फोटो सेल वह यंत्र है जो प्रकाश ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदल देता है।
एक फोटोवोल्टिक सेल (Photovoltaic Cell) एक अर्धचालक उपकरण है जो प्रकाश ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है। इसे सौर सेल के रूप में जाना जाता है जब प्रकाश स्रोत सूर्य का प्रकाश होता है।
जब प्रकाश एक फोटोवोल्टिक सेल के पारदर्शी आवरण से होकर गुजरता है और बाधा परत (barrier layer) से टकराता है, तो सेलेनियम परमाणुओं (selenium atoms) में इलेक्ट्रॉन ऊर्जा प्राप्त करते हैं और पारदर्शी आवरण पर जमा होने के लिए बाधा परत के माध्यम से वैलेंस रिंग (valence ring) से आगे बढ़ते हैं।\
उदाहरण
इस सेल का उपयोग सिनेमा घरों में ध्वनि के पुनरुत्पादन में, फोटोग्राफी में तथा टेलीविजन में किया जाता है।
बैंकों में चोरी की सूचना देने वाले बर्गलर्स एलार्म में इन्हीं का उपयोग होता है।
अंतरिक्ष यात्री इसी सेल द्वारा ‘सौर बैटरी’ से सूर्य के प्रकाश को विद्युत ऊर्जा में बदल लेते हैं।
फोटो सेल सड़कों पर बत्तियों के स्वतः जलने तथा बुझने में भी उपयोग में लाए जाते हैं।
फोटोवोल्टिक प्रभाव (photovoltaic effect) V/s फोटोइलेक्ट्रिक प्रभाव (photoelectric effect)
फोटोवोल्टिक प्रभाव (photovoltaic effect)फोटोइलेक्ट्रिक प्रभाव (photoelectric effect) से निकटता से संबंधित है। फोटोवोल्टिक प्रभाव में प्रकाश अवशोषित हो जाता है और एक इलेक्ट्रॉन या अन्य आवेश वाहक उच्च ऊर्जा अवस्था के लिए उत्साहित होता है।
जबकि फोटोइलेक्ट्रिक प्रभाव शब्द का उपयोग तब किया जाता है जब इलेक्ट्रॉन को सामग्री से बाहर निकाल दिया जाता है, जबकि फोटोवोल्टिक शब्द का उपयोग सामग्री के भीतर रहता है।
इस आर्टिकल में हम प्रकाश-विद्युत प्रभाव (Photo-electric Effect) क्या है ? आइंस्टीन का प्रकाश विद्युत प्रभाव (फोटो इलेक्ट्रिक इफ़ेक्ट) क्या है? प्रकाश-विद्युत प्रभाव के नियम और विशेषताएँ क्या है ? आइंस्टीन के प्रकाश विद्युत समीकरण की स्थापना कैसे हुई ? प्रकाश विद्युत उत्सर्जन का आशय और उसके नियम क्या है ?
