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  • जन्तुओं में पोषण (Nutrition in Animals)  एवं जन्तुओं के पोषक पदार्थ (Nutritive Substance of Animals)

    जन्तुओं में पोषण (Nutrition in Animals) एवं जन्तुओं के पोषक पदार्थ (Nutritive Substance of Animals)

    इस आर्टिकल में हम जंतुओं के पोषण और पोषक पदार्थों के बारे में बात करेगें | जंतुओं के विकास के लिए कोनसे पोषक पदार्थ आवश्यक होते है ? जंतुओं के विकास के लिय पोषक पदार्थ क्यों जरूरी है ? जैविक क्रियाओं के लिय कोनसे पोषक पदार्थ जरूरी होते है और वो जीवों के कहा से प्राप्त होते है या उन पोषक पदार्थों का स्त्रोंत क्या है ? रासायनिक संगठन के आधार पर पोषक पदार्थों के कितने प्रकार है ?

    साथ ही इस आर्टिकल में हम जानेगे कि कार्बोहाइड्रेट्स क्या होते है ? वसा क्या है ? विटामिन क्या होते है ? प्रोटीन क्या होते है और इनका जीवों के शारीरिक विकास में किस प्रकार योगदान है ? खनिज लवण क्या होते है ? आदि

    जन्तुओं में पोषण (Nutrition in Animals) क्यों जरूरी है ?

    जन्तु अपने पोषण के लिए वनस्पतियों एवं अन्य जन्तुओं पर निर्भर होता है अर्थात् जन्तु उत्पादक न होकर उपभोक्ता होता है।

    जन्तु पोषण के दो प्रकार-प्राणिसम पोषण तथा अवशोषी पोषण हैं। प्राणिसम पोषण के अन्तर्गत जन्तु भोजन को अपने शरीर के अन्दर ले जाते हैं अर्थात् निगलते हैं। इसके बाद भोजन का पाचन एवं अवशोषण होता है। वहीं अवशोषी पोषण के अन्तर्गत भोजन का अन्तर्ग्रहण न होकर उसका अवशोषण होता है। उदाहरण फफूंदी में।

    जन्तुओं के पोषक पदार्थ (Nutritive Substance of Animals) कोनसे है ?

    भोज्य पदार्थों में निहित वे उपयोगी रासायनिक घटक, जिनका उपयुक्त मात्रा में उपलब्ध होना शरीर के विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए अति आवश्यक है, पोषक पदार्थ कहलाते हैं। रासायनिक संगठन के आधार पर पोषक पदार्थों को निम्न भागों में बाँटा गया है

    1. कार्बोहाइड्रेट्स

    2. वसा

    3. प्रोटीन

    4. विटामिन

    5. खनिज लवण

    6. जल

    इन पोषक तत्वों में से कार्बोहाइड्रेट तथा वसा ऊर्जा उत्पादन तथा प्रोटीन निर्माणकारी पदार्थ और विटामिन, खनिज लवण एवं जल उपापचयी नियन्त्रक हैं।

    कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates) क्या है ? कार्बोहाइड्रेट्स के प्रकार, स्त्रोत और कार्य

    यह कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का कार्बनिक यौगिक है, जिसका अनुपात क्रमश: 1 : 2 : 1 है यह पचने के उपरान्त ग्लूकोज में परिवर्तित हो जाते हैं। इसी ग्लूकोज के ऑक्सीकरण से र को ऊर्जा मिलती है। शरीर की कुल ऊर्जा का 50-79% मात्रा को पूर्ति कार्बोहाइड्रेट से ही होती है।

    1 ग्राम कार्बोहाइड्रेट के ऑक्सीकरण से 45 किलो कैलोरी ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

    इसका सामान्य सूत्र (CH2O)n होता है। खाद्य पदार्थों में ये शर्करा, स्टार्च एवं सेलुलोज के रूप में पाए जाते हैं। कुछ कार्बोहाइड्रेट जल में घुलनशील होती है, जैसे शकंरा, जो स्वाद में मीठा होता है, जबकि स्टार्च (मण्ड) एवं सेलुलोज अघुलनशील कार्बोहाइड्रेट के प्रमुख उदाहरण हैं।

    पोषण के अन्तर्गत शर्करा ग्लूकोज के रूप में बदल जाता है, जिसका भण्डारण ग्लाइकोजन के रूप में होता है। ग्लूकोज से ग्लाइकोजन बनने की क्रिया ग्लाइकोजेनेसिस कहलाती है।

    सेलुलोज क्या है ?

