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  • कोशिका विभाजन (Cell Division) क्या है ?  कोशिका चक्र क्या है ? | अर्द्धसूत्री विभाजन एवं समसूत्री विभाजन in Hindi

    कोशिका विभाजन (Cell Division) क्या है ? कोशिका चक्र क्या है ? | अर्द्धसूत्री विभाजन एवं समसूत्री विभाजन in Hindi

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की कोशिका विभाजन (cell division) क्या होता है ? koshika vibhajan के प्रकार क्या है ? koshika vibhajan क्यों जरूरी है ? साथ ही हम जानेगे कि समसूत्री कोशिका विभाजन और अर्द्धसूत्री विभाजन क्या है | समसूत्री कोशिका विभाजन और अर्द्धसूत्री विभाजन की परिभाषा, उनमे अंतर और उनके प्रकार क्या है ? आदि

    कोशिका विभाजन (Cell Division) क्या है ?

    कोशिका विभाजन का आशय उस प्रक्रिया से है, जिसके अन्तर्गत एक कोशिका से दो कोशिकाओं का निर्माण होता है, जिससे जीवों में प्रजनन और वृद्धि सम्भव हो पाती है। इस घटना में पहले DNA का द्विगुणन और फिर केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य का विभाजन होता है।  कोशिका विभाजन सभी जीवों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसमे कोशिका विभाजन के दौरान डीएनए प्रतिकृति व कोशिका वृद्धि होती है। ये सभी प्रक्रियाएं जैसे कोशिका विभाजन, डीएनए प्रतिकृति और कोशिका वृद्धि एक दूसरे के साथ समायोजित होकर, इस प्रकार संपन्न होती हैं कि कोशिका विभाजन सही होता है व संतति कोशिकाओं में इनकी पैतृक कोशिकाओं वाला जीनोम होता है।

    कोशिका विभाजन के प्रकार

    कोशिका विभाजन प्रमुख रुप से तीन प्रकार का होता है

    1. असूत्री विभाजन – प्रोकैरियोटिक जीवों में

    2. सूत्री विभाजन या समसूत्री विभाजन – कायिक कोशिकाओं में

    अर्द्धसूत्री विभाजन – जननिक कोशिकाओं में

    कोशिका विभाजन और कोशिका चक्र

    सभी सजीवों की कोशिकाएं दो भागों में विभाजित होकर जनन करती है, जिसमे प्रत्येक पैतृक कोशिका विभाजित होकर दो नई संतति कोशिकाओं का निर्माण करती है ये नव निर्मित संतति कोशिकाएं स्वयं वृद्धि एवं पुन: विभाजन करती है |

    कोशिका चक्र क्या है ?

    कोशिका विभाजन सभी जीवों के लिय एक महत्वपुर्ण प्रक्रिया है | एक कोशिका विभाजन के दौरान डीएनए प्रतिकृति व कोशिका वृद्धि होती है कोशिका अपने जीनोम का द्विगुणन व अन्य संघटकों का संश्लेषण और तत्पश्चात विभाजित होकर दो नई संतति कोशिकाओं का निर्माण करती है, इसे कोशिका चक्र कहते है | यद्यपि कोशिका वृद्धि (कोशिकाद्रव्यीय वृद्धि के संदर्भ में) एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें डीएनए का संश्लेषण कोशिका चक्र की किसी एक विशिष्ट अवस्था में होता है। कोशिका विभाजन के दौरान, प्रतिकृति गुणसूत्र (डीएनए) जटिल घटना क्रम के द्वारा संतति केंद्रकों में वितरित हो जाते हैं। ये सारी घटनाएं आनुवंशिक नियंत्रण के अंतर्गत होती हैं।

    एक प्ररूपी (यूकेरियोटिक) चक्र का उदाहरण मनुष्य की कोशिका के संवर्द्धन में होता है, जो लगभग प्रत्येक चौबीस घंटे में विभाजित होती है। यद्यपि कोशिका चक्र की यह अवधि एक जीव से दुसरे जीव एवं कोशिका से दूसरी कोशिका प्रारूप के लिए बदल सकती है। उदाहरणार्थ- यीस्ट के कोशिका चक्र के पूर्ण होने मेंलगभग नब्बे मिनट लगते हैं।

    कोशिका चक्र की प्रावस्थाएँ

    कोशिका चक्र की अवधि एक जीव से दुसरे जीव एवं कोशिका से दूसरी जीव एवं कोशिका से दूसरी कोशिका प्रारूप के लिय बदल सकती है | कोशिका चक्र की दो मूल प्रावस्थाए होती है जो निम्न है :

