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  • ऊष्मीय प्रसार (Thermal Expansion)क्या होता है ?

    ऊष्मीय प्रसार (Thermal Expansion)

    ऊष्मा के प्रभाव के पदार्थों का फैलाव ऊष्मीय प्रसार कहलाता है। यह प्रसार लम्बाई, क्षेत्रफल तथा आयतन में होता है। ऊष्मीय प्रसार होने से पदार्थ के अणुओं के बीच दूरी बढ़ जाती है। 

    ऊष्मीय प्रसार के कुछ व्यावहारिक उपयोग

    • रेल की पटरियां लोहे की बनी होती हैं, इसलिए रेल की दो पटरियों के जोड़ पर थोड़ा रिक्त स्थान छोड़ दिया जाता है जिससे गर्मी के दिनों में ताप बढ़ने के कारण पटरियों की लम्बाई बढ़ने के लिए खाली स्थान मिल सके, अन्यथा पटरियां तिरछी हो जाएगी और रेल दुर्घटना हो सकती है।
    • कांच की बोतल में डाट फंसने पर बोतल की गर्दन को गरम पानी में रखकर गरम करते हैं, जिससे बोतल की गर्दन का व्यास बढ़ जाता है और डाट बाहर निकल जाता है। यदि कांच की बोतल पर धातु का ढक्कन है (Cap) लगा हुआ है. तो गरम करने पर उसमें प्रसार होता है !

    महत्वपूर्ण तथ्य (कांच की अपेक्षा धातु का प्रसार गुणांक अधिक होने के कारण)

    थर्मामीटर में पारा, बैंजीन जैसे पदार्थ से अधिक उपयोगी होते है और वह ढीली हो जाती है। 

    हैं। इसके निम्नलिखित कारण है: 

    1. पारा ऊष्मा का अच्छा चालक है। अत: पारे के किसी 3. जब कांच के गिलास में गर्म पानी डालते 

    भाग में समायी ऊष्मा इसके अन्य भागों में चलकर हैं, तो वह चटक जाता है क्योंकि कांच आसानी से फैल जाती है। ऊष्मा का कुचालक है। गरम पानी डालते ही अन्दर का भाग गरम हो जाता है और 

    2. पारा थर्मामीटर की नली को भिगोता नहीं बल्कि बैंजीन फैलता है परन्तु बाहर का भाग ठण्डा ही 

    उसे भिगो देती है। रहता है अत: गिलास चटक जाता है। 

    3. चमकीला होने के कारण पारे की सतह स्पष्ट दिखाई पायरेक्स कांच का बर्तन नहीं चटकता है 

    पड़ती है जिससे ताप को पढ़ने में सुविधा होती क्योंकि पायरेक्स कांच का आयतन प्रसार गुणांक साधारण कांच की तुलना में एक-तिहाई होता है। जल का असामान्य प्रसारः प्रायः सभी द्रव गर्म किए जाने पर आयतन में बढ़ते हैं परन्तु जल 0°C से 4°C तक गर्म करने पर आयतन में घटता है तथा 4°C के पश्चात् बढ़ना प्रारम्भ करता है। इसका अर्थ यह है. कि 4° पर जल का घनत्व सबसे अधिक होता है। दैनिक जीवन में इसके कई प्रभाव दिखाई देते हैं. कुछ निम्नलिखित हैं: 1. ठण्डे देशों में तालाबों के जम जाने पर भी उनमें मछलियां जीवित रहती हैं: ठण्डे देशों में जाड़े के दिनों 

