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  • SSC परीक्षा के लिए साइंस GK प्रश्न और उत्तर – सीरीज 3

    SSC परीक्षा के लिए साइंस GK प्रश्न और उत्तर – सीरीज 3

    विज्ञान के महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर (Important questions and their answer in Hindi), जो की प्रतियोगी परीक्षाओं के हिसाब से उपयोगी है | Science GK के इन प्रश्नों की तीसरी श्रृखला इस प्रकार है :

    विज्ञान के महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर (Important Science Questions and Answers in Hindi)

    जीव विज्ञान

    • हड्डियों एवं दाँतों में मुख्य रूप से कौन-सा रसायन होता है? – कैल्शियम
    • ‘हीमोफीलिया’ एक आनुवंशिक रोग है, जिसका क्या परिणाम है? – रक्त का नहीं जमना
    • मनुष्य का सामान्य रक्तचाप कितना होता है? –120/80
    • मलेरिया किसके द्वारा होता है? – मादा ऐनोफिलीज द्वारा
    • डॉक्टरों के द्वारा प्रयुक्त शब्द ‘CAT’ स्कैन का क्या अर्थ है? – कम्प्यूटराइज्ड एक्सियल टोमोग्राफी
    • पसीना निकलने से शरीर का सबसे उपयोग कार्य क्या होता है? – शरीर का ताप नियन्त्रित होना
    • ‘टिटेनस रोग’ किस जीवाणु से होता है? – क्लोस्ट्रीडियम टिटैनी
    • ‘एन्थ्रोपोलॉजी’ क्या है? – मानव विज्ञान का अध्ययन
    • मानव शरीर की किस ग्रन्थि को ‘मास्टर ग्रन्थि’ कहा जाता है? – पीयूषिका
    • आप मानव शरीर में उरोस्थि को कहाँ पाएँगे? – जाँघ में
    • मानव शरीर के किस भाग में ‘पायरिया’ रोगलगता है? – दाँत और मसूड़ा
    • लाल रक्त कणिकाएँ कहाँ बनती हैं? – अस्थि मज्जा में
    • शरीर के थर्मोस्टेट (ताप स्थिरांक) का काम करने वाली ग्रन्थि कौन-सी है? – हाइपोथैलेमस
    • पक्षियों के अध्ययन के विज्ञान को क्या कहते हैं? – आर्निथोलॉजी
    • किस रक्त समूह के व्यक्तियों को सार्वभौमिक दाता (यूनिवर्सल डोनर) कहा जाता है? – O ग्रुप
    • अवशोषित भोज्य पदार्थ को प्रोटोप्लाज्म में बदलने की प्रक्रिया क्या कहलाती है? – एसीमिलेशन
    • ‘ट्रैकोमा’ रोग किस अंग से सम्बन्धित रोग है? – आँख
    • इन्सुलिन, एण्ड्रनलीन, थॉयरीरिक्सल और हीमोग्लोबिन में से कौन-सा हॉर्मोन नहीं है? – हीमोग्लोबिन
    • किसी मनुष्य के द्वारा श्वसन में एक बार में खींची गयी हवा कितनी होती है – 500 मिमी
    • किस विटामिन की कमी के कारण मसूढ़ों से रक्त आता है और दाँत हिलने लगते हैं? – विटामिन C
    • वयस्क मानव ढाँचा कितनी हड्डियों पर आधारित होता है? – 206
    • खारे नमकीन जल में कौन-सा पेड़ उग सकता है? – मैंग्रोव
    • मनुष्य का मेरुदण्ड किससे संरक्षित है? – कशेरुक
    • यदि कोई व्यक्ति दोषपूर्ण द्विकपर्दी वॉल्व से पीड़ित है, तो उसके शरीर का कौन-सा अंग रोगग्रस्त है? – फुफ्फुस
    • मादा पशुओं में बच्चे पैदा होते समय कौन- सा हॉर्मोन अधिक सक्रिय होता है? — ऑक्सीटोसिन
    • किसके दूध में वसा की सर्वाधिक मात्रा पायी जाती है? — रेण्डियर
    • ऊन के लिए विख्यात पशु ‘पश्मीना’ क्या है? — बकरी
    • किस स्तनधारी के दूध में जल की मात्रा सबसे कम होती है? — मादा हाथी
    • मनुष्य के शरीर में ‘एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका’ कहाँ पाया जाता है? — आँत में
    • मच्छर में मलेरिया परजीवी का जीवन चक्र किसने खोजा था? — रोनाल्ड रॉस ने
    • निम्न में से किसमें रक्त नहीं होता है, किंतु वह श्वसन करता है? — हाइड्रा
    • मानव शरीर में पसलियों के कितने जोड़े होते हैं? — 12
    • स्तनधारियों में लाल रुधिर कणिकाओं का निर्माण कहाँ होता है? — अस्थिमज्जा में
    • जीव विज्ञान’ (Biology) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किसने किया था? — लैमार्क एवं ट्रैविरेनस ने
    • ‘वनस्पति विज्ञान’ के जनक कौन हैं? — थियोफ्रेस्ट
    • पुष्पों के अध्ययन को क्या कहा जाता है? — एन्थोलॉजी
    • ‘भारतीय वानस्पतिक सर्वेक्षण’ का मुख्यालय कहाँ स्थित है? — कोलकाता
    • निम्न में से किसे ‘वर्गिकी का पितामह’ कहा जाता है? — कार्ल वार्न लीनियस
    • वर्गीकरण की आधारीय इकाई क्या है? — स्पेशीज
    • जीवाणु की खोज सर्वप्रथम किसने की थी? — ल्यूवेन हॉक
    • वास्तविक केन्द्रक किसमें अनुपस्थित होता है? — जीवाणुओं में
    • भोजन की विषाक्तता उत्पन्न होती है? — क्लोस्ट्रीडियम बौटूलीनम द्वारा
    • निम्नलिखित में से कौन-सी बीमारी जीवाणुओं के द्वारा होती है? — कुष्ठ
    • वृक्षों की छालों पर उगने वाले कवकों को क्या कहते हैं? — कार्टीकोल्स
    • पौधे क्या उत्सर्जित करते हैं? – रात में कार्बनडाइऑक्साइड और दिन में ऑक्सीजन