    • अंतरावस्था (Interphase)
    • एम (M) प्रावस्था (सूत्री विभाजन) (Mitosis Phase)

    अन्तरावस्था (interphase)

    सूत्री विभाजन के प्रारम्भ से पहले एक अन्तरावस्था (interphase) होती है इसमें G1, S तथा G2,  उप-अवस्थाएँ होती हैं। अंतरावस्था को विश्राम अवस्था भी कहते है | यह वह प्रावस्था जिसमे कोशिका विभाजन के लिय तैयार होती है तथा इस दौरान क्रमबद्ध तरीके से कोशिका वृद्धि एवं डीएनए का प्रतिकृतिकरण दोनों होते है अंतरावस्था को तीन प्रावस्थाओं या उप-अवस्थाएँ में विभाजित किया जाता है :

    1. पश्च सूत्री अन्तरकाल प्रावस्था (G1 Phase या जी1 प्रावस्था)

    2. संश्लेषण प्रावस्था (S Phase या एस प्रावस्था)

    3. पुर्व – सूत्री विभाजन अंतरालकाल प्रावस्था (G2 Phase या जी2 प्रावस्था)

    G1 – प्रोटीन एवं RNA का संश्लेषण होता है।

    S – इसमें DNA का द्विगुणन एवं हिस्टोन प्रोटीन का संश्लेषण होता है।

    G2 – RNA व प्रोटीन का संश्लेषण होता है।

    G0 – इसमें कोशिका विशेषीकृत हो जाती है और इसके बाद कोशिका विभाजन नहीं होता।

    जी1 प्रावस्था में कोशिका उपापचयी रूप में सक्रिय होती है, एवं लगातार वृद्धि करती है, परन्तु इसका डीएनए प्रतिकृति नही करता है | एस प्रावस्था या संश्लेषण प्रावस्था के दौरान डीएनए का निर्माण एवं इसकी प्रतिकृति होती है | इस दौरान डीएनए की मात्रा दुगुनी हो जाती है |

    प्राणी कोशिका में एस प्रावस्था के दौरान केन्द्रक में डीएनए का जैसे ही प्रतिकृतिकरण प्रारम्भ होता है वैसे ही तारककेंद्र का कोशिकाद्रव्य में प्रतिकृतिकरण होने लगता है, कोशिका वृद्धि के साथ सूत्री विभाजन हेतु जी2 प्रावस्था के दौरान प्रोटीन का निर्माण होता है |

    जो कोशिकाएं आगे विभाजित नही होती है जी1 प्रावस्था से निकल कर निष्क्रिय अवस्था में पहुचती है, जिसे कोशिका चक्र की शांत अवस्था (G0) कहते है |

    प्राणियों में सूत्री विभाजन केवल द्विगुणित कायिक कोशिकाओं में ही दिखाई देता है | इसके विपरीत पादपों में सूत्री विभाजन अगुणीत एवं द्विगुणीत दोनों कोशिकाओं में दिखाई देता है |

    सूत्री कोशिका विभाजन या समसूत्री विभाजन (Mitosis)

    सभी जन्तुओं और पौधों में, जनन कोशिकाएँ एवं अन्य सारी कोशिकाएँ सूत्री विभाजन से विभाजन करती हैं। इस कोशिका विभाजन की खोज डब्ल्यू. फ्लेमिंग ने की। यह सभी प्रकार के कायिक कोशिकाओं (vegetative cells) में होती है। इसमें एक द्विगुणित मातृ-कोशिका से दो समान सन्तति कोशिकाएँ बनती हैं। सूत्री विभाजन की प्रक्रिया दो भागों केन्द्रक विभाजन एवं कोशिकाद्रव्य विभाजन में सम्पन्न होती है।

    सूत्री विभाजन  (एम (M) प्रावस्था) उस अवस्था को व्यक्त करता है, जिसमे वास्तव में कोशिका विभाजन या समसूत्री विभाजन होता है, और अंतरावस्था दो क्रमिक एम प्रावस्थाओं के बीच की प्रावस्था को व्यक्त करता है, कोशिका चक्र की कुल अवधि की 95 प्रतिशत से अधिक की अवधि अंतरावस्था में ही व्यतीत होती है |

