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  • क्‍या पृथ्‍वी पर पानी एस्‍टरॉयड लाए? क्या है एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) ?

    क्‍या पृथ्‍वी पर पानी एस्‍टरॉयड लाए? क्या है एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) ?

    Resource

    https://iopscience.iop.org/article/10.3847/2041-8213/ac83bd

    https://www.sciencealert.com/asteroid-ryugu-reveals-ancient-grains-of-stardust-older-than-the-solar-system

    करीब 6 साल के एक जापानी अंतरिक्ष मिशन में जुटाए गए गए दुर्लभ नमूनों का विश्लेषण करने के बाद वैज्ञानिकों ने कहा है कि हमारे सौर मंडल के बाहरी किनारों से एस्‍टरॉयड्स द्वारा पानी पृथ्वी पर लाया गया हो सकता है।

    जीवन की उत्पत्ति और ब्रह्मांड के निर्माण पर रोशनी डालने के लिए रिसर्चर्स साल 2020 में एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) से पृथ्वी पर लाए गए मटेरियल की जांच कर रहे हैं।

    एक एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, 5.4 ग्राम (0.2 औंस) वजन वाली चट्टान और धूल को एक जापानी स्‍पेस प्रोब, “हायाबुसा -2′ (Hayabusa-2) ने इकट्ठा किया था। यह प्रोब उस आकाशीय पिंड पर उतरा था और उसने पिंड के सर्फेस पर एक ‘प्रभावक’ (impactor) को फायर किया था। इस मटीरियल से जुड़ी स्‍टडी प्रकाशित होने लगी हैं।

    एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) क्या है ?

    यह सी-प्रकार के क्षुद्रग्रह 162173 रयुगु का रंगीन दृश्य है, जिसे हायाबुसा 2 के बोर्ड पर ओएनसी-टी कैमरे द्वारा देखा गया है।

    संयुक्त राज्य अमेरिका में सोकोरो, न्यू मैक्सिको के पास लिंकन लैब के ईटीएस (Lincoln Lab’s ETS ) में लिंकन नियर-अर्थ क्षुद्रग्रह अनुसंधान (Lincoln Near-Earth Asteroid Research) के साथ खगोलविदों द्वारा 10 मई 1999 को रयुगु की खोज की गई थी। इसे अनंतिम पदनाम 1999 JU3 दिया गया था | इसका व्यास लगभग 1 किलोमीटर (0.62 मील) है और यह दुर्लभ वर्णक्रमीय प्रकार Cb (rare spectral type Cb) की एक काली वस्तु है, जिसमें C-प्रकार के क्षुद्रग्रह (C-type asteroid) और B-प्रकार के क्षुद्रग्रह ((B-type asteroid)) दोनों के गुण हैं।

    28 सितंबर 2015 को माइनर प्लैनेट सेंटर (Minor Planet Center ) द्वारा आधिकारिक तौर पर क्षुद्रग्रह का नाम “रयुगु” रखा गया था।

    यह नाम रियोगो-जो (ड्रैगन पैलेस) (Ryūgū-jō (Dragon Palace) को संदर्भित करता है, जो की एक जापानी लोककथा में एक जादुई महल होता है जो पानी के नीचे स्थित होता है | इस लोक कथा में, मछुआरा उरशिमा तारो (Urashima Tarō ) एक कछुए की पीठ पर इस जादुई महल की यात्रा करता है, और जब वह वापस उस महल से लौटता है, तो अपने साथ एक रहस्यमय बॉक्स लेकर आता है, जैसे हायाबुसा 2 इस एस्‍टरॉयड के नमूनों के साथ वापस पृथ्वी पर आया था |

    हायाबुसा-2 अंतरिक्ष यान जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (Japan Aerospace Exploration Agency (JAXA) द्वारा दिसंबर 2014 में लॉन्च किया गया था और 27 जून 2018 को यह सफलतापूर्वक क्षुद्रग्रह (asteroid) पर पहुंचा। 6 दिसंबर 2020 को एक कैप्सूल एस्‍टरॉयड के samples के साथ ऑस्ट्रेलिया में लैंड हुआ ।

    एस्‍टरॉयड रयुगु से क्या पाया वैज्ञानिकों ने ?

    इस साल जून में रिसर्चर्स के एक समूह ने कहा था कि उन्हें कार्बनिक पदार्थ मिला है, जिससे पता चलता है कि पृथ्वी पर जीवन के कुछ बिल्डिंग ब्‍लॉक्‍स, अमीनो एसिड अंतरिक्ष में बने हो सकते हैं।

    नेचर एस्ट्रोनॉमी जर्नल में प्रकाशित एक नए पेपर में वैज्ञानिकों ने कहा है कि एस्‍टरॉयड ‘रयुगु’ (Ryugu) के सैंपल इस बात पर रोशनी डाल सकते हैं कि अरबों साल पहले पृथ्वी पर महासागर कैसे बने। जापान और अन्य देशों के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस अध्ययन में कहा गया है कि वाष्पशील और ऑर्गनिक रिच C-टाइप के एस्‍टरॉयड, पृथ्वी के पानी के प्रमुख सोर्सेज में से एक हो सकते हैं। उनके मुताबिक पृथ्वी पर वाष्पशील पदार्थ (ऑर्गेनिक्स और पानी) का होना अभी भी बहस का विषय है। खास बात यह है कि स्‍टडी में पहचाने गए रयुगु एस्‍टरॉयड के पार्टिकल्‍स में पाए जाने वाले कार्बनिक पदार्थ संभवत: वाष्पशील पदार्थ के एक अहम सोर्स हो सकते हैं। 