    भौतिकी और रसायन विज्ञान

    • रसोई गैस का मिश्रण क्या है? – ब्यूटेन एवं प्रोपेन का
    • ऊष्मा का सबसे कम ऊष्मारोधी धातु कौन सी है? – एल्युमीनियम
    • वाट को किसमें प्रकट कर सकते हैं?– जूल प्रति सेकण्ड में
    • एल्कोहॉल उद्योग में किस कवक का प्रयोग होता है? – यीस्ट
    • कपड़े से स्याही और जंग के धब्बे छुड़ाने के लिए किसका प्रयोग होता है? – ईथर
    • ट्रांसफॉर्मर का प्रयोग किसके नियन्त्रित करने में होता है? – धारा
    • ग्रेनाइट, ग्रेफाइल और बैसाल्ट में से कौन-सी रूपान्तरि चट्टान है? – ग्रेनाइट
    • रेखीय संवेग संरक्षण किसके बराबर है? – न्यूटन के द्वितीय नियम
    • सूक्ष्म जीवाणुओं से प्राप्त वे तत्व कौन-से हैं, जिनका उपयोग सूक्ष्म जीवाणुओं को नष्ट करने के लिए किया जाता है? – प्रतिजैविक
    • ऊष्मा गति का प्रथम नियम अवधारणा की पुष्ठि कौन करता है? – ऊर्जा संरक्षण
    • आदर्श गैस की ऊर्जा किस पर आधारित होती है? – तापमान पर
    • पेट्रोलियम की गुणवत्ता किससे प्रदर्शित की जाती है? – ऑक्टेन नम्बर से
    • वाष्प भट्टी में किससे आयरन ऑक्साइड उपचयित होता है? – कार्बन
    • भूमि के अपमार्जन में योगदान देने वाला जीव कौन-सा है? – केंचुआ
    • सूर्य में कौन-सा तत्व सर्वाधिक मात्रा में रहता है? – हाइड्रोजन
    • हीरा (Diamond) क्या है? – शुद्ध कार्बन का क्रिस्टलीय
    • प्रसिद्ध ‘विग बैंग थ्योरी’ किस मुख्य सिद्धान्त पर आधारित है? – ऊष्मा गतिकी के सिद्धान्त
    • प्रेशर कुकर में खाना जल्दी क्यों पकता है? – बढ़ा हुआ प्रेशर, उबलन बिन्दु (क्वथनांक) बढ़ा देता है
    • प्रकाश का वेग सर्वप्रथम किसने नापा? – रोमर
    • मौसम के उतार-चढ़ाव अधिकतम कहाँ होते हैं? – सबट्रॉपिक (उपोष्ण प्रदेश)
    • अल्टीमीटर से क्या नापते हैं? – भूतल से ऊँचाई
    • क्रायोजेनिक इंजन का प्रयोग किसमेंहोता है? – रॉकेट में
    • ‘लॉ ऑफ फ्लोटिंग’ का सिद्धान्त किसने दिया था? – आर्किमिडीज ने
    • इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और पोजिट्रॉन इनमें से सबसे बड़ा कण कौन-सा है? – इलेक्ट्रॉन
    • दूध उबालने की स्फूर पश्चयता कितनी होती है? –100°C
    • कौन-सा तत्व रासायनिक रूप में धातु व अधातु दोनों के समान कार्य करता है? – बेरॉन
    • ऐसबेस्टस क्या है? – रेशायुक्त खनिज है
    • कौन-सी फसल, मृदा में नाइट्रोजन यौगिकीकरण को बढ़ाती है? – बीन्स
    • पके हुए अंगूरों में क्या होता है? – ग्लूकोस
    • निम्नलिखित में से किसे ‘जेली फिश’ के नाम से जाना जाता है? — ऑरीलिया
    • वाशिंग मशीन का कार्य किस सिद्धांत पर आधारित है? — अपकेंद्रण
    • न्यून तापमानों (क्रायोजेनिक्स) का अनुप्रयोग होता है? — अंतरिक्ष यात्रा, चुम्बकीय प्रोत्थापन एवं दूरमिति में
    • द्रव बूँद की संकुचित होकर न्यूनतम क्षेत्र घेरने की प्रवृत्ति का कारण होता है? — पृष्ठ तनाव
    • अल्फा कण के दो धन आवेश होते हैं, इसका द्रव्यमान लगभग बराबर होता है — 310
    • जेट इंजन किस सिद्धांत पर कार्य करता है? — रैखिक संवेग संरक्षण
    • नाइट्रोजन के स्थिरीकरण में निम्न में से कौन-सी फ़सल सहायक है? — फली (बीन्स)
  • रेडिएशन को रोकने के लिय पृथ्वी और सूरज के बीच बुलबुला (Space Bubbles) बनाने की तैयारी में वैज्ञानिक

    रेडिएशन को रोकने के लिय पृथ्वी और सूरज के बीच बुलबुला (Space Bubbles) बनाने की तैयारी में वैज्ञानिक

