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  • Nobel Prize in Physics 2022: तीन वैज्ञानिकों को भौतिक विज्ञान के लिए नोबेल प्राइज

    Nobel Prize in Physics 2022: तीन वैज्ञानिकों को भौतिक विज्ञान के लिए नोबेल प्राइज

    एलेन एस्पेक्ट, जॉन एफ क्लॉजर और एंटोन ज़िलिंगर को भौतिक विज्ञान के लिए नोबेल प्राइज (The Nobel Prize in Physics 2022) से सम्मानित किया गया है |

    नोबेल पुरस्कारों की घोषणा की शुरुआत 3 अक्टूबर 2022  से हो गई थी | सबसे पहले फिजियोलॉजी/मेडिसिन कैटि‍गरी में पुरस्‍कार का ऐलान किया गया। इस बार का मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार स्वीडन के स्‍वांते पाबो (Svante Pääbo) को ‘‘विलुप्त होमिनिन और मानव विकास के जीनोम से संबंधित खोजों के लिए (Discoveries concerning the genomes of extinct hominins and human evolution)’ दिया गया है।  पाबो ने आधुनिक मानव और विलुप्त प्रजातियों के जीनोम की तुलना कर बताया कि इनमें आपसी मिश्रण है।

    इसी क्रम में मंगलवार (4 अक्टूबर 2022) को भौतिकी विज्ञान (Physics Science) के लिए नोबेल पुरस्कारों की घोषणा की गई | रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज (The Royal Swedish Academy of Sciences) ने एलेन एस्पेक्ट (Alain Aspect), जॉन फ्रांसिस क्लॉजर (John F. Clauser) और एंटोन ज़िलिंगर (Anton Zeilinger) को भौतिकी में 2022 नोबेल पुरस्कार से सम्मानित करने का निर्णय लिया है |

    एलेन एस्पेक्ट फ्रांस के भौतिक विज्ञानी हैं, जबकि जॉन ए.क्लॉसर अमेरिका और एंटोन जिलिंगर ऑस्ट्रिया के वैज्ञानिक हैं।

    तीनों वैज्ञानिकों को ‘क्वांटम मेकैनिक्स’ के क्षेत्र में कार्य करने के लिए ये पुरस्कार दिया गया है |

    उन्हें यह पुरस्कार इनटैंगल्ड फोटॉन (Entangled photons) के साथ प्रयोग करने, बेल असमानताओं (Bell inequalities) के उल्लंघन को स्थापित करने और क्वांटम इन्फॉर्मेशन साइंस में उनके काम के लिए दिया गया है |

    इन वैज्ञानिकों ने इनटैंगल्ड फोटॉन (Entangled photons) का उपयोग करते हुए अभूतपूर्व प्रयोग किए हैं, जहां दो कण अलग होने पर भी एक इकाई की तरह व्यवहार करते हैं। उनके परिणामों ने क्वांटम सूचना पर आधारित नई तकनीक का रास्ता साफ कर दिया है।

    इनटैंगल्ड फोटॉन (Entangled photons) और एलेन एस्पेक्ट, जॉन एफ क्लॉजर और एंटोन ज़िलिंगर की खोज

    क्वांटम यांत्रिकी (Quantum Mechanics) अब अनुसंधान का एक बड़ा क्षेत्र है जिसमें क्वांटम कंप्यूटर, क्वांटम नेटवर्क और सुरक्षित क्वांटम एन्क्रिप्टेड संचार शामिल हैं।

    इस विकास का एक प्रमुख कारक यह है कि कैसे क्वांटम यांत्रिकी दो या दो से अधिक कणों को एक उलझी हुई अवस्था में मौजूद रहने की अनुमति देता है। उलझे हुए जोड़े में से एक कण का क्या होता है यह निर्धारित करता है कि दूसरे कण का क्या होता है, भले ही वे बहुत दूर हों।

    लंबे समय तक, यह सवाल था कि क्या सहसंबंध (correlation ) इसलिए था क्योंकि एक उलझे हुए जोड़े (entangled pair) में कणों में छिपे हुए variables, निर्देश होते थे जो उन्हें बताते हैं कि उन्हें प्रयोग में कौन सा परिणाम देना चाहिए।

    1960 के दशक में, जॉन स्टीवर्ट बेल (John Stewart Bell) ने उनके नाम पर गणितीय असमानता विकसित की। यह बताता है कि यदि छिपे हुए चर (variables) हैं, तो बड़ी संख्या में माप के परिणामों के बीच संबंध कभी भी एक निश्चित मूल्य से अधिक नहीं होगा। हालांकि, क्वांटम यांत्रिकी भविष्यवाणी करता है कि एक निश्चित प्रकार का प्रयोग बेल की असमानता (Bell’s inequality) का उल्लंघन करेगा, इस प्रकार एक मजबूत सहसंबंध (stronger correlation) के परिणामस्वरूप अन्यथा संभव होगा।

    जॉन एफ क्लॉजर ने जॉन बेल के विचारों को विकसित किया, जिससे एक व्यावहारिक प्रयोग हुआ। जब उन्होंने माप लिया, तो उन्होंने बेल असमानता का स्पष्ट रूप से उल्लंघन करके क्वांटम यांत्रिकी का समर्थन किया। इसका मतलब है कि क्वांटम यांत्रिकी को एक सिद्धांत द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है जो छिपे हुए चर (hidden variables) का उपयोग करता है।

    जॉन एफ क्लॉजर के प्रयोग के बाद कुछ खामियां (loopholes) रह गईं। एलेन एस्पेक्ट (Alain Aspect) ने सेटअप को इस तरह से विकसित किया, जिससे एक महत्वपूर्ण बचाव का रास्ता बंद हो गया। वह एक उलझी हुई जोड़ी (entangled pair) के अपने स्रोत को छोड़ने के बाद माप सेटिंग्स (measurement settings) को स्विच करने में सक्षम था, इसलिए जब वे उत्सर्जित (emitted) होते थे तो सेटिंग परिणाम को प्रभावित नहीं कर सकती थी। परिष्कृत उपकरणों और प्रयोगों की लंबी श्रृंखला का उपयोग करते हुए, एंटोन ज़िलिंगर (Anton Zeilinger) ने उलझी हुई क्वांटम अवस्थाओं (entangled quantum) का उपयोग करना शुरू कर दिया। अन्य बातों के अलावा, उनके शोध समूह ने क्वांटम टेलीपोर्टेशन (quantum teleportation) नामक एक घटना का प्रदर्शन किया है, जिससे क्वांटम अवस्था को एक कण से एक दूरी पर स्थानांतरित करना संभव हो जाता है (makes it possible to move a quantum state from one particle to one at a distance)।