    हायाबुसा-2 को साल 2014 में लगभग 300 मिलियन किलोमीटर दूर ‘रयुगु’ एस्‍टरॉयड की ओर लॉन्‍च किया गया था। दो साल पहले ही यह पृथ्वी की कक्षा में लौटा था। नेचर एस्ट्रोनॉमी में पब्लिश हुई स्‍टडी में रिसर्चर्स ने मिशन द्वारा प्कीराप्त की गई खोजों को महत्वपुर्ण बताया है ।

  • क्या पृथ्वी पर बढ़ रही है एक दिन की लंबाई ? कारण और परिणाम

    क्या पृथ्वी पर बढ़ रही है एक दिन की लंबाई ? कारण और परिणाम

    पृथ्वी (Earth) पर दिन रहस्यमयी तरीके से लंबा हो रहा है यानी धरती के दिन का समय बढ़ रहा है और वैज्ञानिकों को यह रहस्यमय लग रहा है क्योकीं वैज्ञानिक इसके पीछे जुड़े कारण पर अभी तक नही पहुच पा रहे है |

    दुनिया भर के एटॉमिक क्लॉक्स ने गणना करके यह बताया है कि पृथ्वी के दिन का समय रहस्यमयी तरीके से बढ़ रहा है इससे न सिर्फ हमारे समय की कैलकुलेशन पर असर पड़ेगा, बल्कि जीपीएस, नेविगेशन और संचार संबंधी कई अन्य तकनीकों में भी समस्या आएगी |

    धरती के दिन की गणना उसकी धुरी पर लगने वाले चक्कर से होती आई है लेकिन धरती के अपनी धुरी पर घूमने की गति लगातार बढ़ रही है | पिछले कुछ दशकों से हमारे दिन की लंबाई छोटी हो रही थी | जून 2022 में सबसे छोटे दिन का रिकॉर्ड भी दर्ज किया गया यानी पिछली आधी सदी में यह सबसे छोटा दिन था लेकिन साल 2020 के बाद और इस रिकॉर्ड के गठन के बाद अब धरती ने गति धीमी हो रही है और दिन लंबे हो रहे हैं जिसकी वजह वैज्ञानिकों को पता नहीं है |

    सामान्य फोन या घड़ी में तो 24 घंटे का सटीक समय दिखा रहे है लेकिन पृथ्वी के 24 घंटे में लगने वाला चक्कर अब कुछ समय ज्यादा ले रहा है | आमतौर पर यह बदलाव करोड़ों सालों में होता है | हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे की वजह धरती पर आने वाले भूकंप (Earthquake) और तूफान (Storm) भी हो सकते हैं |

    पिछले कई करोड़ वर्षों से धरती के घूमने की गति धीमी हो रही है और इसके पीछे चंद्रमा से निकलने वाले टाइड्स का घर्षण है | हर एक सदी में 2.3 मिलिसेकेंड धरती के दिन के समय में जुड़ रहा है |

    कुछ करोड़ साल पहले धरती का दिन सिर्फ 19 घंटे का होता था लेकिन पिछले 20 हजार सालों से दूसरी प्रक्रिया शुरू हो गई जो कि विपरीत दिशा में है इस वजह से धरती की गति बढ़ने लगी | यह प्रक्रिया तब शुरू हुई जब जब Ice Age  में ध्रुवीय बर्फ के पिघलने से सरफेस प्रेशर कम हो रहा था और धरती का मैंटल धीरे-धीरे ध्रुवों की तरफ खिसक रहा था |

    इसे एक उदाहरण से समझते है जैसे कोई बैले डांसर अपने घूमने की गति बढ़ाने के लिए अपने हाथों को अपने शरीर के करीब रख लेती है ताकि वह अपनी धुरी यानी पैर पर तेजी से गोल घूम सके | इसी तरह हमारी पृथ्वी के घूमने की गति तब बढ़ जाती है, जब उसका मैंटल धुरी के नजदीक पहुंचता है इसकी वजह से धरती का हर दिन 0.6 मिलिसेकेंड्स कम हो जाता है| धरती के एक दिन में 86,400 सेकेंड्स होते हैं |

    पिछले कई दशकों से धरती की आंतरिक संरचना और सतह के बीच एक संबंध बना हुआ है | अगर बड़े भूकंप आते हैं तो ये धरती के दिन की लंबाई को बदल देते हैं  भले ही अंतर कम समय का हो | जैसे साल 2011 में जापान में आए 8.9 तीव्रता के भूकंप ने धरती की घूमने की गति को 1.8 मिलिसेकेंड बढ़ा दिया था | इसके अलावा कई ऐसी छोटी घटनाएं होती रहती हैं, जो धरती के दिन के समय को बदलते हैं. जैसे- जलवायु परिवर्तन, मौसमों में बदलाव आदि | ये धरती के घूमने की गति को हर दिशा से प्रभावित करती हैं |

    हर 15 दिन पर या महीने में टाइडल साइकिल (fortnightly and monthly tidal cycles) यानी लहरों की गति भारी मात्रा में ग्रह के चारों तरफ मूवमेंट करती हैं | इनकी वजह से भी पृथ्वी के दिन का समय कम या ज्यादा होता है | समुद्र की लहरों की वजह से होने वाला बदलाव आमतौर पर 18.6 वर्षों में एक बार होता है | वायुमंडल के मूवमेंट का सबसे ज्यादा असर धरती की गति पर पड़ता है | इसके अलावा बर्फबारी, बारिश, जमीन से पानी निकालना ये चीजें भी धरती की गति पर असर डालती हैं |

    पृथ्वी अचानक धीमी क्यों हो रही है?