    पृथ्वी लगातार जलवायु परिवर्तन, भयानक सूखा, तूफान, हीट वेव और ग्लेशियर की वजह से समुद्री जलस्तर बढ़ने जैसे विनाश को झेल रही है और इस विनाश को रोकने के लिए एमआईटी के वैज्ञानिकों ने सूर्य और पृथ्वी के बीच ‘स्पेस बबल्स‘ बनाने का प्रस्ताव दिया है। शोधकर्ताओं की कोशिश है कि, सूरज और पृथ्वी के बीच एक विशालकाय बुलबुले (Space Bubbles) का निर्माण किया जाए, ताकि सूरज से धरती की तरफ आने वाली भयानक रेडिएशन को धरती पर पहुंचने से रोका जा सके।

    ब्राजील के आकार का बुलबुला

    वैज्ञानिकों की इस इस जियोइंजीनियरिंग के विचार के मुताबिक, ब्राजील के आकार के एक गोलाकार बुलबुले, जिसे वैज्ञानिक भाषा में इन्फ्लेटेबल बुलबुला (Inflatable Bubbles) कहा जाता है, उसका निर्माण पृथ्वी और सूर्य के बीच किया जाएगा, ताकि रेडिएशन को हमारे ग्रह से टकराने से रोका जा सकेगा। वैज्ञानिकों की टीम ने एक प्रेस रिलीज में कहा है कि, ‘हम सूरज और पृथ्वी के बीच स्पेस बबल का निर्माण करना चाहते हैं, जिसे लिक्विड सिलिकॉन (Liquid Silicon) से बनाया जाएगा और उसे विशालकाय बुलबुला बनाकर सूरज और पृथ्वी के बीच अंतरिक्ष में स्थापित कर दिया जाएगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि, ऐसा करने से सूरज से आने वाली रेडिएशन की किरणें परावर्तित हो जाएंगी और हमें अंतरिक्ष में बड़ी बड़ी फिल्म लांच करने की भी जरूरत नहीं होगी।

    क्या जलवायु परिवर्तन से निपट पायेगा यह बुलबुला  

    वैज्ञानिकों का मानना है कि, सूरज से आने वाले रेडिएशन को इस स्पेस बुलबुले के जरिए पूरी तरह से नहीं रोका जा सकता है, हां उसे रेडिएशन को कम जरूर किया जा सकता है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है, कि ये जलवायु परिवर्तन से निपटने के मौजूदा प्रयासों को रिप्लेस कर देगा। हालांकि, शोधकर्ताओं का मानना है कि, जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जो भी मौजूदा उपाए किए जा रहे हैं, उनमें से ये सबसे ज्यादा बेहतर है।

    सूरज और पृथ्वी के बीच सिलिकॉन से छाता

    अंतरिक्ष में किया गया टेस्ट शोधकर्ताओं का कहना है कि, ये एक तरह से सूरज और पृथ्वी के बीच सिलिकॉन से छाता बनाने जैसा है, जो रेडिएशन को बहुत हद तक रोक सकेगा। वहीं, एमआईटी की सेंसेबल सिटी लैब के मुताबिक, अंतरिक्ष में पृथ्वी और सूरज के बीच बुलबुले का टेस्ट किया जा चुका है और एमआईटी के वैज्ञानिकों का मानना है कि, आने वाले दिनों में सूरज के रेडिएशन को रोकने के लिए अंतरिक्ष बुलबुलों का इस्तेमाल किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि, अंतरिक्ष में किया जाने वाला ये उपाए आने वाले दिनों में काफी सुरक्षित होंगे। वैज्ञानिकों का कहना है कि, अगर हम धरती पर टकराने से पहले 1.8 प्रतिशत सौर रेडिएशन को परावर्तित कर देते हैं, तो हम आज की ग्लोबल वार्मिंग को पूरी तरह से उलट सकते हैं।

    बुलबुलों को कभी भी किया जा सकता है खत्म

    एमआईटी वैज्ञानिकों की तरफ से जारी प्रेस रिलीज में कहा गया है कि, अंतरिक्ष में पृथ्वी और सूरज के बीच जिस बुलबुले का निर्माण किया जाएगा, उसे कभी भी नष्ट किया जा सकता है। इससे सौर जियोइंजीनियरिंग समाधान पूरी तरह से प्रतिवर्ती हो जाएगा और अंतरिक्ष मलबे को काफी कम कर देगा।’ वैज्ञानिकों ने कहा कि, पृथ्वी और सूर्य के बीच का वो क्षेत्र, जहां जेम्स वेब टेलीस्कॉप स्थिति है, वहां पर अंतरिक्ष बुलबुले को रखा जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि, सूरज से निकलने वाले रेडिएशन को परावर्तित करने के लिए वो सबसे सही स्थान है।

    जेम्स अर्ली के विचारों पर आधारित है प्रयोग

    स्पेस बबल्स रिसर्च प्रोजेक्ट वैज्ञानिक जेम्स अर्ली के विचारों पर आधारित है, जिन्होंने पहले लैग्रैंगियन पॉइंट (Lagrange Point) पर एक डिफ्लेक्टिव ऑब्जेक्ट को तैनात करने का सुझाव दिया था, और खगोलविद रोजर एंजेल, जिन्होंने बबल-बेड़ा का प्रस्ताव रखा था। हालांकि जियोइंजीनियरिंग एक साइंस फिक्शन फिल्म की तरह लगती है, लेकिन इसका इस्तेमाल वास्तविक दुनिया में किया जा रहा है। पिछले साल, संयुक्त अरब अमीरात ने 122 डिग्री फ़ारेनहाइट तक के तापमान को कम करने के लिए दुबई में बारिश बनाने के लिए जियोइंजीनियरिंग का इस्तेमाल किया था। बादल का निर्माण ड्रोन तकनीक का उपयोग करके किया गया था, जिसमें बारिश करवाने के लिए बिजली का झटका दिया गया था।

