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  • संवहन (Convection) क्या होता है ?

    संवहन (Convection) क्या होता है ?

    संवहन (Convection)

    तरल पदार्थों (द्रव अथवा गैस) में ऊष्मा का संचरण मुख्यतः संवहन द्वारा होता है। ठोसों में संवहन द्वारा ऊष्मा संचरण सम्भव नहीं है। इस विधि में तरल के कण गरम भाग से ऊष्मा लेकर स्वयं हल्के होकर ऊपर उठते हैं तथा ठण्डे भाग की ओर जाते हैं। इनका स्थान लेने के लिए पुनः ठण्डे भाग से नीचे आते हैं।

    इस प्रकार, संवहन विधि में ऊर्ध्वाधरतः तापान्तर होने पर ऊष्मा का प्रवाह नीचे से ऊपर की ओर माध्यम के घनत्व में परिवर्तन होने के कारण संवहन धाराओं द्वारा होता है।

    उदाहरण

    जब हम एक बीकर में जल लेकर उसे नीचे से गरम करते हैं, तो बीकर की तली का पानी पहले गरम होता है जिससे इसका घनत्व कम हो जाता है। घनत्व कम हो जाने के कारण (या प्रसार के कारण) यह जल ऊपर उठता है तथा उसका स्थान लेने के लिए ऊपर से ठण्डा जल (अधिक घनत्व के कारण) नीचे आता है। फिर वह भी ऊष्मा लेकर तथा गरम होकर ऊपर उठ जाता है और उसका स्थान पुनः ऊपर से आकर ठण्डा जल ले लेता है।

    इस प्रकार, सम्पूर्ण जल में संवहन धाराएं प्रवाहित होने लगती हैं जिससे ऊष्मा, जल के विभिन्न भागों में पहुंचकर सम्पूर्ण जल को गरम कर देती है।

    उपयोग

    • रेफ्रिजरेटर में फ्रीजर पेटिका को ऊपर रखा जाता है। जिससे कि फ्रीजर पेटिका के नीचे का शेष स्थान संवहन धाराओं द्वारा ठण्डा बना रहे। इसका कारण यह है, कि नीचे की गरम वायु हल्की होने के कारण ऊपर उठती है तथा फ्रीजर पेटिका से टकराकर ठण्डी हो जाती है। ऊपर की ठण्डी वायु भारी होने के कारण नीचे आती है तथा रेफ्रिजरेटर में इस स्थान में रखी वस्तुओं जैसे—पानी की बोतल, साग-सब्जी, आदि से टकराकर उन्हें ठण्डा कर देती है।
    • समुद्री हवाएं तथा स्थली हवाएं: दिन के समय सूर्य की गर्मी से जल की अपेक्षा थल जल्दी गरम हो जाता है जिससे थल के सम्पर्क की हवाएं ऊपर उठती हैं तथा उनका स्थान लेने के लिए समुद्र की ओर से ठण्डी हवाएं थल की ओर बहने लगती हैं। इन हवाओं को ‘समुद्री हवाएं’ (Sea breeze) कहते हैं। 
    • रात के समय थल, जल की अपेक्षा जल्दी ठण्डा हो जाता है। इसलिए समुद्र के जल से सम्पर्क की गरम हवाएं ऊपर उठती हैं तथा इनका स्थान लेने के लिए थल से समुद्र की ओर हवाएं चलने लगती है। इन्हें ‘स्थली हवाएं’ (Land breeze) कहते हैं।
    • बिजली के बल्बों में निष्क्रिय गैसों का भरा जाना: बिजली के बल्बों में निर्वात के स्थान पर निष्क्रिय गैसें, जैसे—आर्गन, आदि भरी जाती है। इसका कारण यह है, कि बल्ब के अन्दर निर्वात होने पर तन्तु के चलने पर उत्पन्न ऊष्मा से तन्तु का ताप इतना बढ़ सकता है, कि तन्तु पिघल जाए। लेकिन बल्ब में निष्क्रिय गैस भरने से तन्तु की ऊष्मा संवहन धाराओं द्वारा चारों ओर फैल जाती है जिससे तन्तु का ताप उसके गलनांक तक नहीं बढ़ पाता है। निष्क्रिय गैस होने से वह तन्तु के पदार्थ के साथ कोई रासायनिक क्रिया भी नहीं करती है। यदि वायु भर दी जाए तो उसके अन्दर की ऑक्सीजन तन्तु की धातु से क्रिया करके उसे ऑक्साइड में बदल देगी और तन्तु का चमकना बन्द हो जाएगा। 
  • चालन (Conduction) क्या होता है ?