    सूत्री विभाजन  का आरम्भ केन्द्रक के विभाजन (Kayokinesis कैरियो काईनेसिस) और इसका अंत कोशिका द्रव्य विभाजन (Cytokinesis साईटो काईनेसिस) के साथ होता है

    विधा के लिए सूत्री विभाजन को केंद्रक विभाजन की चार अवस्थाओं में विभाजित किया गया है।

    केन्द्रक विभाजन (Kayokinesis)

    इस विभाजन की प्रक्रिया चार अवस्थाओं में सम्पन्न होती है | यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि कोशिका विभाजन एक प्रगतिशील प्रक्रिया है और इसकी विभिन्न अवस्थाओं के बीच स्पष्ट रूप से विभाजन करना मुश्किल है। केन्द्रक विभाजन यानि केरियोकाइनेसिस को चार अवस्थाओं में विभाजित किया गया है :

    • पूर्वावस्था (Prophase)।
    • मध्यावस्था (Metaphase)।
    • पश्चावस्था (Anaphase)।
    • अंत्यावस्था (Telophase)।

    पूर्वावस्था (Prophase)

    अंतरावस्था की व G1 अवस्था के बाद पूर्वावस्था केरियोकाइनेसिस का पहला पड़ाव है। वास्तविक कोशिका विभाजन की शुरूआत इसी अवस्था से होती है। इसमें प्रत्येक गुणसूत्र लम्बाई में पूरी तरह से दो बराबर भागों में बैट जाती है। इस आधे भाग को अर्द्धगुणसूत्र कहा जाता है। ये अर्द्धगुणसूत्र सेन्ट्रोमीयर पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं और केन्द्रक कला तथा केन्द्रिका नष्ट हो जाती है। कोशिका विभाजन का यह सबसे लम्बा चरण होता है।

    पूर्वावस्था के पूर्ण होने के दौरान की घटनाओं की विशेषताएं

    • गुणसूत्रीय द्रव्य संघनित होकर ठोस गुणसूत्र बन जाता है। गुणसूत्र दो अर्धगुणसूत्रों से बना होता है, जो आपस में सेंट्रोमियर से जुड़े रहते हैं। 
    • अंतरावस्था के समय जिस तारककाय का द्विगुण हुआ है वह कोशिका में विपरीत ध्रुव की ओर जाने लगता है। प्रत्येक तारककाय सूक्ष्म नलिकाओं को विकरित करता है, जिसे तारक (एस्टर) कहते हैं। ये तन्तु व तारक मिलकर समसूत्री विभाजन यंत्र बनाते हैं। पूर्वावस्था के अंत में यदि कोशिका को सूक्ष्मदर्शी से देखा जाता है तो इसमें गॉल्जीकाय, अंतर्द्रव्यी जालिका, केंद्रिका व केंद्रक आवरण दिखाई नहीं देता है।

    मध्यावस्था (Metaphase)

    केंद्रक आवरण के पूर्णरूप से विघटित होने के साथ समसूत्री विभाजन की द्वितीय अवस्था प्रारंभ होती है, इसमें गुणसूत्र कोशिका के कोशिका द्रव्य में फैल जाते हैं। इस अवस्था तक गुणसूत्रों का संघनन पूर्ण हो जाता है यह अवस्था काफी छोटी होती है उच्च पादपों में अतारकीय (Anastral) और जन्तुओं में तारकीय (astral) सूत्री विभाजन होता है।  यही वह अवस्था है जब गुणसूत्रों की आकृति का अध्ययन बहुत ही सरल तरीके से किया जा सकता है। 

    मध्यावस्था गुणसूत्र दो संतति अर्धगुणसूत्रों से बना होता है जो आपस में गुणसूत्रबिंदु से जुड़े होते हैं गुणसूत्रबिंदु के सतह पर एक छोटा बिंब आकार की संरचना मिलती है जिसे काइनेटोकोर कहते हैं। गुणसूत्र के सेन्ट्रोमीयर से कुछ तन्तु (टेक्टाइल तन्तु) ध्रुवों से जुड़े रहते हैं।  सूक्ष्म नलिकाओं से बने हुए तर्कुतंतु के जुड़ने का स्थान ये संरचनाएं (काइनेटीकोर) हैं, जो दूसरी ओर कोशिका के केंद्र में स्थित गुणसूत्र से जुड़े होते हैं। इस अवस्था में गुणसूत्र मध्य रेखा पर आकर एकत्र हो जाते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र का एक अर्धगुणसूत्र एक ध्रुव से तर्कुतंतु द्वारा अपने काइनेटोकोर के द्वारा जुड़ जाता है, वहीं इसका संतति अर्धगुणसूत्र तर्कुतंतु द्वारा अपने काइनेटोकोर से विपरीत ध्रुव से जुड़ा होता है। मध्यावस्था में जिस तल पर गुणसूत्र पंक्तिबद्ध हो जाते हैं, उसे मध्यावस्था पट्टिका कहते हैं।

