक पदार्थ मिला है, जिससे पता चलता है कि पृथ्वी पर जीवन के कुछ बिल्डिंग ब्‍लॉक्‍स, अमीनो एसिड अंतरिक्ष में बने हो सकते हैं।

    नेचर एस्ट्रोनॉमी जर्नल में प्रकाशित एक नए पेपर में वैज्ञानिकों ने कहा है कि एस्‍टरॉयड ‘रयुगु’ (Ryugu) के सैंपल इस बात पर रोशनी डाल सकते हैं कि अरबों साल पहले पृथ्वी पर महासागर कैसे बने। जापान और अन्य देशों के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस अध्ययन में कहा गया है कि वाष्पशील और ऑर्गनिक रिच C-टाइप के एस्‍टरॉयड, पृथ्वी के पानी के प्रमुख सोर्सेज में से एक हो सकते हैं। उनके मुताबिक पृथ्वी पर वाष्पशील पदार्थ (ऑर्गेनिक्स और पानी) का होना अभी भी बहस का विषय है। खास बात यह है कि स्‍टडी में पहचाने गए रयुगु एस्‍टरॉयड के पार्टिकल्‍स में पाए जाने वाले कार्बनिक पदार्थ संभवत: वाष्पशील पदार्थ के एक अहम सोर्स हो सकते हैं। 

    हायाबुसा-2 को साल 2014 में लगभग 300 मिलियन किलोमीटर दूर ‘रयुगु’ एस्‍टरॉयड की ओर लॉन्‍च किया गया था। दो साल पहले ही यह पृथ्वी की कक्षा में लौटा था। नेचर एस्ट्रोनॉमी में पब्लिश हुई स्‍टडी में रिसर्चर्स ने मिशन द्वारा प्कीराप्त की गई खोजों को महत्वपुर्ण बताया है ।

  • रेडियो टेलीस्कोप का इस्‍तेमाल कर वैज्ञानिक लगायेगे ‘एलियंस’ और नये ग्रहों का पता

    रेडियो टेलीस्कोप का इस्‍तेमाल कर वैज्ञानिक लगायेगे ‘एलियंस’ और नये ग्रहों का पता

    Resource: https://www.sciencealert.com/scientists-have-found-a-new-way-to-detect-alien-worlds-beyond-our-solar-system

    बीते कुछ वर्षों में साल से वैज्ञानिकों ने अपना फोकस एक्‍सोप्‍लैनेट की ओर बढ़ा दिया है। ऐसे ग्रह जो सूर्य के अलावा अन्य तारों की परिक्रमा करते हैं उन्हें एक्सोप्लैनेट (exoplanets) कहलाते हैं। वैज्ञानिक लगातार नये ग्रहों की खोज इस उम्मीद में करते रहते है की शायद उन्‍हें वहां जीवन के संकेत मिल जाएंगे।

    एक्‍सोप्‍लैनेट को कैसे खोजा जाता है ?

    ज्‍यादातर एक्‍सोप्‍लैनेट को ट्रांजिट मेथड (transit method) द्वारा खोजा गया है। इसमें एक ऑप्टिकल टेलीस्कोप समय के साथ किसी तारे की चमक को मापता है। अगर तारे की चमक बहुत कम है, तो यह संकेत हो सकता है कि कोई ग्रह उसके सामने से गुजरा है। ट्रांजिट मेथड एक पावरफुल टूल है, लेकिन इसकी अपनी कुछ सीमाएं हैं। इसके लिए ऑप्टिकल टेलीस्‍कोप चाहिए और तारे के पास से ग्रह को गुजरना चाहिए ।