    चालन (Conduction) क्या होता है ?

    चालन (Conduction)

    यह ऊष्मा संचरण की ऐसी विधि है जिसमें माध्यम के कण भाग तो लेते हैं परन्तु अपने स्थान को नहीं छोड़ते हैं। इसमें ऊष्मा माध्यम के गरम भागों से ठण्डे भागों की ओर प्रत्येक कण से समीपवर्ती अन्य कणों में होती हुई संचरित होती है। 

    चालन द्वारा ऊष्मा का संचरण सभी पदार्थों (ठोस, द्रव तथा गैसों) से सम्भव है परन्तु ठोसों (तथा पारे) में ऊष्मा का संचरण केवल चालन द्वारा ही होता है। द्रवों तथा गैसों में ऊष्मा का संचरण चालन द्वारा बहुत कम होता है। 

    उदाहरण

    यदि हम किसी धातु की छड़ का एक सिरा गरम करें तो यह सिरा ऊष्मा पाकर गरम हो जाता है तथा चालन द्वारा ऊष्मा दूसरे सिरे तक पहुंचकर उसे भी गरम कर देती है। जिस सिरे को हम गरम करते हैं, उस सिरे के कण ऊष्मा पाकर अपनी मध्यमान स्थिति के दोनों ओर तेजी से तथा अधिक आयाम से कम्पन करने लगते हैं तथा अपने निकट वाले पृष्ठ के कणों से टकराते हैं तथा उन्हें ऊष्मा दे देते हैं। इस पृष्ठ के कण (जो अब तेजी से कम्पन करने लगे हैं) अपने निकट वाले पृष्ठ के कणों को ऊष्मा दे देते हैं इस प्रकार, ऊष्मा दूसरे सिरे तक एक पृष्ठ के कणों से दूसरे पृष्ठ के कणों में होती हुई पहुंच जाती है। 

    ऊष्मा चालकता

    पदार्थ में चालन द्वारा ऊष्मा का संचरण ‘ऊष्मा चालकता’ कहलाती है। ऊष्मा चालकता के आधार पर पदार्थों को तीन वर्गों में बांटा जाता है: 

    चालक

    वे पदार्थ जिनसे होकर ऊष्मा का चालन सरलता से होता है, ‘चालक’ कहलाते हैं। उदाहरण 6 अम्लीय जल, सभी धातु। 

    ऊष्मारोधी

    वे पदार्थ जिनसे होकर ऊष्मा का चालन बिल्कुल नहीं होता है, ‘ऊष्मारोधी’ कहलाते हैं। ऐसे पदार्थ की ऊष्मा चालकता शून्य होती है। एस्बेस्टॉस व एवोनाइट ऊष्मारोधी पदार्थ हैं।

    कुचालक

    वे पदार्थ जिनसे होकर ऊष्मा का चालन सरलता से नहीं होती है, ‘कुचालक’ कहलाते हैं उदाहरण—वायु, गैसें, रबर, लकड़ी व कांच, आदि। 