    महासागरों में जियोइंजीनियरिंग का प्रस्ताव 2021 में जारी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंजीनियरिंग एंड मेडिसिन (NASEM) की एक रिपोर्ट ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए और वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को हटाने के लिए पृथ्वी के महासागरों को जियोइंजीनियरिंग करने का प्रस्ताव दिया था। इस आइडिया के तहत छोटे प्रकाश संश्लेषक के विकास को बढ़ाने के लिए उर्वरक जोड़ना, क्षारीयता को बढ़ावा देने के लिए पानी के माध्यम से विद्युत धाराओं को पारित करना और समुद्री जल के कैमिकल साइंस को बदलना शामिल है। स्कॉट डोनी, जो वर्जीनिया विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान में प्रोफेसर हैं और इस रिपोर्ट के लेखक हैं, उन्होंने एक बयान में कहा कि, ‘महासागर कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की रणनीतियों पर पहले से ही वैज्ञानिकों, गैर-सरकारी संगठनों और द्वारा चर्चा की जा रही है। संभावित जलवायु प्रतिक्रिया रणनीतियों के रूप में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है’।

  • Electric Planes – भविष्य का हवाई जहाज – बिना तेल के चलने वाला विमान

    Electric Planes – भविष्य का हवाई जहाज – बिना तेल के चलने वाला विमान

    अंतरिक्ष पर्यटन (Space Tourism) के साथ अब विमानन (Aviation) के क्षेत्र में क्रांतिकारी आविष्कारों की तैयारी हो रही है| कई कंपनियां आधुनिक तकनीक से युक्त विमान विकसित कर रही हैं जो जीवाश्वम ईंधन पर नहीं बल्कि इलेक्ट्रिक मोटर (Electric Motors) की ताकत के जरिए उड़ सकेंगे | कुछ कंपनियां तो इस दशक में ही इस तरह के विमानों का व्यवसायिक उपयोग शुरू करने की योजना बना रहे हैं |

    दुनिया में अभी अंतरिक्ष पर्यटन  की बातें तो होने लगी हैं | अंतरिक्ष अनुसंधानकर्ता ऐसा रॉकेट विकसित करने में लगे हैं  जिससे लोगों को अंतरिक्ष में पहुंचाने की लागत बहुत कम हो सके | इस लिहाज से देखा जाए तो हमारा विमानन या उड्डयन (Aviation) का क्षेत्र भी पीछे नहीं रहा हैं | विशेषज्ञ विमान तकनीक में नए नवाचारों पर काम रहे हैं जिसमें व्यवसायिक विद्युतीय विमानन (Electrical Aviation) भी शामिल है |

    इनमें से फैराडेयर एविएशन (Faradair Aviation) का हाइब्रिड इलेक्ट्रिक यात्री विमान (Hybrid Electric Passenger Plane), राइट इलेक्ट्रिक का विमान (Wright Electric is an American startup company developing an electric airliner), इजराइल का  ईविएशन का एलिस (Eviation Alice), जैसे विमानों पर काम चल रहा है| फैराडेयर कंपनी एक हाइब्रिड-इलेक्ट्रिक विमान की अवधारणा विकसित कर रही है जो क्षेत्रीय उड़ान विकास में बाधा डालने वाली तीन मुख्य समस्याओं (संचालन लागत(Operation Costs), उत्सर्जन (Emissions ), शोर (Noise) को हल करती है।

    फैराडेयर का विमान (Faradair’s plane)

    यूके में एक स्टार्टअप इसी व्यवसायिक इलेक्ट्रिफाइट एविएशन पर काम कर रहा है| क्षेत्रीय विमानन बाजार को देखते हुए फैराडेयर एविएशन कंपनी एक हाइब्रिड इलेक्ट्रिक यात्री विमान को विकसित पर बेचने की योजना पर काम कर रही है| इसमें 19 सीटें होंगी और इसके पंखों को चलाने के ले इलेक्ट्रिक मोटर ही काफी होगी| इसके लिए जरूरी बिजली एक छोटे से गैसे टर्बाइन से आएगी|

    विमान की विशेषता

    इतना ही नहीं अतिरिक्त उठाव के लिए और छोटी हवाई पट्टी पर उड़ान भरने और उतरने के लिए भी इन विमानों में त्रिस्तरीय पंख होंगे इनसे शानदार एरोडायनामिक्स होने के बाद भी वे वर्ल्ड वार वन फाइटर प्लेन के जैसे दिखाई देते हैं| कंपनी के प्रमुख नील क्लॉग्ले का दावा है कि ऐसे विमानों में परम्परागत प्रोपेलर की तुलना में हिलने वाले कम पुर्जे होंगे| इससे वह सस्ता होने के साथ ज्यादा शांत और कम उत्सर्जन पैदा करने वाला विमान होगा|

    विमानों का उपयोग

    इस तरह के किफायती विमानों पर काम केवल यात्रियों के लिए ही नहीं बल्कि माल ढोने वाले विमानों पर भी चल रहा है| ऐसे विमान रेलवे लाइन बिछाने या सड़क बनाने के खर्चे को भी बचा सकते हैं| फैराडेयर 2025 तक इस तरह के विमान की उड़ान शुरू कर सकता और 2027 से उनका व्यवसायिक उपयोग भी शुरू हो जाएगा|