    यह पौधे की कोशिका मित्ति में पाए जाते हैं।

    कपास एवं कागज शुद्ध सेलुलोज होते हैं।

    यह ग्लूकोस का बहुलक है।

    पशु, जैसे-गाय, भैंस, बकरी आदि में सेलुलोज का पाचन होता है, परन्तु मनुष्य में इसका पाचन नहीं होता।

    कार्बोहाइड्रेट के प्रकार (Types of Carbohydrate) क्या है ?

    रासायनिक संरचना के आधार पर इसे तीन श्रेणियों में बाटां गया है।

    मोनोसैकेराइड्स (Monosaccharides)

    इसमें कार्बोहाइड्रेट की एक ही इकाई होती है।

    यह सभी कार्बोहाइड्रेट की सबसे सरल अवस्था होती है।

    ये जल में घुलनशील तथा मीठो होती है। .

    ग्लूकोज और फ्रक्टोस पौधों में सामान्य रूप से पाया जाने वाला मोनोसैकेराइड्स है।

    इनमें से ग्लूकोज प्रकाश-संश्लेषण का मुख्य उत्पाद है तथा इससे ऊर्जा उपलब्ध होते हैं, जबकि फ्रक्टोस फलों में पाए जाते हैं।

    ग्लूकोज सबसे महत्वपूर्ण मोनोसैकेराइड्स है, जो फलों में मुख्यतया अंगूर और शहद में मिलता है। फ्रक्टोस शरीर के अन्दर ग्लाइकोजन में परिवर्तित हो जाती है।

    शरीर में पहुंचे सभी कार्बोहाइड्रेट्स सर्वप्रथम ग्लूकोज में जल अपघटित होते हैं।

    ऑलिगोसैकेराइड्स (Oligosaccharides)

    ये मोनोसैकेराइड्स के 2-10 अणुओं से मिलकर बनता है, जैसे

    ग्लूकोस + ग्लूकोस = माल्टोस

    ग्लूकोस + फ्रक्टोस = सुक्रोस

    ग्लूकोस + ग्लैक्टोस = लैक्टोस

    सुक्रोस, माल्टोस और लैक्टोस प्रमुख डाइसैकेराइड्स हैं।

    सुक्रोस गन्ना, चुकन्दर, गाजर तथा मीठे फलों में पाया जाता है।

    माल्टोस स्वतन्त्र रूप से नहीं वरन् बीजों की (मुख्यतया जौ) शर्करा अर्थात् माल्ट शुगर होती है।

    पॉलीसैकेराइड्स (Polysaccharides)

    ये जल में अघुलनशील होते हैं, जो अनेक मोनोसैकेराइड्स अणुओं के मिलने से बनता है।

    ये पौधों में मुख्य रूप से सेलुलोज में पाए जाते हैं।

    आवश्यकता पड़ने पर यह जल-अपघटन (hydrolysis) द्वारा ग्लूकोस में बदल जाता है। इस रूप में यह ऊर्जा उत्पादन हेतु संग्रहित ईंधन का कार्य करता है।

    पॉलीसैकेराइड के प्रमुख उदाहरण

    मण्ड या स्टार्च सभी प्रकार के अनाजों, सब्जियों, विशेषकर आलू, शकरकन्द आदि में मिलता है।

    ग्लाइकोजन जन्तु के शरीर में संचित अवस्था में रहता है और आवश्यकता पड़ने पर इसका उपयोग होता है।

    काइटिन आर्थोपोडा संघ के जन्तुओं के बाहा कंकाल का निर्माण।

    सेलुलोज पौधों की कोशिका भित्ति का निर्माण करती है।

    कार्बोहाइड्रेटस के कार्य कोनसे है ?

