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  • इसरो का आदित्य-एल1 (Aditya L1 Mission) मिशन (सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में)

    इसरो का आदित्य-एल1 (Aditya L1 Mission) मिशन (सम्पूर्ण जानकारी हिंदी में)

    इसरो का Aditya L1 Mission (आदित्य-एल1 मिशन (संस्कृत से : आदित्य, “सूर्य”) सूर्य के अवलोकन के लिए समर्पित पहला भारतीय मिशन है जो इसरो द्वारा 2 सितंबर 2023 को लांच किया गया, साथ ही इसरो द्वारा स्थापित पहली सोलर ऑब्जर्वेटरी भी है जिसके जरिए सूर्य का अध्ययन किया जाएगा ।

    Aditya L1 मिशन की लांचिंग और प्रमुख चरण (Launch and key phases of Aditya L1 mission)

    2 सितंबर 2023 को 11:50 IST पर पीएसएलवी सी57 पर आदित्य-एल1 लॉन्च किया गया | इसरो के चंद्रमा मिशन की सफल लैंडिंग के दस दिन बाद  ही Aditya L1 ने सफलतापूर्वक अपनी इच्छित कक्षा हासिल कर ली और 12:57 IST पर अपने चौथे चरण से अलग हो गया । निगार शाजी इस महत्वकांशी परियोजना की निदेशक हैं।

    योजना के अनुसार, प्रक्षेपण के लगभग 63 मिनट बाद पीएसएलवी द्वारा आदित्य-एल1 को निचली-पृथ्वी की कक्षा में तैनात किया गया। प्रक्षेपण के बाद एल1 तक की यात्रा में लगभग 110 दिन लगने का अनुमान है, इस दौरान अंतरिक्ष यान को इस गुरुत्वाकर्षण स्थिर बिंदु तक पहुंचने के लिए आवश्यक वेग देने के लिए पांच और manoeuvre दिए जाएंगे। इनमे से दो manoeuvre पुरे हो चुके है |

    आदित्य-एल1 अंतरिक्ष यान सूर्य का अध्ययन करने के लिए अपने साथ कुल सात उपकरण लेकर गया है, जिनमें से चार सूर्य से प्रकाश का निरीक्षण करेंगे, बचे हुए तीन उपकरण प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्र के यथास्थान मापदंडों को मापेंगे | इस अंतरिक्ष यान को लैग्रेंजियन बिंदु 1 (एल1) पर एक प्रभामंडल कक्षा में स्थापित किया जाएगा, जो सूर्य की दिशा में पृथ्वी से 15 लाख किमी दूर है| यह सूर्य के चारों ओर समान सापेक्ष स्थिति में चक्कर लगाएगा. इस कारण लगातार सूर्य पर नजर रख सकता है |

    L1 पर पहुंचने पर, आदित्य-L1 स्थान के चारों ओर एक कक्षा में खुद को “बांधने” के लिए एक और चाल को अंजाम देगा। इसरो के अनुसार, प्रक्षेपण के लगभग 127 दिन बाद स्थापित कक्षा अनियमित आकार की होगी और सूर्य और पृथ्वी को जोड़ने वाली रेखा के लगभग लंबवत (perpendicular to a line joining the sun and Earth) में होगी।

    Aditya L1 मिशन के पीछे की कहानी (The story behind Aditya L1 mission)

    आदित्य-एल1 का सफल प्रक्षेपण 15 वर्षों से अधिक की योजना का परिणाम है | मिशन की शुरुआत जनवरी 2008 में अंतरिक्ष विज्ञान सलाहकार समिति (एडीसीओएस) (Advisory Committee for Space Sciences (ADCOS)) की एक अवधारणा के रूप में हुई थी, एक छोटे 400 किलोग्राम (880 पाउंड) उपग्रह के रूप में जो पृथ्वी की low-Earth orbit कक्षा में रहेगा। रणनीति बनाने के डेढ़ दशक में इस मिशन का पैमाना काफी बढ़ गया और इस वृद्धि को प्रतिबिंबित करने के लिए जुलाई 2019 में इसे एक नया नाम  —  “आदित्य-एल1”  —  दिया गया।

    क्या करेगा Aditya L1 मिशन ? What will Aditya L1 mission do?

