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  • ध्वनि का सुनाई देना तथा अपवर्तन क्या होता है ?

    अभिग्रहण (सुनाई देना)

    सामान्यतः हमें ध्वनि की अनुभूति अपने कानों के द्वारा होती है। जब किसी कम्पित वस्तु से चलने वाली ध्वनि-तरंगें हमारे कान के पर्दे से टकराती हैं, तो पर्दे में भी उसी प्रकार के कम्पन होने लगते हैं। इससे हमें ध्वनि का अनुभव होता है।

    ध्वनि का अपवर्तन (Refraction of Sound)

    जब ध्वनि की तरंगें एक माध्यम से चलकर दूसरे माध्यम के पृष्ठ से टकराती हैं, तो उनमें से कुछ दूसरे माध्यम में ही अपने पथ से कुछ विचलित होकर चली जाती है। इस प्रकार ध्वनि तरंगों का अपने पथ से विचलित हो जाना ही उनका ‘अपवर्तन’ कहलाता है।

    अपवर्तन के कारण

    ध्वनि के अपवर्तन का कारण है विभिन्न माध्यमों तथा विभिन्न तापों पर ध्वनि की चाल का भिन्न-भिन्न होना। अपवर्तन के कुछ परिमाण हैं—दिन में ध्वनि का केवल ध्वनि के स्रोत के पास के क्षेत्रों में ही सुनाई देना और रात्रि में दूर-दूर तक सुनाई देना, समुद्र में उत्पन्न की गई ध्वनि का दूर-दूर तक सुनाई देना।

    इन घटनाओं का एक कारण अपवर्तन है, दूसरा कारण नमी युक्त वायु का घनत्व कम होना तथा फलत: उसमें ध्वनि की चाल का अधिक होना।

  • ध्वनि का संचरण क्या होता है ?

    संचरण

    ध्वनि के एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में किसी-न-किसी पदार्थ के माध्यम (गैस, द्रव अथवा  ठोस) का होना आवश्यक है। ध्वनि निर्वात में होकर नहीं चल सकती।

    ध्वनि का माध्यम प्रत्यास्थता एवं घनत्व पर निर्भर करती है, जिस पदार्थ के माध्यम प्रत्यास्थ नहीं होते उसमें अधिक दूरी तक ध्वनि का संरचरण नहीं हो पाता।

    इसके विपरीत कोई माध्यम जितना अधिक प्रत्यास्थ होगा उसमें ध्वनि की चाल उतनी ही अधिक होगी। इस कारण ठोस वस्तुओं में द्रव तथा गैसों की अपेक्षा ध्वनि की चाल अधिक होती है।

    उदाहरण

    दैनिक जीवन में किसी ध्वनि-स्रोत से उत्पन्न ध्वनि प्रायः वायु में होकर हमारे कान तक पहुंचती है परन्तु ध्वनि द्रव व ठोस में होकर भी चल सकती है। यही कारण है, कि गोताखोर जल के भीतर होने पर भी ध्वनि को सुन लेता है।

    इसी प्रकार रेल की पटरी से कान लगाकर बहुत दूर से आती हुई रेलगाड़ी की ध्वनि सुनी जा सकती है। ध्वनि किसी भी माध्यम में अनुदैर्ध्य तरंगों के रूप में चलती हैं। 

  • श्रव्य, अपश्रव्य एवं पराश्रव्य तरंगें क्या होती हैं ?