    में वायु का ताप 0° से भी कम हो जाता है। अतः वहां के तालाबों में जल जमने लगता है। वायु का ताप गिरने पर पहले तालाबों की सतह का जल ठण्डा होता है। अत: यह भारी होकर नीचे बैठता रहता है तथा नीचे का हल्का जल ऊपर आता रहता है। यह प्रक्रिया तब तक चली रहती है जब तक कि पूरे तालाब का जल 4°C तक नहीं गिरा जाता। जब सतह के जल का ताप 4°C से नीचे गिरने लगता है. तो इसका घनत्व कम होने लगता है। अतः अब यह नीचे नहीं जाता तथा 0°C तक ठण्डा होकर बर्फ के रूप में सतह पर ही जमने लगता है। अत: जल के जमने की क्रिया ऊपर से नीचे की ओर होती है (नीचे से ऊपर की ओर नहीं) बर्फ की इस पर्त के नीचे अब भी 4°C का जल रहता है। चूंकि बर्फ ऊष्मा का कुचालक होता है, अत: नीचे के 4°C वाले जल की ऊष्मा को बाहर नहीं जाने देता। अत: नीचे वाला जल 4°C पर ही बना रहता है और इस प्रकार वह जमने से बच जाता है। इस जल में मछलिया तथा अन्य जीव जीवित रहते हैं। 2. अत्यधिक ठण्ड में जल के पाइप कभी-कभी फट जाते हैं: ठण्डे स्थानों पर जाड़े के दिनों में पाइपों में बहने वाले जल का ताप 4°C से नीचे गिर जाने पर जल के आयतन में वृद्धि होती है परन्तु धातु का पाइप सिकुड़ता है। इन विपरीत दशाओं के कारण पाइपों की दीवारों पर इतना अधिक दाब पड़ता है, कि वे फट जाते हैं।

  • ऊष्मा धारिता (Thermal Capacity) क्या होती है ?

    ऊष्मा धारिता (Thermal Capacity)

    किसी वस्तु का तापमान 1°C बढ़ाने के लिए जितनी ऊष्मा की आवश्यकता होती है उसे उस वस्तु की ऊष्मा धारिता कहते हैं। परन्तु कौन-सी वस्तु कितनी गरम होगी यह बात वस्तु की प्रकृति और उसके द्रव्यमान पर निर्भर है। इसका मात्रक जूल प्रति केल्विन या कैलोरी प्रति C है। 

    विशिष्ट ऊष्मा धारिता

    आजकल विशिष्ट ऊष्मा को ‘विशिष्ट ऊष्मा धारिता’ लिखा जाता है, किसी पदार्थ की विशिष्ट ऊष्मा धारिता ऊष्मा की वह मात्रा है जो उस पदार्थ के एकांक द्रव्यमान में एकांक ताप-वृद्धि उत्पन्न करती है। इसे प्राय: C द्वारा व्यक्त किया जाता है। 

    उदाहरण

    1 ग्राम जल का ताप 1°C बढ़ाने के लिए 1 कैलोरी ऊष्मा की आवश्यकता होती है। अत: जल की विशिष्ट ऊष्मा धारिता 1 कैलोरी/ग्राम C होती है। जल की विशिष्ट ऊष्मा धारिता अन्य ठोस तथा द्रव पदार्थों की तुलना में सबसे अधिक है। 

    विशिष्ट ऊष्मा धारिता का SI मात्रक जूल किलोग्राम केल्विन होता है। ठोस और द्रवों में जल की विशिष्ट ऊष्मा सर्वाधिक है परन्तु सभी पदार्थों में हाइड्रोजन की विशिष्ट ऊष्मा सर्वाधिक है। 

    पानी की विशिष्ट ऊष्मा धारिता उच्च होने का लाभ यह है, कि अन्य पदार्थों की तुलना में पानी अधिक देर में गरम होता है और अधिक देर में ही ठण्डा होता है। यही कारण है, कि शरीर को सेंकने वाली बोतलों (Heating bottles) में गरम पानी भरा जाता है जिससे वह अधिक देर तक सेंक देता रहे।

    कमरों को गरम करने वाले पाइपों में भी गरम पानी ही भरा जाता है। समुद्र के पास के नगरों में न तो अधिक गर्मी पड़ती है और न ही अधिक सर्दी। इसका कारण भी जल की अधिक विशिष्ट ऊष्मा धारिता है।