    आदित्य-एल1 पृथ्वी से लगभग 1.5 मिलियन किमी की दूरी पर पृथ्वी और सूर्य के बीच एल1 लैग्रेंज बिंदु (Lagrange point 1 ) के चारों ओर एक प्रभामंडल (Earth-sun system) कक्षा में परिक्रमा करेगा जहां यह सौर वायुमंडल, सौर चुंबकीय तूफान और पृथ्वी के चारों ओर के वातावरण पर उनके प्रभाव का अध्ययन करेगा।

    आदित्य एल-1 सूर्य के वायुमंडल, सूर्य के परते (layers) जैसे फोटोस्फेयर (photosphere – प्रकाशमंडल), क्रोमोस्फेयर (chromosphere) और सबसे बाहरी लेयर कोरोना ( the corona) की अलग-अलग कलर बैंड में स्टडी करेगा। इसरो का कहना है कि आदित्य ए-1 पेलोड के सूट कोरोनल हीटिंग, कोरोनल मास इजेक्शन, प्री-फ्लेयर और फ्लेयर गतिविधियों और उनकी विशेषताओं, अंतरिक्ष मौसम की गतिशीलता, कण और मैग्नेटिक फील्ड से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी इकट्ठा करेगा।

    आदित्य-एल1 अंतरिक्ष यान सूर्य के करीब नहीं आएगा, पृथ्वी से लगभग 1.5 मिलियन किमी की दुरी से ही यह सूर्य का अध्ययन करेगा | यह दुरी पृथ्वी और सूर्य के बीच के कुल स्थान का लगभग 1% है | इसरो के अनुसार, L1 पर प्लेसमेंट अंतरिक्ष यान को सूर्य का दृश्य देखने की अनुमति देगा जो ग्रहण (eclipses) या प्रच्छाया (occultations) से निर्बाध है।

    क्या सूर्य का अध्ययन पृथ्वी से संभव है ? Is it possible to study the Sun from Earth?

    धरती पर वायुमंडल है जो सूर्य से आने वाली ज्यादातक खतरनाक रेडिएशन को अवशोषित कर लेता है। इसलिए धरती से सूर्य का अध्ययन सही से नहीं किया जा सकता। सूर्य की स्टडी के लिए स्पेस में जाना जरूरी है और इसी कारण कई देश पहले भी अपने सोलर स्पेसक्राफ्ट लॉन्च कर चुके हैं। अमेरिका, जापान, चीन और यूरोपीय यूनियन की स्पेस एजेंसियां सूर्य की स्टडी कर रही हैं। नासा ने 2018 में पार्कर सोलर प्रोब लॉन्च किया था।

    चीन और भारत के सूर्य के अध्ययन से जुड़े सैटेलाइट में अन्तर

    हाल ही चीन ने भी सूर्य के अध्ययन से जुड़ा एक सैटेलाइट लॉन्च किया। चीन ने 8 अक्टूबर 2022 को नेशनल स्पेस साइंस सेंटर से एडवांस स्पेस बेस्ड सोलर ऑब्जर्वेटरी (ASO-S) या कुआफू-1 लॉन्च किया था। आदित्य L-1 से अगर इसकी तुलना करें तो सबसे बड़ा अंतर इसकी पृथ्वी से ऊंचाई है। ASO-S जहां धरती से 720 किमी की ऊंचाई पर है तो वहीं आदित्य L-1 की दूरी धरती से लगभग 15 लाख किमी होगी। चीन का ASO-S 859 किग्रा है। वहीं भारत का आदित्य L1 का वजन 400 किग्रा है। आदित्य एल-1 और ASO-S की धरती से दूरी सबसे खास है। क्योंकि चीन का स्पेसक्राफ्ट धरती के ऑर्बिट में है, लेकिन इसरो का आदित्य इससे बिल्कुल बाहर होगा। यानी जो चीन ने नहीं किया वह भारत करेगा।

    चीन का ASO-S दुनिया का पहला स्पेसक्राफ्ट रहा है जो सोलर फ्लेयर और कोरोनल मास इजेक्शन की एक साथ स्टडी करने में सक्षम है। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह सैटेलाइट सूर्य की मैग्नोटिक फील्ड, सोलर फ्लेयर और कोरोनल मास इजेक्शन से जुड़ा 500 जीबी का डेटा रोज धरती पर भेजता है। वहीं सूर्य में बड़ी हलचल होने पर यह हर सेकंड तस्वीर भेजता है। वहीं, आदित्य एल-1 सोलर कोरोना की स्टडी करेगा। इसके अलावा आदित्य L-1 एक्स-रे के जरिए स्टडी करेगा।

