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  • पादप आकारिकी | (Plant Morphology) in Hindi | Phytomorphology | पौधों के भौतिक रूप एवं बाहरी संरचना का अध्ययन 

    पादप आकारिकी | (Plant Morphology) in Hindi | Phytomorphology | पौधों के भौतिक रूप एवं बाहरी संरचना का अध्ययन 

    इस आर्टिकल में हम पादपों के विभिन्न अंगो के बारे में जानेगे जैसे जड़, तना, पत्ती, फूल, फल एवं बीज आदि |

    पादप आकारिकी | (Plant Morphology) क्या है ?

    पादप आकारिकी का अर्थ है पादप की बाह्य संरचना का अध्ययन। अर्थात् इसके अंतर्गत पादप की सभी बाहर से दिखने वाली संरचनाओं का अध्ययन किया जाता है। आकारिकी शब्द का अर्थ होता है बाह्य संरचना का अध्ययन।

    एक पादप को बाहर से दिखने पर उसमें जड़ (Root), तना (Stem), पत्ते (Leaves), फूल (Flower), फल (Fruit), छाल (Bark) आदि दिखाई पड़ते हैं, पादप आकारिकी के अंदर इन्हीं संरचनाओं का अध्ययन किया जाता है।

    आकारिकी जीव विज्ञान की वह शाखा होती है जो अंगों की कार्य पद्धति से अधिक महत्व उनके आकार, आकृति, रंग, रूप और रूप में रूपान्तरण, शरीर में उनके स्थान को देती है।

    पादप आकारिकी के अन्तर्गत पौधों के शारीरिक आकार जैसे उसके विभिन्न अंगों जड़, तना, पत्ती, फूल, फलों एवं बीजों की रचना व उसके विकास का अध्ययन किया जाता है। पादप के विभिन्न वर्गों; जैसे

    1. थैलोफाइटा (शैवाल तथा कवक) जिसमें जड़, तना तथा पत्ती) का अभाव होता है

    2. ब्रायोफाइटा वर्ग मे पौधा मूलाभासों (rhizoids), (जड़ों के समान) तनों तथा पत्तियों में विभक्त होता है।

    3. टैरिडोफाइट पौधों में सामान्यतया जड़, तना तथा पत्ती भाग उपस्थित होते हैं एवं उसमें संवहन ऊतक जाइलम एवं फ्लोएम युक्त होते हैं।

    4. जिम्नोस्पर्म (अनावृतबीजी पौधे) का शरीर जड़, तना तथा पत्तियों में विभेदित होता है जिसमें पूर्णतया विकसित संवहन ऊतक होते हैं।

    5. एन्जिमोस्पर्म (आवृतबीजी) पौधे पूर्णत: विकसित तथा अत्यन्त जटिल संरचनाओं से युक्त होते हैं। इसका शरीर जड़, तना एवं पत्तियों में विभक्त होता है। प्रत्येक आवृतबीजी (पुष्पीय) पौधे में प्राय: दो (i) एक भूमिगत मूल तत्र एवं (ii) एक वायवीय प्ररोह तन्त्र, भाग होते हैं |

    जड़ तथा उसकी शाखाओं को सामूहिक रूप से मूल तन्त्र कहते हैं। जड़ तथा उसकी शाखाएँ मूल तन्त्र जबकि तना एवं उसकी शाखाएँ, पत्तियाँ, पुष्प एवं फल सम्मिलित रूप से प्ररोह तन्त्र के अन्तर्गत आते हैं।

    जड़, तना तथा पत्तियाँ कायिक अंग, जबकि पुष्प और फल प्रजनन अंग होते है। पुष्प में उपस्थित जननांगों के संयोजन क्रिया के फलस्वरूप नई पीढ़ी का विकास होता है।

    स्वभाव तथा पोषण के आधार पर पौधों में भिन्नता पाई जाती है। स्वभाव के आधार पर यह शाक, झाड़ी तथा वृक्ष होते है, जबकि पोषण के आधार पर स्वपोषी, परपोषी आदि होते हैं। इन सभी में पादप अंगो का कार्य मूल रूप से समान होता है। इन पौधों का प्रत्येक भाग विशेष कार्य को करने के लिए अनुकूलित होता है |

    पादप आकारिकी | (Plant Morphology) के महत्वपुर्ण भाग

    जड़ (Root) किसे कहते है, जड़ के प्रकार, विशेषताएँ तथा कार्य (what is root, its type and function) मूसला जड़ एवं अपस्थानिक जड़ें

    तना (Plant Stem) परिभाषा, तने के लक्षण, तने के रूपान्तरण, तने के कार्य Work of Plant Stem

    पत्ती (Leaf) किसे कहते है? पत्ती/पर्ण क्या है, परिभाषा, पत्ती की संरचना, भाग, पत्ती के प्रकार, रूपान्तरण, पत्ती के कार्य What is leaf, its type (Leaf in Hindi)

    पुष्पक्रम (Inflorescence) किसे कहते हैं? परिभाषा , पुष्पक्रम के प्रकार, उदाहरण Inflorescence in Hindi | What Is Inflorescence

    पुष्प या फूल (Flowers) , पुष्प के प्रकार, मुख्य विशेषताएँ, परागण | निषेचन | पुंकेसर | बीजाण्डासन (Placentation) और अण्डप | Flowers in Hindi

    फल क्या है | What is Fruit? | फलों के प्रकार | Types of Fruits in Hindi (फलों से जुडी सम्पूर्ण जानकारी)

    पादप आकारिकी के महत्वपुर्ण तथ्य

    • थैलोफाईटा का शरीर जड, तना पत्ति में विभक्त नहीं होता, इसके शरीर को थैलस कहा जाता है।
    • भूमि के ऊपर रहने वाला भाग प्ररोह तंत्र (Shoot system) कहलाता है।
    • भूमि के नीचे रहने वाला भाग जड़ तंत्र (Root System) कहलाता है।
    • एन्जियोस्पर्म पादपों को आकार एवं शरीर की बनावट के हिसाब से तीन प्रकारों में विभक्त किया जाता है- शाक, झाड़ी और वृक्षा
    • तनें विभिन्न कारणों के रूपान्तरित हो जाते हैं जिनमें से मुख्य है- भोजन का संग्रह एवं निर्माण, वाष्पोत्सर्जन कम करना, जनन सुरक्षा आदि।
    • कुछ पौधों के तनों में कायिक जनन (Vegetative reproduction) के लिए तनों के आकार में रूपान्तरण होता है। उदाहरण- घाँस (दूब घाँस) स्ट्रॉबेरी आदि।
    • भोजन संग्रह के लिए पौधों के तनों में अनेक प्रकार के रूपान्तरण होते हैं- (1) बल्ब (Bulb) – उदाहरण- प्याज (2) ट्यूबर (Tuber) -उदाहरण- आलू (3) क्राउन (Crown) – उदाहरण- मकड़ी पादप (Spider plant) (4) कोर्म (Corms) – उदाहरण- लहसून
    • क्लोरोफिल के अतिरिक्त भी कुछ पत्तियों में अनेक वर्णक क्रोमोप्लास्ट (Chromoplast) पाये जाते हैं।
    • घटपर्णी पादप की पत्तियाँ कीट भक्षण के लिए अत्यधिक रूपान्तरित होकर कलश की आकृति ले लेती हैं।
    • फूल पौधे का जनन अंग होता है।
    • फूल मुख्य रूप चार मुख्य भागों में विभक्त होता है- (1) कैलिक्स (Calyx) इसकी एक इकाई सेपल (Sepal) कहलाती है। (2) करोला (Corolla) इसकी इकाई पेटल (Petal) कहलाती है। (3) पुंकेसर (Androecium) इसकी इकाई स्टेमिन (Stemen) कहलाती है। (नर जननांग (4) स्त्रीकेसर (Gyenoecium) इसकी इकाई पिस्टिल (Pistil) कहलाती है। (मादा जननांग) अक्ष (Axis) पर फूलों के खिलने के क्रम को पुष्पविन्यास (Infloresence) कहते हैं। यह अक्ष रैकिस (Rachis) कहलाता है। पुष्पविन्यास विभिन्न पादपों में भिन्न प्रकार का होता हैं।
    • गोभी का फूल, सूरजमुखी का फूल तथा गेंदे का फूल एकल फूल न होकर पुष्पविन्यास होता है।
    • लौंग अधखिली कलियाँ होती हैं। जिन्हें इनके खिल कर फूल बनने से ठीक पहले तोड़ लिया जाता है।
    • रेफलिशिया दुनिया का सबसे बड़ा फूल है, जिसका व्यास लगभग एक मीटर होता है, इससे सड़े मॉस जैसी बदबू आती है।
    • वोल्फिया विश्व का सबसे छोटा पुष्प है।
    • केसर में खाने योग्य भाग इसका लंबा स्टिगमा होता है जो इसके स्त्रीकेसर का भाग है।
    • वास्तविक फूल मात्र एन्जियोस्पर्म पादप में पाये जाते हैं, अन्य निम्न वर्ग के पौधों में फूलों का अभाव होता है।
    • फलों का निर्माण दो प्रक्रियाओं के द्वारा होता है-(1) निषेचन (Fertilization) के द्वारा (2) पार्थिनोकॉर्पो (Parthenocarpy) के द्वारा अनिषेचित फूलों से बने फलों में बीजों का अभाव होता है। उदाहरण- केले के फल पार्थिनोकॉपी के द्वारा बनते है
    • फलों की उनकी संरचना की जटिलता के आधार पर तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1) सामान्य फल (Simple Fruit) (2) संयुक्त फल (Aggregat Fruit) (3) बहु फल (Multiple fruits) मात्र एन्जियोस्पर्म पादपों में ही फल बनते हैं।
    • लीची में खाने योग्य भाग ऐरिल होता है जो कि हाइलम (Hylem) के अतरिक्त रूप से बड़े और मॉसल होने के कारण बनता है। यह हाइलम बीजों के जुड़ने के अण्डाशय से जुड़ने का स्थान होता है।
    • सेब में जो भाग खाया जाता है, वह वास्तविक फल न होकर मिथ्या फल (Pseudo fruit) होता है, जो फूल के अण्डाशय की दीवार के फूल जाने के कारण बनता है, वास्तविक फल इसके अंदर का बीज वाला भाग होता है |
    • मूंगफली एक अंतभौमिक (Underground) फल है।
    • नारियल का पानी इसका तरल भ्रूणपोष (Liquid endosperm) होता है।
    • मूसला जड़ें सामान्यतः द्विबीजपत्रीय (Dicot) बड़े पादपों में पाई जाती हैं। ये भूमि में अत्यधिक गहराई तक चली जाती हैं। इनमें प्राथमिक जड़ (Primary root) द्वितीयक जड़ें (Secondary root) तृतीयक जड़ें (Tertiary root) कहते हैं।
    • भोजन संग्रह के लिए जड़ें रूपान्तरित होकर विभिन्न आकारें में वृद्धि करने लगती है उदाहरण- गाजर, मूली, अदरक, शकरकंद, चुकंदर, शलजम आदि जड़ों के भोजन संग्रह के लिए रूपान्तरण ही हैं।
    • अमरबेल की जड़ों में चूषण क्षमता आ जाती है और ये दूसरे पादप (Host plant) के ऊतकों से भोजन को चूस कर अपना पोषण करते हैं। यह प्रवृत्ति परजीविता (Parasitism) कहलाती है।
    • दलदली भूमि में पाई जाने वाले वाले मैंग्रूव की द्वितीयक जड़ें जमीन के बाहर निकल आती हैं और वातावरणीय नाइट्रोजन अवशोषित करती हैं। इन रूपान्तरित जड़ों को न्यूमेटोफोर (Pneumatophore) कहते हैं।

  • जन्तुओं में पोषण (Nutrition in Animals)  एवं जन्तुओं के पोषक पदार्थ (Nutritive Substance of Animals)

    जन्तुओं में पोषण (Nutrition in Animals) एवं जन्तुओं के पोषक पदार्थ (Nutritive Substance of Animals)

    इस आर्टिकल में हम जंतुओं के पोषण और पोषक पदार्थों के बारे में बात करेगें | जंतुओं के विकास के लिए कोनसे पोषक पदार्थ आवश्यक होते है ? जंतुओं के विकास के लिय पोषक पदार्थ क्यों जरूरी है ? जैविक क्रियाओं के लिय कोनसे पोषक पदार्थ जरूरी होते है और वो जीवों के कहा से प्राप्त होते है या उन पोषक पदार्थों का स्त्रोंत क्या है ? रासायनिक संगठन के आधार पर पोषक पदार्थों के कितने प्रकार है ?

    साथ ही इस आर्टिकल में हम जानेगे कि कार्बोहाइड्रेट्स क्या होते है ? वसा क्या है ? विटामिन क्या होते है ? प्रोटीन क्या होते है और इनका जीवों के शारीरिक विकास में किस प्रकार योगदान है ? खनिज लवण क्या होते है ? आदि

    जन्तुओं में पोषण (Nutrition in Animals) क्यों जरूरी है ?

    जन्तु अपने पोषण के लिए वनस्पतियों एवं अन्य जन्तुओं पर निर्भर होता है अर्थात् जन्तु उत्पादक न होकर उपभोक्ता होता है।

    जन्तु पोषण के दो प्रकार-प्राणिसम पोषण तथा अवशोषी पोषण हैं। प्राणिसम पोषण के अन्तर्गत जन्तु भोजन को अपने शरीर के अन्दर ले जाते हैं अर्थात् निगलते हैं। इसके बाद भोजन का पाचन एवं अवशोषण होता है। वहीं अवशोषी पोषण के अन्तर्गत भोजन का अन्तर्ग्रहण न होकर उसका अवशोषण होता है। उदाहरण फफूंदी में।

    जन्तुओं के पोषक पदार्थ (Nutritive Substance of Animals) कोनसे है ?

    भोज्य पदार्थों में निहित वे उपयोगी रासायनिक घटक, जिनका उपयुक्त मात्रा में उपलब्ध होना शरीर के विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए अति आवश्यक है, पोषक पदार्थ कहलाते हैं। रासायनिक संगठन के आधार पर पोषक पदार्थों को निम्न भागों में बाँटा गया है

    1. कार्बोहाइड्रेट्स

    2. वसा

    3. प्रोटीन

    4. विटामिन

    5. खनिज लवण

    6. जल

    इन पोषक तत्वों में से कार्बोहाइड्रेट तथा वसा ऊर्जा उत्पादन तथा प्रोटीन निर्माणकारी पदार्थ और विटामिन, खनिज लवण एवं जल उपापचयी नियन्त्रक हैं।

    कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates) क्या है ? कार्बोहाइड्रेट्स के प्रकार, स्त्रोत और कार्य

    यह कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का कार्बनिक यौगिक है, जिसका अनुपात क्रमश: 1 : 2 : 1 है यह पचने के उपरान्त ग्लूकोज में परिवर्तित हो जाते हैं। इसी ग्लूकोज के ऑक्सीकरण से र को ऊर्जा मिलती है। शरीर की कुल ऊर्जा का 50-79% मात्रा को पूर्ति कार्बोहाइड्रेट से ही होती है।

    1 ग्राम कार्बोहाइड्रेट के ऑक्सीकरण से 45 किलो कैलोरी ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

    इसका सामान्य सूत्र (CH2O)n होता है। खाद्य पदार्थों में ये शर्करा, स्टार्च एवं सेलुलोज के रूप में पाए जाते हैं। कुछ कार्बोहाइड्रेट जल में घुलनशील होती है, जैसे शकंरा, जो स्वाद में मीठा होता है, जबकि स्टार्च (मण्ड) एवं सेलुलोज अघुलनशील कार्बोहाइड्रेट के प्रमुख उदाहरण हैं।

    पोषण के अन्तर्गत शर्करा ग्लूकोज के रूप में बदल जाता है, जिसका भण्डारण ग्लाइकोजन के रूप में होता है। ग्लूकोज से ग्लाइकोजन बनने की क्रिया ग्लाइकोजेनेसिस कहलाती है।

    सेलुलोज क्या है ?

    यह पौधे की कोशिका मित्ति में पाए जाते हैं।

    कपास एवं कागज शुद्ध सेलुलोज होते हैं।

    यह ग्लूकोस का बहुलक है।

    पशु, जैसे-गाय, भैंस, बकरी आदि में सेलुलोज का पाचन होता है, परन्तु मनुष्य में इसका पाचन नहीं होता।

    कार्बोहाइड्रेट के प्रकार (Types of Carbohydrate) क्या है ?

    रासायनिक संरचना के आधार पर इसे तीन श्रेणियों में बाटां गया है।

    मोनोसैकेराइड्स (Monosaccharides)

    इसमें कार्बोहाइड्रेट की एक ही इकाई होती है।

    यह सभी कार्बोहाइड्रेट की सबसे सरल अवस्था होती है।

    ये जल में घुलनशील तथा मीठो होती है। .

    ग्लूकोज और फ्रक्टोस पौधों में सामान्य रूप से पाया जाने वाला मोनोसैकेराइड्स है।

    इनमें से ग्लूकोज प्रकाश-संश्लेषण का मुख्य उत्पाद है तथा इससे ऊर्जा उपलब्ध होते हैं, जबकि फ्रक्टोस फलों में पाए जाते हैं।

    ग्लूकोज सबसे महत्वपूर्ण मोनोसैकेराइड्स है, जो फलों में मुख्यतया अंगूर और शहद में मिलता है। फ्रक्टोस शरीर के अन्दर ग्लाइकोजन में परिवर्तित हो जाती है।

    शरीर में पहुंचे सभी कार्बोहाइड्रेट्स सर्वप्रथम ग्लूकोज में जल अपघटित होते हैं।

    ऑलिगोसैकेराइड्स (Oligosaccharides)

    ये मोनोसैकेराइड्स के 2-10 अणुओं से मिलकर बनता है, जैसे

    ग्लूकोस + ग्लूकोस = माल्टोस

    ग्लूकोस + फ्रक्टोस = सुक्रोस

    ग्लूकोस + ग्लैक्टोस = लैक्टोस

    सुक्रोस, माल्टोस और लैक्टोस प्रमुख डाइसैकेराइड्स हैं।

    सुक्रोस गन्ना, चुकन्दर, गाजर तथा मीठे फलों में पाया जाता है।

    माल्टोस स्वतन्त्र रूप से नहीं वरन् बीजों की (मुख्यतया जौ) शर्करा अर्थात् माल्ट शुगर होती है।

    पॉलीसैकेराइड्स (Polysaccharides)

    ये जल में अघुलनशील होते हैं, जो अनेक मोनोसैकेराइड्स अणुओं के मिलने से बनता है।

    ये पौधों में मुख्य रूप से सेलुलोज में पाए जाते हैं।

    आवश्यकता पड़ने पर यह जल-अपघटन (hydrolysis) द्वारा ग्लूकोस में बदल जाता है। इस रूप में यह ऊर्जा उत्पादन हेतु संग्रहित ईंधन का कार्य करता है।

    पॉलीसैकेराइड के प्रमुख उदाहरण

    मण्ड या स्टार्च सभी प्रकार के अनाजों, सब्जियों, विशेषकर आलू, शकरकन्द आदि में मिलता है।

    ग्लाइकोजन जन्तु के शरीर में संचित अवस्था में रहता है और आवश्यकता पड़ने पर इसका उपयोग होता है।

    काइटिन आर्थोपोडा संघ के जन्तुओं के बाहा कंकाल का निर्माण।

    सेलुलोज पौधों की कोशिका भित्ति का निर्माण करती है।

    कार्बोहाइड्रेटस के कार्य कोनसे है ?

    यह शरीर को ऊर्जा प्रदान करने वाले मुख्य स्रोत होते हैं।

    ये मण्ड के रूप में ‘संचित ईंधन’ का कार्य करते हैं।

    यह वसा में बदलकर ‘संचित भोजन’ का कार्य करते हैं।

    यह DNA और RNA के घटक पेन्टोज शर्करा होता है।

    प्रोटीन को शरीर के निर्माणकारक कार्यों हेतु सुरक्षित रखते हैं

    शरीर में वसा के उपयोग हेतु यह अत्यन्त ही आवश्यक है।

    वसा (Fats) क्या है ? वसा के स्त्रोत, प्रकार और कार्य

    ये कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के असंतृप्त यौगिक होते हैं किन्तु रासायनिक रूप से कार्बोहाइड्रेट से भिन्न होती है।

    इसमें कार्बोहाइड्रेट्स की तुलना में ऑक्सीजन की बहुत कम मात्रा होती है। ये पानी में अघुलनशील परन्तु क्लोरोफॉर्म, बेन्जीन, पेट्रोलियम आदि कार्बनिक विलायकों में घुलनशील होती है। क्षार द्वारा इसका पायसीकरण किया जा सकता है।

    वसा एक अणु ग्लिसरॉल तथा वसा अम्ल (fatty acid) के तीन अणुओं के एस्टर बन्ध द्वारा बनते हैं इसलिए इन्हें ट्राइग्लिसराइड्स कहते हैं।

    शरीर की कुल ऊर्जा का 20-30% ऊर्जा वसा से प्राप्त होती है, जबकि एक ग्राम वसा के पूर्ण ऑवसीकरण से 9.3 किलो कैलोरी ऊर्जा मुक्त होती है। वसा का संचय विशिष्ट वसीय ऊतक (adipose tissues) में होता है। 20°C पर वसा तेल कहलाते हैं।

    वसा के प्रकार (Type of Fats) कोनसे है ?

    रासायनिक दृष्टि से वसा मुख्यतया तीन प्रकार की होती हैं-1. सरल वसा 2. संयुक्त वसा 3. व्युत्पन्न वसा।

    सरल वसा (Simple Fats)

    सरल वसा में केवल ग्लिसरॉल व वसा अम्ल एस्टर बन्ध द्वारा संयुक्त होते हैं।

    संयुक्त वसा (Complex Fats)

    इन वसाओं में अम्ल तथा एल्कोहॉल के साथ-साथ नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस भी होते हैं। इन्हें जटिल लिपिड्स (compler lipids) भी कहा जाता है।

    ये मुख्यतया दो प्रकार के होते हैं – फॉस्फोलिपिड और ग्लाइकोलिपिडा

    इनमें से फॉस्फोलिपिड में फॉस्फोरस का अंश होता है, जो पित्त, यकृत एवं पेशियों में संचित होती है। परन्तु ग्लाइकोलिपिड तत्रिका तत्र के ऊतक में पाई जाती है।

    व्युत्पन्न वसा (Derived Fats)

    ये संयुक्त वसाओं के जल अपघटन से बनती हैं, जैसे-स्टीरॉयड (लिंग हॉर्मोन, पित्त अम्ल), स्टीरॉल (कोलेस्ट्रॉल, विटामिन-D), प्रोस्टाग्लैन्डिन वसा अम्ल व्युत्पन्न है, जो अरेखित पेशियों के संकुचन, रुधिर स्कन्दन, शोघ तथा एलर्जी प्रतिक्रियाओं में भाग लेते हैं।

    वानस्पतिक वसा (Plant Fats)

    यह प्रकृति के मुख्य रूप से वनस्पतियों, फलों तथा बीजों में पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है।

    जन्तुओं में वसा ऊतक, यकृत तथा अस्थि मज्जा में संचित रहती है। वसा अम्ल दो प्रकार के होते हैं

    संतृप्त वसा और असंतृप्त वसा अम्ला अधिकतर संतृप्त वसा जन्तु वसा होता है।

    सामान्य ताप पर यह ठोस होता है, जैसे-मक्खन परन्तु नारियल का तेल एवं ताड़ का तेल ही संतृप्त वनस्पति तेल के उदाहरण हैं, जबकि असंतृप्त वसा मछली के तेल एवं वनस्पति तेलों में मिलते हैं।

    वसा के प्रमुख कार्य

    यह ठोस रूप में शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है।

    यह त्वचा के नीचे जमा होकर शरीर के ताप को बाहर नहीं निकलने देती है।

    शरीर के विभिन्न अंगों की चोवें से बचाती है। – आरक्षित भोजन के रूप में।

    प्लाज्मा झिल्ली के निर्माण में सहायक होती है।

    प्रोटीन (Protein) क्या है ? प्रोटीन के प्रकार, स्त्रोत एवं कार्य

    यह एक जटिल कार्बनिक यौगिक होता है। प्रोटीन शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1938 में वरजेलियस ने किया। शरीर की वृद्धि एवं ऊतकों के टूट-फूट की मरम्मत में प्रोटीन की भूमिका अहम होती है।

    इसके अलावा शरीर में विभिन्न रासायनिक क्रियाओं के लिए उत्प्रेरक के रूप में विभिन्न एन्जाइम की भूमिका होती है, जो प्रोटीन ही होता है। प्रोटीन अमीनो अम्लों के बहुलक होते हैं इनमें लगभग 20 प्रकार के अमीना अम्ल पाए जाते हैं।

    मानव शरीर में इनमें से 10 प्रकार के अमीनो अम्ल का संश्लेषण शरीर में स्वयं होता है, जबकि शेष 10 प्रकार के अमीनो अम्ल भोजन के द्वारा प्राप्त करते हैं।

    कुछ आवश्यक प्रोटीन के प्रकार

    शारीरिक प्रोटीन कार्य एन्जाइम्स जैव उत्प्रेरक, जैव-रासायनिक अभिक्रियाओं में सहायक हैं। हॉर्मोन्स शरीर की क्रियाओं का नियनन करते हैं।

    परिवहन प्रोटीन हीमोग्लोबिन, विभिन्न पदार्थों का परिवहन करती है। संरचनात्मक प्रोटीन कोशिका एवं ऊतक निर्माण करती है।

    रक्षात्मक प्रोटीन संक्रमण से रक्षा करने में सहायक है। उदाहरण-प्रतिरक्षी। संकुचन प्रोटीन ये पेशी संकुचन एवं चलन हेतु उत्तरदायी है, उदाहरण-मायोसिन, एक्टिन आदि।

    प्रोटीन के कार्य

    यह शरीर की वृद्धि तथा ऊतकों की मरम्मत करता है।

    यह एन्जाइम तथा विटामिन का निर्माण करता है। – प्रोटीन श्वसन अंगों के निर्माण में भाग लेता है।

    यह संयोजी ऊतकों, अस्थियों तथा उपास्थियों के निर्माण में भाग लेता है।

    प्रोटीन की कमी से मैरेस्मस नामक रोग हो जाता है।

    विटामिन (Vitamins) क्या है ? विटामिन (Vitamins) के प्रकार, स्त्रोत और उपयोग

    कैसिमिर फूंक ने इस शब्द का प्रतिपादन किया। यह स्वयं ऊर्जा उत्पादन तो नहीं कर सकता परन्तु ऊर्जा सम्बन्धी रासायनिक क्रियाओं को नियन्त्रित करता है।

    हमारा शरीर विटामिन – D एवं K का संश्लेषण कर सकता है, जबकि अन्य विटामिन बाह्य स्रोत (भोजन) से प्राप्त किए जाते हैं।

    इनका नामकरण अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षरों के अनुसार किया गया है; जैसे-A, B, C, D, E एवं KI

    विलेयता के आधार पर विटामिनों को दो वर्गों में बाँटा गया है।

    1. जल में घुलनशील विटामिन – विटामिन-B समूह और विटामिन-C

    2. वसा में घुलनशील विटामिन – विटामिन- A, D, E एवं KI

    विटामिनों के स्रोत, कार्य एवं कमी के प्रभाव

    खनिज लवण (Minerals)

    खनिज लवण (Minerals) भोजन के अकार्बनिक अवयव है, जो शरीर के उपापचयी क्रिया को नियन्त्रित करते हैं। यह शरीर के ऊतकों के निर्माण के लिए कच्चा पदार्थ है और एन्जाइम तथा विटामिन के आवश्यक अंग है।

    खनिज पदार्थ के मुख्य स्त्रोत और कार्य

    सन्तुलित भोजन (Balanced Diet) क्या है ?