    उपयोग

    • एस्किमो लोग बर्फ की दोहरी दीवारों के मकान में रहते हैं: इसका कारण यह है, कि बर्फ की दोहरी दीवारों के बीच हवा की पर्त ऊष्मा की कुचालक होती है जिससे अन्दर की ऊष्मा बाहर नहीं जा पाती है तथा कमरे के अन्दर का ताप बाहर की अपेक्षा अधिक बना रहता है। 
    • शीत ऋतु में लकड़ी एवं लोहे की कुर्सियां एक ही ताप पर होती हैं परन्तु लोहे की कुर्सी छूने पर लकड़ी की कुर्सी की अपेक्षा अधिक ठण्डी लगती है: शीत ऋतु में शरीर का ताप, कमरे के ताप से अधिक होता है। लोहे की कुर्सी को छूने पर हमारे हाथ से ऊष्मा तापान्तर के कारण लोहे की कुर्सी में शीघ्रता से प्रवाहित होती है क्योंकि लोहा ऊष्मा का सुचालक है। अत: लोहे की कुर्सी छूने पर हमें ठण्डी प्रतीत होती है लेकिन लकड़ी ऊष्मा की कुचालक है, इसलिए वही तापान्तर होने पर भी हमारे हाथ से ऊष्मा लकड़ी में प्रवाहित नहीं होती है और लकड़ी की कुर्सी छूने पर वह हमें ठण्डी प्रतीत नहीं होती 
    • धातु के प्याले में चाय पीना कठिन है जबकि चीनी मिट्टी के प्याले में चाय पीना आसान है: इसका कारण यह है, कि धातु ऊष्मा की सुचालक होती है, अत: धातु के प्याले में चाय पीने पर चाय से ऊष्मा धातु में होकर होंठों तक पहुंच जाती है और होंठ जलने लगते हैं जबकि चीनी मिट्टी ऊष्मा की कुचालक होती है, अत: चाय से ऊष्मा चीनी मिट्टी से होकर होंठों तक नहीं पहुंच पाती है और चाय पीना आसान होता है।
  • दृश्य एवं अवरक्त विकिरण क्या होते हैं ?

    दृश्य विकिरण (Visible Radiation)

    इनके स्रोत सूर्य तथा तारों के अतिरिक्त ज्वाला (Flame), विद्युत-बल्ब, आर्क लैम्प, आदि ताप दीप्त वस्तुएं हैं। प्रकाश से ही हमें वस्तुएं दिखायी देती हैं। ये फोटोग्राफिक प्लेट पर रासायनिक क्रिया करती है। इनके संसूचन का प्रमुख साधन नेत्र हैं। 

    अवरक्त विकिरण (Infra-red Radiation)

    इन विकिरणों का पता हरशैल ने लगाया था। इनकी प्राप्ति तप्त वस्तुओं तथा सूर्य से होती है इनके द्वारा ऊष्मा का संचरण होता है अर्थात् ये किरणें ‘ऊष्मीय विकिरण’ है। ये जिस वस्तु पर पड़ती हैं उसका ताप बढ़ जाता है। इनका प्रकीर्णन बहुत कम होता है। इसलिए ये कुहरे में भी बहुत दूर तक चली जाती है।

    इनका संसूचन (Detection) तापपुंज (Thermopile) अथवा तापमापी से किया जा सकता है। इनका उपयोग अस्पतालों में रोगियों को सिकाई करने तथा कुहरे में फोटोग्राफी करने में होता है। TV के रिमोट कण्ट्रोल में भी इनका प्रयोग किया जाता है। 

  • पराबैंगनी विकिरण (Ultra-violet Radiation) क्या होता है ?