    ध्वनि तरंगों को आवृत्तियों के एक बहुत बड़े परास तक उत्पन्न किया जा सकता है। इस आधार पर उन्हें तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

    श्रव्य तरंगें (Audible Waves)

    जिन तरंगों को हमारा कान सुन सकता है उन्हें ‘श्रव्य’ तरंगें कहते हैं। इन तरंगों की आवृत्ति 20 से लेकर 20,000 हर्ट्ज तक होती है। इन निम्नतम तथा उच्चतम आवृत्तियों को ‘श्रव्यता की सीमाएं’ (Limits of audibility) कहते हैं। श्रव्य तरंगों के स्रोत हैं-वाक्-तन्तु (मनुष्य तथा जानवरों की आवाजें), कम्पित डोरिया (वायलिन, सितार, इत्यादि), कम्पित छड़ें (स्वरित्र द्विभुज), कम्पित प्लेटें व झिल्लियां (घण्टी, ढोल, लाउडस्पीकर, तबला, आदि) तथा वायु-स्तम्भ (माउथ आर्गन)। 

    अपश्रव्य तरंगें (Infrasonic Waves)

    उन अनुदैर्ध्य यान्त्रिक तरंगों को जिनकी आवृत्तियां निम्नतम श्रव्य आवृत्ति (20 हर्ट्ज) से नीचे होती हैं ‘अपश्रव्य तरंगें’ कहते हैं। इस प्रकार की तरंगों को बहुत बड़े आकार के स्रोतों से उत्पन्न किया जा सकता है। भूचाल के समय पृथ्वी में बहुत लम्बी तरंगें चलती हैं। ये अपश्रव्य तरंगें हैं। हमारे हृदय की धड़कनों की आवृत्ति भी अपश्रव्य तरंगों के समान होती है। 

    पराश्रव्य तरंगें (Ultrasonic Waves)

    उन अनुदैर्ध्य यान्त्रिक तरंगों को जिनकी आवृत्तियां उच्चतम श्रव्य आवृत्ति (20,000 हर्ट्ज) से ऊची होती हैं, ‘पराश्रव्य तरंगे’ कहते हैं। इन तरंगों को गाल्टन की सीटी द्वारा तथा दाब-विद्युत प्रभाव (Piezo-electric effect) की विधि द्वारा क्वार्ट्ज और जिंक ऑक्साइड के क्रिस्टल के कम्पनों से उत्पन्न करते हैं।

    इन तरंगों की आवृत्ति बहुत ऊंची होने के कारण ये अपने साथ बहुत ऊर्जा ले जाती है। साथ ही इनकी तरंग दैर्ध्य बहुत छोटी होने के कारण इन्हें एक पतले किरण-पुंज के रूप में बहुत दूर तक भेजा जा सकता है। इन गुणों के कारण इन तरंगों के अनेक लाभदायक उपयोग हैं

    पराश्रव्य तरंगों के उपयोग

    • संकेत (Signal) भेजना: इन तरंगों द्वारा किसी विशेष दिशा में संकेत भेजे जा सकते हैं क्योंकि ये तरंगें बहुत पतले किरण-पुंज के रूप में बहुत दूर तक जा सकती है।
    • समुद्र की गहराई ज्ञात करना व छिपे पदार्थों का पता लगाना: इन तरंगों से समुद्र की गहराई तथा समुद्र में डूबी हुई चट्टानों, मछलियों तथा पनडुब्बियों की स्थितियां ज्ञात की जा सकती है। इन तरंगों के द्वारा उड़ते हुए हवाई जहाज की पृथ्वी से ऊंचाई नापी जा सकती है। 
    • सोनार (SONAR-Sound Navigation and Ranging): यह एक ऐसी विधि तथा युक्ति है जिसके द्वारा समुद्र में डूबी हुई वस्तु का पता लगाया जाता है। इसमें पहले पराश्रव्य तरंगों को समुद्र के अन्दर भेजा जाता है। ये तरंगें डूबी हुई वस्तु से परावर्तित होकर वापस लौटती है। जितने समय में ये तरंगें जाती है और वापस लौटती हैं उसे ज्ञात कर लिया जाता है।
    • उद्योगों में: आजकल इन तरंगों का उपयोग कीमती कपड़ों तथा वायुयान व घड़ियों के पुर्जी को साफ करने में तथा चिमनियों की कालिख हटाने में किया जाता है।
    • कृषि में: कुछ ऐसे छोटे-छोटे पौधे हैं जो पराश्रव्य तरंगों के डालने पर तेजी से बढ़ते हैं।
    • जीव विज्ञान तथा चिकित्सा विज्ञान में: ये तरंगें बैक्टीरिया का विनाश कर देती हैं। गठिया रोग के उपचार तथा मस्तिष्क में ट्यूमर का पता लगाने में पराश्रव्य तरंगें उपयोग में लायी जाती है।
    • अन्य उपयोगः कुछ पशु (विशेष रूप से कुत्ते) तथा पक्षी (चमगादड़) पराश्रव्य तरंगों को सुन लेते हैं इन्हें डाल्फिन भी सुन लेती हैं इस प्रकार की सीटी बनाई गई है जिसे बजाने पर पराश्रव्य तरंगें निकलती है। अत: इस सीटी को बजाने पर कुत्ता आ जाएगा परन्तु आस-पास कोई आदमी उसे नहीं सुन सकेगा। 

