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  • रेडियोऐक्टिव समस्थानिक (Radioactive Isotopes) क्या है ?

    रेडियोऐक्टिव समस्थानिक (Radioactive Isotopes) क्या है ?

    What are Radioactive Isotopes ?

    रेडियोऐक्टिव समस्थानिक बनाने के लिए पदार्थों को रिएक्टर में न्यूट्रॉनों द्वारा किरणित (Irradiated) किया जाता है अथवा उन पर त्वरक (Accelerator) से प्राप्त उच्च ऊर्जा कणों द्वारा बमबारी की जाती है।

    आजकल रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों को उपयोग वैज्ञानिक शोध कार्य, चिकित्सा, कृषि एवं उद्योगों में लगातार बढ़ता जा रहा है। एक तत्व के सभी समस्थानिकों के रासायनिक गुण एक समान होते हैं परन्तु नाभिकीय गुण बहुत भिन्न होते हैं।

    समस्थानिकों का उपयोग

    चिकित्सा में उपयोग

    कोबाल्ट-60 एक रेडियोऐक्टिव समस्थानिक है जो उच्च ऊर्जा की गामा किरणें उत्सर्जित करता है। इन गामा किरणों का उपयोग कैंसर के इलाज में किया जाता है। थायरॉइड ग्रन्थि के कैंसर की चिकित्सा के लिए शरीर में रेडियोऐक्टिव आयोडीन समस्थानिक की पर्याप्त मात्रा प्रविष्ट कराई जाती है।

    पाचन क्रिया के अध्ययन के लिए भी रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों का उपयोग किया जाता है। भोजन में एक रेडियोऐक्टिव समस्थानिक की थोड़ी-सी मात्रा मिला दी जाती है और रोगी मनुष्य को वह भोजन खिला दिया जाता है। उसके पश्चात् वह भोजन शरीर में जहां-जहां जाता है, उस मार्ग को जी. एम. काउण्टर नामक यन्त्र द्वारा पूर्णतः पहचान लिया जाता है।

    जी. एम. अर्थात् Geiger-Miller काउण्टर एक ऐसी युक्ति (Device) है जो रेडियोऐक्टिव पदार्थ की उपस्थिति को पहचान लेती है तथा उसकी सक्रियता (Activity) को माप भी सकती है।

    रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों का उपयोग मानव शरीर में संचरित होने वाले कुल रक्त का आयतन ज्ञात करने में भी किया जाता है। रोगी पर शल्य-क्रिया करने के पहले और बाद में इस प्रकार रक्त के आयतन की माप करके यह पता लगाया जाता है, कि शल्य-क्रिया में कुल कितने रक्त की हानि हुई और उतना ही रक्त पुनः रोगी को को बाहर से दिया जाता है।

    उदाहरण के लिए, थायरॉइड ग्रन्थि के कैंसर के उपचार के लिए I-131, टयूमर की खोज में As-74 तथा परिसंचरण तन्त्र में रक्त के थक्के का पता लगाने के लिए Na-24 समस्थानिक का उपयोग किया जाता है। Co-60 का उपयोग सामान्य कैंसर के उपचार में किया जाता है।

    कृषि में उपयोग

    पौधे ने कितना उर्वरक (Fertilizer) ग्रहण किया है, इसका पता रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों की विधि से लगाया जाता है। इसे ‘ट्रेसर विधि’ (Tracer technique) कहते हैं।

    उर्वरक को पौधे में लगाने से पहले उसमें किसी रेडियोऐक्टिव समस्थानिक की थोड़ी-सी मात्रा मिला दी जाती है। जब पौधे बढ़ने लगता है, तो जी. एम. काउण्टर द्वारा पौधे में उपस्थित उर्वरक की मात्रा ज्ञात हो जाती है। इससे यह पता चलता है, कि किस पौधे को कौन-सा उर्वरक कितनी मात्रा में दिया जाना चाहिए। गामा किरणों द्वारा खाने के पदार्थों को अनुर्वर (Sterilize) किया जाता है तथा जीव नाशक (Pests) के रूप में उपयोग किया जाता है।

    उद्योग में उपयोग

    ऑटोमोबाइल के इंजन के क्षयन (Wear) का पता लगाने के लिए ट्रेसर विधि का उपयोग किया जाता है। इसके लिए इंजन के पिस्टन को रेडियोऐक्टिव बना कर पुन: इंजन में फिट कर दिया जाता है। फिर उसके स्नेहन तेल (Lubricating oil) में रेडियोऐक्टिविटी के बढ़ने की दर को माप करके पिस्टन के क्षयन (या घिसाव) को ज्ञात किया जाता है

    कार्बन काल-निर्धारण (Carbon Dating)

    मृत पेड़ पौधों, आदि जैसे प्राचीन वस्तुओं की आयु ज्ञात करने के लिए उसमें उपस्थित कार्बन समस्थानिक (6C14) के क्षय होने की दर को ज्ञात करने की विधि कार्बन आयु अंकन कहलाती है।

    जीवित अवस्था में प्रत्येक जीव (पौधे या जन्तु) कार्बन-14 (एक रेडियोऐक्टिव समस्थानिक) तत्व को ग्रहण करता रहता है और मृत्यु के बाद उसका ग्रहण करना बन्द हो जाता है। अत: मृत्यु के बाद जीव के शरीर में प्राकृतिक रूप से कार्बन-14 के क्षय (Decay) द्वारा उसकी मात्रा कम होती रहती है। अत: किसी मृत जीव में कार्बन-14 की सक्रियता को माप करके उसकी मृत्यु से वर्तमान तक के समय की गणना की जा सकती है।

    यूरेनियम काल-निर्धारण

    चट्टान, आदि प्राचीन निर्जीव पदार्थों की आयु को उनमें उपस्थित रेडियोऐक्टिव खनिजों, जैसे—यूरेनियम द्वारा ज्ञात किया जाता है। यूरेनियम काल-निर्धारण की इस विधि द्वारा चन्द्रमा से लाई गई चट्टानों की आयु 4.6 x 109 (4.6 अरब) वर्ष पाई गई है जो लगभग उतनी ही है जितनी पृथ्वी की है।

  • रेडियोधर्मिता (Radioactivity) क्या है ?