    वह भोजन, जिसमें सभी पोषक तत्त्व उचित अनुपात में सम्मिलित होते हैं सन्तुलित भोजन कहलाते हैं। इसका निर्धारण प्रत्येक व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और कार्य के अनुरूप होता है।

    पोषक तत्त्वों के स्रोत : एक दृष्टि में

    पोषक पदार्थस्रोत
    कार्बोहाइड्रेटचीनी, शहद, दूध, अनाज, आलू आदि
    प्रोटीनअण्डा, दूध, पनीर, दाल, मछली आदि
    वसाघी, तेल, दूध, मांस आदि
    विटामिनमांस, मछली, दूध, गाजर, हरी सब्जी आदि
    खनिज लवणमांस, दूध, अनाज, हरी सब्जी आदि

    कुपोषण (Malnutrition) क्या है ?

    भोजन की आवश्यक मात्रा तथा आवश्यक तत्त्वों का समावेश न होना कुपोषण की स्थिति पैदा करती है। सामान्यतया कुपोषण की स्थिति प्रोटीन की कमी के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती है, जिसके कारण शरीर के वृद्धि एवं विकास में बाधा उत्पन्न होती है।

    अपोषण (Under-nutrition)

    इसका आशय भोजन में आवश्यक तत्त्वों का सर्वथा अभाव होना है, जिसके परिणामस्वरूप शरीर की आवश्यकता की पूर्ति नहीं हो पाती है।

    पोषण की अधिकता के परिणाम

    संतृप्त वसा की अधिकता से रुधिर में कॉलेस्टरॉल को मात्रा बढ़ जाती है, जो रुधिर वाहिनियों की दीवार पर जम जाती है। फलत: रुधिर को गति कम हो जाती है एवं रुधिर दाब बढ़ जाता है एवं हृदय सम्बन्धी रोग हो जाते हैं।

    अधिक कैलोरी वाले भोजन, जैसे-घी, शक्कर आदि के सेवन से मोटापा तथा डायबिटीज की समस्या आती है।

  • प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) क्या है ? Praakash Sanshleshan | प्रक्रिया, प्रभाव व महत्व

    प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) क्या है ? Praakash Sanshleshan | प्रक्रिया, प्रभाव व महत्व

    इस आर्टिकल में हम प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के बारे में विस्तृत से जानेगे | प्रकाश संश्लेषण क्या है? (Definition of Photosynthesis in Hindi), प्रकाश संश्लेषण की अभिक्रिया क्या है ? ऑक्सीजन युक्त प्रकाश संश्लेषण क्या है ? (Photosynthesis with oxygen in Hindi), प्रकाश संश्लेषण को प्रभावित करने वाले कारक क्या है ? (factors effecting photosynthesis in Hindi), प्रकाशिक अभिक्रिया (Light Reaction) क्या है ?

    प्रकाश संश्लेषण क्या है? (Definition of Photosynthesis in Hindi)

    (Photosynthesis Photo = प्रकाश; Synthesis = जुड़ना, निर्माण) 

    प्रकाशसंश्लेषण पृथ्वी पर होने वाली एकमात्र प्रक्रिया है जिस पर मनुष्य तथा समस्त जीवधारियों का जीवन निर्भर होता है।

    इस प्रक्रिया द्वारा हरे पौधे, शैवाल तथा हरित लवक-धारी जीवाणु, अकार्बनिक अणुओं से सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में अपना भोजन (कार्बनिक पदार्थ) बनाते हैं।

    प्रकाश-संश्लेषण सिर्फ हरे पौधों एवं कुछ जीवाणुओं (साइनोबैक्टीरिया) में घटित होने वाली वह क्रिया है जिसमें पौधों के हरे भाग सौर ऊर्जा को ग्रहण कर वायुमण्डल से ली गई कार्बनडाइऑक्साइड Co2 तथा भूमि से अवशोषित जल (H20) के द्वारा कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते हैं तथा आक्सीजन गैस (O2) बाहर निकालते हैं।

    प्रकाश-संश्लेषण ही एकमात्र ऐसी प्राकृतिक प्रक्रिया है जो वातावरण में ऑक्सीजन छोड़ती है तथा सभी जीवित प्राणी श्वसन हेतु इसी ऑक्सीजन पर निर्भर हैं। हरितलवकों में प्रकाशसंश्लेषण क्रिया सम्पन्न होती है अथवा अन्य शब्दों में हरितलवक सौर-बैटरी की तरह कार्य करके कार्बोहाइड्रेटों का निर्माण करते हैं।

    इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन एवं जल सहउत्पाद (byproduct) के रूप में निष्काषित होते हैं। यह क्रिया क्लोरोफिल को उपस्थिति में सम्पन्न होती है।

    जोसेफ प्रीस्ट्ले तथा इसके पश्चात् जान इंजेनहॉज ने बताया कि पौधों में वायुमंडल से CO2 को ग्रहण करने एवं वातावरण में ऑक्सीजन छोड़ने की क्षमता है।

    इंजेनहॉज ने यह भी बताया कि पौधो द्वारा ऑक्सीजन छोड़ने की प्रक्रिया सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति तथा पौधो के हरे भाग में ही होती हैं।

    रॉबर्ट हिल ने प्रदर्शित किया कि यदि पृथक्कृत हरितलवकों को इलेक्ट्रॉन ग्राही की उपस्थिति में प्रतिदीप्त किया जाए तो वह ऑक्सीजन मुक्त करते हैं तथा इलेक्ट्रॉन ग्राही अपचयित हो जाते हैं। इस अभिक्रिया को हिल प्रतिक्रिया कहते हैं। इसके द्वारा जल (प्रकाश अपघटन) को इलेक्ट्रॉन के स्रोत के रूप में प्रयोग करके कार्बन स्थिरीकरण द्वारा ऑक्सीजन एक उपोत्पाद के रूप में मुक्त होती है।

    प्रकाश संश्लेषण का रासायनिक समीकरण 

    CO2 के 6 अणु, पानी (H2O) के 12 अणुओं के साथ सौर ऊर्जा की सहायता से जुड़ जाते हैं| परिणामस्वरूप कlरबोहाइडरेट (C6H12O6)  या शर्करा का 1 अणु, सांस लेने लायक ऑक्सीजन और पानी के 6 अणुओं के साथ मिलता है।

    इस प्रक्रिया का सबसे प्रमुख घटक क्लोरोफिल है जो हर प्रकार के पौधों में पायी जाती है। इनका मुख्य काम सूर्य की रौशनी को सोखने का होता है। यह हरे रंग की होती है सूर्य के किरणों के लाल और नीले रंगो को सोख  लेते हैं। इसका एक बैक्टीरियल संस्करण भी होता है जिसको बक्टेरिओक्लोरोफिल कहते  हैं|

    प्रकाश-संश्लेषी वर्णक (Photosynthetic Pigments)

    1. क्लोरोफिल-a, b, c, d तथा e प्रकार के होते हैं और मुख्य सौर ऊर्जा अवशेषी वर्णक हैं।

    2. कैरोटिनॉइड्स अर्थात् कैरोटीन एवं जेन्थोफिल, जिसमें कैरोटीन नारंगी और पीले रंग के होते हैं। हरे पौधों में β-कैरोटीन प्रमुखता से पाया जाता है। जन्तु β-कैरोटीन को विटामिन-A में बदल देते हैं। जैन्थोफिल पौधों के हरे भागों में कैरोटीन के साथ पाए जाते हैं।

    कैरोटिनॉइड्स सहायक वर्णक है तथा प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित कर क्लोरोफिल को स्थानान्तरित कर देते हैं।

    3. फाइकोबिलिन लाल फाइकोइरिथ्रिन तथा नीला फाइकोसायनिन प्रमुख फाइकोबिलिन है। यह सहायक वर्णक है, जो प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित कर क्लोरोफिल को देते हैं।

    प्रकाश-संश्लेषण क्रिया (Photosynthesis Process)

    यह क्रिया एक उपचयन-अपचयन (oxidation redution) अभिक्रिया है। इसमें जल का उपचयन ऑक्सीजन के बनने में तथा कार्बन डाइऑक्साइड का अपचयन शर्करा के निर्माण में होता है।

    प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया दो अवस्थाओं में होती हैं

    1. प्रकाशिक अभिक्रिया 2. अप्रकाशिक अभिक्रिया।

    प्रकाशिक अभिक्रिया (Light Reaction)

    यह अभिक्रिया प्रकाश की उपस्थिति में हरितलवक के ग्रेना में होती है। इसे हिल अभिक्रिया भी कहते हैं प्रकाशिक अभिक्रिया के सम्बन्ध में रॉबर्ट इमर्सन ने विभिन्न तरंगदैथ्यों के प्रकाश में क्वाण्टम अर्थात् प्रत्येक क्वाण्टम उपलब्धि उपभोग से मुक्त हुए ऑक्सीजन अणुओं की संख्या, ज्ञात की और यह बताया कि 680 nm से अधिक तरंगदैर्ध्य में क्वाण्टम उपलब्धि में कमी आ जाती है। यह कमी दृश्य प्रकाश के लाल क्षेत्र में होने के कारण रेड ड्रॉप कहलाती है। यदि 680 nm से अधिक तरंगदैर्ध्य के साथ लघु तरंगदैर्ध्य भी दे दी जाए तो प्रकाश-संश्लेषण की दर दोनों अलग-अलग तरंगदैर्ध्या में कुल दर की तुलना में बढ़ जाती है। इसे ही इमरसन प्रभाव कहा जाता है।

    प्रकाश अभिक्रिया में दो वर्णक तन्त्र भाग लेते हैं, जो क्रमशः वर्णक तन्त्र (pigment system I) तथा वर्णक तन्त्र ।। (pigment system II) कहलाते हैं।

    P700 वर्णक तन्त्र I का प्रतिक्रिया केन्द्र है, जिसमें प्रकाश-रासायनिक क्रिया होती है अर्थात् यहाँ से उच्च उर्जा इलेक्ट्रॉन का उत्सर्जन होता है। वर्णक तन्त्र । का उपयोग चक्रीय प्रकाश फॉस्फोरिलेशन तथा अचक्रीय प्रकाश की फॉस्फोरिलेशन दोनों में होता है। वर्णन तन्त्र ।। 600mµ की लघु तरंगदैर्घ्य अवशोषित करता है। इस तन्त्र के प्रमुख वर्णक क्लोरोफिल-b तथा फाइकोबिलिन्स है। इस वर्णक तन्त्र का उपयोग केवल अचक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलेशन में होता है।

    ग्रेना के प्रमुख कार्य क्या होते है ?

    1. सूर्य प्रकाश से क्लोरोफिल के इलेक्ट्रॉन उत्तेजित होकर अपनी कक्षा छोड़ देते हैं। जब ये इलेक्ट्रॉन इस ऊर्जा को मुक्त करते हैं तो ADP + P संयुक्त होकर ATP बनाते है इस प्रकार सूर्य का प्रकाश ऊर्जा रसायनिक ऊर्जा में बदल जाती है।

    2. उत्तेजित इलेक्ट्रॉनों द्वारा जल का हाइड्रोजन आयन (H+) और हाइड्रॉक्सिल (OH) आयनों में अपघटन हो जाता है। जल के अपघटन के लिए ऊर्जा प्रकाश द्वारा मिलती है। इस प्रक्रिया के अन्त में ऊर्जा के रूप में ATP तथा NADPH निकलता है, जो अप्रकाशिक क्रिया में मदद करते हैं। इसमें ऑक्सीजन की विमुक्ति जल से होती है न कि Co2 से। इस प्रकार प्रकाशिक क्रिया से (1) ATP बनते हैं (2) NADPH2 बनता है (3) O2 विमुक्त होती है।

    अप्रकाशिक अभिक्रिया (Dark Reaction) C3

    इस क्रिया में प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती है। यह क्लोरोप्लास्ट (हरितलवक) के स्ट्रोमा में होती है। इस अभिक्रिया के लिए ऊर्जा प्रकाश अभिक्रिया से मिलती है। इस अभिक्रिया में प्रकाश अभिक्रिया के क्रम में उत्पन्न NADPH एवं ATP दोनों ही अणुओं का उपयोग कार्बन डाइऑक्साइड से कार्योहाइड्रेट के संश्लेषण के लिए किया जाता है।

    मैल्विन कैल्विन एवं बेन्सन ने कैल्विन चक्र (C3 चक्र) की खोज की। इसमें राइबुलोज वाई फॉस्फेट CO2 को ग्रहण कर फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल का संश्लेषण होता है। यह प्रथम उत्पाद है।

    हैच एवं स्लैक ने एकबीजपत्री पौधों (जैसे-गन्ना, मक्का, साइप्रस आदि) में C4 चक्र की खोज में इसका प्रथम स्थायी उत्पाद 4-C यौगिक ऑक्सेलो एसोटिक अम्ल है। इसमें पर्णमध्योतक कोशिकाएँ तथा पूलाच्छद कोशिकाएँ भाग लेती हैं।

    C3 पौधों में प्रकाश-श्वसन उपस्थित होता है, जबकि C4 पौधों में अनुपस्थित होता है।

    C3 पादपों में CO2 उपयोग की कम कार्यक्षमता के एक अणु के स्थिरीकरण के लिए 3ATP व 2NADPH23 की आवश्यकता होती है, जबकि C4 पादपों में CO2 उपयोग की अधिक कार्यक्षमता, CO2 के एक अणु के स्थिरीकरण के लिए 5ATP व दो NADPH2 की आवश्यकता होती है।

    मांसलोद्भिद् पौधों, जैसे-नागफनी, अजूबा, अगेव, क्लेचू में CO2 स्थिरीकरण रात में होता है इसे CAM (क्रेसुलेसिन एसिड मेटाबॉल्जिम) कहते हैं।

    प्रकाश-संश्लेषण को प्रभावित करने वाले कारक

    1. प्रकाश लाल तरंगदैर्ध्य में प्रकाश-संश्लेषण की दर अधिकतम उसके बाद नीला तथा हरे तरंगदैर्ध्य में सबसे कम होती है। इसके अलावा पीली और अवरक्त प्रकाश में यह क्रिया बिल्कुल ही नहीं होती है।

    2. CO2 वायुमण्डल में CO2 की मात्रा बढ़ने पर प्रकाश-संश्लेषण की दर बढ़ जाती है।

    3. तापमान पौधों में प्रकाश-संश्लेषण की दर 10°C से 35°C तापमान तक बढ़ती है। इससे अधिक ताप पर एन्जाइम का विकृतिकरण (denaturation) हो जाता है।

    4. प्रकाश तीव्रता प्रकाश की निम्न तीव्रता पर प्रकाश-संश्लेषण की दर बढ़ती है और जैसे-जैसे तीव्रता उच्च होती है, यह घटती है।

    5. ऑक्सीजन C3 पौधों में विशेषकर अधिक तापमान पर ऑक्सीजन प्रकाश-संश्लेषण के दर को कम करती है।

    6. वायुमण्डलीय प्रदूषक SO2, ओजोन, CO आदि प्रकाश-संश्लेषण दर को कम करता है।

    7. खनिज लवण Mg, Mn, Fe, N, S, की कमी से प्रकाश-संश्लेषण की दर घटती है।

    8. प्रकाश-संश्लेषी उत्पाद प्रकाश-संश्लेषी अन्तिम उत्पाद (मण्ड) के कोशिका में संचय होने से प्रकाश-संश्लेषी दर घट जाती है।

  • पोषण किसे कहते हैं | पादपों में पोषण (Nutrition in Plants) | नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation)

    पोषण किसे कहते हैं | पादपों में पोषण (Nutrition in Plants) | नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation)

    विभिन्न उपापचयी क्रियाओं के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा जीवों को खाद्य पदार्थों के ऑक्सीकरण से प्राप्त होती है। पोषण उन सभी क्रियाओं का योग है, जिसमें भोजन का अन्तर्ग्रहण, पाचन, अवशोषण तथा वहिष्करण होता है।

    पादपों में पोषण (Nutrition in Plants)

    विधि के आधार पर पौधों को दो भागों स्वपोषित तथा परपोषी अथवा विषमपोषी पौधे में बाँटा गया है।

    स्वपोषित पौधे (Autotrophic Plants)

    अधिकांश पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में पर्णहरित (Chlorophyl) की सहायता से वायुमण्डल से CO2 और भूमि से जल ग्रहण कर प्रकाश-संश्लेषण द्वारा कार्बनिक भोज्य पदार्थ बना लेते हैं। ये पौधे जड़ों द्वारा भूमि से विभिन्न खनिज पोषकों का अवशोषण करते हैं।

    परपोषित पौधे (Heterotrophic Plants)

    पर्णहरित की अनुपस्थिति के कारण ये पौधे अपना भोजन स्वयं नहीं बना पाते हैं। अत: ये अपना भोजन अन्य स्रोतों से प्राप्त करते हैं।

    भोजन स्रोत के आधार पर परपोषित पोधों के प्रकार

    1. परजीवी (Parasitic) 2. मृतोपजीवी (Saprophytic) 3.  सहजीवी (Symbiotic 4. कीटभक्षी (Insectivorous)

    परजीवी पौधे (Parasitic Plants)

    परजीवी पौधे अपने भोजन के लिए दूसरे जीवित पौधों अथवा जन्तुओं पर निर्भर रहते हैं। परजीवी पौधे के शरीर का कोई भी भाग परजीवी मूल (Haustorium) में रूपान्तरित हो जाता है और पोषक से भोज्य पदाथों का अवशोषण करता है।

    मृतोपजीवी पौधे (Saprophytic Plants)

    इस प्रकार के पौधों में पोषण जीवों के मृत, सड़े हुए शरीर से अपना भोजन प्राप्त करते हैं। अनेक कवक तथा जीवाणु मृतोपजीवी होते है।

    सहजीवी पौधे (Symbiotic Plants)

    इसके अन्तर्गत दो पौधे एक-दूसरे का पूरक बनकर एक-दूसरे को लाभ पहुँचाते हुए जीवित रहते हैं। इसके अन्तर्गत लाइकेन (शैवाल और कवक) सहजीवी के रूप में, मुख्य रूप से आते हैं, जिसमें कवक को शैवाल से पोषण की प्राप्ति तथा शैवाल को कवक से कवक जाल द्वारा सुरक्षा प्रदान किया जाता है। लेग्युमिनोसी कुल के पौधों की जड़ों के गाँठ में पाए जाने वाले राइजोबियम बैक्टीरिया भी सहजीवी के उदाहरण हैं, जिसमें उसे उस पौधों से पोषक तत्व प्राप्त होते हैं तथा पौधे को नाइट्रोजन तत्व की प्राप्ति होती है।

    कीटभक्षी पौधे (Insectivorous Plants)

    इस प्रकार के पौधे आंशिक रूप से स्वपोषी तथा परपोषी दोनों होते हैं। इसका आशय यह है कि ये पौधे पर्णहरित की उपस्थिति के कारण

    अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं, परन्तु नाइट्रोजन की पूर्ति कीटों को पकड़कर तथा उनका पाचन कर पूरी करते हैं।

    पौधों में पोषण के लिए अनिवार्य तत्व

    डी. साउसर ने बताया कि पौधे खनिज पदार्थों पर निर्भर हैं और खनिज पदार्थों को मूल तन्त्र द्वारा मिट्टी से शोषित करते हैं। खनिज तत्वों को दो समूहों में रखते हैं।

    अत्यावश्यक तत्व C, H, O, N, P, K, Mg, Ca, S (कुल = 9 तत्व)

    कम आवश्यक तत्व Zn, Cu, Mn, Fe, B, Cl, Mo आदि

    नाइट्रोजन पोषण

    पौधों को न्यूक्लिक अम्ल, प्रोटीन तथा अन्य नाइट्रोजन युक्त पदार्थों के संश्लेषण हेतु नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है, यद्यपि 78% नाइट्रोजन वायुमण्डल में है, किन्तु पौधे वातावरण से सीधे नाइट्रोजन को गैसीय रूप में ग्रहण नहीं कर सकते हैं बल्कि नाइट्राइट (NO2), नाइट्रेट (NO3) व अमोनियम (NH4+) के रूप में प्राप्त करते हैं। इसलिए नाइट्रोजन के यौगिकीकरण (nitrogen fixation) का पौधों के लिए महत्त्व है।

    नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation)

    वायुमण्डल की मुक्त नाइट्रोजन जैविक और अजैविक विधियों द्वारा विभिन्न यौगिकों में बदल जाती है अजैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण बादलों में बिजली के चमकने से होता है।

    जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण दो प्रकार से होता है

    असहजीवी नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Asymbiotic Nitrogen Fixaton)

    मिट्टी में स्वतन्त्र रूप से पाए जाने वाले अवायवीय (anaerobic) जीवाणु; जैसे-क्लॉस्ट्रिडियम, वायवीय (aerobic) जीवाणु; जैसे- एजोटोबैक्टर स्वतन्त्र नीले-हरे शैवाल; जैसेनॉस्टॉक, एनाबीना आदि स्वतन्त्र नाइट्रोजन का। स्थिरीकरण करने में सक्षम होते हैं क्योंकि वे अपने निफ जीन (नाइट्रोजन स्थिरीकारक जीन) की सहायता से नाइट्रोजिनेस नामक एन्जाइम का संश्लेषण कर लेते हैं जो उत्प्रेरक का कार्य करता है।

    नाइट्रोजीनेस एन्जाइम नाइट्रोजन को अमोनियम यौगिकों में अपचयित करने की क्षमता रखता है।

    सहजीवी नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Symbiotic Nitrogen Fixation)

    राइजोबियम लेग्युमिनोसेरम नामक जीवाणु लेग्युमिनोसी कुल के पौधों (जैसे-चना, मटर, मूंगफली आदि) की जड़ में प्रवेश कर ग्रन्थिकाएँ बनाता है, जिसमें लाल रंग का वर्णक लैगहीमोग्लोबिन पाया जाता है, जो प्रकृति से नाइट्रोजन लेकर नाइट्रेट में बदल देते हैं।

    अमोनीकरण (Ammonification)

    जीवाणु; जैसे – बैसिलस रेमोसस, बैसिलस वल्गेरिस तथा बैसिलस मायकॉइड्स द्वारा पौधे तथा जन्तुओं के मृत शरीर की प्रोटीन से अमोनिया बनाने की क्रिया अमोनीकरण कहलाती है।

    नाइट्रीकरण (Nitrification)

    पुष्पी पादप नाइट्रेट (NO3) आयनों का अवशोषण करते हैं। नाइट्रोसोमोनास अथवा नाइट्रोसोकोकस नामक जीवाणु अमोनियम आयनों (NH4+) का ऑक्सीकरण करके उन्हें (NO2) (नाइट्राइट) आयन में परिवर्तित कर देता है। फिर नाइट्रोबैक्टर नामक जीवाणुओं द्वारा इनको नाइट्रेट (NO3) में बदलने की क्रिया नाइट्रीकरण कहलाती है।

    विनाइट्रीकरण (Denitrification)

    कुछ जीवाणु; जैसे – थायोबैसिलस डीनाइट्रीफिकेंस, स्यूडोमोनास डीनाइट्रीफिकेन्स आदि नाइट्रोजन और अमोनियम यौगिकों को नाइट्रोजन में परिवर्तन कर देते हैं, जो पुन: वायुमण्डल में पहुँच जाती है। इसी तरह में नाइट्रोजन चक्र चलता रहता है।

    विभिन्न तत्त्वों के कार्य तथा कमी के प्रभाव

    तत्वस्त्रोंत विशेष कार्य न्यूनता लक्षण 
    NNO2, NO3या NH4+ प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल, हॉर्मोन, विटामिन, हरितलवक तथा ATP के निर्माण में।हरिमाहीनता तथा स्तम्मित वृद्धि। 
    KK+रन्ध्र के खुलने तथा बन्द होने की क्रिया में महत्त्वपूर्ण योगदान। कोशिका को स्फीत बनाए रखने में, प्रोटीन संश्लेषण में।पत्तियों के किनारे पीले पड़ जाते हैं। ऊतकक्षयी क्षेत्र बनते हैं, पत्तियों नीचे की ओर मुड़ जाती हैं तथा तना कमजोर हो जाता है।
    PH2PO4कोशिका झिल्ली, प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल आदि का मुख्य अवयव।वृद्धि निरुद्ध हो जाती है। पत्तियाँ हरे रंग की होती हैं। काल पूर्व मृत्यु।
    CaCa2+झिल्ली की विभेदी पारगम्यता बनाए रखने में, कुछ एन्जाइम को क्रियाशील करने में तथा मिडिल लेमेला में कैल्शियम पेक्टेट के रूप में।स्तम्भित वृद्धि, युवा पत्तियाँ कुरुना (molted) हो जाती हैं, पौधे स्थायी रूप से मुरझा जाते हैं।
    MgMg2+फॉस्फेट उपापचय में एन्जाइम क्रियाशील करने के लिए, राइबोसोम को जोड़ने में, पर्णहरिम का मुख्य अवयव।हरिमाहीनता, ऊतकक्षयी क्षेत्र, एन्थोसायनिन का बनना। 
    SSO2+ 4प्रोटीन, विटामिन, फेरोडोक्सिन आदि का मुख्य घटकनई पत्तियों में हरिमाहीनता, तना सख्त, मूल तन्त्र अधिक विकसित।
    FeFe3+फेरोडोक्सिन, साइटोक्रोम आदि में, केटालेज एन्जाइम को क्रियाशील करने में तथा क्लोरोफिल के संश्लेषण में।हरिमाहीनता, शिराएँ गहरे हरे रंग की, वृन्त छोटे तथा क्लोरोफिल नहीं बनता है।
    MnMn2+कार्बोक्सीलेज एन्जाइम को क्रियाशील करने में।हरिमाहीनता तथा ऊतकक्षयी क्षेत्र, क्लोरोफिल नहीं बनता है।  
    BBO3-3 याB4O2-7परागकणों के अंकुरण में, कोशिका विभेदन में तथा कार्बोहाइड्रेट स्थानान्तरण में।ब्राऊन हार्ट रोग, शिखाग्र काले, पत्तियाँ ताम्रक तथा भंगुर हो जाती है।
    CuCu2+एन्जाइम क्रियाशीलता में।शीर्ष ऊतकक्षयी, प्ररोह डाइ बैक रोग।
    ZnZn2+ऑक्सिन संश्लेषण में।पत्तियाँ हरिमाहीन विकृत, पर्व छोटे, पुष्पन निरुद्ध।
    ClClNa+ तथा K+ के धनायन तथा ऋणायन सन्तुलन बनाए रखने में, प्रकाश-संश्लेषण में ऑक्सीजन के निकलने की क्रिया में।जड़ें छोटी, पत्तियाँ हरिमाहीन तथा ऊतक्क्षयी क्षेत्र बनते हैं।
  • पेगासस क्या है ? इजराइल के NSO Group का ये स्पाईवेयर कैसे काम करता है? Pegasus सॉफ्टवेयर कैसे फोन के जरिए करता है लोगों की जासूसी

    पेगासस क्या है ? इजराइल के NSO Group का ये स्पाईवेयर कैसे काम करता है? Pegasus सॉफ्टवेयर कैसे फोन के जरिए करता है लोगों की जासूसी

    Pegasus एक जासूसी सॉफ्टवेयर (Spyware) का नाम है | जासूसी सॉफ्टवेयर होने की वजह से इसे स्पाईवेयर भी कहा जाता है | इसे इजरायली सॉफ्टवेयर कंपनी NSO Group ने बनाया है | इसे Trident और Q Suite जैसे अन्य नामों से जाना जाता है।

    क्या है पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus Spyware) ?