प्रकाश-विद्युत प्रभावकी परिभाषा
प्रकाश क्वांटा-फोटॉन (light quanta – photons) के कारण धातु की प्लेट से इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन होता है।
किसी धातु की सतह पर प्रकाश पड़ने से इलेक्ट्रॉन निकलने की क्रिया ‘प्रकाश-विद्युत प्रभाव’ कहलाती है। सभी क्षारीय धातुएं एवं जिंक प्रकाश के साथ विद्युत प्रभाव दिखाती हैं। सभी धातुएं एक्स-किरणों एवं गामा-किरणों के साथ भी प्रकाश-विद्युत प्रभाव दिखाती है।
दुसरे शब्दों में, फोटो इलेक्ट्रिक प्रभाव, वह घटना है जिसमें विधुत आवेशित कण, विद्युत चुम्बकीय किरण(electromagnetic radiation) को अवशोषित करने पर किसी पदार्थ ((धातु, अधातु ठोस, द्रव एवं गैसें) से या उसके भीतर निकलते हैं। इस प्रभाव में अक्सर किसी मेटल प्लेट पर प्रकाश पड़ने पर उसमे से इलेक्ट्रॉनों का डिस्चार्ज होता है ।
व्यापक परिभाषा में, दीप्तिमान ऊर्जा (radiant energy) इन्फ्रारेड, दृश्य (visible), या पराबैंगनी प्रकाश, एक्स-रे, या गामा किरणों के रूप में हो सकती हैं; पदार्थ ठोस, तरल या गैस हो सकते है; और जो पार्टिकल रिलीज़ होते है वो विद्युत आवेशित परमाणु या अणु के साथ-साथ इलेक्ट्रॉन भी हो सकते हैं। यह घटना आधुनिक भौतिकी के विकास में मौलिक रूप से महत्वपूर्ण थी क्योंकि इसने प्रकाश की प्रकृति के बारे में महत्वपुर्ण प्रश्नों को उठाया था
प्रकाश-विद्युत प्रभाव की खोज हर्ट्स (Heinrich Rudolf Hertz) ने की थी। रेडियो तरंगों पर करने के दौरान, हर्ट्ज ने देखा कि, जब दो धातु इलेक्ट्रोड पर पराबैंगनी प्रकाश चमकता है, तो प्रकाश जिस पर स्पार्किंग होती है उसके वोल्टेज को बदल देता है । प्रकाश और बिजली (इसलिए फोटोइलेक्ट्रिक) के बीच इस संबंध को 1902 में एक अन्य जर्मन भौतिक विज्ञानी फिलिप लेनार्ड (Philipp Lenard) ने स्पष्ट किया था। इसकी विस्तृत व्याख्या आइन्सटीन (Albert Einstein) एवं मिलिकन (Robert A. Millikan) ने की जिसके लिए उन्हें क्रमश: 1921 एवं 1923 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुए।
विद्युत-चुम्बकीय तरंगें छोटे-छोटे कणों से बनी होती हैं, जिन्हें फोटॉन कहते हैं। ये फोटॉन धातु की सतह से टकराते हैं तब एक फोटॉन की कुछ ऊर्जा धातु के एक-एक इलेक्ट्रॉन में स्थानान्तरित हो जाती है।
प्रकाश-विद्युत प्रभाव के नियम
1. जब प्रकाश के विशेष रंग की कोई किरण धातु की सतह पर पड़ती है, तब प्रति सेकण्ड धातु की सतह से निकलने वाले इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रकाश की तीव्रता के अनुक्रमानुपाती होती है।
2. उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा का मान शून्य से महत्तम के बीच बदलता रहता है। इलेक्ट्रॉन की इस गतिज ऊर्जा का मान प्रकाश की आवृत्ति पर निर्भर करता है, प्रकाश की तीव्रता पर नहीं।
3. धातु की सतह पर पड़ने वाले प्रकाश की आवृत्ति का मान एक निश्चित मान से कम होता है, तो इलेक्ट्रॉन का उत्सर्जन धातु की सतह से नहीं हो पाता है। आवृत्ति के इस न्यूनतम निश्चित मान को ‘देहली आवृत्ति’ (Threshold frequency) कहते हैं। भिन्न-भिन्न धातुओं के लिए इसका मान भिन्न-भिन्न होता है। क्षारीय धातुओं के लिए इस आवृत्ति का मान वर्णक्रम के दृश्य क्षेत्र में होता है।