    एलेन एस्पेक्ट (Alain Aspect)

    एलेन एस्पेक्ट (Alain Aspect)

    फ्रांस के फिजिसिस्ट एलेन एस्पेक्ट (Alain Aspect) का जन्म 15 जून 1947 को फ्रांस के एजेन में हुआ था | 75 वर्षीय एलेन एस्पेक्ट ने पेरिस साकले यूनिवर्सिटी और पेरिस यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी की थी | 1980 में जब उनकी पीएचडी चल रही थी, तब उन्होंने बेल टेस्ट एक्सपेरीमेंट्स (Bell Test Experiments) करने शुरू कर दिए थे  जिसमें उन्होंने क्वांटम इनटैंगलमेंट (Quantum Entanglement) से जुड़े कुछ रहस्यों का पता लगाया |

    इनटैंगल्ड फोटॉन (1982) के साथ उनके बेल टेस्ट एक्सपेरिमेंट ने, 1935 में शुरू हुई अल्बर्ट आइंस्टीन और निल्स बोहर के बीच एक बहस को सुलझाने में योगदान दिया है |

    एलेन एस्पेक्ट, इंस्टीट्यूट डी ऑप्टिक ग्रेजुएट स्कूल और इकोले पॉलीटेक्निक (यूनिवर्सिटी पेरिस-सैकले) में प्रोफेसर हैं | वह कई एकैडमी (फ्रांस, यूएसए, ऑस्ट्रिया) के सदस्य हैं | अब तक उन्हें अपने रिसर्च के निम्न पुरस्कार मिल चुके है :

    CNRS गोल्ड मेडल (2005); 2010 में फिजिक्स में वुल्फ पुरस्कार ( Wolf prize); निल्स बोहर (Nils Bohr Gold medal); अल्बर्ट आइंस्टीन मेडल (2012); ओएसए (2013) का इवेस मेडल/क्विन प्राइज़; और 2014 में क्वांटम सूचना में बलजान पुरस्कार(Balzan prize)

    जॉन फ्रांसिस क्लॉजर (John Francis Clauser)

    जॉन फ्रांसिस क्लॉजर (John Francis Clauser)

    जॉन फ्रांसिस क्लॉजर एक अमेरिकी एक्सपेरिमेंटल और थ्योरेटिकल भौतिक विज्ञानी हैं | उन्हें क्वांटम मेकैन्किस में उनके योगदान के लिए जाना जाता है | उन्हें क्लॉसर-हॉर्न-शिमोनी-होल्ट (Clauser-Horne-Shimony-Holt (CHSH) ) इनीक्वैलिटी, नॉन लोकल क्वांटम इनटैंगलमेंट के पहले प्रायोगिक प्रमाण और लोकल रियलिज़्म की थ्योरी के निर्माण के लिए जाना जाता है |

    जॉन फ्रांसिस क्लॉजर का जन्म 1 दिसंबर 1942 को अमेरिका के पासाडेना में हुआ था | उन्होंने 1964 में, कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से फिजिक्स में बी.एस किया | 1966 में उन्होंने फिजिक्स में एमए किया और 1969 में कोलंबिया युनिवर्सिटी से पीएचडी की | 1969 से 1996 तक उन्होंने लॉरेंस बर्कले नेशनल लेबोरेटरी, लॉरेंस लिवरमोर नेशनल लेबोरेटरी और कैलिफोर्निया युनिवर्सिटी बर्कले में काम किया |

    1969 में, जॉन बेल के सैद्धांतिक परिणामों से प्रेरित माइकल हॉर्न, अब्नेर शिमोनी और रिचर्ड होल्ट के साथ, उन्होंने स्थानीय छिपी हुई वेरिएबल थ्योरी के पहले टेस्ट का प्रस्ताव दिया था | इन सिद्धांतों के लिए उन्होंने पहले प्रयोगात्मक परीक्षण योग्य सीएचएसएच-बेल की थ्योरम- क्लॉजर-हॉर्न-शिमोनी-होल्ट (CHSH) इनीक्वैलिटी दी | 1972 में, उन्होंने CHSH का पहला प्रायोगिक परीक्षण किया और 1976 में दूसरा परीक्षण किया |

    1974 में, माइकल हॉर्न के साथ काम करते हुए उन्होंने लोकल रियलिस्टिक थ्योरी के सिद्धांत को लोकल हिडन वैरिएबल थ्योरी के सामान्यीकरण के रूप में तैयार किया | 1974 में उन्होंने प्रकाश के लिए उप-पॉसोनियन आंकड़ों (Sub-Poissonian statistics) का पहला अवलोकन किया | इस तरह पहली बार प्रयोगात्मक रूप से साबित किया कि फोटॉन स्थानीयकृत कणों (localized particles) की तरह व्यवहार कर सकते हैं न कि विद्युत चुम्बकीय विकिरण (electromagnetic radiation) के संक्षिप्त पल्स की तरह |

    1982 में उन्हें जॉन बैल के साथ रियलिटी फाउंडेशन प्राइज़ (Reality Foundation Prize) दिया गया | 2010 में उन्हें एलेन एस्पेक्ट और एंटोन ज़िलिंगर के साथ, नॉन लोकल क्वांटम इनटेंगलमेंट पर उनकी टिप्पणियों के लिए और लोकल रियलिज़िम के एक्सपेरिमेंटल टेस्ट के लिए फिजिक्स में वुल्फ पुरस्कार (Wolf Prize) से सम्मानित किया गया था | 2011 में उन्हें थॉमसन-रॉयटर्स प्रशस्ति-पत्र पुरस्कार (Thompson-Reuters Citation Laureate) से सम्मानित किया गया था

    एंटोन ज़िलिंगर (Anton Zeilinger)

    एंटोन ज़िलिंगर (Anton Zeilinger)