    वर्ष 1960 से अब तक धरती पर मौजूद रेडियो टेलिस्कोप्स ग्रहों के चारों तरफ मौजूद क्वासार (Quasars) और अन्य अंतरिक्षीय वस्तुओं की गणना से धरती के घूमने की गति का पता लगाते आ रहे हैं | इन रेडियो टेलिस्कोप और एटॉमिक घड़ी के आंकड़ों से पता चला है कि पिछले कुछ सालों से धरती के दिन का समय कुछ कम हो रहा था | लेकिन रोटेशन में इतना बदलाव आता है कि वैज्ञानिक कई बार धोखा खा जाते हैं |

    29 जून 2022 को सबसे छोटा दिन होने के बावजूद साल 2020 के बाद धरती के घूमने की ट्रैजेक्टरी (trajectory) में समय बढ़ा है | यह बदलाव पिछले 50 सालों में कभी नहीं देखा गया था | अभी तक इस बदलाव की सही और सटीक वजह पता नहीं चल पाई है | ये बदलाव मौसम के परिवर्तन की वजह से हो सकते है या फिर ला नीना इवेंट्स (La Niña events की वजह से | बर्फ के लगातार पिघलने की वजह से यह प्रक्रिया और बढ़ सकती है |

    वर्तमान समय के बदलाव को लेकर पहले चैंडलर वॉबल (Chandler Wobble) को वजह बताया जा रहा था | यह हर 430 दिन में होता था | लेकिन रेडियो टेलिस्कोप की जांच से पता चला कि चैंडलर वॉबल खत्म हो चुका है | एक आखिरी संभावना ये बनती है कि धरती के अंदर या बाहर कुछ बेहद खास बदलाव न हुआ हो, जो समझ में नहीं आ रहा है | लंबे समय के टाइडल इफेक्ट की वजह से भी पृथ्वी में यह परिवर्तन हो सकता है |

    क्या हमे नेगेटिव लीप सेकंड की जरूरत है ?

    धरती के घूमने की दर (Earth’s rotation rate) की वजह से कई तरह के आधुनिक एप्लीकेशन काम करते हैं. जैसे- जीपीएस, नेविगेशन सिस्टम | यदि धरती का घूमना बदलता है तो इनकी प्रणाली में दिक्कत आना शुरु हो जाएगी | हर कुछ साल पर समय की जानकारी रखने वालों को लीप सेकेंड जोड़ना पड़ेगा ताकि वो धरती की गति के साथ सामंजस्य बिठा सकें |  इस तरह अगर धरती और लंबे दिनों की ओर बढ़ेगी तो हमें निगेटिव लीड सेकेंड जोड़ना पड़ सकता है |

    निगेटिव लीप सेकेंड को अपने समय के साथ जोड़ने को वैज्ञानिक सही नहीं मानते हैं | अगर ऐसा करना पड़ेगा तो पूरी दुनिया के जीपीएस, नेविगेशन सिस्टम को अपना समय एडजस्ट करना होगा |

  • क्‍या हैं एस्‍टरॉयड (उल्कापिंड या क्षुद्रग्रह)?  क्या एस्‍टरॉयड से हो सकती है दुनिया ख़त्म?

    क्‍या हैं एस्‍टरॉयड (उल्कापिंड या क्षुद्रग्रह)?  क्या एस्‍टरॉयड से हो सकती है दुनिया ख़त्म?

    एस्‍टरॉयड (Asteroid) लगातार पृथ्वी के नजदीक से गुजरते रहते है और पृथ्वी लगातार इन एस्‍टरॉयड (Asteroid) का सामना करती रहती है।

    29 और 30 जुलाई को लगातार दो एस्‍टरॉयड पृथ्‍वी के करीब से गुजरे, जिनका साइज म‍ल्‍टीस्‍टोरी बिल्डिंग जितना था। इसके अलावा 4 अगस्त को एक और एस्‍टरॉयड पृथ्‍वी के नजदीक से होकर गया। इसमें एक हजार परमाणु बमों जितनी ताकत थी।

    जब भी कोई एस्‍टरॉयड पृथ्‍वी के करीब से गुजरता है, तो दुनियाभर की स्‍पेस एजेंसियां उसे मॉनिटर करती हैं, क्‍योंकि अंतरिक्ष में तैरती ये चट्टानें पृथ्‍वी को भारी नुकसान पहुंचा सकती हैं, आखिर डायनासोर भी तो एस्‍टरॉयड के पृथ्‍वी पर टकराने से ही खत्‍म हुए थे।

    क्‍या होते हैं एस्‍टरॉयड (Asteroids) ?

