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  • जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की सबसे अनोखी तस्वीर, अंतरिक्ष की सबसे करीबी झलक

    जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की सबसे अनोखी तस्वीर, अंतरिक्ष की सबसे करीबी झलक

    जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (वेब) (The James Webb Space Telescope (Webb) को 25 दिसंबर, 2021 को पूरी उम्मीदों के साथ अंतरिक्ष में लॉन्च किया गया था। वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि 10 अरब डॉलर की अंतरिक्ष वेधशाला (Space Observatory) उन्हें ब्रह्मांड की उत्पत्ति, उसकी आकाशगंगाओं और शायद पहले तारे के उत्पति (formation of the first stars) का भी पता लगाने की कोशिश करेगी । 12 जुलाई, 2022 को नासा द्वारा को जारी की गई शुरुआती तस्वीरों से संकेत मिलता है कि वेब अपने वादे पर खरा उतर रहा है ।

    National Aeronautics and Space Administration (NASA) – नासा के प्रशासक बिल नेल्सन (Bill Nelson ) ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इन तस्वीरों का खुलासा करने से पहले कहा, “हर तस्वीर एक नई खोज है, और प्रत्येक तस्वीर मानवता को ब्रह्मांड का एक नया दृश्य देगी जो पहले कभी नहीं देखा गया।” |

    दुनिया के इस सबसे बड़े जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप ने शुरुआती यूनिवर्स की सबसे गहरी, स्पष्ट और रंगीन इन्फ्रारेड फोटो खींची है, जो संभवतः 13 अरब साल पहले तक के ब्रह्मांड का नजारा दिखाती है | इस तस्वीर में अनगिनत सितारे, हजारों आकाशगंगाएं, सितारों के जन्मदाता नेबुला तक दिख रहे हैं |

    ब्रह्मांड अनगिनत अजूबों से भरा हुआ है | इसके रहस्यों को जानने के लिए इंसान लंबे अरसे से उत्सुक रहा है | नित नई तकनीक और उन्नत तकनीक के दम पर नासा के वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में कुछ ऐसा देखा है, जो पहले कभी नहीं देखा गया था | उन्होंने ब्रह्मांड की अनोखी तस्वीर खींची है |

    वाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन द्वारा जारी इस तस्वीर में अनगिनत सितारे और हजारों आकाशगंगाएं दिख रही हैं | बहुत दूर की धुंधली गैलेक्सी के झलकी भी इसमें दिख रही है | इस तस्वीर में हमारे सौरमंडल के बाहर एक विशाल गैसीय ग्रह और निहारिका (नेबुला) की दो तस्वीरें भी हैं | नेबुला वो जगह होती है, जहां सितारे पैदा होते हैं और नष्ट हो जाते हैं. इसके अलावा इसमें 5 घनी आकाशगंगाएं भी एकदूसरे के आसपास नजर आ रही हैं |

    ये ऐसी तस्वीर है, जिसमें इंसान ने इतनी दूरी तक और इतने समय पीछे तक का नजारा देखने में कामयाबी हासिल की है | माना जा रहा है कि टेलीस्कोप ने 13.8 अरब साल पहले हुए बिगबैंग के बाद निकली रोशनी के कुछ हिस्सों को तस्वीर में कैद किया है | 10 अरब डॉलर के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप से खींची गई इस तस्वीर को “डीप फील्ड” नाम दिया गया है | टेलीस्कोप को ये तस्वीर लेने में 12.5 घंटे का समय लगा. इससे ब्रह्मांड के ओर-छोर की जानकारी हासिल करने में जुटे इंसान को नया नजरिया मिला है |

    नासा के जेम्स वेब टेलीस्कोप दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे शक्तिशाली अंतरिक्ष दूरबीन है. इसे पिछले साल अमेरिका के फ्रेंच गुयाना से लॉन्च किया गया था | जनवरी में यह पृथ्वी से 16 लाख किलोमीटर दूर पहुंच गया था | वहां जाकर इसके उपकरणों को शुरू किया गया. इसमें 21 फुट का सोने से मढ़ा फूल की तरह दिखने वाला मिरर लगा है, जो अब तक अंतरिक्ष में भेजा गया सबसे बड़ा और सबसे संवेदनशील दर्पण है. इसके 18 सेग्मेंट हैं | जेम्स वेब के उप परियोजना वैज्ञानिक जोनाथन गार्डनर ने बताया कि इस टेलीस्कोप के जरिए हमें समय के अरबों साल पीछे देखने में कामयाबी मिली है | ऐसा इसलिए संभव हुआ कि उन आकाशगंगाओं से निकले प्रकाश को हमारी दूरबीन तक पहुंचने में अरबों साल लगे | अब आगे खगोलविद यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि ये आकाशगंगाएं कितनी पुरानी हैं | ब्रह्मांड की अनोखी चीजों के राज खोलने की कोशिश होगी | हमारे अपने सोलर सिस्टम के बारे में भी नई जानकारियां हासिल की जाएंगी |

  • क्या है पृथ्‍वी के अंदर मौजूद ‘रहस्यमयी’ ब्लाब (Blob) – माउंट एवरेस्ट से 100 गुना लंबी चट्टानी परत

    क्या है पृथ्‍वी के अंदर मौजूद ‘रहस्यमयी’ ब्लाब (Blob) – माउंट एवरेस्ट से 100 गुना लंबी चट्टानी परत

    Nature Communications and research में प्रकाशित हुई रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिकों ने पृथ्‍वी के अंदर मौजूद ‘रहस्यमयी’ ब्लाब (Blob) की इमेज बनाकर उसे समझने की कोशिश की है। ब्लाब, हमारी पृथ्वी के क्रस्‍ट और उसके कोर के बीच चट्टान की गर्म मोटी परत है। ठोस होने के बावजूद यह धीरे-धीरे बहती रहती है। वैज्ञानिकों ने कहा है कि से इमेजेस भूकंप विज्ञान (Seismology) में ‘मील का पत्थर’ साबित हो सकती हैं।

    हमारे ब्रह्मांड में कई ऐसे रहस्‍य हैं, जिनकी तह तक जाने के लिए वैज्ञानिक दिन-रात जुटे हुए हैं। रहस्‍यों से घिरी तो हमारी पृथ्‍वी भी है। वैज्ञानिकों ने इसके अंदर मौजूद ‘रहस्यमयी’ ब्लाब की इमेज बनाकर उसे समझने की कोशिश की है। ब्लाब, हमारी पृथ्वी के क्रस्‍ट और उसके कोर के बीच चट्टान की गर्म मोटी परत है। ठोस होने के बावजूद यह धीरे-धीरे बहती रहती है। बताया जाता है कि ये ब्‍लाब, माउंट एवरेस्ट से 100 गुना लंबे हैं रिसर्चर्स की एक टीम मानती है कि यह सब थिया (Theia) के अवशेष हैं थिया एक एक प्रोटोप्लैनेट था, जो पृथ्‍वी से टकराया था

    वैज्ञानिक आमतौर पर मानते हैं कि ये ब्‍लाब, टेक्टोनिक प्लेटों के मूवमेंट से जुड़े हैं, लेकिन इनमें बदलाव ने वैज्ञानिकों को हैरान किया है। वैज्ञानिकों ने इन्‍हें ‘आकर्षक और जटिल’ कहा है। बताया है कि वह उनके बारे में और ज्‍यादा समझने की कोशिश कर रहे हैं। ये इमेजेस नेचर कम्युनिकेशंस में पब्लिश एक स्‍टडी का हिस्सा हैं। इस स्‍टडी में सर्कुलर अंडरग्राउंड पॉकेट पर फोकस किया गया है, जिसे हवाई के नीचे मौजूद अल्ट्रा-लो वेग जोन कहा जाता है। अब वैज्ञानिकों ने कहा है कि से इमेजेस भूकंप विज्ञान में ‘मील का पत्थर’ साबित हो सकती हैं।

    मिरर यूके की रिपोर्ट के अनुसार, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के जियोफ‍िजिसिस्‍ट, ज़ी ली ने कहा कि पृथ्वी के सभी डीप इंटीरियर फीचर्स में ये सबसे आकर्षक और जटिल हैं। हमें पृथ्‍वी की आंतरिक संरचना दिखाने के लिए पहला ठोस सबूत मिल गया है, जो भूकंप विज्ञान के लिए मील का पत्थर है। इन इमेजेस को बेहतर बनाने के लिए वैज्ञानिक लंबे वक्‍त से कोशिश कर रहे थे। उन्‍होंने कई इंस्‍ट्रूमेंट्स इस्‍तेमाल किए, लेकिन इमेजेस बेहतर नहीं बनीं। पृथ्वी की सतह से दूरी ने इसे चुनौतीपूर्ण काम बना दिया था।

    लेकिन इस बार इमेजेस को कंप्यूटर मॉडलिंग द्वारा तैयार किया गया है। इसके लिए डेटा को पृथ्वी की लेयर्स के जरिए भेजे गए सिग्‍नल्‍स से लिया गया है। इन सिग्‍नल रेस्‍पॉन्‍स के जरिए वैज्ञानिक यह समझ पाए हैं कि यह ब्लाब लगभग एक किलोमीटर साइज का है। इस महीने की शुरुआत में एक और स्‍टडी ने यह अनुमान लगाया था कि पृथ्‍वी के केंद्र के महाद्वीपों के साइज के कुछ बड़े ब्‍लाब हैं।

    बताया जाता है कि ये ब्‍लाब, माउंट एवरेस्ट से 100 गुना लंबे हैं और वैज्ञानिकों को इस बारे में बहुत कम जानकारी है कि वे वहां क्यों मौजूद हैं। रिसर्चर्स की एक टीम अब यह मानती है कि यह सब थिया (Theia) के अवशेष हैं। थिया एक एक प्रोटोप्लैनेट था, जो 4.5 मिलियन साल पहले पृथ्वी से टकराया था। इसी की वजह से चंद्रमा का निर्माण हुआ था। रिपोर्ट के अनुसार, ये ब्‍लाब पश्चिमी अफ्रीका और प्रशांत महासागर के नीचे स्थित हैं और कई दशकों से भूकंप विज्ञानियों को भ्रमित कर रही हैं।

    कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी की स्‍टडी में भाग लेने वाले वैज्ञानिकों में से एक सुजॉय मुखोपाध्याय ने कहा कि अगर यह चीजें वाकई में पुरानी हैं, तो यह हमें बताती हैं कि हमारे ग्रह का निर्माण कैसे हुआ।

  • पृथ्वी पर आ सकता है सौर्य तूफान ! मोबाइल, रेडियो, GPS, सैटेलाइट को कर सकता है प्रभावित

    पृथ्वी पर आ सकता है सौर्य तूफान ! मोबाइल, रेडियो, GPS, सैटेलाइट को कर सकता है प्रभावित

    अंतरिक्ष मौसम भौतिक विज्ञानी डॉ. तमिथा स्कोव (Dr Tamitha Skov) के मुताबिक, सूरज से सांप के आकार जैसी एक सोलर फ्लेयर (Snake like filament) मंगलवार यानी 19 जुलाई पृथ्वी को हिट करेगी. इससे कई सैटेलाइट प्रभावित हो सकते हैं. जीपीएस, टीवी संचार और रेडियो का काम भी बाधित हो सकता है | यह एक तरह का सौर्य तूफान है जो पृथ्वी को सीधे तौर पर प्रभावित हो सकता है कि मोबाइल जैसी डिवाइस काम करना बंद कर दें |

    इस सोलर फ्लेयर (Solar flare) से इलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडिएशन और गर्मी बहुत बढ़ जाती है. हालांकि, पृथ्वी पर इससे गर्मी तो नहीं बढ़ेगी, लेकिन इलेक्ट्रो मैग्नेटिक फील्ड पर असर पड़ सकता है और सिगनल बंद हो सकते हैं |

    वैज्ञानिकों के मुताबिक, इन दिनों सूरज काफी सक्रिय रहा है. इस वजह से जियोमैग्रेटिक तूफान (Geomagnetic storms) आ रहे हैं. जिसे वैज्ञानिक भाषा में (M class) एम-क्लास और (X class) एक्स-क्लास के फ्लेयर्स बोलते हैं. यह सबसे मजबूत वर्ग की फ्लेयर्स भेज रहा है, क्योंकि इस समय सूरज एक्टिव है. जो अगले 8 सालों तक रहेगा. इस वजह से सौर तूफानों के आने की आशंका बनी रहेगी |  