    रेडियोधर्मिता (Radioactivity) क्या है ?

    What is Radioactivity ?

    बड़े नाभिकों में दो प्रोटॉनों के बीच में दूरी इतनी कम हो जाती है कि प्रोटॉनों के मध्य उनके समान विद्युत-आवेश के कारण लगने वाला प्रतिकर्षण बल, उनके मध्य लगने वाले नाभिकीय बल (Nuclear force) जो एक आकर्षण बल होता है, से अधिक हो जाता है।

    यह पाया गया है कि जिन नाभिकों में प्रोटॉनों की संख्या 83 या उससे अधिक होती है, वे अस्थायी होते हैं। स्थायित्व प्राप्त करने के लिए ये नाभिक स्वतः ही अल्फा (α), बीटा (β) तथा गामा (γ) किरणों का उत्सर्जन करने लगते हैं। ऐसे नाभिक जिन तत्वों के परमाणुओं में होते हैं उन्हें ‘रेडियोऐक्टिव तत्व’ कहते है तथा उपर्युक्त किरणों के उत्सर्जन की घटना को ‘रेडियोधर्मिता’ कहते हैं।

    अल्फा किरणें वास्तव में धनावेशित हीलियम नाभिकों से बनी होती है तथा बीटा किरणें केवल तीव्र गति से गमन करने वाले ऋणावेश युक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं। गामा किरणे आवेश रहित फोटॉन कणों से बनती है। जब किसी नाभिक से अल्फा किरणें या बीटा किरणें उत्सर्जित हो जाती है, तो वह नाभिक एक नये तत्व के नाभिक में बदल जाता है। यदि यह नाभिक उत्तेजित अवस्था में होता है, तो वह अपने उत्तेजन ऊर्जा को गामा किरणों के रूप में उत्सर्जित करके अपनी मूल अवस्था (Ground state) में आ जाता है। इस प्रकार गामा किरणें, अल्फा या बीटा किरणों के बाद ही उत्सर्जित होती हैं।

    अर्ध-आयु (Half-life)

    किसी रेडियोऐक्टिव तत्व में किसी क्षण पर उपस्थित परमाणुओं के आधे परमाणु जितने समय में विघटित (Disintegrate) हो जाते हैं, उस समय को उस तत्व की ‘अर्ध-आयु’ कहते हैं। प्रत्येक रेडियोऐक्टिव तत्व की अर्ध-आयु निश्चित होती है। विभिन्न तत्वों की अर्ध-आयु 10-7 सेकण्ड से 1010 वर्ष तक पायी जाती है।

    तत्वान्तरण (Transmutation)

    एक रेडियोऐक्टिव तत्व का दूसरे तत्व में परिवर्तित हो जाना तत्वान्तरण कहलाता है।

    प्राकृतिक रेडियोऐक्टिव तत्व तो अल्फा या बीटा कण का उत्सर्जन करके दूसरे तत्वों में बदलते रहते ही हैं; इनके अतिरिक्त कृत्रिम रूप से भी नये तत्व बनाए जा सकते हैं। इसके लिए परमाणु क्रमांक 92 (यूरेनियम) से ऊपर के तत्वों को चुना जाता है और उन पर उच्च ऊर्जा के इलेक्ट्रॉन या प्रोटॉन की बमबारी (Bombarding) की जाती है। इस प्रकार के कृत्रिम तत्वान्तरण द्वारा अब प्रायः सभी तत्वों को रेडियोऐक्टिव भी बनाया जा सकता है।

    ऐक्टिवता (Activity)

    एक या अधिक नाभिकों के किसी नमूने (Sample) की कुल क्षमता दर (Rate of decay) उस नमूने की ‘सक्रियता’ या ‘ऐक्टिवता’ कहलाती है। इसका (SI) मात्रक ‘बेकेरल’ (Baquerrel) है।

    रेडियोधर्मिता की इकाइयाँ(Units of Radioactivity)

    क्यूरी और रदरफोर्ड रेडियोधर्मिता की इकाइयाँ हैं।

    1C = 3.7 × 10 4 Rd क्यूरी और रदरफोर्ड के बीच का संबंध है।

    1907 से पहले अपनी पेरिस प्रयोगशाला में पियरे और मैरी क्यूरी

    रेडियोधर्मी विकिरण(Radioactive Radiations)

    निम्नलिखित तीन रेडियोधर्मी विकिरण हैं जो α, β, और किरणों से प्राप्त होते हैं:

    1.ज़ब किसी तत्व से एक अल्फ़ा कण निकलता है तो उसके परमाणुभार से 4 की कमी और परमाणु क्रमांक से 2 की कमी होती है।

    2.ज़ब किसी तत्व से एक बिटा कण निकलता है तो उसके परमाणु भार में कोई परिवर्तन नहीं होता जबकि परमाणु क्रमांक में 1 की वृद्धि हो जाती है।

    3.ज़ब किसी तत्व से एक गामा किरण निकलती है तो उसके परमाणु भार और परमाणु क्रमांक में कोई परिवर्तन नहीं होत है।