    दिन में समुद्र का जल धूप में स्थल की मिट्टी की अपेक्षा बहुत देर में गरम होता है जिससे स्थल के ऊपर की वायु गरम होकर ऊपर उठ जाती है। उसका स्थान भरने के लिए दिन में समुद्र से स्थल की ओर ठण्डी हवा चलती है, इससे वहां का ताप बहुत अधिक नहीं बढ़ पाता है।

    रात को समद्र का जल स्थल की अपेक्षा अधिक देर से ठण्डा होता है, अतः रात को समुद्र, स्थल की अपेक्षा गरम होता है वहां की वायु गरम होकर ऊपर उठ जाती है। उसका स्थान ग्रहण करने के लिए स्थल से ठण्डी वायु समुद्र की ओर चलने लगती है।

    इस प्रकार स्थल का ताप दिन और रात में लगभग एकसमान बना रहता है, और ग्रीष्म तथा शीत ऋतु में भी इसी प्रकार की प्रक्रिया द्वारा एकसमान बना रहता है।

  • ध्वनि का तारत्व क्या होता है ?

    तारत्व

    तारत्व का सम्बन्ध आवृत्ति से होता है। जैसे-जैसे ध्वनि की आवृत्ति बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे ध्वनि का तारत्व बढ़ता जाता है तथा ध्वनि तीक्षण अथवा पतली होती जाती है।

    चिड़िया की आवाज, सोनोमीटर के तने हुए पतले तार से निकलने वाली ध्वनि, मच्छरों की भनभनाहट, अधिक तारत्व की ध्वनियों के उदाहरण हैं।

    ध्वनि की आवृत्ति कम होने पर उसका तारत्व कम होता है तथा ध्वनि मोटी तथा सपाक (Flat) प्रतीत होती है। सितार के मोटे तथा कम तने हुए तार से उत्पन्न ध्वनि कम तारत्व की होती है। 

    उदाहरण

    बच्चों और स्त्रियों की आवाज पतली होती है, अत: उसका तारत्व अधिक होता है, पुरुषों की आवाज भारी होती है, अत: उसका तारत्व कम होता है।

    ध्वनि के तारत्व का ध्वनि की प्रबलता से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। अधिक प्रबल ध्वनि का तारत्व कम (जैसे शेर की दहाड़) अथवा अधिक (जैसे रेलगाड़ी की सीटी), कुछ भी हो सकता है।

    इसी प्रकार, कम प्रबल ध्वनि का तारत्व कम (जैसे—पत्तियों की खड़खड़ाहट) अथवा अधिक (जैसे मच्छर की भनभनाहट), कुछ भी हो सकता है।

  • ध्वनि प्रबलता क्या होती है ?

    ध्वनि के लक्षण

    प्रबलता ध्वनि का वह लक्षण है जिससे ध्वनि कान को मन्द (धीमी) अथवा तीव्र (प्रबल) प्रतीत होती है। सांस लेने से उत्पन्न ध्वनि अत्यधिक मन्द, किताब का कागज पलटने पर उत्पन्न ध्वनि मन्द, आपस में बातचीत की ध्वनि मन्द, कार के हॉर्न की ध्वनि प्रबल तथा बादलों की गड़गड़ाहट अति प्रबल प्रतीत होती है।

    लेकिन ध्वनि जो साधारण मनुष्य को प्रबल प्रतीत होती है, बहरे मनुष्य को मन्द प्रतीत होती है। अतः हम कह सकते हैं, कि वास्तव में, ध्वनि की प्रबलता दो कारकों पर निर्भर करती है