    यह सॉफ्टवेयर टारगेट के फोन में जाकर डेटा लेकर इसे सेंटर तक पहुंचाता है | इससे एंड्रॉयड (android) और आईओएस (IOS) दोनों को टारगेट किया जा सकता है| इस सॉफ्टवेयर के फोन में इंस्टॉल होते ही फोन सर्विलांस (surveillance) डिवाइस के तौर पर काम करने लगता है | इजरायली कंपनी के अनुसार इसे क्रिमिनल और टेररिस्ट को ट्रैक करने के लिए बनाया गया है | कंपनी इसे सिर्फ सरकारों (governments) को ही कंपनी बेचती है | इसके सिंगल लाइसेंस के लिए 70 लाख रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं | फोन की खामी का फायदा उठा Pegasus को इंस्टॉल किया जाता है | इसके लिए कई तरीकों का यूज किया जाता है | Pegasus Spyware कई देशों की कानूनी और इंटेलिजेंस एजेंसियों को बेचा गया है |

    Pegasus के जरिए ग्लोबली 50,000 से ज्यादा फोन को टारगेट करने का आरोप है जिसमे 300 भारतीय भी शामिल हैं | Kaspersky का कहना है कि Android के लिए Pegasus जीरो-डे कमजोरियों पर निर्भर नहीं करता है। इसके बजाय, यह Framaroot नाम के एक प्रसिद्ध रूटिंग विधि का इस्तेमाल करता है।

    एनएसओ ग्रुप के अनुसार पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus Spyware) का इस्तेमाल

    एनएसओ ग्रुप अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर बताता है कि वह सरकारी एजेंसियों की मदद करने, आतंकवाद और अपराध को रोकने और उसकी जांच करने के लिए सॉफ्टवेयर बनाता है. कंपनी यह भी कहती है कि उसके पास संविदात्मक दायित्व हैं जिसके लिए उसके ग्राहकों को अपने उत्पादों के उपयोग को गंभीर अपराधों की रोकथाम और जांच तक सीमित करने की आवश्यकता है और यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनका उपयोग मानव अधिकारों का उल्लंघन करने के लिए नहीं किया जाएगा

    क्या कर सकता है पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus Spyware)?

    Pegasus spyware यूज़र के एसएमएस मैसेज और ईमेल को पढ़ने, कॉल सुनने, स्क्रीनशॉट लेने, कीस्ट्रोक्स रिकॉर्ड करने और कॉन्टेक्ट्स व ब्राउज़र हिस्ट्री तक पहुंचने में सक्षम है। यह हैकर फोन के माइक्रोफोन और कैमरे को हाईजैक कर सकता है, इसे रीयल-टाइम सर्विलांस डिवाइस में बदल सकता है। चूँकि पेगासस एक जटिल और महंगा मैलवेयर है, जिसे विशेष रुचि के व्यक्तियों की जासूसी करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, इसलिए औसत यूज़र्स को इसका टार्गेट होने का डर नहीं है।

    पेगासस पासवर्ड, कॉन्टैक्ट्स, टेक्स्ट मैसेज, कैलेंडर डिटेल्स और यहां तक कि मैसेजिंग ऐप का इस्तेमाल करके की गई वॉयस कॉल जैसी जानकारी चुरा सकता है। इसके अलावा, यह फोन के कैमरे और माइक्रोफ़ोन के साथ-साथ लाइव लोकेशन को ट्रैक करने के लिए जीपीएस का उपयोग करके भी जासूसी कर सकता है।

    पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus Spyware) को पहली बार कब खोजा गया था?

    पेगासस स्पाइवेयर को पहली बार 2016 में iOS डिवाइस में खोजा गया था और फिर Android पर थोड़ा अलग वर्ज़न पाया गया। Kaspersky का कहना है कि शुरुआती दिनों में, इसका अटैक एक एसएमएस के जरिए होता था। पीड़ित को एक लिंक के साथ एक SMS मिलता था। यदि वह उस लिंक पर क्लिक करता है, तो उसका डिवाइस स्पाइवेयर से संक्रमित हो जाता था।

    हालांकि, पिछले आधे दशक में, पेगासस सोशल इंजीनियरिंग पर निर्भर अपेक्षाकृत क्रूड सिस्टम से सॉफ्टवेयर के रूप में विकसित हुआ है, जो यूज़र के लिंक पर क्लिक किए बिना ही फोन का एक्सेस ले सकता है, या साइबर वर्ल्ड की भाषा में कहें, तो यह ज़ीरो-क्लिक एक्सप्लॉइट (exploit) करने में सक्षम है।

    पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus Spyware) फोन को कैसे संक्रमित करता है?

    पेगासस डिवाइस का एक्सेस इस तरह लेता है कि इसकी भनक यूजर तक को नहीं पड़ती | ज़ीरो-क्लिक एक्सप्लॉइट्स iMessage, WhatsApp और FaceTime जैसे लोकप्रिय ऐप में मौजूद बग्स पर निर्भर करते हैं, जो यूज़र के डेटा को प्राप्त और सॉर्ट करने का काम करते हैं और कभी-कभी ऐसा अज्ञात स्रोतों के जरिए होता है। इस बग्स का इस्तेमाल कर एक बार ब्रीच मिलने के बाद, पेगासस ऐप के प्रोटोकॉल का उपयोग करके डिवाइस में आसानी से घुसपैठ की जा सकती है।

    Zero-click exploits के अलावा, OCCRP ने एक अन्य तरीके के बारे में भी बताया है। रिपोर्ट का कहना है कि यह सॉफ्टवेयर डिवाइस का चुपचाप एक्सेस लेने के लिए “नेटवर्क इंजेक्शन” नाम के एक अन्य तरीके का उपयोग भी करता है। टार्गेट की वेब ब्राउज़िंग उन्हें विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए स्पैम लिंक पर क्लिक करने की आवश्यकता के बिना हमला करने के लिए खुला छोड़ सकती है। इसमें यूज़र के एक ऐसी वेबसाइट पर जाने का इंतज़ार किया जाता है, जो पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है। एक बार जब यूज़र किसी असुरक्षित साइट के लिंक पर क्लिक करता है, तो NSO Group का सॉफ्टवेयर फोन तक पहुंच प्राप्त कर लेता है और अटैक को ट्रिगर कर लेता है।

    क्या पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus Spyware) iPhone को भी हैक कर सकता है ?

    जुलाई 2021 में, मानवाधिकार समूह एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International) द्वारा गहन विश्लेषण के साथ-साथ प्रोजेक्ट पेगासस खुलासे के व्यापक मीडिया कवरेज हिस्से ने खुलासा किया कि पेगासस का अभी भी हाई-प्रोफाइल व्यक्तियों के खिलाफ व्यापक रूप से उपयोग किया जा रहा था। यह दिखाता है कि पेगासस आईओएस 14.6 तक के सभी updated IOS Versions को zero click iMessage exploit के माध्यम से हैक करने में सक्षम था।

    Amnesty International ने बताया था कि NSO Group के इस स्पाइवेयर ने नए आईफोन मॉडल, विशेष रूप से iPhone 11 और iPhone 12 को iMessage के जरिए Zero-click exploit कर दिया। स्पाइवेयर आईफोन में डाउनलोड किए गए एप्लिकेशन को कॉपी कर सकता है और ऐप्पल के सर्वर के जरिए खुद को पुश नोटिफिकेशन के रूप में ट्रांस्मिट कर सकता है। एनएसओ स्पाइवेयर द्वारा हजारों आईफोन हैंडसेट को संभावित रूप से प्रभावित किया गया है।

    पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus spyware) द्वारा जासूसी

    एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus spyware) का इस्तेमाल कथित तौर पर भारतीयों की जासूसी करने के लिए किया जाता था। 2019 में WhatsApp ने इस मामले को प्रकाश में लाया। उसने मई 2019 में भारत सहित दुनिया भर के 20 देशों में पत्रकारों, कार्यकर्ताओं, वकीलों और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों पर कथित तौर पर जासूसी करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पेगासस स्पाइवेयर के लिए इजरायली स्पाइवेयर निर्माता NSO ग्रुप पर मुकदमा दायर किया। WhatsApp ने खुलासा किया कि उसने कई भारतीय उपयोगकर्ताओं से संपर्क किया है, जिनके बारे में माना जाता है कि उनको पेगासस स्पाइवेयर का उपयोग करके अवैध जासूसी का लक्ष्य बनाया गया है।

    हालाँकि पेगासस के उपयोग के बारे में प्रतीत होने वाली पुष्टि व्हाट्सएप द्वारा एनएसओ समूह पर मुकदमा चलाने के बाद हुई। पेगासस के उपयोग पर लंबे समय से व्हाट्सएप साइबर हमले में संदेह किया गया था जिसे पहली बार 2019 में रिपोर्ट किया गया था।

    पेगासस स्पाइवेयर (Pegasus Spyware) द्वारा फोन के हैक होने पर पता लगाने का कोई तरीका?

    संगठित अपराध और भ्रष्टाचार रिपोर्टिंग परियोजना (OCCRP) की रिपोर्ट है कि आखिरकार, जैसे-जैसे जनता इन तरीकों के बारे में अधिक जागरूक हो गई है और गलत स्पैम को बेहतर ढंग से पहचानने में सक्षम हो गई, ज़ीरो-क्लिक एक्सप्लॉइट्स से बचने के समाधान भी खोजे जा चुके हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल के शोधकर्ताओं ने एक टूल विकसित किया है, जो यह बता सकता है कि आपका फोन स्पाईवेयर से संक्रमित हुआ है या नहीं।

    मोबाइल वैरिफिकेशन टूलकिट (MVT) का उद्देश्य यह पहचानने में मदद करना है कि पेगासस ने डिवाइस को संक्रमित किया है या नहीं। यूं तो यह Android और iOS दोनों डिवाइसों पर काम करता है, लेकिन इसके लिए कुछ कमांड लाइन नॉलेज की आवश्यकता होती है। MVT के समय के साथ ग्राफिकल यूज़र इंटरफेस (GUI) प्राप्त करने की उम्मीद भी है, जिसके बाद इसे समझना और चलाना आसान हो जाएगा।

    क्या कंपनी पेगासस को बंद करने पर विचार कर रही है ?

    हाल ही में खबर आई थी कि NSO ग्रुप लिमिटेड पर अपने कर्जों के चलते डिफॉल्ट होने का खतरा मंडरा रहा है | ऐसे में कंपनी अपनी विवादित ‘पेगासस’ को बंद करने और उसे बेचने पर विचार कर रही है | हलाकि NSO के प्रवक्ता ने इस पर कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार किया | कंपनी पर दुनियाभर के तमाम देशों में यूजर्स के डेटा का गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगा है | आरोप है कि कंपनी ने डेटा को विभिन्न देशों की सरकारों को दिया, जिन्होंने राजनीतिक विरोधियों, पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की जासूसी करने में इसका इस्तेमाल किया |

  • Microsoft Activision Blizzard Deal                     माइक्रोसॉफ्ट और एक्टिविजन ब्लिजार्ड में हुई बड़ी डील, 68.7 अरब डॉलर में हुआ समझौता

    Microsoft Activision Blizzard Deal माइक्रोसॉफ्ट और एक्टिविजन ब्लिजार्ड में हुई बड़ी डील, 68.7 अरब डॉलर में हुआ समझौता

    माइक्रोसॉफ्ट ने घोषणा की है कि वह गेम पब्‍लिशर एक्टिविजन ब्लिजार्ड (Activision Blizzard) को 68.7 अरब डॉलर (लगभग 5,10,990 करोड़ रुपये) में खरीदेगी।

    गेमिंग की दुनिया की सबसे बड़ी डील?

    माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) ने घोषणा की है कि माइक्रोसॉफ्ट गेम पब्‍लिशर एक्टिविजन ब्लिजार्ड (Activision Blizzard) को 68.7 अरब डॉलर (लगभग 5,10,990 करोड़ रुपये) में खरीदेगी।

    माइक्रोसॉफ्ट की यह डील अगर सफल होती है तो यह डील कंपनी को निन्टेंडो (Nintendo) से भी बड़ी वीडियो-गेम कंपनी बना देगी।

    माइक्रोसॉफ्ट की एक्टिविजन के साथ डील को कंपनी की अब तक की सबसे बड़ी डील माना जा रहा है। यह माइक्रोसॉफ्ट की पिछले 46 साल की सबसे बड़ी डील है। माइक्रोसॉफ्ट इस डील के लिए प्रति शेयर 95 डॉलर का भुगतान करेगा। ऐसा माना जा रहा है कि माइक्रोसॉफ्ट मेटावर्स की दुनिया में खुद को मजबूत बनाने के लिए इस तरह की डील करेगी।

    Xbox गेमिंग सिस्टम बनाने वाली ‘Microsoft’ ने कहा है कि कैंडी क्रश, कॉल ऑफ ड्यूटी, ओवरवॉच और डियाब्लो जैसे गेम बनाने वाली कंपनी को हासिल करना गेमर्स के लिए अच्छा होगा। कंपनी मेटावर्स के लिए भी अपनी महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाएगी।

    जानते है क्या यह डील गेमर्स के लिए अच्छी साबित होगी?

    इस बारे में एनालिस्‍ट विल मैककॉन-वाइट ने कहा कि ‘Microsoft इंटलेक्‍चुअल प्रॉपर्टी की अपनी वैराइटी को बढ़ाना चाहती है। उनका टारगेट वीडियो गेम को व्यापक ऑडियंस तक पहुंचाना है।’

    दूसरी ओर, माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनी द्वारा गेम के कंटेंट को कंट्रोल करने की संभावना भी है। इससे यह चिंता पैदा होती है कि क्या कंपनी एक्टिविजन ब्लिजार्ड द्वारा बनाए गए गेम्‍स को अपने कॉम्‍पिटिटर्स के लिए प्रतिबंधित कर सकती है।

    एनालिस्‍ट माइकल पच्टर कहते हैं कि Microsoft अपनी Xbox सब्‍सक्रिप्‍शन सर्विस में एक्टिविजन ब्लिजार्ड के गेम्‍स ला सकती है। इनमें से कुछ एक्सक्लूसिव हो सकते हैं। हालांकि उनका कहना है कि एंटीट्रस्‍ट रेगुलेटर माइक्रोसॉफ्ट को सोनी के प्लेस्टेशन से इन गेम्‍स को दूर रखने की अनुमति नहीं देंगे।

    माइक्रोसॉफ्ट और मेटा

    माइक्रोसॉफ्ट ऐसा कहता है। कुछ ऐसे तरीके भी हैं जिनसे कंपनी को मेटा जैसे कॉम्पिटिटर्स के साथ प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिल सकती है। 

    इस डील को रेगुलेटर और कॉम्‍पिट‍िटभी र्स द्वारा रोकने के लिए दबाव बना सकते हैं। बाकी टेक कंपनियों जैसे- मेटा, गूगल, एमेजॉन और ऐपल ने अमेरिका और यूरोप में एंटीट्रस्ट नियामकों का ध्यान आकर्षित किया है। लेकिन ‘एक्टिविजन ब्लिजार्ड’ डील इतनी बड़ी है कि माइक्रोसॉफ्ट खुद ही रेगुलेटर की नजर में आ जाएगी। 

    माना जा रहा है कि इस डील से माइक्रोसॉफ्ट को एक्टिविजन के करीब 40 करोड़ मासिक गेमिंग यूजर्स मिलेंगे।

    इस डील के बाद माइक्रोसॉफ्ट को उम्मीद है कि कंपनी Xbox कंसोल के कारोबार का तेज विस्तार कर सकेगी। और प्रतिद्वंद्वी सोनी कॉर्प के PlayStation के साथ बेहतर प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिलेगी। Xbox के साथ एक्टिविज़न का एक लंबा इतिहास रहा है।

  • जैव विकास तथा जैव विकास के सिद्धांत (Bio Evolution and theories of Bio Evolution)

    जैव विकास तथा जैव विकास के सिद्धांत (Bio Evolution and theories of Bio Evolution)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की जैव विकास ((Bio evolution) क्या है ? जैव विकास के प्रमुख सिद्धांत (theories of Bio evolution) क्या है ? जीवन का विकास क्या है ? जैव विकास के संबंधित प्रमुख परिकल्पनाएँ कोन – कोनसी है ? जैव विकास के प्रमुख आधार क्या है ? जैव विकास की विशेषताएं क्या है ? आनुवंशिकता एवं जैव विकास के बीच संबंध क्या है ? आदि

    जीवन की उत्पत्ति (Origin of Life) और जैव विकास (Bio evolution)

    जैव विकास एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में होने वाला आनुवंशिक (Genetic) परिवर्तन है। पृथ्वी के प्रारंभ से ही निम्नकोटि के जीवों का क्रमिक परिवर्तनों द्वारा निरंतर अधिकाधिक जटिल जीवों की उत्पत्ति वास्तविक रूप से जैव विकास ही है। जैव विकास के अनुसार पृथ्वी पर पहले की पूर्वज जातियों के जैव विकास के द्वारा ही, नई-नई जातियां उत्पन्न हुई और हो रही हैं। 

    पृथ्वी का उद्गम लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व हुआ, जबकि इस पर जीवन की उत्पत्ति लगभग 3.5 – 4 अरब वर्ष पूर्व हुई। जीवन की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कई विचार धाराएं प्रचलित हैं, अरस्तू द्वारा प्रतिपादित स्वत:जनन के सिद्धान्त के अनुसार, निम्न वर्ग के जीवधारी निर्जीव पदार्थों से स्वतः पैदा हो जाते हैं।

    17 वीं शताब्दी के दौरान फ्रांसिस्को रेड्डी ने दो अलग-अलग बर्तनों, जिनमें एक खुला तथा दूसरा बन्द उसमें मांस का नमूना रखा। इस परीक्षण के निष्कर्ष में खुले बर्तन वाले मांस में कीड़े दिखाई दिए, जवकि बन्द बर्तन में नहीं। इससे अरस्तू के जीवन की स्वत: उत्पत्ति सिद्धान्त कमजोर पड़ा फिर लुई पाश्चर के प्रयोग से स्वत: जनन सिद्धान्त धराशायी हो गया। जीवन की उत्पत्ति के सम्बन्ध में ओपेरिन एवं हेल्डेन द्वारा आधुनिक सिद्धान्त, प्रकृतिवाद या जैव-रसायन विकास (Bio-chemical evolution) सिदान्त  प्रतिपादित किया गया।

    ओपेरिन ने 1936 में अपनी पुस्तक द ऑरिजिन ऑफ लाइफ (The Origin of Life) में इस सिद्धान्त का विस्तारपूर्वक वर्णन किया,  जिसके अनुसार आदिकाल में हाइड्रोजन गैस अधिक मात्रा में होने के कारण पृथ्वी का वायुमण्डल अपचायक था तथा इसमें ऑक्सीजन अनुपस्थित थी। तापमान कम होने पर हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, कार्बन आदि परमाणुओं के आपस में संयोग से इसके अणु बने। इस प्रक्रम में पहले जटिल कार्बनिक यौगिक तथा कोएसरवेट एवं न्यूक्लियोप्रोटीन्स का निर्माण हुआ।

    स्टैनले मिलर अपने विख्यात प्रयोग में उसने पृथ्वी के प्रारम्भिक वायुमण्डल जैसी स्थितियों को पैदा करते हुए एवं बन्द फ्लास्क (स्वान आकार के) में विद्युत धारा को अमोनिया, मीथेन, हाइड्रोजन और वाष्प के मिश्रण में से गुजारकर कार्बोहाइड्रेड एवं अमीनो अम्लों का मिश्रण प्राप्त किया। इन पदार्थों में अभिक्रिया के परिणास्वरूप पॉलीसैकेराइड, प्रोटीन, लिपिड एवं न्यूक्लिक अम्ल बने।

    न्यूक्लिक अम्ल में अभिक्रिया कर स्वप्रतिकृतियन की क्षमता थी। इनके विकास से निर्जीव एवं सजीव के बीच की एक सीमा निर्धारित हो गई और आगे चलकर प्रारम्भिक कोशिकाएँ, संश्लेषण वृद्धि तथा परिवर्धन करने लगी, जिसकी परिणति पोषण-विधियों के विकास के साथ सम्पन्न हुई। परजीविता, मृतजीविता, प्राणो सदृश पोषण विधियों के पश्चात् स्वपोषी पोषण विधि का भी विकास हुआ। ये स्वपोषी जीव दो प्रकार के रसायन-संश्लेषी तथा प्रकाश-संश्लेषी थे। इसकी अन्तिम कड़ी के रूप में वायुमण्डल का निर्माण हुआ तथा ऑक्सीजन की उपस्थिति से यह काफी महत्वपूर्ण हो गया।

    जैविक विकास (Biological Evolution) क्या है ?

    जीवन की उत्पत्ति आदिसागर के जल में न्यूक्लियोप्रोटीन्स के विषाणु, जैसे कणों के रूप में, आज से लगभग 3.7 अरब वर्ष पूर्व, पृथ्वी के इतिहास के प्रीकैम्ब्रियन महाकल्प में हुई और ये प्रारम्भिक जीव परपोषी एवं अवायवीय थे। इनकी कोशिका आज के विषाणु तथा माइकोप्लाज्मा के समान थी। कुछ समय संग्राहक का रूप ले लिया तथा आनुवंशिक कोड के बाद कोशिका के DNA ने आनुवंशिक सूचनाओं के द्वारा RNA एवं प्रोटीन-संश्लेषण से जुड़ गया।

    ऐसा माना जाता है कि प्रारम्भिक जीव रसायनी परपोषी थे, जो जटिल कार्बनिक पदार्थों के किण्वन से ऊर्जा प्राप्त करते थे। तदन्तर पर्णहरिम के विकास से प्रकाश-स्वपोषी जीवों का विकास हुआ। प्रारम्भिक प्रकाश-स्वपोषी-जीव-अवायवीय थे जो 3.5 अरब पूर्व वायवीय प्रकाश-स्वपोषी जीवों में रूपान्तरित हो गए।

    लिन मारगुलिस के अनुसार, कुछ अवायवीय परभक्षी के कोशिकाओं ने प्रारम्भिक वायवीय जीवाणुओं का भक्षण किया और प्रथम यूकैरियोटिक कोशिका बन गई। परभक्षी कोशिका, जिसने वायवीय जीवाणु तथा प्रकाश-संश्लेषी नीली-हरी शैवाल कोशिका का भक्षण किया। वह यूकैरियोटिक पादप कोशिका बन गई अर्थात् वायवीय जीवाणु माइटोकॉण्ड्रिया तथा नीले-हरे शैवाल हरितलवक के रूप में स्थापित हो गए।

    जैव विकास के सिद्धान्त (Theories of Organic Evolution)

    जैव विकास एक विकासीय घटना है, जो क्रमिक एवं सतत् प्रक्रिया के अनुरूप सरल से जटिल जीवों की ओर होती है। जीवन की उत्पत्ति से संबंधित सबसे प्राचीन परिकल्पना, स्वतः उत्पादन की है, जबकि आधुनिक परिकल्पना प्रकृतिवाद की है। 

    इसके अन्तर्गत उपार्जित लक्षणों की वंशागति पर आधारित लैमार्कवाद, प्राकृतिक चयन सिद्धान्त पर आधारित डार्विनवाद तथा उत्परिवर्तन पर आधारित ह्यूगो डी व्रीज का सिद्धान्त प्रमुख रूप से शामिल है।

    लैमार्कवाद (Lamarckism) क्या है ?

    फ्रांसीसी वैज्ञानिक जीन बैप्टिस्ट डी लैमार्क ने 1809 ई. में फिलोसफी जूलोजिक (Philosophie Zoologique) नामक प्रसिद्ध पुस्तक में उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धान्त प्रस्तुत किया।

    इस सिद्धान्त के अनुसार, प्रत्येक जीव अपने जीवन काल में जिस वातावरण में रहता है, उसके प्रभाव से अनेक लक्षण उपार्जित करता है। यही उपार्जित लक्षण उसकी सन्तानों में पहुँच जाते हैं तथा धीरे-धीरे नई जाति (new species) बन जाती है। इस सिद्धान्त के अनुसार, जिस अंग का लगातार प्रयोग होता है वह धीरे-धीरे आकार में बढ़ जाता है तथा जिस अंग का प्रयोग नहीं होता है या काफी कम होता है उसका क्रमशः ह्यस होता जाता है तथा अन्त में वह समाप्त हो जाता है; जैसे-अवशेषी अंग।

    लैमार्क का सिद्धान्त मूलतः चार अवधारणाओं पर आधारित है, जो इस प्रकार हैं:

    बड़े होने की प्रवृति

    वातावरण का सीधा प्रभाव

    अंगों के उपयोग एवं उसके अनुप्रयोग का प्रभाव

    उपार्जित लक्षणों की वंशागति

    लैमार्क के अनुसार, वर्तमान जिराफों के पूर्वज छोटी गर्दन एवं छोटी टाँगों वाले थे तथा वृक्षों की पत्तियाँ खाते थे, जिसके लिए उसे गर्दन ऊपर करनी पड़ती थी। ऊँचे वृक्षों की पत्तियाँ खाने के प्रयास में जिराफ की गर्दन एवं अगली टाँगें लम्बी हो गईं। अत: इस आधार पर किसी अंग के सक्रियता से उस अंग का विकास होता है। अंगों के कम उपयोग का उदाहरण लैमार्क ने साँपों में दिया, जिनके पैर गायब हो गए।

    लैमार्कवाद की सबसे अधिक आलोचना जर्मन वैज्ञानिक वीजमान ने की, जिन्होंने अपने प्रयोग में 21 पीढ़ियों तक चूहों की पूँछ काटकर आपस में प्रजनन करवाया, परन्तु किसी भी पीढ़ी में पूंछ विहीन चूहे उत्पन्न नहीं हुए। इससे प्रमाणित होता है कि वातावरण से प्राप्त उपार्जित लक्षणों की वंशागति नहीं होती है। वीजमान ने जननद्रव्य की निरन्तरता का सिद्धान्त प्रतिपादित किया।

    जैव विकास के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

    * पेलिओजोइक महाकल्प को प्राचीन जीवन का उद्भव काल भी कहते हैं।

    * डेवोनियन कल्प को मछलियों का युग भी कहा जाता है।

    * कार्बोनिफेरस कल्प को उभयचरों का युग कहा जाता है।

    * मीसोजोइक महाकल्प को सरीसृपों का युग भी कहा जाता है।

    * सीनोजोइक महाकल्प को स्तनधारियों का युग भी कहा जाता है।

    * प्लीस्टोसीन युग को मानव युग कहा जाता है।

    डार्विनवाद (Darwinism) क्या है ?