    कैलिफोर्निया की राइट इलेक्ट्रिक (Wright Electric) का plane

    लेकिन इस क्षेत्र में केवल फैराडेयर ही अकेली कंपनी नहीं है| कैलिफोर्निया की राइट इलेक्ट्रिक भी 100 सीटों वाला पूरी तरह से इलेक्ट्रिक एयरक्राफ्ट बनाने की तैयारी में है और इस सदी के मध्य में लोगों को उपलब्ध कराने की भी तैयारी कर रही है| यह विमान वर्तमान बे146 पर आधारित होगा जिसके टर्बोफैन इंजन की जगह इलेक्ट्रिक मोटर होंगी| कंपनी की ईजीजेट से साझेदारी भी होगी और यह लंदन –पेरिस, न्यूयॉर्क वॉशिंगटन या हॉन्गकॉन्ग ताईपेई के बीच एक घंटे वाली उड़ान भी मुहैया कराएगी|

    हाइब्रिड से इलेक्ट्रिक तक का सफ़र

    ये विमान अभी हाइब्रिट विमान की तरह ही होंगे जिसमें केवल चार इंजन को ही इलक्ट्रिक मोटर से बदला जाएगा| और बाकियों को सफल परीक्षणों के बाद ही बदला जाएगा| कंपनी का कहना है कि इससे ग्राहकों में एक विश्वास विकसित करने में मदद मिलेगी| कार उद्योग भी इस तरह से बदलाव ला रहा है| लेकिन विमानन में बैटरी का उपयोग एक बड़ी चुनौती है|

    इजराली ईविएशन कंपनी का विमान

    इजराइल की एक कंपनी ईविएशन एक नौ सीटों वाला विमान विकसित कर रही है|  छोटी श्रेणी का यह विमान कई सालों से विकसित किया जा रहा है| इसे 600 मील तक की उड़ान के लिए डिजाइन किया गया है और यह पूरी तरह से इलेक्ट्रिक है| वहीं विशाल हाइब्रिड विमान 500 किलोमीटर की दूरी तय कर सकेंगे|

    यूरोपीय विमानन कंपनी एयरबस ने 2017 वमें अपने प्रोटोटाइप हाइब्रिड विमान ई-फैन एक्स पर काम करना शुरू किया था| यह राइट इलेक्ट्रिक्स के BAe 146 पर आधारित था| लेकिन तीन साल बाद इस कार्यक्रम को रद्द कर दिया गया| इसके अलावा एयर बस हाइड्रोजन ऊर्जा के उपयोग पर भी काम कर रही है| कंपनी की टीम क्रायोजेनिक और सुपरकंडक्टिंग तकनीकों पर काम रही हैं| कंपनी का लक्ष्य साल 2035 तक हाइड्रोजन आधारित व्यवसायिक उड़ान भरने का है|

  • वैज्ञानिकों को मिला सबसे विशाल बैक्टीरिया थियोमार्गरीटा मैग्निफा, बिना माइक्रोस्कोप के दिखने वाला पहला Bacteria

    वैज्ञानिकों को मिला सबसे विशाल बैक्टीरिया थियोमार्गरीटा मैग्निफा, बिना माइक्रोस्कोप के दिखने वाला पहला Bacteria

    वैज्ञानिकों ने एक ऐसे जीवाणु (Bacteria) की खोज की है, जो नंगी आंखों से भी दिखता है। अगर इंसान से तुलना करें तो इसका आकार दूसरी बैक्टीरिया के मुकाबले इतना ही विशालकाय है, जैसे मानव के लिए माउंट एवरेस्ट। गौरतलब है कि बैक्टीरिया से पृथ्वी का बहुत ही नजदीकी रिश्ता है। इंसान के शरीर में अनगिनत बैक्टीरिया होते हैं। ऐसा पहली बार हुआ है, जब इतना बड़ा बैक्टीरिया मिला है, जिसे हम बिना माइक्रोस्कोप की मदद से भी देख सकते हैं।

    थियोमार्गरीटा मैग्निफा (Thiomargarita Magnifica) की खोज

    कैरिबियन द्वीप समूह में मैंग्रोव के दलदल में दुनिया का सबसे विशाल बैक्टीरिया की खोज की गई है। वैज्ञानिकों को यह भी अनुमान लग रहा है कि किस वजह से इस बैक्टीरिया ने इतना विशाल आकार विकसित किया होगा। इस बैक्टीरिया को थियोमार्गरीटा मैग्निफा (Thiomargarita Magnifica) नाम दिया गया है, जो ज्यादातर जीवाणुयों की तुलना में 5,000 गुना विशाल है। जबकि, अबतक जितने भी विशाल बैक्टीरिया की जानकारी है, उनसे भी यह 50 गुना ज्यादा बड़ा है (इसके नाम में मैग्निफिका का संदर्भ लैटिन में ‘बड़ा’ और फ्रेंच शब्द मैग्निफिक्यू से है)।

    नंगी आंखों से दिखता है ये बैक्टीरिया

    इस शोध के लीड ऑथर और कैलिफोर्निया के मरीन बायोलॉजिस्ट जीन-मैरी वोलैंड ने इसकी विशालता के बारे में कहा कि, ‘इसका संदर्भ देखने के लिए, इसे ऐसे समझा जा सकता है, जैसे एक इंसान का सामना माउंट एवरेस्ट के रूप में दूसरे इंसान से होता है।’ दरअसल, इसकी सबसे बड़ी विशेषता ही यही है कि किसी भी बैक्टीरिया को देखने के लिए माइक्रोस्कोप की आवश्यकता होती है, लेकिन यह इतना अनोखा है कि इसे नंगी आंखों से भी देखा जा सकता है।