    • (1) ध्वनि की तीव्रता पर, तथा
    • (2) श्रोता के कान की संवेदना पर

    ध्वनि की तीव्रता बढ़ने पर ध्वनि की प्रबलता भी बढ़ती है। ध्वनि की तीव्रता एक भौतिक राशि है जिसे शुद्धता से मापा जा सकता है। माध्यम के किसी बिन्दु पर ध्वनि की तीव्रता, उस बिन्दु पर एकांक क्षेत्रफल से प्रति सेकण्ड तल के लम्बवत् गुजरने वाली ध्वनि ऊर्जा के बराबर होती है।

    इसका SI मात्रक माइक्रोवाट/मीटर (=10-6 जूल/सेकण्ड मीटर) तथा प्रयोगात्मक मात्रक बेल B (Bell) है। इसके दसवें भाग को ‘डेसीबल’ (dB कहते हैं)। 0 तारत्व या पिच: तारत्व, ध्वनि का वह लक्षण है जिससे ध्वनि को मोटा (Grave) या तीक्ष्ण (Shrill) कहा जाता है। 

  • प्रतिध्वनि या अनुरणन (Reverberation) क्या होता है ?

    प्रतिध्वनि या अनुरणन (Reverberation)

    जब किसी बन्द हॉल में एक अल्प समय के लिए ध्वनि उत्पन्न की जाती है, तो हॉल की दीवारों तथा छत से क्रमिक परावर्तनों के फलस्वरूप स्रोत के कम्पन बन्द हो जाने पर भी हॉल में कुछ समय तक ध्वनि बनी रहती है, इसे ‘अनुरणन’ कहते हैं।

    अनुरणन काल

    जितने समय तक ध्वनि हॉल में बनी रहती है, उसे ‘अनुरणन काल’ (Reverberation time) कहते हैं। अच्छी ध्वनिकी (Acoustics) के लिए अनुरण काल का मान अनुकूलम (Optimum) होना चाहिए। (T= 0.053 V/A)|

    अत: दीवारों पर अवशोषक पदार्थ का क्षेत्रफल बढ़ाकर या घटाकर अनुरणन काल को समंजित किया जा सकता है। यदि अनुरणन काल T का मान बहुत अधिक है, तो अनुरणन के कारण उत्तरोत्तर ध्वनियों में अतिव्यापन (Overlapping) होने से मूल ध्वनि साफ सुनायी नहीं देगी। इसके विपरीत, यदि अनुरणन काल T बहुत कम है, तो परावर्तन समाप्त होने से ध्वनि की प्रबलता एकसमान नहीं रहेगी। 

    उदाहरण

    बादलों की गर्जन, भी अनुरणन का एक उदाहरण है क्योंकि यह दो बादलों के बीच ध्वनि के लगातार परावर्तन से उत्पन्न होती है। 

    अनुरणन को कैसे रोका जा सकता है ?

    व्याख्यान हॉल या सिनेमा हॉल में आवश्यक अनुरणन को रोकने के लिए हॉल की दीवारें खुरदरी (Rough) बनाई जाती है अथवा उन्हें मोटे सरंध्र (Porous) परदों से ढक दिया जाता है। इससे ध्वनि, अवशोषित हो जाती है। फर्श पर भी इसी उद्देश्य से कालीन बिछाई जाती है।

  • ध्वनि का परावर्तन क्या होता है ?

    ध्वनि का परावर्तन (Reflection of Sound)

    ध्वनि का परावर्तन (Reflection of Sound) भी होता है। यह ठीक उसी प्रकार होता है जैसे प्रकाश का परावर्तन होता है। ध्वनि की तरंग-दैर्ध्य अधिक होती है, इसलिए इसका परावर्तन बड़े आकार के पृष्ठों से अधिक होता है, जैसे—पर्वत, समुद्रतल, नदी, घाटी, पृथ्वीतल, आदि से परावर्तन। 

    प्रतिध्वनि (Echo)

    जो ध्वनि किसी दृढ़ दीवार या पहाड़, आदि से टकराने (अर्थात् परावर्तित होने) के बाद सुनाई देती है, उसे उस ध्वनि की ‘प्रतिध्वनि’ कहते हैं। यदि श्रोता परावर्तक तल के बहुत निकट खड़ा है, तो उसे प्रतिध्वनि नहीं सुनाई देगी।