    इस प्रकार की सीटी बजाकर पेड़ों पर से चिड़ियों को भी उड़ाया जाता है। इसे गाल्टन सीटी (Galton whistle) कहते हैं। 

    उड़ते समय चमगादड़ (Bat) पराश्रव्य तरंगें उत्पन्न करता है। ये तरंगें सामने पड़ने वाली वस्तुओं से परावर्तित होकर चमगादड़ के कानों पर वापस आती हैं। इससे चमगादड़ अंधेरे में उड़ते समय पेड़ों, दीवारों तथा अन्य वस्तुओं से अपने को टकराने से बचा लेता है। 

  • यान्त्रिक तथा विद्युत-चुम्बकीय तरंगें क्या होती हैं ?

    यान्त्रिक तरंगें (Mechanical Waves)

    वे तरंगें जो किसी पदार्थ के माध्यम (ठोस, द्रव अथवा गैस) में संचरित होती हैं, ‘यान्त्रिक तरंगें’ कहलाती हैं। इन तरंगों में माध्यम के कण यान्त्रिकी के नियमों के अन्तर्गत कम्पन करते हैं। ध्वनि की तरंगें यान्त्रिक तरंगें हैं क्योंकि ये किसी माध्यम से ही संचरित होती हैं।

    यान्त्रिक तरंगें अनुप्रस्थ तथा अनुदैर्ध्य दोनों प्रकार की हो सकती है तथा भिन्न-भिन्न माध्यमों में उत्पन्न तरंगों की चाल भिन्न-भिन्न होती है।

    विद्युत-चुम्बकीय तरंगें

    जिनके संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता नहीं होती, जैसे प्रकाश तरंगें, ऊष्मीय विकिरण, रेडियो तरंगें, एक्स किरणें, गामा किरणें, आदि। इन्हें ‘विद्युत-चुम्बकीय तरंगें’ कहते हैं। 

    विद्युत-चुम्बकीय तरंगों में विद्युत क्षेत्र तथा चुम्बकीय क्षेत्र परस्पर लम्बवत् तलों में कम्पन करते रहते हैं तथा रिक्त स्थान में प्रकाश की चाल से आगे बढ़ते जाते हैं। इन क्षेत्रों के संचरण की दिशा उन तलों के लम्बवत् होती है जिनमें ये स्थित होते हैं।

    इस प्रकार विद्युत-चुम्बकीय तरंग सदैव अनुप्रस्थ होती है तथा इन तरंगों की चाल प्रकाश की चाल के बराबर होती है। निर्वात् (Vacuum) में प्रकाश की चाल 3×108 मी./सेकण्ड होती है। 

  • अनुप्रस्थ-अनुदैर्ध्य तरंगें क्या होती हैं ?