    करीब एक सेंटीमीटर है थियोमार्गरीटा मैग्निफा की लंबाई

    थियोमार्गरीटा मैग्निफा का आकार लगभग इंसान के पलकों जितनी है और यह करीब एक सेंटीमीटर लंबा है। एक सामान्य बैक्टीरिया प्रजाति की लंबाई 1 से 5 माइक्रोमीटर होती है। जबकि, इस प्रजाति की औसत लंबाई 10,000 माइक्रोमीटर है। इनमें से कुछ तो इससे भी करीब दोगुनी हैं। बैक्टीरिया एक कोशिका वाला जीव है, जो धरती पर हर जगह मौजूद है। कुछ तो पारिस्थितिक तंत्र और अधिकांश जीवित चीजों के लिए बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं।

    पृथ्वी का पहला जीव है बैक्टीरिया

    माना जाता है कि पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत बैक्टीरिया से ही हुई और अरबों साल बाद भी इसकी संरचना काफी सामान्य है। हमारे शरीर में भी अनगिनत बैक्टीरिया मौजूद हैं, जिनमें से कुछ ही ऐसे होते हैं, जो गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं। बाकी हमारे शरीर में अच्छे जीवाणुओं की काफी जरूरत रहती है। यह शोध डिसकवरी साइंस जर्नल में विस्तार से प्रकाशित किया गया है।

    मैंग्रोव के दलदल में अनेक चीजों से चिपका मिला

    फ्रेंच वेस्ट इंडीज और गुयाना यूनिवर्सिटी के एक को-ऑथर और बायोलॉजिस्ट ओलिवियर ग्रोस ने 2009 में ग्वाडेलोप द्वीपसमूह में भी मैंग्रोव के पत्तों से चिपके हुए इस जीवाणु का पहला सैंपल देखा था। लेकिन, इसके विशाल आकार की वजह से वह तत्काल नहीं जान पाए थे कि एक यह बैक्टीरिया था। बाद में जेनेटिक एनालिसिस से यह खुलासा हुआ कि वह जीव एक कोशिका वाला बैक्टीरिया ही था। ग्रोस ने पाया कि बैक्टीरिया दलदल में सीप के शेल, चट्टानों और ग्लास की बोतलों से भी चिपका हुआ था।

    अपनी रक्षा के लिए विशाल बना थियोमार्गरीटा मैग्निफा (Thiomargarita Magnifica)!

    वैज्ञानिक इसे अभी लैब कल्चर में विकसित नहीं कर पाए हैं, लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि इसकी कोशिका में एक ऐसी संरचना है,जो बैक्टीरिया के लिए असामान्य है। शोधकर्ताओं का कहना है कि वे निश्चित नहीं हैं कि जीवाणु इतना बड़ा क्यों है, लेकिन को-ऑथर वोलैंड का अनुमान है कि छोटे जीवों से खाए जाने से बचने के लिए इसने इतना विशाल स्वरूप धारण किया हो सकता है।

  • चंद्रमा को एक्‍स्‍प्‍लोर करने वाला आर्टिमिस समझौते में सहयोगी बना सऊदी अरब – 21वां देश बना

    चंद्रमा को एक्‍स्‍प्‍लोर करने वाला आर्टिमिस समझौते में सहयोगी बना सऊदी अरब – 21वां देश बना

    14 जुलाई 2022 को सऊदी स्‍पेस कमीशन के CEO मोहम्मद सऊद अल-तमीमी ने सऊदी अरब किंगडम की ओर से आर्टेमिस समझौते (Artemis Accords) पर हस्ताक्षर किए। आर्टेमिस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला सऊदी अरब सातवां देश है और इसमें शामिल होने वाला चौथा मिडिल ईस्‍ट का देश है। यह समझोता मानवता के लिए अंतरिक्ष के लाभकारी उपयोग को बढ़ावा देने वाले सिदान्तों पर आधारित है l

    क्या है आर्टेमिस-1 मिशन (Artemis Accords) ?

    आर्टेमिस-1 मिशन के जरिए चंद्रमा को एक्‍स्‍प्‍लोर किया जाएगा। इसका स्‍पेसक्राफ्ट चार से छह सप्ताह में पृथ्वी से 280,000 मील की यात्रा करेगा। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा इस मिशन को लेकर तेजी से काम पूरे कर रही है। आर्टेमिस समझौते के सिद्धांत, 1967 की आउटर स्‍पेस ट्रिटी पर आधारित हैं और नासा के आर्टेमिस प्रोग्राम को आगे बढ़ाते हैं। यह प्रोग्राम एक बार फ‍िर से इंसानों को चंद्रमा पर उतारेगा साथ ही मंगल ग्रह पर मानव मिशन के लिए रास्ता तैयार करेगा। 

    आर्टेमिस-1 मिशन के जरिए चंद्रमा को एक्‍स्‍प्‍लोर किया जाएगा। यह स्‍पेसक्राफ्ट चार से छह सप्ताह में पृथ्वी से 280,000 मील की यात्रा करेगा। हालांकि मिशन की लॉन्चिंग में देरी हुई है। नासा ने पिछले साल नवंबर में आर्टेमिस-1 को लॉन्च करने की योजना बनाई थी। तब से अबतक इसमें देरी ही हो रही है। 