    चार्ल्स डार्विन के जैव विकास के सम्बन्ध में विचार विस्तारपूर्वक उनकी पुस्तक ‘ओरिजिन ऑफ स्पीशीज बाइ नेचुरल सेलेक्शन’ (प्राकृतिक चयन द्वारा जातियों का विकास) में सन् 1859 में प्रकाशित हुए।

    डार्विनवाद के मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं:

    जीवों में सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता प्रत्येक जीव जाति में सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता होती है। उदाहरण के लिए, फल-मक्खी (ड्रोसोफिला) एक बार में 200 अण्डे देती हैं, जिससे 10-14 दिनों में वह मक्खियाँ बन जाती हैं। यदि सभी अण्डों से उत्पन्न मक्खियाँ जीवित रहें एवं जनन करें, तो 40-45 दिनों में इसकी संख्या लगभग 20 करोड़ हो जाएगी।

    जीवन संघर्ष सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता के बावजूद प्रकृति में प्रत्येक जाति के जीवधारियों की संख्या लगभग स्थिर रहती है। इसका कारण यह है कि जीवधारियों को अपने अस्तित्व को बनाए रखने, वृद्धि करने एवं जनन करने के लिए भोजन, प्रकाश, वास-स्थान, जनन के लिए साथी आदि की आवश्यकता होती है। परन्तु ये सब प्रकृति में सीमित हैं। अर्थात् जीवधारियों को पैदा होते ही इनके लिए संघर्ष करना पड़ता है।

    जैव विकास के बारे में डार्विन की व्याख्या का आधार एच एम एस बीगल नामक जहाज पर की गई समुद्री यात्रा के समय का प्राकृतिक अवलोकन एवं माल्थस का जनसंख्या सिद्धान्त था।

    अपनी यात्रा के दौरान डार्विन ने गैलापैगोज द्वीप समूह पर 20 प्रकार की चिड़ियाएँ देखीं। बाद ये चिड़ियाएँ डार्विन की फिन्चिस के नाम से प्रसिद्ध हुई।

    विभिन्नताएँ एवं उनकी वंशागति संसार में सभी जीवधारियों में विभिन्नताएँ पाई जाती हैं। एक ही माता-पिता की सन्तानें भी बिल्कुल एक जैसी नहीं होती हैं। विभिन्नताएँ केवल रंग रूप में ही नहीं बल्कि विभिन्न लक्षणों के लिए हो सकती हैं, जैसे-दौड़ने की शक्ति, रोगों से लड़ने की शक्ति, कार्य क्षमता आदि, जो भिन्नताएँ किसी जीवधारी का अस्तित्व बनाए रखने में सहयोगी होती हैं, ये लाभदायक विभिन्नताएँ अगली पीढ़ियों में पहुँचती हैं।

    योग्यतम की उत्तरजीविता व प्राकृतिक चयन जीवन संघर्ष में वही जीवधारी सफल होते है, जिनमें परिस्थितियों के अनुकूल विभिन्नताएँ होती है और जनन करके जनसंख्या में वृद्धि करते हैं। अधिक-से-अधिक अनुकूल लक्षणों वाले जीवधारियों (योग्यतम) का एक प्रकार से प्रकृति द्वारा चयन होता है। इसी को योग्यतम की उत्तरजीविता या प्राकृतिक चयन (Natural Selection) कहते हैं, जिसे हरबर्ट स्पेन्सर ने सामाजिक विकास के सन्दर्भ में योग्यतम की अतिजीविता (Survival of the Fittest) कहा।

    नई जातियों की उत्पत्ति वातावरण या परिस्थितियाँ निरन्तर बदलती रहती हैं। फलस्वरूप निरन्तर नए लक्षणों का प्राकृतिक चयन होता रहता है। उपयोगी विभिन्नताएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी इकट्ठी होती रहती हैं और काफी समय बाद (सैकड़ों-हजारों वर्षों बाद) उत्पन्न जीवधारियों के लक्षण मूल जीवधारियों से इतने भिन्न हो जाते हैं कि एक नई जाति बन जाती है।

    विभिन्नताओं के कारण, उत्पत्ति तथा आनुवंशिकता की व्याख्या न होने, अवशेषी अंगों की उपस्थिति न होने आदि के कारण डार्विनवाद की आलोचना की गई।

    नव-डार्विनवाद क्या है ?

    नव-डार्विनवाद के अनुसार लैंगिक जनन करने वाले जीवों की सन्तानों में उत्परिवर्तन के कारण विभिन्नताएँ होती हैं। प्रकृति इनमें से लाभदायक विभिन्नताओं का चयन करती है। एक जाति के विभिन्न समूहों के प्रजनन काल भिन्न होने के कारण लैंगिक पृथक्करण हो जाता है, जिसके फलस्वरूप नयी जातियों का विकास होता है। पेपर्ड मॉथ की ग्रे किस्म का औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् काली किस्म में रूपान्तरित होना प्राकृतिक चयन का उदाहरण है।

    ह्यूगो डी व्रीज का उत्परिवर्तन वाद  (Mutation Theory of Hugo de Vries)

    ह्यूगो डी वीज नामक वैज्ञानिक ने 1901 ई. में इवनिंग प्रिमरोज (ऑइनोथेरा लैमार्कियाना) में उत्परिवर्तन (mutation) की खोज की और उत्परिवर्तन सिद्धान्त दिया, जिसके अनुसार नई जाति की उत्पत्ति अचानक एक ही बार में होने वाली स्पष्ट एवं स्थायी (वंशागत) आकस्मिक परिवर्तनों (उत्परिवर्तनों) के कारण होती है।

    उत्परिवर्तन वाद सिदांत की प्रमुख विशेषताएं

    नई जातियों की उत्पत्ति एक ही बार में स्पष्ट एव स्थायी (वंशागत) आकस्मिक परिवर्तनों (उत्परिवर्तनों) के परिणामस्वरूप होती है, न कि छोटी-छोटी व अस्थिर विभिन्नताओं के प्राकृतिक चयन द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचय व क्रमिक विकास के फलस्वरूप है।

    सभी जीवधारियों में उत्परिवर्तन की प्राकृतिक प्रवृत्ति होती है, जो कभी कम या अधिक या लुप्त हो सकती है।

    उत्परिवर्तन अनिश्चित होते हैं। ये किसी एक अंग विशेष में अथवा अनेक अंगों में एक साथ ठत्पन्न हो सकते हैं। परिणामस्वरूप अंग अचानक लुप्त या अधिक विकसित हो सकते हैं।

    एक ही जाति के विभिन्न सदस्यों में विभिन्न प्रकार के उत्परिवर्तन हो सकते हैं।

    उपरोक्त उप्परिवर्तनों के परिणामस्वरूप अचानक ऐसे जीवधारी उत्पन्न हो सकते हैं, जो जनक से इतने अधिक भिन्न हों कि उन्हें नई जाति माना जा सके।

    प्रकृति में स्वयं होने वाले उत्परिवर्तन प्राकृतिक (spontaneous) तथा X-किरणों, α-किरणों, β-किरणों या रासायनिक पदार्थों (जैसे-मस्टर्ड गैस) आदि के द्वारा प्रेरित किए जाने वाले उत्परिवर्तन कृत्रिम (induced) कहलाते हैं।

    जाति निर्माण (Speciation)

    जाति अन्तः प्रजनन करने वाले ऐसे जीवों का समूह है, जो एक या अनेक जनसंख्याओं में रहते हैं।

    किसी जनसंख्या के सारे सदस्यों की जीन मिलकर उस जनसंख्या की जीन राशि (gene pool) बनाते हैं।

    एक जननिक रूप से समांग जनसंख्या का दो या अधिक जनसंख्याओं, जो आनुवंशिक रूप से भिन्न तथा जननिक पृथक्करण युक्त हो, में टूटना जाति निर्माण या स्पीसिएशन (speciation) कहलाता है।

    जाति निर्माण मुख्यतया दो प्रकार से होता है:

    एलोपैट्रिक स्पीसिएशन

    एक जाति को कुछ जनसंख्याओं का भौगोलिक पृथक्करण (geographical isolation) हो जाता है। हजारों वर्षों बाद ये दो जनसंख्याएँ विकास के क्रम में भिन्न हो जाती हैं। जब ये दो जनसंख्याएँ दोबारा सम्पर्क में आती हैं तब इनके बीच प्रजनन नहीं होता है। इस प्रकार प्रत्येक जनसंख्या एक नई जाति वन जाती है।

    सिम्पैट्रिक स्पीसिएशन

    जब एक जाति को, एक ही भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाली दो जनसंख्याएँ जननिक रूप से पृथक् हो जाती है, तब ये जनसंख्या धीरे-धीरे एक-दूसरे से भिन्न होती चली जाती हैं और अलग जातियाँ बन जाती हैं।

    जैव विकास के प्रमाण (Evidences of Organic Evolution)

    आकारिकी एवं शारीरिकी से प्रमाण

    समजात अंग (Homologous organs)

    ऐसे अंग, जो रचना और उत्पत्ति में समान परन्तु कार्य में भिन्न हो; जैसे-मेंढक, पक्षी एवं मनुष्य के अग्रपाद।

    समवृति अंग (Analogous organs)

    ऐसे अंग, जो समान कार्यों में उपयोग होने के कारण समान दिखाई पड़ते हैं, लेकिन उनकी मूल रचना एवं भ्रूणीय प्रक्रिया में भिन्नता पाई जाती है समवृति अंग कहलाते हैं; जैसे-पक्षियो एवं कीटों के पंखा

    अवशेषो अंग (Vestigial organs)

    वे अंग, जो वे पूर्वजों में कार्यशील थे, परन्तु वर्तमान में कार्यविहीन है; जैसे-साँपों के अल्पविकसित पाद, कोबी पक्षी के पंख, मनुष्य के त्वचा के वाल, वर्माफॉर्म एपेन्डिक्स आदि। जीवों में कभी-कभी अचानक कोई ऐसा लक्षण विकसित हो जाता है, जो वर्तमान जातीय लक्षण न होकर किसी निम्न वर्गीय पूर्वव जाति का होता है इसो क्रिया को प्रत्यावर्तन (atavism) कहते हैं।

    संयोजक जातियों से प्रमाण

    कुछ जीव-जन्तुओं में उनसे कम विकसित निन्न वर्गीय जातियों के तथा उनसे अधिक विकसित उच्च वर्गीय जातियों के लक्षणों का सम्मिश्रण पाया जाता है।

    उदाहरण             संयोजक कड़ी

    आर्किऑटेरिक्स – सरीसृपों एवं पक्षियों

    निओपिलिना   – मौलस्का एवं एनीलिडा

    पेरीपेटस      – एनीलिडा एवं ऑर्थोपोडा

    प्रोटोथीरिया    – सरीसृप एवं स्तनधारी

    यूग्लीना      –  पादप एवं जन्तु

    आनुवंशिकी से प्रमाण

    विभिन्न जातियों के सदस्यों में परस्पर संकरण जातियों के घनिष्ट विकासीय सम्बन्धों को प्रमाणित करता है, जैसे – घोड़े तथा गधे से वर्णसंकर खच्चर का बनना।

    तुलनात्मक कार्यिकी एवं जैव-रसायन से प्रमाण (Evidences from Comparative Physiology and Biochemistry)

    फ्लोकिन एवं वाल्ड ने जन्तुओं एवं पादपों की कार्यिकी एवं जैव-रसायन से सम्बन्धित प्रमाण प्रस्तुत किए

    प्रारम्भिक जीवों से लेकर जटिलतम स्तनियों तक जीवद्रव्य के समान रासायनिक संयोजन, प्रोटोजोआ से स्तनियों तक अधिकांश जन्तुओं में ट्रिप्सिन नामक एन्जाइम की उपस्थिति, एमाइलेस की उपस्थिति, सभी कशेरुकियों में थायरॉक्सिन हॉर्मोन की उपस्थिति तथा हीमोग्लोबिन से बनाए गए | हिमेटिन रवों की आकृति एवं माप में समानता, मानव व चिम्पैंजी में रुधिर सीरम प्रोटीन में समानता आदि जैव विकास को दर्शाते हैं।

    बायोजेनेटिक नियम अथवा पुनरावृत्ति सिद्धान्त या भ्रौणिकी से प्रमाण

    हैकेल ने इस सिद्धान्त को प्रतिपादित किया जिसके अनुसार, व्यक्तिवृत्त में जातिवृत्त की पुनरावृत्ति होती है अर्थात् जन्तु अपनी भ्रूणावस्था में पूर्वजों की अवस्थाओं को दोहराते हैं। (Ontogeny Repeats Phylogeny)

    जीवाश्म

    प्राचीन जीवों के शेष बचे भार्गों; जैसे – हड्डी दाँत, शैल आदि को जीवाश्म कहते हैं। ये मुख्यतया अवसादी चट्टानों में पाए जाते हैं। जीवाश्म की आयु यूरेनियम लैड विधि, रेडियोधर्मी कार्बन विधि, फिसन ट्रैक तथा इलेक्ट्रॉन चक्रण रेजोनेन्स आदि विधियों द्वारा ज्ञात की जाती है। कॉपोलाइट ऐसे जीवाश्म होते हैं, जिनमें जन्तुओं के मल में फॉस्फेट लवणों का संचय होता है।

    मानव का विकास (Human Evolution) – सम्पूर्ण जानकारी

    मानव या होमीनिड वंश, जो मनुष्य व कपियों के पूर्वज थे, का उद्भव आज से लगभग 2.4 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ। होमीनिड वंश का विकास एशिया तथा अफ्रीका में हुआ।

    * डार्विन ने अपनी पुस्तक ‘डेसेन्ट ऑफ मैन एण्ड सेलेक्शन इन रिलेशन टू सैक्स’ (Descent of Man and Selection in Relation to Sex) में मानव का विकास कपियों जैसे पूर्वज से होने के सिद्धान्त का वर्णन किया।

    * लिनियस ने मनुष्य को वानरों व कपियों के साथ रखा तथा उसे वैज्ञानिक नाम होमो सेपियन्स (Homo sapiens) दिया, जिसका अर्थ है –  बुद्धिमान प्राणी।

    मानव का वर्गीकरण

    संघ  – कॉर्डेटा

    वर्ग – स्तनधारी

    गण – प्राइमेट

    उपगण – एन्थ्रोपोइडिया

    कुल – होमीनिडी

    वंश – होमो

    जाति – सेपियन्स

    उपजाति – सेपिएन्स

    – गज-श्रूज (Elephant shrews) मानव के प्रारम्भिक पूर्वज माने जाते हैं।

    – गिब्बन भारत में पाया जाने वाला अकेला कपि है।

    • मानव व कपियों का विकास एक सम्मिलित पूर्वज से हुआ था।

    . प्रोप्लिओपिथेकस मानव-पूर्व पूर्वज है, जिसके जीवाश्म लगभग 3.5 करोड़ वर्ष पूर्व ओलिगोसीन युग की चट्टानों में मिले हैं। इसमें मनुष्य व कपि दोनों के लक्षण हैं।

    – मायोसीन में पाए जाने वाले कपि लिम्नोपिथेकस को गिब्बन का पूर्वज माना जाता है।

    आधुनिक चिम्पैन्जी का पूर्वज प्रोकोंसल को माना जाता है

    प्रोकोंसल के जीवाश्म लीकी द्वारा पूर्वी अफ्रीका से प्राप्त किए गए।

    ड्रायोपिथेकस (Dryopithecus)

    . ड्रायोपिथेकस अफ्रीकेन्स (Dryopithecus Africans) का जीवाश्म अफ्रीका और यूरोप की चट्टानों से प्राप्त हुआ ।

    • इसे मनुष्य एवं कपि दोनों का पूर्वज माना जाता है।

    • यह चिम्पैन्जी से करीबी समानता दिखाता है।

    • यह मायोसीन के समय 250 लाख साल पहले जीवित था।

    • यह शाकाहारी था और कोमल फलों व पत्तियों को खाता था।

    रामापिथेकस (Ramapithecus)

    लेविस (Lewis) ने 1932 में भारत की शिवालिक पहाड़ी की प्लीयोसीन चट्टानों से रामापिथेकस के जीवाश्म को खोजा।

    यह 14-15 मिलियन वर्ष पहले पश्च-मायोसीन से प्लायोसीन युग में जीवित था।

    रामापिथेकस अपनी पिछली टाँगों पर सीधा खड़ा होकर चलता था।

    यह आधुनिक मानव की तरह कठोर नट व बीज खाता था।

    ऑस्ट्रेलोपिथेकस (Australopithecus)

    इसे प्रथम कपि मानव माना जाता है।

    यह लगभग 4 से 1.5 मिलियन वर्ष पहले प्लीस्टोसीन युग के दौरान गुफाओं में रहता था।

    इसकी कपाल क्षमता 500-700 घन सेमी थी। .

    यह पूरी तरह द्विपद (bipedal) होमोनिड था।

    जबड़े तथा दाँत मनुष्य के समान थे और यह सर्वाहारी था। .

    इसकी खोज एल. बी. वी. लिकी ने की थी।

    जावा मानव (होमो इरेक्टस इरेक्टस)

    • जावा मानव का विकास पूर्व तथा मध्य प्लीस्टोसीन में लगभग 600000 वर्ष पूर्व हुआ।

    • इसका जीवाश्म जावा के त्रिनिल स्थान से प्राप्त हुआ, जिसे डुबॉइस ने खोजा।

    होमो इरेक्टस इरेक्टस नाम मेयर (1950) ने दिया।

    • इसके जबड़े बड़े तथा भारी लेकिन आधुनिक मानव के लगभग समान थे

    • इसकी कपाल क्षमता लगभग 40 घन सेमी थी।

     औसत शारीरिक सम्बाई 170 सेमी तथा भार 70 किग्रा था।

    यह सर्वाहारी था इसने सबसे पहले नि का उपयोग भोजन पकान, अपनी रक्षा करने तथा शिकार में किया था।

    पेकिंग मानव (होमो इरेक्टस पेकिनेंन्सिंस)

    पैकिंग मानत की खोज पाईनै 1924 में चीन के पैकिंग (बीजिंग) की।

    पैकिंग मानव के जीवाश्म लगभग 6 लाख वर्ष पुराने थे।

    इराकी कपाल गुहा का आयराम लगभग 850-1200 घन सेमी था।

    ये जावा मानव की तरह सर्वाहारी तथा कनीयल थे। इनमें ठोड़ी अनुपस्थित थी।

    ये पत्थर के औजारों को शिकार करने तथा अपनी रक्षा के लिए प्रयोग करते थे।

    निएन्डरथल मानव (होमो सेपियन्स निएन्डरथेलेन्सिस)

    जर्मनी की निएन्डर घाटी से 1856 में सी फूलरॉट ने निएन्डरथल मानव के जीवाश्म प्राप्त किए थे। ये सबसे पुराने जीवाश्म है।

    इनका विकास लगभग 150000 वर्ष पूर्व हुआ था और लगभग 25000 वर्ष पहले ये विलुप्त हो गए।  इनकी कपाल गुहा का आयतन 1450 घन सेमी था।

    इनका जबड़ा गहरा, ठोड़ी रहित और खोपड़ी की अस्थियाँ चौड़ी थी।

    ये सर्वाहारी और केनिबल थे और आग का प्रयोग खाना पकाने व गर्म रखने के लिए करते थे।

    ये वास्तविक मनुष्य थे, जिनमें संस्कृति की उत्पत्ति हुई और ये हथियार बनाना भी जानते थे।

    क्रो-मैग्नॉन मानव (होमो सेपियन्स फॉसिलिस)

    ये लगभग 50000 वर्ष पूर्व उत्पन्न हुए तथा 20000 वर्ष पूर्व विलुप्त हो गए। इनके जीवाश्म क्रो-मैग्नॉन (फ्रांस) के पत्थरों से मैक प्रीगर ने 1868 में प्राप्त किया।

    इनकी कपाल गुहा का आयतन 1660 घन सेमी था, जो कि आधुनिक मानव से भी अधिक था अर्थात् ये आधुनिक मानव से अधिक बुद्धिमान थे।

    ये गुफाओं में सुन्दर चित्रकारी करते थे। निएन्डरथल व क्रो-मैग्नॉन दोनों ही आधुनिक मानव के सीधे पूर्वज माने जाते हैं।

    आधुनिक मानव (होमो सेपियन्स)

    लगभग 10000 वर्ष पूर्व आखिरी हिम युग (glacial period) के पश्चात् आधुनिक मानव का विकास क्रो-मैग्नॉन मानव से हुआ।

    इनकी कपाल गुहा का आयतन लगभग 1460 घन सेमी होता है।

    इनमें सेरीब्रम अत्यधिक विकसित होता है। आधुनिक मानव की कुछ प्रजातियाँ निम्न हैं:

    (a) नीग्रोइड्स (Negroids)

    (b) कॉकेसोइड्स (Caucasoids)

    (c) मोन्गोलॉयड्स (Mongoloids)

    डॉ. शैपीरो के अनुसार, होमो सेपियन्स सेपियन्स धीरे-धीरे होमो सेपियन्स फ्युचुरिस में विकसित हो जाएगा इस मानव का मस्तिष्क अधिक उन्नत व जटिल होगा, सिर गुम्बद के आकार का होगा, यह अधिक लम्बा होगा तथा शरीर बाल रहित होगा।

  • आनुवंशिकता किसे कहते है ? आनुवंशिकी (Genetics) की परिभाषा क्या है ? hereditary meaning in Hindi | Biology in Hindi

    आनुवंशिकता किसे कहते है ? आनुवंशिकी (Genetics) की परिभाषा क्या है ? hereditary meaning in Hindi | Biology in Hindi

    इस आर्टिकल में हम जानेगे कि आनुवंशिकता क्या है ? आनुवंशिकी क्या है ? जेनेटिक्स के प्रमुख नियम क्या है ? आनुवंशिक विज्ञान किससे सम्बन्धी है ? मेण्डलवाद(Mendelism) क्या है और इसके प्रमुख नियम कोनसे है ? प्रभाविता का नियम का नियम क्या है ? पृथक्करण का नियम क्या है ? स्वतन्त्र अपव्यूहन का नियम क्या है ? प्रतीप संकरण (Back Cross) और परिक्षार्थ संकरण (Test Cross) क्या होते है ? जीनों में अन्योन्य क्रिया (Interaction in Genes) क्या होती है ? उत्परिवर्तन (Mutation) क्या है ? गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन (Chromosomal Mutation) क्या है ? जीन उत्परिवर्तन (Gene Mutation) क्या होते है ? DNA की संरचना (Structure of DNA) कैसी होती है ? सहलग्नता (Linkage) क्या होती है ? वर्णान्धता (Colour Blindness) क्या होती है ? वाटसन एवं क्रिक मॉडल क्या है ? और साथ ही हम बात करेगे की आनुवंशिक कोड (Genetic Code) क्या होते है और किस तरह महत्वपुर्ण होते है ? साथ ही हम जानेगे मानव जीनोम (Human Genome) क्या है और कैसे यह विज्ञान जगत में महत्वपुर्ण है ? आदि

    आनुवंशिकी Genetics

    जीव विज्ञान की वह शाखा जिसके अंतर्गत आनुवांशिक लक्षणों के संतान में पहुंचने की रीतियों एवं आनुवंशिक समानता एवं विभिन्नताओं का अध्ययन करते हैं आनुवंशिक विज्ञान या आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) कहलाती है।”

    प्रत्येक जीव में बहुत से ऐसे गुण होते हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी माता-पिता से उनकी संतानों में संचारित होते रहते हैं। ऐसे गुणों को आनुवंशिक गुण (Hereditary characters) या पैतृक गुण कहते हैं। जीवों के इन मूल गुणों का संचरण आनुवंशिकता कहलाता है। दूसरे शब्दों में वंशागत लक्षणों (Inherited Characters) का अध्ययन आनुवंशिकता (Heredity) कहलाता है। इसी के कारण ही प्रत्येक जीव के गुण अपने माता-पिता के गुणों के समान होते हैं।  

    जीवों में प्रजनन के द्वारा संतान उत्पन्न करने की अद्भुत क्षमता होती है। संतानों में कुछ लक्षण माता-पिता से पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचते रहते हैं, जिन्हें आनुवंशिक लक्षण कहते हैं। इन्हें आनुवंशिक गुण (Hereditary characters) या पैतृक गुण भी कहा जाता है | इन गुणों का संचरण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जनकों के युग्मकों (Gametes) के द्वारा होता है।

    डब्ल्यू वाटसन ने 1905 में सर्वप्रथम ‘जेनेटिक्स (Genetics)’ शब्द का प्रयोग किया। आनुवंशिकी के क्षेत्र में मार्गन, ब्रिजेज, मूलर, सटन, बीडल, नौरेनबर्ग एवं डॉ. हरगोविन्द खुराना का कार्य अविस्मरणीय है।

    आणविक आनुवंशिकी

    प्रत्येक जीव में गुणसूत्रों की संख्या निश्चित होती है। गुणसूत्र हिस्टोन प्रोटीन एवं न्यूक्लिक अम्ल (डीएनए व आरएनए) से बना होता है। डीएनए एवं आरएनए दोनों ही न्यूक्लियोटाइड के बहुलक होते हैं। न्यूक्लियोटाइड निम्नलिखित पदार्थों से मिलकर बनते हैंः

    1. शर्करा

    2. नाइट्रोजीनस झार

    3. फॉस्फेट

    आनुवंशिक अभियांत्रिकी

    यह एक ऐसी आनुवंशिक तकनीक है जिसमें जीवों के जीन का परिचालन किया जाता है, जिसकी वजह से इसमें जेनेटिक कोड स्थायी रूप से बदल जाते हैं।

    डीएनए की सफलतापूर्वक ग्राफ्टिंग सर्वप्रथम पॉलवर्ग द्वारा की गई थी। इसे डीएनए ैट-40 (सिमियन वायरस-40) से लिया गया था और इसे बैक्टीरिया के डीएनए से मिलाया गया।

    मेण्डलवाद (Mendelism)

    ग्रेगर जॉन मेंडल (1822-84) ने मटर के पौधे पर संकरण का प्रयोग कर आनुवंशिकी के क्षेत्र में एक नयी अवधारणा की शुरूआत की। मेंडल को आनुवंशिकी का जनक या आनुवंशिकी का पिता (Father of Genetics) कहा जाता है। ग्रेगर जॉन मेंडल (Gregor John Mendel) ने अपने वैज्ञानिक खोजों से आधुनिक आनुवंशिकी (Modern genetics) की नींव डाली।

    ग्रेगर जॉन मेंडल (Gregor John Mendel, 1822-84) आस्ट्रिया देश के ब्रून (Brunn) नामक स्थान में ईसाइयों के एक मठ के पादरी थे।