    मध्यावस्था की मुख्य विशेषता

    • तर्कुतंतु गुणसूत्र के काइनेटोकोर से जुड़े रहते हैं।
    • गुणसूत्र मध्यरेखा की ओर जाकर मध्यावस्था पट्टिका पर पंक्तिबद्ध होकर ध्रुवों से तर्कुतंतु से जुड़ जाते हैं।

    पश्चावस्था (anaphase)

    सूत्री विभाजन के अन्तर्गत इस अवस्था में सर्वाधिक कम समय (2-3 मिनट) लगता है। इस अवस्था में अर्धगुणसूत्र अलग हो जाते हैं और सन्तति गुणसूत्रों (daughter chromosomes) के मध्य प्रतिकर्षण ( बल या टेक्टाइल तन्तुओं के ध्रुवों की ओर खिंचाव के कारण ये विपरीत ध्रुवों की ओर गति करते हैं।

    पश्चावस्था की विशेषताएं

    • गुणसूत्रबिंदु विखंडित होते हैं और अर्धगुणसूत्र अलग होने लगते हैं।
    • अर्धगुणसूत्र विपरीत ध्रुवों की ओर जाने लगते हैं।

    अन्त्यावस्था (Telophase)

    इस चरण में में नवजात गुणसूत्र के प्रत्येक जोड़े के चारों ओर एक केन्द्रक झिल्ली का निर्माण होता है और एक पूर्ण कोशिका का निर्माण होता है। इसके साथ ही सन्तति गुणसूत्र ध्रुवों पर एकत्र हो जाते हैं। इस सम्बन्ध में को जन्तु कोशिकाओं में सन्तति कोशिकाओं को पृथक करने के लिए संकुचन होता है, परन्तु पादप कोशिकाओं में संकुचन के स्थान पर कोशिका प्लेट बनती हैं।

    अन्त्यावस्था की मुख्य घटनाएं

    • गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों की ओर एकत्रित हो जाते हैं और इनकी पृथक पहचान समाप्त हो जाती है। 
    • गुणसूत्र समूह के चारों तरफ केंद्रक झिल्ली का निर्माण हो जाता है। 
    • केंद्रिका, गॉल्जीकाय व अंतर्द्रव्यी जालिका का पुनर्निर्माण हो जाता है।

    कोशिका द्रव्य विभाजन (Cytokinesis)

    केन्द्रक विभाजन के बाद कोशिकाद्रव्य का विभाजन होता है। सूत्री विभाजन के दौरान द्विगुणित गुणसूत्रों का संतति केंद्रकों में संपृथकन होता है जिसे केंद्रक विभाजन (Karyokinesis) कहते हैं।  कोशिका विभाजन संपन्न होने के अंत में कोशिका स्वयं एक अलग प्रक्रिया द्वारा दो संतति कोशिकाओं में विभाजित हो जाती है, इस प्रक्रिया को कोशिकाद्रव्य विभाजन कहते हैं। प्राणी कोशिका का विभाजन जीवद्रव्यकला में एक खांच बनने से संपन्न होता है। खांचों के लगातार गहरा होने व अंत में केंद्र में आपस में मिलने से कोशिका का कोशिकाद्रव्य दो भागों में बँट जाता है। यद्यपि पादप कोशिकाएं जो अपेक्षाकृत अप्रसारणीय कोशिका भित्ति से घिरी होती हैं अतः इनमें कोशिकाद्रव्य विभाजन दूसरी भिन्न प्रक्रियाओं द्वारा संपन्न होता है। पादप कोशिकाओं में नई कोशिका भित्ति निर्माण कोशिका के केंद्र से शुरू होकर बाहर की ओर पूर्व स्थित पार्श्व कोशिका भित्ति से जुड़ जाता है। नई कोशिकाभित्ति निर्माण एक साधारण पूर्वगामी रचना से प्रारंभ होता है जिसे कोशिका पट्टिका कहते हैं, जो दो सन्निकट कोशिकाओं की भित्तियों के बीच मध्य पट्टिका को दर्शाती है। कोशिकाद्रव्य विभाजन के समय कोशिका अंगक जैसे सूत्रकणिका (माइटोकॉड्रिया) व प्लैस्टिड लवक का दो संतति कोशिकाओं में वितरण हो जाता है। कुछ जीवों में केंद्रक विभाजन के साथ कोशिकाद्रव्य का विभाजन नहीं हो पाता है। इसके परिणामस्वरूप एक ही कोशिका में कई केंद्रक बन जाते हैं। ऐसी बहुकेंद्रकी कोशिका को संकोशिका कहते हैं  नारियल का तरल भ्रूणपोश इसका एक उदाहरण है । यह पादप कोशिकाओं में फ्रेग्मोप्लास्ट से, कोशिका के मध्य से बाहर की ओर कोशिका प्लेट के निर्माण द्वारा तथा जन्तुओं में कोशिका कला के मध्यवर्ती स्थान से अन्तर्वलन (invagination) द्वारा होता है।