    यह शरीर को ऊर्जा प्रदान करने वाले मुख्य स्रोत होते हैं।

    ये मण्ड के रूप में ‘संचित ईंधन’ का कार्य करते हैं।

    यह वसा में बदलकर ‘संचित भोजन’ का कार्य करते हैं।

    यह DNA और RNA के घटक पेन्टोज शर्करा होता है।

    प्रोटीन को शरीर के निर्माणकारक कार्यों हेतु सुरक्षित रखते हैं

    शरीर में वसा के उपयोग हेतु यह अत्यन्त ही आवश्यक है।

    वसा (Fats) क्या है ? वसा के स्त्रोत, प्रकार और कार्य

    ये कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के असंतृप्त यौगिक होते हैं किन्तु रासायनिक रूप से कार्बोहाइड्रेट से भिन्न होती है।

    इसमें कार्बोहाइड्रेट्स की तुलना में ऑक्सीजन की बहुत कम मात्रा होती है। ये पानी में अघुलनशील परन्तु क्लोरोफॉर्म, बेन्जीन, पेट्रोलियम आदि कार्बनिक विलायकों में घुलनशील होती है। क्षार द्वारा इसका पायसीकरण किया जा सकता है।

    वसा एक अणु ग्लिसरॉल तथा वसा अम्ल (fatty acid) के तीन अणुओं के एस्टर बन्ध द्वारा बनते हैं इसलिए इन्हें ट्राइग्लिसराइड्स कहते हैं।

    शरीर की कुल ऊर्जा का 20-30% ऊर्जा वसा से प्राप्त होती है, जबकि एक ग्राम वसा के पूर्ण ऑवसीकरण से 9.3 किलो कैलोरी ऊर्जा मुक्त होती है। वसा का संचय विशिष्ट वसीय ऊतक (adipose tissues) में होता है। 20°C पर वसा तेल कहलाते हैं।

    वसा के प्रकार (Type of Fats) कोनसे है ?

    रासायनिक दृष्टि से वसा मुख्यतया तीन प्रकार की होती हैं-1. सरल वसा 2. संयुक्त वसा 3. व्युत्पन्न वसा।

    सरल वसा (Simple Fats)

    सरल वसा में केवल ग्लिसरॉल व वसा अम्ल एस्टर बन्ध द्वारा संयुक्त होते हैं।

    संयुक्त वसा (Complex Fats)

    इन वसाओं में अम्ल तथा एल्कोहॉल के साथ-साथ नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस भी होते हैं। इन्हें जटिल लिपिड्स (compler lipids) भी कहा जाता है।

    ये मुख्यतया दो प्रकार के होते हैं – फॉस्फोलिपिड और ग्लाइकोलिपिडा

    इनमें से फॉस्फोलिपिड में फॉस्फोरस का अंश होता है, जो पित्त, यकृत एवं पेशियों में संचित होती है। परन्तु ग्लाइकोलिपिड तत्रिका तत्र के ऊतक में पाई जाती है।

    व्युत्पन्न वसा (Derived Fats)

    ये संयुक्त वसाओं के जल अपघटन से बनती हैं, जैसे-स्टीरॉयड (लिंग हॉर्मोन, पित्त अम्ल), स्टीरॉल (कोलेस्ट्रॉल, विटामिन-D), प्रोस्टाग्लैन्डिन वसा अम्ल व्युत्पन्न है, जो अरेखित पेशियों के संकुचन, रुधिर स्कन्दन, शोघ तथा एलर्जी प्रतिक्रियाओं में भाग लेते हैं।

    वानस्पतिक वसा (Plant Fats)

    यह प्रकृति के मुख्य रूप से वनस्पतियों, फलों तथा बीजों में पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है।

    जन्तुओं में वसा ऊतक, यकृत तथा अस्थि मज्जा में संचित रहती है। वसा अम्ल दो प्रकार के होते हैं

    संतृप्त वसा और असंतृप्त वसा अम्ला अधिकतर संतृप्त वसा जन्तु वसा होता है।

    सामान्य ताप पर यह ठोस होता है, जैसे-मक्खन परन्तु नारियल का तेल एवं ताड़ का तेल ही संतृप्त वनस्पति तेल के उदाहरण हैं, जबकि असंतृप्त वसा मछली के तेल एवं वनस्पति तेलों में मिलते हैं।

    वसा के प्रमुख कार्य

    यह ठोस रूप में शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है।

    यह त्वचा के नीचे जमा होकर शरीर के ताप को बाहर नहीं निकलने देती है।

    शरीर के विभिन्न अंगों की चोवें से बचाती है। – आरक्षित भोजन के रूप में।

    प्लाज्मा झिल्ली के निर्माण में सहायक होती है।

    प्रोटीन (Protein) क्या है ? प्रोटीन के प्रकार, स्त्रोत एवं कार्य

    यह एक जटिल कार्बनिक यौगिक होता है। प्रोटीन शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1938 में वरजेलियस ने किया। शरीर की वृद्धि एवं ऊतकों के टूट-फूट की मरम्मत में प्रोटीन की भूमिका अहम होती है।