    मेण्डल ने ‘मटर’ (Pisum sativum) के पौधों पर किए गए अपने प्रयोगों पर आधारित निष्कर्षों को आनुवंशिकता के नियमों के रूप में 1865 में “प्रोसिडिंग ऑफ द नैचुरल हिस्ट्री सोसायटी ऑफ बून” पत्रिका में प्रकाशित किया।  मटर के पौधों पर किए गए अपने प्रयोगों के निष्कर्षों को उन्होंने 1866 ई. में Annual proceedings of the natural history society or brunn में प्रकाशित कराया, परन्तु विज्ञान जगत में 34 वर्षों तक इस पर ध्यान नहीं दिया गया।  मेण्डल के कार्यों के महत्त्व को 1900 में ह्यूगो डी ब्रीज (हॉलैण्ड), कार्ल कॉरेन्स (जर्मनी) और एरिक वान शारमैक (आस्ट्रिया) ने विश्व के समक्ष रखा।

    मेण्डल द्वारा लिए गए लक्षणों के प्रभावी तथा अप्रभावी रूप

    लक्षणप्रभावीअप्रभावी
    पौधे की ऊँचाई                      लम्बा बोना 
    पुष्प की स्थिति कक्षस्थ अग्रस्थ 
    फली का रंगहरा पीला 
    फली की प्रकृति फूली हुई संकुचित 
    बीज का आकार गोल झुर्रीदार 
    पुष्प का रंग लाल सफ़ेद 
    बीजपत्र का रंग पीला हरा 

    मेण्डल ने मटर के पौधे में सात जोड़े लक्षण लिए, जो चार अलग-अलग गुणसूत्रों पर उपस्थित थे।

    मेण्डल के आनुवंशिकता के नियम

    मेण्डल ने मटर के विभिन्न गुणों वाले पौधों के बीज का संकरण कराकर वंशागति के तीन महत्वपूर्ण नियमों का प्रतिपादन किया। इन्हें ‘मेण्डल के आनुवंशिकता के नियम’ के नाम से जाना जाता है। इस नियम के अनुसार युग्मकों के निर्माण के समय कारकों (जीन) के जोड़े के कारक अलग-अलग हो जाते हैं और इनमें से केवल एक कारक ही युग्मक में पहुंचता है। दोनों कारक एक साथ युग्मक में कभी नहीं जाते । इस नियम को युग्मकों की शुद्धता का नियम भी कहा जाता है। मेंडल के नियमों में पहला एवं दूसरा एकसंकरीय क्रॉस के आधार पर तथा तीसरा नियम द्विसंकरीय क्रॉस के आधार पर आधारित है।

    ये तीनों नियम इस प्रकार है:

    प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)

    एक जोड़ा विपरीत गुणों वाले शुद्ध पिता और माता में संकरण कराने से प्रथम पीढ़ी में प्रभावीगुण (dominant character) प्रकट होते हैं, जबकि अप्रभावीगुण (recessive character) छिप जाते हैं। जैसे, लाल पुष्प वाले पौधे का सफेद पुष्प वाले पौधे से संकरण कराने पर प्रथम पीढ़ी (R) में केवल लाल में पुष्प वाले पौधे पैदा होते हैं, जबकि सफेद रंग वाला लक्षण दब जाता है। लालरंगप्रभावी (dominant) लक्षण है, जबकि सफेदरंगअप्रभावी (recessive) लक्षण है।

    पृथक्करण का नियम (Law of Segregation)

    इसके अनुसार, युग्मकों के निर्माण के समय कारकों (जीन) के जोड़े के कारक अलग-अलग हो जाते हैं और इनमें से केवल एक कारक ही किसी एक युग्मक में पहुँचता है।

    इस नियम को शुद्धता का नियम (Law of Purity) भी कहते हैं। जब F पीढ़ी के संकर पौधों में स्वपरागण कराया जाता है, तो द्वितीय पीढ़ी में पैतृक लक्षण 3 : 1 के अनुपात में पृथक हो जाते हैं।

    फीनोटिपिक अनुपात = 3:1

    जीनोटिपिक अनुपात = 1 : 2 : 1

    स्वतन्त्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment)

    इस नियम के अनुसार, जब दो जीव दो या दो से अधिक लक्षणों में एक-दूसरे से भिन्न होते हैं, तो उनमें से एक लक्षण की वंशागति पर दूसरे लक्षण की, वंशागति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

    जब गोल पीले बीज वाले पौधे का झुरींदार हरे बीज वाले पौधे से संकरण कराया जाता है, तो F1  पीढ़ी में सभी गोल पीले बीज वाले पौधे उगते हैं, परन्तु F2 पीढ़ी में 9 : 3 : 3 : 1 का फिनोटिपिक अनुपात प्राप्त होता है।

    फीनोटिपिक अनुपात – 9 : 3 : 3 : 1

    जीनोटिपिक अनुपात -1:2:2:4:1:2:1:2:1

    प्रतीप संकरण (Back Cross)

    विषमयुग्मजी F1 संकर का समयुग्मजी प्रभावी जनक से क्रॉस प्रतीप संकरण कहलाता है।

    परिक्षार्थ संकरण (Test Cross)

    विषमयुग्मजी F1 संकर का समयुग्मजी अप्रभावी जनक के साथ क्रॉस परिक्षार्थ संकरण कहलाता है। इस क्रॉस से पता किया जाता है कि कोई पौधा समयुग्मजी है या विषमयुग्मजी।

    परीक्षार्थ संकरण में एकसंकर क्रॉस का अनुपात 1:1 तथा द्विसंकर क्रॉस का अनुपात 1 : 1 : 1 : 1 प्राप्त होता है।

    फिनोटाइप जीवधारी के जो लक्षण प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देते हैं, उसे फिनोटाइप कहते हैं, उदाहरण पौधे का लम्बापन।

    जीनोटाइप जीवधारी के आनुवंशिक संगठन को उसका जीनोटाइप कहते हैं, जो करकों का बना होता है। उदाहरण TT (कोशिकाओं में दो कारक-दोनों लम्बे लक्षण वाले) जीनोटाइप कहलाता है।

    मेण्डलवाद के अपवाद (Exceptions of Mendelism)

    अपूर्ण प्रभाविता (Incomplete dominance) – कुछ लक्षणों की आनुवंशिकता के दौरान मेण्डल का प्रभाविता का नियम पूरी तरह काम नहीं करता। E पीढ़ी की संतति में कोई भी लक्षण पूर्णतया प्रभावी नहीं होता है अर्थात् मध्यवर्ती होता है, इसे अपूर्ण प्रभाविता कहते हैं।

    स्नैपड्रैगन (snapdragon) तथा गुलाबाँस (4 O’ Clock) में लाल (RR) और सफेद (rr) फूलों वाली किस्मों के बीच संकरण के फलस्वरूप F1 पीढ़ी में गुलाबी फूल उत्पन्न होते हैं। इसका कारण यह है कि लाल रंग सफेद पर पूरी तरह प्रभावी नहीं है। अब यदि F1 पीढ़ी के गुलाबी पुष्पों में स्वपरागण होने दिया तो F2पीढ़ी में फीनोटाइप अनुपात 25% लाल (RR), 50% गुलाबी (Rr) व 25% सफेद (rr) प्राप्त होता है।

    सहप्रभाविता (Co-dominance) – इसमें दोनों ही जनकों के लक्षण पृथक रूप से F1 पीढ़ी में प्रकट होते हैं। उदाहरण यदि एक लाल रंग के पशु को श्वेत रंग के पशु से क्रॉस कराया जाता है तो F1 पीढ़ी में चितकबरी सन्तान पैदा होती है।

    बहुविकल्पता (Multiple allelism) – मेण्डल के अनुसार जीन के दो ही विकल्पी रूप होते हैं, परन्तु एक ही जीन के एक ही लोकस पर दो से अधिक एलील हो सकते हैं, जो बहुविकल्पी कहलाते हैं; जैसे – मनुष्य में रुधिर वर्ग A, B, AB और O के लिए तीन एलील (IAIBIO) एक ही लोकस पर स्थित होते हैं।

    जीनों में अन्योन्य क्रिया (Interaction in Genes)

    कभी-कभी दो या दो से अधिक जीन अन्योन्य क्रिया द्वारा एक ही लक्षण को प्रभावित करती है। इस प्रकार की अन्योन्य क्रिया के दौरान कुछ जीन योगात्मक (additive), कुछ पूरक (complementary) तथा कुछ निरोधक (inhibitory) होते हैं।

    पूरक जीन (Complementary gene)

    जब दो नॉन एलीलिक जीन अकेले-अकेले एक ही लक्षण को अभिव्यक्त करते हैं परन्तु एक साथ होने पर पूर्णतया भिन्न लक्षण प्रदर्शित करते हैं, तो ऐसे जीन पूरक जीन कहलाते हैं। उदाहरण लेथाइरस ऑडोरेटस में CCPP से बैंगनी पुष्प, जबकि ccPP एवं CCpp से सफेद पुष्प उत्पन्न होते हैं। इसमें द्विसंकर अनुपात 9 : 7 प्राप्त होता है।

    अनुलिपिक जीन (Duplicate geno)

    एक ही गुणसूत्र पर समान प्रभाव दिखने वाले दो जीन अनुलिपिक जीन कहलाते हैं। उदाहरण के तौर पर कैपसेला फलों का प्रकार A तथा B जीन से नियन्त्रित होता है। इसमें द्विसंकर अनुपात 15 : 1 प्राप्त होता है।

    प्रबलता (Epistasis)

    इसमें एक जीन दूसरे नॉन-एलीलिक जीन के प्रभाव को छिपा देता है। अप्रभावी प्रबलता में 9 : 3 : 4 का द्विसंकर अनुपात, जबकि प्रभावी प्रबलता में 12 : 3 : 1 का द्विसंकर अनुपति प्राप्त होता है।

    संदमक जीन (Inhibitory gene)

    पृथक गुणसूत्रों पर उपस्थित प्रभावी जीन पारस्परिक क्रिया से दूसरे जीन के लक्षण को अप्रभावी कर देते हैं। इसी कारण द्विसंकर क्रॉस का अनुपात बदलकर 13 : 3 हो जाता है।

    बहुजीनी या मात्रात्मक वंशागति (Polygenic or Quantitative inheritance)

    जब एक लक्षण एक से अधिक जीनों द्वारा नियन्त्रित होता है। गेहूँ में केरनल रंग के लिए बहुजीनी वंशागति, जिसमें द्वितीय पीढ़ी में 1: 4:6:4:1 का अनुपात प्राप्त होता है।

    बाह्य केन्द्रकीय वंशागति

    माइटोकॉण्ड्रिया तथा हरितलवक में उपस्थित आनुवंशिक कारक को प्लाज्मा जीन तथा उसके समूह को प्लाज्मोन कहते हैं। युग्मनज को अधिकांश कोशिकाद्रव्य मादा युग्मक से प्राप्त होता है इसलिए संतति प्रायः मादा जनक के समान होती है। घोंघे की खोल में कुण्डलन तथा मक्का में कोशिकाद्रव्यी नर नपुंसकता की वंशागति बाह्य केन्द्रकीय आनुवंशिक पदार्थ द्वारा ही होती है।

    उत्परिवर्तन (Mutation) क्या होते है ? उत्परिवर्तन (Mutation) के प्रकार

    किसी जाति के पौधों या जन्तुओं में, जो आकस्मिक विभिन्नताएँ उत्पन्न हो जाती हैं, उन्हें उत्परिवर्तन कहते हैं अर्थात् जीन अथवा गुणसूत्र की संरचना या संख्या में वंशागत परिवर्तन होना उत्परिवर्तन कहलाता है।

    प्रकृति में अपने-आप होने वाले उत्परिवर्तन प्राकृतिक (spontaneous) तथा X,  β, γ एवं UV-किरणों सहित रासायनिक पदार्थों (मस्टर्ड गैस, इथाइल मीथेन सल्फोनेट, मिथाइल मीथेन सल्फोनेट) आदि के द्वारा प्रेरित किए जाने वाले उत्परिवर्तन कृत्रिम (induced) कहलाते हैं।

    उत्परिवर्तन (Mutation) के प्रकार

    आकार के आधार पर उत्परिवर्तन दो प्रकार के होते हैं

    (i) गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन

    (ii) जीन उत्परिवर्तन

    गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन (Chromosomal Mutation) क्या होते है ?

    इसके अन्तर्गत संरचनात्मक गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन एवं संख्यात्मक गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन आते हैं।

    संरचनात्मक गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन गुणसूत्र के किसी भाग की हानि (अभाव), किसी भाग के द्विगुणन, एक गुणसूत्र के किसी भाग का दूसरे गुणसूत्र पर स्थानान्तरण तथा प्रतिपन (180° पर घूमने) के कारण होता है, जबकि संख्यात्मक गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन एक या अधिक गुणसूत्र की कमी या अधिकता के कारण या फिर गुणसूत्रों की संख्या या उनके जीनोम के गुणांक में होने से होता है।

    संरचनात्मक गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन एवं संख्यात्मक गुणसूत्रीय उत्परिवर्तन विशेषताएँ और अन्तर

    संरचनात्मक                                                संख्यात्मक
    अमाव सिरे पर या अन्तराली भाग में गुणसूत्र की हानि होती है, यह समयुग्मी अवस्था में हानिकारक होता है, समजात गुणसूत्रों में सिनैप्सिस के समय पता चलता है।एन्यूप्लॉइडी इसमें द्विगुणित गुणसूत्रों की संख्या से एक या अधिक गुणसूत्र कम या अधिक हो जाते हैं; जैसे-मोनोसोमी (2n – 1), नलीसोमी (2n – 2), ट्राइसोमी (2n + 1), टेट्रासोमी (2n + 2) आदि। मानव में डाउन सिन्ड्रोम, एडवार्ड सिन्ड्रोम, पटाऊ सिन्ड्रोम, क्लाइनफेल्टर सिन्ड्रोम ट्राइसोमी के उदाहरण हैं।
    द्विगुणन कुछ जीनों के दो या अधिक बार एक ही गुणसूत्र में जुड जाने से उत्पन्न उदाहरण ड्रोसोफिला में बार आँखें।यूप्लॉइडी जीवों में गुणसूत्रों की संख्या, उनके जीनोम के गुणांक में होती है, इसलिए ये डिप्लॉइड, पॉलीप्लॉइड होते हैं। पॉलीप्लॉइडी दो प्रकार की होती हैं
    स्थानान्तरण एक गुणसूत्र का भाग दूसरे असमजात गुणसूत्र पर स्थानान्तरित होता है, साधारण (एक गुणसूत्र में हानि, जबकि असमजात गुणसूत्र में जोड़) या पार (असमजात गुणसूत्रों में आदान-प्रदान) हो सकता है।स्वबहुगुणिता बहुगुणित गुणसूत्र एक ही जाति के होते हैं यह F, संकर में कोल्चीसीन से गुणसूत्रों की संख्या दुगुनी करके उत्पन्न की जाती है। इसके कारण पत्तियों, फूलों तथा फलों का आकार बड़ा हो जाता है।
    प्रतिपन गुणसूत्र का कोई भाग 180° पर घूम जाता है। यदि इसमें सेन्ट्रोमीटर भाग लेता है, तो इसे पेरासेन्ट्रिक और यदि सेन्ट्रोमीयर भाग नहीं लेता, तो पैरासेन्ट्रिक प्रतिपन कहते हैं।परबहुगुणिता ये विभिन्न जातियों अथवा वंशों के संकरण से बनते हैं। उदाहरण रेफेनोफ्रेसिका, रेफेनस सटाइवस तथा बॅसिका ओलेरेशिया के संकरण से प्राप्त की गयी थी तथा ट्रिटिकेल, ट्रिटिकम ड्यूरम व सिकेल सिरेल के संकरण से बनाया गया है।

    जीन उत्परिवर्तन (Gene Mutation) क्या होते है ?

    यह न्यूक्लियोटाइड के प्रकार या उनके क्रम में बदलाव के कारण होता है। गेहूँ की सरबती सोनारा, सोनारा 64 में गामा किरणों द्वारा उत्परिवर्तन से पैदा की गई है।

    विस्थापन   फ्रेमशिफ्ट  टॉटोमेराइजेशन
    ट्रांजिशन एक प्यूरीन क्षार (A और G) का दूसरे प्यूरीन क्षार या एक पिरीमिडीन क्षार ( और C) का दूसरे पिरीमिडीन क्षार से विस्थापनन्यूक्लियोटाइड की श्रृंखला में एक क्षार कम या अधिक हो जाने पर पॉलीपेप्टाइड बनाने की सूचना पार्श्व दिशाओं में खिसक जाती है और बनने वाली पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला पूर्णरूप से बदल जाती है। उदाहरण थेलेसीमिया रोगDNA या RNA में प्यूरीन तथा पिरीमिडीन क्षार के किसी में प्रोटॉन व इलेक्ट्रॉन की पुनर्व्यवस्था।
    ट्रांसवर्जन एक प्यूरीन क्षार का पिरीमिडीन क्षार से या पिरीमिडीन क्षार का प्यूरीन क्षार से विस्थापन।  

    जीन और डीएनए से जुड़े कुछ महत्वपुर्ण फैक्ट्स

    • जीन DNA का एक खण्ड है, जो प्रोटीन संश्लेषण को नियन्त्रित करता है।
    • बेन्जर ने ‘सिस्ट्रॉन’ अर्थात् जीन की कार्यात्मक इकाई, ‘रिकॉन’ अर्थात रिकॉम्बिनेशन की इकाई तथा ‘म्यूटॉन’ अर्थात् उत्परिवर्तन की इकाई शब्दों का प्रतिपादन किया।
    • यूकैरियोट में जीन सतत् नहीं होते वरन् इन्ट्रॉन और एक्सॉन में विभक्त होते हैं। ऐसे जीन विभक्त जीन (split gene) कहलाते हैं।
    • विपुन्सन’ द्विलिंगी पुष्प में परागकोशों के पकने एवं फटने से पूर्व ही उनको पृथक करना है।
    • ‘ऑक्सोट्रॉफ’ एक उत्परिवर्ती (mutant) जीव है, जिसमें एक या अधिक आवश्यक यौगिकों को संश्लेषित करने की क्षमता समाप्त हो चुकी है।
    • ‘क्लोन’ एक ही जनक से अलैंगिक जनन द्वारा बनने वाला जीव।
    • एच. जे. मुलर ने ड्रोसोफिला में सर्वप्रथम X-rays से उत्परिवर्तन किया।
    • ‘सौपरिवेशकी’ उत्तम परिस्थितियाँ उत्पन्न कर मानव समाज को सुधारना।

    सहलग्नता (Linkage) क्या है ?

    यह मेण्डल के स्वतन्त्र अपव्यूहन नियम का अपवाद है। जब दो विभिन्न लक्षण एक ही गुणसूत्र में बँधे होते हैं, तो उनकी वंशागति स्वतन्त्र न होकर एक साथ ही होती है। इसी को मॉर्गन ने ‘सहलग्नता’ कहा। \

    गुणसूत्र पर दो जीन, जितने निकटवर्ती होंगे (दूरी जितनी कम होगी) उनके बीच सहलग्नता उतनी ही तीव्र होगी। सहलग्न समूहों की संख्या अगुणित समूह में उपस्थित गुणसूत्रों की संख्या के बराबर होती है। पूर्ण सहलग्नता (complete linkage) में पैतृक संयोजन दो या तीन पीढ़ी में लगातार प्राप्त होते हैं, जबकि अपूर्ण सहलग्नता (incomplete linkage) में सहलग्न जीन विनियम (crossing over) के कारण अलग हो जाते हैं और 50% से कम पुनर्संयोजन (recombinant) मिलते हैं। सहलग्नता से जीनों का पुनयोजन सीमित रह जाता है। अत: जातीय लक्षणों के एक साथ बने रखने में सहायक होती है। वर्णान्धता (colour blindness) तथा हीमोफीलिया (haemophilia) मानव में लिंग सहलग्नता के उदाहरण हैं।

    वर्णान्धता (Colour Blindness) क्या है ?

    इस रोग से ग्रसित व्यक्ति लाल व हरे रंग का भेद नहीं कर पाता। इसका जीन X-गुणसूत्र पर उपस्थित होता है तथा अप्रभावी होता है।

    उदाहरण एक वर्णान्ध स्त्री का विवाह एक सामान्य पुरुष से होने पर उससे उत्पन्न सन्तानों में पुत्रों में वर्णान्धता के गुण होंगे, जबकि पुत्रियाँ वाहक (सामान्य) होंगी।

    हीमोफीलिया या ब्लीडर रोग (Haemophilia or Bleeder’s Disease)

    इस रोग में रोगी के खून का थक्का नहीं जम पाता है या काफी देर से बनता है। यह रोग अप्रभावी X- सहलान जीन के कारण होता है। उदाहरण हीमोफिलिक पुरुष और सामान्य स्त्री से उत्पन्न सन्तानों में से सभी पुत्रियाँ वाहक, जबकि सभी पुत्र सामान्य होंगे।

    लिंग-निर्धारण (Sex-Determination)

    मनुष्य में XY प्रकार के गुणसूत्रों द्वारा लिंग निर्धारण होता है। मनुष्य की प्रत्येक कोशिका में 46 गुणसूत्र अर्थात् 23 जोड़े होते हैं, जिनमें 22 जोड़े नर तथा मादा में एक समान होते हैं। इन 22 जोड़ों को अलिंगसूत्री युग्म या सहसूत्री युग्म (autosomes) कहते हैं। 23वें जोड़े को लिंग गुणसूत्र कहते हैं, जिसे पुरुष में XY से प्रदर्शित करते हैं, जबकि स्त्रियों में इसे XX से प्रदर्शित करते हैं।

    शुक्रजनन में अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा दो प्रकार के शुक्राणु बनते हैं आधे वे, जिनमें 23वीं जोड़ी का X- गुणसूत्र आता है अर्थात् (22 + X) और आधे वे, जिनमें 28वाँ जोड़ा Y- गुणसूत्र (22 + Y) जाता है। स्त्रियों में एक समान प्रकार का गुणसूत्र अर्थात् (22 + X) तथा (22 + X) वाले अण्डाणु पाए जाते हैं। निषेचन के दौरान यदि अण्डाणु X- गुणसूत्र वाले शुक्राणु से मिलता है, तो इससे बनने वाली सन्तान लड़की होगी। इसके विपरीत यदि अण्डाणु Y- गुणसूत्र वाले शुक्राणु से निपेचित होगा, तब सन्तान लड़का होगा अर्थात् पुरुष का Y-गुणसूत्र सन्तान में लिंग निर्धारण के लिए उत्तरदायी है।

    मधुमक्खियों में लिंग-निर्धारण इस बात पर निर्भर करता है कि सन्तान का विकास निपेचित अण्ड से हो रहा है या अनिषेचित अण्ड से। निषेचित अण्ड द्विगुणित (diploid) होता है इससे मादा मधुमक्खी का विकास होता है। मधुमक्खी के अनिषेचित अण्ड अगुणित होते हैं इनसे ड्रोन (drone) बनते हैं। मेलेन्ड्रियम, कोक्सीनिया, स्फीरोकार्पस नामक पौधों में लिंग निर्धारण की क्रिया का अध्ययन किया गया है।

    DNA की संरचना (Structure of DNA)

    DNA में उपस्थित नाइट्रोजनी क्षारक चार प्रकार के होते हैं; जैसे – एडीनीन (A), ग्वानीन (G), थायमीन (T) एवं साइटोसीन (C)

    सन् 1953 में वाटसन और क्रिक द्वारा DNA का द्विकुण्डलित प्रतिरूप बनाया जिसके अनुसार,

    (i) DNA का प्रत्येक अणु दो कुण्डलित पॉलिन्यूक्लियोटाइड शृंखलाओं का बना होता है। ये दोनों श्रृंखलाएँ एक-दूसरे पर सर्पिल क्रम में लिपटी होती हैं।

    (ii) प्रत्येक पॉलिन्यूक्लियोटाइड श्रृंखला में डीऑक्सीराइबोज शर्करा और फॉस्फेट समूह एकान्तर क्रम में जुड़कर श्रृंखला का आधार तैयार करती है। फॉस्फेट समूह एक तरफ की शर्करा के 5′ कार्बन पर तथा दूसरी ओर 3’ कार्बन पर फॉस्फो डाइएस्टर बन्ध द्वारा जुड़ी होती है। दोनों शृखलाएँ प्रतिसमानान्तर दिशा में कुण्डलित होती हैं।

    (iii) एडीनीन और थायमिन के बीच दो हाइड्रोजन बन्ध तथा साइटोसीन और ग्वानीन के बीच तीन हाइड्रोजन बन्ध होते हैं।

    (iv) एक ही शृंखला में किन्हीं दो न्यूक्लियोटाइड्स के बीच 3.4 Å की दूरी होती है।

    वाटसन एवं क्रिक मॉडल

    DNA का द्विगुणन

    वाटसन एवं क्रिक ने DNA द्विगुणन की अर्धसरक्षी विधि (semiconservative method) का प्रतिपादन किया का द्विगुणन समारंभन बिन्दु (initiation point) से शुरू होता है। हेलिकेस एन्जाइम DNA के दोनों रज्जुओं को पृथक कर देता है तथा प्रत्येक रज्जुक, एकल रज्जुक बन्धन प्रोटीन (single strand binding protein) की सहायता से DNA स्थिर हो जाता है |

    टोपोआइसोमेरेस एन्जाइम रज्जुक में कुण्डलन के तनाव को समाप्त करता है। प्रत्येक रज्जुक फर्म (template) की तरह कार्य करता है। बहुलीकरण (polymerization) से पूर्व प्राइमेस एन्जाइम की सहायता से रज्जुक के 3′ छोर के पूरक RNA प्राइमर का संश्लेषण होता है, जिससे आगे DNA पॉलीमरेस-III द्वारा बहुलीकरण होता है।

    अग्रग रज्जुक (Leading strand) पर 5′ → 3′ दिशा में सतत् (continuous) संश्लेषण होता है, जबकि पश्चगामी रज्जुक (lagging strand) पर छोटे-छोटे टुकड़ों, जिन्हें ओकाजाकी टुकड़े कहते हैं, में असतत् (discontinuous) संश्लेषण होता है। प्रत्येक ओकाजाकी टुकड़े के लिए एक अलग RNA प्राइमर बनता है।

    ओकाजाको टुकड़े के पूर्ण निर्मित होने पर DNA पॉलीमरेस-I द्वारा RNA प्राइमर को हटा दिया जाता है और DNA लाइगेज एन्जाइम ओकाजाकी टुकड़ों को जोड़ने का कार्य करता है।

    DNA एवं RNA में अन्तर

    DNARNA
    इसमें डीऑक्सीराइबोज़ शर्करा होती है।इसमें राइबोज शर्करा होती है।
    क्षार, एडीनीन, ग्वानीन, थायमीन तथा साइटोसीन होते हैं।थायमीन के स्थान पर यूरेसिल होता है।
    मुख्यतया केन्द्रक तथा कुछ मात्रा में माइटोकॉण्ड्रिया व हरितलवक में पाया जाताकेन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य दोनों में पाया जाता है।
    आनुवंशिक लक्षणों की वंशागति का कार्य करता है।कुछ विषाणुओं में आनुवंशिक पदार्थ तथा प्रोटीन संश्लेषण (सभी जीवों में) का कार्य करता है।

    आनुवंशिक कोड (Genetic Code) क्या होते है ?