    सौर तूफान लाखों किलोमीटर प्रतिघंटे की गति से आता है |

    सूरज पर बने धब्बे से कोरोनल मास इजेक्शन (Coronal Mass Ejection- CME) होता है. यानी सूर्य की सतह पर एक तरह का विस्फोट. इससे अंतरिक्ष में कई लाख किलोमीटर प्रति घंटे की गति से एक अरब टन आवेषित कण (Charged Particles) फैलते हैं. ये कण जब धरती से टकराते तब कई सैटेलाइट नेटवर्क, जीपीएस सिस्टम, सैटेलाइट टीवी और रेडियो संचार को बाधित करते हैं |

    सूरज पर धब्बे दिखाई देने का कारण

    जब सूरज के किसी हिस्से में दूसरे हिस्से की तुलना में गर्मी कम होती है, तब वहां पर धब्बे बन जाते हैं. ये दूर से छोटे-बड़े काले और भूरे रंग के धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं | एक धब्बा कुछ घंटों से लेकर कुछ हफ्तों तक रह सकता है | धब्बों अंदर के अधिक काले भाग को अम्ब्रा (Umbra) और कम काले वाले बाहरी हिस्से को पेन अम्ब्रा (Pen Umbra) कहते हैं |

  • फल क्या है | What is Fruit? | फलों के प्रकार | Types of Fruits in Hindi (फलों से जुडी सम्पूर्ण जानकारी)

    फल क्या है | What is Fruit? | फलों के प्रकार | Types of Fruits in Hindi (फलों से जुडी सम्पूर्ण जानकारी)

    इस आर्टिकल में फलों से जुड़े सारे तथ्यों के बारे में बात करेगे | फल क्या होते है (What is Fruit), फलों के कितने प्रकार है, फलों की विशेषताएँ क्या क्या है, फलों के क्या गुण है आदि महत्वपुर्ण जानकारी इस आर्टिकल में जानेगे |

    फल (Fruits)

    फल पादप का मुख्य अंग है फल का निर्माण निषेचन(FERTILIZATION) के पश्चात जायांग के अण्डाशय(OVARY) से होता हैं।परिपक्व अण्डाशय ही फल कहलाता है। फल में मुख्यतया दो भाग फलभित्ति (Pericap) तथा बीज (seed) होते हैं। केवल अण्डाशय से विकसित होने वाले फल सत्य फल (True Fruit) तथा पुष्प के अन्य भाग; जैसे-पुष्पासन, बाह्यदल इत्यादि में विकसित फल कूट फल (false fruit) कहलाते हैं। जैसे – सेब, शहतूत, नाशपाती आदि मे निषेचन के बिना अण्डाशय का फल के रूप में रुपान्तरण अनिषेकफलन कहलाता है।

    ये फल प्रायः बीज रहित होते हैं उदाहरण केला, पपीता, नारंगी अंगर, अनानास आदि। फल नए बीजों की रक्षा करता है तथा बीज के प्रकीर्णन में सहायता करता है।

    फल की संरचना (STRUCTURE OF FRUITS)

    एक फल में फलभित्ती (PERICARP) (Pericarp) और बीज होते हैं। अंडाशय की दीवार से फलभित्ती (PERICARP) विकसित होती है। फलभित्ती को बाह्य फलभित्ती (Epicarp), मध्य फलभित्ती  (Mesocarp) और अन्तः फलभित्ती  (Endocarp) में विभेदित किया जाता है।

    बीज का निर्माण  निषेचन के बाद  बिजाण्ड (OVULE) से होता हैं। बीजांड का बीजावरण (SEED COAT) फलभित्ती के पास होता है।
    बाह्य फलभित्ती  (Epicarp) – यह सबसे बाहरी स्त्तर होता है। जो पतला नरम या कठोर होता है। यह फल का छिलका बनती है।
    मध्य फलभित्ती  (Mesocarp)–  यह मोटी गूदेदार तथा खाने योग्य होती है, जैसी की आम का मध्य का पीला खाने योग्य भाग लेकिन नारियल में रेशेदार जटा होती है।
    अन्तः फलभित्ती (Endocarp)- यह सबसे भीतरी स्तर है आम नारियल बेर में यह कठोर लेकिन खजूर, संतरा में पतली झिल्ली के रूप में होती है।  बीजावरण अन्तः फलभित्ती के पास होता है।

    फलों के प्रकार (Type of Fruits)

    आवृतबीजियों के फलों में बहुत विभिन्नताएं पाई जाती है, मोटे तौर पर ये तीन श्रेणियों में रखे जाते है |

    (i) सरल फल (Simple Fruit)

    (ii) गुदेदार फल (Succulent fruits)

    (iii) शुष्क फल (Dry Fruit)

    सरल फल (Simple Fruit)

    ये फल एकाण्डपी या बहुअण्डपी एवं युक्ताण्डपी अण्डाशय से विकसित होते है। ये फल गूदेदार या शुष्क होते हैं। इसके अन्तर्गत मूंगफली, सिंघाड़ा, काजू जैसे शुष्क फल एवं आम, नींबू आदि जैसे गूदेदार फल आते हैं।

    अष्ठिफल (Drupe)

    यह एकबीजी फल है, जो एकाण्डपी या बहुअण्डपी व युक्ताअण्डपी अण्डाशय से विकसित होते हैं। इन फलों में फलभित्ति बाह्य, मध्य तथा अन्त:फलभित्ति में विभाजित होती है तथा अन्त:फलभित्ति काष्ठीय होती है। उदाहरण आम, बेर, पिस्ता।

    बेरी (Berry)

    बेरी (Berry) एक या अनेक बीजधारी फल है, जो बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी व उर्ध्ववती या अधोवर्ती अण्डाशय से विकसित होते हैं।

    गुदेदार फल (Succulent fruits)

    फलभित्ति बाह्य, मध्य तथा अन्तःफलभित्ति में विभेदित होती है।

    उदाहरण: टमाटर, पपीता, अंगूर, मिर्च।

    पोम (Pome)

    यह कूट फल है क्योकि इसमें अण्डाशय के साथ-साथ पुष्पासन भी फल बनाने में सहायता करता है।

    मुख्य फल पंचअण्डपी व युक्ताण्डपी अण्डाशय से बनता है, परन्तु खाने योग्य नहीं है, पुष्पासन जो अण्डाशय के चारों ओर रसीला व गुदेदार भाग बनाता है, खाया जाता है। उदाहरण सेब, लौकाटा।

    पेपो (Pepo)

    यह प्राय बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी, अधोवर्ती तथा भित्तीय बीजाण्डन्यास युक्त अण्डाशय से विकसित होता है। बाह्य फल भित्ति दृढ़ छिलका बनाती है, तथा मध्य व अन्तःफलभित्ति रसीली तथा खाने योग्य होती है। उदाहरण: कुकुरबिटेसी कुल के पौधे।

    हेस्पेरिडियम (Hesperidium)

    • ये फल बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्व अण्डाशय से विकसित होते हैं।
    • अण्डाशय में स्तम्भीय बीजाण्डन्यास होता है। बाह्य फल भित्ति मोटी एवं छिलके के रूप में होती है, जिसमें अनेक तेल ग्रन्थियाँ पाई जाती है।
    • अत:फलभित्ति झिल्ली के रूप में प्रत्येक फाँक के ऊपर रहती है, इससे अनेक सरस ग्रन्थिल रोम निकलते हैं, जो फल का खाने योग्य भाग बनाते हैं। उदाहरण सन्तरा, नींबू ।

    शुष्क फल (Dry Fruit) के प्रकार

    शुष्क फल तीन प्रकार के होते है

    (i)   स्फोटक

    (ii)  अस्फोटक

    (iii)  भिदुरफल

    स्फोटक शुष्क फल की विशेषताएँ और प्रकार

    इस फल के परिपक्व हो जाने पर फलभित्ति फट जाती है |

    स्फोटक शुष्क फल के निम्न प्रकार है :

    फली (Legume or pod)

    यह उर्ध्ववर्ती, एकाण्डपी, एककोष्ठीय अण्डाशय से विकसित होते हैं परिपक्व फल शिखर से आधार की ओर दोनों सीवन से फटते हैं, उदाहरण: फेबेसी कुल के सदस्य।

    फॉलिकिल (Follicle)

    यह उर्ध्वर्ती, एकाण्डपी, एककोष्ठीय अण्डाशय से विकसित होते हैं, परन्तु परिपक्व फल अधर सीवन से फटते हैं। उदाहरण: मदार डेल्फिनियम।

    सिलिक्यूआ (Siliqua)

    यह बहुबीजी तथा द्विकोष्ठी फल है, जो द्विअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्ववर्ती अण्डाशय से विकसित होता है। स्फुटन नीचे से ऊपर की ओर होता है तथा बीज आभाषीपट या रेप्लम पर लगे होते हैं। उदाहरण – क्रूसीफेरी|

    सिलिक्यूला (Silicula) छोटे, चौड़े व चपटे सिलिक्यूआ, उदाहरण: कैप्सेला

    सम्पुट (Capsule)

    यह बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्ववर्ती कभी-कभी अधोवर्ती अण्डाशय से विकसित होता है। इन फलों का स्फुटन विभिन्न प्रकार से होता है । उदाहरण: रन्ध्री-पोस्त, कोष्टविदारक-कपास, षटविदारक-लाइनम, पटभंजक, धतूरा तथा अनुप्रस्थ, पोर्टुलाका

    अस्फोटक शुष्क फल की विशेषताएँ और प्रकार

    अस्फोटक शुष्क फलों मेंफल के परिपक्व होने पर फलभित्ति नहीं फटती है |

    ऐकीन (Achene)

    ये फल एककोष्ठीय तथा एकबीजी होते हैं, और एकाण्डपी व उर्ध्ववर्ती अण्डाशय से विकसित होते हैं। इनकी फलभित्ति बीजावरण से अलग होती है। उदाहरण: क्लीमेटिस, नार्विलिया ।

    कैरिओप्सिस (Caropsis)

    ये एककोष्ठीय तथा एकबीजी फल हैं, जो एकाण्डपी, उर्ध्व अण्डाशय, से विकसित होते हैं, इनकी फलभित्ति बीजावरण से संयुक्त रहती है। उदाहरण- ग्रेमिनी कुल के पौधे ।

    सिप्सेला (Cypsella)

    ये एककोष्ठीय तथा एकबीजी फल हैं, जो द्विअण्डपी, युक्ताअण्डपी, अधोवर्ती, अण्डाशय से विकसित होते हैं इनकी फलभित्ति बीजावरण से पृथक रहती है इनमें बाह्यदल पैपस के रूप में रूपान्तरित होते हैं जो प्रकीर्णन की पैराशूट प्रक्रिया में सहायक है। उदाहरण: कम्पोजिटी कुल के सदस्य।

    नट (Nut)

    एककोष्ठीय तथा एकबीजी फल, जो द्वि या बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्ववर्ती अण्डाशय से विकसित होते हैं फलभित्ति कठोर एवं काष्ठीय। उदाहरण: काजू सिंघाड़ा, लीची।

    समारा (Samara)

    ये एकबीजी फल है, जो द्विअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्व अण्डाशय से विकसित होते हैं। इनकी फलभित्ति पँख के सामन चपटी होती है और वायु द्वारा प्रकणन में सहायक है। उदाहरण: होलोप्टेरा, हिप्टेज

    भिदुरफल

    परिपक्व होने के साथ-साथ दो बीजों के बीज की फलभित्ति के अन्दर की ओर धँस जाने से फल बहुत से एक बीज युक्त फलांशुकों में विभक्त हो जाते हैं।

    लोमेन्टम (Lomentum)

    ये फली के रूपान्तरण है, जो एकाण्डपी, एककोष्ठीय तथा उर्ध्व अण्डाशय से विकसित होते हैं। ये एकबीजी फलांशुकों (mericarps) में विभाजित हुए रहते हैं। उदाहरण: मूँगफली, छुईमई, बबूला

    रेग्मा (Regma)

    ये फल त्रिअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्वअण्डाशय से विकसित होते हैं। फल परिवक्व होने पर तीन अस्फोटी बीजयुक्त गोलाणुओं (Cocci) में विभाजित हो जाते हैं, उदाहरण: रिसिनस, जिरेनियम

    क्रीमोकार्प (Cremocarp)

    ये फल द्विकोष्ठीय एवं द्विबीजी होते हैं और द्विअण्डपी, युक्ताण्डपी अधोवर्ती अण्डाशय से विकसित होते हैं। अण्डाशय के पकने पर फल दो अस्फोटी भागों में बँट जाता है, जिन्हें फलाँशुक कहते हैं,

    उदाहरण: अम्बेलीफेरी कुल के सदस्य।

    कार्सेरूलस (Carcerulus)

    ये फल द्विअण्डपी या बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्ववर्ती अण्डाशय से विकसित होते हैं। कूट पर के बन जाने से इनमें अनेक एकबीजी फलांशुक बन जाते हैं। उदाहरण: ओसिमम, ऐबूटिलोन ।

