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  • रेडिएशन को रोकने के लिय पृथ्वी और सूरज के बीच बुलबुला (Space Bubbles) बनाने की तैयारी में वैज्ञानिक

    रेडिएशन को रोकने के लिय पृथ्वी और सूरज के बीच बुलबुला (Space Bubbles) बनाने की तैयारी में वैज्ञानिक

    पृथ्वी लगातार जलवायु परिवर्तन, भयानक सूखा, तूफान, हीट वेव और ग्लेशियर की वजह से समुद्री जलस्तर बढ़ने जैसे विनाश को झेल रही है और इस विनाश को रोकने के लिए एमआईटी के वैज्ञानिकों ने सूर्य और पृथ्वी के बीच ‘स्पेस बबल्स‘ बनाने का प्रस्ताव दिया है। शोधकर्ताओं की कोशिश है कि, सूरज और पृथ्वी के बीच एक विशालकाय बुलबुले (Space Bubbles) का निर्माण किया जाए, ताकि सूरज से धरती की तरफ आने वाली भयानक रेडिएशन को धरती पर पहुंचने से रोका जा सके।

    ब्राजील के आकार का बुलबुला

    वैज्ञानिकों की इस इस जियोइंजीनियरिंग के विचार के मुताबिक, ब्राजील के आकार के एक गोलाकार बुलबुले, जिसे वैज्ञानिक भाषा में इन्फ्लेटेबल बुलबुला (Inflatable Bubbles) कहा जाता है, उसका निर्माण पृथ्वी और सूर्य के बीच किया जाएगा, ताकि रेडिएशन को हमारे ग्रह से टकराने से रोका जा सकेगा। वैज्ञानिकों की टीम ने एक प्रेस रिलीज में कहा है कि, ‘हम सूरज और पृथ्वी के बीच स्पेस बबल का निर्माण करना चाहते हैं, जिसे लिक्विड सिलिकॉन (Liquid Silicon) से बनाया जाएगा और उसे विशालकाय बुलबुला बनाकर सूरज और पृथ्वी के बीच अंतरिक्ष में स्थापित कर दिया जाएगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि, ऐसा करने से सूरज से आने वाली रेडिएशन की किरणें परावर्तित हो जाएंगी और हमें अंतरिक्ष में बड़ी बड़ी फिल्म लांच करने की भी जरूरत नहीं होगी।

    क्या जलवायु परिवर्तन से निपट पायेगा यह बुलबुला  

    वैज्ञानिकों का मानना है कि, सूरज से आने वाले रेडिएशन को इस स्पेस बुलबुले के जरिए पूरी तरह से नहीं रोका जा सकता है, हां उसे रेडिएशन को कम जरूर किया जा सकता है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है, कि ये जलवायु परिवर्तन से निपटने के मौजूदा प्रयासों को रिप्लेस कर देगा। हालांकि, शोधकर्ताओं का मानना है कि, जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जो भी मौजूदा उपाए किए जा रहे हैं, उनमें से ये सबसे ज्यादा बेहतर है।

    सूरज और पृथ्वी के बीच सिलिकॉन से छाता

    अंतरिक्ष में किया गया टेस्ट शोधकर्ताओं का कहना है कि, ये एक तरह से सूरज और पृथ्वी के बीच सिलिकॉन से छाता बनाने जैसा है, जो रेडिएशन को बहुत हद तक रोक सकेगा। वहीं, एमआईटी की सेंसेबल सिटी लैब के मुताबिक, अंतरिक्ष में पृथ्वी और सूरज के बीच बुलबुले का टेस्ट किया जा चुका है और एमआईटी के वैज्ञानिकों का मानना है कि, आने वाले दिनों में सूरज के रेडिएशन को रोकने के लिए अंतरिक्ष बुलबुलों का इस्तेमाल किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि, अंतरिक्ष में किया जाने वाला ये उपाए आने वाले दिनों में काफी सुरक्षित होंगे। वैज्ञानिकों का कहना है कि, अगर हम धरती पर टकराने से पहले 1.8 प्रतिशत सौर रेडिएशन को परावर्तित कर देते हैं, तो हम आज की ग्लोबल वार्मिंग को पूरी तरह से उलट सकते हैं।

    बुलबुलों को कभी भी किया जा सकता है खत्म

    एमआईटी वैज्ञानिकों की तरफ से जारी प्रेस रिलीज में कहा गया है कि, अंतरिक्ष में पृथ्वी और सूरज के बीच जिस बुलबुले का निर्माण किया जाएगा, उसे कभी भी नष्ट किया जा सकता है। इससे सौर जियोइंजीनियरिंग समाधान पूरी तरह से प्रतिवर्ती हो जाएगा और अंतरिक्ष मलबे को काफी कम कर देगा।’ वैज्ञानिकों ने कहा कि, पृथ्वी और सूर्य के बीच का वो क्षेत्र, जहां जेम्स वेब टेलीस्कॉप स्थिति है, वहां पर अंतरिक्ष बुलबुले को रखा जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि, सूरज से निकलने वाले रेडिएशन को परावर्तित करने के लिए वो सबसे सही स्थान है।