    आनुवंशिक कोड mRNA अणुओं में स्थित नाइट्रोजनी क्षारों का वह क्रम है, जिसमें प्रोटीन संश्लेषण के लिए संदेश निहित (कूटित) होते हैं। एक अमीनो अम्ल के लिए संदेश देने वाला न्यूक्लियोटाइड का समूह कोडॉन कहलाता है। आनुवंशिक कोड की खोज नौरेनबर्ग एवं मथाई ने की थी।

    1. AUG तथा GUG (कभी-कभी) प्रारम्भिक कोडॉन, जबकि UAA, UGA, UAG समापन कोडॉन हैं। 2. जेनेटिक कोड अपभ्रष्टता (degeneracy), कोमाविहीन, सार्वत्रिकता, नॉन-ओवरलेपिंग होता है।

    3. जेनेटिक कोड असंदिग्धता दर्शाता है अर्थात् एक विशिष्ट कोडॉन एक ही अमीनो अम्ल को कोड करता है।

    4. एच सी क्रिक ने वोवल हाइपोथेसिस प्रस्तुत की, जिसके अनुसार, एक कोडॉन की विशिष्टता प्रथम दो क्षारकों द्वारा निर्धारित होती है।

    मानव आनुवंशिक रोग

    रंजकहीनताइसमें टाइरोसीनेज एन्जाइम अनुपस्थित
    एल्केप्टोन्यूरियाहोमोजेन्टिसिक अम्ल ऑक्सीडेज में उत्परिवर्तन
    दात्र कोशिका अरक्तताहीमोग्लोबिन में ग्लूटामिक अम्ल के स्थान पर वैलीन
    फिनाइलकीटोनूरियाफिनाइलएलेनीन हाइड्रोक्सीलेज की अनुपस्थिति
    थैलेसीमियाहीमोग्लोविन संश्लेषण की कमी
    डाउन्स सिन्ड्रोम21वीं जोड़ी गुणसूत्र की ट्राइसोमी
    एडवार्ड सिन्ड्रोम18वीं जोड़ी गुणसूत्र की ट्राइसोमी
    टर्नर सिन्ड्रोममादा में 45 (44+XO) गुणसूत्र
    क्लाइनफेल्टर सिन्ड्रोम44+ XXY गुणसूत्र
    क्राइ-डू-चैट सिन्ड्रोमपाँचवें गुणसूत्र की छोटी भुजा में हानि
    पटाऊ सिन्ड्रोम13वें गुणसूत्र की ट्राइसोमी

    प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis) एवं क्रिया

    पॉलीपेप्टाइड शृंखला के निर्माण हेतु सर्वप्रथम DNA के अणु के एक विशिष्ट खण्ड के द्वारा सूचना न्यूक्लियोटाइड के त्रिक (triplot) संकेतों के रूप में mRNA पर अनुलेखित हो जाती है। mRNA पर अनुलेखित सूचना का अनुवादन (RNA के द्वारा अमीनो अम्लों को निश्चित क्रम में जोड़कर प्रोटीन के रूप में किया जाता है अर्थात् प्रोटीन संश्लेषण में आनुवंशिक कोड द्वारा सूचनाओं का DNA से mRNA में अनुलेखन तथा mRNA से प्रोटीन में अनुलिपीकरण होता है।

    DNA (जीन्स) का प्रोटीनों तक सूचना का यह अप्रत्यक्ष प्रवाह सैन्ट्रल डोग्मा कहलाता है। तथापि कुछ प्रतिगामी विषाणुओं (rotrovirusos), जैसे HIV, रॉस सारकोमा वाइरस में RNA से DNA का संश्लेषण होता है, जिसे टेमिन एवं बाल्टीमोर ने खोजा।

    जॉर्ज बीडल एवं एडवर्ड टेटम ने न्यूरोस्पोरा क्रासा पर आनुवंशिक प्रयोग किए तथा एक जीन-एक एन्जाइम परिकल्पना प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार, एक जीन-एक एन्जाइम को नियन्त्रित करता है।

    प्रोटीन संश्लेषण की दो क्रियाएँ

    अनुलेखनअनुलिपीकरण
    DNA पर, RNA पॉलीमरेज की सहायता से RNA का बनना।राइबोसोम पर mRNA के निर्देश tRNA व अमीनो अम्लों की सहायता से प्रोटीन का बनना। 
    प्रोकिरियोट में एक ही RNA पॉलीमरेज से तीनों RNA (अर्थात् mRNA, tRNA व rRNA) का संश्लेषण होता है, जबकि युकैरियोट में RNA पॉलीमरेज-I से rRNA, RNA पॉलीमरेज-II से mRNA तथा RNA पॉलीमरेज-III से tRNA का संश्लेषण होता है।एक विशिष्ट अमीनो अम्ल ATP एन्जाइम से क्रिया कर AA-AMP एन्जाइम कॉम्पलैक्स बनाता है, जो tRNA के 3′ छोर पर जुड़ता है अमीनो अम्ल का सक्रियण अमीनो एसाइल tRNA सिन्थेटेस एन्जाइम द्वारा उत्प्रेरित होता है।
    DNA के जिस रज्जुक पर RNA का संश्लेषण होता है, उसे एक निश्चित अमीनो अम्ल के लिए विशिष्ट IRNA होता है। टेम्पलेट रज्जुक या एन्टीसेन्स या नॉन-कोडिंग रज्जुक कहते हैं।एक निश्चित अमीनो अम्ल के लिय विशिष्ट tRNA होता है |
    ई. कोलाई में RNA पॉलीमरेज पाँच पॉलीपेप्टाइड शृंखलाओ 2 α β β’ तथा ω से मिलकर बना होता है।mRNA समारम्भन कारक (Initiation factor) की उपस्थिति में राइबोसोम की छोटी इकाई से जुड़ जाता है। 
    जीवाणु RNA पॉलीमरेज आरम्भ स्थल से कुछ पहले प्रोमोटर भाग, जो 20-200 क्षारकों का एक विशिष्ट क्रम है, पर जुड़ता है।प्रोटीन संश्लेषण मेथयोनीन अमीनो अम्ल से आरम्भ होता है 
    जीवाणु में mRNA के प्रथम क्षारक से 5-10 क्षारक बायीं ओर कन्सेन्सस अनुक्रम युक्त प्रिनो बॉक्स होता है, जबकि यूकैरियोट में TATA बॉक्स या होगनेस बॉक्स होता है।प्रोकैरियोट में तीन समारम्भन कारक (initiation factor), जबकि यूकैरियोट में नौ समारम्भन कारक होते हैं।
    RNA का संश्लेषण 5’   3’ दिशा में होता है।समारम्भन कोडॉन के लिए विशेष अमीनो एसाइल tRNA कॉम्पलेक्स राइबोसोम की P-site तक पहुँचता है और इसका एन्टीकोडॉन भाग mRNA के कोडॉन से हाइड्रोजन बन्धों द्वारा जुड़ जाता है। यह क्रिया GTP की उपस्थिति में होती है।

    येनोटस्की ने एक जीन-एक पॉलीपेप्टाइड विचार धारा प्रस्तुत की।

    1. पहले कृत्रिम जीन का निर्माण हरगोविन्द खुराना ने 1970 में यीस्ट एलेनीन tRNA के लिए किया था

    2. ग्रिफिथ ने सर्वप्रथम प्रमाणित किया कि DNA एक आनुवंशिक पदार्थ है।

    जम्पिंग जीन

    इस जीन की खोज बारबरा मैकक्लिनटॉक ने की थी। इसका अर्थ- किसी जीन का अपने स्थान से न निकलकर उसी गुणसूत्र में दूसरे स्थान पर या दूसरे किसी गुणसूत्र में जाकर जुड़ जाना है और इस प्रकार नए लक्षण प्रारूपों को जन्म देती है। आभासी जीन वे जीन, जो कार्यात्मक जीन के समजात होते हैं परन्तु अभाव, जुड़ाव या प्रोमोटर भाग की अक्रियाशीलता के कारण कार्यात्मक उत्पाद पैदा करने में असमर्थ होती है।

    मानव जीनोम (Human Genome)

    डॉ. वाटसन मानव जीनोम परियोजना के प्रमुख निर्देशक थे इस सन्दर्भ में अमेरिकी सरकार ने 1988 में मानव जीनोम परियोजना नाम की परियोजना शुरू की। इस परियोजना के अध्यक्ष डा. कालिंस ने अप्रैल 2000 में घोषणा की कि अब तक मानव जीनोम के 3 अरब क्षार जोड़ों में से दो अरब क्षार जोड़ों की डिकोडिंग हो चुकी है। अभी हाल में हैदराबाद में स्थित सेन्टर फॉर सेल एण्ड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (CCMB) में एक ह्यमन जीन डायमर्सिटी प्रोजेक्ट शुरू किया गया है, जिसमें अण्डमान व निकोबार द्वीप समूह पर रहने वाली चार प्राचीन जनजातियों के जीनोम का पता लगाया जाएगा।

    स्मार्ट फैक्ट्स

    एलील या युग्मविकल्पी (allele) एक ही जीन के दो या अधिक विकल्प; जैसे-लम्बापन (T) और बौनापन (t) एक दूसरे के एलील हैं।

    एकसंकर क्रॉस (Monohybrid cross) एक जोड़ी लक्षणों को लेकर कराया गया क्रॉस

    व्युत्पन्न क्रॉस (Reciprocal cross) जनक, पादपों की लैंगिकता को परस्पर बदलकर कराया गया क्रॉस।

    घातक जीन (Lethal gene) जीन, जो किसी जीव की मृत्यु का कारण बनते हैं।

    एपिस्टेटिक जीन (Epistatic gene) एक जीन, जो दूसरे नॉन एलिलिक जीन के प्रभाव को छिपा देता है।

  • कोशिका विभाजन (Cell Division) क्या है ?  कोशिका चक्र क्या है ? | अर्द्धसूत्री विभाजन एवं समसूत्री विभाजन in Hindi

    कोशिका विभाजन (Cell Division) क्या है ? कोशिका चक्र क्या है ? | अर्द्धसूत्री विभाजन एवं समसूत्री विभाजन in Hindi

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की कोशिका विभाजन (cell division) क्या होता है ? koshika vibhajan के प्रकार क्या है ? koshika vibhajan क्यों जरूरी है ? साथ ही हम जानेगे कि समसूत्री कोशिका विभाजन और अर्द्धसूत्री विभाजन क्या है | समसूत्री कोशिका विभाजन और अर्द्धसूत्री विभाजन की परिभाषा, उनमे अंतर और उनके प्रकार क्या है ? आदि

    कोशिका विभाजन (Cell Division) क्या है ?

    कोशिका विभाजन का आशय उस प्रक्रिया से है, जिसके अन्तर्गत एक कोशिका से दो कोशिकाओं का निर्माण होता है, जिससे जीवों में प्रजनन और वृद्धि सम्भव हो पाती है। इस घटना में पहले DNA का द्विगुणन और फिर केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य का विभाजन होता है।  कोशिका विभाजन सभी जीवों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसमे कोशिका विभाजन के दौरान डीएनए प्रतिकृति व कोशिका वृद्धि होती है। ये सभी प्रक्रियाएं जैसे कोशिका विभाजन, डीएनए प्रतिकृति और कोशिका वृद्धि एक दूसरे के साथ समायोजित होकर, इस प्रकार संपन्न होती हैं कि कोशिका विभाजन सही होता है व संतति कोशिकाओं में इनकी पैतृक कोशिकाओं वाला जीनोम होता है।

    कोशिका विभाजन के प्रकार

    कोशिका विभाजन प्रमुख रुप से तीन प्रकार का होता है

    1. असूत्री विभाजन – प्रोकैरियोटिक जीवों में

    2. सूत्री विभाजन या समसूत्री विभाजन – कायिक कोशिकाओं में

    अर्द्धसूत्री विभाजन – जननिक कोशिकाओं में

    कोशिका विभाजन और कोशिका चक्र

    सभी सजीवों की कोशिकाएं दो भागों में विभाजित होकर जनन करती है, जिसमे प्रत्येक पैतृक कोशिका विभाजित होकर दो नई संतति कोशिकाओं का निर्माण करती है ये नव निर्मित संतति कोशिकाएं स्वयं वृद्धि एवं पुन: विभाजन करती है |

    कोशिका चक्र क्या है ?

    कोशिका विभाजन सभी जीवों के लिय एक महत्वपुर्ण प्रक्रिया है | एक कोशिका विभाजन के दौरान डीएनए प्रतिकृति व कोशिका वृद्धि होती है कोशिका अपने जीनोम का द्विगुणन व अन्य संघटकों का संश्लेषण और तत्पश्चात विभाजित होकर दो नई संतति कोशिकाओं का निर्माण करती है, इसे कोशिका चक्र कहते है | यद्यपि कोशिका वृद्धि (कोशिकाद्रव्यीय वृद्धि के संदर्भ में) एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें डीएनए का संश्लेषण कोशिका चक्र की किसी एक विशिष्ट अवस्था में होता है। कोशिका विभाजन के दौरान, प्रतिकृति गुणसूत्र (डीएनए) जटिल घटना क्रम के द्वारा संतति केंद्रकों में वितरित हो जाते हैं। ये सारी घटनाएं आनुवंशिक नियंत्रण के अंतर्गत होती हैं।

    एक प्ररूपी (यूकेरियोटिक) चक्र का उदाहरण मनुष्य की कोशिका के संवर्द्धन में होता है, जो लगभग प्रत्येक चौबीस घंटे में विभाजित होती है। यद्यपि कोशिका चक्र की यह अवधि एक जीव से दुसरे जीव एवं कोशिका से दूसरी कोशिका प्रारूप के लिए बदल सकती है। उदाहरणार्थ- यीस्ट के कोशिका चक्र के पूर्ण होने मेंलगभग नब्बे मिनट लगते हैं।

    कोशिका चक्र की प्रावस्थाएँ

    कोशिका चक्र की अवधि एक जीव से दुसरे जीव एवं कोशिका से दूसरी जीव एवं कोशिका से दूसरी कोशिका प्रारूप के लिय बदल सकती है | कोशिका चक्र की दो मूल प्रावस्थाए होती है जो निम्न है :

    • अंतरावस्था (Interphase)
    • एम (M) प्रावस्था (सूत्री विभाजन) (Mitosis Phase)

    अन्तरावस्था (interphase)

    सूत्री विभाजन के प्रारम्भ से पहले एक अन्तरावस्था (interphase) होती है इसमें G1, S तथा G2,  उप-अवस्थाएँ होती हैं। अंतरावस्था को विश्राम अवस्था भी कहते है | यह वह प्रावस्था जिसमे कोशिका विभाजन के लिय तैयार होती है तथा इस दौरान क्रमबद्ध तरीके से कोशिका वृद्धि एवं डीएनए का प्रतिकृतिकरण दोनों होते है अंतरावस्था को तीन प्रावस्थाओं या उप-अवस्थाएँ में विभाजित किया जाता है :

    1. पश्च सूत्री अन्तरकाल प्रावस्था (G1 Phase या जी1 प्रावस्था)

    2. संश्लेषण प्रावस्था (S Phase या एस प्रावस्था)

    3. पुर्व – सूत्री विभाजन अंतरालकाल प्रावस्था (G2 Phase या जी2 प्रावस्था)

    G1 – प्रोटीन एवं RNA का संश्लेषण होता है।

    S – इसमें DNA का द्विगुणन एवं हिस्टोन प्रोटीन का संश्लेषण होता है।

    G2 – RNA व प्रोटीन का संश्लेषण होता है।

    G0 – इसमें कोशिका विशेषीकृत हो जाती है और इसके बाद कोशिका विभाजन नहीं होता।

    जी1 प्रावस्था में कोशिका उपापचयी रूप में सक्रिय होती है, एवं लगातार वृद्धि करती है, परन्तु इसका डीएनए प्रतिकृति नही करता है | एस प्रावस्था या संश्लेषण प्रावस्था के दौरान डीएनए का निर्माण एवं इसकी प्रतिकृति होती है | इस दौरान डीएनए की मात्रा दुगुनी हो जाती है |

    प्राणी कोशिका में एस प्रावस्था के दौरान केन्द्रक में डीएनए का जैसे ही प्रतिकृतिकरण प्रारम्भ होता है वैसे ही तारककेंद्र का कोशिकाद्रव्य में प्रतिकृतिकरण होने लगता है, कोशिका वृद्धि के साथ सूत्री विभाजन हेतु जी2 प्रावस्था के दौरान प्रोटीन का निर्माण होता है |

    जो कोशिकाएं आगे विभाजित नही होती है जी1 प्रावस्था से निकल कर निष्क्रिय अवस्था में पहुचती है, जिसे कोशिका चक्र की शांत अवस्था (G0) कहते है |

    प्राणियों में सूत्री विभाजन केवल द्विगुणित कायिक कोशिकाओं में ही दिखाई देता है | इसके विपरीत पादपों में सूत्री विभाजन अगुणीत एवं द्विगुणीत दोनों कोशिकाओं में दिखाई देता है |

    सूत्री कोशिका विभाजन या समसूत्री विभाजन (Mitosis)

    सभी जन्तुओं और पौधों में, जनन कोशिकाएँ एवं अन्य सारी कोशिकाएँ सूत्री विभाजन से विभाजन करती हैं। इस कोशिका विभाजन की खोज डब्ल्यू. फ्लेमिंग ने की। यह सभी प्रकार के कायिक कोशिकाओं (vegetative cells) में होती है। इसमें एक द्विगुणित मातृ-कोशिका से दो समान सन्तति कोशिकाएँ बनती हैं। सूत्री विभाजन की प्रक्रिया दो भागों केन्द्रक विभाजन एवं कोशिकाद्रव्य विभाजन में सम्पन्न होती है।

    सूत्री विभाजन  (एम (M) प्रावस्था) उस अवस्था को व्यक्त करता है, जिसमे वास्तव में कोशिका विभाजन या समसूत्री विभाजन होता है, और अंतरावस्था दो क्रमिक एम प्रावस्थाओं के बीच की प्रावस्था को व्यक्त करता है, कोशिका चक्र की कुल अवधि की 95 प्रतिशत से अधिक की अवधि अंतरावस्था में ही व्यतीत होती है |

    सूत्री विभाजन  का आरम्भ केन्द्रक के विभाजन (Kayokinesis कैरियो काईनेसिस) और इसका अंत कोशिका द्रव्य विभाजन (Cytokinesis साईटो काईनेसिस) के साथ होता है

    विधा के लिए सूत्री विभाजन को केंद्रक विभाजन की चार अवस्थाओं में विभाजित किया गया है।

    केन्द्रक विभाजन (Kayokinesis)

    इस विभाजन की प्रक्रिया चार अवस्थाओं में सम्पन्न होती है | यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि कोशिका विभाजन एक प्रगतिशील प्रक्रिया है और इसकी विभिन्न अवस्थाओं के बीच स्पष्ट रूप से विभाजन करना मुश्किल है। केन्द्रक विभाजन यानि केरियोकाइनेसिस को चार अवस्थाओं में विभाजित किया गया है :

    • पूर्वावस्था (Prophase)।
    • मध्यावस्था (Metaphase)।
    • पश्चावस्था (Anaphase)।
    • अंत्यावस्था (Telophase)।

    पूर्वावस्था (Prophase)

    अंतरावस्था की व G1 अवस्था के बाद पूर्वावस्था केरियोकाइनेसिस का पहला पड़ाव है। वास्तविक कोशिका विभाजन की शुरूआत इसी अवस्था से होती है। इसमें प्रत्येक गुणसूत्र लम्बाई में पूरी तरह से दो बराबर भागों में बैट जाती है। इस आधे भाग को अर्द्धगुणसूत्र कहा जाता है। ये अर्द्धगुणसूत्र सेन्ट्रोमीयर पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं और केन्द्रक कला तथा केन्द्रिका नष्ट हो जाती है। कोशिका विभाजन का यह सबसे लम्बा चरण होता है।

    पूर्वावस्था के पूर्ण होने के दौरान की घटनाओं की विशेषताएं

    • गुणसूत्रीय द्रव्य संघनित होकर ठोस गुणसूत्र बन जाता है। गुणसूत्र दो अर्धगुणसूत्रों से बना होता है, जो आपस में सेंट्रोमियर से जुड़े रहते हैं। 
    • अंतरावस्था के समय जिस तारककाय का द्विगुण हुआ है वह कोशिका में विपरीत ध्रुव की ओर जाने लगता है। प्रत्येक तारककाय सूक्ष्म नलिकाओं को विकरित करता है, जिसे तारक (एस्टर) कहते हैं। ये तन्तु व तारक मिलकर समसूत्री विभाजन यंत्र बनाते हैं। पूर्वावस्था के अंत में यदि कोशिका को सूक्ष्मदर्शी से देखा जाता है तो इसमें गॉल्जीकाय, अंतर्द्रव्यी जालिका, केंद्रिका व केंद्रक आवरण दिखाई नहीं देता है।

    मध्यावस्था (Metaphase)

    केंद्रक आवरण के पूर्णरूप से विघटित होने के साथ समसूत्री विभाजन की द्वितीय अवस्था प्रारंभ होती है, इसमें गुणसूत्र कोशिका के कोशिका द्रव्य में फैल जाते हैं। इस अवस्था तक गुणसूत्रों का संघनन पूर्ण हो जाता है यह अवस्था काफी छोटी होती है उच्च पादपों में अतारकीय (Anastral) और जन्तुओं में तारकीय (astral) सूत्री विभाजन होता है।  यही वह अवस्था है जब गुणसूत्रों की आकृति का अध्ययन बहुत ही सरल तरीके से किया जा सकता है। 

    मध्यावस्था गुणसूत्र दो संतति अर्धगुणसूत्रों से बना होता है जो आपस में गुणसूत्रबिंदु से जुड़े होते हैं गुणसूत्रबिंदु के सतह पर एक छोटा बिंब आकार की संरचना मिलती है जिसे काइनेटोकोर कहते हैं। गुणसूत्र के सेन्ट्रोमीयर से कुछ तन्तु (टेक्टाइल तन्तु) ध्रुवों से जुड़े रहते हैं।  सूक्ष्म नलिकाओं से बने हुए तर्कुतंतु के जुड़ने का स्थान ये संरचनाएं (काइनेटीकोर) हैं, जो दूसरी ओर कोशिका के केंद्र में स्थित गुणसूत्र से जुड़े होते हैं। इस अवस्था में गुणसूत्र मध्य रेखा पर आकर एकत्र हो जाते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र का एक अर्धगुणसूत्र एक ध्रुव से तर्कुतंतु द्वारा अपने काइनेटोकोर के द्वारा जुड़ जाता है, वहीं इसका संतति अर्धगुणसूत्र तर्कुतंतु द्वारा अपने काइनेटोकोर से विपरीत ध्रुव से जुड़ा होता है। मध्यावस्था में जिस तल पर गुणसूत्र पंक्तिबद्ध हो जाते हैं, उसे मध्यावस्था पट्टिका कहते हैं।

    मध्यावस्था की मुख्य विशेषता

    • तर्कुतंतु गुणसूत्र के काइनेटोकोर से जुड़े रहते हैं।
    • गुणसूत्र मध्यरेखा की ओर जाकर मध्यावस्था पट्टिका पर पंक्तिबद्ध होकर ध्रुवों से तर्कुतंतु से जुड़ जाते हैं।

    पश्चावस्था (anaphase)

    सूत्री विभाजन के अन्तर्गत इस अवस्था में सर्वाधिक कम समय (2-3 मिनट) लगता है। इस अवस्था में अर्धगुणसूत्र अलग हो जाते हैं और सन्तति गुणसूत्रों (daughter chromosomes) के मध्य प्रतिकर्षण ( बल या टेक्टाइल तन्तुओं के ध्रुवों की ओर खिंचाव के कारण ये विपरीत ध्रुवों की ओर गति करते हैं।

    पश्चावस्था की विशेषताएं

    • गुणसूत्रबिंदु विखंडित होते हैं और अर्धगुणसूत्र अलग होने लगते हैं।
    • अर्धगुणसूत्र विपरीत ध्रुवों की ओर जाने लगते हैं।

    अन्त्यावस्था (Telophase)

    इस चरण में में नवजात गुणसूत्र के प्रत्येक जोड़े के चारों ओर एक केन्द्रक झिल्ली का निर्माण होता है और एक पूर्ण कोशिका का निर्माण होता है। इसके साथ ही सन्तति गुणसूत्र ध्रुवों पर एकत्र हो जाते हैं। इस सम्बन्ध में को जन्तु कोशिकाओं में सन्तति कोशिकाओं को पृथक करने के लिए संकुचन होता है, परन्तु पादप कोशिकाओं में संकुचन के स्थान पर कोशिका प्लेट बनती हैं।

    अन्त्यावस्था की मुख्य घटनाएं

    • गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों की ओर एकत्रित हो जाते हैं और इनकी पृथक पहचान समाप्त हो जाती है। 
    • गुणसूत्र समूह के चारों तरफ केंद्रक झिल्ली का निर्माण हो जाता है। 
    • केंद्रिका, गॉल्जीकाय व अंतर्द्रव्यी जालिका का पुनर्निर्माण हो जाता है।

    कोशिका द्रव्य विभाजन (Cytokinesis)

    केन्द्रक विभाजन के बाद कोशिकाद्रव्य का विभाजन होता है। सूत्री विभाजन के दौरान द्विगुणित गुणसूत्रों का संतति केंद्रकों में संपृथकन होता है जिसे केंद्रक विभाजन (Karyokinesis) कहते हैं।  कोशिका विभाजन संपन्न होने के अंत में कोशिका स्वयं एक अलग प्रक्रिया द्वारा दो संतति कोशिकाओं में विभाजित हो जाती है, इस प्रक्रिया को कोशिकाद्रव्य विभाजन कहते हैं। प्राणी कोशिका का विभाजन जीवद्रव्यकला में एक खांच बनने से संपन्न होता है। खांचों के लगातार गहरा होने व अंत में केंद्र में आपस में मिलने से कोशिका का कोशिकाद्रव्य दो भागों में बँट जाता है। यद्यपि पादप कोशिकाएं जो अपेक्षाकृत अप्रसारणीय कोशिका भित्ति से घिरी होती हैं अतः इनमें कोशिकाद्रव्य विभाजन दूसरी भिन्न प्रक्रियाओं द्वारा संपन्न होता है। पादप कोशिकाओं में नई कोशिका भित्ति निर्माण कोशिका के केंद्र से शुरू होकर बाहर की ओर पूर्व स्थित पार्श्व कोशिका भित्ति से जुड़ जाता है। नई कोशिकाभित्ति निर्माण एक साधारण पूर्वगामी रचना से प्रारंभ होता है जिसे कोशिका पट्टिका कहते हैं, जो दो सन्निकट कोशिकाओं की भित्तियों के बीच मध्य पट्टिका को दर्शाती है। कोशिकाद्रव्य विभाजन के समय कोशिका अंगक जैसे सूत्रकणिका (माइटोकॉड्रिया) व प्लैस्टिड लवक का दो संतति कोशिकाओं में वितरण हो जाता है। कुछ जीवों में केंद्रक विभाजन के साथ कोशिकाद्रव्य का विभाजन नहीं हो पाता है। इसके परिणामस्वरूप एक ही कोशिका में कई केंद्रक बन जाते हैं। ऐसी बहुकेंद्रकी कोशिका को संकोशिका कहते हैं  नारियल का तरल भ्रूणपोश इसका एक उदाहरण है । यह पादप कोशिकाओं में फ्रेग्मोप्लास्ट से, कोशिका के मध्य से बाहर की ओर कोशिका प्लेट के निर्माण द्वारा तथा जन्तुओं में कोशिका कला के मध्यवर्ती स्थान से अन्तर्वलन (invagination) द्वारा होता है।