    पराबैंगनी विकिरण (Ultra-violet Radiation)

    इस विकिरण का पता रिटर (Ritter) ने लगाया था। ये सूर्य, आर्क, विद्युत स्पार्क, विसर्जन नलिका, आदि से प्राप्त होती हैं। इनकी भेदन क्षमता एक्स-किरणों से कम होती है। इनमें फोटोग्राफिक प्लेट पर रासायनिक क्रिया, प्रतिदीप्ति उत्पन्न करने तथा प्रकाश-विद्युत प्रभाव के गुण होते हैं।

    खोज

    इनकी खोज इस प्रेक्षण से बहुत कुछ जुङी हुई हैं, कि रजत नीरेय लवण (सिल्वर क्लोराइड) धूप पङने पर काले पङ जाते हैं। 1801 में जोहन्न विल्हैम रिटर ने एक विशिष्ट प्रेक्षण किया, कि बैंगनी प्रकाश के परे (ऊपर) अप्रत्यक्ष किरणें, रजत नीरेय के लवण में भीगे कागज को काला कर देतीं है। उसने उन्हें डी-ऑक्सिडाइजिंग किरणें कहा जिससे कि उनकी रसायनीय क्रियाओं पर बल दिया जा सके साथ ही इन्हें वर्णक्रम के दूसरे सिरे पर उपस्थित ऊष्म किरणों से पृथक पहचाना जा सके। कालांतर में एक सरल शब्द रासायनिक किरणें प्रयोग हुआ। जो कि उन्नीसवीं शताब्दी तक चला, जब जाकर दोनों के ही नाम बदले और पराबैंगनीएवं अधोरक्त’ कहलाए।

    उपयोग

    इनका संसूचन (Detection) प्रकाश-विद्युत प्रभाव, प्रतिदीप्त पर्दा अथवा फोटोग्राफिक प्लेट द्वारा किया जाता है। इनका उपयोग सिकाई करने, प्रकाश-विद्युत प्रभाव को उत्पन्न करने, हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने, आदि में किया जाता है।

  • एक्स-किरणें (X-rays) क्या होती हैं ?

    एक्स-किरणें (X-rays)

    इन किरणों को उनके अन्वेषक के नाम पर ‘रॉन्टजन किरणें’ भी कहते हैं। ये तीव्रगामी इलेक्ट्रॉनों के किसी भारी लक्ष्य वस्तु पर टकराने से उत्पन्न होती हैं। इनकी भेदन क्षमता गामा-किरणों से कम होती है।

    चिकित्सा में इनका उपयोग टूटी हड्डी तथा फेफड़ों के रोगों का पता लगाने में किया जाता है। इनका उपयोग जासूसी तथा इंजीनियरी में भी किया जाता है। X-किरणों की खोज सन् 1895 में विल्हम के रॉन्टजन ने की थी।

    उपयोग

    चिकित्सीय उपयोगों के अलावा भी एक्सरे का अनेकों प्रकार से उपयोग किया जाता है। एक्सरे के विशिष्ट गुणों के कारण उनका उपयोग विस्तृत रूप से विज्ञान की अनेक शाखाओं तथा विभिन्न उद्योगों में होता आ रहा है। उद्योगों में, विशेषत: निर्माण तथा निर्मित पदार्थो के गुणों के नियंत्रण में, एक्सरे का बहुत उपयोग होता है। निर्मित पदार्थो की अंतस्य त्रुटियाँ एक्सरे फोटोग्राफों द्वारा सरलता से ज्ञात की जा सकती हैं। विमान तथा उसी प्रकार के साधनों के यंत्रों में अति तीव्र वेग तथा चरम भौतिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता हैं; ऐसे यंत्रों के निर्माण में प्रत्येक अवयव अंतर्बाह्य निर्दोष तथा यथार्थ होना चाहिए। ऐसे प्रत्येक अवयव की परीक्षा एक्सरे से की जाती है और सदोष अवयवों का त्याग किया जाता है। धातु एक्सरे का अवशोषण करते हैं, अत: धातुओं के अंतर्भागों की परीक्षा के लिए मृदु एक्सरे अनुपयुक्त होते हैं। विशाल आकार के धात्वीय पदार्थो के लिए अत्युच्च विभव के एक्सरे की आवश्यकता होती है।