    इसके अलावा शरीर में विभिन्न रासायनिक क्रियाओं के लिए उत्प्रेरक के रूप में विभिन्न एन्जाइम की भूमिका होती है, जो प्रोटीन ही होता है। प्रोटीन अमीनो अम्लों के बहुलक होते हैं इनमें लगभग 20 प्रकार के अमीना अम्ल पाए जाते हैं।

    मानव शरीर में इनमें से 10 प्रकार के अमीनो अम्ल का संश्लेषण शरीर में स्वयं होता है, जबकि शेष 10 प्रकार के अमीनो अम्ल भोजन के द्वारा प्राप्त करते हैं।

    कुछ आवश्यक प्रोटीन के प्रकार

    शारीरिक प्रोटीन कार्य एन्जाइम्स जैव उत्प्रेरक, जैव-रासायनिक अभिक्रियाओं में सहायक हैं। हॉर्मोन्स शरीर की क्रियाओं का नियनन करते हैं।

    परिवहन प्रोटीन हीमोग्लोबिन, विभिन्न पदार्थों का परिवहन करती है। संरचनात्मक प्रोटीन कोशिका एवं ऊतक निर्माण करती है।

    रक्षात्मक प्रोटीन संक्रमण से रक्षा करने में सहायक है। उदाहरण-प्रतिरक्षी। संकुचन प्रोटीन ये पेशी संकुचन एवं चलन हेतु उत्तरदायी है, उदाहरण-मायोसिन, एक्टिन आदि।

    प्रोटीन के कार्य

    यह शरीर की वृद्धि तथा ऊतकों की मरम्मत करता है।

    यह एन्जाइम तथा विटामिन का निर्माण करता है। – प्रोटीन श्वसन अंगों के निर्माण में भाग लेता है।

    यह संयोजी ऊतकों, अस्थियों तथा उपास्थियों के निर्माण में भाग लेता है।

    प्रोटीन की कमी से मैरेस्मस नामक रोग हो जाता है।

    विटामिन (Vitamins) क्या है ? विटामिन (Vitamins) के प्रकार, स्त्रोत और उपयोग

    कैसिमिर फूंक ने इस शब्द का प्रतिपादन किया। यह स्वयं ऊर्जा उत्पादन तो नहीं कर सकता परन्तु ऊर्जा सम्बन्धी रासायनिक क्रियाओं को नियन्त्रित करता है।

    हमारा शरीर विटामिन – D एवं K का संश्लेषण कर सकता है, जबकि अन्य विटामिन बाह्य स्रोत (भोजन) से प्राप्त किए जाते हैं।

    इनका नामकरण अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षरों के अनुसार किया गया है; जैसे-A, B, C, D, E एवं KI

    विलेयता के आधार पर विटामिनों को दो वर्गों में बाँटा गया है।

    1. जल में घुलनशील विटामिन – विटामिन-B समूह और विटामिन-C

    2. वसा में घुलनशील विटामिन – विटामिन- A, D, E एवं KI

    विटामिनों के स्रोत, कार्य एवं कमी के प्रभाव

    खनिज लवण (Minerals)

    खनिज लवण (Minerals) भोजन के अकार्बनिक अवयव है, जो शरीर के उपापचयी क्रिया को नियन्त्रित करते हैं। यह शरीर के ऊतकों के निर्माण के लिए कच्चा पदार्थ है और एन्जाइम तथा विटामिन के आवश्यक अंग है।

    खनिज पदार्थ के मुख्य स्त्रोत और कार्य

    सन्तुलित भोजन (Balanced Diet) क्या है ?

    वह भोजन, जिसमें सभी पोषक तत्त्व उचित अनुपात में सम्मिलित होते हैं सन्तुलित भोजन कहलाते हैं। इसका निर्धारण प्रत्येक व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और कार्य के अनुरूप होता है।

    पोषक तत्त्वों के स्रोत : एक दृष्टि में

    पोषक पदार्थस्रोत
    कार्बोहाइड्रेटचीनी, शहद, दूध, अनाज, आलू आदि
    प्रोटीनअण्डा, दूध, पनीर, दाल, मछली आदि
    वसाघी, तेल, दूध, मांस आदि
    विटामिनमांस, मछली, दूध, गाजर, हरी सब्जी आदि
    खनिज लवणमांस, दूध, अनाज, हरी सब्जी आदि

    कुपोषण (Malnutrition) क्या है ?