    जेम्स अर्ली के विचारों पर आधारित है प्रयोग

    स्पेस बबल्स रिसर्च प्रोजेक्ट वैज्ञानिक जेम्स अर्ली के विचारों पर आधारित है, जिन्होंने पहले लैग्रैंगियन पॉइंट (Lagrange Point) पर एक डिफ्लेक्टिव ऑब्जेक्ट को तैनात करने का सुझाव दिया था, और खगोलविद रोजर एंजेल, जिन्होंने बबल-बेड़ा का प्रस्ताव रखा था। हालांकि जियोइंजीनियरिंग एक साइंस फिक्शन फिल्म की तरह लगती है, लेकिन इसका इस्तेमाल वास्तविक दुनिया में किया जा रहा है। पिछले साल, संयुक्त अरब अमीरात ने 122 डिग्री फ़ारेनहाइट तक के तापमान को कम करने के लिए दुबई में बारिश बनाने के लिए जियोइंजीनियरिंग का इस्तेमाल किया था। बादल का निर्माण ड्रोन तकनीक का उपयोग करके किया गया था, जिसमें बारिश करवाने के लिए बिजली का झटका दिया गया था।

    महासागरों में जियोइंजीनियरिंग का प्रस्ताव 2021 में जारी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंजीनियरिंग एंड मेडिसिन (NASEM) की एक रिपोर्ट ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए और वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को हटाने के लिए पृथ्वी के महासागरों को जियोइंजीनियरिंग करने का प्रस्ताव दिया था। इस आइडिया के तहत छोटे प्रकाश संश्लेषक के विकास को बढ़ाने के लिए उर्वरक जोड़ना, क्षारीयता को बढ़ावा देने के लिए पानी के माध्यम से विद्युत धाराओं को पारित करना और समुद्री जल के कैमिकल साइंस को बदलना शामिल है। स्कॉट डोनी, जो वर्जीनिया विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान में प्रोफेसर हैं और इस रिपोर्ट के लेखक हैं, उन्होंने एक बयान में कहा कि, ‘महासागर कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की रणनीतियों पर पहले से ही वैज्ञानिकों, गैर-सरकारी संगठनों और द्वारा चर्चा की जा रही है। संभावित जलवायु प्रतिक्रिया रणनीतियों के रूप में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है’।

  • क्या बारिश का पानी पीया जा सकता है ?

    क्या बारिश का पानी पीया जा सकता है ?

    पानी (Water) तो पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में है, लेकिन स्वच्छ, पीने योग्य और सुरक्षित पानी (Safe and drinking Water) दुर्लभ है | दुनिया के बहुत से लोग साफ और सुरक्षित पानी से आज भी वंचित हैं. लेकिन साफ पानी हासिल करना इतना मुश्किल भी नहीं है | पानी के कई स्रोत होते हैं जिनमें महासागर, नदी, तालाब, जमीन के अंदर का पानी, बारिश का पानी (Rainwater) प्रमुख हैं | यहां हम बात करेंगे कि बारिश का पानी कितना शुद्ध होता है और क्या वह पीने योग्य होता भी है या नहीं और उसका वायु प्रदूषण से क्या संबंध है |

    बारिश – पानी का सबसे शुद्ध रूप

    बारिश के  पानी को लेकर लोगों में कई तरह की भ्रांतियां हैं, लेकिन सच यही है कि यही पानी का सबसे शुद्ध रूप होता है |  एक समय था पानी की कमी नहीं मानी जाती थी | तालाब, कुएं नदी सब जगह पर पानी उपलब्ध होता था | छोटी छोटी नदियां तक 12 महीने बहा करती थीं | बारिश के पानी में बच्चे नहाया करते थे और अपना मुंह खोल कर पानी पी लिया करते थे | उन्हें बारिश का पानी साफ है कि नहीं सोचने की जरूरत नहीं पड़ती थी |

    बोतलबंद पानी की शुरुआत

    आज हम धीरे धीरे शुद्ध पानी के नाम पर बोतलबंद पानी को ही प्राथमिकता देते हैं | बारिश आते ही हम बच्चों से कहते हैं कि बारिश में ना रहो बल्कि अंदर आ जाओ. लेकिन क्या आज किसी से कहा जा सकता है कि बोतलबंद पानी की जगह बारिश का पानी पीजिए | लेकिन इस बात के प्रमाण हैं जो दर्शाते हैं कि बोतलबंद पानी की शुरुआत बारिश के पानी से हुई थी |