    एस्टेरॉयड (Asteroids) को हिन्दी में उल्कापिंड या क्षुद्रग्रह भी कहते हैं। इसे मीटीऑराइट ( meteorite ) भी कहते हैं। एस्टेरॉयड को किसी ग्रह या तारे का टूटा हुआ टुकड़ा माना जाता है। ये पत्थर या धातु के टूकड़े होते हैं जो एक छोटे पत्थर से लेकर एक मील बड़ी चट्टान तक और कभी-कभी तो एवरेस्ट के बराबर तक हो सकते हैं। आकाश में कभी-कभी एक ओर से दूसरी ओर अत्यंत वेग से जाते हुए अथवा पृथ्वी पर गिरते हुए जो पिंड दिखाई देते हैं उन्हें उल्का और साधारण बोलचाल में टूटते हुए तारे‘ अथवा ‘लूका‘ कहते हैं।

    नासा के अनुसार, इन्‍हें लघु ग्रह भी कहा जाता है। जैसे हमारे सौर मंडल के सभी ग्रह सूर्य का चक्‍कर लगाते हैं, उसी तरह एस्‍टरॉयड भी सूर्य की परिक्रमा करते हैं। लगभग 4.6 अरब साल पहले हमारे सौर मंडल के शुरुआती गठन से बचे हुए चट्टानी अवशेष एस्‍टरॉयड हैं । वैज्ञानिक अभी तक 11 लाख 13 हजार 527 एस्‍टरॉयड का पता लगा चुके हैं।  हमारे सौर मंडल में करीब 20 लाख एस्ट्रेरॉयड घूम रहे हैं। NASA के पास पृथ्वी के आसपास 140 मीटर या उससे बड़े करीब 90 प्रतिशत एस्टेरॉयड को ट्रैक की क्षमता है।

    अतीत में इन उल्कापिंडों से कई बार जीवन लगभग समाप्त हो चुका है। एक बार फिर मंडरा रहा है डायनासोर के जमाने का खतरा। अंतरिक्ष में भटक रहा सबसे बड़ा उल्का पिंड ‘2005 वाय-यू 55’ है लेकिन फिलहाल खतरा एस्टेरॉयड एपोफिस से है।

    इस तरह का सबसे पिछला प्रलयंकारी पिंड साढ़े छह करोड़ साल पहले टकराया था। उसने न जाने कितने जीव-जंतुओं की प्रजातियों का पृथ्वी पर से अंत कर दिया। डायनासॉर इस टक्कर से लुप्त होने वाली सबसे प्रसिद्ध प्रजाति हैं। समस्या यह है कि हम नहीं जानते कि कब फिर ऐसा ही हो सकता है।’ वह लघु ग्रह सेनफ्रांसिस्को की खाड़ी जितना बड़ा था और आज के मेक्सिको में गिरा था। इस टक्कर से जो विस्फोट हुआ, वह दस करोड़ मेगाटन टीएनटी के बराबर था। पृथ्वी पर वर्षों तक अंधेरा छाया रहा।

    1994 में एक ऐसी ही घटना घटी थी। पृथ्वी के बराबर के 10-12 उल्का पिंड बृहस्पति ग्रह से टकरा गए थे जहां का नजारा महाप्रलय से कम नहीं था। आज तक उस ग्रह पर उनकी आग और तबाही शांत नहीं हुई है।

    वैज्ञानिक मानते हैं कि यदि बृहस्पति ग्रह के साथ जो हुआ वह भविष्य में कभी पृथ्वी के साथ हुआ तो तबाही तय हैं, लेकिन यह सिर्फ आशंका है। आज वैज्ञानिकों के पास इतने तकनीकी साधन हैं कि इस तरह की किसी भी उल्का पिंड की मिसाइल द्वारा दिशा बदल दी जाएगी। इसके बावजूद फिर भी जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग तबाही का एक कारण बने हुए हैं।

    मंगल और बृहस्‍पति के बीच घूमते हैं ज्‍यादातर एस्‍टरॉयड

    ज्‍यादातर एस्‍टरॉयड एक मुख्‍य एस्‍टरॉयड बेल्‍ट में पाए जाते हैं, जो मंगल और बृहस्‍पति ग्रह के बीच है। इनका साइज 10 मीटर से 530 किलोमीटर तक हो सकता है। अबतक खोजे गए सभी एस्‍टरॉयड का कुल द्रव्‍यमान पृथ्‍वी के चंद्रमा से कम है।

    ज्‍यादातर एस्‍टरॉयड का आकार अनियमित होता है। कुछ लगभग गोलाकार होते हैं, तो कई अंडाकार दिखाई देते हैं। कुछ एस्‍टरॉयड तो ऐसे भी हैं, जिनका अपना चंद्रमा है। कई के दो चंद्रमा भी हैं। वैज्ञानिकों ने डबल और ट्रिपल एस्‍टरॉयड सिस्‍टम की खोज भी की है, जिनमें ये चट्टानों एक-दूसरे के चारों ओर घूमती रहती हैं। 

    एस्‍टरॉयड को तीन वर्गों- सी, एस और एम टाइप में बांटा गया है। सीटाइप (चोंड्राइट Chondrite) एस्‍टरॉयड सबसे आम हैं। ये संभवतः मिट्टी और सिलिकेट चट्टानों से बने होते हैं और दिखने में गहरे रंग के होते हैं। ये सौर मंडल की सबसे पुरानी चीजों में एक हैं। एसटाइप के एस्टरॉयड सिलिकेट मटेरियल और निकललौह से बने होते हैं। वहीं M-Type (एम टाइप) एस्टरॉयड मैटलिक (निकललौह) हैं। इनकी संरचना सूर्य से दूरी पर निर्भर करती है। 

    आज वैज्ञानिकों के पास इतने तकनीकी साधन हैं कि इस तरह की किसी भी उल्का पिंड की मिसाइल द्वारा दिशा बदल दी जाएगी। इसके बावजूद फिर भी जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग तबाही का एक कारण बने हुए हैं |

  • नासा ने खोजी 4 गुना बड़ी ‘पृथ्‍वी’, क्‍या इस ग्रह पर संभव हो पायेगा इंसानी जीवन ?