    भोजन की आवश्यक मात्रा तथा आवश्यक तत्त्वों का समावेश न होना कुपोषण की स्थिति पैदा करती है। सामान्यतया कुपोषण की स्थिति प्रोटीन की कमी के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती है, जिसके कारण शरीर के वृद्धि एवं विकास में बाधा उत्पन्न होती है।

    अपोषण (Under-nutrition)

    इसका आशय भोजन में आवश्यक तत्त्वों का सर्वथा अभाव होना है, जिसके परिणामस्वरूप शरीर की आवश्यकता की पूर्ति नहीं हो पाती है।

    पोषण की अधिकता के परिणाम

    संतृप्त वसा की अधिकता से रुधिर में कॉलेस्टरॉल को मात्रा बढ़ जाती है, जो रुधिर वाहिनियों की दीवार पर जम जाती है। फलत: रुधिर को गति कम हो जाती है एवं रुधिर दाब बढ़ जाता है एवं हृदय सम्बन्धी रोग हो जाते हैं।

    अधिक कैलोरी वाले भोजन, जैसे-घी, शक्कर आदि के सेवन से मोटापा तथा डायबिटीज की समस्या आती है।

  • पोषण किसे कहते हैं | पादपों में पोषण (Nutrition in Plants) | नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation)

    पोषण किसे कहते हैं | पादपों में पोषण (Nutrition in Plants) | नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation)

    विभिन्न उपापचयी क्रियाओं के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा जीवों को खाद्य पदार्थों के ऑक्सीकरण से प्राप्त होती है। पोषण उन सभी क्रियाओं का योग है, जिसमें भोजन का अन्तर्ग्रहण, पाचन, अवशोषण तथा वहिष्करण होता है।

    पादपों में पोषण (Nutrition in Plants)

    विधि के आधार पर पौधों को दो भागों स्वपोषित तथा परपोषी अथवा विषमपोषी पौधे में बाँटा गया है।

    स्वपोषित पौधे (Autotrophic Plants)

    अधिकांश पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में पर्णहरित (Chlorophyl) की सहायता से वायुमण्डल से CO2 और भूमि से जल ग्रहण कर प्रकाश-संश्लेषण द्वारा कार्बनिक भोज्य पदार्थ बना लेते हैं। ये पौधे जड़ों द्वारा भूमि से विभिन्न खनिज पोषकों का अवशोषण करते हैं।

    परपोषित पौधे (Heterotrophic Plants)

    पर्णहरित की अनुपस्थिति के कारण ये पौधे अपना भोजन स्वयं नहीं बना पाते हैं। अत: ये अपना भोजन अन्य स्रोतों से प्राप्त करते हैं।

    भोजन स्रोत के आधार पर परपोषित पोधों के प्रकार

    1. परजीवी (Parasitic) 2. मृतोपजीवी (Saprophytic) 3.  सहजीवी (Symbiotic 4. कीटभक्षी (Insectivorous)

    परजीवी पौधे (Parasitic Plants)

    परजीवी पौधे अपने भोजन के लिए दूसरे जीवित पौधों अथवा जन्तुओं पर निर्भर रहते हैं। परजीवी पौधे के शरीर का कोई भी भाग परजीवी मूल (Haustorium) में रूपान्तरित हो जाता है और पोषक से भोज्य पदाथों का अवशोषण करता है।

    मृतोपजीवी पौधे (Saprophytic Plants)

    इस प्रकार के पौधों में पोषण जीवों के मृत, सड़े हुए शरीर से अपना भोजन प्राप्त करते हैं। अनेक कवक तथा जीवाणु मृतोपजीवी होते है।

    सहजीवी पौधे (Symbiotic Plants)

    इसके अन्तर्गत दो पौधे एक-दूसरे का पूरक बनकर एक-दूसरे को लाभ पहुँचाते हुए जीवित रहते हैं। इसके अन्तर्गत लाइकेन (शैवाल और कवक) सहजीवी के रूप में, मुख्य रूप से आते हैं, जिसमें कवक को शैवाल से पोषण की प्राप्ति तथा शैवाल को कवक से कवक जाल द्वारा सुरक्षा प्रदान किया जाता है। लेग्युमिनोसी कुल के पौधों की जड़ों के गाँठ में पाए जाने वाले राइजोबियम बैक्टीरिया भी सहजीवी के उदाहरण हैं, जिसमें उसे उस पौधों से पोषक तत्व प्राप्त होते हैं तथा पौधे को नाइट्रोजन तत्व की प्राप्ति होती है।