    आदित्य-एल1 मिशन के प्रमुख वैज्ञानिक उद्देश्य (Major scientific objectives of Aditya-L1 mission)

    • सौर ऊपरी वायुमंडलीय (क्रोमोस्फीयर और कोरोना) गतिशीलता का अध्ययन।
    • क्रोमोस्फेरिक और कोरोनल हीटिंग का अध्ययन, आंशिक रूप से आयनित प्लाज्मा की भौतिकी, कोरोनल द्रव्यमान इजेक्शन की शुरुआत, और फ्लेयर्स
    • सूर्य से कण गतिशीलता के अध्ययन के लिए डेटा प्रदान करने वाले इन-सीटू कण और प्लाज्मा वातावरण का निरीक्षण करें।
    • सौर कोरोना का भौतिकी और इसका तापन तंत्र।
    • कोरोनल और कोरोनल लूप प्लाज्मा का निदान: तापमान, वेग और घनत्व।
    • सीएमई का विकास, गतिशीलता और उत्पत्ति।
    • कई परतों (क्रोमोस्फीयर, बेस और विस्तारित कोरोना) पर होने वाली प्रक्रियाओं के अनुक्रम की पहचान करें जो अंततः सौर विस्फोट की घटनाओं की ओर ले जाती हैं।
    • सौर कोरोना में चुंबकीय क्षेत्र टोपोलॉजी और चुंबकीय क्षेत्र माप।
    • अंतरिक्ष मौसम के लिए ड्राइवर (सौर हवा की उत्पत्ति, संरचना और गतिशीलता)।

    आदित्य-एल1 पेलोड

    आदित्य-एल1 के उपकरणों को सौर वातावरण मुख्य रूप से क्रोमोस्फीयर और कोरोना का निरीक्षण करने के लिए ट्यून किया गया है। इन-सीटू उपकरण एल1 पर स्थानीय वातावरण का निरीक्षण करेंगे। जहाज पर कुल सात पेलोड हैं जिनमें से चार सूर्य की रिमोट सेंसिंग करते हैं और तीन इन-सीटू अवलोकन करते हैं।

    वैज्ञानिक जांच की उनकी प्रमुख क्षमता के साथ पेलोड।

    Photo courtesy – ISRO (https://www.isro.gov.in/Aditya_L1.html
  • इसरो का चंद्रयान-3 मिशन (Hindi में ) | Launching of Chandrayaan-3 Mission by ISRO

    इसरो का चंद्रयान-3 मिशन (Hindi में ) | Launching of Chandrayaan-3 Mission by ISRO

    तेजी से हो रहे वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के इस युग में, अंतरिक्ष अन्वेषण ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ का विस्तार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अंतरिक्ष अनुसंधान और अन्वेषण में कदम रखने वाले कई देशों में से, भारत अपने अभूतपूर्व मिशनों के साथ एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में उभरा है।

    भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) (Indian Space Research Organisation (ISRO) के सबसे महत्वपुर्ण मिशनों में से एक चंद्रयान-3 (Chandrayaan-3) का बहुप्रतीक्षित प्रक्षेपण 14 जुलाई 2023 को दोपहर 2.35 बजे सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र ((Satish Dhawan Space Centre), श्रीहरिकोटा से होगा, जो चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सॉफ्ट-लैंडिंग करने वाले दुनिया के पहले मिशन के रूप में इतिहास रचने के लिए तैयार है। इस आर्टिकल में हम इस महत्वाकांक्षी मिशन की जटिलताओं, इसके महत्व, उद्देश्यों और भारत के लिए इसका क्या अर्थ है, इस पर प्रकाश डालता है।

    Chandrayaan-3 Integrated Module
    चंद्रयान-3 इंटीग्रेटेड मॉड्यूल

    चंद्रयान-3 मिशन क्या है? What is Chandrayaan-3 Mission ?