    जन्तु और पादप कोशिकाओं के सूत्री विभाजन में विभिन्नताएँ

    पादप कोशिकाजन्तु कोशिका
    सेन्ट्रियोल अनुपस्थित होते हैं।सेन्ट्रियोल उपस्थित होते हैं।
    एस्टर नहीं बनते हैं।एस्टर बनते हैं।
    कोशिका विभाजन में एक कोशिका प्लेट बनता हैकोशिका विभाजन में कोशिकाद्रव्य का निर्माण और दो भागों में बँटते हैं।

    सूत्री कोशिका विभाजन का महत्त्व (Importance of Mitosis)

    सूत्री विभाजन या मध्यवर्तीय विभाजन केवल द्विगुणित कोशिकाओं में होता है। यद्यपि कुछ निम्न श्रेणी के पादपों एवं सामाजिक कीटों में अगुणित कोशिकाएं भी सूत्री विभाजन द्वारा विभाजित होती हैं। सूत्री विभाजन के कारण जीवों की वृद्धि तथा विकास सम्भव हो पाता है। यह अलैंगिक जनन का आधार है। इससे सन्तति कोशिकाओं (daughter cells) में गुणसूत्रों की संख्या मातृ कोशिका के समान होती हैं। इसके साथ ही सन्तति कोशिकाओं के गुण भी मातृ कोशिका के ही समान होता है। बहुकोशिकीय जीवधारियों की वृद्धि सूत्री विभाजन के कारण होती है। कोशिका वृद्धि के परिणामस्वरूप केंद्रक व कोशिकाद्रव्य के बीच का अनुपात अव्यवस्थित हो जाता है। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि कोशिका विभाजित होकर केंद्रक कोशिकाद्रव्य अनुपात को बनाए रखे। सूत्री विभाजन का एक महत्वपूर्ण योगदान यह है कि इसके द्वारा कोशिका की मरम्मत होती है। अधिचर्म की उपरी सतह की कोशिकाएं, आहार नाल की भीतरी सतह की कोशिकाएं एवं रक्त कोशिकाएं निरंतर प्रतिस्थापित होती रहती है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन (Meiosis)

    इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम फॉर्मर एवं मूरे ने किया। लैंगिक प्रजनन द्वारा संतति के निर्माण में दो युग्मकों का संयोजन होता है, जिनमें अगुणित गुणसूत्रों का एक समूह होता है। युग्मक का निर्माण विशिष्ट द्विगुणित कोशिकाओं से होता है। यह विशिष्ट प्रकार का कोशिका विभाजन है, जिसके द्वारा बनने वाली अगुणित संतति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है। इस प्रकार के विभाजन को अर्धसूत्री विभाजन कहते हैं।  यह विभाजन केवल जनन कोशिकाओं (reproductive cells) में होता है। इस विभाजन में गुणसूत्रों की संख्या कम होकर आधी रह जाती है, इसलिए इसे न्यूनकारी कोशिका विभाजन (reduction division) भी कहा जाता है।

    अर्धसूत्री विभाजन की मुख्य विशेषताएं

    अर्द्धसूत्री विभाजन केन्द्रक विभाजन का रूप है। सूत्री विभाजन की तरह इसमें मुख्य कोशिका में अन्तरावस्था के क्रम में ही DNA रेप्लीकेशन होता है, परन्तु यह केन्द्रक विभाजन (nucleus division) तथा कोशिका विभाजन (cell division) के दो चरणों में पूरा होता है, जिसे अर्द्धसूत्री I और अर्द्धसूत्री II के नाम से जाना जाता है। यह विभाजन जन्तु में शुक्राणु और अण्डाणु के बनने (gametogenesis) के दौरान और पौधों में स्पोर (spore) बनने के क्रम में होता है। यह विभाजन द्विगुणित (diploid) जनन कोशिकाओं में होता है, जिसके परिणामस्वरूप चार अगुणित कोशिकाएँ (haploid cells) बनती हैं।

    अर्धसूत्री विभाजन की अवस्थाएँ

    अर्धसूत्री Iअर्धसूत्री II
    पूर्वावस्था Iपूर्णावस्था II
    मध्यावस्था Iमध्यावस्था II
    पश्चावस्था Iपश्चावस्था II
    अंत्यावस्था Iअंत्यावस्था II

    अर्द्धसूत्री विभाजन। (Meiosis।)

    इसे न्यूनकारी विभाजन (reduction division) भी कहा जाता है।

    इसकी चार अवस्थाएँ होती हैं

    पूर्वावस्था I (Prophase I)

    अर्धसूत्री विभाजन I की पूर्वावस्था की तुलना समसूत्री विभाजन की पूर्वावस्था से की जाए तो, यह अधिक लंबी व जटिल होती है। गुणसूत्रों के व्यवहार के आधार पर इसे पाँच प्रावस्थाओं में उपविभाजित किया गया है जैसे-तनुपट्ट (लेप्टोटीन), युग्मपट्ट (जाइगोटीन), स्थूलपट्ट (पैकेटीन), द्विपट्ट (डिप्लोटीन) व पारगतिक्रम (डायकाइनेसिस)।

    साधारण सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखने पर तनुपट्ट (लिप्टोटीन) अवस्था के दौरान गुणसूत्र धीरे-धीरे स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं। गुणसूत्र का संहनन (कॉम्पैक्शन) पूरी तनुपट्ट अवस्था के दौरान जारी रहता है। इसके उपरांत पूर्वावस्था I का द्वितीय चरण प्रारंभ होता है, जिसे युग्मपट्ट कहते हैं। इस अवस्था के दौरान गुणसूत्रों का आपस में युग्मन प्रारंभ हो जाता है और इस प्रकार की संबद्धता को सूत्रयुग्मन कहते हैं।

    लेप्टोटीन

    इसमें केन्द्रक जाल संघनित होकर गुणसूत्र बनाते हैं। एक ही प्रकार के गुण रखने वाले गुणसूत्र समजात गुणसूत्र कहलाते हैं।

    युग्मपट्ट (जाइगोटीन) 

    इस उप-अवस्था में समजात गुणसूत्र युग्म बनाते हैं। इस क्रिया को सिनेप्सिस (synapsis) कहते हैं। इस प्रकार के गुणसूत्रों के युग्मों को समजात गुणसूत्र कहते हैं। इस अवस्था का इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मलेखी यह दर्शाता है कि गुणसूत्र सूत्रयुग्मन के साथ एक जटिल संरचना का निर्माण होता है, जिसे सिनेप्टोनिमल सम्मिश्र कहते हैं। जिस सम्मिश्र का निर्माण एक जोड़ी सूत्रयुग्मित समजात गुणसूत्रों द्वारा होता है, उसे युगली (bivalent) अथवा चतुष्क (tetrad) कहते हैं। यद्यपि ये अगली अवस्था में अधिक स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। पूर्वावस्था I की उपर्युक्त दोनों अवस्थाएं स्थूलपट्ट (Pachytene) अवस्था से अपेक्षाकृत कम अवधि की होती हैं। इस अवस्था के दौरान प्रत्येक युगली गुणसूत्र के चार अर्ध गुणसूत्र चतुष्क के रूप में अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं।

    इस अवस्था में पुनर्योजन ग्रंथिकाएं दिखाई देने लगती हैं जहाँ पर समजात गुणसूत्रों के असंतति अर्धगुणसूत्रों के बीच विनिमय (क्रासिंग ओवर) होता है। विनिमय दो समजात गुणसूत्रों के बीच आनुवंशिक पदार्थों के आदान-प्रदान के कारण होता है। विनिमय एंजाइम द्वारा नियंत्रित प्रक्रिया है व जो एंजाइम इस प्रक्रिया में भाग लेता है, उसे रिकाम्बीनेज कहते हैं। दो गुणसूत्रों में आनुवंशिक पदार्थों का पुनर्योजन जीन विनिमय द्वारा अग्रसर होता है। समजात गुणसूत्रों के बीच पुनर्योजन स्थूलपट्ट अवस्था के अंत तक पूर्ण हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप विनिमय स्थल पर गुणसूत्र जुड़े हुए दिखाई पड़ते हैं। द्विपट्ट (डिप्लोटीन) के प्रारंभ में सिनेप्टोनीमल सम्मिश्र का विघटन हो जाता है और युगली के समजात गुणसूत्र विनिमय बिंदु के अतिरिक्त एक दूसरे से अलग होने लगते हैं।

    विनिमय बिंदु पर X आकार की संरचना को काएज्मेटा कहते हैं। कुछ कशेरुकी प्राणियों के अडंकों में द्विपट्ट महीनों या वर्षों बाद समाप्त होती है।

    अर्धसूत्री पूर्वावस्था I की अंतिम अवस्था पारगतिक्रम (डायाकाइनेसिस) कहलाती है। जिसमें काएज्मेटा का उपांतीभवन हो जाता है, जिसमें काएज्मेटा का अंत होने लगता है। इस अवस्था में गुणसूत्र पूर्णतया संघनित हो जाते हैं व तर्कुतंतु एकत्रित होकर समजात गुणसूत्रों को अलग करने में सहयोग प्रदान करते हैं। पारगतिक्रम के अंत तक केंद्रिका अदृश्य हो जाती है और केंद्रक-आवरण झिल्ली भी विघटित हो जाता है। पारगतिक्रम मध्यावस्था की ओर पारगमन को निरूपित करता है।

    पैकेटीन

    इस उप-अवस्था में गुणसूत्र के लम्बाई में फटने के कारण समजात गुणसूत्र जोड़े में चार क्रोमैटिड दिखाई देते हैं। इस स्थिति को चर्तुसंयोजक (tetrad) कहा जाता है। समजात गुणसूत्रों के अबहन अर्द्धगुणसूत्रों के मध्य विनियम (crossing over) भी होता है।

    डिप्लोटीन

    इसमें समजात गुणसूत्र का प्रत्येक अर्द्धगुणसूत्र एक-दूसरे से अलग होने लगता है, परन्तु कुछ स्थानों पर एक-दूसरे के साथ क्रॉस रखता है, जिसे क्याज्मेटा कहते हैं।

    डाइकाइनेसिस

    इस उप-अवस्था में केन्द्रक तथा केन्द्रक कला लुप्त हो जाती हैं तथा क्याज्मेटा गुणसूत्र के सिरे की ओर खिसकने लगते हैं, जिसे टर्मिनेलाइजेशन (terminalization) कहते हैं।

    मध्यावस्था I (Metaphase I)

    इसमें तर्कु उपकरण बन जाता है तथा तर्कु तन्तु गुणसूत्रों के सेन्ट्रोमीटर से जुड़ जाते हैं।

    पश्चावस्था I (Anaphase I)

    तर्कु तन्तुओं के संकुचन के कारण समजात गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों पर जाने लगते हैं और प्रत्येक ध्रुव पर गुणसूत्र की संख्या आधी हो जाती है।

    अन्त्यावस्था I (Telophase I)

    इस अवस्था में केन्द्रक तथा केन्द्रक कला प्रकट हो जाती है। कोशिकाद्रव्य विभाजन शुरू हो जाता है और कोशिका की इस अवस्था को कोशिका द्विक कहते हैं। कोशिकाद्रव्य विभाजन द्वारा दो कोशिकाएँ बनती हैं, जो अन्त्यावस्था में प्रवेश करती है, परन्तु इसमें DNA का द्विगुणन नहीं होता है। उसके बाद पूर्वावस्था II आती है जो पूर्वावस्था I से काफी सरल होती है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन || (Meiosis II)

    अर्द्धसूत्री I के बाद यह अवस्था शुरू होती है। दोनों के मध्य की अवस्था विरामावस्था कहलाती है। इस चरण में चार अवस्थाएँ होती हैं, जो सूत्री विभाजन के समान होता है।

    पूर्वावस्था II (Interphase II)

    अर्धसूत्री विभाजन II गुणसूत्र के पूर्ण लंबा होने के पहले व कोशिकाद्रव्य विभाजन के तत्काल

    बाद प्रारंभ होता है। इसमें केन्द्रिका और केन्द्रक आवरण विखर जाते हैं साथ ही अर्द्धगुणसूत्र छोटे और मोटे हो जाते हैं तथा तर्कु (spindle fibre) बन जाते हैं।

    मध्यावस्था II (Metaphase II)

    इसमें केन्द्रिका और केन्द्रक झिल्ली विलुप्त हो जाती है। तर्क बन जाती है और गुणसूत्र तर्क के मध्य रेखा (equator) पर सेन्ट्रोमीयर द्वारा चिपक जाते हैं।

    पश्चावस्था II (Anaphase II)

    इसमें सेन्ट्रियोल पहले सेन्ट्रोमीयर्स को और फिर क्रोमैटिड्स को विपरीत ध्रुवों पर खींचते हैं।

    अन्त्यावस्था II (Telophase II)

    यह अवस्था अर्धसूत्री विभाजन की अंतिम अवस्था है, जिसमें गुणसूत्रों के दो समूह पुनः केंद्रक आवरण द्वारा घिर जाते हैं। कोशिकाद्रव्य विभाजन के उपरांत चार अगुणित संतति कोशिकाओं का कोशिका चतुष्टय बन जाता है। इस तरह इसमें चार नई कोशिकाओं का निर्माण होता है। गुणसूत्र कुण्डली से खुलकर, सीधे, लम्बे और एक समान हो जाते है। तकुं (spindle fibre) विलुप्त हो जाते हैं और सेन्टियोल दोहरे हो जाते हैं। केन्द्रक आवरण केन्द्रक के चारों ओर फिर से बनते हैं, जहाँ गुणसूत्र संख्या अविभाजित कोशिका में मौजूद गुणसूत्रों की संख्या की आधी (haploid) की होती है। जीव को एक अविभाजित कोशिका से चार नए कोशिकाओं का निर्माण करते हैं।

    मुख्यतया अगुणित जीवन चक्र वाले पौधों; जैसे-यूलोथ्रिक्स में युग्मनज में अर्द्धसूत्री विभाजन, द्विगुणित जीवन चक्र वाले पौधों में युग्मकी अर्द्धसूत्री विभाजन तथा उच्च वर्ग के पौधों में बीजाणुक अर्द्धसूत्री विभाजन (sporic meiosis) होता है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन का महत्त्व (Importance of Melosis)

    अर्द्धसूत्री विभाजन में विनिमय (crossing over) द्वारा नई किस्मों का विकास होता है। चूंकि एक जाति के समस्त जीवों में पीढ़ी दर पीढ़ी गुणसूत्रों की संख्या सदैव स्थिर रहती है, जो अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा ही सम्भव हो पाता है।

    अर्द्धसूत्री विभाजन के मौलिक लक्षण

    समसूत्री एवं अर्द्धसूत्री विभाजन में अंतर (Differences between Mitosis and Meiosis)

    समसूत्री विभाजनअर्द्धसूत्री विभाजन
    यह शरीर के कायिक कोशिकाओं एवं लैंगिक कोशिकाओं में होता है।यह केवल लैंगिक कोशिकाओं में होता है।
    कोशिका के गुणसूत्रों में कोई परिवर्तन नहीं होता है।इसमें सन्तति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या आधी रह जाती है।
    यह प्रक्रिया चार अवस्थाओं में सम्पन्न होती है।यह दो उपविभाजनों में पूरा होता है जिसमें पहला न्यूनकारी (reductional) तथा प्रत्येक विभाजन में 4-5 अवस्थाएँ होती हैं।
    गुणसूत्रों के आनुवंशिक पदार्थ में आदान-प्रदान नहीं होता है इसलिए सन्तति कोशिकाओं में भी उसी प्रकार के गुणसूत्र होते हैं, जैसे जनक कोशिका में।गुणसूत्रों के बीच आनुवंशिक पदार्थ का आदान-प्रदान होता है इसलिए सन्तति कोशिकाओं के गुणसूत्र में कुछ भाग पितृ कोशिका से तथा कुछ भाग मातृ कोशिका से आ जाता है अतःसन्तति कोशिका के गुणसूत्र, जनकों के गुणसूत्र से भिन्न होते हैं।
    सन्तति कोशिका में जनक जैसे ही गुणसूत्र होने के कारण आनुवंशिक विविधता नहीं होती है lसन्तति कोशिकाओं में जनकों से भिन्न गुणसूत्र होने के कारण आनुवंशिक विविधता होती है।
    एक जनक (parents) से दो सन्तति कोशिकाएँ (daughter) बनती हैं।एक जनक से चार सन्तति कोशिकाएँ बनती हैं।

  • कोशिका (Cell) से जुड़े महत्वपुर्ण प्रश्न और उत्तर | कोशिका (Koshika) के सवाल और जवाब | जीव विज्ञान प्रश्नोतरी | Cell Biology Topics | कोशिका विज्ञान से जुडी जानकारी |

    कोशिका (Cell) से जुड़े महत्वपुर्ण प्रश्न और उत्तर | कोशिका (Koshika) के सवाल और जवाब | जीव विज्ञान प्रश्नोतरी | Cell Biology Topics | कोशिका विज्ञान से जुडी जानकारी |

    कोशिका संबंधी महत्वपूर्ण प्रश्न – जीव विज्ञान प्रश्नोतरी | Cell Biology Topics – इस आर्टिकल में हमने कोशिका से जुड़े कुछ महत्वपुर्ण प्रश्नों को उनके उत्तर सहित शामिल किया है | आर्टिकल में हमने कोशिका से जुड़े जितने भी परीक्षा की दृष्टि से Koshika – important question and answers को जोड़ा है | साथ ही कोशिका संबंधी महत्वपूर्ण प्रश्न- जीव विज्ञान प्रश्नोत्तरी | Cell Biology Topics, कोशिका विज्ञान के महत्वपूर्ण प्रश्न (cell biology topics) – प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाने वाले कोशिका विज्ञान (cytology) या कोशिका जैविकी (cell biology general science questions) विषयक महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (biology gk questions) आदि इसमें सम्मिलित किये गये है |

    कोशिका से क्या समझते हैं ?

    कोशिका जीवधारियों की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई होती है | कोशिका प्राय: स्वत: जनन की सामर्थ्य रखती है। यह विभिन्न पदार्थों का वह छोटे-से-छोटा संगठित रूप है जिसमें वे सभी क्रियाएँ होती हैं जिन्हें सामूहिक रूप से हम जीवन कहतें हैं। सजीवों की सभी जैविक क्रियाएँ कोशिकाओं के भीतर होती हैं। प्रत्येक जीव का जीवन एक कोशिका से आरम्भ होता है | यदि वह इसी एक कोशिका के सहारे अपने जीवन को चलाता रहता है तो उसे एककोशिकीय जीव (Unicellular) जीव कहा जाता है, परन्तु अधिकांश जीवों में यह कोशिका विभाजन करती है और अंत में बहुकोशिकीय जीव बन जाता है |

    कोशिका कितनी होती है?

    कुछ सजीव जैसे जीवाणुओं के शरीर एक ही कोशिका से बने होते हैं, उन्हें एककोशकीय जीव कहते हैं जबकि कुछ सजीव जैसे मनुष्य का शरीर अनेक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है उन्हें बहुकोशकीय सजीव कहते हैं। मानव शरीर में लगभग 60-90 ट्रिलियन सेल से बना होता है।

    कोशिका की खोज किसने की और कब की?

    कोशिका की खोज सर्वप्रथम रॉबर्ट हुक ने 1665 में की। उन्होंने कार्क की एक महीन काट में मधुमक्खी के छत्ते के समान कोठरियाँ देखी जिन्हें उन्होंने कोशिका (सेल-Cell) का नाम दिया। हुक की इस खोज ने कोशिकाओं को जीवन की सबसे छोटी इकाइयों के रूप में समझने के लिए प्रेरित किया तथा कोशिका सिद्धांत की नींव रखी | 1939 ई० में श्लाइडेन तथा श्वान ने कोशिका सिद्धान्त प्रस्तुत किया जिसके अनुसार सभी सजीवों का शरीर एक या एकाधिक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है तथा सभी कोशिकाओं की उत्पत्ति पहले से उपस्थित किसी कोशिका से ही होती है।

    कोशिका सिद्धान्त किसने प्रस्तुत किया ?

    1939 ई० में श्लाइडेन तथा श्वान ने कोशिका सिद्धान्त प्रस्तुत किया जिसके अनुसार सभी सजीवों का शरीर एक या एकाधिक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है तथा सभी कोशिकाओं की उत्पत्ति पहले से उपस्थित किसी कोशिका से ही होती है।

    कोशिका प्रायः छोटी होती है क्यों?

    कोशिका के बड़े होने के साथ सतह का आयतन अनुपात छोटा हो जाता है। इस प्रकार, यदि कोशिका एक निश्चित सीमा से आगे बढ़ेगी तो पर्याप्त सामग्री कोशिका झिल्ली को पार करने में सक्षम नहीं हो पायेगी यही कारण है कि कोशिकाओं का आकार आम तौर पर छोटा होता है।

    कोशिका का कार्य क्या है?

    सजीवों की सभी जैविक क्रियाएँ कोशिकाओं के भीतर होती हैं। कोशिकाओं के भीतर ही आवश्यक आनुवांशिक सूचनाएँ होती हैं जिनसे कोशिका के कार्यों का नियंत्रण होता है तथा सूचनाएँ अगली पीढ़ी की कोशिकाओं में स्थानान्तरित होती हैं। कोशिका जीवधारियों की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई होती है | कोशिका प्राय: स्वत: जनन की सामर्थ्य रखती है। यह विभिन्न पदार्थों का वह छोटे-से-छोटा संगठित रूप है जिसमें वे सभी क्रियाएँ होती हैं जिन्हें सामूहिक रूप से हम जीवन कहतें हैं।

    कोशिका का सबसे बड़ा कोशिकांग कौन सा है?

    केंद्रक कोशिका का सबसे बड़ा कोशिकांग है। कोशिका द्रव्य में स्थित वह संरचना जो जीवद्रव्य की क्रियाओं को संचालित करता है अर्थात कोशिका का नियंत्रण करता है, केंद्रक कहलाता है | केंद्रक कोशिका का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग है जो कोशिका के प्रबन्धक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। केंद्रक में कोशिका की वंशानुगत जानकारी होती है और कोशिका के विकास और प्रजनन को नियंत्रित भी करती है|

    यूकेरियोटिक से आप क्या समझते हैं?

    इस प्रकार की कोशिकाओं में पूर्ण विकसित केन्द्रक अर्थात् केन्द्रक कला और केन्द्रिका युक्त तथा पूर्ण विकसित कोशिकांग पाए जाते हैं। इस प्रकार की कोशिकाओं के गुणसूत्र में DNA तथा हिस्टोन प्रोटीन से बनी इकाई न्यूक्लिओसोम पाई जाती हैं। ये कोशिका अर्थात् वास्तविक केन्द्रक वाली यूकैरियोटिक कोशिकाएँ अधिकांश शैवाल, उच्च पादप एवं जन्तुओं में पाई जाती हैं।

    प्रोकैरियोटिक कोशिका क्या है ?

    प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में केन्द्रक कला नहीं होती है। इस प्रकार केन्द्रकीय पदार्थ कोशिकाद्रव्य में बिखरा होता है। गुणसूत्र के स्थान पर हिस्टोन प्रोटीन रहित DNA के धागे होते हैं। ऐसी कोशिकाओं में पूर्ण रूप से विकसित कोशिकांगों का अभाव रहता है। ये कोशिकाएँ अर्थात् वास्तविक केन्द्रक रहित प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ नीले-हरे शैवाल, माइकोप्लाज्मा और जीवाणु में पाई जाती हैं।

    मानव शरीर की सबसे छोटी कोशिका कौन है?

    शुक्राणु मानव शरीर की सबसे छोटी कोशिका होती है। यह एक नर जनन कोशिका है ।

    कोशिका कला कहाँ पाई जाती है?

    केन्द्रक कोशिका के लगभग मध्य में स्थित एक गोलाकार या अण्डाकार संरचना होती है। सामान्यतया एक कोशिका में एक ही केन्द्रक पाया जाता है। केन्द्रक एक दोस्तरीय आवरण से घिरी संरचना है जिसे केन्द्रक कला कहते हैं। कोशिका कला या कोशिका झिल्ली (cell membrane) कोशिका की सबसे बाहरी परत, जो उसके विभिन्न घटकों को बाहरी वातावरण से अलग करती है।

    सबसे छोटी कोशिका का नाम क्या है?

    माइकोप्लाज़्मा को सबसे छोटी जीवित कोशिका के रूप में जाना जाता है लेकिन इसमें कोशिका भित्ति नहीं होती है। ये एककोशिकीय जीव हैं जो ऑक्सीजन के बिना जीवित रह सकते हैं।

    रॉबर्ट हुक ने कोशिका की खोज कैसे की?

    कोशिका की खोज सबसे पहले सन् 1665 में “रॉबर्ट हुक”(Robert Hooke) ने किया था रॉबर्ट हुक ने कंपाउंड माइक्रोस्कोप की मदद से बोतल की काॅर्क की महीन टुकड़ों में मधुमक्खी के छत्ते के समान कोठरियां देखी, जिसको उन्होंने “कोशिका” का नाम दिया इसलिए उन्हें कोशिका (Cell) के खोजकर्ता कहा जाता है

    कोशिका चक्र क्या है ?

    कोशिका चक्र, या कोशिका-विभाजन चक्र, एक कोशिका में होने वाली घटनाओं की श्रृंखला है जो इसे दो कोशिकाओं (daughter cell) में विभाजित करने का कारण बनती है।

    कोशिका चक्र का क्रम क्या है?

    एक कोशिका चक्र घटनाओं की एक श्रृंखला है जो एक कोशिका के बढ़ने और विभाजित होने पर घटित होती है अर्थात घटनाओं का वह अनुक्रम जिसमे कोशिका अपने जीनोम का द्विगुणन एवं अन्य संघटको का संश्लेषण होता है और इसके बाद विभाजित होकर दो नयी संतति कोशिकाओं का निर्माण करती है, कोशिका चक्र कहलाती है। कोशिका चक्र की दो मूल प्रावस्थाएँ होती है अर्थात सम्पूर्ण प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होती है, प्रथम चरण में कोशिका के केन्द्रक का विभाजन होता है। इस प्रक्रिया को केन्द्रक-विभाजन (कैरियोकाइनेसिस) कहते हैं। विभाजन के द्वितीय चरण में कोशिका-द्रव्य का विभाजन होता है। इस प्रक्रिया को कोशिका-द्रव्य विभाजन कहते हैं।

    मनुष्य में कोशिका चक्र कितने समय का होता है?

    मनुष्य में कोशिका चक्र 24 घंटे का होता है |

    कोशिका चक्र का सबसे लंबा चरण कौन सा है?

    कोशिका चक्र की सम्पूर्ण प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होती है, प्रथम चरण में कोशिका के केन्द्रक का विभाजन होता है। इस प्रक्रिया को केन्द्रक-विभाजन (कैरियोकाइनेसिस) कहते हैं। विभाजन के द्वितीय चरण में कोशिका-द्रव्य का विभाजन होता है। इस प्रक्रिया को कोशिका-द्रव्य विभाजन कहते हैं।

    कोशिका चक्र का प्रशांत प्रावस्था Go क्या है?