    कीटभक्षी पौधे (Insectivorous Plants)

    इस प्रकार के पौधे आंशिक रूप से स्वपोषी तथा परपोषी दोनों होते हैं। इसका आशय यह है कि ये पौधे पर्णहरित की उपस्थिति के कारण

    अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं, परन्तु नाइट्रोजन की पूर्ति कीटों को पकड़कर तथा उनका पाचन कर पूरी करते हैं।

    पौधों में पोषण के लिए अनिवार्य तत्व

    डी. साउसर ने बताया कि पौधे खनिज पदार्थों पर निर्भर हैं और खनिज पदार्थों को मूल तन्त्र द्वारा मिट्टी से शोषित करते हैं। खनिज तत्वों को दो समूहों में रखते हैं।

    अत्यावश्यक तत्व C, H, O, N, P, K, Mg, Ca, S (कुल = 9 तत्व)

    कम आवश्यक तत्व Zn, Cu, Mn, Fe, B, Cl, Mo आदि

    नाइट्रोजन पोषण

    पौधों को न्यूक्लिक अम्ल, प्रोटीन तथा अन्य नाइट्रोजन युक्त पदार्थों के संश्लेषण हेतु नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है, यद्यपि 78% नाइट्रोजन वायुमण्डल में है, किन्तु पौधे वातावरण से सीधे नाइट्रोजन को गैसीय रूप में ग्रहण नहीं कर सकते हैं बल्कि नाइट्राइट (NO2), नाइट्रेट (NO3) व अमोनियम (NH4+) के रूप में प्राप्त करते हैं। इसलिए नाइट्रोजन के यौगिकीकरण (nitrogen fixation) का पौधों के लिए महत्त्व है।

    नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation)

    वायुमण्डल की मुक्त नाइट्रोजन जैविक और अजैविक विधियों द्वारा विभिन्न यौगिकों में बदल जाती है अजैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण बादलों में बिजली के चमकने से होता है।

    जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण दो प्रकार से होता है

    असहजीवी नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Asymbiotic Nitrogen Fixaton)

    मिट्टी में स्वतन्त्र रूप से पाए जाने वाले अवायवीय (anaerobic) जीवाणु; जैसे-क्लॉस्ट्रिडियम, वायवीय (aerobic) जीवाणु; जैसे- एजोटोबैक्टर स्वतन्त्र नीले-हरे शैवाल; जैसेनॉस्टॉक, एनाबीना आदि स्वतन्त्र नाइट्रोजन का। स्थिरीकरण करने में सक्षम होते हैं क्योंकि वे अपने निफ जीन (नाइट्रोजन स्थिरीकारक जीन) की सहायता से नाइट्रोजिनेस नामक एन्जाइम का संश्लेषण कर लेते हैं जो उत्प्रेरक का कार्य करता है।

    नाइट्रोजीनेस एन्जाइम नाइट्रोजन को अमोनियम यौगिकों में अपचयित करने की क्षमता रखता है।

    सहजीवी नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Symbiotic Nitrogen Fixation)

    राइजोबियम लेग्युमिनोसेरम नामक जीवाणु लेग्युमिनोसी कुल के पौधों (जैसे-चना, मटर, मूंगफली आदि) की जड़ में प्रवेश कर ग्रन्थिकाएँ बनाता है, जिसमें लाल रंग का वर्णक लैगहीमोग्लोबिन पाया जाता है, जो प्रकृति से नाइट्रोजन लेकर नाइट्रेट में बदल देते हैं।

    अमोनीकरण (Ammonification)

    जीवाणु; जैसे – बैसिलस रेमोसस, बैसिलस वल्गेरिस तथा बैसिलस मायकॉइड्स द्वारा पौधे तथा जन्तुओं के मृत शरीर की प्रोटीन से अमोनिया बनाने की क्रिया अमोनीकरण कहलाती है।

    नाइट्रीकरण (Nitrification)