    एंटोन ज़िलिंगर का जन्म 20 May 1945 को ऑस्ट्रिया के रीड इम इनक्रेइस में हुआ था | ज़िलिंगर वियना यूनिवर्सिटी में फिजिक्स के प्रोफेसर हैं और ऑस्ट्रियन एकेडमी ऑफ साइंसेज में क्वांटम ऑप्टिक्स और क्वांटम सूचना संस्थान में वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं | उनके ज्यादातर शोध क्वांटम इनटैंगलमेंट के प्रयोगों से जुड़े हैं | उन्हें खासतौर पर अपने एक्सपेरिमेंटल और सैद्धांतिक कामों के लिए जाना जाता है, खासकर इनटैंगलमेंट, क्वांटम टेलीपोर्टेशन, क्वांटम कम्यूनिकेशन और क्रिप्टोग्राफी |

    उन्होंने 1971 में वियना यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की थी | 1999 में वियना यूनिवर्सिटी में शामिल होने से पहले वे वियना की टेक्निकल यूनिवर्सिटी और इन्सब्रुक यूनिवर्सिटी के संकायों में थे, जहां उन्होंने फिजिक्स डिपार्टमेंट के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया | ज़िलिंगर ने एमआईटी, म्यूनिख के तकनीकी विश्वविद्यालय, हम्बोल्ट विश्वविद्यालय बर्लिन, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और कॉलेज डी फ्रांस में चेयर इंटरनेशनल सहित कई जगहों पर काम किया है | ज़िलिंगर ऑस्ट्रियन फिजिकल सोसाइटी के अध्यक्ष रहे हैं और फिलहाल ऑस्ट्रियन एकेडमी ऑफ साइंसेज के अध्यक्ष हैं |

    पिछले साल इनको मिला था भौतिकी में नोबल पुरस्कार

    पिछले साल स्यूकुरो मानेबे, क्लॉस होसेलमैन और जियोर्जियो पेरिसी को भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें यह पुरस्कार जटिल भौतिक प्रणालियों को लेकर हमारी समझ में विकसित करने के लिए दिया गया था।

    स्यूकुरो मानेबे और क्लॉस होसेलमैन ने यह पुरस्कार ‘धरती की जलवायु की भौतिक मॉडलिंग’ और ‘ग्लोबल वार्मिंग की भविष्यवाणी’ को मजबूत करने के लिए जीता था। वहीं पेरिसी को ‘परमाणु से ग्रहों के पैमाने तक ‘भौतिक प्रणालियों में उतार-चढ़ाव की क्रिया के खोज के लिए’ नोबल से सम्मानित किया गया था।

    स्त्रोत:

    नोबल पुरस्कार आधिकारिक वेबसाइट : https://www.nobelprize.org/

    एलेन एस्पेक्ट (Alain Aspect) के बारे में – https://youtu.be/lZyZtrF01qQ

    एंटोन ज़िलिंगर (Anton Zeilinger) के बारे में – https://youtu.be/epooR8ONrj4

    जॉन फ्रांसिस क्लॉजर (John F. Clauser)https://youtu.be/ZYZiLX2uibM

    प्रेस रिलीज़ – https://www.nobelprize.org/prizes/physics/2022/press-release/

    Does colour exist when no one is watching? – https://www.nobelprize.org/uploads/2022/10/press-physics2022-figure2.pdf

    Entangled particles that never met – https://www.nobelprize.org/uploads/2022/10/press-physics2022-figure3.pdf

  • अब तक का सबसे पावरफुल James Webb Telescope लॉन्च, हबल टेलीस्कोप की जगह लेगा

    अब तक का सबसे पावरफुल James Webb Telescope लॉन्च, हबल टेलीस्कोप की जगह लेगा

    नासा (NASA) ने 25 दिसंबर 2021 को अब तक का सबसे शक्तिशाली टेलीस्कोप जेम्स वेब टेलीस्कोप (James Webb telescope) सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया, इस टेलीस्कोप को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी का अगला बड़ा स्पेस मिशन कहा जा रहा है

    जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप अब हबल टेलीस्कोप की जगह लेगा. NASA ने JWST को एरियन-5 ईसीए (Ariane 5 ECA) रॉकेट से लॉन्च किया. लॉन्चिंग फ्रेंच गुएना स्थित कोरोऊ लॉन्च स्टेशन से की गई.

    James Webb Telescope के उद्देश्य

    • इस टेलीस्कोप को सोलर सिस्टम के रहस्यों को सुलझाने में मदद करने के लिए डिजाइन किया गया है. ये धरती से अलग दूसरी दुनिया और सितारों के बारे में जानकारी देगा. हमारे ब्रह्मांड की रहस्यमय संरचनाओं और उत्पत्ति के बारे में भी पता लगाएगा
    • यह टेलीस्कोप ब्रह्मांड की सुदूर गहराइयों में मौजूद आकाशगंगाओं, एस्टेरॉयड, ब्लैक होल्स और सौर मंडलों आदि की खोज में मदद करेगी.
    • जेम्स वेब टेलीस्कोप का इस्तेमाल आज करीब 13.5 अरब साल पहले प्रारंभिक ब्रह्मांड में पैदा हुई पहली गैलेक्सीज को देखने के लिए होगा
    • इसके साथ ही ये टेलीस्कोप सितारों, एक्सोप्लैनेट और सोलर सिस्टम के चंद्रमाओं और ग्रहों के स्रोतों का निरीक्षण करेगा
    • टेलीस्कोप में हबल की तुलना में व्यापक स्पेक्ट्रम व्यू है और ये सोलर सिस्टम की कक्षा में भी देख सकेगा.
  • शुष्क सेल (Dry Cell) बनाने में क्या प्रयोग किया जाता है ?

    शुष्क सेल (Dry Cell) बनाने में क्या प्रयोग किया जाता है ?

    शुष्क सेल में अमोनियम क्लोराइड तथा जिंक क्लोराइड का प्रयोग विद्युत अपघटन के रूप में किया जाता है |

    ड्राई-सेल बैटरी एक या एक से अधिक इलेक्ट्रोकेमिकल कोशिकाओं से बना एक उपकरण है जो संग्रहीत रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करती है।

    इसमें एक इलेक्ट्रोलाइट होता है जो पेस्ट या अन्य नम माध्यम में निहित होता है।एक मानक शुष्क सेल बैटरी में एक केंद्रीय छड़ के भीतर एक जस्ता एनोड और एक कार्बन कैथोड शामिल होता है।

    कैडमियम, कार्बन, लेड, निकल और जिंक का उपयोग विभिन्न शुष्क सेल डिजाइन और क्षमताओं के निर्माण के लिए किया जाता है, कुछ मॉडल दूसरों की तुलना में कुछ उपकरणों के लिए अधिक उपयुक्त होते हैं।

    वेट-सेल बैटरियों के विपरीत, सूखी बैटरी फैलती नहीं है, जो उन्हें पोर्टेबल उपकरणों के लिए आदर्श बनाती है।

  • मोटर कार में रेडिएटर किस सिद्धांत पर कार्य करता है?