    जन्तु और पादप कोशिकाओं के सूत्री विभाजन में विभिन्नताएँ

    पादप कोशिकाजन्तु कोशिका
    सेन्ट्रियोल अनुपस्थित होते हैं।सेन्ट्रियोल उपस्थित होते हैं।
    एस्टर नहीं बनते हैं।एस्टर बनते हैं।
    कोशिका विभाजन में एक कोशिका प्लेट बनता हैकोशिका विभाजन में कोशिकाद्रव्य का निर्माण और दो भागों में बँटते हैं।

    सूत्री कोशिका विभाजन का महत्त्व (Importance of Mitosis)

    सूत्री विभाजन या मध्यवर्तीय विभाजन केवल द्विगुणित कोशिकाओं में होता है। यद्यपि कुछ निम्न श्रेणी के पादपों एवं सामाजिक कीटों में अगुणित कोशिकाएं भी सूत्री विभाजन द्वारा विभाजित होती हैं। सूत्री विभाजन के कारण जीवों की वृद्धि तथा विकास सम्भव हो पाता है। यह अलैंगिक जनन का आधार है। इससे सन्तति कोशिकाओं (daughter cells) में गुणसूत्रों की संख्या मातृ कोशिका के समान होती हैं। इसके साथ ही सन्तति कोशिकाओं के गुण भी मातृ कोशिका के ही समान होता है। बहुकोशिकीय जीवधारियों की वृद्धि सूत्री विभाजन के कारण होती है। कोशिका वृद्धि के परिणामस्वरूप केंद्रक व कोशिकाद्रव्य के बीच का अनुपात अव्यवस्थित हो जाता है। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि कोशिका विभाजित होकर केंद्रक कोशिकाद्रव्य अनुपात को बनाए रखे। सूत्री विभाजन का एक महत्वपूर्ण योगदान यह है कि इसके द्वारा कोशिका की मरम्मत होती है। अधिचर्म की उपरी सतह की कोशिकाएं, आहार नाल की भीतरी सतह की कोशिकाएं एवं रक्त कोशिकाएं निरंतर प्रतिस्थापित होती रहती है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis)

    इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम फॉर्मर एवं मूरे ने किया। लैंगिक प्रजनन द्वारा संतति के निर्माण में दो युग्मकों का संयोजन होता है, जिनमें अगुणित गुणसूत्रों का एक समूह होता है। युग्मक का निर्माण विशिष्ट द्विगुणित कोशिकाओं से होता है। यह विशिष्ट प्रकार का कोशिका विभाजन है, जिसके द्वारा बनने वाली अगुणित संतति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है। इस प्रकार के विभाजन को अर्धसूत्री विभाजन कहते हैं।  यह विभाजन केवल जनन कोशिकाओं (reproductive cells) में होता है। इस विभाजन में गुणसूत्रों की संख्या कम होकर आधी रह जाती है, इसलिए इसे न्यूनकारी कोशिका विभाजन (reduction division) भी कहा जाता है।

    अर्धसूत्री विभाजन की मुख्य विशेषताएं

    अर्द्धसूत्री विभाजन केन्द्रक विभाजन का रूप है। सूत्री विभाजन की तरह इसमें मुख्य कोशिका में अन्तरावस्था के क्रम में ही DNA रेप्लीकेशन होता है, परन्तु यह केन्द्रक विभाजन (nucleus division) तथा कोशिका विभाजन (cell division) के दो चरणों में पूरा होता है, जिसे अर्द्धसूत्री I और अर्द्धसूत्री II के नाम से जाना जाता है। यह विभाजन जन्तु में शुक्राणु और अण्डाणु के बनने (gametogenesis) के दौरान और पौधों में स्पोर (spore) बनने के क्रम में होता है। यह विभाजन द्विगुणित (diploid) जनन कोशिकाओं में होता है, जिसके परिणामस्वरूप चार अगुणित कोशिकाएँ (haploid cells) बनती हैं।