    वे कोशिकाएँ जो आगे विभाजित नहीं होती हैं तथा निष्क्रिय अवस्था में पहुँचती हैं, जिसे कोशिका, चक्र की प्रशांत अवस्था (G0) कहा जाता है। इस अवस्था की कोशिका उपापचयी रूप से सक्रिय होती है, लेकिन विभाजित नहीं होती, इनमें विभाजन जीव की आवश्यकता के अनुसार होता है।

    यीस्ट को कोशिका चक्र पूरा करने में कितना समय लगता है?

    यीस्ट के कोशिका चक्र के पूर्ण होने में लगभग नब्बे मिनट लगते हैं।

    जीवद्रव्य क्या है ?

    कोशिका का एक बड़ा भाग है, जो कोशिका झिल्ली या प्लाज्मा झिल्ली से घिरा एक तरल पदार्थ होता है। इसमें बहुत से कोशिका के घटक होते हैं, जिसे कोशिका अंग कहते हैं, जो कोशिका के लिए विशिष्ट कार्य करते हैं। कोशिकाद्रव्य तथा केन्द्रक दोनों को मिलाकर जीवद्रव्य कहलाता है। यह कोशिकाद्रव्य चिपचिपा, रंगहीन तथा कणिकामय होती है। यहाँ एन्जाइम की प्रचुरता होती है।

    गॉल्जीकाय की खोज कब हुई?

    गॉल्जीकाय (Golgi apparatus also known as the Golgi complex, Golgi body) की पहचान 1897 में इतालवी वैज्ञानिक कैमिलो गोल्गी (Camillo Golgi) ने की थी और 1898 में उनके नाम गॉल्जीकाय का नाम रखा गया था | कैमिलो गोल्गी इटली का एक तंत्रिका वैज्ञानिक था, जिसने श्वेत उलूक (Barn Owl) की तंत्रकोशिकाओं में इसका पता लगाया, जो उसके नाम से ही विख्यात है। इसकी आकृति चपटी होती है तथा ये एक के बाद एक समानान्तर रूप में स्थिर रहे हैं। गॉल्जीकाय को लाइपोकॉण्ड्यिा या डिक्टियोसोम भी कहा जाता है।

    कोशिका का ट्रैफिक पुलिस किसे कहा जाता है ?

    गॉल्जीकाय को कोशिका को ‘ट्रैफिक पुलिस‘ भी कहा जाता है।

    कोशिका का कौन सा अंग आत्मघाती थैली के नाम से जाना जाता है?

    लाइसोसोम (Lysosome) को कोशिका की आत्मघाती थैली या आत्महत्या की थैली कहा जाता है | यह कोशिका का अपशिष्ट निपटाने वाला तन्त्र है। लाइसोसोम में बहुत शक्तिशाली पाचन एंजाइम (digestive enzymes) होते हैं जो कार्बनिक पदार्थ को तोड़ देते हैं। कोशिकीय उपापचय में रूकावट के कारण जब कोशिका क्षतिग्रस्त या मर हो जाती है तो लाइसोसोम फट जाते हैं और अपनी ही कोशिका को पाचित कर देते हैं या खा जाते या नष्ट हो जाते हैं। असल में लाइसोसोम कोशिका का आमाशय (पेट) होते हैं। एसिड भरी ये थैलियां फटने पर उनके एसिड तत्व कोशिका को ही नष्ट कर देते हैं।

    क्यों लाइसोसोम आत्मघाती बैग कहा जाता है?

    लाइसोसोम (lysosomes) को आत्मघाती थैली (suicide bags) इसलिए कहते हैं क्योकि यह कोशिका का अपशिष्ट निपटाने वाला तन्त्र है। लाइसोसोम में बहुत शक्तिशाली पाचन एंजाइम (digestive enzymes) होते हैं जो कार्बनिक पदार्थ को तोड़ देते हैं। कोशिकीय उपापचय में रूकावट के कारण जब कोशिका क्षतिग्रस्त या मर हो जाती है तो लाइसोसोम फट जाते हैं और अपनी ही कोशिका को पाचित कर देते हैं या खा जाते या नष्ट हो जाते हैं। असल में लाइसोसोम कोशिका का आमाशय (पेट) होते हैं। एसिड भरी ये थैलियां फटने पर उनके एसिड तत्व कोशिका को ही नष्ट कर देते हैं।

    कोशिका के किस अंगक को बिजलीघर कहते हैं और क्यों?

    चूँकि सभी आवश्यक रासायनिक क्रियाओं को करने के लिए माइटोकॉण्ड्रिया ATP के रूप में ऊर्जा प्रदान करते हैं इसिलिय माइटोकाण्ड्रिया को कोशिका का ऊर्जा संयन्त्र या बिजली घर कहा जाता है। माइटोकाण्ड्रिया में जो एन्जाइम होते है वो भोजन पदार्थो का ऑक्सीकरण करके ऊर्जा का निर्माण करते है, जो ए.टी.पी. के रूप में एकत्र होती है।

    मानव तंत्रिका कोशिका का रेखाचित्र बनाइए | | तंत्रिका कोशिकाओं द्वारा क्या कार्य किया जाता है ?

    तंत्रिका कोशिका संदेश प्राप्त कर उनका स्थानान्तरण करती है, जिसके द्वारा यह शरीर में नियंत्रण एवं समन्वय का कार्य करती है। इस कोशिका का कार्य मस्तिष्क से सूचना का आदान प्रदान और विश्लेषण करना है किसी चीज के स्पर्श छूने, ध्वनि या प्रकाश के होने पर ये तंत्रिका कोशिका ही प्रतिक्रिया करते हैं और यह अपने संकेत मेरु रज्जु और मस्तिष्क को भेजते हैं। मोटर तंत्रिका कोशिका मस्तिष्क और मेरु रज्जु से संकेत ग्रहण करते हैं। मांसपेशियों की सिकुड़न और ग्रंथियां इससे प्रभावित होती है। एक सामान्य और साधारण तंत्रिका कोशिका में एक कोशिका यानि सोमा, डेंड्राइट और कार्रवाई होते हैं। तंत्रिका कोशिका का मुख्य हिस्सा सोमा होता है।

    माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का ऊर्जा क्यों कहते हैं?

    माइटोकॉन्ड्रिया किसी भी कोशिका के अंदर पाया जाता है जिसका मुख्य काम कोशिका के हर हिस्से में ऊर्जा पहुंचाना होता है | माइटोकाण्ड्रिया में जो एन्जाइम होते है वो भोजन पदार्थो का ऑक्सीकरण करके ऊर्जा का निर्माण करते है, जो ए.टी.पी. के रूप में एकत्र होती है। इसी कारण माइटोकांड्रिया को कोशिका का पावर हाउस भी कहा जाता है |

    अर्धस्वायत्त कोशिकांग (semi autonomous organelle) किसे कहा जाता है ?

    माइटोकॉण्ड्रिया के मैट्रिक्स में क्रैब्स चक्र के एन्जाइम, DNA, राइबोसोम तथा RNA स्थित होते हैं इसलिए माइटोकॉण्ड्रिया को अर्धस्वायत्त कोशिकांग (semi autonomous organelle) कहा जाता है।

    अर्द्धस्वशासित कोशिकांग कोनसे है ?

    माइटोकॉण्ड्रिया और हरितलवक अर्द्धस्वशासित कोशिकांग कहलाते हैं।

    पादप कोशिका और जंतु कोशिका में क्या अंतर है?

    पादप कोशिका
    कोशिका कला चारों ओर से एक भित्ति द्वारा घिरी रहती है, जिसे कोशिका भित्ति कहते हैं, जो प्रायः सेलुलोज नामक पदार्थ की बनी होती है।
    बड़ी-बड़ी रसधानियाँ होती हैं, जो कि कोशिका का काफी बड़ा भाग घेरे रहती हैं।
    लवक पाए जाते हैं (हरे हरितलवक, रंगहीन ल्यूकोप्लास्ट एवं रंगीन क्रोमोप्लास्ट)।
    अधिकांश पौधों की कोशिकाओं में सेन्ट्रोसोम नहीं पाए जाते हैं।
    अधिकांश पौधों की कोशिकाओं में लाइसोसोम नहीं मिलते।

    जन्तु कोशिका
    कोशिका कला के बाहर कोई भित्ति नहीं होती। कोशिका कला ही कोशिका की सीमा है।
    रसधानियाँ अनुपस्थित या बहुत छोटी होती हैं। अतः कोशिकाद्रव्य कोशिका में समान रूप से वितरित रहता है
    लवक नहीं पाए जाते हैं।
    अधिकांश जन्तुओं की कोशिकाओं में सेण्ट्रोसोम पाए जाते हैं।
    लाइसोसोम पाए जाते हैं।

    प्रोकैरियोटिक में कौन कौन से जीव आते हैं?

    प्रोकैरियोटिक कोशिका नीले- हरे शैवालों तथा जीवाणुओं में ये कोशिकाएं पायी जाती हैं। प्रोकैरियोटिक कोशिका में क्लोरोप्लास्ट, गॉल्जीबाड़ी, तारककाय, माइक्रोकान्ड्रिया तथा अन्तः द्रव्यीजालिका (E.R.) नहीं पायी जाती है। फिर भी 70S प्रकार के राइबोसोम्स पाये जाते हैं तथा इनमें डीएनए हिस्टोन प्रोटीन से सम्बद्ध नहीं होता है।

    प्रोकैरियोटिक जीव कौन सा होता है?

    सबसे छोटा ज्ञात प्रोकैरियोटिक जीव माइकोप्लाज्मा है। माइकोप्लाज्मा सबसे छोटे मुक्त जीव हैं और बैक्टीरिया के सबसे सरल माने जाते हैं। वे जीवाणु वर्ग मोलिक्यूट्स से संबंधित हैं, जिनके सदस्य कोशिका भित्ति की कमी और उनके प्लाज्मा जैसे रूप से प्रतिष्ठित हैं।

    माइकोप्लाज्मा क्या है ?

    माइकोप्लाज्मा सबसे छोटे मुक्त जीव हैं और बैक्टीरिया के सबसे सरल माने जाते हैं। वे जीवाणु वर्ग मोलिक्यूट्स से संबंधित हैं, जिनके सदस्य कोशिका भित्ति की कमी और उनके प्लाज्मा जैसे रूप से प्रतिष्ठित हैं। सबसे छोटा ज्ञात प्रोकैरियोटिक जीव माइकोप्लाज्मा ही है।

    सबसे लंबी कोशिका का नाम क्या है?

    मनुष्यों में सबसे लम्बी कोशिका न्यूरॉन्स जिन्हें तंत्रिका कोशिका (nerve cell) भी कहा जाता है होती है | न्यूरॉन्स या तंत्रिका कोशिकाएं 3 फीट तक लंबी हो सकती हैं। ये मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र की मूलभूत इकाइयाँ हैं । एक विशिष्ट न्यूरॉन में एक cell morphology होता है जिसे सोमा कहा जाता है, इनकी बाल जैसी संरचनाएं जिन्हें डेंड्राइट्स और एक अक्षतंतु कहा जाता है। न्यूरॉन्स पूरे शरीर में दिमाग के जरिये knowledge पहुंचाने में सक्षम होते हैं। न्यूरॉन्स में भी विशेषत: motor neuron (मोटर न्यूरॉन) सबसे बड़ी कोशिका होती है | महिलाओं के शरीर में मानव अंडाणु (human egg ) जो की एक अपवाद (exception) है, वास्तव में शरीर की सबसे बड़ी कोशिका होती है |

    महिला शरीर में सबसे बड़ी कोशिका कौन सी है?

    मानव अंडाणु (human egg ) या अंडकोशिका जो की एक अपवाद (exception) है, वास्तव में शरीर की सबसे बड़ी कोशिका है और इसे बिना सूक्ष्मदर्शी के देखा जा सकता है। अन्य मानव कोशिकाओं की तुलना में, अंडे की कोशिकाएं बहुत बड़ी होती हैं। वे व्यास में 100 माइक्रोन हैं (जो कि एक मीटर का दस लाखवां हिस्सा है) और बालों के एक कतरा के बराबर चौड़ाई में होते है।

    सबसे छोटी मानव कोशिका कोनसी होती है ?

    सेरिबैलम (Cerebellum)की ग्रेन्युल कोशिका (Granule Cell) मानव शरीर की सबसे छोटी कोशिका होती है जो 4 माइक्रोमीटर से 4.5 माइक्रोमीटर लंबी होती है। RBC का आकार भी लगभग 5 माइक्रोमीटर पाया गया है ।

    मानव शरीर की सबसे लम्बी और सबसे बड़ी कोशिका कौन सी है?

    मानव अंडाणु (human egg ) या अंडकोशिका मानव शरीर (महिलाओं में ) की सबसे बड़ी कोशिका है। तंत्रिका कोशिका शरीर में सबसे लंबी कोशिका है।

    कोशिका झिल्ली के कौन कौन से कार्य हैं?

    कोशिका झिल्ली लचीली होती है और कार्बनिक अणुओं; जैसे-ग्लाइकोप्रोटीन तथा ग्लाइकोलिपिड की बनी होती है। कोशिका झिल्ली का लचीलापन एककोशिकीय जीवों में कोशिका के बाह्य वातावरण से भोजन तथा अन्य पदार्थ ग्रहण करने में सहायता करता है। इस प्रक्रिया को एण्डोसाइटोसिस कहते हैं। अमीबा इसी प्रक्रिया द्वारा भोजन ग्रहण करता है। कोशिका झिल्ली कोशिका की आकृति का निर्माण करती है एवं जीव द्रव्य की रक्षा करती है। साथ ही कोशिका झिल्लीअन्तर कोशिकीय विसरण एवं परासरण की क्रिया को नियंत्रित करने के साथ-साथ यह विभिन्न रचनाओं के निर्माण में भी सहायता करती है। कोशिका झिल्ली को सी. क्रेमर एवं नेगेली (1855) ने कोशिका कला एवं प्लोव ने जीवद्रव्य कला कहा।

    कोशिका कला क्या है ?

    कोशिका कला या कोशिका झिल्ली कोशिका की सबसे बाहरी परत, जो उसके विभिन्न घटकों को बाहरी वातावरण से अलग करती है। कोशिका के सभी अवयव एक पतली झिल्ली द्वारा घिरे रहते हैं। यह झिल्ली आवश्यक पदार्थों को अन्दर अथवा बाहर जाने देती है। इसी को चयनात्मक पारगम्यता (selective permeability) कहते हैं। इस दृष्टि से O2 एवं CO2, कोशिका झिल्ली के आर-पार विसरण प्रक्रिया तथा जल परासरण प्रक्रिया द्वारा कोशिका के अन्दर एवं बाहर होते हैं।

    लाइसोसोम कौन बनाता है?

    लाइसोसोम मुख्यतया जन्तु कोशिकाओं में पाई जाने वाली गोल इकहरी झिल्लियों से घिरी थैलियाँ है, जिसमें 50 हाइड्रोलिटिक एन्जाइम पाए जाते हैं वे एक एकल झिल्ली से घिरे होते हैं जो मोटाई में 100 एनएम तक होती है। वे गॉल्जी तंत्र द्वारा बनते हैं और इनमें लगभग 60 विभिन्न प्रकार के अम्ल हाइड्रोलाज़ होते हैं जो विभिन्न सामग्रियों के पाचन में मदद करते हैं। , यह लगभग 5 pH पर कार्य करते हैं। यह कोशिका का अपशिष्ट निपटाने वाला तन्त्र है। लाइसोसोम में उपस्थित पाचनकारी एन्जाइम कार्बनिक पदार्थ को तोड़ देते हैं। लाइसोसोम को आत्महत्या की थैली भी कहा जाता है।

    कोशिका की खोज रॉबर्ट हुक ने कब की?

    कोशिका की खोज रॉबर्ट हुक ने 1665 में की | कोशिका जीवधारियों की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई होती है | कोशिका प्राय: स्वत: जनन की सामर्थ्य रखती है। यह विभिन्न पदार्थों का वह छोटे-से-छोटा संगठित रूप है जिसमें वे सभी क्रियाएँ होती हैं जिन्हें सामूहिक रूप से हम जीवन कहतें हैं।

    प्रोकैरियोटिक एवं यूकैरियोटिक कोशिका में क्या अंतर है?

    प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं (Prokaryotic Cell) में केन्द्रक कला नहीं होती है। इस प्रकार केन्द्रकीय पदार्थ कोशिकाद्रव्य में बिखरा होता है। गुणसूत्र के स्थान पर हिस्टोन प्रोटीन रहित DNA के धागे होते हैं। ऐसी
    कोशिकाओं में पूर्ण रूप से विकसित कोशिकांगों का अभाव रहता है। ये कोशिकाएँ अर्थात् वास्तविक केन्द्रक रहित प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ नीले-हरे शैवाल, माइकोप्लाज्मा और जीवाणु में पाई जाती हैं।
    यूकैरियोटिक कोशिका (Eukaryotic Cell) कोशिकाओं में पूर्ण विकसित केन्द्रक अर्थात् केन्द्रक कला और केन्द्रिका युक्त तथा पूर्ण विकसित कोशिकांग पाए जाते हैं। इस प्रकार की कोशिकाओं के गुणसूत्र में DNA तथा हिस्टोन प्रोटीन से बनी इकाई न्यूक्लिओसोम पाई जाती हैं। ये कोशिका अर्थात् वास्तविक केन्द्रक वाली यूकैरियोटिक कोशिकाएँ अधिकांश शैवाल, उच्च पादप एवं जन्तुओं में पाई जाती हैं।

    वनस्पति तथा जंतु कोशिका में समान रूप से क्या पाए जाते हैं?

    संरचनात्मक रूप से, पौधे और जंतु कोशिकाएं बहुत समान हैं क्योंकि वे दोनों यूकेरियोटिक कोशिकाएं हैं। इन दोनों में केन्द्रक, माइटोकॉन्ड्रिया, अन्तःप्रद्रव्यी जालिका, गॉल्जीकाय, लाइसोसोम और पेरॉक्सिसोम जैसे झिल्ली-बद्ध अंग होते हैं। दोनों में समान झिल्ली, साइटोसोल और साइटोस्केलेटल तत्व भी होते हैं। कोशिका सिदान्त वनस्पति विज्ञान शास्त्री श्लाइडेन और जन्तु विज्ञान शास्त्री श्वान ने प्रस्तुत की थी, जिसके अनुसार, सभी पौधे तथा जन्तु कोशिकाओं से बने हैं और ये जीवन की मूलभूत इकाई हैं। जीवधारियों (जन्तु एवं वनस्पति) का शरीर एक या अनेक कोशिकाओं से बने होते हैं, जो शरीर की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है तथा जीवद्रव्य इसका भौतिक आधार होता है। कोशिका सिदान्त वनस्पति विज्ञान शास्त्री श्लाइडेन और जन्तु विज्ञान शास्त्री श्वान ने प्रस्तुत की थी, जिसके अनुसार, सभी पौधे तथा जन्तु कोशिकाओं से बने हैं और ये जीवन की मूलभूत इकाई हैं। जीवधारियों (जन्तु एवं वनस्पति) का शरीर एक या अनेक कोशिकाओं से बने होते हैं, जो शरीर की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है तथा जीवद्रव्य इसका भौतिक आधार होता है।

    प्लांट सेल और एनिमल सेल में क्या अंतर है?

    पादप कोशिका (प्लांट सेल) में कोशिका कला चारों ओर से एक भित्ति द्वारा घिरी रहती है, जिसे कोशिका भित्ति कहते हैं, जो प्रायः सेलुलोज नामक पदार्थ की बनी होती है।
    पादप कोशिका (प्लांट सेल) में बड़ी-बड़ी रसधानियाँ होती हैं, जो कि कोशिका का काफी बड़ा भाग घेरे रहती हैं। पादप कोशिका (प्लांट सेल) में लवक पाए जाते हैं (हरे हरितलवक, रंगहीन ल्यूकोप्लास्ट एवं रंगीन क्रोमोप्लास्ट)। अधिकांश पौधों की कोशिकाओं में सेन्ट्रोसोम नहीं पाए जाते हैं। अधिकांश पौधों की कोशिकाओं में लाइसोसोम नहीं मिलते।
    जबकि जन्तु कोशिका ( एनिमल सेल) में कोशिका कला के बाहर कोई भित्ति नहीं होती। कोशिका कला ही कोशिका की सीमा है। जन्तु कोशिका ( एनिमल सेल) में रसधानियाँ अनुपस्थित या बहुत छोटी होती हैं। अतः कोशिकाद्रव्य कोशिका में समान रूप से वितरित रहता है | जन्तु कोशिका ( एनिमल सेल) में लवक नहीं पाए जाते हैं। अधिकांश जन्तुओं की कोशिकाओं में सेण्ट्रोसोम पाए जाते हैं। जन्तु कोशिका ( एनिमल सेल) में लाइसोसोम पाए जाते हैं।

    लाइसोसोम कैसे उत्पन्न होते हैं?

    अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) और गॉल्जी काय (Golgi body) के द्वारा लाइसोसोम का निर्माण के द्वारा होता है। अन्तःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum) के द्वारा लाइसो सोम के एंजाइमों का निर्माण होता है। लाइसोसोम मुख्यतया जन्तु कोशिकाओं में पाई जाने वाली गोल इकहरी झिल्लियों से घिरी थैलियाँ है, जिसमें 50 हाइड्रोलिटिक एन्जाइम पाए जाते हैं, जो लगभग 5 pH पर कार्य करते हैं। यह कोशिका का अपशिष्ट निपटाने वाला तन्त्र है। लाइसोसोम में उपस्थित पाचनकारी एन्जाइम कार्बनिक पदार्थ को तोड़ देते हैं। लाइसोसोम को आत्महत्या की थैली भी कहा जाता है।

    माइटोकांड्रिया के तीन कार्य क्या है?

    माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का पावर हाउस या ऊर्जा घर कहां जाता है इसमें ऑक्सीश्वसन के दौरान निकलने वाली ऊर्जा एडिनोसीन ट्राईफॉस्फेट (ATP) के रूप में संचित रहती है और सभी आवश्यक रासायनिक क्रियाओं को करने के लिए माइटोकॉण्ड्रिया ATP के रूप में ऊर्जा प्रदान करते हैं। माइटोकॉण्ड्रिया के मैट्रिक्स में क्रैब्स चक्र के एन्जाइम, DNA, राइबोसोम तथा RNA स्थित होते हैं इसलिए माइटोकॉण्ड्रिया को अर्धस्वायत्त कोशिकांग (semi autonomous organelle) कहा जाता है।

    लवक कहाँ पाए जाते है?

    लवक पादप कोशिकाओं के कोशिका द्रव में पाए जाने वाले गोल या अंडाकार रचना हैं, इनमें पादपों के लिए महत्त्वपूर्ण रसायनों का निर्माण होता है। लवक केवल पादप कोशिकाओं में स्थित होते हैं। ये तीन प्रकार के अर्थात् हरितलवक, अवर्णी लवक तथा वर्णी लवक होते हैं। हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) नामक हरे रंग के लवक में जीव जगत की सबसे महत्त्वपूर्ण जैव रासायनिक क्रिया प्रकाश-संश्लेषण होती है।

    कौन से कोशिकांग सक्रिय श्वसन स्थल है?

    कोशिका में श्वसन की क्रिया का कार्यस्थल माइटोकॉन्ड्रिया को कहा जाता है। श्वसन ऐसी प्रक्रिया है जिसके दौरान शरीर की आवश्यकता के लिए उसकी स्तर पर कहें तो कोशिका की ऊर्जा की आपूर्ति के लिए आवश्यक एडिनोसीन ट्राईफॉस्फेट (ATP) की उत्पत्ति श्वसन की क्रिया के द्वारा की जाती है। माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का पावर हाउस या ऊर्जा घर कहां जाता है इसमें ऑक्सीश्वसन के दौरान निकलने वाली ऊर्जा एडिनोसीन ट्राईफॉस्फेट (ATP) के रूप में संचित रहती है और सभी आवश्यक रासायनिक क्रियाओं को करने के लिए माइटोकॉण्ड्रिया ATP के रूप में ऊर्जा प्रदान करते हैं।

    माइटोकॉण्ड्रिया की अन्तःकला में क्या स्थित होता है ?

    क्रेब्स चक्र का सक्सिनिक डीहाइड्रोजीनेज एन्जाइम माइटोकॉण्ड्रिया की अन्तःकला में स्थित होता है।

    कोशिका का कोनसा भाग जीवन का आधार होता है ?

    हक्सले ने बताया कि जीवद्रव्य जीवन का भौतिक आधार है।

    गॉल्जीकाय का कार्य क्या है ?

    गॉल्जीकाय पादप कोशिकाओं में कोशिका पट्ट के निर्माण में भाग लेती हैं, इसलिए कोशिका विभाजन के समय संख्या बढ़ जाती है।

    लोमासोम किसे कहते है ?

    कवकों में कोशिका भित्ति व प्लाज्मालेमा के बीच पाई जाने वाली विशेष रचना लोमासोम कहलाती है।

    टीलोमीयर क्या होते है ?

    गुणसूत्र के सिरों को टीलोमीयर कहते हैं, ये गुणसूत्रों को स्थायित्व प्रदान करते हैं।

    प्रकाश-संश्लेषण की इकाई कोशिका कोनसी है ?

    थाइलेकॉइड पर पाई जाने वाली कोशिकाएँ क्वान्टासोम प्रकाश-संश्लेषण की इकाई है। प्रत्येक क्वान्टासोम में 250-300 हरितलवक अणु उपस्थित होते हैं।

    यूकैरियोटिक कोशिका के कोशिकाद्रव्य, हरितलवक तथा माइटोकॉण्ड्रिया में किस प्रकार के राइबोसोम होते है ?

    यूकैरियोटिक कोशिका के कोशिकाद्रव्य में 80S प्रकार के राइबोसोम तथा हरितलवक तथा माइटोकॉण्ड्रिया में 70 S प्रकार के राइबोसोम उपस्थित होते हैं।

    राइबोसोम अन्तःप्रद्रव्यी जालिका से कैसे जुड़े होते है ?

    राइबोसोम अन्तःप्रद्रव्यी जालिका से एक ग्लाइकोप्रोटीन राइबोफोरीन द्वारा जुड़े होते हैं।

    सपाट अन्तःप्रद्रव्यी जालिका पर किसका संश्लेषण होता है ?

    सपाट अन्तःप्रद्रव्यी जालिका पर लिपिड का संश्लेषण होता है।

    अलग अलग जीवों में हरितलवक के आकार

    क्लोरेला एवं क्लेमाइडोमोनास में हरितलवक प्यालेनुमा, यूलोथ्रिक्स में मेखलाकार, जिग्निमा में तारेनुमा, क्लेडोफोरा एवं ऊडोगोनियम में जालिकामय एवं स्पाइरोगायरा में कुण्डलाकार होते हैं।

    ग्रेना किसमे नही पाए जाते है ?

    शैवालों तथा बण्डल आच्छद कोशिकाओं की हरितलवक में ग्रेना नहीं पाये जाते हैं।