    द्विसमारा

    ये फल द्विअण्डपी, युक्ताअण्डपी, उर्ध्व अण्डाशय से विकसित होते हैं। इनमें फलभित्ति फैलकर दो चपटे पक्ष बनाती है। परिपक्व होने पर फल, दो एकबीजी भागों में विभाजित हो जाता है। उदाहरण: एसर, हिप्टेज ।

    पुंजफल (Aggregate Fruits)

    ये वास्तव में लघुफलों (fruitlets) के समूह हैं, जो बहुअण्डपी, वियुक्ताण्डपी अण्डपों से विकसित होते हैं। प्रत्येक अण्डप (carpel) से एक लघुफल बनता है। ये निम्न प्रकार के होते हैं :

    फॉलिकिलों का पुंज (Etaerio of follicles)

    इस फल में प्रत्येक लघुफल एक फॉलिकिल होता है, और सभी लघुफल बढ़े हुए पुष्पासन पर एक गुच्छे के रूप में लगे रहते हैं। उदाहरण: मदार, सदाबहार।

    सरस फलों का पुंज (Etaerio of Berries)

    इसेमें बहुत से सरस फल एक गूदेदार पुष्पासन के चारों ओर लगे रहते हैं। उदाहरण: पॉलीऐल्थिया, शरीफा ।

    अष्ठिफलों का पुंज (Etaerio of drupes)

    बहुत से छोटे-छोटे अष्ठिफल पुष्प के विभिन्न अण्डपों से विकसित होते हैं, और गूदेदार पुष्पासन पर लगे रहते हैं। उदाहरण: रसभरी।

    ऐकीनों का पुंज (Etaerio of Achenes)

    प्रत्येक लघुफल ऐकीन होता है। उदाहरण: नारवेलिया, क्लीमेटिस, गुलाब।

    संग्रथित फल (Composite Fruit)

    (संग्रथित फल सम्पूर्ण पुष्पक्रम से विकसित होते हैं, इन्हें इन्फ्रक्टेसेन्स (Enfructescence) भी कहते हैं।

    ये दो प्रकार के होते हैं:

    सोरोसिस (Sorosis)

    शूकी, स्पेडिक्स या कैटकिन पुष्पक्रमों से विकसित होते हैं। प्रत्येक पुष्प के सहपत्र तथा परिदल मांसल तथा रसीले हो जाते हैं तथा इनका पुष्पावली वृन्त भी मोटा तथा मांसल हो जाता है। उदाहरण कटहल, अनानास, शहतूत।

    साइकोनस (Syconus)

    यह हाइपेन्थोडियम पुष्पक्रम से विकसित होता है। आशय नाशपाती के आकार की खोखली गुहा बनाते हैं, जिसके ऊपर छोटे-छोटे शल्कों से घिरा एक छिद्र होता है। पुष्पासन गूदेदार खाने योग्य भाग बनाता है।

    फलों के गुण, उपयोग और फायदे (Fruits Benefits in Hindi)

    • फल हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत उपयोगी होते हैं। फलों से से हमारे शरीर में खनिज और विटामिन्स की पूर्ती होती है, जो कि हमारे शरीर को अच्छी तरह से काम करने लिए बेहद ज़रूरी होते हैं।
    • फाइबर युक्त फल पाचन शक्ति को बढ़ाने में मदद करते हैं। फल खाने से पर्याप्त ऊर्जा भी मिलती है।
    • फल स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं जैसे हीट स्ट्रोक, हाई बीपी (उच्च रक्तचाप), कैंसर, हृदय रोग और मधुमेह से लड़ने की क्षमता प्रदान करते हैं।
    • लगभग सभी फलो में पोषक तत्व पाए जाते हैं। शरीर के रोग ग्रसित होने पर स्वस्थ आहार और फल रोगों से निजात दिलाते हैं।
    • फलों में न केवल महत्वपूर्ण विटामिन और खनिज पाए जाते हैं, बल्कि इनके सेवन से पाचन तंत्र भी स्वस्थ रहता है। यद्यपि किसी भी प्रकार का फल आपके संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है, लेकिन विशिष्ट पोषक तत्वों की अधिक मात्रा वाले फल अन्य किस्मों की तुलना में अधिक फायदेमंद होते हैं।
    • फलों के छिलकों में फाइबर की अधिक मात्रा होती है जो कि हमारे शरीर की उत्सर्जन प्रक्रिया में बहुत उपयोगी होती है। हालांकि कुछ रेशेदार फलों के छिलके जिन्हें खाया नही जा सकता हैं जैसे कि नींबू, केले, खरबूज़े और नारंगी लेकिन इनके बाक़ी हिस्सों पर्याप्त मात्रा में फाइबर उपस्थित होता है।
    • फल 90-95% पानी की मात्रा से भरपूर होते हैं, जिससे शरीर से नाइट्रोजनयुक्त अवांछित विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में आसानी होती है।

    फलों से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य

    • विक्टोरिया एमाजोनिका की पत्तियाँ सबसे बड़ी होती हैं।
    • अपस्थानिक जड़े मूलांकुर (radicle) के अतिरिक्त पौधों की शाखाओं तथा पत्तियों से निकलती हैं।
    • जब एक ही पौधे पर अलिंगी, द्विलिंगी तथा एकलिंगी पुष्प पाये जाते हैं, तो इसे सर्वांगी (polygamous) कहते हैं; जैसे-आम (Mangifera indica), पॉलीगोनम ।
    • जब पुष्प में केवल पुंकेसर हो तो इसे पुंकेसरी (staminate) तथा जब केवल मादा जननांग हो तो इसे स्त्रीकेसरी कहते हैं। गोभी का सम्पूर्ण पुष्पक्रम भोजन के रूप में उपयोग होता है।
    • किसी स्थान पर वर्ष की विभिन्न ऋतुओं में जलवायु के क्रमिक परिवर्तन के कारण कैम्बियम की सक्रियता बदलती रहती है, जिसके कारण बसन्त ऋतु में मोटी वाहिकाएँ तथा शरद ऋतु में पतली वाहिकाएँ मिलती हैं इसके फलस्वरुप स्पष्ट वार्षिक वलय बनते हैं, जो एक वर्ष की वृद्धि को प्रदर्शित करते हैं। इन वलयों को गिनकर पेड़ की आयु ज्ञात की जाती है। वार्षिक वलय का अध्ययन डेन्ड्रोक्रोनोलॉजी (Dendrochronology) कहलाती है।
    • कैम्बियम के द्वारा पौधे के बाहरी ओर कॉर्क का निर्माण होता है। परिपक्व होने पर ये मृत हो जाती है और सुबेरिन नामक पदार्थ जमा हो जाता है। बोतलों में प्रयुक्त कॉर्क इसका उदाहरण है, जो क्यूरकस सूबर नामक पौधे से प्राप्त होता है।
  • पुष्प या फूल (Flowers) , पुष्प के प्रकार, मुख्य विशेषताएँ, परागण | निषेचन | पुंकेसर | बीजाण्डासन (Placentation) और अण्डप | Flowers in Hindi (detailed सम्पूर्ण जानकारी)

    पुष्प या फूल (Flowers) , पुष्प के प्रकार, मुख्य विशेषताएँ, परागण | निषेचन | पुंकेसर | बीजाण्डासन (Placentation) और अण्डप | Flowers in Hindi (detailed सम्पूर्ण जानकारी)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे की पुष्प या फल क्या है ? क्योकि पुष्पीय पौधों में पुष्प एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंग है। तो हम पुष्प के प्रकार, पुष्प की मुख्य विशेषताएं और पुष्प के उपयोग के बारे में बतायेगे | साथ ही हम जानेगे की परागण, निषेचन, पुंकेसर, बीजाण्डासन क्या होते है और यह किस प्रकार पुष्प से सम्बंधित है |

    पुष्प (Flower)

    पुष्पीय पौधों में पुष्प एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंग है। आकारकीय (Morphological) रूप से पुष्प एक रूपान्तरित प्ररोह (स्तम्भ) है जिस पर गाँठे तथा रूपान्तरित पुष्पी पत्तियाँ लगी रहती हैं। पुष्प प्रायः तने या शाखाओं के शीर्ष अथवा पत्ती के अक्ष (Axil) में उत्पन्न होकर प्रजनन (Reproduction) का कार्य करती है तथा फल एवं बीज उत्पन्न करता है।

    पुष्प या फूल एक रूपान्तरित प्ररोह है। इसमें जनन अंग तथा सहायक अंग उपस्थित होते हैं। जिस पुष्प में दोनों जनन अंग अर्थात नर और मादा हो, तो उसे द्विलिंगी पुष्प तथा जब केवल एक जननांग (नर या मादा उपस्थित होते हैं तो उसे एकलिंगी कहते हैं। एक ही पौधे पर नर तथा मादा दोनों पुष्प होने पर पौधा उभयलिंगाश्रयी, जबकि नर तथा मादा पुष्प अलग-अलग पौधों पर उपस्थित उपस्थित होने एकलिंगीश्रयी कहलाता है।

    पुष्प की रचना

    पुष्प एक डंठल द्वारा तने से सम्बद्ध होता है। इस डंठल को वृन्त या पेडिसेल (Pedicel) कहते हैं। वृन्त के सिरे पर स्थित चपटे भाग को पुष्पासन या थेलामस (Thalamus) कहते हैं। इसी पुष्पासन पर पुष्प के विविध पुष्पीय भाग (Floral Parts) एक विशेष प्रकार के चक्र (Cycle) में व्यवस्थित होते हैं।

    पुष्प (Flower) के मुख्य भाग

    पूर्ण पुष्प में चार मुख्य भाग निम्न है :

    1. बाह्य दलपुंज (Calyx),
    2. दलपुंज (Corolla),
    3. पुमंग (Androecium)
    4. जायांग (Gynoecium)

    पूर्ण पुष्प में चार मुख्य भाग बाह्य दलपुंज एवं दलपुंज (दोनों सहायक अंग) तथा पुमंग एवं जायांग (दोनों आवश्यक अंग) उपस्थित होते हैं। तने से पुष्पों को जोड़ने वाले अंग वृन्त पुष्प का डण्ठल होता है।

    1. बाह्य दलपुंज (Calyx)

    यह पुष्प का सबसे बाहरी चक्र होता है। बाह्यदलपुंज एक दूसरे से स्वतन्त्र (polysepalous) या एक दूसरे से जुड़े हो सकते हैं। कुछ पौधों जैसे सिंघाड़ा में बाह्य दलपुंज काँटों में रूपान्तरित हो जाते हैं। कम्पोजिटी कुल के पौधों में रोमों के समान हो जाते है, जिन्हें रोमगुच्छ कहते हैं।

    2. दलपुंज (Corolla)

    यह अनेक इकाइयों अर्थात् दलों से मिलकर बनता है, जो विभिन्न वर्णकों के कारण चमकीले होते हैं तथा फूलों को आकर्षक रूप प्रदान करते हैं।

    3. पुमंग (Androecium)

    पुमंग (Androecium) पुष्प का नर जनन अंग है, जो पुंकेसरों (stamens) का बना होता है। पुंकेसर पुतन्तु (filament), परागकोष (anther) तथा योजी (connective) से मिलकर बना होता है।

    पुंकेसर

    अधिकांश पुंकेसरों में दो परागकोष होते हैं, जिन्हें द्विकोष्ठी कहते हैं परन्तु मालवेसी कुल में एककोष्ठी (monothecous) पुंकेसर मिलते हैं।

    – पुष्प में पुंकेसर स्वतन्त्र अर्थात् पृथक पुंकेसरी या संयुक्त अर्थात् संघी हो सकते हैं; जैसे

    1. एकसंघी सभी पुंकेसरी एक समूह में, उदाहरण गुड़हला

    2. द्विसंघी पुंकेसरों के पुतन्तु परस्पर जुड़कर दो समूह बनाते हैं, उदाहरण मटर

    3. यहुसंघी पुतन्तु संयुक्त होकर दो से अधिक समूह बनाते हैं, उदाहरण बॉम्बेक्सा

    4. युक्तकोषी पुंकेसर अपने परागकोषों से जुड़े होते हैं और उनके पुतन्तु स्वतन्त्र होते हैं, उदाहरण कम्पोजिटी।

    5. युक्तपुंकेसरी पुंकेसरों के परागकोष तथा पुतन्तु दोनों आपस में पूरी तरह जुड़े होते हैं, और उनके में पुंतन्तु स्वतन्त्र होते हैं, उदाहरण कम्पोजिटी।