    धातु विज्ञान तथा धातुगवेषणा में एक्सरे अत्यंत उपयोगी हैं। धातु भी मणिभीय होते हैं, किंतु इनके मणिभ सूक्ष्म होते हैं और वे यथेच्छ प्रकार से स्थापित रहते हैं, अत: धातुओं की लावे-प्रतिमा में सामान्यत: संकेंद्र वर्तुल रहते हैं। प्रत्येक वर्तुल एक समान तीव्रता का होता है, किंतु किसी भौतिक क्रिया से कणों के आकारों में वृद्धि हो जाने पर इन वर्तुलों में बिंदु भी आते हैं। अत: एक्सरे व्याभंग द्वारा इसका ठीक ठीक पता चल जाता है कि धात्वीय मणिभों के कण किस प्रकार के हैं और उनका आकार आदि कैसा है। इस ज्ञान का धातुविज्ञान में अत्यंत महत्त्व है। धातु के पदार्थ बनाने के समय ऊष्मा के कारण उनमें अंतर्विकृति आ जाती है। धातु को मोड़ने से भी उसमें अंतर्विकृति हो जाती है। ऐसी विकृतियों का विश्लेषण एक्सरे से हो सकता है। इस प्रकार विशिष्ट गुणों से युक्त निर्दोष धातु प्राप्त करने में एक्सरे का विशेष उपयोग होता है।

    एक्सरे के अन्य उपयोगों में एक्सरे सूक्ष्मदर्शी उल्लेखनीय है। एक्सरे के तरंगदैर्घ्य प्रकाश के तरंगदैर्घ्यो से सूक्ष्म होते हैं, अत: एक्सरे सूक्ष्मदर्शी को प्रकाश सूक्ष्मदर्शी से अधिक प्रभावशाली होना चाहिए। 1948 में एक्सरे को केंद्रित करने के कर्कपैट्रिक के प्रयत्न अंशत: सफल हुए। इस रीति से तथा अन्य रीतियों से प्रतिबिंब का आवर्धन करने के प्रयत्न अब प्रायोगिक अवस्था पार कर चुके हैं और अनेक निर्माताओं द्वारा निर्मित कई प्रकार के एक्सरे सूक्ष्मदर्शी सुलभ हैं।

    प्रकाश सूक्ष्मदर्शी से जिन बातों का पता नहीं चल पाता उनका ज्ञान सरलतापूर्वक एक्सरे सूक्ष्मदर्शी से हो जाता है।

  • गामा-किरणें (γ-Rays) क्या होती हैं ?

    गामा-किरणें (γ-किरण)

    गामा-किरणों को इनके अन्वेषक के नाम पर ‘बैकुरल किरणें’ भी कहते हैं। ये अत्यन्त लघु तरंग दैर्ध्य की विद्युत-चुम्बकीय तरंगें होती है।

    ये उच्च परमाणु द्रव्यमान के रेडियोधर्मी पदार्थों, जैसे यूरेनियम, रेडियम, थोरियम. प्लूटोनियम, आदि के परमाणुओं के नाभिकों के विघटन की क्रिया से उत्सर्जित होती है। इसकी भेदन क्षमता अल्फा तथा बीटा किरणों के मुकाबले अधिक होता है ये किरणें गैस को आयनीकृत कर देती हैं।

    इनकी आवृत्ति बहुत अधिक होने के कारण ये अपने साथ बहुत अधिक ऊर्जा ले जाती हैं। इनकी भेदन क्षमता इतनी अधिक होती है, कि ये 30 सेमी. मोटी लोहे की चादर को भेद कर निकल जाती हैं।