आइंस्टीन का प्रकाश विद्युत प्रभाव
आइन्स्टीन ने बताया कि प्रकाश-विद्युत प्रभाव के लिए आपतित फोटॉन की ऊर्जा का मान धातु के कार्यफलन (Work function) और उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा के मान के योग के बराबर होता है।
परमाणु संरचना के मॉडलों में तरंग यान्त्रिकी मॉडल (Wave mechanical model) विशेष रूप से सफल रहा है। इसका प्रारम्भिक रूप ‘बोर मॉडल’ (Bohr’s model) है जिसे सन् 1913 में डेनमार्क के भौतिक विज्ञानी नील्स बोर ने हाइड्रोजन के लिए प्रस्तुत किया था। इसके अनुसार, परमाणु में नाभिक के चारों ओर विभिन्न वृत्ताकार कक्षाओं (Circular orbits) में इलेक्ट्रॉन घूमते रहते हैं, जैसे—सूर्य के चारों ओर पृथ्वी, मंगल, आदि ग्रह घूमते रहते हैं। सबसे हल्का परमाणु हाइड्रोजन का होता है जिसमें केवल 1 इलेक्ट्रॉन होता है और सबसे भारी प्राकृतिक रूप से उपलब्ध परमाणु यूरेनियम का है जिसमें 92 इलेक्ट्रॉन होते हैं।
विकिरण उत्सर्जन
सामान्य परमाणु में इलेक्ट्रॉन अपने न्यूनतम ऊर्जा-स्तर में रहते हैं परन्तु यदि पदार्थ को गरम करके परमाणुओं को अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान की जाए तो उसके कुछ इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तरों में चले जाते हैं। यदि उच्च ऊर्जा वाला कोई कण इलेक्ट्रॉन से टकराकर उसे अपनी ऊर्जा दे देता है तो भी इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा-स्तर में पहुंच सकता है। इस स्थिति में परमाणु को ‘उत्तेजित अवस्था’ (Excited state) में कहा जाता है। परन्तु परमाणु इस अवस्था में 10-8 सेकण्ड से अधिक देर तक नहीं रहता है और इलेक्ट्रॉन वापस किसी निम्न ऊर्जा स्तर में चला जाता है। दोनों ऊर्जा-स्तरों में जो अन्तर होता है वह उतनी ऊर्जा के फोटॉन के रूप में उत्सर्जित हो जाता है। इसे ही ‘विकिरण उत्सर्जन‘ कहते हैं।
फोटॉन को ऊर्जा का पैकेट माना जा सकता है। यदि फोटॉन की ऊर्जा अधिक है, तो वे गामा किरणों (या उच्च ऊर्जा विद्युत-चुम्बकीय तरंग) के फोटॉन होते हैं और कम होने पर वे क्रमशः एक्स-किरणों के, पराबैंगनी किरणों के, दृश्य प्रकाश के या अवरक्त विकिरण के फोटॉन हो सकते हैं।
परमाणु भौतिकी में परमाणु तथा उसकी अन्तक्रियाओं (Interactions) का अध्ययन किया जाता है।
डाल्टन के परमाणुवाद के अनुसार, परमाणु पदार्थ के सबसे छोटे कण होते हैं। ये परमाणु अविभाज्य होते हैं, किन्तु बीसवीं सदी के वैज्ञानिक जे. जे. थॉमसन (J.J.Thomson) व रदरफोर्ड (Ernest Rutherford) ने पदार्थ की संरचना के गहन अध्ययन से निष्कर्ष निकाला कि परमाणु अविभाज्य नहीं है, बल्कि यह छोटे-छोटे आवेशित कणों से मिलकर बना होता है।
नाभिक,इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन औरन्यूट्रॉन