    रेडियोएक्टिव पदार्थ

    सन् 1898 ई० में क्यूरी दंपति ने एक नए रेडियोएक्टिव पदार्थ की खोज (अविष्कार) की। उन्होंने लगभग 30 टन पिथ ब्लेंडी नामक पदार्थ पर कठोर परिश्रमी रासायनिक अभिक्रियाएं की, इस अभिक्रिया में विभिन्न प्रकार के तत्व प्राप्त हुए। सभी तत्वों को अलग करने के बाद केवल 2 मिलीग्राम रेडियम रेडियोएक्टिव पदार्थ प्राप्त हुआ।
    रेडियोएक्टिव पदार्थ यूरेनियम, थोरियम, पोलोनियम, एक्टिमियम तथा रेडियम आदि रेडियोएक्टिव पदार्थ हैं इन्हें रेडियोधर्मी पदार्थ के नाम से भी जाना जाता है।

    रेडियोएक्टिव क्षय का नियम

    एक नाभिक द्वारा अल्फा क्षय दो न्यूट्रॉन और दो प्रोटॉन के एक अल्फा कण का उत्सर्जन करता है

    जब किसी रेडियोएक्टिव पदार्थ के परमाणु से अथवा कण तथा किरणें निकलती हैं तो इस घटना से परमाणु का भार व क्रमांक में परिवर्तन हो जाता है। और एक नए तत्व के परमाणु का निर्माण होता है इस घटना को रेडियोएक्टिव क्षय कहते हैं।

    इस नियम के अनुसार, ” किसी भी क्षण रेडियोएक्टिव परमाणुओं के क्षय होने की दर उस क्षण उपस्थिति रेडियोएक्टिव परमाणुओं की संख्या के अनुक्रमानुपाती होती है। “
    माना किसी क्षण t पर रेडियोएक्टिव परमाणुओं की संख्या N है। तथा (t + dt) क्षण पर यह संख्या घटकर (N + dtN) हो जाती है। तब रेडियोएक्टिव परमाणुओं के क्षय होने की दर −dt/dN होगी।
    अतः रदरफोर्ड सोडी के नियम अनुसार

    इस नियम को रदरफोर्ड सोडी नियम अथवा रेडियोएक्टिव क्षय का नियम कहते हैं।
    जहां N = रेडियोएक्टिव परमाणुओं की संख्या
    N0 = समय (t = 0) पर रेडियोएक्टिव परमाणुओं की संख्या
    λ = रेडियोएक्टिव परमाणुओं का क्षय नियतांक
    t = समय है।

    रेडियोधर्मिता के लाभ और हानि (Advantages and Disadvantages of Radioactivity)

    • गामा किरणों का उपयोग कैंसर कोशिकाओं को मारने के लिए किया जाता है और इसलिए इसका उपयोग रेडियोथेरेपी में किया जाता है।
    • कोबाल्ट-60 का प्रयोग कार्सिनोजेनिक कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
    • गामा किरणों का उपयोग शरीर के आंतरिक अंगों को स्कैन करने के लिए किया जाता है।
    • गामा किरणें भोजन में मौजूद रोगाणुओं को मारती हैं और शेल्फ लाइफ को बढ़ाकर इसे क्षय से बचाती हैं।
    • चट्टान में मौजूद आर्गन सामग्री को मापकर रेडियोधर्मी विकिरणों का उपयोग करके चट्टानों की आयु का अध्ययन किया जा सकता है।

    रेडियोधर्मिता के नुकसान

    • शरीर पर रेडियोधर्मी विकिरण की उच्च खुराक से मृत्यु हो सकती है।
    • रेडियोधर्मी समस्थानिक महंगे हैं।
  • नाभिक क्या है ?

    नाभिक क्या है ?

    What is Nucleus ?

    नाभिक एक परमाणु का केंद्र कोर होता है जिसमें धनात्मक आवेश होता है और जिसमें परमाणु का अधिकांश द्रव्यमान, या किसी संगठन या समूह का केंद्रीय हृदय (Central Heart of an Organization or Group) होता है।

    नाभिक में प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन कण होते हैं

    नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या को ‘परमाणु क्रमांक’ (Atomic number) कहते हैं।

    नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों तथा न्यूटॉनों की कुल संख्या को परमाणु की ‘द्रव्यमान संख्या’ (Mass number) कहते हैं। पदार्थ की रचना परमाणुओं से होती है परन्तु परमाणु भी कुछ मूल कणों से बना होता है।

    प्रोटॉन, न्यूट्रॉन व इलेक्ट्रॉन तो प्रचलित मूल कण हैं ही, इनके अतिरिक्त भी अनेक मूल कण हैं। प्रत्येक मूल कण का प्रति कण (Antiparticle) भी होता है। कुछ प्रमुख मूल कणों का विवरण निम्नलिखित है:

    इलेक्ट्रॉन (Electron)

    इलेक्ट्रॉन की खोज 1897 में अंग्रेज वैज्ञानिक जे. जे. थॉमसन ने कैथोड किरणों के रूप में की। इलेक्ट्रॉन अतिसूक्ष्म कण होते है तथा ये परमाणु में नाभिक के बाहर चारों ओर चक्कर लगाते हैं। इन पर 1.6 x 10-19 कूलॉम का ऋणात्मक आवेश होता है। इनका द्रव्यमान 9.1 x 10-31 किग्रा. होता है। यह एक स्थायी (Stable) मूल कण है ।

    प्रोटॉन (Proton)

    प्रोटॉन की खोज अंग्रेज वैज्ञानिक रदरफोर्ड ने सन् 1919 में नाइट्रोजन नाभिकों पर कणों का प्रहार करके की। प्रोटॉन का द्रव्यमान 1.67239 x 10-27 किग्रा. होता है और आवेश 1.6x 10-19 कूलॉम धनात्मक होता है। यह एक अतिसूक्ष्म कण है। इसका उपयोग कृत्रिम तत्वान्तरण (Artificial transmutation) में होता है।

    न्यूट्रॉन (Neutron)