    एक्सोप्लैनेट का पता लगाने का नया मेथड

    नई मेथड खगोलविदों को रेडियो टेलीस्कोप का इस्‍तेमाल करके एक्सोप्लैनेट का पता लगाने में मदद कर सकती है। Sciencealert की रिपोर्ट के अनुसार, रेडियो तरंग दैर्ध्य (Wavelengths) पर एक्सोप्लैनेट को ऑब्‍जर्व करना आसान नहीं है। ज्‍यादातर ग्रह बहुत ज्‍यादा रेडियो लाइट उत्सर्जित नहीं करते हैं और तारे ऐसा करते हैं। हालांकि तारों से निकलने वाले फ्लेयर्स (stellar flares) के कारण रेडियो लाइट में भी अंतर हो सकता है। लेकिन बृहस्पति जैसे बड़े गैस ग्रह रेडियो ब्राइट (radio bright) हो सकते हैं। इसकी वजह इनका मजबूत चुंबकीय क्षेत्र है। बृहस्पति ग्रह की रेडियो लाइट इतनी चमकदार है कि आप इसे घर में मौजूद रेडियो टेलीस्कोप से पहचान सकते हैं।

    बृहस्पति गृह की रेडियो इमेज (Radio image of Jupiter). (Imke de Pater; Michael H. Wong, UC Berkeley; Robert J. Sault, University of Melbourne)

    एस्‍ट्रोनॉमर्स ने कई और ग्रहों से रेडियो सिग्‍नल्‍स का पता लगाया है। स्‍टडी के दौरान टीम ने यह समझने की कोशिश की कि इस तरह के सिग्‍नल कैसे हो सकते हैं। उन्होंने अपने मॉडल को मैग्नेटोहाइड्रोडायनामिक्स (MHD) पर आधारित किया। यह बताता है कि चुंबकीय क्षेत्र और आयनित गैसें कैसे आपस में इंटरेक्‍ट करती हैं। अपनी स्‍टडी को वैज्ञानिकों ने HD 189733 के रूप में पहचाने के गए ग्रह सिस्‍टम पर अप्‍लाई किया। उन्होंने सिम्‍युलेट किया कि कैसे एक तारे की हवा ने ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र इंटरेक्‍ट किया।

    वैज्ञानिकों को कई दिलचस्‍प चीजें पता चलीं। उन्‍हें पता चला कि रेडियो ऑब्‍जर्वेशन अपने तारे के सामने से गुजरने वाले किसी ग्रह के ट्रांजिशन का पता लगा सकते हैं। हालांकि ऐसे सिग्‍नल काफी फीके होंगे और उन्‍हें पकड़ने के लिए नई जेनरेशन वाले रेडियो टेलिस्‍कोप की जरूरत होगी। लेकिन अगर हम उनका पता लगाते हैं, तो ग्रहों के रेडियो सिग्नल हमें सिस्टम में कम से कम एक ग्रह का सटीक ऑर्बिटल माप देंगे। इससे एक्सोप्लैनेट की संरचना और इंटीरियर को समझने में मदद मिलेगी।

  • क्या पृथ्वी पर बढ़ रही है एक दिन की लंबाई ? कारण और परिणाम

    क्या पृथ्वी पर बढ़ रही है एक दिन की लंबाई ? कारण और परिणाम

    पृथ्वी (Earth) पर दिन रहस्यमयी तरीके से लंबा हो रहा है यानी धरती के दिन का समय बढ़ रहा है और वैज्ञानिकों को यह रहस्यमय लग रहा है क्योकीं वैज्ञानिक इसके पीछे जुड़े कारण पर अभी तक नही पहुच पा रहे है |

    दुनिया भर के एटॉमिक क्लॉक्स ने गणना करके यह बताया है कि पृथ्वी के दिन का समय रहस्यमयी तरीके से बढ़ रहा है इससे न सिर्फ हमारे समय की कैलकुलेशन पर असर पड़ेगा, बल्कि जीपीएस, नेविगेशन और संचार संबंधी कई अन्य तकनीकों में भी समस्या आएगी |