    मुख्यतः तरंगें दो प्रकार की होती हैं: – अनुप्रस्थ तरंगें तथा अनुदैर्ध्य तरंगें

    अनुप्रस्थ तरंगें

    जब तरंग की गति की दिशा माध्यम के कणों के कम्पन करने की दिशा के लम्बवत् होती है, तो इस प्रकार की तरंगों को ‘अनुप्रस्थ तरंगें’ (Transverse waves) कहते हैं। अनुप्रस्थ तरंगों के निर्माण के लिए माध्यम में दृढ़ता का होना आवश्यक है। पानी की सतह पर उत्पन्न तरंग, प्रकाश तरंग, आदि अनुप्रस्थ तरंग के उदाहरण हैं। 

    अनुदैर्ध्य तरंगें

    जब तरंग की गति की दिशा माध्यम के कणों के कम्पन करने की दिशा के अनुदिश (या उसके समान्तर) होती है, तो ऐसी तरंग को अनुदैर्ध्य तरंग (Longitudinal wave) कहते हैं। अनुदैर्ध्य तरंगे सभी माध्यमों (ठोस, द्रव एवं गैस) में उत्पन्न की जा सकती है। भूकम्प तरंगें, स्प्रिंग से उत्पन्न तरंगें, आदि अनुदैर्ध्य तरंगें है। अनुदैर्ध्य तरंगों के निर्माण के लिए माध्यम का प्रत्येक दिशा में लचीला होना चाहिए। 

  • वायु की आपेक्षिक आर्द्रता क्या होती है ?

    वायु की आपेक्षिक आर्द्रता

    किसी दिये हुए ताप पर, वायु के किसी आयतन में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा तथा उसी ताप पर उसी आयतन की वायु को संतृप्त करने के लिए आवश्यक जलवाष्प की मात्रा के अनुपात को ‘आपेक्षिक आर्द्रता’ कहते हैं। इसे प्रतिशत में व्यक्त करते हैं। 

    आपेक्षिक आर्द्रता के लाभ

    • मौसम विज्ञानशालाओं में प्रतिदिन की आपेक्षिक आर्द्रता ज्ञात की जाती है, इससे मौसम का अनुमान लगाने में सहायता मिलती है। यदि आर्द्रता अधिक है, तो वर्षा होने की सम्भावना रहती है।
    • स्वास्थ्य विभाग को आर्द्रता जानने की आवश्यकता होती है क्योंकि नम वायु में कुछ जीवाणु उत्पन्न होने लगते हैं।
    • सूत के कारखानों में अधिक आर्द्रता की आवश्यकता होती है क्योंकि वायु में नमी अधिक होने से सूत का धागा नहीं टूटता। यही कारण है, कि सूती कपड़ों के मिल समुद्र के निकट (अधिक आर्द्रता वाले) बसे हुए नगरों, जैसे—मुम्बई, अहमदाबाद में लगाए जाते हैं।
    • वातानुकूलन में भी आपेक्षिक आर्द्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। 

    महत्वपूर्ण तथ्य

    • आपेक्षिक आर्द्रता को मापने के लिए आर्द्रतामापी (Hygrometer) का प्रयोग किया जाता है। 
    • वायु की आपेक्षिक आर्द्रता 60 से 65 प्रतिशत के बीच होनी चाहिए।
  • हिम मिश्रण (Freezing Mixture) क्या होता है ?

    हिम मिश्रण (Freezing Mixture) क्या होता है ?

    हिम मिश्रण (Freezing Mixture) कैसे बनाते हैं ?

    बर्फ में नमक, नौसादर अथवा कैल्सियम क्लोराइड मिला देने पर मिश्रण का ताप 0°C से नीचे गिर जाता है। इसका कारण यह है, कि जब बर्फ में नमक मिलाया जाता है, तो नमक को 0°C तक ठण्डा करने में कुछ बर्फ गल जाती है।

    इससे बने जल में नमक घुल जाता है तथा नमक का संतृप्त घोल बन जाता है परन्तु घोल का हिमांक सदैव शुद्ध जल के हिमांक से नीचा होता है। अत: बर्फ 0°C पर नमक के घोल के साथ ठोस अवस्था में नहीं रह सकती है। जो बर्फ घोल के सम्पर्क में है वह गलने लगती है तथा इसके लिए आवश्यक गुप्त ऊष्मा मिश्रण से ले लेती है जिससे मिश्रण का ताप गिर जाता है।