    न्यूट्रॉन की खोज अंग्रेज वैज्ञानिक चैडविक ने सन् 1932 में बेरेलियम पर a कणों का प्रहार करके की। यह एक आवेश रहित कण है। इसका द्रव्यमान 1.675 x x 10-27 किग्रा. होता है। इसकी भेदन-क्षमता (Penetrating power) अत्यधिक होती है। यह कैंसर की चिकित्सा और नाभिकीय विखण्डन (Nuclear fission) में प्रयुक्त किया जाता है।

    पोजिट्रॉन (Positron)

    यह एक धनावेशित मूल कण है जिसका द्रव्यमान व आवेश इलेक्ट्रॉन के बराबर होता है। इसलिए इसे इलेक्ट्रॉन का प्रतिकण या ऐण्टि-कण (Anti-particle) भी कहते हैं। इसकी खोज 1932 में एण्डरसन (Anderson) ने की थी।

    न्यूट्रिनों (Neutrino)

    ये लगभग द्रव्यमान रहित व आवेश रहित मूल कण हैं। इनकी खोज 1930 में पाउली (Pauli) ने की थी। न्यूट्रिनों का भी प्रतिकण होता है जिसे ‘ऐण्टिन्यूट्रिनों’ कहते हैं। इन दोनों में अन्तर केवल इतना ही है, कि ऐण्टिन्यूट्रिनों की स्पिन (Spin) न्यूट्रिनों की स्पिन के विपरीत होती है l

    पाई-मेसॉन (π-Meson)

    पाई-मेसॉन मूल कणों की सैद्धान्तिक खोज सन् 1935 में वैज्ञानिक युकावा ने की थी। ये कण तीन प्रकार के होते हैं — उदासीन (π०), धनात्मक (π+), ऋणात्मक (π) पाई-मेसॉन। ये अस्थायी कण होते हैं। इनका जीवन काल 10-8 सेकण्ड व द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान का लगभग 274 गुना होता है।

    फोटॉन (Photon)

    फोटॉन ऊर्जा के बण्डल (Packets) होते है जो प्रकाश की चाल से चलते हैं। सभी प्रकार की विद्युत-चुम्बकीय किरणों का निर्माण इन्हीं मूल कणों से होता है। इनका विराम द्रव्यमान (Rest mass) शून्य होता है।

    कुछ नाभिक दूसरों की अपेक्षा अधिक स्थायी होते हैं। नाभिक में प्रोटॉनों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ उनके मध्य प्रतिकर्षण बल भी बढ़ जाता है जिससे नाभिक के टूटने का खतरा पैदा हो जाता है। जिन नाभिकों में प्रोटॉनों (या न्यूटॉनों) की संख्या 2, 8, 14, 20, 50, या 82 होती है, वे स्थायी होते हैं। इसके अतिरिक्त जिन नाभिकों में प्रोटॉन संख्या 114 होती है, वे भी स्थायी होते हैं । इसी प्रकार जिन नाभिकों में न्यूट्रॉनों की संख्या 126 या 184 होती है, वे भी स्थायी होते हैं।

    अतः न्यूट्रॉन संख्या N या प्रोटॉन संख्या Z के मान 2, 8, 14, 20, 50 तथा 82 ‘स्थायित्व संख्याएं’ (Magic numbers) कहलाते हैं।

    ऐक्टिवता (Activity)

    एक या अधिक नाभिकों के किसी नमूने (Sample) की कुल क्षमता दर (Rate of decay) उस नमूने की ‘सक्रियता’ या ‘ऐक्टिवता’ कहलाती है। इसका (SI) मात्रक ‘बेकेरल’ (Baquerrel) है।

  • मेसर (Maser) क्या है ?

    मेसर (Maser) क्या है ?

    What is Maser ?

    मेसर का अर्थ है ‘विकिरण के उद्दीपित उत्सर्जन द्वारा माइक्रोतरंग का प्रवर्धन‘ (Microwave Amplification by Stimulated Emission of Radiation)।

    मेसर एक शक्तिशाली, एकवर्णी, समान्तरित्र एवं कला-सम्बद्ध (Collimated and coherent) माइक्रोतरंग किरण-पुंज प्राप्त करने की युक्ति (Device) है। सर्वप्रथम अमोनिया मेसर बनाया गया था

    मेसर के उपयोग

    अन्तरिक्ष व समुद्र में संदेश-प्रेषण, जटिल ऑपरेशन, कैंसर, अल्सर व आंख की बीमारियों की चिकित्सा हेतु प्रयुक्त किया जाता है।

  • राडार (Radar) क्या है  ?

    राडार (Radar) क्या है ?

    What is Radar ?

    राडार का अर्थ है—’रेडियो संसूचन एवं सर्वेक्षण’ (Radio Detection and Ranging)

    इसके द्वारा रेडियों तरंगों की सहायता से आकाशगामी वायुयान की स्थिति व दूरी का पता लगाया जाता है।

    राडार से प्रेषित एवं वायुयान से परावर्तित तरंगों के मध्य समयान्तर ज्ञात करके वायुयान की दूरी ज्ञात की जाती है।

    राडार का उपयोग वायुयानों के संसूचन, निर्देशन एवं संरक्षण में, बादलों की स्थिति व दूरी ज्ञात करने में, धातु व तेल के भण्डारों का पता लगाने में एवं वायुमण्डल की उच्चतम पर्त, आयनमण्डल की ऊंचाई ज्ञात करने में किया जाता है।

  • टेलीविजन (Television) कैसे काम करता है ?

    टेलीविजन (Television) कैसे काम करता है ?

    How television works ?