    नासा ने खोजी 4 गुना बड़ी ‘पृथ्‍वी’, क्‍या इस ग्रह पर संभव हो पायेगा इंसानी जीवन ?

    अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) ने एक नया पृथ्वी जैसा ग्रह खोजा है। यह काफी दूर हमारी आकाशगंगा के बाहरी इलाके में है। ‘रॉस 508 बी’ (ROSS 508 b) नाम के इस नए सुपर अर्थ (Super Earth) ने खगोलविदों की उम्मीदें बढ़ा दी हैं, क्‍योंकि यह अपने लाल बौने तारे के रहने योग्‍य जोन में स्थित है। पृथ्‍वी जैसे इस ग्रह की खोज में सुबारू टेलीस्कोप (Subaru Telescope) ने भूमिका निभाई जिस पर इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोग्राफ का इस्‍तेमाल करते हुए ग्रह को खोजा गया। 

    पृथ्‍वी से बाहर जीवन की मौजूदगी की बात आती है, तो एक्‍सोप्‍लैनेट (Exoplanets) सबसे बड़े संभावित उम्‍मीदवारों के रूप में नजर आते हैं । ऐसे ग्रह जो सूर्य के अलावा अन्य तारों की परिक्रमा करते हैं, एक्सोप्लैनेट कहलाते हैं। वैज्ञानिकों ने ऐसे कई एक्‍सोप्‍लैनेट को अब तक खोजा है, जो पृथ्‍वी की तरह ही चट्टानी हैं। हालांकि विस्‍तृत शोध में वहां जीवन की संभावनाएं नजर नहीं आईं, क्‍योंकि कई ग्रहों का तापमान बहुत अधिक है।

    रॉस 508 बी‘ (ROSS 508 b) को पृथ्‍वी से भी बड़ी संभावित चट्टानी दुनिया माना जा रहा है, लेकिन यह अपने रहने योग्‍य जोन से मूव कर रहा है। इसके बावजूद उम्‍मीदें बरकरार हैं, क्‍योंकि यह ग्रह अपनी सतह पर पानी को बनाए रखता है, जिससे जीवन की संभावना को बल मिलता है। नासा ने बताया है कि ‘रॉस 508 बी (ROSS 508 b)‘ एक सुपर अर्थ एक्सोप्लैनेट है। यह M-टाइप तारे की परिक्रमा करता है, जो पृथ्वी से लगभग 37 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है। इस ग्रह का द्रव्यमान 4 पृथ्‍वी के बराबर है और ग्रह को अपने तारे की एक परिक्रमा करने में 10.8 दिन लगते हैं।

    कैसे खोजते है ऐसे ग्रहों को वैज्ञानिक

    सवाल उठता है कि आखिर वैज्ञानिक उन ग्रहों को कैसे ढूंढते हैं, जो रहने लायक हो सकते हैं। इसका जवाब हैं गोल्डीलॉक्स जोन (Goldilocks Zone) या वासयोग्य क्षेत्र (Habitable Zone) ।

    ये ऐसे जोन होते हैं जिनसे होकर गुजरने वाले ग्रहों में जीवन की संभावना हो सकती है। नासा ने कहा है कि यह ऐसा ग्रह है, जो अपनी सतह पर पानी बनाए रखने में सक्षम हो सकता है और भविष्य में M क्‍लास वाले बौने तारों के आसपास जीवन की संभावना का अध्ययन करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।

    हाल में एक अध्ययन से पता चला है कि विभिन्‍न परिस्थितियों में भी कई अरबों वर्षों तक लिक्विड वॉटर, एक्सोप्लैनेट की सतह पर मौजूद रह सकता है। पृथ्वी की तरह जीवन दे सकने वाले एक्सोप्लैनेट की खोज में लिक्विड वॉटर यानी पानी की भूमिका महत्‍वपूर्ण है। बर्न यूनिवर्सिटी, ज्यूरिख यूनिवर्सिटी और नेशनल सेंटर ऑफ कॉम्पीटेंस इन रिसर्च (NCCR) के रिसर्चर्स ने समझाया है कि रहने योग्य एक्सोप्लैनेट की खोज के लिए इस दृष्टिकोण की बेहद जरूरत है।

  • रेडिएशन को रोकने के लिय पृथ्वी और सूरज के बीच बुलबुला (Space Bubbles) बनाने की तैयारी में वैज्ञानिक

    रेडिएशन को रोकने के लिय पृथ्वी और सूरज के बीच बुलबुला (Space Bubbles) बनाने की तैयारी में वैज्ञानिक