    चंद्रयान-3 इसरो का तीसरा चंद्र मिशन है । यह मिशन 2019 के चंद्रयान-2 मिशन का follow up Mission है | चंद्रयान-2 मिशन आंशिक रूप से विफल हो गया था क्योंकि इसके लैंडर और रोवर चंद्रमा पर सॉफ्ट-लैंडिंग नहीं कर सके थे ।

    चंद्रयान-3 मिशन का प्राथमिक उद्देश्य चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित लैंडिंग (safe landing) और roving (चन्द्रमा की सतह पर घुमने की अपनी क्षमता को प्रदर्शित करना है। इस मिशन में एक लैंडर/रोवर (lander/rover) और एक प्रोपल्शन मॉड्यूल (propulsion module) शामिल है। प्रोपल्शन मॉड्यूल, एक बॉक्स जैसी संरचना है जो एक बड़े सौर पैनल और एक मुख्य थ्रस्टर नोजल(thruster nozzle) के साथ, लैंडर (lander) को चंद्र कक्षा में ले जाती है । यह संचार रिले उपग्रह (communications relay satellite) के रूप में कार्य करते हुए चंद्रमा के चारों ओर कक्षा में रहता है ।

    चंद्रयान 3 प्रोपल्शन मॉड्यूल, जिसका उपयोग रिले उपग्रह के रूप में किया जाएगा (Photo: Wikipedia)

    इस रोवर में भूकंपमापी (seismometer), ऊष्मा प्रवाह प्रयोग (heat flow experiment) और स्पेक्ट्रोमीटर (spectrometers) है जो चन्द्रमा की सतह और कक्षा से कई प्रयोग (scientific measurements) करेगा । इसरो प्रमुथ एस सोमनाथ ने 10 जुलाई 2023 को कहा कि चंद्रयान-2 के सफलता आधारित डिजाइन की बजाय चंद्रयान-3 में ‘विफलता आधारित डिजाइन’ का विकल्प चुना गया है | उन्होंने कहा कि इस बात पर ध्यान केंद्रित किया गया कि क्या विफल हो सकता है और इसकी सुरक्षा कैसे की जाए और सफल लैंडिंग सुनिश्चित की जाए |

    इसरो का चंद्रयान मिशन (ISRO’s Chandrayaan Mission)

    चंद्रयान-1 (Chandrayaan-1)

    चंद्रयान मिशन की शुरुआत इसरो ने चंद्रयान-1 मिशन के साथ शुरू की | चंद्रयान-1, चंद्रमा के लिए भारत का पहला मिशन, 22 अक्टूबर 2008 को सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) से सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया था।, जो 312 दिनों तक संचालित हुआ और अपने नियोजित उद्देश्यों में से 95% को पूरा किया, जिसमें चन्द्रमा पर मिट्टी में पानी के अणुओं की व्यापक उपस्थिति की महत्वपूर्ण खोज भी शामिल थी।

    अंतरिक्ष यान चंद्रमा के रासायनिक, खनिज और फोटो-भूगर्भिक मानचित्रण के लिए चंद्रमा की सतह से 100 किमी की ऊंचाई पर चंद्रमा के चारों ओर परिक्रमा कर रहा था। अंतरिक्ष यान में भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, स्वीडन और बुल्गारिया में निर्मित 11 वैज्ञानिक उपकरण थे। सभी प्रमुख मिशन उद्देश्यों के सफल समापन के बाद, मई 2009 के दौरान कक्षा को 200 किमी तक बढ़ा दिया गया है। उपग्रह ने चंद्रमा के चारों ओर 3400 से अधिक परिक्रमाएं कीं और मिशन तब समाप्त हुआ जब 29 अगस्त को अंतरिक्ष यान के साथ संचार टूट गया था |

    चंद्रयान-2 (Chandrayaan-2)

    चंद्रयान-2 या चंद्रयान द्वितीय, चंद्रयान-1 के बाद चन्द्रमा पर खोजबीन करने वाला इसरो का दूसरा अभियान था, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसन्धान संगठन (इसरो) ने विकसित किया था | अभियान को जीएसएलवी संस्करण 3 प्रक्षेपण यान द्वारा प्रक्षेपित (लॉन्च) किया गया था और इस अभियान में भारत में निर्मित एक चंद्र कक्षयान (ऑरबिटर), एक रोवर एवं एक लैंडर शामिल हैं।

    भारत ने चंद्रयान-2 को 22 जुलाई 2019 को श्रीहरिकोटा रेंज से भारतीय समयानुसार दोपहर 02:43 बजे सफलता पूर्वक प्रक्षेपित किया था | यह यान 20 अगस्त 2019 को चंद्रमा की कक्षा में पहुंचा और विक्रम लैंडर की लैंडिंग के लिए कक्षीय स्थिति निर्धारण करना शुरू किया। लैंडर और रोवर को 6 सितंबर 2019 को चंद्रमा के निकट, दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में लगभग 70° दक्षिण के अक्षांश पर उतरने और एक चंद्र दिवस (Lunar day) के लिए वैज्ञानिक प्रयोग करने के लिए निर्धारित किया गया था, जो पृथ्वी के दो सप्ताह के बराबर है लेकिन 6 सितंबर 2019 को उतरने का प्रयास करते समय लैंडर अपने इच्छित प्रक्षेपवक्र (intended trajectory) से भटक जाने पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इसरो को सौंपी गई विफलता विश्लेषण रिपोर्ट के अनुसार, दुर्घटना एक सॉफ्टवेयर (software glitch) गड़बड़ी के कारण हुई थी।