    तीन विधि से हम टेलीविज़न के कार्य को समझते है

    टेलीविजन द्वारा ध्वनि तथा दृश्य दोनों को एक टेलीविजन का अर्थ होता है दूर की वस्तुओं को देखना। इसकी सहायता चित्रों, विभिन्न दृश्यों, चलती फिरती वस्तुओं आदि को विद्युत चुंबकीय तरंगों के रूप में दूरस्थ स्थानों को भेजा जाता है। साथ ही रेडियो तरंगों द्वारा आवाज को एक स्थान से दूसरे स्थान को संप्रेषित किया जाता है।

    वस्तुओं का क्रमवीक्षणीकरण(scanning) जिसमें वस्तुओं को आर्वधन विधि (magnifying method)की सहायता से छोटे-छोटे काले व सफेद बिन्दुओं में बदला जाता है। इनमें से प्रत्येक बिन्दु को तत्व (element) कहते हैं । दूसरी विधि में क्रमवीक्षण (scanning) वस्तुओं से निकली प्रकाश तरंगों को वैद्युत तरंगों (electrical waves) में परिवर्तित किया जाता है। इसके लिये प्रकाश विद्युत सेलों का इस्तेमाल किया जाता है l तीसरी विधि में इन विद्युत तरंगों को पुनः प्रकाश तरंगों में इस प्रकार परिवर्तित किया जाता है कि वास्तविक चित्र दिखायी दे।

    टेलीविजन के दो भाग होते हैं—(1) आइकोनोस्कोप, (2) काइनोस्कोप

    आइकोनोस्कोप (Iconocoscope)

    यह चित्र द्वारा प्रकीर्णित (Scattered) प्रकाश तरंगों को विद्युत तरंगों में परिवर्तित करता है जिन्हें प्रवर्धित व मॉडुलित (Amplified and modulated) करके दूरस्थ स्थानों को प्रेषित कर दिया जाता है। आइनोस्कोप को टेलीविजन प्रेषी या दूरदर्शन कैमरा भी कहते हैं।

    काइनोस्कोप (Kineoscope)

    यह एक प्रकार का कैथोड किरण ऑसिलोग्राफ (CRO) है जो आइकोनोस्कोप से आने वाली विद्युत तरंगों से तुल्यकालित (Synchronised) होता है और पर्दे पर चित्र व दृश्य के अनुसार, प्रतिदीप्ति उत्पन्न करता है। अत: दृष्टि निर्बंध (Persistence of vision) के कारण एक सतत् चित्र पर्दे पर दिखाई देता है।

    टेलीविजन की सहायता से हम घर बैठे दुनिया के विभिन्न कार्यक्रम देख सकते हैं। इसके लिये भू -स्थिर उपग्रह का प्रयोग किया जाता है। इन्हीं उपग्रहों को पृथ्वी तल से 36000 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित किया जाता है तथा इनका परिक्रमण काल पृथ्वी द्वारा.अपने अक्ष के चारो तरफ परिक्रमण काल (24 घण्टे) के बराबर होता है।

    भारत के इनसेट उपग्रह इसी तरह के उपग्रह हैं। पृथ्वी पर होने वाले कार्यक्रमों को विद्युत तरंगों में परिवर्तित करके, इन उपग्रहों की ओर भेजा जाता है, जहाँ पर ये इन तरंगों को ग्रहण करके इनका आवर्धन करते हैं व पुनः पृथ्वी की ओर भेज देते हैं। पृथ्वी पर स्थित विभिन्न स्टेशन इन्हें ग्रहण कर लेते हैं। और इनका प्रसारण टीवी पर करते हैं l

  • अर्धचालक (Semiconductor) क्या है ?

    अर्धचालक (Semiconductor) क्या है ?

    What is Semiconductor ?

    जर्मेनियम व सिलिकॉन जैसे पदार्थ जिनकी विद्युत चालकता सामान्य ताप पर चालक (Conductors) व विद्युत-रोधी (Insulators) पदार्थों की चालकताओं के मध्य होती है, ‘अर्धचालक’ कहलाते हैं।

    ताप बढ़ाने पर अर्धचालक की चालकता बढ़ती है तथा ताप घटाने पर घटती है जबकि चालक पदार्थों की चालकता ताप बढ़ाने पर घटती है।

    शुद्ध अर्धचालक को ‘निज अर्धचालक’ (Intrinsic semiconductor) कहते है तथा अपद्रव्य (Impurity) युक्त अर्धचालक को ‘बाह्य अर्धचालक’ (Extrinsic semiconductor) कहते हैं। अपद्रव्य मिलाए जाने की प्रक्रिया को ‘डोपिंग’ (Doping) कहते हैं।

    N-टाइप अर्धचालक

    शुद्ध अर्धचालक (जैसे–जर्मेनियम) में किसी पंचसंयोजी (Pentavalent) अपद्रव्य, जैसे आर्सेनिक को मिलाने से N-टाइप अर्धचालक प्राप्त होता है। इसमें धारा प्रवाह मुख्यतः इलेक्ट्रॉनों द्वारा होता है।

    P-टाइप अर्धचालक

    शुद्ध अर्धचालक में किसी त्रिसंयोजी (Trivalent) अपद्रव्य, जैसे-ऐलुमिनियम को मिलाने से P-टाइप अर्धचालक प्राप्त होता है। इसमें धारा प्रवाह मुख्य रूप से होल (Hole) द्वारा किया जाता है।

    उदाहरण

    ट्रांजिस्टर (Transistor): इसमें भिन्न अर्द्ध चालकों की दो संधियां बनाई जाती है। जब एक N-टाइप अर्धचालक की पतली पर्त को दो P-टाइप अर्धचालकों के मध्य दबा कर रखा जाता है, तो इससे P-N-P प्रकार का ट्रांजिस्टर बन जाता है।

  • X-किरणें (X-Rays) क्या है ? एक्स किरणों की खोज, उनके प्रकार,गुण और विशेषताएँ  (Hindi me)

    X-किरणें (X-Rays) क्या है ? एक्स किरणों की खोज, उनके प्रकार,गुण और विशेषताएँ (Hindi me)

    इस आर्टिकल में हम जानेगें कि X-किरणें (X-Rays) क्या होती है ? उसकी खोज कब हुई ? उसके प्रकार क्या है ?, एक्स-रे किरणों की गुण और विशेषताएँ क्या है ?