    धरती के दिन की गणना उसकी धुरी पर लगने वाले चक्कर से होती आई है लेकिन धरती के अपनी धुरी पर घूमने की गति लगातार बढ़ रही है | पिछले कुछ दशकों से हमारे दिन की लंबाई छोटी हो रही थी | जून 2022 में सबसे छोटे दिन का रिकॉर्ड भी दर्ज किया गया यानी पिछली आधी सदी में यह सबसे छोटा दिन था लेकिन साल 2020 के बाद और इस रिकॉर्ड के गठन के बाद अब धरती ने गति धीमी हो रही है और दिन लंबे हो रहे हैं जिसकी वजह वैज्ञानिकों को पता नहीं है |

    सामान्य फोन या घड़ी में तो 24 घंटे का सटीक समय दिखा रहे है लेकिन पृथ्वी के 24 घंटे में लगने वाला चक्कर अब कुछ समय ज्यादा ले रहा है | आमतौर पर यह बदलाव करोड़ों सालों में होता है | हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे की वजह धरती पर आने वाले भूकंप (Earthquake) और तूफान (Storm) भी हो सकते हैं |

    पिछले कई करोड़ वर्षों से धरती के घूमने की गति धीमी हो रही है और इसके पीछे चंद्रमा से निकलने वाले टाइड्स का घर्षण है | हर एक सदी में 2.3 मिलिसेकेंड धरती के दिन के समय में जुड़ रहा है |

    कुछ करोड़ साल पहले धरती का दिन सिर्फ 19 घंटे का होता था लेकिन पिछले 20 हजार सालों से दूसरी प्रक्रिया शुरू हो गई जो कि विपरीत दिशा में है इस वजह से धरती की गति बढ़ने लगी | यह प्रक्रिया तब शुरू हुई जब जब Ice Age  में ध्रुवीय बर्फ के पिघलने से सरफेस प्रेशर कम हो रहा था और धरती का मैंटल धीरे-धीरे ध्रुवों की तरफ खिसक रहा था |

    इसे एक उदाहरण से समझते है जैसे कोई बैले डांसर अपने घूमने की गति बढ़ाने के लिए अपने हाथों को अपने शरीर के करीब रख लेती है ताकि वह अपनी धुरी यानी पैर पर तेजी से गोल घूम सके | इसी तरह हमारी पृथ्वी के घूमने की गति तब बढ़ जाती है, जब उसका मैंटल धुरी के नजदीक पहुंचता है इसकी वजह से धरती का हर दिन 0.6 मिलिसेकेंड्स कम हो जाता है| धरती के एक दिन में 86,400 सेकेंड्स होते हैं |

    पिछले कई दशकों से धरती की आंतरिक संरचना और सतह के बीच एक संबंध बना हुआ है | अगर बड़े भूकंप आते हैं तो ये धरती के दिन की लंबाई को बदल देते हैं  भले ही अंतर कम समय का हो | जैसे साल 2011 में जापान में आए 8.9 तीव्रता के भूकंप ने धरती की घूमने की गति को 1.8 मिलिसेकेंड बढ़ा दिया था | इसके अलावा कई ऐसी छोटी घटनाएं होती रहती हैं, जो धरती के दिन के समय को बदलते हैं. जैसे- जलवायु परिवर्तन, मौसमों में बदलाव आदि | ये धरती के घूमने की गति को हर दिशा से प्रभावित करती हैं |

    हर 15 दिन पर या महीने में टाइडल साइकिल (fortnightly and monthly tidal cycles) यानी लहरों की गति भारी मात्रा में ग्रह के चारों तरफ मूवमेंट करती हैं | इनकी वजह से भी पृथ्वी के दिन का समय कम या ज्यादा होता है | समुद्र की लहरों की वजह से होने वाला बदलाव आमतौर पर 18.6 वर्षों में एक बार होता है | वायुमंडल के मूवमेंट का सबसे ज्यादा असर धरती की गति पर पड़ता है | इसके अलावा बर्फबारी, बारिश, जमीन से पानी निकालना ये चीजें भी धरती की गति पर असर डालती हैं |

    पृथ्वी अचानक धीमी क्यों हो रही है?