    पृथ्वी लगातार जलवायु परिवर्तन, भयानक सूखा, तूफान, हीट वेव और ग्लेशियर की वजह से समुद्री जलस्तर बढ़ने जैसे विनाश को झेल रही है और इस विनाश को रोकने के लिए एमआईटी के वैज्ञानिकों ने सूर्य और पृथ्वी के बीच ‘स्पेस बबल्स‘ बनाने का प्रस्ताव दिया है। शोधकर्ताओं की कोशिश है कि, सूरज और पृथ्वी के बीच एक विशालकाय बुलबुले (Space Bubbles) का निर्माण किया जाए, ताकि सूरज से धरती की तरफ आने वाली भयानक रेडिएशन को धरती पर पहुंचने से रोका जा सके।

    ब्राजील के आकार का बुलबुला

    वैज्ञानिकों की इस इस जियोइंजीनियरिंग के विचार के मुताबिक, ब्राजील के आकार के एक गोलाकार बुलबुले, जिसे वैज्ञानिक भाषा में इन्फ्लेटेबल बुलबुला (Inflatable Bubbles) कहा जाता है, उसका निर्माण पृथ्वी और सूर्य के बीच किया जाएगा, ताकि रेडिएशन को हमारे ग्रह से टकराने से रोका जा सकेगा। वैज्ञानिकों की टीम ने एक प्रेस रिलीज में कहा है कि, ‘हम सूरज और पृथ्वी के बीच स्पेस बबल का निर्माण करना चाहते हैं, जिसे लिक्विड सिलिकॉन (Liquid Silicon) से बनाया जाएगा और उसे विशालकाय बुलबुला बनाकर सूरज और पृथ्वी के बीच अंतरिक्ष में स्थापित कर दिया जाएगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि, ऐसा करने से सूरज से आने वाली रेडिएशन की किरणें परावर्तित हो जाएंगी और हमें अंतरिक्ष में बड़ी बड़ी फिल्म लांच करने की भी जरूरत नहीं होगी।

    क्या जलवायु परिवर्तन से निपट पायेगा यह बुलबुला  

    वैज्ञानिकों का मानना है कि, सूरज से आने वाले रेडिएशन को इस स्पेस बुलबुले के जरिए पूरी तरह से नहीं रोका जा सकता है, हां उसे रेडिएशन को कम जरूर किया जा सकता है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है, कि ये जलवायु परिवर्तन से निपटने के मौजूदा प्रयासों को रिप्लेस कर देगा। हालांकि, शोधकर्ताओं का मानना है कि, जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जो भी मौजूदा उपाए किए जा रहे हैं, उनमें से ये सबसे ज्यादा बेहतर है।

    सूरज और पृथ्वी के बीच सिलिकॉन से छाता

    अंतरिक्ष में किया गया टेस्ट शोधकर्ताओं का कहना है कि, ये एक तरह से सूरज और पृथ्वी के बीच सिलिकॉन से छाता बनाने जैसा है, जो रेडिएशन को बहुत हद तक रोक सकेगा। वहीं, एमआईटी की सेंसेबल सिटी लैब के मुताबिक, अंतरिक्ष में पृथ्वी और सूरज के बीच बुलबुले का टेस्ट किया जा चुका है और एमआईटी के वैज्ञानिकों का मानना है कि, आने वाले दिनों में सूरज के रेडिएशन को रोकने के लिए अंतरिक्ष बुलबुलों का इस्तेमाल किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि, अंतरिक्ष में किया जाने वाला ये उपाए आने वाले दिनों में काफी सुरक्षित होंगे। वैज्ञानिकों का कहना है कि, अगर हम धरती पर टकराने से पहले 1.8 प्रतिशत सौर रेडिएशन को परावर्तित कर देते हैं, तो हम आज की ग्लोबल वार्मिंग को पूरी तरह से उलट सकते हैं।

    बुलबुलों को कभी भी किया जा सकता है खत्म

    एमआईटी वैज्ञानिकों की तरफ से जारी प्रेस रिलीज में कहा गया है कि, अंतरिक्ष में पृथ्वी और सूरज के बीच जिस बुलबुले का निर्माण किया जाएगा, उसे कभी भी नष्ट किया जा सकता है। इससे सौर जियोइंजीनियरिंग समाधान पूरी तरह से प्रतिवर्ती हो जाएगा और अंतरिक्ष मलबे को काफी कम कर देगा।’ वैज्ञानिकों ने कहा कि, पृथ्वी और सूर्य के बीच का वो क्षेत्र, जहां जेम्स वेब टेलीस्कॉप स्थिति है, वहां पर अंतरिक्ष बुलबुले को रखा जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि, सूरज से निकलने वाले रेडिएशन को परावर्तित करने के लिए वो सबसे सही स्थान है।

    जेम्स अर्ली के विचारों पर आधारित है प्रयोग

    स्पेस बबल्स रिसर्च प्रोजेक्ट वैज्ञानिक जेम्स अर्ली के विचारों पर आधारित है, जिन्होंने पहले लैग्रैंगियन पॉइंट (Lagrange Point) पर एक डिफ्लेक्टिव ऑब्जेक्ट को तैनात करने का सुझाव दिया था, और खगोलविद रोजर एंजेल, जिन्होंने बबल-बेड़ा का प्रस्ताव रखा था। हालांकि जियोइंजीनियरिंग एक साइंस फिक्शन फिल्म की तरह लगती है, लेकिन इसका इस्तेमाल वास्तविक दुनिया में किया जा रहा है। पिछले साल, संयुक्त अरब अमीरात ने 122 डिग्री फ़ारेनहाइट तक के तापमान को कम करने के लिए दुबई में बारिश बनाने के लिए जियोइंजीनियरिंग का इस्तेमाल किया था। बादल का निर्माण ड्रोन तकनीक का उपयोग करके किया गया था, जिसमें बारिश करवाने के लिए बिजली का झटका दिया गया था।