    मोटर कार में रेडिएटर किस सिद्धांत पर कार्य करता है?

    मोटर कार में रेडिएटर समान सिद्धांत पर कार्य करता है विधि में ऊष्मा का संचरण पदार्थ के कणों के स्थानांतरण के द्वारा होता है इस प्रकार पदार्थ के कणों के स्थानांतरण से धाराएं बहती हैं जिन्हें संवहन धाराएं कहते हैं यही समय धाराएं इंजन के वाटर पंप में पहुंचकर उसे ठंडा करती रहती है !

    रेडियेटर क्या होता है ?

    विकिरक या रेडियेटर (Radiators) एक माध्यम से दूसरे माध्यम में उष्मीय उर्जा का विनिमय करने वाली युक्ति है। इसकी सहायता से किसी चीज को गरम या ठण्डा किया जा सकता है। इनका उपयोग वाहनों, घरों, एवं विद्युत उपकरणों आदि के तापमान को सुरक्षित सीमा में बनाये रखने के लिये किया जाता है।

  • प्रकाश-वर्ष क्या होता है ?

    प्रकाश-वर्ष क्या होता है ?

    प्रकाश वर्ष (lightyear), जो प्रव (ly) द्वारा चिन्हित किया जाता है, लम्बाई की एक मापन इकाई है। यह लगभग 95 खरब (9.5 ट्रिलियन) किलोमीटर की होती है। अन्तर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ के अनुसार, एक प्रकाश वर्ष वह दूरी है जो प्रकाश अपने निर्वात में एक वर्ष में पूरा कर लेता है। यह इकाई मुख्यत: लम्बी दूरियों यथा दो तारों या गैलेक्सी जैसी अन्य खगोलीय वस्तुओं की बीच की दूरी मापने में प्रयोग की जाती है।[2]

    अंकीय मान

    एक प्रकाश वर्ष बराबर होता है:

    • यथार्थतः 9,460,730,472,580.8 किमी (लगभग 10 Pm)
    • लगभग 5,878,625,373,183.61 मील
    • लगभग 63,241 खगोलीय इकाई
    • लगभग 0.3066 पारसैक

    उपरोक्त आंकडे़ जूलियन वर्ष (ना कि ग्रेगोरियन वर्ष) पूरे 365.25 दिवसों के (प्रत्येक दिवस पूरे 86,400 SI सैकिण्डों का, कुल मिलाकर 31,557,600 सैकिण्ड) बराबर होता है, जैसा कि IAU द्वारा परिभाषित है।[3]

    प्रकाश वर्ष का प्रयोग प्रायः तारों की दूरियां नापने हेतु होता है। इसकी अधिमान्य इकाई है पारसैक। पारसैक की परिभाषा अनुसार वह दूरी है जो, जितनी दूरी पर एक वस्तु दिग्भेद के एक आर्क्सैकिण्ड के बराबर हिलती प्रतीत होती है, जब प्रेक्षक एक खगोलीय इकाई अपनी दॄष्टि रेखा के अभिलम्ब चलता है। यह लगभग ३.२६ प्रकाश-वर्षों के बराबर होता है। पारसैक को अन्य इकाइयों की तुलना में अधिक सरलता से पर्यवेक्षण आंकडो़ से मिलान और व्युत्पन्न किया जा सकता है। वैसे वैज्ञानिक वर्ग में प्रकाश वर्ष ही अधिक प्रचलित है।

    प्रमुख दूरियाँ (प्रकाशवर्षों में)

    • पृथ्वी-से-सूर्य : 0.0000158125 प्रकाश वर्ष, जिसे प्रकाश 8 मिनट19.005 सैकिंड में तय करता है।
    • निकटतम तारा, प्रॉक्सिमा सेन्टॉरी: 4.2420 प्रकाशवर्ष।
    • निकटतम पड़ोसी गैलेक्सी, एण्ड्रोमेडा गैलेक्सी: 25 लाख प्रकाशवर्ष।
  • नाभिकीय विखण्डन और नाभिकीय संलयन पर आधारित बम और उनके दुष्प्रभाव

    नाभिकीय विखण्डन और नाभिकीय संलयन पर आधारित बम और उनके दुष्प्रभाव

    Bombs based on nuclear fission and nuclear fusion and their side effects

    नाभिकीय अस्त्र मूलतः दो प्रकार के होते हैं (1) नाभिकीय विखण्डन पर आधारित, जैसे—परमाणु बम तथा (2) नाभिकीय संलयन पर आधारित, जैसे—हाइड्रोजन बम। इनके विस्फोट से मानव जीवन पर दूरगामी प्रभाव पड़ते है।

    वे प्रभाव चार प्रकार के हैं:

    विस्फोट तरंग

    विस्फोट की शुरुआत आग के गोले के निर्माण से शुरू होती है जिसमें धूलकणों एवं गर्म गैसों का उच्च दाब पर घना बादल होता है। विस्फोट के कुछ ही क्षण बाद ये गैसें फैलने लगती है जिससे विस्फोट तरंगें बनती है, इन्हें ‘प्रघात तरंगें’ (Shock waves) भी कहते हैं। इन विस्फोट तरंगों से 5 किलोमीटर तक के सभी लोग और 10 किलोमीटर तक के कुछ लोग मारे जाते हैं। 10 किलोमीटर क्षेत्र तक के कई अन्य व्यक्ति गम्भीर रूप से घायल हो जाते हैं।