आधुनिक अभिधारणा के अनुसार, परमाणु धनावेशित प्रोटॉनों, ऋणावेशित इलेक्ट्रॉनों व उदासीन न्यूट्रॉनों से मिलकर बना होता है। परमाणु के केन्द्र में एक ‘नाभिक’ (Nucleus) होता है जिसमें परमाणु का लगभग सम्पूर्ण द्रव्यमान प्रोटॉन व न्यूट्रॉन के रूप में समाहित होता है। नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉनों का बादल जैसा होता है जिसमें इलेक्ट्रॉन लगातार गति करते रहते हैं। इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रोटॉनों की संख्या के बराबर होती है। प्रोटॉन पर धनात्मक आवेश तथा इलेक्ट्रॉन पर उतना ही ऋणात्मक आवेश होता है परन्तु न्यूट्रॉन आवेश रहित होता है।
सूर्य के केन्द्र में नाभिकीय संलयन (Nuclear fusion) क्रिया द्वारा हाइड्रोजन लगातार हीलियम में बदलती रहती है और अपार ऊर्जा निकलती रहती है। सूर्य, इस ऊर्जा का कुछ भाग पृथ्वी को प्रकाश के रूप में प्रदान करता है।
सूर्य से पृथ्वी को प्रति सेकण्ड लगभग 4×1026 जूल ऊर्जा प्राप्त होती है। केवल इतनी ऊर्जा प्रदान करने में भी प्रति सेकण्ड सूर्य के द्रव्यमान में लगभग 4 x 109 किग्रा. की कमी हो रही है परन्तु फिर भी सूर्य अपना प्रकाश लगभग 450 करोड़ वर्षों तक देता रहेगा।
तापदीप्त स्रोत
जब किसी पिण्ड को अत्यधिक गरम किया जाता है, तो वह प्रकाश देने लगता है, ऐसे पिण्ड को ‘तापदीप्त स्रोत’ कहते हैं। उत्सर्जित प्रकाश का रंग स्रोत के ताप पर निर्भर करता है। उत्सर्जित प्रकाश का रंग स्रोत के ताप पर निर्भर करता है।
प्रदीप्त वस्तुएं(Luminous bodies)
वे वस्तुएं जो अपने स्वयं के प्रकाश से प्रकाशित होती हैं, जैसे विद्युत-बल्ब, सूर्य, तारे, आदि ‘प्रदीप्त वस्तुएं’ कहलाती हैं।
अप्रदीप्त वस्तुएं (Non-luminous bodies)
ऐसी वस्तुएं जिनका अपना प्रकाश नहीं होता है परन्तु उन पर यदि प्रकाश डाला जाए, तो वे दिखाई देती हैं, जैसे–चन्द्रमा, सभी ग्रह, वृक्ष, पर्वत, आदि ‘अप्रदीप्त वस्तुएं’ कहलाती हैं।
जैव-प्रकाश (Bio-luminescence)
जुगनू (Fire fly) जैसे कुछ जन्तु प्रकाश उत्सर्जित करते है, इसे जैव-प्रकाश (Bio-luminescence) कहते हैं।
गोलीय दर्पण (Spherical Mirror): गोलीय दर्पण उस दर्पण को कहते हैं जिसकी परावर्तक सतह एक खोखले गोले का एक भाग होती है। गोलीय दर्पण प्रायः कांच के एक टुकड़े को रजतित (Silvered) कर बनाया जाता है।
ये दो प्रकार के होते हैं—अवतल दर्पण तथा उत्तल दर्पण।
अवतल दर्पण में एक परावर्तक सतह (reflective surface) होती है जो प्रकाश स्रोत से अंदर और दूर घुमावदार (curved) होती है। अवतल दर्पण प्रकाश को एक केंद्र बिंदु की ओर अंदर (inward) की ओर परावर्तित करते हैं l
बड़ी फोकस दूरी वाला अवतल दर्पण-दाढ़ी बनाने के काम में आता है। मनुष्य का चेहरा दर्पण के ध्रुव व फोकस के मध्य होता है, अत: उसका बड़ा और सीधा प्रतिबिम्ब बनता है l
डॉक्टर प्रकाश की किरणों को छोटे अवतल दर्पण से परावर्तित करके आंख, नाक, कान, गले में डालकर आन्तरिक भागों को स्पष्ट देखते हैं।
सर्चलाइटों में, मोटरकारों के हेडलाइटों, आदि में अवतल तथा परावलयिक दर्पणों का प्रयोग परावर्तकों के रूप में किया जाता है।