    अर्धसूत्री विभाजन की अवस्थाएँ

    अर्धसूत्री Iअर्धसूत्री II
    पूर्वावस्था Iपूर्णावस्था II
    मध्यावस्था Iमध्यावस्था II
    पश्चावस्था Iपश्चावस्था II
    अंत्यावस्था Iअंत्यावस्था II

    अर्द्धसूत्री विभाजन। (Meiosis।)

    इसे न्यूनकारी विभाजन (reduction division) भी कहा जाता है।

    इसकी चार अवस्थाएँ होती हैं

    पूर्वावस्था I (Prophase I)

    अर्धसूत्री विभाजन I की पूर्वावस्था की तुलना समसूत्री विभाजन की पूर्वावस्था से की जाए तो, यह अधिक लंबी व जटिल होती है। गुणसूत्रों के व्यवहार के आधार पर इसे पाँच प्रावस्थाओं में उपविभाजित किया गया है जैसे-तनुपट्ट (लेप्टोटीन), युग्मपट्ट (जाइगोटीन), स्थूलपट्ट (पैकेटीन), द्विपट्ट (डिप्लोटीन) व पारगतिक्रम (डायकाइनेसिस)।

    साधारण सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखने पर तनुपट्ट (लिप्टोटीन) अवस्था के दौरान गुणसूत्र धीरे-धीरे स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं। गुणसूत्र का संहनन (कॉम्पैक्शन) पूरी तनुपट्ट अवस्था के दौरान जारी रहता है। इसके उपरांत पूर्वावस्था I का द्वितीय चरण प्रारंभ होता है, जिसे युग्मपट्ट कहते हैं। इस अवस्था के दौरान गुणसूत्रों का आपस में युग्मन प्रारंभ हो जाता है और इस प्रकार की संबद्धता को सूत्रयुग्मन कहते हैं।

    लेप्टोटीन

    इसमें केन्द्रक जाल संघनित होकर गुणसूत्र बनाते हैं। एक ही प्रकार के गुण रखने वाले गुणसूत्र समजात गुणसूत्र कहलाते हैं।

    युग्मपट्ट (जाइगोटीन) 

    इस उप-अवस्था में समजात गुणसूत्र युग्म बनाते हैं। इस क्रिया को सिनेप्सिस (synapsis) कहते हैं। इस प्रकार के गुणसूत्रों के युग्मों को समजात गुणसूत्र कहते हैं। इस अवस्था का इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मलेखी यह दर्शाता है कि गुणसूत्र सूत्रयुग्मन के साथ एक जटिल संरचना का निर्माण होता है, जिसे सिनेप्टोनिमल सम्मिश्र कहते हैं। जिस सम्मिश्र का निर्माण एक जोड़ी सूत्रयुग्मित समजात गुणसूत्रों द्वारा होता है, उसे युगली (bivalent) अथवा चतुष्क (tetrad) कहते हैं। यद्यपि ये अगली अवस्था में अधिक स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। पूर्वावस्था I की उपर्युक्त दोनों अवस्थाएं स्थूलपट्ट (Pachytene) अवस्था से अपेक्षाकृत कम अवधि की होती हैं। इस अवस्था के दौरान प्रत्येक युगली गुणसूत्र के चार अर्ध गुणसूत्र चतुष्क के रूप में अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं।

    इस अवस्था में पुनर्योजन ग्रंथिकाएं दिखाई देने लगती हैं जहाँ पर समजात गुणसूत्रों के असंतति अर्धगुणसूत्रों के बीच विनिमय (क्रासिंग ओवर) होता है। विनिमय दो समजात गुणसूत्रों के बीच आनुवंशिक पदार्थों के आदान-प्रदान के कारण होता है। विनिमय एंजाइम द्वारा नियंत्रित प्रक्रिया है व जो एंजाइम इस प्रक्रिया में भाग लेता है, उसे रिकाम्बीनेज कहते हैं। दो गुणसूत्रों में आनुवंशिक पदार्थों का पुनर्योजन जीन विनिमय द्वारा अग्रसर होता है। समजात गुणसूत्रों के बीच पुनर्योजन स्थूलपट्ट अवस्था के अंत तक पूर्ण हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप विनिमय स्थल पर गुणसूत्र जुड़े हुए दिखाई पड़ते हैं। द्विपट्ट (डिप्लोटीन) के प्रारंभ में सिनेप्टोनीमल सम्मिश्र का विघटन हो जाता है और युगली के समजात गुणसूत्र विनिमय बिंदु के अतिरिक्त एक दूसरे से अलग होने लगते हैं।