    तापीय विकिरण

    इसमें आग के गोले से निकलने वाली पराबैंगनी, अवरक्त तथा दृश्य किरणें शामिल होती हैं। पराबैंगनी किरणें वायु द्वारा शीघ्रता से अवशोषित कर ली जाती हैं और इसलिए इससे कम क्षति पहुंचती है। लेकिन दृश्य विकिरणों तथा अवरक्त विकिरणों से आंख के साथ-साथ त्वचा को भी क्षति पहुंच सकती है, इसे ‘दीप्ति जलन’ कहा जाता है। तापीय विकिरणों से अखबारों एवं सूखे पत्तों में प्रज्वलन उत्पन्न हो सकता है। इन पदार्थों के जलने से आग लगने की बड़ी घटनाएं हो सकती हैं। हिरोशिमा के 20% से 30% लोगों की मृत्यु इसी विकिरण से हुई थी

    प्राथमिक नाभिकीय विकिरण

    ये विकिरण विस्फोट के 1 मिनट के अन्दर उत्पन्न होते हैं। इसमें न्यूट्रॉन और गामा किरणें होती हैं। कुछ न्यूट्रॉन तथा गामा किरणों का उत्सर्जन आग के गोले से लगातार जारी रहता है। शेष गामा किरणों का उत्सर्जन मशरूम के आकार के उन रेडियो सक्रिय पदार्थों के बादल से होता है जो विस्फोट के फलस्वरूप बनते हैं। नाभिकीय विकिरणों से सूजन हो सकती है और मानव कोशिकाओं को क्षति पहुंच सकती है तथा कोशिकाओं का सामान्य विस्थापन भी अवरुद्ध हो जाता है। विकिरणों की बड़ी मात्रा से मृत्यु भी हो सकती है।

    अवशिष्ट नाभिकीय विकिरण

    ये विकिरण विस्फोट के 1 मिनट के बाद उत्पन्न होते हैं, इन विकिरणों में गामा किरणें तथा बीटा किरणें होते हैं। संलयन से उत्पन्न विकिरणों का निर्माण मुख्यत: न्यूट्रॉनों से होता है। ये कण चट्टानों, मिट्टी तथा जल एवं अन्य पदार्थों से टकराकर मशरूम के आकार का बादल बनाते हैं। परिणामस्वरूप, ये कण रेडियो सक्रिय हो जाते हैं। जब ये कण पृथ्वी पर पुनः गिरने लगते हैं, तो इन्हें निक्षेप (Fall out) कहा जाता है। पृथ्वी की सतह से जितना निकट विस्फोट होगा, निक्षेप का निर्माण उतना ही अधिक होगा।

  • अतिचालकता (Superconductivity) क्या है ?

    अतिचालकता (Superconductivity) क्या है ?

    What is Superconductivity ?

    अतिचालकता की खोज एक डच भौतिकशास्त्री कैमरलिंग ओनिस द्वारा 1911 में की गयी।

    अत्यन्त निम्न ताप पर कुछ पदार्थों का विद्युत प्रतिरोध शून्य हो जाता है। इन्हें ‘अतिचालक’ (Super-conductor) कहते हैं और इस गुण को ‘अतिचालकता’ कहते हैं।

    4.2 k (अर्थात् 268.8°C) पर पारा अतिचालक बन जाता है, अर्थात् उसका विद्युत प्रतिरोध शून्य हो जाता है, यदि उस समय उसमें धारा प्रवाहित की जाए तो वह अनन्त काल तक बहती रहेगी, उसमें कोई कमी नहीं आएगी।

    कुछ मिश्र धातुएं, जैसे—नियोबियस्टन काफी ऊंचे ताप पर भी अतिचालकता प्राप्त कर लेती है।

    अतिचालक का दूसरा महत्त्वपूर्ण गुण यह होता है, कि वह पूर्णतः प्रतिचुम्बकीय होता है, अर्थात् वह पूर्ण ‘चुम्बकीय कवच’ होता है जिसे कोई चुम्बकीय बल-रेखा भेदकर उसके अन्दर नहीं जा सकती है

    क्रांतिक ताप (Critical temperature)

    कुछ अतिचालक मृत्तिकाएं (Ceramics) थौलियम (TI), बेरियम और कॉपर ऑक्साइड (Cu0) से युक्त होती हैं जिनमें 120 K ताप पर ही अतिचालकता आ जाती है। कोई पदार्थ जिस ताप पर अतिचालक बनता है उसे उसका ‘क्रांतिक ताप’ (Critical temperature) कहते हैं।

    साथ में यह भी पढ़िए अति चालक

  • नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) क्या है ?

    नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) क्या है ?

    What is Nuclear Fusion ?

    जब दो या अधिक हल्के नाभिक संयुक्त होकर एक भारी नाभिक बनाते है और अत्यधिक उर्जा विमुक्त करते है, तो इस अभिक्रिया को नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) कहते है l

    यह अभिक्रिया सूर्य और अन्य तारों में संपन्न होती है और अत्यधिक उर्जा उत्पन्न करती है l सूर्य से प्राप्त प्रकाश और ऊष्मा उर्जा का स्त्रोत नाभिकीय संलयन ही है l

    जब अत्यधिक और अति उच्च ताप (जो सूर्य के केंद्रीय भाग में उपलब्ध है ) पर एक ड्यूटेरियम नाभिक ट्रीटियम नाभिक (दोनों हल्के नाभिक) से संयुक्त होता है, तो वे एक हीलियम नाभिक (अपेक्षाकृत भारी नाभिक) बनाते है तथा एक न्यूट्रॉन व अत्यधिक ऊर्जा (17.6 मिलियन इलेक्ट्रॉन वोल्ट) विमुक्त होती है।

    सूर्य की असीमित ऊर्जा का कारण नाभिकीय संलयन है। सूर्य में हाइड्रोजन के समस्थानिक ड्यूटेरियम (HP) के परमाणु नाभिकों के संलयन के फलस्वरूप हीलियम नाभिक का निर्माण होता है। इस दौरान प्रचुर ऊर्जा उत्सर्जित होती है।

    सबसे सफल संलयन रिएक्टर जिसे ‘टोकामक’ के नाम से जाना जाता है, मूलतः सोवियत वैज्ञानिकों द्वारा डिजाइन किया गया था। रशियन भाषा में टोकामक का अर्थ है-शक्तिशाली धारा।

    भारत ने अनुसंधान के उद्देश्य से इंस्टीटयूट ऑफ प्लाज्मा रिसर्च, अहमदाबाद में ‘आदित्य’ नामक टोकामक विकसित कर लिया है।

    नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) के उदाहरण

    जब दो भारी हाइड्रोजन का नाभिक (ड्यूट्रॉन 1H2) संलयित होते हैं। तो एक ट्राॅइटियम का नाभिक (ट्राइटॉन) तथा एक प्रोटोन (1H1) प्राप्त होता है। तथा इस प्रक्रिया में 4.0 MeV ऊर्जा निकलती है।
    1H2 + 1H2 ⟶⟶ 1H3 + 1H1 + 4.0 MeV ऊर्जा
    अब ट्राॅइटियम का नाभिक एक तीसरे ड्यूट्रॉन के साथ संलयित होकर एक हीलियम नाभिक (2He4) का निर्माण करती हैं। तथा इस प्रक्रिया में 17.6 MeV ऊर्जा मुक्त होती है।
    1H3 + 1H2 ⟶⟶ 2He4 + 0n1 + 17.6 MeV ऊर्जा

    Fusion of deuterium with tritium creating helium-4, freeing a neutron, and releasing 17.59 MeV as kinetic energy of the products while a corresponding amount of mass disappears, in agreement with kinetic E = ∆mc2, where Δm is the decrease in the total rest mass of particles

    अतः इस प्रकार उपरोक्त दोनों अभिक्रियाओं में तीन ड्यूट्रॉन संलयित होकर एक हीलियम नाभिक, एक प्रोटोन तथा एक न्यूट्रॉन का निर्माण करते हैं। तथा इसमें 21.6 MeV ऊर्जा मुक्त होती है। जो प्रोटॉन (sub>1H1) तथा न्यूट्रॉन (sub>0n1) की गतिज ऊर्जा के रूप में होती है।

    हाइड्रोजन बम नाभिकीय संलयन प्रक्रिया पर कार्य करता है। अर्थात् हाइड्रोजन बम नाभिकीय संलयन का एक उदाहरण है।

    सूर्य एक मुख्य अनुक्रम तारा (Sequence Star जो हाइड्रोजन नाभिक के हीलियम में परमाणु संलयन द्वारा अपनी ऊर्जा उत्पन्न करता है। अपने मूल में, सूर्य प्रति सेकंड 500 मिलियन मीट्रिक टन हाइड्रोजन का संलयन करता है।

    नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया

    नाभिकीय संलयन प्रक्रिया व्यवहार में नाभिकीय विखंडन के मुकाबले एक अत्यंत कठिन प्रक्रिया है। इसका कारण दोनों ड्यूट्रॉनों का धनावेशित होना है। जिसके फलस्वरूप दोनों ड्यूट्रॉन एक दूसरे के निकट मिलने की जगह प्रतिकर्षित हो जाते हैं। यह प्रतिकर्षण बल इतना प्रबल होता है कि अभिक्रिया का होना असंभव सा लगता है। जिस कारण अभिक्रिया में ड्यूट्रॉनों को लगभग 10 मिलियन कैल्विन ताप पर तापित किया जाता है।

    हाइड्रोजन बम

    हाइड्रोजन बम नाभिकीय संलयन अभिक्रिया पर आधारित है। इस सिद्धान्त के आधार पर हाइड्रोजन के दो नाभिकों को संलयित करके एक अधिक द्रव्यमान का नाभिक तैयार किया जाता है। इस क्रम में काफी मात्रा में ऊर्जा उत्सर्जित होता है जो अन्य नाभिकों को भी संलयित करती है जिससे पुनः ऊर्जा का उत्सर्जन होता है। परिणामस्वरूप अभिक्रिया की एक श्रृंखला बन जाती है जिससे अपरिमित ऊर्जा निःसृत होती है। यह बम, परमाणु बम की अपेक्षा लगभग 10 हजार गुना अधिक विध्वंसात्मक होता है।

    नाभिकीय विखण्डन अभिक्रिया ‘स्व-प्रजननी’ (Self-propagating) होने के कारण बहुत महत्त्वपूर्ण है। ‘नियन्त्रित’ विखण्डन से उत्पन्न ऊर्जा पूर्ण नियन्त्रण में रहती है। यह ऊर्जा मुख्यत: ऊष्मा के रूप में होती है तथा इसका विद्युत और यान्त्रिक ऊर्जा में रूपान्तरण करके अनेक लाभदायक कार्यों में उपयोग किया जा सकता है

    नाभिकीय ऊर्जा के कुछ शान्तिमय उपयोग निम्नलिखित हैं:

    1. विद्युत शक्ति का उत्पादन (Electric power generation) करने में;

    2. जहाज, वायुयान, पनडुब्बी (Submarine) और रेल चलाने में:

    3. रॉकेट उड़ाने में; तथा

    4. रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों का उत्पादन करने में। इन समस्थानिकों का उनके स्वतः विघटन के गुण के कारण चिकित्सा, कृषि, रासायनिक विश्लेषण, जीव-रसायन अनुसन्धान, इत्यादि कई क्षेत्रों में उपयोग किया जाता है।

    नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) से जुड़े प्रश्न और ऊत्तर

    प्रश्न – नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) क्या है ?

    उत्तर – जब दो हल्के नाभिक परस्पर संयुक्त होकर एक भारी तत्व के नाभिक की रचना करते हैं तो इस प्रक्रिया को नाभिकीय संलयन कहते हैं। नाभिकीय संलयन के फलस्वरूप जिस नाभिक का निर्माण होता है उसका द्रव्यमान संलयन में भाग लेने वाले दोनों नाभिकों के सम्मिलित द्रव्यमान से कम होता है। द्रव्यमान में यह कमी ऊर्जा में रूपान्तरित हो जाती है।

    प्रश्न – नाभिकीय अभिक्रिया से क्या तात्पर्य है?

    उत्तर – नाभिकीय अभिक्रिया वह प्रक्रम है जिसमें में दो नाभिक या नाभिकीय कण आपस में टक्कर करने के बाद नये उत्पाद बनाते हैं। सिद्धांततः नाभिकीय अभिक्रिया में दो से अधिक नाभिक भी भाग ले सकते हैं किन्तु दो से अधिक नाभिकों के एक ही समय पर टकराने की प्रायिकता बहुत कम होती है, इसलिये ऐसी अभिक्रियाएं अत्यन्त कम होती हैं।

    प्रश्न – नाभिकीय विखण्डन व नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) क्या है?