    एक्स-रे विद्युत चुम्बकीय विकिरण (electromagnetic radiation) का एक प्रकार हैं जिसका सबसे ज्यादा आम प्रयोग चिकित्सकों द्वारा किसी रोगी की त्वचा के माध्यम से उसकी हड्डियों की छवियों (images) को देखा जाता है । टेक्नोलॉजी के बढ़ने के साथ केंद्रित एक्स-रे बीम के साथ-साथ इन प्रकाश तरंगों का प्रयोग तेजी से बढ़ा है और आज X – रे किरणों जैविक कोशिकाओं की इमेजिंग से लेकर कैंसर कोशिकाओं को मारने तक में सक्षम है ।

    X-किरणों का इतिहास (History of X-rays)

    एक्स-रे किरणों की खोज 1895 में जर्मनी के वुर्जबर्ग विश्वविद्यालय (Würzburg University) के प्रोफेसर विल्हेम कॉनराड रोएंटजेन (Wilhelm Conrad Röentgen) ने की थी।

    नॉनडेस्ट्रक्टिव रिसोर्स सेंटर ( Nondestructive Resource Center) के “हिस्ट्री ऑफ रेडियोग्राफी” के अनुसार, रोएंटजेन ने एक उच्च वोल्टेज कैथोड-रे ट्यूब (cathode-ray tube) के पास क्रिस्टल को एक फ्लोरोसेंट (fluorescent) चमक प्रदर्शित करते हुए देखा, और ऐसा तब हुआ जब कि क्रिस्टल को रोएंटजेन ने काले कागज से परिरक्षित (shielded) किया। कागज को भेदने वाली नली से किसी प्रकार की ऊर्जा उत्पन्न हो रही थी और क्रिस्टलों में चमक आ रही थी। रॉन्टगन ने इस अज्ञात ऊर्जा को “एक्स-विकिरण” कहा। इस तरह प्रयोगों से पता चला कि यह विकिरण हमारी त्वचा के नरम ऊतकों में प्रवेश कर सकता है लेकिन हड्डी में नहीं, और इस तरह एक्स-रे किरणों का प्रयोग फोटोग्राफिक प्लेटों पर छाया चित्र उत्पन्न करने में होने लगा l

    X-किरणों का उत्पादन कैसे होता है ? How are X-rays produced?

    X-किरणों का उत्पादन एक निर्वातित (Evacuated) X-किरण नलिका में किया जाता है जिसमें एक इलेक्ट्रॉनों का स्रोत, जैसे—एक तप्त तन्तु (Heated filament) तथा एक टंगस्टन का लक्ष्य (Target) होता है जिससे इलेक्ट्रॉन टकराते हैं, अर्थात् स्रोत व लक्ष्य आमने-सामने होते हैं। इन दोनों के मध्य लगभग 50,000 से 1,00,000 वोल्ट का विभवान्तर रखा जाता है। उच्च विभवान्तर के कारण इलेक्ट्रॉन लक्ष्य की ओर त्वरित हो जाते हैं और बहुत अधिक वेग से लक्ष्य से टकराते हैं।

    अभिलाक्षणिक X-किरणें (Characteristic X-rays)

    टंगस्टन के परमाणु उत्तेजित हो जाते हैं और जब वे अपनी सामान्य अवस्था में आते हैं, तो X-किरणों के फोटॉन उत्सर्जित करते हैं। इस तरह उत्पन्न X-किरण फोटॉन की ऊर्जा निश्चित होती है, अतः इन्हें ‘अभिलाक्षणिक X-किरणें’ (Characteristic X-rays) कहते हैं।

    संतत X-किरणें (Continuous X-rays)

    इसके विपरीत, यदि X-किरणों के फोटॉनों की ऊर्जाएं एक निश्चित न्यूनतम मान से किसी निश्चित अधिकतम मान तक के बीच की सभी सम्भव ऊर्जाएं होती हैं, तो इस तरह की X-किरणों को ‘संतत X-किरणें’ (Continuous X-rays) कहते हैं। ये किरणें तब उत्पन्न होती हैं जब कुछ इलेक्ट्रॉन लक्ष्य के निकट के स्थान में अवमन्दित (Decelerated) होते हैं।

    एक्स किरणों के प्रकार (Types of X-Rays)

    एक्स-रे किरणों को मोटे तौर पर सॉफ्ट (नरम) एक्स-रे किरणें (soft X-rays) और हार्ड (कठोर) एक्स-रे किरणें (hard X-rays) में वर्गीकृत किया जाता है। नरम एक्स-रे में लगभग 10 नैनोमीटर (एक नैनोमीटर मीटर का एक अरबवां हिस्सा) की अपेक्षाकृत कम तरंग दैर्ध्य (wavelengths) होती है, और इसलिए वे पराबैंगनी (ultraviolet) (यूवी) प्रकाश और गामा-किरणों (gamma-rays) के बीच विद्युत चुम्बकीय (electromagnetic) (ईएम) स्पेक्ट्रम की सीमा में आते हैं। हार्ड एक्स-रे में लगभग 100 पिकोमीटर की तरंग दैर्ध्य होती है (एक पिकोमीटर एक मीटर का एक ट्रिलियनवां हिस्सा होता है)। ये विद्युतचुंबकीय तरंगें EM स्पेक्ट्रम के समान क्षेत्र में गामा-किरणों के रूप में व्याप्त हैं। उनके बीच एकमात्र अंतर उनके स्रोत का है: एक्स-रे इलेक्ट्रॉनों को तेज करके उत्पन्न होते हैं, जबकि गामा-किरणें चार परमाणु प्रतिक्रियाओं में से एक में परमाणु नाभिक द्वारा निर्मित होती हैं।