    – जब पुंकेसर दल से जुड़े होते है, तो इन्हें दललग्न, जैसे धतूरा व बैगन, जब परिदल से जुड़े होते हैं, तो इन्हें परिदललग्न; जैसे-प्याज व लहसुन तथा जब जायाँग के साथ जुड़े होते हैं, तो इन्हें पुंजायाँगी कहते हैं; जैसे-मदार।

    द्विदिघ्री (Didynamous) अवस्था में 4 पुंकेसर में से 2 के पुतन्तु बड़े तथा दो के छोटे होते हैं; के सदस्य। जैसे-लेबिऐटी कुल के सदस्य

    चतुदीघ्री (Tetradynamous) अवस्था में 6 पुंकेसरों में से 2 बाहर वाले पुंकेसरों के पुंतन्तु छोटे तथा चार अन्दर वाले पुंकेसरों के पुतन्तु बड़े होते हैं; जैसे-क्रूसीफेरी कुल के सदस्य ।

    4. जायाँग (Gynoecium)

    यह पुष्प का मादा जनन अंग है, जो अनेक अण्डपों से मिलकर बना होता है। अण्डपों की संख्या के आधार पर जायाँग एकाअण्डपी; जैसे-मटर, द्विअण्डपी; जैसे-सरसों, त्रिअण्डपी; जैसे-कुकुरबिटा, पंचाण्डपी; जैसे-गुड़हल और बहुअण्डपी; जैसे- पैपेवर आदि होता है।

    उर्ध्ववर्ती (Superior) अवस्था में अण्डाशय बाह्यदलों, दलों तथा पुंकेसरों से ऊपर होता है, जबकि अधोवर्ती (inferior) अवस्था में पुष्पासन अण्डाशय से संगलित हो जाता है और बाह्यदल, दल तथा पुंकेसर अण्डाशय के ऊपर लगे होते हैं।

    अण्डप

    अण्डप के मुख्यतया तीन भाग होते हैं

    1. अण्डाशय (Ovary) अण्डप के आधार का फूला हुआ भाग अण्डाशय कहलाता है।

    2. वर्तिका (Style) अण्डाशय के ऊपर वाले भाग, लम्बी और पतली संरचना वर्तिका कहलाती है।

    3. वर्तिकाग्र (Stigma) यह वर्तिका का शीर्ष भाग होता है।

    पुष्प का कार्य

    पुष्प का मुख्य कार्य लिंगीय प्रजनन द्वारा फल तथा उसके अन्दर बीज का निर्माण करना है।

    परागण

    परागकणों का पुंकेसर से वर्तिकाग्र पर स्थानान्तरण परागण कहलाता है। यह दो प्रकार से होता है:

    स्व-परागण (Self-pollination) में एक पुष्प के परागण उसी पुष्प अथवा उसी पौधे के दूसरे पुष्प की वर्तिकाग्र पर पहुंचते हैं।

    पर-परागण (Cross-pollination) में एक पुष्प के परागकण उसी जाति के दूसरे पौधों के पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं। पर-परागण की क्रिया वायु, जल, कीट तथा जन्तुओं के द्वारा होती है। पर-परागण के अन्तर्गत वायु द्वारा परागण अर्थात् । एनिमोफिली; जैसे-गेहूँ, मक्का आदि में, जल द्वारा अर्थात् हाइड्रोफिला; जैसे-हाइड्रिला में, कीटों द्वारा अर्थात् एन्टोमोफिली।

    • अधिकांश पुष्पों में सर्वाधिक सफल परागण कीटों के माध्यम से ही होता है। इस क्रिया में पराग कणों की न्यूनतम क्षति होती है। पुष्पों में उपस्थित मकरन्द (nectas) कीटों का प्रिय भोजन है। पक्षियों द्वारा परागण अर्थात् ऑर्निथोफिली सेमल वृक्ष में, चमगादड़ द्वारा अर्थात चिरोप्टेरोफिली जैसे कदम्ब वृक्ष में, घोघों द्वारा अर्थात् मैलेकोफिली परागण; जैसे-अरवी में, हाथी द्वारा रफ्लेशिया में आदि परागण विधियाँ आती हैं।

    परागण की विधियां (Methods of pollination)

    1. वायु परागण (Anemophilous): वायु द्वारा परागण
    2. कीट परागण (Entomophilous): कीट द्वारा परागण
    3. जल परागण (Hydrophilous): जल द्वारा परागण
    4. जन्तु परागण (zoophilous): जन्तु द्वारा परागण
    5. पक्षी परागण (Ornithophilous): पक्षियों द्वारा परागण
    6. मेलेकोफिलस (Malacophilous): घोंघे द्वारा परागण
    7. चिरोप्टोफिलस (Chiroptophilous): चमगादड़ द्वारा परागण

    निषेचन (Fertilization)

    परागण के पश्चात निषेचन की क्रिया प्रारम्भ होती है। परागनली (Pollen tube) बीजाण्ड (ovule) में प्रवेश करके बीजाण्डासन को भेदती हुई भ्रूणपोष (Endosperm) तक पहुँचती है और परागकणों को वहीं छोड़ देती है। इसके पश्चात् एक नर युग्मक एक अण्डकोशिका से संयोजन करता है। इसे ही निषेचन कहते हैं। अब निषेचित अण्ड (Fertilized egg) युग्मनज (zygote) कहलाता है। यह युग्मनज बीजाणुभिद की प्रथम इकाई है।

    निषेचन के पश्चात बीजाण्ड से बीज, युग्मनज से भ्रूण (embryo) तथा अण्डाशय से फल का निर्माण होता है। आवृत्तबीजी पौधों (Angiospermic plants) में निषेचन को त्रिक संलयन (Triple fusion) कहते हैं।

    निषेचन के पश्चात् पुष्प में होने वाले परिवर्तन

    निषेचन के पश्चात् पुष्प में निम्नलिखित प्रकार के परिवर्तन देखने को मिलते हैं-

    1. बाह्य दलपुंज (Calyx): यह प्रायः मुरझाकर गिर जाता है। अपवाद-मिर्च।
    2. दलपुंज (Corolla): यह मुरझाकर गिर जाता है।
    3. पुंकेसर (stamen): यह मुरझाकर झड़ जाता है।
    4. वर्तिकाग्र (stigma): यह मुरझा जाती है।
    5. वर्तिका (style): यह मुरझा जाती है।
    6. अण्डाशय (Ovary): यह फल में परिवर्तित हो जाती है।
    7. अण्डाशय भित्ति (Ovary wall): यह फलाभित्ति (Pericarp) में परिवर्तित हो जाती है।
    8. त्रिसंयोजक केन्द्रक (Triple fused nucleus): यह भ्रूणपोष (Endosperm) में परिवर्तित हो जाती है।
    9. अण्डकोशिका (Egg cells): यह भ्रूण (embryo) में परिवर्तित हो जाता है।
    10. बीजाण्डसन (Nucellus): यह पेरीस्पर्म (Perisperm) में परिवर्तित हो जाती है।
    11. बीजाण्ड (Ovule): यह बीज (seed) में परिवर्तित हो जाती है।

    बीजाण्डासन (Placentation)

    बीजाण्डों के वितरण को बीजाण्डन्यास कहते हैं। बीजाण्डासन पुष्पासन (thalamus) या अधर सेवनी (ventral suture) से उत्पन्न विशेष प्रकार का ऊतक है। बीजाण्डन्यास निम्न प्रकार के होते हैं:

    1. सीमान्त (Marginal)

    यह एकाण्डपी अण्डाशय में पाया जाता है, इसमें बीजाण्ड अण्डाशय की सीवन (suture) पर लगे होते हैं। जैसे-लेग्युमिनासा कुल के सदस्य।

    2. भित्तीय (Pnrietal)

    यह द्वि, त्रि या बहुअण्डपी तथा एक कोष्ठी अण्डाशय में पाया जाता है, बीजाण्ड अण्डाशय की भीतरी भित्ति पर लगे होते हैं; जैसे-सरसों, मूली, आरजीमॉन।

    3. स्तम्भीय या अक्षवर्ती (Axile)

    यह द्वि, त्रि,  बहुअण्डपी अण्डाशय में पाया जाता है। बीजाण्डासन अण्डाशय के केन्द्रीय अक्ष पर उत्पन्न होता है; जैसे-गुड़हल, टमाटर, लिली।

    4. आधारिक (Basal)

    अण्डाशय एक कोष्ठकीय होता है तथा बीजाण्डासन अण्डाशय के आधार पर लगा होता है, प्रत्येक बीजाण्डासन पर केवल बीजाण्ड जुड़ा होता है; जैसे-सूरजमुखी गेहूँ।

    5. मुक्त स्तम्भीय (Free central)

    बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी तथा कोष्ठकी अण्डाशय में पाया जाता है, बीजाण्ड अण्डाशय के केन्द्रीय अक्ष पर लगे होते हैं; जैसे-सैपोनेरिया, प्राइमुला।

    6. परिभित्तीय (Superficial)

    यह बहुअण्डपी, युक्ताअण्डपी तथा बहुकोष्ठकीय अण्डाशय में पाया जाता है, इसमें बीजाण्ड अण्डपों की भीतरी दीवार की विभाजन भित्तियों पर उत्पन्न होते हैं; जैसे-वाटर लिली।

  • पुष्पक्रम (Inflorescence) किसे कहते हैं? परिभाषा , पुष्पक्रम के प्रकार, उदाहरण  Inflorescence in Hindi | What Is Inflorescence

    पुष्पक्रम (Inflorescence) किसे कहते हैं? परिभाषा , पुष्पक्रम के प्रकार, उदाहरण Inflorescence in Hindi | What Is Inflorescence

    इस आर्टिकल में हम जानेगे कि पुष्पक्रम किसे कहते हैं अथवा Inflorescence meaning in Hindi ? क्या है, साथ ही हम जानेगे कि पुष्पक्रम (Inflorescence) कितने प्रकार के होते है, Inflorescence के उदाहरण क्या क्या है, एकल पुष्प  क्या होता है, असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence), ससीमाक्षी पुष्पक्रम (Cymose Inflorescence) और मिश्रित पुष्पक्रम (Mixed Inflorescence) क्या है, इनकी विशेषताएं और उदाहरण क्या क्या है आदि |

    पुष्पक्रम क्या है? What Is Inflorescence In Hindi | पुष्पक्रम की परिभाषा

    प्रत्येक जाति के पुष्पीय पौधे पर पुष्प कुछ निश्चित क्रम में व्यवस्थित होते है। पौधे की शाखा के शीर्ष पर पुष्प के उत्पन्न होने और व्यवस्थित होने की विधि (ढंग) को “पुष्पक्रम” कहते है। पुष्पक्रम का अक्ष पुष्पाक्ष कहलाता है | दुसरे शब्दों में पुष्प अक्ष (Floral Axis) या पुष्पाक्ष पर पुष्पों के लगने की व्यवस्था को पुष्पक्रम (Inflorescence) कहते हैं।

    जिस शाखा पर पुष्प लगते है, उस शाखा को पुष्पावली वृन्त (Peduncle) कहते हैं। तथा एक पुष्प जिस वृन्त के द्वारा शाखा से जुड़ा रहता है, उसे पुष्प वृन्त (Pedicel) कहते हैं। पुष्पक्रम का प्रत्येक फूल पुष्पक कहलाता है।

    जब पुष्पावली वृन्त (Peduncle) चपटा या गोल होता है, तो उसे पात्र (receptacle) कहते हैं।
    कभी-कभी पुष्पावली वृन्त (Peduncle) मूलज पत्तियों (radical leaves) के बीच से निकलता है, तब इसे पुष्पदंड (Scape) कहते हैं।

    एकल पुष्प क्या होता है ?

    पुष्प का निर्माण पादप के शीर्षस्थ (terminal) अथवा कक्षस्थ  कलिका (axillary bud) से होता है।
    जब पुष्प शाखा पर एक ही होता है, तो उसे एकल पुष्प कहते हैं। परंतु जब शाखा पर अनेक पुष्प होते हैं, तो ऐसे पुष्पों का समूह पुष्पक्रम कहलाता हैं। (i) एकल शीर्षस्थ : अकेला शीर्षस्थ पुष्प मुख्य तने या उसकी शाखाओं के शीर्ष पर विकसित होता है , उदाहरण पॉपी। (ii)  एकल कक्षस्थ : ये पुष्प पत्ती (उदाहरण : पिटुनिया) के कक्ष में या पुष्पावलि वृन्त के शीर्ष (उदाहरण : चाइना रोज = शू पुष्प = हिबिस्कस रोजा – सिनेनसिस) पर अकेले पाए जाते है।

    पुष्पक्रम (Inflorescence) के प्रकार  (Different Types Of Inflorescence in Hindi)

    पुष्पक्रम मुख्यत: तीन प्रकार के होते है :

    (1) असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence)

    (2) ससीमाक्षी पुष्पक्रम (Cymose Inflorescence)

    (3) मिश्रित पुष्पक्रम (Mixed Inflorescence)

    असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence) क्या है ?