    महासागरों में जियोइंजीनियरिंग का प्रस्ताव 2021 में जारी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंजीनियरिंग एंड मेडिसिन (NASEM) की एक रिपोर्ट ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए और वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को हटाने के लिए पृथ्वी के महासागरों को जियोइंजीनियरिंग करने का प्रस्ताव दिया था। इस आइडिया के तहत छोटे प्रकाश संश्लेषक के विकास को बढ़ाने के लिए उर्वरक जोड़ना, क्षारीयता को बढ़ावा देने के लिए पानी के माध्यम से विद्युत धाराओं को पारित करना और समुद्री जल के कैमिकल साइंस को बदलना शामिल है। स्कॉट डोनी, जो वर्जीनिया विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान में प्रोफेसर हैं और इस रिपोर्ट के लेखक हैं, उन्होंने एक बयान में कहा कि, ‘महासागर कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की रणनीतियों पर पहले से ही वैज्ञानिकों, गैर-सरकारी संगठनों और द्वारा चर्चा की जा रही है। संभावित जलवायु प्रतिक्रिया रणनीतियों के रूप में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है’।

  • क्या है पृथ्‍वी के अंदर मौजूद ‘रहस्यमयी’ ब्लाब (Blob) – माउंट एवरेस्ट से 100 गुना लंबी चट्टानी परत

    क्या है पृथ्‍वी के अंदर मौजूद ‘रहस्यमयी’ ब्लाब (Blob) – माउंट एवरेस्ट से 100 गुना लंबी चट्टानी परत

    Nature Communications and research में प्रकाशित हुई रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिकों ने पृथ्‍वी के अंदर मौजूद ‘रहस्यमयी’ ब्लाब (Blob) की इमेज बनाकर उसे समझने की कोशिश की है। ब्लाब, हमारी पृथ्वी के क्रस्‍ट और उसके कोर के बीच चट्टान की गर्म मोटी परत है। ठोस होने के बावजूद यह धीरे-धीरे बहती रहती है। वैज्ञानिकों ने कहा है कि से इमेजेस भूकंप विज्ञान (Seismology) में ‘मील का पत्थर’ साबित हो सकती हैं।

    हमारे ब्रह्मांड में कई ऐसे रहस्‍य हैं, जिनकी तह तक जाने के लिए वैज्ञानिक दिन-रात जुटे हुए हैं। रहस्‍यों से घिरी तो हमारी पृथ्‍वी भी है। वैज्ञानिकों ने इसके अंदर मौजूद ‘रहस्यमयी’ ब्लाब की इमेज बनाकर उसे समझने की कोशिश की है। ब्लाब, हमारी पृथ्वी के क्रस्‍ट और उसके कोर के बीच चट्टान की गर्म मोटी परत है। ठोस होने के बावजूद यह धीरे-धीरे बहती रहती है। बताया जाता है कि ये ब्‍लाब, माउंट एवरेस्ट से 100 गुना लंबे हैं रिसर्चर्स की एक टीम मानती है कि यह सब थिया (Theia) के अवशेष हैं थिया एक एक प्रोटोप्लैनेट था, जो पृथ्‍वी से टकराया था

    वैज्ञानिक आमतौर पर मानते हैं कि ये ब्‍लाब, टेक्टोनिक प्लेटों के मूवमेंट से जुड़े हैं, लेकिन इनमें बदलाव ने वैज्ञानिकों को हैरान किया है। वैज्ञानिकों ने इन्‍हें ‘आकर्षक और जटिल’ कहा है। बताया है कि वह उनके बारे में और ज्‍यादा समझने की कोशिश कर रहे हैं। ये इमेजेस नेचर कम्युनिकेशंस में पब्लिश एक स्‍टडी का हिस्सा हैं। इस स्‍टडी में सर्कुलर अंडरग्राउंड पॉकेट पर फोकस किया गया है, जिसे हवाई के नीचे मौजूद अल्ट्रा-लो वेग जोन कहा जाता है। अब वैज्ञानिकों ने कहा है कि से इमेजेस भूकंप विज्ञान में ‘मील का पत्थर’ साबित हो सकती हैं।

    मिरर यूके की रिपोर्ट के अनुसार, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के जियोफ‍िजिसिस्‍ट, ज़ी ली ने कहा कि पृथ्वी के सभी डीप इंटीरियर फीचर्स में ये सबसे आकर्षक और जटिल हैं। हमें पृथ्‍वी की आंतरिक संरचना दिखाने के लिए पहला ठोस सबूत मिल गया है, जो भूकंप विज्ञान के लिए मील का पत्थर है। इन इमेजेस को बेहतर बनाने के लिए वैज्ञानिक लंबे वक्‍त से कोशिश कर रहे थे। उन्‍होंने कई इंस्‍ट्रूमेंट्स इस्‍तेमाल किए, लेकिन इमेजेस बेहतर नहीं बनीं। पृथ्वी की सतह से दूरी ने इसे चुनौतीपूर्ण काम बना दिया था।