इसके अनुसार, अच्छे अवशोषक ही अच्छे उत्सर्जन होते हैं। अंधेरे कमरे में यदि एक काली और एक सफेद वस्तु को समान ताप तक गरम करके रखा जाए तो काली वस्तु अधिक विकिरण उत्सर्जित करेगी। अत: काली वस्तु अंधेरे में अधिक चमकेगी।
लोहे की अवशोषकता अधिक होती है, इसलिए उसकी उत्सर्जकता भी अधिक होती है। इसलिए लोहे के बर्तन शीघ्रता से गरम व शीघ्रता से ठण्डे हो जाते हैं।
उदाहरण
अत: किरचॉफ के नियमानुसार, लाल रंग की वस्तु गरम होने पर हरे रंग का प्रकाश उत्सर्जित करेगी। इसीलिए लाल कांच की गेंद को गरम करके अंधेरे कमरे में देखा जाए तो वह हरी दिखायी देती है और हरे कांच की पर्याप्त रूप से गरम गेंद लाल दिखायी देगी।
विकिरण का उत्सर्जन व अवशोषण (Emission and Absorption of Radiation)
प्रिवोस्ट के विनियम सिद्धान्त के अनुसार सभी तापों पर (परम शून्य को छोड़कर) प्रत्येक वस्तु विकिरण ऊर्जा को उत्सर्जित करती है तथा अपने वातावरण से विकिरण ऊर्जा का अवशोषण भी करती है। इस विकिरण ऊर्जा को ‘ऊष्मीय विकिरण’ (Thermal radiation) कहते हैं।
यदि वस्तु का ताप उसके चारों ओर के वातावरण के ताप से ऊंचा होता है, तो उस वस्तु के पृष्ठ से उत्सर्जित ऊर्जा, उसके द्वारा अवशोषित ऊर्जा से अधिक होती है।
समान तापमान पर दो चीजें संतुलन में रह सकती हैं, जैसे टी तापमान पर प्रकाश के बादल से घिरा पदार्थ टी तापमान पर औसत रूप से बादल में उतना प्रकाश विकिरित कर सकता है, जितना वह सोख ले, यह प्रीवोस्ट के विनिमय सिद्धांत पर आधारित है, जो विकरणशील संतुलन को सन्दर्भित करता है। विस्तृत संतुलन का सिद्धांत कहता है कि उत्सर्जन और अवशोषण की प्रक्रिया के बीच कोई अजीब किस्म का सह-संबंध नहीं है, उत्सर्जन की प्रक्रिया अवशोषण से प्रभावित नहीं होती बल्कि यह केवल उत्सर्जन कर रहे पदार्थ की सौर स्थिति से प्रभावित होती है। इसका मतलब यह हुआ कि टी तापमान पर पदार्थ द्वारा उत्सर्जित कुल प्रकाश, चाहे वह कृष्ण पदार्थ हो या नही, हमेशा उस कुल प्रकाश के बराबर होता है, जिसे पदार्थ अवशोषित करता है, जो टी तापमान पर प्रकाश से घिरा हो।
कृष्णिका के लिए अवशोषित प्रकाश की मात्रा उतनी होती है, जितनी वह सतह पर पड़ती है। किसी भी तरंगदैर्घ्य λ के प्रति ईकाई समय में अवशोषित प्रकाश ऊर्जा अनिवार्य रूप से कृष्णिका के कर्व के अनुपात में होती है। इसका मतलब है कि कृष्णिका का घुमाव कृष्णिका द्वारा उत्सर्जित प्रकाश ऊर्जा जितना है, जो इसके नाम को उपयुक्त ठहराता है। यह सौर विकिरण का किरचॉफ नियम है: कृष्णिका का उत्सर्जन घुमाव प्रकाश की सौर विशेषता है, जो केवल गुहा की दीवारों केतापमानपर ही निर्भर करता है, बशर्ते यह स्थिति होनी आवश्यक है कि गुहा में कुछ पूरी तरह से काली सामग्री हो और यह विकरणशील संतुलन में हो। जब कृष्णिका इतना छोटा हो कि इसके आकार की प्रकाश के तरंगदैर्घ्य से तुलना की जा सके तो अवशोषण संशोधित हो जाता है, क्योंकि एक छोटी सी वस्तु लंबे तरंगदैर्घ्य के प्रकाश का एक कुशल अवशोषक नहीं हो सकती, लेकिन उत्सर्जन और अवशोषण की कठोर समानता के सिद्धांत हमेशा सही ठहराये जाते हैं।