    असीमाक्षी या अनिश्चित वृद्धि का पुष्पक्रम पाशर्व या कक्षस्थ पुष्प रखता है जो अग्राभिसारी क्रम (आधार की ओर पुराने और शीर्ष पर नए) में उत्पन्न होते है। इस प्रकार के पुष्पक्रम में पुष्प अक्ष (Floral Axis) की वृद्धि रुकती नही है और अनिश्चित वृद्धि करता है। इसमें नीचे के फूल बड़े जबकि ऊपर की तरफ छोटे होते जाते है। इसमे नये फूल ऊपर या बीच में जबकि पुराने फूल सबसे नीचे होते है। उदाहरण – मूली , सरसों , घास , केला , सहतूत, सरसों, सोयाबीन इत्यादि।

    असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence in hindi) के मुख्य प्रकार

    •  रेसीम (Raceme) – सरसों के पौधे में यह पुष्पक्रम पाया जाता है। इसमें मुख्य लम्बे अक्ष से pedicle जुड़े होते है और इससे फूल लगे होते है। उदाहरण :गुलमोहर, गेहूं इत्यादि।
    • स्पाइक (Spike) – यह एक अनिश्चित और अशाखित पुष्पक्रम है जो Sessile (बिना डंठल के) फूलों में मिलता है।
    • ओक (Catkin) – ओक में यही पुष्पक्रम पाया जाता है। इसमें लम्बे अक्ष पर उभयलिंगी फूल लगे होते है।
    • Umbel – इसे shortened Racemose भी कहते है। यह गाजर वंश के पौधो में पुष्पक्रम पाया जाता है।
    • Spikelet – इसमें पुष्पक्रम शाखित केंद्रीय अक्ष पर होता है।
    • Head – इसे flattened Racemose कहा जाता है। इसमें मुख्य अक्ष मोठा और चौड़ा हो जाता है जिसे receptacle कहते है। फूलों में pedicles नही होते है।

    ससीमाक्षी पुष्पक्रम क्या है? (Cymose Inflorescence in Hindi)

    इस प्रकार के पुष्पक्रम में पुष्प अक्ष की वृद्धि सीमित होती है। इस प्रकार के पुष्प क्रम में मुख्य अक्ष सिमित वृद्धि वाला होता है और शीर्ष पर एक पुष्प बन जाने के कारण शीर्ष की वृद्धि रुक जाती है।  शीर्षस्त पुष्प के नीचे शाखाएँ निकलती है व उनके शीर्ष पर भी पुष्प बन जाता है।  ससीमाक्षी में पुष्पक्रम तलाभिसारी होता है। उदाहरण – गुडहल , मकोय , पॉपी , चमेली ,आक आदि।

    ससीमाक्षी पुष्पक्रम के मुख्य प्रकार

    • Uniparous Cyme – इसे monochasial पुष्पक्रम भी कहते है। मुख्य अक्ष फूल में समाप्त होता है और इसके आधार से एक दूसरी पार्श्व शाखा निकलती है। फूल basipetal व्यवस्था में शीर्ष में मौजूद होते है। उदाहरण : ड्रोसेरा (Drosera).
    • Dichasial Cyme – इसे द्विशाखी पुष्पक्रम भी कहते है। इसके peduncle के शीर्ष पर फूल लगता है जबकि आधार पर दो पार्श्व शाखाएं निकलती है। उदाहरण : चमेली
    • Multiparous Cyme – इसे बहुशाखी पुष्पक्रम कहते है।
    • Cymose Capitulum (कैपिटुलम) – इसमें पुष्पावली वृन्त (Peduncle) कम वृद्धि करता है और टॉप पर बड़ा फूल लगता है। जबकि इसके पार्श्व में छोटे फूल होते है।

    ससीमाक्षी पुष्पक्रम के कुछ उदाहरण

    • शूकी बॉस एवं लटजीरा
    • अनुशूकी गेहूँ
    • मन्जरी बीटुला एवं मोरस
    • स्थूल मन्जरी कोलोकेशिया
    • समशिख केसिया
    • छतक हाइड्रोकोटाइल
    • मुण्डक सूरजमुखी, जीनिया (पुष्पाक्ष छोटा एवं चपटा होता है जिसे पात्र (receptacle) कहते हैं। मुण्डक में बाहर की ओर रश्मि पुष्पक एवं केन्द्र की ओर बिम्ब पुष्पक होते हैं।

    मिश्रित या यौगिक पुष्पक्रम (Compound Inflorescence) क्या है ?

    जिस पौधे के पुष्प अक्ष पर ससीमाक्षी और असीमाक्षी दोनों प्रकार के पुष्पक्रम पाये जाते है, उसे मिश्रीत पुष्पक्रम (Compound Inflorescence) कहते है।

    मिश्रित पुष्पक्रम के प्रकार

    • थिरसस : साइमोस समूह अग्रभिसारी रूप से विन्यस्त होते है। उदाहरण : विटिस विनिफेरा (ग्रेप वाइन)
    • मिश्रित स्पेडिक्स : स्पेडिक्स मांसल अक्ष पर अग्राभिसारी रूप से विन्यस्त साइमोस पुष्पक्रम रखता है।
    • पेनिकिल ऑफ़ स्पाइकलेट्स : स्पाइकलेंट संयुक्त रेसीम में विन्यस्त होते है। उदाहरण : जई , चावल।
    • कॉरिम्ब ऑफ़ कैपिटुला : उदाहरण : एगीरेटम
    • अन्य प्रकार जैसे अम्बेल ऑफ़ कैपिटूला , साइम ऑफ़ कैपिटुला (उदाहरण : वनिर्जिया ) , साइम ऑफ़ अम्बेल (उदाहरण : लेटाना) , साइम ऑफ़ क्रोरिम्ब आदि।

    विशिष्ट पुष्पक्रम

    विशिष्ट पुष्पक्रम निम्न प्रकार के होते है :

    कटोरिया (Cyathium) सहपत्रों के आपस में जुड़ने से कटोरे की आकृति का सहपत्र चक्र (involucre) बनता है इसकी बाहरी सतह पर मकरन्द ग्रन्थियाँ, बीच में केवल जायाँग द्वारा प्रदर्शित मादा पुष्प तथा उसके चारों ओर एक तन्तुकीय पुंकेसर द्वारा प्रदर्शित नर पुष्प होते हैं; जैसे – यूफोरबिएसी कुल के सदस्य।

    कूट चक्रक (Verticillaster) – यह द्विशाखी ससीमाक्ष का परिवर्तित रूप है। तने की प्रत्येक पर्वसन्धि पर निकली विपरीत पत्तियों के कक्ष में अवृन्त पुष्प निकलते हैं जिसके नीचे से दोनों ओर दो पुष्प निकलते हैं; जैसे – तुलसी, साल्विया

    हाइपेन्थोडियम (Hypanthodium) पुष्पाक्ष अथवा आशय एक छिद्रयुक्त गूदेदार तथा खोखली गुहा की भाँति हो जाता है और छिद्र शल्कों से ढका रहता है।

    पुष्पक्रम (Inflorescence) से सम्बन्धित महत्वपुर्ण प्रश्न :

    प्रश्न : असीमाक्षी पुष्पक्रम और ससीमाक्षी पुष्पक्रम में क्या अंतर है ? Difference between Racemose and Cymose Inflorescence?

    उत्तर: असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose) में ससीमाक्षी पुष्पक्रम (cymose) की तुलना में मुख्य अक्ष में अत्यधिक वृद्धि होती है।

    असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose – रेसमोस) में, मुख्य अक्ष अनिश्चित काल तक बढ़ता रहता है और फूल बाद में पैदा होते हैं। ससीमाक्षी पुष्पक्रम (cymose – सायमोज) में, फूल पुष्प अक्ष पर अंतिम रूप से पैदा होते हैं और मुख्य अक्ष के विकास को निर्धारित करते हैं।

    असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose) में फूल अग्राभिसारी (acropetal) (नीचे से ऊपर की तरफ बढ़ना) क्रम में व्यवस्थित होते है। जबकि ससीमाक्षी पुष्पक्रम (cymose) में पुष्प तलाभिसारी (basipetal) क्रम में होते है।

    असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose) में सबसे पुराना फूल पुष्पक्रम अक्ष के आधार पर होता है जबकि ससीमाक्षी पुष्पक्रम (cymose) में पुष्पक्रम अक्ष के सबसे ऊपर होता है।

    फूलों के Flowering (खिलना या उगना) का समय भी पुष्पक्रम को निर्धारित करता है।

    प्रश्न : असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence) कोनसे फूलों में पाया जाता है ?  Racemose Inflorescence is present in which flower?

    उत्तर : मूली , सरसों , घास , केला , सहतूत, सरसों, सोयाबीन

    प्रश्न : ससीमाक्षी पुष्पक्रम कोनसे फूलों में पाया जाता है ?  Cymose Inflorescence is present in which flower?

    उत्तर : गुड़हल, चमेली 

    प्रश्न : पुष्पक्रम से क्या आशय है? ये कितने प्रकार के होते है? What is inflorescence? How many types of inflorescence?

    उत्तर : प्रत्येक जाति के पुष्पीय पौधे पर पुष्प कुछ निश्चित क्रम में व्यवस्थित होते है। पौधे की शाखा के शीर्ष पर पुष्प के उत्पन्न होने और व्यवस्थित होने की विधि (ढंग) को “पुष्पक्रम” कहते है। पुष्पक्रम का अक्ष पुष्पाक्ष कहलाता है | दुसरे शब्दों में पुष्प अक्ष (Floral Axis) या पुष्पाक्ष पर पुष्पों के लगने की व्यवस्था को पुष्पक्रम (Inflorescence) कहते हैं। पुष्पक्रम मुख्यत: तीन प्रकार के होते है :

    (1) असीमाक्षी पुष्पक्रम (Racemose Inflorescence)

    (2) ससीमाक्षी पुष्पक्रम (Cymose Inflorescence)

    (3) मिश्रित पुष्पक्रम (Mixed Inflorescence)

    प्रश्न : कटोरिया पुष्पक्रम पर टिप्पणी

    उत्तर : कटोरिया (Cyathium) सहपत्रों के आपस में जुड़ने से कटोरे की आकृति का सहपत्र चक्र (involucre) बनता है इसकी बाहरी सतह पर मकरन्द ग्रन्थियाँ, बीच में केवल जायाँग द्वारा प्रदर्शित मादा पुष्प तथा उसके चारों ओर एक तन्तुकीय पुंकेसर द्वारा प्रदर्शित नर पुष्प होते हैं; जैसे – यूफोरबिएसी कुल के सदस्य।

    प्रश्न : हाइपेन्थोडियम पुष्पक्रम क्या है ?