    इसी प्रकार जब हम एक खाली कमरे में खड़े हैं, तो भी हमें प्रतिध्वनि नहीं सुनाई देती क्योंकि मूल ध्वनि तथा प्रतिध्वनि की आवाज एक साथ ही आती है।

    इसका कारण यह है, कि जब हमारा कान कोई ध्वनि सुनता है, तो उसका प्रभाव हमारे मस्तिष्क में 0.1 सेकण्ड तक रहता है, अत: यदि इस अवधि में कोई अन्य ध्वनि भी आएगी तो वह पहली के साथ मिल जाएगी।

    अतः स्पष्ट प्रतिध्वनि सुनने के लिए आवश्यक है, कि परावर्तक तल श्रोता से कम-से-कम इनती दूर अवश्य हो कि परावर्तित ध्वनि को उस तक पहुंचने में 0.1 सेकण्ड से अधिक समय लेगें। ध्वनि द्वारा वायु में 0.1 सेकण्ड में चली गई दूरी =1×332 = 33.2 मीटर 

    अत: यदि हम कोई ध्वनि उत्पन्न करते हैं, तो उसकी स्पष्ट प्रतिध्वनि सुनने के लिए परावर्तक तल की दूरी 33.2 की कम-से-कम मीटर = 16.6 (लगभग 17 मीटर) होनी चाहिए। 

    प्रतिध्वनि के प्रयोग

    प्रतिध्वनि द्वारा हम समुद्र की गहराई, वायुयान की ऊंचाई, सुदूर स्थित पहाड़ की दूरी, आदि माप सकते हैं। महासागर या समुद्र की गहराई मापने के लिए ध्वनि तरंग छोड़ी जाती है जो महासागर के तल से टकराकर लौट आती है। प्रतिध्वनि के लौटने में जो समय लगता है, उसके आधार पर गहराई निर्धारत कर ली जाती है।

  • डॉप्लर प्रभाव (Doppler Effect) क्या होता है ?

    डॉप्लर प्रभाव (Doppler Effect)

    ध्वनि में आवृत्ति परिवर्तन के प्रभाव को सर्वप्रथम जॉन डॉप्लर ने 1842 में प्रतिपादित किया जिसके कारण उन्हीं के नाम पर उसे ‘डॉप्लर प्रभाव’ कहते हैं। डॉप्लर के अनुसार, ‘जब किसी ध्वनि स्रोत व श्रोता के बीच आपेक्षिक गति होती है, तो श्रोता को ध्वनि की आवृत्ति उसकी वास्तविक आवृत्ति से अलग सुनाई देती है। यदि कोई स्त्रोत, श्रोता के निकट आ रहा होता है, तो ध्वनि की आवृत्ति बढ़ जाती है और यदि स्रोत. श्रोता से दूर जाता है, तो आवृत्ति कम हो जाती है।

    यही कारण है, कि जब रेलगाड़ी का इन्जन सीटी बजाते हुए श्रोता के निकट आता है, तो उसकी ध्वनि बड़ी तीखी (Shrill) अर्थात् अधिक आवृत्ति की सुनाई देती है और जैसे ही इन्जन श्रोता को पार करके aदूर जाने लगता है तुरन्त ध्वनि की आवृत्ति कम हो जाती है और सीटी की ध्वनि मोटी (Grave) हो जाती है। 

    प्रयोग

    डॉप्लर प्रभाव का उपयोग करके गैलेक्सी तथा सुदूर तारों का अध्ययन किया जाता है। तारे के प्रकाश के वर्णक्रमण (Spectrum) का अध्ययन करके प्रकाश की आवृत्ति में हुए परिवर्तन का पता लगाया जाता है। इस परिवर्तन से यह ज्ञात हो जाता है, कि तारा पृथ्वी से दूर जा रहा है या उसके पास आ रहा है और उसकी गति का वेग क्या है !