    लेकिन इस बार इमेजेस को कंप्यूटर मॉडलिंग द्वारा तैयार किया गया है। इसके लिए डेटा को पृथ्वी की लेयर्स के जरिए भेजे गए सिग्‍नल्‍स से लिया गया है। इन सिग्‍नल रेस्‍पॉन्‍स के जरिए वैज्ञानिक यह समझ पाए हैं कि यह ब्लाब लगभग एक किलोमीटर साइज का है। इस महीने की शुरुआत में एक और स्‍टडी ने यह अनुमान लगाया था कि पृथ्‍वी के केंद्र के महाद्वीपों के साइज के कुछ बड़े ब्‍लाब हैं।

    बताया जाता है कि ये ब्‍लाब, माउंट एवरेस्ट से 100 गुना लंबे हैं और वैज्ञानिकों को इस बारे में बहुत कम जानकारी है कि वे वहां क्यों मौजूद हैं। रिसर्चर्स की एक टीम अब यह मानती है कि यह सब थिया (Theia) के अवशेष हैं। थिया एक एक प्रोटोप्लैनेट था, जो 4.5 मिलियन साल पहले पृथ्वी से टकराया था। इसी की वजह से चंद्रमा का निर्माण हुआ था। रिपोर्ट के अनुसार, ये ब्‍लाब पश्चिमी अफ्रीका और प्रशांत महासागर के नीचे स्थित हैं और कई दशकों से भूकंप विज्ञानियों को भ्रमित कर रही हैं।

    कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी की स्‍टडी में भाग लेने वाले वैज्ञानिकों में से एक सुजॉय मुखोपाध्याय ने कहा कि अगर यह चीजें वाकई में पुरानी हैं, तो यह हमें बताती हैं कि हमारे ग्रह का निर्माण कैसे हुआ।

  • पृथ्वी पर आ सकता है सौर्य तूफान ! मोबाइल, रेडियो, GPS, सैटेलाइट को कर सकता है प्रभावित

    पृथ्वी पर आ सकता है सौर्य तूफान ! मोबाइल, रेडियो, GPS, सैटेलाइट को कर सकता है प्रभावित

    अंतरिक्ष मौसम भौतिक विज्ञानी डॉ. तमिथा स्कोव (Dr Tamitha Skov) के मुताबिक, सूरज से सांप के आकार जैसी एक सोलर फ्लेयर (Snake like filament) मंगलवार यानी 19 जुलाई पृथ्वी को हिट करेगी. इससे कई सैटेलाइट प्रभावित हो सकते हैं. जीपीएस, टीवी संचार और रेडियो का काम भी बाधित हो सकता है | यह एक तरह का सौर्य तूफान है जो पृथ्वी को सीधे तौर पर प्रभावित हो सकता है कि मोबाइल जैसी डिवाइस काम करना बंद कर दें |

    इस सोलर फ्लेयर (Solar flare) से इलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडिएशन और गर्मी बहुत बढ़ जाती है. हालांकि, पृथ्वी पर इससे गर्मी तो नहीं बढ़ेगी, लेकिन इलेक्ट्रो मैग्नेटिक फील्ड पर असर पड़ सकता है और सिगनल बंद हो सकते हैं |

    वैज्ञानिकों के मुताबिक, इन दिनों सूरज काफी सक्रिय रहा है. इस वजह से जियोमैग्रेटिक तूफान (Geomagnetic storms) आ रहे हैं. जिसे वैज्ञानिक भाषा में (M class) एम-क्लास और (X class) एक्स-क्लास के फ्लेयर्स बोलते हैं. यह सबसे मजबूत वर्ग की फ्लेयर्स भेज रहा है, क्योंकि इस समय सूरज एक्टिव है. जो अगले 8 सालों तक रहेगा. इस वजह से सौर तूफानों के आने की आशंका बनी रहेगी |  

    सौर तूफान लाखों किलोमीटर प्रतिघंटे की गति से आता है |

    सूरज पर बने धब्बे से कोरोनल मास इजेक्शन (Coronal Mass Ejection- CME) होता है. यानी सूर्य की सतह पर एक तरह का विस्फोट. इससे अंतरिक्ष में कई लाख किलोमीटर प्रति घंटे की गति से एक अरब टन आवेषित कण (Charged Particles) फैलते हैं. ये कण जब धरती से टकराते तब कई सैटेलाइट नेटवर्क, जीपीएस सिस्टम, सैटेलाइट टीवी और रेडियो संचार को बाधित करते हैं |

    सूरज पर धब्बे दिखाई देने का कारण

    जब सूरज के किसी हिस्से में दूसरे हिस्से की तुलना में गर्मी कम होती है, तब वहां पर धब्बे बन जाते हैं. ये दूर से छोटे-बड़े काले और भूरे रंग के धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं | एक धब्बा कुछ घंटों से लेकर कुछ हफ्तों तक रह सकता है | धब्बों अंदर के अधिक काले भाग को अम्ब्रा (Umbra) और कम काले वाले बाहरी हिस्से को पेन अम्ब्रा (Pen Umbra) कहते हैं |