    वर्ष 1960 से अब तक धरती पर मौजूद रेडियो टेलिस्कोप्स ग्रहों के चारों तरफ मौजूद क्वासार (Quasars) और अन्य अंतरिक्षीय वस्तुओं की गणना से धरती के घूमने की गति का पता लगाते आ रहे हैं | इन रेडियो टेलिस्कोप और एटॉमिक घड़ी के आंकड़ों से पता चला है कि पिछले कुछ सालों से धरती के दिन का समय कुछ कम हो रहा था | लेकिन रोटेशन में इतना बदलाव आता है कि वैज्ञानिक कई बार धोखा खा जाते हैं |

    29 जून 2022 को सबसे छोटा दिन होने के बावजूद साल 2020 के बाद धरती के घूमने की ट्रैजेक्टरी (trajectory) में समय बढ़ा है | यह बदलाव पिछले 50 सालों में कभी नहीं देखा गया था | अभी तक इस बदलाव की सही और सटीक वजह पता नहीं चल पाई है | ये बदलाव मौसम के परिवर्तन की वजह से हो सकते है या फिर ला नीना इवेंट्स (La Niña events की वजह से | बर्फ के लगातार पिघलने की वजह से यह प्रक्रिया और बढ़ सकती है |

    वर्तमान समय के बदलाव को लेकर पहले चैंडलर वॉबल (Chandler Wobble) को वजह बताया जा रहा था | यह हर 430 दिन में होता था | लेकिन रेडियो टेलिस्कोप की जांच से पता चला कि चैंडलर वॉबल खत्म हो चुका है | एक आखिरी संभावना ये बनती है कि धरती के अंदर या बाहर कुछ बेहद खास बदलाव न हुआ हो, जो समझ में नहीं आ रहा है | लंबे समय के टाइडल इफेक्ट की वजह से भी पृथ्वी में यह परिवर्तन हो सकता है |

    क्या हमे नेगेटिव लीप सेकंड की जरूरत है ?

    धरती के घूमने की दर (Earth’s rotation rate) की वजह से कई तरह के आधुनिक एप्लीकेशन काम करते हैं. जैसे- जीपीएस, नेविगेशन सिस्टम | यदि धरती का घूमना बदलता है तो इनकी प्रणाली में दिक्कत आना शुरु हो जाएगी | हर कुछ साल पर समय की जानकारी रखने वालों को लीप सेकेंड जोड़ना पड़ेगा ताकि वो धरती की गति के साथ सामंजस्य बिठा सकें |  इस तरह अगर धरती और लंबे दिनों की ओर बढ़ेगी तो हमें निगेटिव लीड सेकेंड जोड़ना पड़ सकता है |

    निगेटिव लीप सेकेंड को अपने समय के साथ जोड़ने को वैज्ञानिक सही नहीं मानते हैं | अगर ऐसा करना पड़ेगा तो पूरी दुनिया के जीपीएस, नेविगेशन सिस्टम को अपना समय एडजस्ट करना होगा |

  • दो नए ग्रहों की खोज, बृहस्पति जितना विशाल है आकार – क्या मिलेगे जीवन के लक्षण ?

    दो नए ग्रहों की खोज, बृहस्पति जितना विशाल है आकार – क्या मिलेगे जीवन के लक्षण ?

    इजरायल के एक यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की अगुवाई में शोधकर्ताओं की टीम ने पृथ्वी वाले सौर मंडल के दायरे से काफी बाहर मौजूद दूसरी दुनिया में टेलीस्कोप के माध्यम से जाकर दो विशाल ग्रहों का पता लगाया है। ये इतने विशाल ग्रह हैं कि अपने बृहस्पति ग्रह के आकार के बराबर हैं। जानते हैं इन दोनों नए ग्रहों और उनकी खोज के बारे में।