यदि एक बर्तन में गरम जल भर दिया जाए और फिर उसे ठण्डा होने दिया जाए तो प्रारम्भ में जल का ताप जल्दी-जल्दी कम होता है और जैसे-जैसे जल तथा वातावरण के ताप में अन्तर कम होता है, ताप गिरने की दर धीरे-धीरे कम होती जाती है।
विकिरण द्वारा किसी वस्तु से क्षय होने वाली ऊष्मा की दर, के पृष्ठ की प्रकृति, उसके पृष्ठ क्षेत्रफल तथा उसके व आस-पास के वातावरण के ताप के अन्तर पर निर्भर करती है।
इसका अध्ययन सर्वप्रथम न्यूटन ने किया था। न्यूटन के शीतलन नियम के अनुसार, समान अवस्था रहने पर विकिरण द्वारा किसी वस्तु के ठण्डे होने की दर (अर्थात् वस्तु की ऊष्मा क्षय होने की दर), उस वस्तु और आस-पास के वातावरण के ताप के अन्तर के अनुक्रमानुपाती होती है (जबकि ताप का अन्तर बहुत अधिक न हो)।
उदाहरण
अत: यदि गर्म दूध को थाली (बड़े पृष्ठ क्षेत्रफल वाली वस्तु) में डाला जाए तो वह शीघ्र ठण्डा हो जाता है। अत: वस्तु जैसे-जैसे ठण्डी होती जाएगी उसके ठण्डे होने की दर कम होती जाएगी।
ऊष्मा संचरण की इस विधि में माध्यम कोई भाग नहीं लेता है। इस विधि में ऊष्मा, गरम वस्तु से ठण्डी वस्तु की ओर बिना किसी माध्यम की सहायता के (अर्थात् निर्वात में भी) तथा बिना माध्यम को गरम किए प्रकाश की चाल में सीधी रेखा में संचरित होती है।
उदाहरण
पृथ्वी पर सूर्य से ऊष्मा विकिरण विधि द्वारा ही प्राप्त होती है। सूर्य तथा पृथ्वी के बीच बहुत अधिक स्थान में कोई भी माध्यम नहीं है तथा निर्वात फैला हुआ है, अत: चालन अथवा संवहन की विधि से ऊष्मा पृथ्वी तक नहीं आ सकती है (क्योंकि इनके लिए माध्यम आवश्यक है)। माध्यम की अनुपस्थिति में ऊष्मा पृथ्वी तक विकिरण द्वारा प्रकाश तरंगों के साथ पहुंचती है। विकिरण में ऊष्मा, तरंगों के रूप में चलती है जिन्हें ‘विद्युत-चुम्बकीय तरंगे’ कहते हैं।
उपयोग
चाय की केतली की बाहरी सतह चमकदार बनायी जाती है: चमकदार सतह न तो बाहर से ऊष्मा का अवशोषण करती है और न भीतर की ऊष्मा बाहर जाने देती है। अत: चाय देर तक गर्म बनी रहती है।
प्रयोगशाला में ऊष्मामापी की बाहरी सतह को, इंजन में भाप की नलियों को तथा गर्म जल ले जाने वाले पाइपों की बाहरी सतहों को पॉलिश द्वारा चमकदार बनाकर विकिरण द्वारा होने वाले ऊष्मा-ह्रास (Heat-loss) को घटाया जाता है।
पॉलिश किए हुए जूते धूप में शीघ्र गर्म नहीं होते क्योंकि वे अपने ऊपर गिरने वाली ऊष्मा का अधिकांश भाग परावर्तित कर देते हैं।
रेगिस्तान दिन में बहुत गरम तथा रात में बहुत ठण्डे हो जाते हैं: रेत ऊष्मा का अवशोषक है, अत: दिन में सूर्य की ऊष्मा को अवशोषित करके गर्म हो जाता है। रात में वह अपनी ऊष्मा को विकिरण द्वारा खोकर ठण्डा हो जाता है।
बादलों वाली रात, स्वच्छ आकाश वाली रात की अपेक्षा गर्म होती है: दिन में सूर्य की गरमी से पृथ्वी गर्म हो जाती है तथा रात को विकिरण द्वारा ठण्डी होती है। जब आकाश स्वच्छ होता है, तो ऊष्मा विकिरण द्वारा पृथ्वी से आकाश की ओर चली जाती है। परन्तु जब आकाश में बादल छाए रहते हैं, तो ऊष्मा के विकिरण बादलों से टकराते हैं। परन्तु बादल ऊष्मा के बुरे अवशोषक है, अत: ऊष्मा के विकिरण पृथ्वी की ओर वापस आ जाते हैं जिससे पृथ्वी गर्म ही बनी रहती है।