    उत्तर – विखंडन का आशय एक बड़े परमाणु का दो या दो से अधिक छोटे परमाणुओं में विभाजन से है। नाभिकीय संलयन का आशय दो हल्के परमाणुओं के संयोजन से एक भारी परमाणु नाभिक के निर्माण की प्रकिया से है। विखंडन प्रकिया सामान्य रूप से प्रकृति में घटित नहीं होती है। प्रायः सूर्य जैसे तारों में संलयन प्रक्रिया घटित होती है।

    प्रश्न – सूर्य में कौन सी क्रिया होती है?

    उत्तर – सूर्य (Sun) में नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया होती है

    प्रश्न – नाभिकीय ऊर्जा का महत्व क्या है?

    उत्तर – यूरेनियम के एक परमाणु क विखण्डन से जो ऊर्जा मुक्त होती है वह कोयले के किसी कार्बन परमाणु के दहन से उत्पन्न ऊर्जा की तुलना में एक करोड़ गुना अधिक होती है। नाभिकीय ऊर्जा प्रदूषण नहीं करती है। यह ऊर्जा थोडी मात्रा में अवशिष्ट पदार्थ उत्पन्न करती है। यह ऊर्जा नवीकरणीय ऊर्जा है

  • नाभिकीय विखण्डन (Nuclear Fission) क्या है ?

    नाभिकीय विखण्डन (Nuclear Fission) क्या है ?

    What is Nuclear Fission ?

    जब किसी अस्थायी भारी नाभिक पर उच्च ऊर्जा वाले न्यूट्रॉन की बमबारी की जाती है, तो वह लगभग समान द्रव्यमान वाले दो नाभिकों में विभक्त हो जाता है। इस प्रक्रिया को ‘नाभिकीय विखण्डन’ कहा जाता है।

    यूरेनियम-235 का नाभिकीय विखण्डन अनेक प्रकार से हो सकता है, उनमें से एक नाभिकीय अभिक्रिया निम्न प्रकार है:

    श्रृंखला अभिक्रिया (Chain Reaction)

    यदि बहुत अधिक यूरेनियम-235 के परमाणु उपलब्ध हों, तो नाभिकीय विखण्डन एक श्रृंखला अभिक्रिया बन जाती है। यूरेनियम-235 पर जब मन्द गति वाले न्यूट्रॉनों की बमबारी की जाती है, तो U-235 परमाणु एक न्यूट्रॉन को अवशोषित (Absorb) कर लेता है जिससे U-236 का अस्थायी परमाणु बन जाता है। U-236 का नाभिक अत्यधिक अस्थायी होने के कारण तुरन्त दो खण्डों में विभक्त हो जाता है और प्राय: 3 न्यूट्रॉन तथा बहुत अधिक ऊर्जा मुक्त होती है। इस क्रिया में निर्मुक्त न्यूट्रॉनो में से माना दो न्यूट्रॉन दूसरे दो U-235 परमाणुओं का विखण्डन करते है जिससे पहले से अधिक ऊर्जा और लगभग 6 न्यूट्रॉन मुक्त होते हैं। माना इनमें से 4 न्यूट्रॉन दूसरे चार U-235 परमाणुओं का विखण्डन करते हैं जिससे और अधिक ऊर्जा एवं लगभग 12 न्यूट्रॉन मुक्त होते हैं। इस प्रकार यह क्रिया अपने-आप आगे बढ़ती रहती है और अभिक्रियाओं की एक श्रृंखला बन जाती है। प्रथम विखण्डन क्रिया प्रारम्भ होने के पश्चात् बाहर से न्यूट्रॉनों की बमबारी करना आवश्यक नहीं है, क्योंकि अभिक्रिया में उत्पन्न हुए न्यूट्रॉन (मन्दित होकर) विखण्डन अभिक्रिया को स्वयं आगे बढ़ाते रहते हैं। इसे ही ‘श्रृंखला अभिक्रिया’ कहते हैं

    यह अभिक्रिया भी दो प्रकार की बनाई जा सकती है—अनियन्त्रित तथा नियन्त्रित श्रृंखला अभिक्रिया।

    परमाणु बम (Atom Bomb)

    नाभिकीय विखण्डन क्रिया पर जब किसी प्रकार का नियन्त्रण नहीं होता है, तो विखण्डन क्रिया की दर बहुत तीव्र होती है जिस कारण कुछ ही क्षणों में प्रचण्ड विस्फोट हो जाता है। परमाणु बम में अनियन्त्रित विखण्डन क्रिया होती है। प्रथम परमाणु बम सन् 1945 में बनाया गया था

    द्वितीय विश्वयुद्ध में प्रथम परमाणु बम का विस्फोट 6 अगस्त, 1945 को जापान में हिरोशिमा पर और इसके तीन दिन बाद ही दूसरा परमाणु-विस्फोट जापान में ही नागासाकी पर किया गया था।

    समृद्धित यूरेनियम (Enriched Uranium)

    परमाणु बम के निर्माण में पर्याप्त यूरेनियम-235 की आवश्यकता होती है परन्तु प्राकृतिक यूरेनियम में केवल 0.7% ही यूरेनियम-235 होता है शेष यूरेनियम-238 होता है जिसका विखण्डन मन्द न्यूट्रॉनों द्वारा नहीं होता है। अतः प्राकृतिक यूरेनियम से यूरेनियम-235 अलग किया जाता है। वह यूरेनियम जिसमें विखण्डनीय यूरेनियम-235 की प्रचुर मात्रा होती है उसे ‘समृद्धित यूरेनियम’ कहते हैं।

    नाभिकीय रिएक्टर (Nuclear Reactor)

    नियन्त्रित नाभिकीय शृंखला उत्पन्न करने के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले रिएक्टर को ‘नाभिकीय रिएक्टर या परमाणु भट्टी‘ कहा जाता है। इसमें यूरेनियम-235 का नियन्त्रित विखण्डन कराया जाता है। विखण्डन में निकलने वाली ऊर्जा अधिकांशतः ऊष्मीय ऊर्जा के रूप में होती है जिससे पानी को गर्म करके भाप बनाई जाती है। इस भाप द्वारा टरबाइन चलाकर विद्युत उत्पन्न की जाती है। प्रथम नाभिकीय रिएक्टर वैज्ञानिक ऐनरिको फर्मी के निर्देशन में अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय में सन् 1942 में बनाया गया था