    एक्स किरणों के गुण (Properties of X-Rays)

    मानव शरीर पर सीधे X किरणें के उपयोग होने पर यह उत्तकों और स्वेत रुधिर कोशिकाओं को नष्ट कर सकती है ।

    ये किरणें प्रकाश के वेग से गति करती है, निर्वात में इनकी गति 3.00 × 108 m/s होती है।

    X किरणें विद्युत चुम्बकीय विकिरण होती है जिनकी तरंग दैर्ध्य 10 A से 0.01 A के मध्य होती है।

    चुम्बकीय क्षेत्र तथा विद्युत क्षेत्र द्वारा ये किरणें विक्षेपित नहीं होती है।

    इनकों नग्न आखों से नहीं देखा जा सकता है।

    सामान्य प्रकाश की तरह ये किरणें भी अपवर्तन , परावर्तन , विवर्तन , व्यतिकरण आदि घटनाओं को प्रदर्शित करती है।

    ये किरणें कॉम्पटन प्रभाव तथा प्रकाश विद्युत प्रभाव को प्रदर्शित करती है।

    खुली जगह में एक सीधी रेखा के रूप में गति करती है।

    इनमे कोई ध्वनी उत्पन्न नहीं होती है और न ही कोई गंध उत्पन्न होती है।

    सीसा X  किरणों का सबसे अच्छा अवशोषक होता है।

    इन किरणों का उपयोग राडार में नहीं किया जा सकता है क्यूंकि ये किरणें लक्ष्य से परावर्तित कम होती है और लक्ष्य द्वारा अवशोषित अधिक होती है।

    एक्स किरणों का उपयोग (Uses of X-Rays)

    कुछ सामग्रियों में अन्दर घुसने की इनकी क्षमता के कारण, एक्स किरणों का उपयोग कई गैर-विनाशकारी मूल्यांकन और परीक्षण अनुप्रयोगों विशेष रूप से संरचनात्मक घटकों (structural components) में खामियों या दरारों की पहचान के लिए किया जाता है, ।

    इसका उपयोग डॉक्टरों और दंत चिकित्सकों द्वारा क्रमशः हड्डियों और दांतों की एक्स-रे छवियों को बनाने के लिए किया जाता है।

    एक्स किरणों के द्वारा ही यात्रियों के सामान (luggage), कार्गो और परिवहन आदि का सुरक्षा निरीक्षण  किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक इमेजिंग डिटेक्टर कोई भी सामान और वस्तुओं को रियल टाइम में देख सकते है और उनकी जाँच कर सकते है ।

    रेडिएशन थेरेपी में high-energy radiation द्वारा X – किरणों के उपयोग से कैंसर कोशिकाओं के डीएनए को डैमेज कर शरीर से उन्हें खत्म किया जाता है l

    रेडियोग्राफी में इनका उपयोग किया जाता है।

    किसी भी क्रिस्टल की संरचना अध्ययन x किरणों की मदद से की जाती है।

    रेडियो चिकित्सा के क्षेत्र में x किरणों का उपयोग किया जाता है l

  • कैथोड किरणें (Cathode Rays) क्या है ? कैथोड किरणों की खोज, कैथोड किरणों के गुण और विशेषताएँ क्या है, केथोड किरणें नलिका क्या है (in Hindi)

    कैथोड किरणें (Cathode Rays) क्या है ? कैथोड किरणों की खोज, कैथोड किरणों के गुण और विशेषताएँ क्या है, केथोड किरणें नलिका क्या है (in Hindi)

    What is Cathode Rays ?

    जब विसर्जन नलिका (Discharge tube) के सिरों पर 20 किलो वोल्ट का विभवान्तर लगाया जाता है और उसका दाब 0.1 मिलीमीटर पारे के स्तम्भ के बराबर होता है, तो उसके कैथोड से एक इलेक्ट्रॉन पुंज (Beam) निकलने लगता है। इसे ही ‘कैथोड किरणें‘ कहते हैं। अत: कैथोड किरणें केवल उच्च ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉनों का पुंज है। इसके अलावा जब किसी इलेक्ट्रान नलिका में किसी फिलामेंट को गर्म किया जाता है तो इस फिलामेंट से भी इलेक्ट्रान की धारा निकलती है अर्थात इससे भी इलेक्ट्रान उत्सर्जित होते है इन ऋणात्मक कणों को भी कैथोड किरणें कहा जता है।

    जब कैथोड किरणें किसी उच्च परमाणु क्रमांक वाली धातु (जैसे—टंगस्टन) पर गिरती हैं, तो ये X-किरणें उत्पन्न करती हैं। कैथोड किरणें कांच पर गिरती हैं, तो प्रतिदीप्ति उत्पन्न करती हैं।

    ये विद्युत तथा चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा विक्षेपित (Deflect) हो जाती हैं।

    कैथोड किरणों की खोज किसने की ?