    आर्टेमिस प्रोग्राम एक व्यापक और विविध अंतरराष्ट्रीय गठबंधन पर निर्भर है। इस समझौते में शामिल होने के बाद अमेरिका और सऊदी अरब मिलकर आउटर स्‍पेस में अनिश्चितता को कम करेंगे और स्‍पेस ऑपरेशंस की सुरक्षा में वृद्धि करेंगे। सऊदी अरब से पहले कई और देश इस समझौते पर हस्‍ताक्षर कर चुके हैं।

    इनमें ऑस्ट्रेलिया, बहरीन, ब्राजील, कनाडा, कोलंबिया, फ्रांस, इजराइल, इटली, जापान, कोरिया गणराज्य, लक्जमबर्ग, मैक्सिको, न्यूजीलैंड, पोलैंड, रोमानिया, सिंगापुर, यूक्रेन, यूएई और ब्रिटेन जैसे देश हैं। समझौते पर हस्‍ताक्षर करने वाला सऊदी अरब 21वां देश है।  

    यह प्रोग्राम अपने तय समय से काफी पीछे है। मई में नासा ने इस मिशन की लॉन्चिंग के लिए कुछ और संभावित तारीखों के बारे में बताया था। एजेंसी जुलाई से दिसंबर 2022 का वक्‍त लेकर चल रही है। मिशन के तहत ओरियन स्‍पेसक्राफ्ट को स्‍पेस लॉन्‍च सिस्‍टम (SLS) रॉकेट पर पर अंतरिक्ष में भेजा जाएगा।

    बीते दिनों एसएलएस रॉकेट को वेट ड्रेस रिहर्सल से भी गुजारा गया था। कुछ समय पहले ही नासा ने बताया था कि उसकी टीमें आर्टेमिस मिशन के प्रमुख हिस्सों को भी टेस्‍ट कर रही हैं, जिन्‍हें पहले दो मिशन के बाद लॉन्‍च किया जाना है। ये आर्टिमिस-3, 4 और 5 मिशन होंगे। 

  • स्पेसवॉक करने वाले अंतरिक्ष यात्री महसूस करते है हर 90 मिनट में एक सूर्योदय और सूर्यास्त

    स्पेसवॉक करने वाले अंतरिक्ष यात्री महसूस करते है हर 90 मिनट में एक सूर्योदय और सूर्यास्त

    हाल ही में सोशल मीडिया यूजर्स के लिए इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (International Space Station) ने एक सवाल-जवाब का सेशन रखा।

    मौका था जब स्पेस स्टेशन के दो अंतरिक्ष यात्री 7 घंटे का स्पेसवॉक करके स्पेस स्टेशन में वापस लौटे थे। इनमें एक जापान के अखिखो होशिदे और दूसरे फ्रांस के थोमस पेस्क्वेस्ट थे। दोनों ही यात्रियों से ट्विटर यूजर्स ने कई उत्सुकता भरे सवाल किए।  अखिखो होशिदे और थोमस पेस्क्वेस्ट स्पेसशिप से बाहर एक सपोर्ट ब्रेकेट को इंस्टॉल करने के लिए निकले थे, ताकि आने वाले समय में स्पेस स्टेशन से तीसरा सोलर एर्रे अटैच किया जा सके। दोनों अंतरिक्ष यात्रियों ने अपना मिशन सफलतापूर्वक पूरा किया। इस साल के अंदर होने वाला यह 12वां स्पेसवॉक था। 

    इस बातचीत के दौरान एक यूजर ने पूछा कि क्या उनके अंतरिक्ष सूट के अंदर तापमान में कुछ अंतर महसूस होता है? ISS के ऑफिशिअल ट्विटर हैंडल से जवाब आया, ” स्पेसवॉक करने वाले अंतरिक्ष यात्री हर 90 मिनट में एक सूर्योदय और सूर्यास्त महसूस करते हैं।” साथ ही उन्होंने तापमान में अंतर वाली बात पर जो खुलासा किया, वह भी चौंकाने वाला था। 

    इस अद्भुत घटना के बारे में विस्तार से बताते हुए नासा के एक्सपर्ट ने कहा कि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन हर 90 मिनट के अंदर पृथ्वी का गोल चक्कर काट लेता है जिससे हर 45 मिनट के अंदर उनको एक सूर्यास्त और अगले 45 मिनट के अंदर एक सूर्योदय दिखाई देता है। यानि कि हर 90 मिनट में वो एक सूर्योदय और सूर्यास्त देख लेते हैं। इसके अलावा ये भी बताया कि इस दौरान तापमान में भारी अंतर आता है। सूर्यास्त के समय तापमान -250 डिग्री और सूर्योदय के समय यह 250 डिग्री फॉरेनहाइट होता है। स्पेस सूटों में इस तरह के कपड़े का इस्तेमाल किया गया होता है कि उनके ऊपर इस बदलते तापमान का ज्यादा असर नहीं पड़ता है। 

    चूंकि नासा ने इस साल इंटरनेशनल स्पेसस्टेशन को कमर्शियल इस्तेमाल के लिए भी खोल दिया है, इसलिए वहां पर ऊर्जा की खपत भी बढ़ गई है। इसलिए टीम वहां पर मौजूद 8 चैनलों में से 6 चैनलों को अपग्रेड करने पर काम कर रही है ताकि आने वाले समय में पर्याप्त पावर सप्लाई उपलब्ध हो सके। 

  • क्या सोते समय हमारा दिमाग काम नही करता है ?

    क्या सोते समय हमारा दिमाग काम नही करता है ?