    विनिमय बिंदु पर X आकार की संरचना को काएज्मेटा कहते हैं। कुछ कशेरुकी प्राणियों के अडंकों में द्विपट्ट महीनों या वर्षों बाद समाप्त होती है।

    अर्धसूत्री पूर्वावस्था I की अंतिम अवस्था पारगतिक्रम (डायाकाइनेसिस) कहलाती है। जिसमें काएज्मेटा का उपांतीभवन हो जाता है, जिसमें काएज्मेटा का अंत होने लगता है। इस अवस्था में गुणसूत्र पूर्णतया संघनित हो जाते हैं व तर्कुतंतु एकत्रित होकर समजात गुणसूत्रों को अलग करने में सहयोग प्रदान करते हैं। पारगतिक्रम के अंत तक केंद्रिका अदृश्य हो जाती है और केंद्रक-आवरण झिल्ली भी विघटित हो जाता है। पारगतिक्रम मध्यावस्था की ओर पारगमन को निरूपित करता है।

    पैकेटीन

    इस उप-अवस्था में गुणसूत्र के लम्बाई में फटने के कारण समजात गुणसूत्र जोड़े में चार क्रोमैटिड दिखाई देते हैं। इस स्थिति को चर्तुसंयोजक (tetrad) कहा जाता है। समजात गुणसूत्रों के अबहन अर्द्धगुणसूत्रों के मध्य विनियम (crossing over) भी होता है।

    डिप्लोटीन

    इसमें समजात गुणसूत्र का प्रत्येक अर्द्धगुणसूत्र एक-दूसरे से अलग होने लगता है, परन्तु कुछ स्थानों पर एक-दूसरे के साथ क्रॉस रखता है, जिसे क्याज्मेटा कहते हैं।

    डाइकाइनेसिस

    इस उप-अवस्था में केन्द्रक तथा केन्द्रक कला लुप्त हो जाती हैं तथा क्याज्मेटा गुणसूत्र के सिरे की ओर खिसकने लगते हैं, जिसे टर्मिनेलाइजेशन (terminalization) कहते हैं।

    मध्यावस्था I (Metaphase I)

    इसमें तर्कु उपकरण बन जाता है तथा तर्कु तन्तु गुणसूत्रों के सेन्ट्रोमीटर से जुड़ जाते हैं।

    पश्चावस्था I (Anaphase I)

    तर्कु तन्तुओं के संकुचन के कारण समजात गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों पर जाने लगते हैं और प्रत्येक ध्रुव पर गुणसूत्र की संख्या आधी हो जाती है।

    अन्त्यावस्था I (Telophase I)

    इस अवस्था में केन्द्रक तथा केन्द्रक कला प्रकट हो जाती है। कोशिकाद्रव्य विभाजन शुरू हो जाता है और कोशिका की इस अवस्था को कोशिका द्विक कहते हैं। कोशिकाद्रव्य विभाजन द्वारा दो कोशिकाएँ बनती हैं, जो अन्त्यावस्था में प्रवेश करती है, परन्तु इसमें DNA का द्विगुणन नहीं होता है। उसके बाद पूर्वावस्था II आती है जो पूर्वावस्था I से काफी सरल होती है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन || (Meiosis II)

    अर्द्धसूत्री I के बाद यह अवस्था शुरू होती है। दोनों के मध्य की अवस्था विरामावस्था कहलाती है। इस चरण में चार अवस्थाएँ होती हैं, जो सूत्री विभाजन के समान होता है।

    पूर्वावस्था II (Interphase II)

    अर्धसूत्री विभाजन II गुणसूत्र के पूर्ण लंबा होने के पहले व कोशिकाद्रव्य विभाजन के तत्काल

    बाद प्रारंभ होता है। इसमें केन्द्रिका और केन्द्रक आवरण विखर जाते हैं साथ ही अर्द्धगुणसूत्र छोटे और मोटे हो जाते हैं तथा तर्कु (spindle fibre) बन जाते हैं।