    कैथोड किरणें पहली बार 1869 में जर्मन भौतिक विज्ञानी जूलियस प्लकर और जोहान विल्हेम हिट्टोर्फ (Julius Plücker and Johann Wilhelm Hittorf) द्वारा देखी गई थी और 1876 में यूजेन गोल्डस्टीन कैथोडेनस्ट्रालेन (Eugen Goldstein Kathodenstrahlen) द्वारा इन्हें ‘कैथोड किरणों (Cathode Rays)’ का नाम दिया। 1897 में, ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी जे जे थॉमसन (J. J. Thomson) ने दिखाया कि कैथोड किरणें पहले अज्ञात नेगेटिव आवेशित कणों से बनी थीं, जिसे बाद में इलेक्ट्रॉन नाम दिया गया।

    कैथोड-रे ट्यूब

    कैथोड-रे ट्यूब (Cathode-ray tubes (CRTs) (सीआरटी) के जरिये एक स्क्रीन पर कोई भी इमेज (छवि) दिखाने के लिए विद्युत या चुंबकीय क्षेत्रों द्वारा विक्षेपित इलेक्ट्रॉनों के एक केंद्रित बीम का उपयोग करते हैं।

    कैथोड किरणों के गुण

    1. कैथोड किरणों को केवल गैस का प्रयोग करके पैदा किया जा सकता है।

    2. कैथोड किरणों के उत्पादन में विभव का स्रोत प्रेरण कुन्डली होता है, जो कम विभव के सेल से बहुत उच्च विभव प्रदान करता है। यह पारम्परिक प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है।

    3. कैथोड किरणों अदृश्य होती है और सीधी रेखाओं में चलती है।

    4. कैथोड किरणों ऋणात्मक होती है, इसलिए ये कैथोड से एनोड की तरफ गमन करती है। ये इलेक्ट्रान की बनी होती है और अपनी सतह के लंबवत निकलती है।

    5. कैथोड किरणों का वेग, प्रकाश के वेग का 1/10 गुण होता है।

    6. यह किरण विघुत एवं चुंबकीय क्षेत्र में विक्षेपित होती है।

    7. यह गैसो को आयनित कर देती है एवं धातु पर उष्मीय प्रभाव दिखलाती है।

    8. यह फोटोग्राफिक प्लेट को प्रभावित करती है।

    9. इसकी वेधन क्षमता कम होती है यह धातु की चादर से पार कर जाती है।

    10. कैथोड किरणें जब विघुतीय क्षेत्र से होकर लंबवत गुजरती है, तो इसका रास्ता परवलयाकार होता है।

  • तापदीप्ति (Incandescence) और प्रतिदीप्ति (Fluorescence) क्या है ? तापदीप्तता और प्रतिदीप्तिता की विशेषताएँ (in Hindi)

    तापदीप्ति (Incandescence) और प्रतिदीप्ति (Fluorescence) क्या है ? तापदीप्तता और प्रतिदीप्तिता की विशेषताएँ (in Hindi)

    निचे दिए article में हम तापदीप्ति (Incandescence) और प्रतिदीप्ति (Fluorescence) क्या है, और उनकी विशेषतायें क्या है ? इनके बारे में बतायेगे l

    तापदीप्ति (Incandescence) क्या है ? What is Incandescence ?

    यदि पदार्थ को गर्म करके उसके परमाणुओं को उत्तेजित किया जाए तो अपनी सामान्य अवस्था में आने पर वे प्रकाश विकिरण उत्सर्जित करते हैं (अर्थात् गर्म करने पर कुछ पदार्थ चमकने लगते हैं)। इस घटना को ‘तापदीप्ति’ कहते हैं

    सामान्य विद्युत बल्ब के गर्म टंगस्टन तन्तु द्वारा उत्सर्जित किए गए प्रकाश में विभिन्न तरंग दैर्यों का मिश्रण (विभिन्न रंगों का मिश्रण) होता है इसीलिए वह प्रकाश श्वेत दिखाई देता है। सूर्य का प्रकाश भी तापदीप्ति का ही परिणाम है।

    तापदीप्ति (Incandescence) की विशेषताएँ क्या है ?

    तापदीप्तता तापीय विकिरण (thermal radiation) के कारण होती है। यह आमतौर पर विशेष रूप से दृश्य प्रकाश (Visible light) को संदर्भित करता है, जबकि थर्मल विकिरण इन्फ्रारेड या किसी अन्य विद्युत चुम्बकीय विकिरण को संदर्भित करता है।

    ज्यादा efficient प्रकाश स्रोत, जैसे कि फ्लोरोसेंट लैंप और एलईडी, तापदीप्ति द्वारा कार्य नहीं करते हैं।

    सूरज की रोशनी सूरज की “सफेद गर्म” सतह की ही तापदीप्ति है

    प्रतिदीप्ति (Fluorescence) क्या है ?

    कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं कि यदि उन पर पराबैंगनी प्रकाश (अर्थात् उसके फोटॉन) डाला जाए तो वे उसे अवशोषित कर लेते हैं और उनके परमाणु इस अतिरिक्त ऊर्जा को प्राप्त करके उत्तेजित अवस्था में चले जाते हैं। जब वे सामान्य अवस्था (Ground state) में आते हैं, तो दृश्य प्रकाश का उत्सर्जन करते हैं। ऐसे पदार्थों को ‘प्रतिदीप्त पदार्थ’ (Fluorescent materials) तथा इस घटना को ‘प्रतिदीप्ति’ कहते हैं।

    प्रतिदीप्ति (Fluorescence) की विशेषताएँ और उदाहरण क्या है ?

    घरों में प्रयोग की जाने वाली ट्यूब में इसी घटना का उपयोग किया जाता है। इस ट्यूब में पारे की वाष्प तथा आर्गन गैस (या अन्य कोई अक्रिय गैस) का मिश्रण भरा रहता है। विद्युत-धारा प्रवाहित होने पर इस मिश्रण द्वारा पराबैंगनी विकिरण का उत्सर्जन किया जाता है।

    ट्यूब की दीवारों पर प्रतिदीप्त पदार्थ जिसे ‘फॉस्फर’ (Phosphor) कहते हैं, का लेप होता है जो इन पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर लेता है और बाद में दृश्य प्रकाश का उत्सर्जन करता है।

    प्रतिदीप्ति पदार्थों के दैनिक जीवन में अनेक उपयोग देखने को मिलते हैं। इनकी सहायता से आंखों से न दिखायी देने वाले विकिरणों, जैसे—पराबैंगनी किरणें, एक्स किरणें, आदि का पता लगाया जाता है।