    नेचर न्यूरोसाइंस (Nature Neuroscience) में प्रकाशित हुए शोध के मुताबिक,  जब हम सोते हैं तो हमारी चेतना की एक खासियत काम करना बंद कर देती है |

    जब हम सपने देखते हैं, तो हमारे दिमाग में कुछ रहस्यमय चीजें होती हैं. ऐसा लगता है जैसे हम जाग रहे हों, लेकिन यह स्थिति जागने से काफी अलग होती है. वैज्ञानिक इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि इन दोनों स्थितियों के बीच क्या होता है. अब एक और सुराग मिला है |

    चेतना (Consciousness) की एक खास विशेषता होती है – आवाजों को पहचानने की क्षमता. एक नए अध्ययन से पता चला है कि सोते समय हमारी यह क्षमता काम करना बंद कर देती है. इससे हमें यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि हमारा दिमाग सपने कैसे देखता है |

    https://www.sciencealert.com/we-lose-one-crucial-feature-of-consciousness-while-we-re-asleep

    मिर्गी के रोगियों ने की शोध में मदद

    लोगों के जागते और सोते समय उनके दिमाग की मैपिंग (Brain Mapping) करना आसान नहीं होता. इसलिए शोधकर्ताओं ने मिर्गी के रोगियों (Epilepsy patients) पर की जा रही रिसर्च का सहारा लिया |

    इज़राइल की तेल अवीव यूनिवर्सिटी (Tel Aviv University, Israel) के न्यूरोसाइंटिस्ट युवल नीर (Yuval Nir) का कहना है कि उन्हें ऐसे खास मेडिकल प्रोसीज़र की मदद मिली जिसमें मिर्गी के रोगियों के दिमाग में इलेक्ट्रोड लगाए गए थे और इलाज के लिए उनके दिमाग के अलग-अलग हिस्सों में हो रही गतिविधियों को मॉनिटर किया गया था |

    8 साल तक चला शोध

    नीर ने कहा कि मरीजों ने सोते और जागते समय, सुनने की स्थिति (Auditory stimulation) पर दिमाग की प्रतिक्रिया जानने में शोधकर्ताओं की मदद की | अब, इलेक्ट्रोड की मदद से, शोधकर्ता नींद की अलग-अलग अवस्थाओं और जागते हुए, सेरिब्रल कॉर्टेक्स (Cerebral cortex) की प्रतिक्रिया में अंतर देख पा रहे थे. रिसर्च के लिए, शोधकर्ताओं ने मरीज़ों को सोते समय स्पीकर से अलग-अलग तरह की आवाज़ें सुनाईं. यह शोध करीब आठ सालों तक चला | इस दौरान करीब 700 से ज़्यादा न्यूरॉन्स का डेटा इकट्ठा किया गया |

    शोधकर्ताओं ने पाया कि नींद के दौरान भी मरीज़ों का दिमाग आवाजों के प्रति प्रतिक्रियाएं देता रहा. ध्यान और अपेक्षा से जुड़ी वेव्स, अल्फा-बीटा वेव्स (Alpha-beta waves) का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया | इसका मतलब था कि मरीजों के दिमाग ने आने वाली आवाजों का विश्लेषण तो किया, लेकिन दिमाग ने उस विश्लेषण के नतीजे, चेतना को नहीं भेजे. पहले ये माना जाता था कि नींद के दौरान, आवाजों से जुडे संकेत, दिमाग में बहुत जल्दी खत्म हो जाते हैं. जबकि इस शोध से पता चला है कि ये वास्तव में ज़्यादा मजबूत बने रहते हैं |

    अल्फा-बीटा वेव्स के पैटर्न में बढ़ोतरी वाला बदलाव पहले उन मरीज़ों में भी देखा गया था जिन्हें एनेस्थीसिया दिया गया था |

    इससे वैज्ञानिकों को ये मापने का एक विश्वसनीय तरीका भी मिलता है कि मरीज कोमा में या ऑपरेशन के दौरान वास्तव में बेहोश है या नहीं |

  • वैज्ञानिकों ने खोजा शरीर का नया अंग

    वैज्ञानिकों ने खोजा शरीर का नया अंग

    वैज्ञानिकों ने हाल ही में शरीर के एक ऐसे हिस्से का खुलासा किया है जिसका वर्णन पहले कभी नहीं किया गया था | मास्सेटर में मांसपेशियों की एक गहरी परत, जो निचले जबड़े को ऊपर उठाती है और चबाने के लिए महत्वपूर्ण होती है। आधुनिक शरीर रचना विज्ञान पाठ्यपुस्तकों में दो परतों, एक गहरी और एक सतही होने के रूप में बड़े पैमाने पर पेशी का वर्णन किया गया है।

    “हालांकि, कुछ ऐतिहासिक ग्रंथों में तीसरी परत के संभावित अस्तित्व का भी उल्लेख है, लेकिन वे इसकी स्थिति के अनुसार बेहद असंगत हैं,” एनाटॉमी का इतिहास पत्रिका के ऑनलाइन संस्करण में 2 दिसंबर को प्रकाशित एक नई रिपोर्ट में लेखकों ने लिखा है। इसलिए टीम ने यह जांचने का फैसला किया कि क्या प्रमुख जबड़े की मांसपेशियों में एक छिपी, सुपर-गहरी परत हो सकती है, जैसा कि ऐतिहासिक ग्रंथों से पता चलता है।

    ऐसा करने के लिए, उन्होंने 12 मानव शवों के सिरों को विच्छेदित किया जिन्हें फॉर्मलाडेहाइड में संरक्षित किया गया था; रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने 16 “ताजा” शवों का सीटी स्कैन भी लिया और एक जीवित विषय से एमआरआई स्कैन की समीक्षा की। इन परीक्षाओं के माध्यम से, उन्होंने द्रव्यमान पेशी की “शारीरिक रूप से विशिष्ट” तीसरी परत की पहचान की।