    उत्तर : हाइपेन्थोडियम (Hypanthodium) पुष्पाक्ष अथवा आशय एक छिद्रयुक्त गूदेदार तथा खोखली गुहा की भाँति हो जाता है और छिद्र शल्कों से ढका रहता है।

    प्रश्न : कूटचक्रक और सायथियम पुष्पक्रम में अन्तर लिखिए।

    उत्तर : कूट चक्रक (Verticillaster) – यह द्विशाखी ससीमाक्ष का परिवर्तित रूप है। तने की प्रत्येक पर्वसन्धि पर निकली विपरीत पत्तियों के कक्ष में अवृन्त पुष्प निकलते हैं जिसके नीचे से दोनों ओर दो पुष्प निकलते हैं; जैसे – तुलसी, साल्विया

    सायथियम (Cyathium – कटोरिया) सहपत्रों के आपस में जुड़ने से कटोरे की आकृति का सहपत्र चक्र (involucre) बनता है इसकी बाहरी सतह पर मकरन्द ग्रन्थियाँ, बीच में केवल जायाँग द्वारा प्रदर्शित मादा पुष्प तथा उसके चारों ओर एक तन्तुकीय पुंकेसर द्वारा प्रदर्शित नर पुष्प होते हैं; जैसे – यूफोरबिएसी कुल के सदस्य।

  • पत्ती (Leaf) किसे कहते है? पत्ती/पर्ण क्या है, परिभाषा, पत्ती की संरचना, भाग, पत्ती के प्रकार, रूपान्तरण, पत्ती के कार्य What is leaf, its type (Leaf in Hindi)

    पत्ती (Leaf) किसे कहते है? पत्ती/पर्ण क्या है, परिभाषा, पत्ती की संरचना, भाग, पत्ती के प्रकार, रूपान्तरण, पत्ती के कार्य What is leaf, its type (Leaf in Hindi)

    इस आर्टिकल में हम जानेगे कि पत्ती किसे कहते है, पत्ती के कितने प्रकार और भाग होते है l साथ ही हम इस आर्टिकल में जानेगे कि पत्ती की संरचना किस प्रकार की होती है, इसके अलावा पत्ती के रूपान्तरण तथा पत्ती के कार्यों, और एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री पत्ती में अन्तर के बारे में बात करेगे |

    पत्ती या पर्ण किसे कहते है ? (What is Leaf)

    पत्ती पोधों के तना के पर्वसन्धि (Internodes) से निकलती है जो  पौधों का हरा पाशर्व (side) भाग होता है और इसे पौधों की भोजन की फैक्ट्री कहा जाता है। क्योकीं पौधों का पत्ती वाला भाग ही प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की क्रिया द्वारा भोजन अर्थात कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते है। पत्तियाँ या पर्ण चपटी और फैली हुई पर्वसन्धि पर विकसित होती है।  ये अग्राभिसारी (आगे की तरफ देखते हुए – forward looking) क्रम में व्यवस्थित होती है।  पत्ती के कक्ष में कली होती है जो शाखा बनाती है।  पत्तियाँ क्लोरोफिल (Chlorophyll) (हरित लवक) के कारण हरे रंग की होती है, जिनमें छोटे-छोटे छिद्र होते है, जिनको स्टोमेटा (Stometa) कहा जाता है, जिसकी सहायता से गैसीय विनिमय (exchange of gases) का कार्य होता है।

    नोट :- क्लोरोफिल या हरित लवक हरे पौधों में मौजूद प्राकृतिक यौगिक है जो उन्हें अपना रंग देता है। यह पौधों को सूर्य से ऊर्जा को अवशोषित करने में मदद करता है क्योंकि वे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया से गुजरते हैं। (Chlorophyll is the natural compound present in green plants that gives them their color. It helps plants to absorb energy from the sun as they undergo the process of photosynthesis.)

    पत्ती की संरचना किस प्रकार की होती है (What is structure of Leaf)

    पत्तियों को संरचना के आधार पर निम्न तीन भागों में बांटा गया है:- 

    पत्राधार या पर्णाधार (Leaf base)

    यह पत्ती का सबसे निचला भाग होता है जो पत्ती को तना व शाखा से जोड़ता है, अर्थात तना और पत्ती के पत्रवृंत (Petiole) के जुड़ने वाले भाग को पत्राधार कहते यह पत्ती का आधारीय भाग है | इसके आधार पर एक या दो छोटी पत्तियों के समान प्रवर्ध होते है, जिन्हें अनुपर्ण कहते है। एक बीज पत्ती व लैग्यूमिनेसी कुल के पादपों में पर्णाधार फूला हुआ होता है ऐसे पर्णाधार को पर्णवृन्त तल्प कहते है।

    पत्रवृंत (Petiole)

    पत्राधार से एक लम्बा डंठल या डंडलनुमा भाग जैसी संरचना निकलती है जो पत्रफलक को आधार प्रदान करती है, इस लम्बे डंठल को ही पत्रवृंत कहते है। किन्तु कुछ पौधों में यह संरचना नहीं पायी जाती जैसे एक बीजपत्री पौधे। पत्रवृंत का मुख्य कार्य पत्रफलक (पर्णफलक) को सहारा देना और प्रकाश के लिए उठाये रखना होता है। पर्णफलक को उपयुक्त सूर्य का प्रकाश ग्रहण करने के लिए अग्रसर करता है | यह पत्ती के फलक को प्रकाश में उठाए रखता है ताकि अधिक-से-अधिक प्रकाश प्राप्त हो सके। यदि पादपो में पत्तियों के पर्णवृन्त उपस्थित हो तो उसे संवृन्त पत्ती और यदि उपस्थित नहीं हो तो अवृन्त पत्ती कहते है। जिन पत्तियों में पत्रवृन्त होता है, उन्हें सवृन्त (Petiolate) कहते हैं। जैसे-आम, पीपल आदि। बबूल में यह चपटे आकार के पर्णदल (lamina) में रूपान्तरित हो जाता है जिसे फायलोड़ (phyllodo) कहते है। जिन पतियों में पत्रवृन्त नहीं होता है, उन्हें अवृन्त (sessile) कहते हैं। जैसे- मक्का, गेहूँ आदि।

    पत्रफलक ((Leaf blade या Lamina)

    यह पत्ती का हरा, चपटा तथा फैला हुआ भाग होता है। इसके मध्य में पर्णवन्त से लेकर पत्ती के शीर्ष तक प्रायः एक मोटी शिरा होती है जिसे मध्यशिरा (midrib) कहा जाता है इस मध्यशिरा से दोनों तरफ पतली शिरायें निकलती है, जो आगे जाकर और छोटी और पतली शिराओं में विभक्त हो जाती है। ये पत्रफलक को कंकाल की भाँति दृढ़ता प्रदान करते हैं | इसका मुख्य कार्य पानी तथा भोज्य पदार्थों का परिवहन करना है। यह जल, खनिज लवण व भोजन आदि का स्थानांतरण का कार्य भी करती है। पत्तियों द्वारा प्रकाश-संश्लेषण, श्वसन एवं वाष्पोत्सर्जन क्रिया सम्पन्न होती है |

    प्रर्णाग्र – पत्ती का अंतिम पतला नुकीला भाग प्रर्णाग्र कहलाता है।

    शिराविन्यास

     वर्ण में शिराओ व शिराकाओं के विन्यास को शिरा विन्यास कहते है, शिराविन्यास दो प्रकार का होता है।

    (a) समान्तर शिराविन्यास: जब शिराएँ मध्य शिरा (midrib) के समान्तर व्यवस्थित होती है तो उसे समान्तर शिराविन्यास कहते है। उदाहरण: राकबीज पत्ती पादप।

    (b) जालिका शिराविन्यास: जब शिराएँ मध्यशिरा से निकलकर पर्णफलक में एक जाल बनाती है तो इसे जालिका पत शिराविन्यास कहते है। उदाहरण: द्विबीज पत्री पादप।

    पत्तियों को शिराविन्यास के आधार पर भी निम्न दो प्रकार में बांटा गया है:-

    जालिकावत पत्ती – जिलाकावत पत्तियाँ उन पत्तियों को कहा जाता है जिनका शिरा विन्यास जालि के जैसा होता है। अधिकतर द्वीबीजपत्री पौधों में यह विन्यास दिखाई देता है। जैसे :- जामुन, आम, बरगद, पीपल आदि की पत्ती।

    सामान्तर पत्ती – सामान्तर पत्ती उन पत्तियों को कहते है। जिनका शिरा विन्यास सामान्तर प्रकार का होता है। इस प्रकार का विन्यास एकबीजपत्री पौधों में दिखाई देता है। जैसे :-  गेंहूँ, धान, केला आदि की पत्तियाँ।

    एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री पत्ती में अन्तर

    एकबीजपत्री पत्तीद्विबीजपत्री पत्ती
    यह समद्शिर्विक होती है।यह पत्ती पृष्ठधारी होती है
    इनकी बाह्य त्वचा में बुलीफार्म कोशिकाएँ पाई जाती हैं।इनकी बाह्य त्वचा में बुलीफार्म कोशिकाओं का अभाव होता है।
    स्पंजी पैरेन्काइमा के अवकाश छोटे होते है।स्पंजी पैरेन्काइमा के अवकाश बड़े होते हैं।
    इसकी दोनों सतहों पर स्टोमेटा पाए जाते हैं।इसकी केवल निचली सतह पर स्टोमेटा पाए जाते हैं।

    पत्ती कितने प्रकार की होती है ? (Type of Leaf) 

    पत्रफलक के कटाव के आधार पर पत्तियाँ दो प्रकार की होती हैं- सरल पत्ती एवं संयुक्त पत्ती

    सरल पत्ती किसे कहते है (What is Simple Leaf) 

    सरल पत्ती वह पत्ती होती है जिसका फलक बड़ा होता है तथा इस फलक में कटाव नहीं होते किंतु कुछ पत्तियों में कटाव होते हैं लेकिन वह कटाव मध्य शिरा या पत्रवृन्त तक तक नहीं जाते।  जबकि इनमें केवल एक ही पर्ण फलक होता है तथा शाखा पर अग्रभिसारी क्रम में लगे होते है, उस पति को सरल पत्ती कहा जाता है। सरल पत्ती के उदाहरण:- आम, बरगद, पीपल, अमरुद आदि 

    संयुक्त पत्ती किसे कहते है (What is Compound Leaf)

    संयुक्त पत्ती पत्ती का वह प्रकार होता है जिसमें पत्र फलक मैं कटाव विभिन्न जगह से मध्य शिरा तक पहुंचता है, इसलिए यह पत्र फलक कई पर्णकों में बंट जाता है। इसके एक शाखा पर पर्ण फलक एक साथ होते है, उस पति को संयुक्त पत्ती कहा जाता है। संयुक्त पत्ती के उदाहरण:- नींबू, नारंगी, नीम, गुलाब आदि।

    संयुक्त पत्ती दो प्रकार की होती है –

    (a) पिच्छाकार संयुक्त पत्ती: इस प्रकार की पत्ती में अनेक पर्णक एक मध्यशिरा पर स्थित होते है।  उदाहरण – नीम आदि।

    (b) हस्ताकार संयुक्त पत्ती: इस प्रकार की पत्ती में अनेक पर्णक एक ही बिंदु अर्थात पर्णवृन्त के शीर्ष से जुड़े रहते है। उदाहरण – शिल्ककोटन वृक्ष।

    पूर्ण विन्यास (phyllotaxy)

    पत्तियों के तने पर लगने की व्यवस्था को पर्णविन्यास (Phyllotaxy) कहते हैं। पादपो में यह तीन प्रकार का होता है।

    (i) एकांतर पर्ण विन्यास: इस प्रकार के पर्णविन्यास में तने या शाखा पर एक अकेली पत्ती पर्णसन्धि पर एकान्तर क्रम में लगी रहती है। उदाहरण: गेहूं, गुडहल, सरसों, सूरजमुखी आदि।

    (ii) सम्मुख पर्णविन्यास: इस प्रकार के पर्ण विन्यास में प्रत्येक पर्णसन्धि पर एक जोड़ी पत्तियाँ आमने सामने लगी रहती है। उदाहरण: अमरुद, केलोट्रोफिस (आक) आदि।

    (iii) चक्करदार पर्णविन्यास: यदि एक ही पर्ण सन्धि पर दो से अधिक पत्तियाँ चक्र में व्यवस्थित हो तो उसे चक्करदार पर्ण विन्यास कहते है। उदाहरण – कनेर, एल्सटोनियम आदि।

    पत्तियों का रूपान्तरण (Modification of Leaves)

    पत्तियाँ कुछ विशेष कार्य सम्पादित करने पतियों का रूपांतर स्थिति मौसम के अनुसार अनुकूलन के हिसाब से हो जाता है:-

    पर्ण कंटक/सुरक्षा के लिए (Leaf spines)

    यह पौधे मरुस्थल या शुष्क स्थानों में उगते है, तो वहाँ जल की क्षति को रोकने के लिए पौधों की पत्तियाँ काँटों में परिवर्तित हो जाती है जिन्हे पर्णकंटक कहते है।  इसमें पतियाँ काँटों या शूलों (spines) में रूपान्तरित होकर पोधे के लिए सुरक्षा का कार्य करती है। जैसे- बैर , केक्ट्स , नागफनी आदि।

    पर्ण प्रतान (Leaf tendril)/ सहारा देने हेतु

    पौधों को आरोहण प्रदान करने के लिए जब पौधों की पत्तियाँ लंबे पतले कुंडलित तारनुमा संरचना में बदल जाते हैं, जिसे प्रतान (Tendril) कहा जाता है और इस तरह की पत्तियों को पर्णप्रतान ((Leaf Tendril) कहते है। ये प्रतान अति संवेदनशील होते हैं और ज्योंहि वे किसी आधार के सम्पर्क में आते हैं, उसके चारों ओर लिपट जाते हैं। इस प्रकार वे पौधों को आरोहण में सहायता प्रदान करते हैं। उदाहरण :- मटर

    पर्णाभवृन्त (Phyllode)

    इसमें पर्णवृन्त अथवा रेकिस का कुछ भाग चपटा एवं हरा होकर पर्णफलक जैसा रूप ग्रहण कर लेता है यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब पौधों में प्रकाश संश्लेषण प्रभावित होने लगता है । इसे ही पर्णाभवृन्त कहते हैं। इस तरह इस प्रकार की पत्तियां प्रकाश संश्लेषण का कार्य करती है उदाहरण : ऑस्ट्रेलियन बबूल, कैर आदि।