    इस गली बर्फ में और नमक घुलता है तथा उपरोक्त क्रिया फिर दोहराई जाती है जब तक कि मिश्रण का ताप -22°C तक नहीं गिर जाता है।

    इस ताप पर बर्फ नमक के घोल के साथ ठोस अवस्था में रह सकती है। बर्फ तथा कैल्शियम क्लोराइड के मिश्रण का ताप -55°C तक गिर जाता है। गर्मियों में इस प्रकार के मिश्रण से आइसक्रीम जमाई जाती है।

  • गलनांक, क्वथनांक, द्रव हिमांक, संघनन, वाष्पीकरण

    गलनांक

    निश्चित ताप पर ठोस का द्रव में बदलना गलन कहलाता है तथा इन निश्चित ताप को ठोस गलनांक कहते हैं। ,

    द्रव हिमांक

    निश्चित ताप पर द्रव का ठोस में बदलना ‘हिमीकरण’ कहलाता है तथा इस निश्चित ताप को ‘द्रव हिमांक’ कहते हैं। प्रायः गलनांक तथा हिमांक बराबर होते हैं जो पदार्थ ठोस से द्रव में बदलने पर सिकुड़ते हैं (जैसे—बर्फ) उनका गलनांक दाब बढ़ाने पर घटता है तथा जो पदार्थ ठोस से द्रव में बदलने पर फैलते हैं, उनका गलनांक दाब बढ़ाने पर चढ़ता है। अशुद्धि मिलाने से (जैसे बर्फ में नमक मिलाने से) गलनांक घटता है !

    क्वथनांक

    निश्चित ताप पर द्रव का वाष्प (या गैसों) में बदलना वाष्प कहलाता है तथा इस निश्चित ताप को द्रव का ‘क्वथनांक’ कहते हैं। चूंकि सभी द्रव जब वाष्प में परिवर्तित होते हैं, तो वे फैलते हैं, अत: क्वथनांक दाब बढ़ाने से बढ़ता है। अशुद्धि मिलाने से भी द्रव का क्वथनांक बढ़ता है। 

    संघनन

    निश्चित ताप पर वाष्प का द्रव में बदलना संघनन कहलाता है तथा यह निश्चित ताप संघनन बिन्दु कहलाता है। प्रायः क्वथनांक तथा संघनन ताप समान होता है।

    वाष्पीकरण (Evaporation)

    द्रव की खुली सतह से प्रत्येक ताप पर धीरे-धीरे द्रव का अपने वाष्प में बदलना ‘वाष्पीकरण’ कहलाता है। वाष्पीकरण के लिए भी द्रव को ऊर्जा की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, एक ग्राम जल को वाष्प में बदलने के लिए 2,260 जूल ऊष्मा की आवश्यकता होती है। यह ऊष्मा द्रव अपने अन्दर से ही प्राप्त करता है, अत: द्रव ठण्डा हो जाता है। 

    दाब का प्रभाव

    किसी पदार्थ के ‘द्रवणांक में अल्प परिवर्तन होता है यदि उस पर दाब बढ़ाया जाता है। उदाहरण के लिए, बर्फ पर दाब बढ़ाने से उसका द्रवणांक या गलनांक कम हो जाता है। ।

    अशुद्धियों का प्रभाव

    किसी पदार्थ के द्रवणांक पर अशुद्धियों का भी प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, जब जल और बर्फ के मिश्रण में नमक मिलाया जाता है, तो तापमान के -22°C तक होने की सम्भावना रहती है। इस प्रकार बने मिश्रण का उपयोग हिमीकरण के लिए किया जाता है।

  • गुप्त ऊष्मा (Latent Heat) क्या होती है ?