    मध्यावस्था II (Metaphase II)

    इसमें केन्द्रिका और केन्द्रक झिल्ली विलुप्त हो जाती है। तर्क बन जाती है और गुणसूत्र तर्क के मध्य रेखा (equator) पर सेन्ट्रोमीयर द्वारा चिपक जाते हैं।

    पश्चावस्था II (Anaphase II)

    इसमें सेन्ट्रियोल पहले सेन्ट्रोमीयर्स को और फिर क्रोमैटिड्स को विपरीत ध्रुवों पर खींचते हैं।

    अन्त्यावस्था II (Telophase II)

    यह अवस्था अर्धसूत्री विभाजन की अंतिम अवस्था है, जिसमें गुणसूत्रों के दो समूह पुनः केंद्रक आवरण द्वारा घिर जाते हैं। कोशिकाद्रव्य विभाजन के उपरांत चार अगुणित संतति कोशिकाओं का कोशिका चतुष्टय बन जाता है। इस तरह इसमें चार नई कोशिकाओं का निर्माण होता है। गुणसूत्र कुण्डली से खुलकर, सीधे, लम्बे और एक समान हो जाते है। तकुं (spindle fibre) विलुप्त हो जाते हैं और सेन्टियोल दोहरे हो जाते हैं। केन्द्रक आवरण केन्द्रक के चारों ओर फिर से बनते हैं, जहाँ गुणसूत्र संख्या अविभाजित कोशिका में मौजूद गुणसूत्रों की संख्या की आधी (haploid) की होती है। जीव को एक अविभाजित कोशिका से चार नए कोशिकाओं का निर्माण करते हैं।

    मुख्यतया अगुणित जीवन चक्र वाले पौधों; जैसे-यूलोथ्रिक्स में युग्मनज में अर्द्धसूत्री विभाजन, द्विगुणित जीवन चक्र वाले पौधों में युग्मकी अर्द्धसूत्री विभाजन तथा उच्च वर्ग के पौधों में बीजाणुक अर्द्धसूत्री विभाजन (sporic meiosis) होता है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन का महत्त्व (Importance of Melosis)

    अर्द्धसूत्री विभाजन में विनिमय (crossing over) द्वारा नई किस्मों का विकास होता है। चूंकि एक जाति के समस्त जीवों में पीढ़ी दर पीढ़ी गुणसूत्रों की संख्या सदैव स्थिर रहती है, जो अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा ही सम्भव हो पाता है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन के मौलिक लक्षण

    समसूत्री एवं अर्द्धसूत्री विभाजन में अंतर (Differences between Mitosis and Meiosis)

    समसूत्री विभाजनअर्द्धसूत्री विभाजन
    यह शरीर के कायिक कोशिकाओं एवं लैंगिक कोशिकाओं में होता है।यह केवल लैंगिक कोशिकाओं में होता है।
    कोशिका के गुणसूत्रों में कोई परिवर्तन नहीं होता है।इसमें सन्तति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या आधी रह जाती है।
    यह प्रक्रिया चार अवस्थाओं में सम्पन्न होती है।यह दो उपविभाजनों में पूरा होता है जिसमें पहला न्यूनकारी (reductional) तथा प्रत्येक विभाजन में 4-5 अवस्थाएँ होती हैं।
    गुणसूत्रों के आनुवंशिक पदार्थ में आदान-प्रदान नहीं होता है इसलिए सन्तति कोशिकाओं में भी उसी प्रकार के गुणसूत्र होते हैं, जैसे जनक कोशिका में।गुणसूत्रों के बीच आनुवंशिक पदार्थ का आदान-प्रदान होता है इसलिए सन्तति कोशिकाओं के गुणसूत्र में कुछ भाग पितृ कोशिका से तथा कुछ भाग मातृ कोशिका से आ जाता है अतःसन्तति कोशिका के गुणसूत्र, जनकों के गुणसूत्र से भिन्न होते हैं।
    सन्तति कोशिका में जनक जैसे ही गुणसूत्र होने के कारण आनुवंशिक विविधता नहीं होती है lसन्तति कोशिकाओं में जनकों से भिन्न गुणसूत्र होने के कारण आनुवंशिक विविधता होती है।
    एक जनक (parents) से दो सन्तति कोशिकाएँ (daughter) बनती हैं।एक जनक से चार सन्तति कोशिकाएँ बनती हैं।