    घटपर्णी या घट रूपान्तरण (Pitcher)

    इसे कीटभक्षी पौधा या किटाहारी पादप भी कहते है जो नाइट्रोजन की कमी पूरी करने के लिए कीटों का भक्षण करता है। इसमें पत्ती का पर्णाधार (Leaf base) चौड़ा, चपटा एवं हरे रंग का होता है। पर्णवृन्त (Petiole) प्रतान का, फलक (Leafblade) घटक (Pitcher) का तथा फलक शीर्ष (फलक का नुकीला हिस्सा) ढक्कन का रूप ले लेता है। इस प्रकार सम्पूर्ण पत्ती घटनुमा रचना में परिवर्तित हो जाती है। घट (Pitcher) की भीतरी सतह पर पाचक ग्रन्थियाँ (digestive glands) होती हैं, जिनसे पाचक रस निकलता है। जब कोई कीट आकर्षित होकर फिसलकर घट में गिर जाता है तो घट का ढक्कन स्वतः बन्द हो जाता है। कीट पाचक रस द्वारा पचा लिया जाता है। इस क्रिया द्वारा पौधे अपने नाइट्रोजन की आवश्यकता की पूर्ति करते हैं। जैसे- घाटपर्णी (Pitcher plant), डायोनिया , ड्रेसिरा , वीनस , प्लाई ट्रेप आदि।

    ब्लेडर वर्ट (Bladderwort)

    यूट्रीकुलेरिया (Utricularia) जैसे जलीय कीटभक्षी पौधों में पतियाँ अनेक छोटे-छोटे खण्डों में बँटी होती हैं। कुछ खण्ड रूपान्तरित होकर थैलीनुमा संरचना बनाते हैं। प्रत्येक थैली (bladder) में एक खोखला कक्ष (Empty chamber) होता है, जिसमें एक मुख होता है। इस मुख पर एक प्रवेश द्वार होता है जिससे होकर केवल सूक्ष्म जलीय जन्तु ही प्रवेश कर सकते हैं। थैली या ब्लैडर के अंदर पाचक एन्जाइम उन सूक्ष्म जन्तुओं को पचा डालते हैं।

    खाद्य संचय हेतु रूपान्तरण

    कुछ पादपों की पत्तियाँ भोजन संचय का कार्य करती है।  उदाहरण – प्याज , लहसून आदि।

    कुछ पौधों (जैसे – खजूर और सायकस आदि) में पत्तियां केवल मुख्य स्तम्भ पर ही लगी रहती है। ऐसी पत्तियाँ स्तम्भिक कहलाती है।

    अधिकांश पौधों में पत्तियाँ मुख्य स्तम्भ और शाखाओं , दोनों पर पायी जाती है जैसे आम , पीपल , नीम आदि जिन्हें स्तम्भिक और शाखीय (cauline and ramal) कहते है।

    इनके अतिरिक्त कुछ पौधों , जैसे प्याज , मूली आदि में पत्तियां समानित भूमिगत तने पर उत्पन्न होती है , जिन्हें मूलज (radical) कहते है।

    नोट:- – संवहनी पौधों में पत्ती प्ररोह की एक महत्वपूर्ण संरचना होती है जो कि सीमित वृद्धि प्रदर्शित करती है। अधिकांश पौधों में पत्तियाँ प्राय: हरी , चपटी और पतली होती है और प्रकाश संश्लेषण और वाष्पोत्सर्जन का कार्य करती है। पत्ती को तने और शाखाओं की पर्वसन्धि से निकलने वाली एक पाशर्व उधर्ववृद्धि के रूप में परिभाषित किया जाता है। इनकी उत्पत्ति बहिर्जात होती है और अग्राभिसरी क्रम में उत्पन्न होती है। पत्ती की कक्ष में एक कक्षीय कलिका पायी जाती है जिससे शाखा का विकास होता है।

    पत्तियों के कार्य क्या है ? (What are functions of leaves)

    पत्तियाँ पौधे का महत्त्वपूर्ण अंग है। यह निम्नलिखित प्रमुख कार्य सम्पादित करती है-

    पत्तियों क्लोरोफिल, जल, कार्बन डाइऑक्साइड तथा सूर्य प्रकाश की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया करती है जिससे पौधों के लिए भोजन का निर्माण होता है। तथा मनुष्य और जीव जंतुओं के लिए प्राणवायु ऑक्सीजन का उत्पादन होता है ।

    यह जल तथा घुलनशील भोज्य पदार्थों का पतियों से स्तम्भ तक संचरण में सहायता करती है।

    पत्तियों का मुख्य कार्य गैसो का विनिमय करना होता है जो इनमें उपस्थित संरचना स्टोमेटा के द्वारा होता है। पत्तियाँ कार्बनडाई ऑक्साइड का अवशोषण करती है तथा ऑक्सीजन को वातावरण में छोड़ती है।

    मरुस्थल के पौधों में पत्तियाँ काँटों में रूपातंरित होकर जल के वाष्पीकारण को रोककर जल संरक्षण तथा जानवरो से फूलों, फलों और कलियों की रक्षा करती है।

    पत्तियाँ वाष्पीकरण के द्वारा पौधों से आवश्यकता से अधिक जल को बाहर निकालती है।

    पत्तियों में निर्मित भोजन पौधों के अन्य भागो में जल में धूलित अवस्था में पहुँचता है। तथा आवश्यकता से अधिक भोजन को संग्रहित करने का कार्य पत्तियाँ ही करती है।

    पत्तियाँ वाष्पोत्सर्जन की क्रिया करके पौधों की रक्षा सर्दी में पत्तियाँ गिराकर ऊष्मा को रोकती है और पतझड़ में पत्तियाँ गिराकर जल के वाष्पी कारण को रोककर पौधों में ऊष्मा और जल की मात्रा बनाये रखती है।

    पत्तियाँ उत्स्वेदन (Transpiration) की क्रिया को नियंत्रित करती है।

    प्रतन्तुओं में रूपान्तरित होने पर यह कमजोर पौधों को मजबूत आधार प्रदान करती है, तथा आरोहण में मदद करती है।

    कीटभक्षी पौधों में पिचर (Pitcher), ब्लेडर (Bladder) आदि में यह रूपान्तरित होकर प्रोटीनयुक्त पोषण में सहायता करती है।

    कुछ पतियाँ वर्धी प्रजनन (Vegetative reproduction) एवं परागण (Pollination) में सहायता करती हैं।

    कुछ पत्तियाँ भोजन संग्रह (Food storage) का कार्य भी करती हैं।

    बीजधारी पादपों में पत्तियों के प्रकार  (types of leaves in Hindi)

    पत्ती तने का मुख्य पाशर्व भाग है और बीजधारी पादपों में इनकी स्थिति , उत्पत्ति , कार्य और संरचना के आधार पर इनको निम्नलिखित प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है –

    1. बीजपत्रिय पर्ण (cotyledonary leaves) : अंकुरित होने वाले पौधों की यह सबसे पहली पर्ण होती है। कुछ द्विबीजपत्री पौधों में बीजों के अंकुरण के समय इनके बीजपत्र भूमि के ऊपर निकल आते है और हरे रंग का पत्तिनुमा संरचना में परिवर्तित हो जाते है। इस प्रकार की पत्तियां बीजपत्रीय पर्ण या भ्रूणीय पर्ण (embryonal leaves) कहलाती है। सत्य पर्णों के विकसित होने तक ये भोजन निर्माण का कार्य करती है और उसके पश्चात् झड़ कर गिर जाती है।

    2. अधोपर्ण अथवा शल्क पर्ण (cataphylls leaves) : ये सफ़ेद , भूरे अथवा हरे रंग की अवृंत और झिल्लीनुमा संरचनाएं होती है। ये मुख्यतः कलिकाओं और भूमिगत तनों में पायी जाती है। इनका प्रमुख कार्य पौधों के कोमल भागों को सुरक्षा प्रदान करना अथवा खाद्य पदार्थों का संचय होता है।

    3. अधिपर्ण (hypsophylls leaves) : ये हरी या रंगीन (लाल , पीली , नारंगी आदि) पर्णील संरचनाएँ होती है जो मुख्यतः पौधों के अग्र भागों में पायी जाती है , जिनके कक्ष में एकल पुष्प अथवा पुष्प गुच्छ विकसित होते है। इसलिए इन्हें सहपत्र (bract) भी कहते है। कभी कभी पुष्प वृंत पर भी इनका निर्माण होता है और सहपत्रक (bracteole) कहलाती है। ये कीटों को आकर्षित कर परागण में मदद करती है।

    4. प्रोफिल्स (prophylls) : ये आवृतबीजी पौधों की प्रथम पत्तियाँ होती है , जो पाशर्व शाखाओं पर उत्पन्न प्रथम केटाफिल्स है। इन्हें सहपत्रिका भी कहते है। उदाहरण – बीलपत्र में ये दो काटों के रूप में दिखाई देती है।

    5. पुष्पी पत्र (floral leaves) : पुष्प एक रूपांतरित प्ररोह है और इसके पुष्पी उपांग जैसे – बाह्यदल , दल , पुंकेसर और अंडप सभी पर्णील उपांग कहलाते है। आर्बर के अनुसार पर्णील उपांग , फिल्लोम (phyllome) कहलाते है।

    6. सामान्य पर्ण (foliage leaves) : ये पत्तियाँ तने पर पाशर्व उपांगों के रूप में लगी रहती है। ये हरे रंग की चपटी और प्रकाश संश्लेषी संरचनाएँ होती है। ये अवृंत संरचनाएं होती है और प्ररोह का मुख्य भाग प्राय: इन पत्तियों द्वारा ही निर्मित होता है।

    पत्ती की उत्पत्ति और परिवर्धन (origin and development of leaf in Hindi)

    पत्ती की उत्पत्ति तने अथवा शाखाओं के ऊपरी सिरे के पास स्थित कोशिकाओं के विभाजन से निर्मित पर्ण आद्यकों (leaf primordia) के रूप में होती है। पर्ण आद्यकों का विकास पर्ण विकास के अनुसार प्ररोह शीर्षस्थ विभाज्योतक के पाशर्व पर नियमित क्रम में होता है। पत्ती के विकास की विभिन्न प्रावस्थाओं का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है।

    1. समारम्भन और शीर्ष भिन्नन (initiation and early differentiation in hindi) :

    गिफोर्ड और टेपर के अनुसार पर्ण समारम्भन के स्थान पर उपस्थित विभाज्योतकी कोशिकाओं में आर.एन.ए (RNA) की मात्रा बढ़ जाती है। समारम्भन के प्रथम चरण में शीर्षस्थ विभाज्योतक की पाशर्व पर स्थित परिधीय कोशिकाओं में परिनतिक विभाजन होता है। विभिन्न पौधों में पर्ण आद्यकों के विभेदन में भाग लेने वाली कोशिकाओं की संख्या और स्थिति अलग अलग हो सकती है। सामान्यतया पर्ण समारम्भन से सम्बन्धित विभाजन ट्यूनिका की दूसरी या तीसरी परत की कोशिकाओं में होते है लेकिन घासों में ट्यूनिका की सबसे बाहरी परत में परिनतिक विभाजनों से पर्ण आद्यक का समारम्भन होता है। प्रारंभिक परिनतिक विभाजनों के फलस्वरूप ट्यूनिका से व्युत्पन्न कोशिकाओं और समीपवर्ती कार्पस की कोशिकाओं में परिनतिक और अपनतिक विभाजनों के फलस्वरूप शीर्षस्थ विभाज्योतक के पाशर्व में एक उभार और उधर्व विकसित होता है जिसे पर्ण बप्र कहते है। आच्छद पर्णाधार युक्त पत्तियों में प्रारंभिक विभाजन पर्ण आद्यक के पाशर्व में भी होते है , जिसके फलस्वरूप पर्ण आद्यक शीर्षस्थ विभाज्योतक को लगभग पूरी तरह घेर लेता है। इसके पश्चात् पर्ण आद्यक की शेष वृद्धि शीर्षस्थ विभाज्योतक के अतिरिक्त उपान्तीय , अन्तर्वेशी अभ्यक्ष और प्लेट विभाज्योतकों की सक्रियता के फलस्वरूप होती है। इन विभाज्योतकों में विभाजन उत्तरोतर या युगपत होते है जिनसे विभिन्न प्रकार की पत्तियों का विकास होता है।