    पुष्पी पादप नाइट्रेट (NO3) आयनों का अवशोषण करते हैं। नाइट्रोसोमोनास अथवा नाइट्रोसोकोकस नामक जीवाणु अमोनियम आयनों (NH4+) का ऑक्सीकरण करके उन्हें (NO2) (नाइट्राइट) आयन में परिवर्तित कर देता है। फिर नाइट्रोबैक्टर नामक जीवाणुओं द्वारा इनको नाइट्रेट (NO3) में बदलने की क्रिया नाइट्रीकरण कहलाती है।

    विनाइट्रीकरण (Denitrification)

    कुछ जीवाणु; जैसे – थायोबैसिलस डीनाइट्रीफिकेंस, स्यूडोमोनास डीनाइट्रीफिकेन्स आदि नाइट्रोजन और अमोनियम यौगिकों को नाइट्रोजन में परिवर्तन कर देते हैं, जो पुन: वायुमण्डल में पहुँच जाती है। इसी तरह में नाइट्रोजन चक्र चलता रहता है।

    विभिन्न तत्त्वों के कार्य तथा कमी के प्रभाव

    तत्वस्त्रोंत विशेष कार्य न्यूनता लक्षण 
    NNO2, NO3या NH4+ प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल, हॉर्मोन, विटामिन, हरितलवक तथा ATP के निर्माण में।हरिमाहीनता तथा स्तम्मित वृद्धि। 
    KK+रन्ध्र के खुलने तथा बन्द होने की क्रिया में महत्त्वपूर्ण योगदान। कोशिका को स्फीत बनाए रखने में, प्रोटीन संश्लेषण में।पत्तियों के किनारे पीले पड़ जाते हैं। ऊतकक्षयी क्षेत्र बनते हैं, पत्तियों नीचे की ओर मुड़ जाती हैं तथा तना कमजोर हो जाता है।
    PH2PO4कोशिका झिल्ली, प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल आदि का मुख्य अवयव।वृद्धि निरुद्ध हो जाती है। पत्तियाँ हरे रंग की होती हैं। काल पूर्व मृत्यु।
    CaCa2+झिल्ली की विभेदी पारगम्यता बनाए रखने में, कुछ एन्जाइम को क्रियाशील करने में तथा मिडिल लेमेला में कैल्शियम पेक्टेट के रूप में।स्तम्भित वृद्धि, युवा पत्तियाँ कुरुना (molted) हो जाती हैं, पौधे स्थायी रूप से मुरझा जाते हैं।
    MgMg2+फॉस्फेट उपापचय में एन्जाइम क्रियाशील करने के लिए, राइबोसोम को जोड़ने में, पर्णहरिम का मुख्य अवयव।हरिमाहीनता, ऊतकक्षयी क्षेत्र, एन्थोसायनिन का बनना। 
    SSO2+ 4प्रोटीन, विटामिन, फेरोडोक्सिन आदि का मुख्य घटकनई पत्तियों में हरिमाहीनता, तना सख्त, मूल तन्त्र अधिक विकसित।
    FeFe3+फेरोडोक्सिन, साइटोक्रोम आदि में, केटालेज एन्जाइम को क्रियाशील करने में तथा क्लोरोफिल के संश्लेषण में।हरिमाहीनता, शिराएँ गहरे हरे रंग की, वृन्त छोटे तथा क्लोरोफिल नहीं बनता है।
    MnMn2+कार्बोक्सीलेज एन्जाइम को क्रियाशील करने में।हरिमाहीनता तथा ऊतकक्षयी क्षेत्र, क्लोरोफिल नहीं बनता है।  
    BBO3-3 याB4O2-7परागकणों के अंकुरण में, कोशिका विभेदन में तथा कार्बोहाइड्रेट स्थानान्तरण में।ब्राऊन हार्ट रोग, शिखाग्र काले, पत्तियाँ ताम्रक तथा भंगुर हो जाती है।
    CuCu2+एन्जाइम क्रियाशीलता में।शीर्ष ऊतकक्षयी, प्ररोह डाइ बैक रोग।
    ZnZn2+ऑक्सिन संश्लेषण में।पत्तियाँ हरिमाहीन विकृत, पर्व छोटे, पुष्पन निरुद्ध।
    ClClNa+ तथा K+ के धनायन तथा ऋणायन सन्तुलन बनाए रखने में, प्रकाश-संश्लेषण में ऑक्सीजन के निकलने की क्रिया में।जड़ें छोटी, पत्तियाँ हरिमाहीन तथा ऊतक्क्षयी क्षेत्र बनते हैं।