    यदि स्पेक्ट्रम में प्रकाश रेखा बैंगनी सिरे की ओर विस्थापित होती है (बैंगनी-विस्थापन, Violet-shift) तो प्रकाश स्रोत (तारा, गैलेक्सी, आदि) पृथ्वी की ओर आ रहा है और यदि वह लाल सिरे की ओर विस्थापित होती है (अर्थात् लाल-विस्थापन या अभिरक्त विस्थापन, Red-shift) तो प्रकाश स्रोत पृथ्वी से दूर जा रहा होता है। 

    प्रकाश में डॉप्लर प्रभाव

    प्रकाश तरंगें भी डॉप्लर प्रभाव दर्शाती हैं। इन दोनों में अन्तर यह है, कि ध्वनि में डॉप्लर प्रभाव असममित (Asymmetric) होता है जबकि प्रकश में सममित (Symmetric) होता है। इसका तात्पर्य यह है, कि ध्वनि में डॉप्लर प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है, कि ध्वनि स्रोत श्रोता की ओर आ रहा है या उससे परे जा रहा है। इसके विपरीत प्रकाश में डॉप्लर प्रभाव केवल प्रकाश स्रोत व दर्शक के मध्य आपेक्षिक वेग पर निर्भर करता है, इस बात पर नहीं कि स्रोत दर्शक के निकट आ रहा है या उससे दूर जा रहा है। 

    प्रकाश के डॉप्लर प्रभाव द्वारा सुदूर तारों व गैलेक्सियों के पृथ्वी के सापेक्ष वेग तथा उनकी गति की दिशा ज्ञात की जाती है। वास्तव में खगोलज्ञ एडविन हब्बल (1889-1953) ने डॉप्लर प्रभाव द्वारा ही यह ज्ञात किया था, कि विश्व (Universe) का विस्तार हो रहा है।

    यदि कोई तारा या गैलेक्सी पृथ्वी की ओर आ रहा है, तो उससे प्राप्त प्रकाश की तरंग दैर्ध्य स्पेक्ट्रम के बैंगनी सिरे की ओर विस्थापित होती है और यदि तारा या गैलेक्सी पृथ्वी से दूर जा रहा है, तो प्राप्त प्रकाश की तरंग-दैर्ध्य स्पेक्ट्रम के लाल सिरे की ओर विस्थापित होती

  • ध्वनि का विवर्तन क्या होता है ?

    ध्वनि का विवर्तन (Diffraction of Sound)

    ध्वनि की तरंग-दैर्ध्य 1 मीटर की कोटि की होती है। अतः जब इसी कोटि का कोई अवरोध, जैसे—दरवाजा, खिड़की, दीवार, आदि। ध्वनि के मार्ग में आता है, तो ध्वनि अवरोध के किनारों पर मुड़कर आगे बढ़ जाती है।

    इस घटना को ‘ध्वनि का विवर्तन‘ कहते हैं। यही कारण है, कि यदि हम कमरे के अन्दर बैठे हैं, तो भी हम बाहर के शोरगुल या अन्य ध्वनियों को सुन लेते हैं, कारण यही है, कि बाहर से आने वाली ध्वनि दरवाजों, खिड़की, आदि पर मुड़कर हमारे कानों तक पहुंच जाती है। 

    ध्वनि में डॉप्लर प्रभाव का उपयोग करके किसी वायुयान या पनडुब्बी की गति की दिशा व उसका वेग ज्ञात किया जा सकता है। 

  • ध्वनि का विस्पंद क्या होता है ?