    आकाशगंगा की दूसरी दुनिया में दो नए ग्रहों की खोज

    इजरायल के तेल अवीव विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की अगुवाई में वैज्ञानिकों की एक टीम ने मिल्की वे आकाशगंगा के अंदर सौर मंडल के दूरस्थ क्षेत्र में दो नए ग्रहों की खोज की है। इन्होंने यूरोपीय स्पेस एजेंसी और इसकी गैया स्पेसक्राफ्ट की टीमों के साथ सहयोग से शोध के हिस्से के रूप में गैया-1 बी और गैया -2 बी नाम से इन दोनों विशाल ग्रहों की पहचान की है। ऐसा पहली बार हुआ है कि गैया स्पेसक्राफ्ट ने सफलतापूर्वक दो नए ग्रहों को खोज निकाला है।

    आकाशगंगा के 3डी मैप तैयार करने के मिशन के दौरान मिली सफलता

    गैया एक तारा सर्वेक्षण उपग्रह है। इसे आकाशगंगा के 3डी मैप तैयार करने के मिशन पर भेजा गया है। इसकी सटीकता को अभूतपूर्व रखने की कोशिश की गई है, इतनी सटीक कि कोई पृथ्वी पर खड़े होकर भी चांद पर मौजूद 10-शेकेल (यहूदियों का प्राचीन सिक्का) सिक्कों की पहचान कर ले। इस शोध के परिणाम को साइंटिफि जर्नल एस्ट्रोनॉमी और ऐस्टेरफिजिक्स में प्रकाश किया गया है। इस खोज के अगुवा और तेल अवीव यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शाय जुकर ने कहा, ‘दो नए ग्रहों की खोज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक का इस्तेमाल करते हुए सूक्ष्म छानबीन के दौरान की गई।

    40 और ग्रहों की हो सकती है खोज

    दोनों नए ग्रहों को उनके आकार और उनके मेजबान तारों से निकटता की वजह से ‘हॉट जुपिटर’ कहा गया है। प्रोफेसर जुकर के मुताबिक, ‘अमेरिका में हमने टेलीस्कोप से जो माप किए, उससे इसकी पुष्टि हुई कि ये असल में दो विशाल ग्रह थे, जो हमारे सौर मंडल में बृहस्पति ग्रह के आकार जैसे थे, और अपने सूर्य के इतने पास मौजूद थे कि चार दिनों से भी कम समय में एक कक्षा पूरी कर लेते थे। इसका मतलब हुआ कि प्रत्येक पृथ्वी वर्ष उस ग्रह के 90 वर्ष के बराबर होता है।’ उन्होंने कहा, ‘हमने 40 और कैंडिडेट के बारे में भी प्रकाशित किया है, जिन्हें हमने गैया के माध्यम से पता लगाया है। खगोलीय समुदाय को अब इन ग्रहों की प्रकृति की पुष्टि करने की कोशिश करनी होगी, जैसा कि हमने पहले दो कैंडिडेट के लिए किया।’

    1995 में पहली बार हुई थी दूसरी दुनिया के ग्रह की खोज

    हमारा सौर मंडल सूर्य और उसके आठ ग्रहों से बना है। जबकि, आकाशगंगा में हजारों दूसरे अज्ञात और कम ज्ञात ग्रह मौजूद हैं, जो अनगिनत सौर मंडल शामिल हैं। दूरस्थ सौर मंडल में पहला ग्रह 1995 में खोजा गया था। यही वजह है कि इनके बारे में जानने-समझने को लेकर खगोलविदों की ओर से एक सतत प्रयास जारी है; और उसी का परिणाम है कि इन दो नए और विशाल ग्रहों के बारे में पता चल पाया है।

    जीवन के लक्षण को लेकर अनुमान क्या है ?