    बारिश के पानी की शुद्धता

    नदियों और नहरों में अधिकांश पानी बारिश का पानी होता है | यहां तक का नलों में आने वाला पानी का मुख्य स्रोत बारिश होता है | प्राकृतिक संसार में भी चल चक्र में शीर्श पर बारिश का पानी होता है | बादलों में पानी पहुंचता है वह वाष्पीकरण की प्रक्रिया से पहुंचता है जिसके बाद बारिश के जरिए धरती पर पहुंचने तक वह शुद्ध ही रहता है |

    कैसे प्रदूषित होता है पानी

    दुनिया में धरती पर कोई पानी हो, वह बारिश के पानी से ही आया है |  जब वजह जमीन के अंदर जाता है तो मिनिरल वाटर हो जाता है क्योंकि उसमें जमीन के नीचे के खनिज घुल जाते हैं | ये पानी फिर भी तुलनात्मक रूप से पाने के लिहाज से सुरक्षित और साफ होता है | बारिश का पानी जहां जाता है उसी के अनुकूल हो जाता है | कचरे पर गिरता है तो वह प्रदूषित हो जाता है |

    सबसे शुद्ध कब होता है बारिश का पानी

    यह भी एक सच है कि पानी जितना फैलता है यानि ज्यादा जगह जाता है उसमें प्रदूषण मिलने की संभावना ज्यादा होती जाती है | और उसके बाद हमें उसके शुद्धिकरण की कीमत अदा करते हैं | इस तरह सबसे शुद्ध पानी बारिश का वह पानी होता है जो जमीन पर नहीं पहुंच हो | प्राकृतिक रूप से यही सबसे शुद्ध पानी होता है | इसलिए हमें इसे प्रदूषित होने से पहले ही हासिल करने के प्रयास करना चाहिए |

  • पृथ्वी पर आ सकता है सौर्य तूफान ! मोबाइल, रेडियो, GPS, सैटेलाइट को कर सकता है प्रभावित

    पृथ्वी पर आ सकता है सौर्य तूफान ! मोबाइल, रेडियो, GPS, सैटेलाइट को कर सकता है प्रभावित

    अंतरिक्ष मौसम भौतिक विज्ञानी डॉ. तमिथा स्कोव (Dr Tamitha Skov) के मुताबिक, सूरज से सांप के आकार जैसी एक सोलर फ्लेयर (Snake like filament) मंगलवार यानी 19 जुलाई पृथ्वी को हिट करेगी. इससे कई सैटेलाइट प्रभावित हो सकते हैं. जीपीएस, टीवी संचार और रेडियो का काम भी बाधित हो सकता है | यह एक तरह का सौर्य तूफान है जो पृथ्वी को सीधे तौर पर प्रभावित हो सकता है कि मोबाइल जैसी डिवाइस काम करना बंद कर दें |

    इस सोलर फ्लेयर (Solar flare) से इलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडिएशन और गर्मी बहुत बढ़ जाती है. हालांकि, पृथ्वी पर इससे गर्मी तो नहीं बढ़ेगी, लेकिन इलेक्ट्रो मैग्नेटिक फील्ड पर असर पड़ सकता है और सिगनल बंद हो सकते हैं |

    वैज्ञानिकों के मुताबिक, इन दिनों सूरज काफी सक्रिय रहा है. इस वजह से जियोमैग्रेटिक तूफान (Geomagnetic storms) आ रहे हैं. जिसे वैज्ञानिक भाषा में (M class) एम-क्लास और (X class) एक्स-क्लास के फ्लेयर्स बोलते हैं. यह सबसे मजबूत वर्ग की फ्लेयर्स भेज रहा है, क्योंकि इस समय सूरज एक्टिव है. जो अगले 8 सालों तक रहेगा. इस वजह से सौर तूफानों के आने की आशंका बनी रहेगी |  

    सौर तूफान लाखों किलोमीटर प्रतिघंटे की गति से आता है |

    सूरज पर बने धब्बे से कोरोनल मास इजेक्शन (Coronal Mass Ejection- CME) होता है. यानी सूर्य की सतह पर एक तरह का विस्फोट. इससे अंतरिक्ष में कई लाख किलोमीटर प्रति घंटे की गति से एक अरब टन आवेषित कण (Charged Particles) फैलते हैं. ये कण जब धरती से टकराते तब कई सैटेलाइट नेटवर्क, जीपीएस सिस्टम, सैटेलाइट टीवी और रेडियो संचार को बाधित करते हैं |

    सूरज पर धब्बे दिखाई देने का कारण

    जब सूरज के किसी हिस्से में दूसरे हिस्से की तुलना में गर्मी कम होती है, तब वहां पर धब्बे बन जाते हैं. ये दूर से छोटे-बड़े काले और भूरे रंग के धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं | एक धब्बा कुछ घंटों से लेकर कुछ हफ्तों तक रह सकता है | धब्बों अंदर के अधिक काले भाग को अम्ब्रा (Umbra) और कम काले वाले बाहरी हिस्से को पेन अम्ब्रा (Pen Umbra) कहते हैं |