    विस्पंद (Beat)

    जब कभी दो लगभग बराबर आवृत्ति की ध्वनि तरंग साथ-साथ उत्पन्न होती है, तो उनके अध्यारोपण से जो परिणामी ध्वनि उत्पन्न होती है, उसकी तीव्रता बारी-बारी से घटती और बढ़ती है। ध्वनि की तीव्रता के इस चढ़ाव व उतार को ‘विस्पंद’ कहते हैं। एक चढ़ाव और एक उतार को मिलाकर एक विस्पंद बनता है !

    विस्पंद आवृत्ति

    एक सेकण्ड में जितनी बार ध्वनि की तीव्रता में चढ़ाव या उतार होता है, उसे ‘विस्पंद आवृत्ति’ (Beat frequency) कहते हैं। विस्पंद आवृत्ति = ध्वनियों की आवृत्तियों का अन्तर = श्रोतों की आवृत्तियों का अन्तर। यदि हम बराबर आवृत्ति के दो ध्वनि श्रोतों को एक साथ बजाते हैं, तो उनसे उत्पन्न परिणामी ध्वनि की तीव्रता में हमें कोई उतार-चढ़ाव सुना नहीं देता। 

    विस्पंद के अनुप्रयोग

    • स्वरित्र द्विभुज की आवृत्ति के निर्धारण
    • वाद्यों के समस्वरण में
    • रेडियो अभिग्रहण में 
    • खानों में विस्फोटक मीथेन गैस का पता लगाने में
  • ध्वनि का व्यतिकरण क्या होता है ?

    ध्वनि का व्यतिकरण (Interference of Sound)

    जब समान आवृत्ति या आयाम की दो ध्वनि तरंगें एक साथ किसी बिन्दु पर पहुंचती हैं, तो उस बिन्दु पर ध्वनि ऊर्जा का पुनर्वितरण (Redistribution) हो जाता है। इस घटना को ध्वनि का व्यतिकरण कहते हैं।

    ‘सम्पोषी’ (Constructive) व्यतिकरण

    यदि दोनों तरंगें उस बिन्दु पर एक ही कला (Phase) में पहुंचती हैं, तो वहां ध्वनि की तीव्रता अधिकतम होती है। इसे ‘सम्पोषी’ (Constructive) व्यतिकरण कहते हैं।

    ‘विनाशी’ (Destructive) व्यतिकरण

    यदि दोनों तरंगें विपरीत कला में मिलती हैं, तो वहां पर तीव्रता न्यूनतम होती है। इसे ‘विनाशी’ (Destructive) व्यतिकरण कहते हैं।

    उदाहरण

    व्यतिकरण के कुछ उदाहरण हैं—समुद्र में लाइट हाउस पर रखे साइरन से उत्पन्न की गई ध्वनि समुद्र पृष्ठ पर स्थित किसी बिन्दु पर दो प्रकार से पहुंचती है, एक तो लाइट हाउस से सीधे ही और दूसरे समुद्र के पृष्ठ से परावर्तित होने के बाद।

    इन दोनों तरंगों में व्यतिकरण के फलस्वरूप कुछ स्थानों पर ध्वनि तीव्र सुनाई देती है (वहां पर सम्पोषी व्यतिकरण होता है और कुछ स्थानों पर ध्वनि की तीव्रता बहुत कम होती है वहां पर विनाशी व्यतिकरण होता है। जिन्हें ‘नीरव क्षेत्र’ (Silence zone) कहते हैं। 

    किसी बड़े हॉल में एक ही स्थान पर उत्पन्न ध्वनि, श्रोता तक दो प्रकार से पहुंचती है, एक तो श्रोता के पास सीधे ही और दूसरे हाल की छत व दीवारों से परावर्तित होने के बाद। इन दोनों तरंगों में सम्पोषी व विनाशी व्यतिकरण होने के कारण हाल में कुछ बिन्दुओं पर तीव्र ध्वनि और कुछ पर अति मन्द (या बिल्कुल नहीं) ध्वनि सुनाई देगी। ध्वनि के व्यतिकरण का प्रभाव रेडियो के कार्यक्रमों पर स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है।