    सवाल है कि जो बृहस्पति के आकार वाले दोनों नए ग्रहों का वैज्ञानिकों ने पता लगाया है, वहां जीवन के लक्षण मिलने की कितनी संभावनाएं हैं? इस रिसर्च में शामिल रेमंड के डॉक्टरेट के एक छात्र एवियाद पान्ही ने बताया, ‘नए ग्रह अपने सूर्य के बहुत ही करीब हैं और इसलिए वहां का तापमान बहुत ही ज्यादा है, करीब 1,000 डिग्री सेल्सियस, इसलिए वहां जीवन के विकसित होने की संभावना शून्य है।’

  • गुरुत्व का नया सिद्धांत जो सुलझा सकता है डार्क मैटर का रहस्य

    गुरुत्व का नया सिद्धांत जो सुलझा सकता है डार्क मैटर का रहस्य

    गुरुत्व के नए सिद्धांत (New Gravity Theory) के बारे में दावा किया गया है कि इसके जरिए खगोलीय परिघटनाओं की पूरी व्याख्या की जा सकती है और डार्क मैटर (Dark Matter) जैसे किसी अदृश्य पदार्थ के अस्तित्व की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. मिलग्रोमैन गतिकी (Milgromian Dynamics) नाम का यह सिद्धांत गैलेक्सी के घूर्णन की व्याख्या के साथ उसका पूर्वानुमान तक लगा सकता है जिसके लिए अभी तक वैज्ञानिक डार्क मैटर को जिम्मेदार बता रहे थे |

    पिछले कुछ दशकों से विज्ञान जगत में डार्क मैटर (Dark Matter) की खूब चर्चा रही है | अभी तक इसके अस्तित्व सिद्ध किए बिना ही कई परिघटनाओं की व्याख्या में इसका उपयोग हुआ है | डार्क मैटर के बारे में बताया जाता है कि यह अदृश्य पदार्थ प्रकाश से तो अप्रभावित होता है, लेकिन गुरुत्व से नहीं | नई समीक्षा में वैज्ञानिकों ने सुझाया है कि विभिन्न पैमानों पर किए गए व्यापक अवलोकन बताते हैं कि गुरुत्व का एक वैकल्पिक सिद्धांत (New Gravity Theory), जिसे मिलग्रोमैन गतिकी (Milgromian dynamics) या मोंड भी कहते है, सभी परिघटनाओं की व्याख्या कर सकता है जिसके लिए डार्क मैटर जैसे अदृश्य की जरूरत ही नहीं होगी |

    डार्क मैटर की अवधारणा

    न्यूटन के भौतिकी के नियम सौरमडंल के ग्रहों की चाल तो सटीकता से बता पाते हैं, लेकिन  1970 के दशक में वैज्ञानिकों ने पाया कि ऐसा गैलेक्सी की चक्रिका (Galaxy Discs) के साथ नहीं हो रहा है | बाहरी किनारे पर तारों की घूमने की गति न्यूटन के सिद्धांत के द्वारा बताई गई गति से कहीं ज्यादा थी | यहीं से डार्क मैटर की अवधारणा आई जिसे उस अतिरिक्त गुरुत्व खिंचाव के लिए जिम्मेदार माना गया जो तारों को गति प्रदान कर रहा था |

    गुरुत्व और डार्क मैटर

    गुरुत्व का यह नया सिद्धांत 40 साल पहले इजराइली भौतिकविद मोर्डेहाई मिलग्रोम ने दिया था | बताया जा रहा है कि यह सिद्धांत डार्क मैटर की आवश्यकता को खत्म कर देगा | मोंड सिद्धांत में मूलतः बताया गया है कि जब गुरुत्व बहुत ही कमजोर हो जाती है, जैसा की गैलेक्सी के किनारों पर होता है, तब वह न्यूटन की भौतिकी से अलग बर्ताव करने लगती है | इस तरह से इसकी व्याख्या करना संभव हो सकेगा कि 150 गैलेक्सी के किनारों पर तारे, ग्रह और गैस आदि तेजी से क्यों घूमते हैं |

    मानक प्रतिमान से बेहतर?