    चंद्रयान-2 लैंडर और रोवर चंद्रमा पर लगभग 70° दक्षिण के अक्षांश पर स्थित दो क्रेटरों मज़िनस सी (craters Manzinus C) और सिमपेलियस एन (Simpelius N) के बीच एक ऊँचे मैदान पर उतरने का प्रयास करना था। पहियेदार रोवर चंद्र सतह पर चलने और जगह का रासायनिक विश्लेषण करने के लिए बनाया गया था। रोवर द्वारा एकत्र किए गए आंकड़ों को चंद्रयान-2 कक्षयान के माध्यम से पृथ्वी पर भेजने की योजना थी ।

    इन दो मिशनों से मिले अनुभवों और सीखों के आधार पर, इसरो अब चंद्रयान-3 के लिए तैयारी कर रहा है, जिसका लक्ष्य चंद्रमा पर सफल लैंडिंग करना है।

    भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है चंद्रयान-3?

    चंद्रयान-3 इसरो के लिए सिर्फ एक और मिशन नहीं है; यह भारत की अंतरिक्ष अनुसंधान यात्रा में एक महत्वपूर्ण कदम है। सफल होने पर, यह मिशन चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित रूप से उतरने और घूमने में भारत की क्षमता को प्रदर्शित करेगा, यह उपलब्धि अब तक केवल संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और चीन ने ही हासिल की है। इसके अलावा, मिशन से प्राप्त अंतर्दृष्टि चंद्रमा, विशेषकर इसके दक्षिणी ध्रुव के बारे में जानकारी में हमारी समझ में महत्वपूर्ण योगदान देगी। इस प्रकार, चंद्रयान-3 की सफलता भारत के लिए वैज्ञानिक और भू-राजनीतिक दोनों निहितार्थ रखती है।

    चंद्रयान-3 मिशन

    चंद्रयान-3 लैंडर और रोवर का नाम क्या है?

    चंद्रयान-3 के लैंडर का नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के नाम पर विक्रम रखा गया है। यह चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर के समान होगा, लेकिन सुरक्षित लैंडिंग सुनिश्चित करने के लिए इसमें सुधार किए गये है । उदाहरण के लिए, लैंडर में पांच के बजाय चार थ्रस्टर इंजन (thruster engines) होंगे, अधिक मजबूत पैर (robust legs), बड़े सौर पैनल होंगे और यह अधिक ईंधन ले जाएगा। इस 1.75 टन के लैंडर विक्रम में चंद्रयान-3 का रोवरया अंतरिक्ष अन्वेषण वाहन प्रज्ञान (Pragyaan) होगा जिसका संस्कृत में अर्थ ‘’ज्ञान ( ‘wisdom’)’ होता है । प्रज्ञान 26 किलोग्राम का 6 पहियों वाला रोबोटिक वाहन है जो आधा किलोमीटर तक यात्रा कर सकता है। विक्रम के विपरीत, प्रज्ञान केवल लैंडर से संचार करने में सक्षम है। यह कार्य करने के लिए सौर ऊर्जा का उपयोग करता है।

    चंद्रयान-3 चंद्रमा पर कब उतरेगा?

    इसरो अधिकारियों के अनुसार, चंद्रयान-3 अपने प्रक्षेपण के लगभग एक महीने बाद चंद्रमा की कक्षा में पहुंचेगा और इसके लैंडर, विक्रम और रोवर, प्रज्ञान के 23 अगस्त या 24 अगस्त, 2023 को चंद्रमा पर उतरने की संभावना है। नवीनतम मिशन कमोबेश चंद्रयान-2 जैसा ही है जिसका लक्ष्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास 70 डिग्री अक्षांश पर लैंडिंग करना है । अगर सब कुछ ठीक रहा तो चंद्रयान-3 चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सॉफ्ट-लैंडिंग करने वाला दुनिया का पहला मिशन बन जाएगा। इससे  पहले, इसे प्रोपल्शन मॉड्यूल द्वारा चंद्र कक्षा में ले जाया जाएगा, जो रहेगा चंद्रमा के चारों ओर कक्षा में, संचार रिले उपग्रह के रूप में कार्य करता है।

    चंद्रयान-3 मिशन कब शुरू हुआ और कब ख़त्म होगा?