    गुप्त ऊष्मा

    जब कोई पदार्थ एक भौतिक अवस्था (जैसे ठोस) से दूसरी भौतिक अवस्था (जैसे द्रव) में परिवर्तित होता है तो एक नियत ताप पर उसे कुछ उष्मा प्रदान करनी पड़ती है या वह एक नियत ताप पर उष्मा प्रदान करता है। किसी पदार्थ की गुप्त उष्मा (latent heat), उष्मा की वह मात्रा है जो उसके इकाई मात्रा द्वारा अवस्था परिवर्तन (change of state) के समय अवषोषित की जाती है या मुक्त की जाती है।

    इसके अलावा पदार्थ जब अपनी कला (फेज) बदलते हैं तब भी गुप्त उष्मा के बराबर उष्मा का अदान/प्रदान करना पड़ता है।

    वाष्पन की गुप्त ऊष्मा या वाष्पन की एन्थैल्पी

    ऊर्जा की वह मात्रा है जो द्रव के इकाई मात्रा को गैस में बदलने के लिये आवश्यक होती है। इसे वाष्पन की गुप्त ऊष्मा भी कहते हैं। वाष्पन की एन्थैल्पी, उस दाब पर भी निर्भर करती है जिस पर यह अवस्था परिवर्तन किया जाता है।

  • ऐवोगैड्रो का नियम क्या होता है ?

    ऐवोगैड्रो का नियम

    समान ताप और दाब पर सभी गैसों के समान आयतन में अणुओं की संख्या समान होती है। 

    इस नियम का नाम अमेदिओ अवोगाद्रो (Amedeo Avogadro) के नाम पर रखा गया है। इसे “अवोगाद्रो की परिकल्पना” (Avogadro’s hypothesis) एवं “अवोगाद्रो का सिद्धान्त” के नाम से भी जाना जाता है। सन् १८११ में अवोगाद्रो ने यह परिकल्पना प्रस्तुत की

    आवोगाड्रो ने ही सर्वप्रथम कहा कि गैसों में केवल अणुओं का स्वतंत्र अस्तित्व संभव है न कि परमाणुओं का, इसीलिए गैस के आयतन को उसमें उपस्थित अणुओं से व्यक्त करना चाहिए। इस आधार पर आवोगाड्रो ने निम्नलिखित संबंध व्यक्त किया है :एक ही ताप और दाब पर सभी गैसों के समान आयतन में अणुओं की संख्या समान होती है।

    प्रारंभ में इस संबंध को आवोगाड्रो की परिकल्पना कहा गया था लेकिन बाद में जब प्रयोगों द्वारा इसका परीक्षण किया गया तो इसे आवोगाड्रो का सिद्धांत कहा जाने लगा। और अब इसे ‘आवोगाड्रो का नियम’ कहते हैं। परमाणु सिद्धांत के संशोधन में तथा गेलुसाक के नियम की व्याख्या करने में इस नियम का उयपयोग हुआ है। तात्विक गैसों की परमाणुकता निकालने में, अणु भार ज्ञात करने में, गैसों के भार आयतन के संबंध को ज्ञात करने में तथा गैसों के विश्लेषण में इस नियम का उपयोग किया जाता है।

    आवोगाड्रो की संख्या

    किसी भी गैस के एक ग्राम अणु भार में अणुओं की संख्या समान होती है। इस संख्या को ही आवोगाड्रो की संख्या कहते हैं। विभिन्न विधियों से इसका मान 6.02×1023 निश्चित किया गया है। आवोगाड्रो की संख्या पांच विश्व स्थिरांको (युनिवर्सल कांस्टैंट) में से एक है। इसे रोमन अक्षर एन (N) से निरूपित करते हैं।

    उदाहरण

    हाइड्रोजन एवं नाइट्रोजन के समान आयतन में अणुओं की संख्या समान होगी यदि वे एक ही ताप व दाब पर रखीं हो तथा आदर्श गैस के समान व्यवहार कर रही हों। व्यवहार में वास्तविक गैसों के लिये यह नियम पूर्णत: सत्य नहीं है बल्कि “लगभग सत्य” है।