    इससे भी खास बात यह है कि मोंड केवल घूर्णन वक्र की ही व्याख्या नहीं करता है,  बल्कि इससे कई मामलों में सही पूर्वानुमान भी लगाया जा सकता है  विज्ञान के दार्शनिकों का कहना है कि मोंड की पूर्वानुमान लगाने की यह क्षमता उसे मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान (standard cosmological model) से ऊपर उठा देता है जिसके अनुसार ब्रह्माण्ड में दिखाई देने वाला यानि सामान्य पदार्थ की तुलना में डार्कमैटर ज्यादा है | इस प्रतिमान के अनुसार गैलेक्सी में अनिश्चित लेकिन बहुत ही ज्यादा पदार्थ होता है. जिससे गैलेक्सी के घूर्णन की व्याख्या नहीं हो सकती है |

    मोंड के सटीक पूर्वानुमान

    गैलेक्सी के किनारे के पिडों की घूमने की गति की व्याख्या के ना होने की जिम्मेदार डार्क मैटर को ही बताया जाता रहा है |  लेकिन मोंड के अभी तक के पूर्वानुमानों की पुष्टि तक होती रही है | जहां सामान्य पदार्थ के वितरण के आधार पर गैलेक्सी के किनारों के घूर्णन की गति 100 और 300  किलोमीटर प्रतिघंटा का अनुमान लगा पता है, मोंड इसे 180-190 किलोमीटर प्रतिघंटा की गति बताता है और बाद में अवलोकन करने में पता चलता है कि वास्तविक घूर्णन की गति 188 किलोमीटर प्रतिघंटा है, तो साफ है कि ऐसे में मोंड सिद्धांत को ही प्राथमिकता दी जाएगी |

    मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान की कमजोरी

    मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान की सबसे बड़ी नाकामी गैलेक्सी बार से संबंधित है जो तारों का बनाया छड़ के आकार के इलाके होते हैं | ये इलाके सर्पिल गैलेक्सी के केंद्रीय इलाके में पाए जाते हैं | यह छड़ समय के साथ घूर्णन करती है.  यदि गैलेक्सी में विशालकाय भार डार्क मैटर मौजूद है तो उनके बार या छड़ों की गति धीमी हो जानी चाहिए, लेकिन बहुत सी गैलेक्सी के अवलोकनों में पाया गया है कि ये छड़े बहुत तेज हैं | इससे मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान पर विश्वास काफी कम हो जाता है | डार्क मैटर (Dark Matter) की गैलेक्सी में उपस्थिति कई परिघटनाओं की सही व्याख्या नहीं कर पाती है |

    डार्क मैटर का गुरुत्व का प्रभाव

    डार्क मैटर का गुरुत्व का प्रभाव तो होता है, लेकिन वे समान्य पदार्थ के गुरुत्व से प्रभावित नहीं होते हैं | इससे गणना में तो आसानी होती है, लेकिन यह वास्तविकताओं से मेल नहीं खाती है | जब इसे बाद में सिम्यूलेशन के लिए उपयोग में लाया गया तो भी विशेषताओं की सही व्याख्या नहीं हुई. इसके अलावा मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान में कई और भी खामियां पाई गई हैं |

    लेकिन कनवरसेशन में प्रकाशित लेख में वैज्ञानिकों ने मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान और मोंड के खगोलीय अवलोकनों के परिपेक्ष्य में परीक्षण के लिए ओकाम के रेजर की अवधारणा का उपयोग किया | जिसके मुताबिक मानदंडों से मुक्त एक सिद्धांत ज्यादा आकड़ों से संगत होता है जिससे वह और जटिल हो जाता है | इसकी व्याख्या लिए उन्होंने सैद्धांतिक लचीलेपन की भी अवधारणा दी | बहराल मोंड का सिद्धांत अवलोकनों से मेल खाता हुआ संगत दिखाई देता है लेकिन अभी डार्कमैटर या मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान को खारिज करना शायद जल्दबाजी हो |