    चंद्रयान-3 मिशन 14 जुलाई, 2023 को भारत के पूर्वी तट से दूर श्रीहरिकोटा के अंतरिक्ष बंदरगाह से लॉन्च होने वाला है। मिशन की समाप्ति तिथि चंद्रमा की सतह पर रोवर की लैंडिंग और उसके बाद के संचालन की सफलता पर निर्भर करती है। यह देखते हुए कि लैंडर और रोवर को एक चंद्र दिन की अवधि के लिए संचालित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जो लगभग 14 पृथ्वी दिनों के बराबर है, मिशन सितंबर 2023 की शुरुआत में समाप्त हो सकता है।

    क्यों महत्वपूर्ण है चन्द्रमा का दक्षिणी धुव्र

    चंद्रयान-3 मिशन के माध्यम से इसरो चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव का अन्वेषण क्यों करना चाहता है?

    चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव का पता लगाने का इसरो का निर्णय इस क्षेत्र की अद्वितीय भूविज्ञान और वैज्ञानिक खोजों की क्षमता से प्रेरित है। भूमध्यरेखीय क्षेत्र के विपरीत जहां पिछले अंतरिक्ष यान उतरे हैं, दक्षिणी ध्रुव काफी हद तक अछूता है। इसके कुछ हिस्से स्थायी रूप से छाया में रहते हैं, जिससे पहली बार चंद्रमा की बर्फ का नमूना लेने की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा, चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के आसपास के बड़े गड्ढों में प्रारंभिक सौर मंडल की संरचना के बारे में सुराग हो सकते हैं।

    वैज्ञानिक चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव का अन्वेषण क्यों करना चाहते हैं?

    वैज्ञानिक विशेष रूप से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव में रुचि रखते हैं क्योंकि यह चंद्रमा के एक बिल्कुल नए क्षेत्र का अध्ययन करने का मौका प्रदान करता है। इस क्षेत्र का भूविज्ञान अमेरिकी अपोलो मिशन के दौरान अध्ययन किए गए क्षेत्रों से बहुत अलग है। इस क्षेत्र की खोज से चंद्रमा के तापीय गुणों, भूकंपीयता, गैस और प्लाज्मा वातावरण और तात्विक संरचना के बारे में जानकारी मिल सकती है। ये डेटा न केवल चंद्रमा, बल्कि व्यापक ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ को आगे बढ़ाने में सहायक साबित हो सकते हैं।

    चंद्रयान-3 –  महत्वपूर्ण तथ्य

    चंद्रयान-3 कई ‘प्रथम’ मिशनों का मिशन है। यह चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सॉफ्ट-लैंड करने वाला पहला मिशन होगा और संचार उपग्रह के रूप में प्रोपल्शन मॉड्यूल का उपयोग करने वाला पहला मिशन होगा। मिशन का लक्ष्य पिछली कमियों को दूर करना और सफल चंद्र लैंडिंग हासिल करना है, जो भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इसके साथ ही, मिशन कई वैज्ञानिक प्रयोग भी करेगा, जिसमें चंद्रमा की सतह की रासायनिक संरचना का अध्ययन करना, थर्मल गुणों को मापना और भूकंपीय अध्ययन करना शामिल है। इनमें से प्रत्येक प्रयोग चंद्रमा के बारे में हमारी समझ में योगदान देगा और भविष्य के चंद्र अभियानों के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा।

    चंद्रयान-3 मिशन और भविष्य

    चंद्रयान-3 भारत की अंतरिक्ष अन्वेषण यात्रा में एक ऐतिहासिक मिशन होगा । यह पिछली असफलताओं से उबरने और वैज्ञानिक ज्ञान और तकनीकी कौशल की खोज जारी रखने के देश के दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। यह मिशन देश की आशाओं और दुनिया की निगाहों को सामने रखता है क्योंकि यह चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की ऐतिहासिक यात्रा की तैयारी कर रहा है। चंद्रयान-3 की सफलता ब्रह्मांड की हमारी खोज में एक नए आयाम पर पहुचाने में सक्षम है |