    ये फोटोग्राफिक प्लेटों पर रासायनिक क्रिया करती हैं। ये सोडियम आयोडाइड तथा अन्य प्रस्फुरक पदार्थों की पर्त वाले पर्दे (Fluorescent screen) पर प्रस्फुर (चमक) उत्पन्न करती है। इन प्रस्फुरों के द्वारा अथवा फोटोग्राफिक प्लेट पर प्रभाव से इन किरणों की पहचान की जाती है। इनका उपयोग नाभिकीय अभिक्रिया तथा कृत्रिम रेडियोधर्मिता में किया जाता है।

    उपयोग

    • गामा किरणे, ब्रह्माण्ड में होने वाली अति उच्च ऊर्जा वाली परिघटनाओं के बारे में जानकारी देता है।
    • गामा किरणों के द्वारा आनविक परिवर्तन किया जा सकता है। इसी प्रक्रिया द्वारा अर्ध-रत्नों (semi-precious stones) के गुणों को बदला जाता है।
    • संवेदक (सेन्सर) – स्तर (levels), घनत्व तथा मोटाई मापने के लिये।
    • जीवाणुओं को मारने के लिये – इसे गामा किरणन कहते हैं। गामा किरणन द्वारा चिकित्सा उपकरणों का रोगाणुनाशन (sterilization) किया जाता है जो रासायनिक विधि तथा अन्य विधियों से की जाने वाले रोगाणुनाशन का विकल्प बनकर उभरी है।
    • गामा किरणों के द्वारा भोज्य पदार्थों से उन जीवाणुओं को मार दिया जाता है जो उनका क्षय करते हैं।
    • फल और शब्जियों का अंकुरण रोकने के लिये, या अंकुरण की गति कम करने के लिये या अंकुरण में देरी करने के लिए।
    • कैंसर की चिकित्सा में (गामा किरणों के कारण कैंसर भी हो सकता है।)
  • ध्वनि-अनुनाद क्या होता है ?

    ध्वनि-अनुनाद

    जब किसी वस्तु पर कोई बाहरी आवर्ती (Periodic force) लगाया जाता है, तो वस्तु उस बल के प्रभाव में प्रणोदित कम्पन (Forced vibration) करने लगती है। 

    यदि आवर्ती बल की आवृत्ति, वस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति के बराबर हो तो वस्तु के कम्पनों का आयाम अधिकतम हो जाता है। इस घटना को ‘अनुनाद’ (Resonance) कहते हैं। 

    1939 में संयुक्त राज्य अमेरिका का टैकोमा पुल यांत्रिक अनुनाद के कारण ही क्षतिग्रस्त हो गया था। उच्च गति की पवन पुल के ऊपर कम्पन करने लगी जो पुल की स्वाभाविक आवृत्ति के लगभग बराबर आवृत्ति की थी। इससे पुल में दोलन आरम्भ हो गया और यह कई घण्टे तक चलता रहा और कम्पन के आयाम में लगातार वृद्धि होते रहने के कारण पुल टूट गया। 