  • चीनी रिसर्चर्स जानबूझकर करेगे अंतरिक्ष यान को एस्‍टरॉयड के साथ दुर्घटनाग्रस्त

    चीनी रिसर्चर्स जानबूझकर करेगे अंतरिक्ष यान को एस्‍टरॉयड के साथ दुर्घटनाग्रस्त

    एस्‍टरॉयड्स (asteroids) का पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने के लिए चीनी रिसर्चर्स एक नई मेथड पर काम कर रहे हैं। इस मेथड के तहत 20 से ज्‍यादा बड़े एंटीना को मिलाकर एक सारणी (Array) बनाई जा रही है, ताकि एस्‍टरॉयड्स से सिग्‍नलों को बाउंस किया जा सके। प्रोजेक्‍ट का नाम चाइना फुयान अंग्रेजी में – कंपाउंड आई है, जिसे बीजिंग इंस्टि‍ट्यूट ऑफ टेक्‍नॉलजी लीड कर रहा है। इस मेथड को सितम्बर 2022 में टेस्‍ट किया जाना है l

    इसके अलावा, अप्रैल में ग्‍लोबल टाइम्‍स ने बताया था कि देश की अंतरिक्ष एजेंसी एक नया मॉनिटरिंग और डिफेंस सिस्‍टम विकसित कर रही है। इसकी टेस्टिंग जानबूझकर एक अंतरिक्ष यान को एस्‍टरॉयड के साथ दुर्घटनाग्रस्त करके की जाएगी। रिपोर्टों में आगे कहा गया है कि नया मिशन 2025 की शुरुआत में एक खतरनाक एस्‍टरॉयड की कक्षा बदलने और उस पर अटैक करने के लिए लॉन्‍च किया जाएगा।

    चीनी रिसर्चर्स के एस्‍टरॉयड्स (asteroids)  पर किये गये इस मेथड से यह जाननें में मदद मिलेगी कि स्‍पेस रॉक का कोई विशाल टुकड़ा पृथ्वी के लिए खतरा तो नहीं है। इस मेथड के तहत 20 से ज्‍यादा बड़े एंटीना को मिलाकर एक सारणी (array) बनाई जा रही है, ताकि एस्‍टरॉयड्स से सिग्‍नलों को बाउंस किया जा सके और निर्धारित किया जा सके कि वे हमारे ग्रह को प्रभावित कर सकते हैं या नहीं। इस प्रोजेक्‍ट में कुछ चीनी विश्वविद्यालय शामिल हैं। इसके बारे में सबसे पहले डिटेल चीन के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के ऑफ‍िशियल न्‍यूज पेपर- साइंस एंड टेक्‍नॉलजी डेली में पब्लिश हुई थी। 

    चीन के मंत्रालय के अनुसार, इस प्रोजेक्‍ट का नाम चाइना फुयान अंग्रेजी में – कंपाउंड आई है और इस प्रोजेक्‍ट को बीजिंग इंस्टि‍ट्यूट ऑफ टेक्‍नॉलजी लीड कर रहा है। सिग्नल बाउंसिंग के लिए चुने गए एस्‍टरॉयड पृथ्वी से 93 मिलियन मील (150 मिलियन किलोमीटर) की दूरी पर मौजूद रहेंगे। 

    स्‍पेसडॉटकॉम की रिपोर्ट के अनुसार, प्रोजेक्‍ट के तहत दो एंटीना दक्षिणी चीन के चोंगकिंग में एक साइट पर बनाए गए हैं इस एंटीना का व्‍यास 82 से 98 फीट होगा।  । सितंबर में इन्‍हें टेस्‍ट किया जाएगा। टेस्टिंग अगर सफल रहती है, तो उसके बाद इन्‍हें शुरू कर दिया जाएगा।

    बीजिंग इंस्टि‍ट्यूट ऑफ टेक्‍नॉलजी के प्रेसिडेंट लॉन्ग टेंग ने ग्लोबल टाइम्स को बताया कि यह प्रोजेक्‍ट देश की उन जरूरतों को पूरा करेगा, जिनमें पृथ्‍वी के नजदीकी इलाके की सुरक्षा और एस्‍टरॉयड के निर्माण से जुड़े शोध शामिल हैं। रिसर्चर ने कहा कि यह सिस्‍टम को पृथ्वी की कक्षा में उपग्रहों और मलबे को ट्रैक करने के लिए भी लागू किया जा सकता है।