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  • सोलर कुकर (Solar Cooker) क्या होता है ?

    सोलर कुकर (Solar Cooker)

    इस उपकरण में सौर ऊर्जा का संग्रहण करके उसका उपयोग खाना बनाने में किया जाता है। सूर्य के प्रकाश का लगभग 1/3 भाग अवरक्त प्रकाश होता है जो उस वस्तु को गरम कर देता है जिस पर भी पड़ता है। 

    कैसे बना होता है ?

    यह एक फाइबर ग्लास का बना एक Box होता है। जिसके अन्दर का भाग काले रंग से रंग दिया जाता है क्योंकि काला रंग ऊष्मा को लगभग पूर्णत: अवशोषित करता है। Box का ऊपरी भाग मोटी कांच की प्लेटो द्वारा ढक दिया जाता है।

    बॉक्स के ढक्कन पर अन्दर की तरफ एक समतल दर्पण लगा होता है जो सूर्य के प्रकाश को उसके अन्दर परावर्तित करता है। बॉक्स के अन्दर ऐलुमिनियम के बर्तन रखे जाते हैं जो बाहर से काले रंग से रंगे होते हैं। इन बर्तनों में सब्जियां, आदि पकाने के लिए रखी जाती है। 

    कैसे काम करता है ?

    सौर कुकर को धूप में रखा जाता है तथा ढक्कन को इस प्रकार मोड़कर रखा जाता है, कि सूर्य का प्रकाश समतल दर्पण से परावर्तित होकर सौर कुकर के अंदर प्रवेश करे। बॉक्स के अन्दर का काला रंग तथा बर्तनों के बाहर का काला रंग ऊष्मा को अवशोषित करता है।

    बॉक्स के ऊपर रखी हुई कांच की प्लेट ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करती है जिसके कारण बॉक्स के अन्दर का ताप बढ़ता जाता है और खाने की वस्तुएं पक जाती है।

  • प्रत्यानयन बल (Restoring Force)क्या होता है ?

    कम्पन करने वाले कण जब अपनी साम्य स्थिति (या मध्यमान स्थिति) में होता है, तो उस पर नेट बल शून्य कार्य करता है तथा कण विराम अवस्था में होता है, किन्तु जब कण को साम्य स्थिति से विस्थापित कर दिया जाता है, तो उस पर एक ऐसा बल कार्य करने लगता है जो सदैव साम्य स्थिति की ओर दिष्ट होता है।

    इस बल को ‘प्रत्यानयन की ओर दिष्ट होता है। इस बल को ‘प्रत्यानयन बल’ कहते हैं। इस बल का प्रयास सदैव यही होता है, कि कण साम्य स्थिति में आ जाए। इस बल के कारण ही कण में त्वरण उत्पन्न होता है और वह दोलन करता है। 

  • ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के नियम

    ऊष्मागतिकी (Thermodynamics)

    भौतिकी की वह शाखा जिसके अन्तर्गत ऊष्मीय ऊर्जा का यान्त्रिक ऊर्जा, रासायनिक ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा के साथ सम्बन्ध हो, ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) कहलाता है। हम अपने दैनिक जीवन में देखते हैं, कि यान्त्रिक ऊर्जा को ऊष्मा बदला जा सकता है। (उदाहरण के लिए, हाथों को आपस में रगड़ने ऊष्मा उत्पन्न होती है) तथा ऊष्मा को यान्त्रिक ऊर्जा में बदला जा सकता है (उदाहरण के लिए, वाष्य इंजन में)। 

    ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम (First Law of Thermodynamics)

    यदि यान्त्रिक ऊर्जा (अथवा कार्य) को ऊष्मा में परिवर्तित किया जाए तो किया गया कार्य, उससे उत्पन्न ऊष्मा के तुल्य होता है।’ इसे ‘ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम’ कहते हैं। 

    प्रथम नियम का दूसरा रूप

    ऊर्जा की न तो उत्पत्ति होती है और न विनाश, इसका एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तन हो सकता है।’ उदाहरण के लिए, आंतरिक ऊर्जा का गतिज ऊर्जा में परिवर्तन। 

    ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम (Second Law of Thermodynamics)

    ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम ऊष्मा के प्रवाहित होने की दिशा को व्यक्त करता है। इस नियम के अनुसार

    (1) ऊष्मा का पूर्णतया कार्य में परिवर्तन असम्भव है एवं

    (2) ऊष्मा अपने कम ताप की वस्तु से अधिक ताप की वस्तु की ओर प्रवाहित नहीं हो सकती जब तक कि बाहरी ऊर्जा का उपयोग न किया जाए। 

    ऊष्मागतिकी का तीसरा नियम

    किसी पदार्थ या निकाय (System) तन्त्र के तापमान को परम शून्य तक नहीं घटाया जा सकता है।’ अर्थात् परम शून्य तापमान प्राप्त करना असम्भव है। 

  • आवर्त गति क्या होती है ?

    आवर्त गति (Periodic Motion)

    एक निश्चित पथ पर गति करती वस्तु जब एक निश्चित समय-अन्तराल के पश्चात् बार-बार अपनी पूर्व गति को दुहराती है, तो इस प्रकार की गति को ‘आवर्त गति‘ कहते हैं।

    आवर्त काल

    गति को दुहराने का तात्पर्य है, कि किसी निश्चित समय-अन्तराल पर वस्तु अपने मार्ग में स्थित किसी बिन्दु को किसी निश्चित दिशा में पार करती हुई बार-बार दिखायी दे। इस निश्चित समय-अन्तराल को जिसमें वस्तु उसी बिन्दु उसी दिशा में जाने वाली स्थिति में पुनः आ जाती है ‘आवर्तकाल‘ (Time period) कहते हैं। आवर्तकाल T द्वारा सूचित किया जाता है। आवर्तकाल का मात्रक प्रति सेकण्ड होता है। 

    पृथ्वी सूर्य के चारों ओर आवर्त गति करती है जिसका आवर्त काल एक वर्ष होता है। घड़ी की सुइयां भी आवर्त गति करती हैैं !