    उदाहरण

    1. सैनिकों को पल पार करने का प्रशिक्षण अनुनाद से बचने के लिए ही दिया जाता है। पुल को कम्पन कर सकने वाला एक निकाय माना जा सकता है जिसके लिए स्वाभाविक आवृत्ति का एक निश्चित मान होगा। यदि सैनिकों के नियमित पड़ने वाले कदमों की आवृत्ति पुल की आवृत्ति के बराबर हो जाए तो अनुनाद की स्थिति आ जाएगी और पुल में अधिक आयाम के कम्पन उत्पन्न हो जाएंगे। इससे पुल टूटने का खतरा रहता है। इसी कारण पुल पार करते समय सैनिकों की टुकडी कदम मिलाकर नहीं चलती। 
    2. बच्चों का झूला इसका एक सामान्य यांत्रिक उदाहरण है। झूले को ऊंचाई तक ले जाने के लिए उसे हर बार अधिक जोर से धक्का नहीं देना चाहिए, लेकिन उसे एक निश्चित अंतराल पर समान रूप से ही धक्का देना चाहिए। एक छोटे बल के प्रत्येक बार आरोपित होने से ही झूला अपनी उच्चतम स्थिति पर कुछ ही समय में पहुंच जाता है और उसकी गति विस्तृत हो जाती है।
    3. यदि कोई वायुयान कम ऊंचाई से गुजरता है, तो खिड़कियां खड़खडाने लगती हैं। ऐसा तब होता है जब खिड़की को स्वाभाविक आवृत्ति का मान वायुयान के इंजन की निकलने वाले शोर की आवृत्ति के बराबर हो जाता है। जब किसी कमरे में कोई बड़ा विस्फोट होता है, तो खिड़कियां तीव्र गति से खड़खड़ाने लगती हैं और ऐसा तब भी होता है जब खिड़िकियां बंद हों। यदि विस्फोट और भी शक्तिशाली हो, तो खिड़की टूटकर गिर सकती है। इसी प्रकार यदि कोई बम गिराया जाता है, तो कुछ दूरी तक के भवन गिर जाते हैं। 
    4. रेडियो भी अनुनाद के सिद्धान्त पर ही कार्य करता है, किसी रेडियो सेट को समस्वरित (Tune) करने के लिए रेडियो के धारिता के मान को तब तक परिवर्तित किया जाता है जब तक कि विद्युत की वह आवृत्ति न प्राप्त हो जाए जितनी आवृत्ति आ रहे ध्वनि संकेत की है। एण्टीना में छोटे विभवान्तर या वि.वा. बल उत्पन्न किए गए होते हैं जो समस्वरित परिपथ के आयाम के बराबर का आयाम बना सके।
  • ऊष्मा इंजन क्या होते हैं ?

    ऊष्मा इंजन

    ऊष्मा इंजन वह युक्ति है जो ईंधन के दहन से प्राप्त ऊष्मीय ऊर्जा को गतिज ऊर्जा में बदलती है। एक आंतरिक दहन इंजन, जैसे पेट्रोल या डीजल या जेट इंजन में ईंधन को एक बेलन के अन्दर जलाया जाता है या किसी चैम्बर में जलाया जाता है जहां ऊर्जा परिवर्तन होता है। ऐसा अन्य इंजनों जैसे टरबाइन इंजनों में नहीं होता है। 

    पेट्रोल इंजन

    जिस आन्तरिक दहन इंजन में हवा कार्यकारी पदार्थ होती है और पेट्रोल का वाष्प ईंधन होता है उसे पेट्रोल इंजन कहते हैं। पेट्रोल का कार्यकारी पदार्थ नियत आयतन पर ऊष्मा लेता है। इंजन में गर्म गैस का द्रुत प्रसार प्रयोग में लाया जाता है जिससे गर्म गैसें बेलन के पिस्टन को बल लगाकर धक्का देती रहती है। पेट्रोल इंजन की कार्यक्षमता 30 प्रतिशत होती है।

    इसका अर्थ है, कि इसे जितनी ऊष्मीय ऊर्जा दी जाती है उसका मात्र 30 प्रतिशत ही गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो पाता है। शेष ऊर्जा निर्वात चरण में बाहर चल जाती है। 

    डीजल इंजन

    जिस आन्तरिक दहन इंजन में हवा कार्यकारी पदार्थ होती है और डीजल का वाष्प ईंधन होता है, उसे ‘डीजल इंजन’ कहते हैं। दो तथा चार चरण वाले डीजल इंजनों की कार्यविधि भी पेट्रोल इंजनों की तरह ही होती है। इनमें पेट्रोल की जगह डीजल का उपयोग किया जाता है। डीजल इंजन में कोई स्पार्किंग प्लग नहीं होता है और न ही कार्बोरेटर।

  • निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute Humidity) क्या होती है ?

    निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute Humidity)

    हवा के प्रति इकाई आयतन में विद्यमान जलवाष्प की मात्रा को ‘निरपेक्ष आर्द्रता’ कहते हैं। इसे अधिकतर ग्राम प्रति घनमीटर में व्यक्त किया जाता है। वायुमण्डल की जलवाष्प धारण करने की क्षमता पूर्णत: तापमान पर निर्भर करती है। 

    हवा की आर्द्रता स्थान-स्थान पर और समय-समय पर बदलती रहती है। आर्द्रता: वायुमण्डल में मौजूद अदृश्य जलवाष्य की मात्रा को ‘आर्द्रता’ कहते हैं। वायुमण्डल में जलवाष्प की मात्रा स्थान और समय के अनुसार परिवर्तनशील होती है।

    उदाहरण 

    1. बरसात की ऋतु में नमक खुले में रखने पर गीला हो जाता है क्योंकि बरसात की ऋतु में वायु में आर्द्रता अधिक होती है जिसे नमक अवशोषित करके गीला हो जाता है।

     2. बर्फ से भरे गिलास के बाहर जल की बूंदे एकत्रित हो जाती है जिसका कारण है, कि गिलास की सतह से के सम्पर्क में आने वाली वायु की वाष्प संघनित होकर गिलास की सतह पर जम जाती है और बूंदों के रूप में दिखाई देती है। 

  • जल का असामान्य प्रसार क्या होता है ?

    जल का असामान्य प्रसार क्या होता है ?

    जल का असामान्य प्रसार

    प्रायः सभी द्रव गर्म किए जाने पर आयतन में बढ़ते हैं परन्तु जल 0°C से 4°C तक गर्म करने पर आयतन में घटता है तथा 4°C के पश्चात् बढ़ना प्रारम्भ करता है। इसका अर्थ यह है. कि 4° पर जल का घनत्व सबसे अधिक होता है।

    दैनिक जीवन में इसके कई प्रभाव दिखाई देते हैं. कुछ निम्नलिखित हैं:

    ठण्डे देशों में तालाबों के जम जाने पर भी उनमें मछलियां जीवित रहती हैं: ठण्डे देशों में जाड़े के दिनों में वायु का ताप 0° से भी कम हो जाता है। अतः वहां के तालाबों में जल जमने लगता है।

    वायु का ताप गिरने पर पहले तालाबों की सतह का जल ठण्डा होता है। अत: यह भारी होकर नीचे बैठता रहता है तथा नीचे का हल्का जल ऊपर आता रहता है। यह प्रक्रिया तब तक चली रहती है जब तक कि पूरे तालाब का जल 4°C तक नहीं गिरा जाता।

    जब सतह के जल का ताप 4°C से नीचे गिरने लगता है. तो इसका घनत्व कम होने लगता है। अतः अब यह नीचे नहीं जाता तथा 0°C तक ठण्डा होकर बर्फ के रूप में सतह पर ही जमने लगता है। अत: जल के जमने की क्रिया ऊपर से नीचे की ओर होती है (नीचे से ऊपर की ओर नहीं) बर्फ की इस पर्त के नीचे अब भी 4°C का जल रहता है।

    चूंकि बर्फ ऊष्मा का कुचालक होता है, अत: नीचे के 4°C वाले जल की ऊष्मा को बाहर नहीं जाने देता। अत: नीचे वाला जल 4°C पर ही बना रहता है और इस प्रकार वह जमने से बच जाता है। इस जल में मछलिया तथा अन्य जीव जीवित रहते हैं।

    अत्यधिक ठण्ड में जल के पाइप कभी-कभी फट जाते हैं: ठण्डे स्थानों पर जाड़े के दिनों में पाइपों में बहने वाले जल का ताप 4°C से नीचे गिर जाने पर जल के आयतन में वृद्धि होती है परन्तु धातु का पाइप सिकुड़ता है। इन विपरीत दशाओं के कारण पाइपों की दीवारों पर इतना अधिक दाब पड़ता है, कि वे फट जाते हैं।