    नाभिकीय रिएक्टर के पांच भाग होते हैं:

    नाभिकीय ईंधन (Nuclear Fuel) : यह रिएक्टर का मुख्य भाग होता है। इसमें विखण्डनीय (Fissile) पदार्थ होता है। यह प्रायः समृद्धित यूरेनियम होता है।

    मन्दक (Moderator) : यह विखण्डन अभिक्रिया में उत्पन्न तीव्र न्यूट्रॉनों को मन्दित करता है। इसके लिए प्रायः ग्रेफाइट या भारी जल (Heavy water) का उपयोग किया जाता है। ड्यूटेरियम ऑक्साइड (D2O) को भारी जल कहते है l इस प्रकार के जल का घनत्व साधारण जल के घनत्व से लगभग 10% अधिक होता है। भारी जल को सबसे अच्छा मंदक माना जाता है।

    नियन्त्रक छड़ें (Control Rods) : विखण्डन की श्रृंखला अभिक्रिया को नियन्त्रण में रखने के लिए कैडमियम या बोरॉन की लम्बी छड़ों का उपयोग किया जाता है जिनकी कुछ लम्बाई को रिएक्टर के विखण्डन कक्ष (Fission chamber) के अन्दर तथा कुछ को बाहर रखा जाता है। ये छड़ें विखण्डन में उत्पन्न होने वाले न्यूट्रॉनों को अवशोषित कर लेती हैं, अत: विखण्डन की श्रृंखला रुक जाती है।

    शीतलक (Coolant): नाभिकीय विखण्डन के दौरान बड़ी मात्रा में ऊष्मा निर्मुक्त होती है, जिसे ठण्डा करना आवश्यक होता है। इस निर्मित रिएक्टर में वायु, जल और कार्बन डाइऑक्साइड प्रवाहित किए जाते हैं। इस ऊष्मा का उपयोग वाष्प निर्माण में किया जाता है जिससे टरबाइन चलाकर विद्युत उत्पादित की जाती है

    परिरक्षक (Protector) : नाभिकीय विखण्डन के दौरान कई प्रकार की उच्च शक्ति और भेदन क्षमता वाली किरणें निकलती हैं। इन किरणों से रक्षा के लिए रिएक्टर के चारों ओर कंक्रीट की मोटी-मोटी दीवारों का निर्माण किया जाता है, जिसे ‘परिरक्षक’ कहा जाता है। भारत तथा अन्य कई देशों में नाभिकीय रिएक्टरों का उपयोग विद्युत उत्पादन के लिए किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त रिएक्टर से रेडियोऐक्टिव समस्थानिक (Radioactive isotopes) भी प्राप्त होते हैं। रिएक्टर द्वारा यूरेनियम-238 को विखण्डन-योग्य (Fissile) तत्व प्लूटोनियम-239 में भी परिवर्तित किया जाता है और तब उसे परमाणु बम के निर्माण में प्रयुक्त किया जा सकता है

    ब्रीडर रिएक्टर (Breeder Reactor)

    ऐसा रिएक्टर जो प्रयुक्त किए गए विखण्डनीय पदार्थ की तुलना में अधिक विखण्डनीय पदार्थ उत्पन्न करता है, ‘ब्रीडर रिएक्टर’ कहलाता है अर्थात् इसमें प्रयुक्त पदार्थ ही और अधिक मात्रा में उत्पन्न किया जाता है। प्रारम्भ में प्लूटोनियम-239 द्वारा समृद्धित यूरेनियम-238 का अथवा थोरियम-232 का उपयोग किया जाता है, उसके पश्चात् यूरेनियम-238 में एक न्यूट्रॉन संयुक्त हो जाने से प्लूटोनियम-239 प्राप्त होता है और थोरियम-232 से यूरोनियम-233 प्राप्त होता है।

  • द्रव्यमान-ऊर्जा और बन्धन ऊर्जा

    द्रव्यमान-ऊर्जा और बन्धन ऊर्जा

    Mass-Energy and Binding Energy

    नाभिकीय ऊर्जा

    नाभिकीय ऊर्जा (परमाणु ऊर्जा) एक परमाणु के नाभिक या कोर में उपलब्ध उर्जा है। परमाणु ऊर्जा का उपयोग बिजली बनाने के लिए किया जाता है। परमाणु ऊर्जा परमाणु विखंडन, परमाणु क्षय और परमाणु संलयन प्रतिक्रियाओं से प्राप्त की जा सकती है।

    द्रव्यमान-ऊर्जा समतुल्यता (Mass-Energy Equivalence)

    सम्पूर्ण नाभिकीय ऊर्जा का मूल स्रोत है द्रव्यमान का ऊर्जा में परिवर्तन।

    महान् वैज्ञानिक आइन्सटीन ने बताया कि प्रत्येक द्रव्यमान (m), ऊर्जा (E) के समतुल्य है: E=mc2 जहां, c निर्वात (Vacuum) में प्रकाश की चाल है जो 3 x 108 मीटर/सेकण्ड होती है। इस प्रकार एक किलोग्राम द्रव्यमान के समतुल्य ऊर्जा 1 x (3 x 108) = 9 x 1016 जूल होती है। यह अति विशाल ऊर्जा है। अत: m किलोग्राम द्रव्यमान के लुप्त होने mc2 जूल ऊर्जा उत्पन्न होती है तथा 5 जूल ऊर्जा के उत्पन्न होने पर E/c2 किलोग्राम द्रव्यमान की क्षति (Loss) होती है।

    बन्धन ऊर्जा (Binding Energy)

    नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनन्यूट्रॉन को ‘न्यूक्लिऑन’ (Nucleon) कहते हैं। नाभिक का वास्तविक द्रव्यमान उसमें उपस्थित न्यूक्लिऑनों के द्रव्यमानों के योग से सदैव कुछ कम होता है। यह द्रव्यमान अन्तर ‘द्रव्यमान क्षति’ (Mass defect) कहलाता है

    जब प्रोटॉन व न्यूट्रॉन मिलकर नाभिक की रचना करते हैं, तो कुछ द्रव्यमान लुप्त हो जाता है। यह लुप्त द्रव्यमान ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है। अतः न्यूट्रॉन व प्रोटॉन के संयोग से किसी नाभिक के बनने में जो ऊर्जा विमुक्त होती है उसे नाभिक की बन्धन ऊर्जा कहते हैं