    2. शीर्षस्थ और अंतर्वेशी वृद्धि (apical and intercalary growth in hindi) : अधिकतर द्विबीजपत्रीयों की पत्ती का आद्यक पर्णफलक रहित शंकु के रूप में होता है , जिसे पर्ण अक्ष कहते है। इसके पश्चात् पर्ण आद्यक की लम्बाई में वृद्धि आद्यक के शीर्ष पर उपस्थित शीर्षस्थ विभाज्योतक द्वारा होती है। इस विभाज्योतक की सक्रियता कुछ समय पश्चात् समाप्त हो जाती है। इसके पश्चात् शीर्ष से कुछ दूरी पर स्थित अन्तर्वेशी विभाज्योतक कोशिकाओं के विभाजन और दीर्घन से आद्यक की वृद्धि होती है। एकबीजपत्रियों मे अन्तर्वेशी वृद्धि द्विबीजपत्रियों की तुलना में अधिक होती है।

    3. उपांतीय वृद्धि (marginal growth) : पर्ण आद्यक की लम्बाई में वृद्धि के साथ साथ पत्ती के अक्ष के किनारे अथवा उपान्तो पर स्थित कोशिकाओं में तेजी से विभाजन होते है जिसके परिणामस्वरूप पत्ती में एक मध्यशिरा और दो पंख जैसे पर्ण फलक विभेदित हो जाते है। पर्ण आद्यक की यह पाशर्व या उपांतीय वृद्धि उपांतीय विभाज्योतक की सक्रियता द्वारा होती है। पर्ण आद्यक के आधारी भाग में उपान्ति विभाज्योतक निष्क्रिय होता है जिसके कारण पाशर्व वृद्धि नहीं होती और यह भाग पत्ती के वृंत में विकसित होता है। उपांति विभाज्योतक को दो भागों में विभेदित किया जा सकता है –

    (i) उपांतीय प्रारंभिक (marginal initials)

    (ii) उप उपांतीय प्रारंभिक (sub marginal initials)

    इन दोनों प्रारम्भिक कोशिकाओं से पत्ती के निश्चित भाग विकसित होते है।

    उपान्तीय प्रारंभिक में मुख्यतः अपनतिक विभाजन होते है जिससे पत्ती की ऊपरी और निचली अधित्वक का निर्माण करती है। कुछ एकबीजपत्री पर्णों में यदा कदा उपांति कोशिकाओं में परिनत विभाजन भी होता है जिनसे अधित्वक के अलावा पत्ती के आंतरिक ऊत्तक भी विकसित होते है।

    उप उपान्तीय प्रारंभिक जो उपांतीय प्रारम्भिक के निचे स्थित होती है। प्राय: सभी तलों में विभक्त होकर पर्ण फलक के आंतरिक ऊतकों का निर्माण करती है। उप उपांतीय प्रारंभिक कोशिकाओं की सक्रियता हमेशा एक सी नहीं रहती है। अत: पर्ण फलक की वृद्धि में विविधताएँ उत्पन्न होती है।

    4. अभ्यक्ष वृद्धि (adaxial growth) : पर्ण आद्यक की लम्बाई में वृद्धि के साथ साथ इसकी अरीय मोटाई में भी वृद्धि होती है। अरीय वृद्धि पत्ती के अभ्यक्ष अधित्वक के नीचे स्थित विभाज्योतकी पट्टियों के द्वारा होती है। इस विभाज्योतक की कोशिकाओं में परिनतिक विभाजन होते है जिनसे पत्ती की मोटाई में वृद्धि होती है। पर्णवृंत और मध्यशिरा की मोटाई भी इसी विभाज्योतक की सक्रियता का परिणाम होता है।

    5. प्लेट विभाज्योतक (plate meristem) : जब उपांतीय विभाज्योतक की सक्रियता समाप्त हो जाती है , तब पत्ती के पर्ण फलक के आमाप में वृद्धि प्लेट विभाज्योतक द्वारा होती है। इस विभाज्योतक में अनेक पर्ण मध्योतक कोशिकाओं के समानांतर स्तर होते है। ये कोशिकाएं अपनतिक विभाजनों द्वारा पत्ती के पृष्ठीय क्षेत्रफल में वृद्धि करती है। इस विभाज्योतक के विभाजनों के फलस्वरूप पत्ती अपनी परिपक्व अवस्था में पहुँचती है।

    6. संवहन ऊत्तक का विकास (development of vascular tissue in hindi) : द्विबीजपत्रियों की पत्ती में संवहन तंत्र का परिवर्धन मध्य शिरा में प्रोकेम्बियम के विभेदन से प्रारंभ होता है। प्रोकेम्बियम का विभेदन अग्राभिसारी क्रम में होता है और इसकी सतता अक्ष के प्रोकेम्बियम से बनी रहती है। पर्ण फलक के विस्तार के साथ साथ साथ मध्य शिरा से प्रथम श्रेणी की पाशर्व शिराएँ विकसित होती है। इसके पश्चात् दूसरी , तीसरी और अन्य उच्च श्रेणी की पाशर्व शिराएँ उत्तरोतर क्रम में विकसित होती है जिसके फलस्वरूप जालिकारुपी शिरा विन्यास बनता है। इस पाशर्व शिराओं का विभेदन पत्ती की अन्तर्वेशी वृद्धि के समय होता है। शिराओं के निर्माण में भाग लेने वाली प्रारंभिक कोशिकाओं की संख्या उत्तरोतर क्रम में (प्रथम श्रेणी → द्वितीयक श्रेणी → तृतीय श्रेणी) कम होती जाती और सबसे अंतिम श्रेणी की शिरिका केवल एकपंक्तिक रह जाती है। विभिन्न श्रेणी की शिराएँ सतत विकसित होती है। जाइलम और फ्लोयम ऊतकों का विभेदन अग्राभिसारी क्रम में होता है और फ्लोयम का विभेदन जाइलम से पहले होता है।

    एक बीजपत्रियों की पत्ती (उदाहरण ट्रिटिकम ) में लम्बी पाशर्व शिराओं का प्रोकेम्बियम स्टैंड अग्राभिसारी क्रम में विकसित होता है जबकि छोटी शिराओं का प्रोकोम्बियम तलाभिसारी क्रम में विकसित होता है। अनुप्रस्थ शिराएँ जो पाशर्व शिराओं को परस्पर जोडती है , अंत में बनती है और तलाभिसारी क्रम में विकसित होती है।

    स्मार्ट फैक्ट्स:

    आशुपाती (Caducous) पत्तियाँ प्रायः बनने के उपरान्त ही पौधे से गिर जाती हैं।

    पर्णपाती (Deciducous) पत्तियाँ एक विशेष ऋतु तक पौधे में लगी रहती है। और इसके बाद झड़ जाती है। उदाहरण: आम, पीपल, बरगद आदि।

    जालिका रूपी (Reticulate) शिराविन्यास में शिराएँ एवं उपशिराएँ एक अनियमित जाल के रूप में फैली रहती है। उदाहरण: द्विबीजपत्री पौधे। समानान्तर (Parallel) शिराविन्यास में शिराएँ एक दूसरे के समानान्तर होती हैं। उदाहरण: एकबीजपत्री पौधे।

  • तना (Plant Stem) परिभाषा, तने के लक्षण, तने के रूपान्तरण, तने के कार्य Work of Plant Stem in Hindi

    तना (Plant Stem) परिभाषा, तने के लक्षण, तने के रूपान्तरण, तने के कार्य Work of Plant Stem in Hindi

    तना पौधे का वह भाग है जो कि भूमि एवं जल के विपरीत तथा प्रकाश (Light) की ओर वृद्धि करता है। तना प्रांकुर (Plumule) से विकसित होता है और शाखाओं, पतियों, फूल एवं फल धारण करता है।

    तना पौधे का आरोही भाग है, जो भूमि के विपरीत प्रकाश की ओर गति करता है। (Negatively geotropic but positively phototropic). तने का आकार बेलनाकार, चपटा अथवा कोणीय (Angular) होता है। तने की अग्र सिरे पर कलिकाएँ (Buds) पायी जाती हैं, जिनसे तना वृद्धि करता है।

    तने की विशेषताएं (Characteristics of stem):

    • तना पौधे को दृढ़ता प्रदान करता है, जो तना में उपस्थित जाइलम तथा दृढ़ोत्तक (soloronchyma) के कारण होता है।
    • यह शाखाओं, पत्तियों एवं पुष्पों को जन्म देता है।
    • यह जड़ों द्वारा अवशोपित जल और खनिज लवणों को अन्य भागों तक तथा पत्तियों में संश्लेपित भोजन को जड़ सहित अन्य भागों तक पहुँचाता है।
    • तनों में निश्चित पर्वसन्धियाँ (nodes) तथा पर्व (inter-nodes) होते है। शाखाएँ एवं पत्तियाँ सामान्यतया पर्वसन्धियों से ही निकलता है।
    • तना जड़ों की भाँति खाद्य संग्रह भी करती है। जैसे-आलू, हल्दी, अदरक, गन्ना आदि। तना धनात्मक प्रकाशानुवर्ती तथा ऋणात्मक गुरुत्वानुवव्रती होता है ।

    एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री तने में अन्तर

    एकबीजपत्री तनाद्विबीजपत्री तना
    इसमें कैम्बियम नहीं पाया जाता। फलतः द्वितीयक वृद्धि का अभाव होता है।इसमें कैम्बियम पाया जाता है, इसलिए द्वितीयक वृद्धि भी पाई जाती है।
    मज्जा (pith) अनुपस्थित होता है।मज्जा उपस्थित होता है।
    इसकी एपीडर्मिस पर रोम नहीं पाए जाते।इसकी एपीडर्मिस पर रोम पाए जाते हैं।
    इसकी हाइपोडर्मिस स्क्लेरेन्काइमा की बनी होती हैं।इसकी हाइपोडर्मिस कोलेन्काइमा की बनी होती है।
    इसमें संवहन बण्डल बन्द प्रकार के होते हैं।इसमें संवहन बण्डल खुलै प्रकार के होते हैं।
    इसमें मज्जा किरणे नहीं पाई जाती हैं।इसमें मज्जा किरणें पाई जाती हैं।

    तने के विभिन्न प्रकार (Type of Plant Stem)

    भूमि की स्थिति के अनुसार तने के तीन प्रकार होते है जो निम्न है :

    1. भूमिगत तना (Underground Stem)

    भूमिगत तना पौधे के तने का वह भाग जो भूमि के अंदर पाया जाता है । भूमिगत तने में पर्व सन्धियाँ, पर्ण कलिकाएँ तथा शल्क पत्र पाये जाते हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में भूमिगत तने भोजन संग्रह करने के कारण मोटा एवं मांसल हो जाता है।

    जैसे- हल्दी, अदरक, केला, फर्न, आलू, प्याज, लहसुन, कचालू, जिमीकन्द, अरबी आदि।

    भूमिगत तने का रूपान्तरण (Modifications of underground stem)

    भूमिगत तने के चार प्रकार होते हैं जो निम्न है :

    (i) प्रकन्द (Rhizorne): 

    यह मोटा, फैला हुआ भूमिगत तना होता है। इसमें कक्षस्थ तथा अग्रस्थ कलिकाएँ भी पायी जाती हैं। यह तना शाखारहित या शाखायुक्त हो सकता है। कभी-कभी इसमें अपस्थानिक जड़ (Adventitious roots) भी विकसित हो जाती है। इनमें स्पष्ट पर्व, पर्व सन्धियाँ तथा शल्क पत्र पाये जाते हैं। इस प्रकार का भूमिगत तना हल्दी, अदरक, केला, फर्न आदि पौधों में पाया जाता है।

    (ii) स्तम्भ कन्द (stem tuber): 

    यह एक प्रकार का भूमिगत तना है। यह भोजन संग्रह करने के कारण शीर्ष पर फ्ल जाता है। इस प्रकार के तने की सतह पर अनेक गड्ढ़े होते हैं, जिन्हें आंखें (eyes) कहते हैं। प्रत्येक आंख एक शल्क पत्र होता है, जो पर्व-सन्धि की स्थिति को दशतिा है तथा प्रसुप्त कलिकाएँ होती हैं। इन्हीं प्रसुप्त कलिकाओं से वायवीय (Aerial) शाखाएँ निकलती हैं जिनके अगले सिरे पर अग्रस्थ कलिका होती है जो कि अनुकूल परिस्थितियों में वृद्धि करके नए पौधे को जन्म देते हैं। इस प्रकार का तना आलू में पाया जाता है।

    (iii) शल्क कन्द (Bulb): 

    इस प्रकार का भूमिगत तना बहुत से छोटे-छोटे शल्क पत्रों (scaly leaves) से मिलकर बना होता है। यह शल्क पत्र जल तथा भोजन संग्रह करने के कारण मांसल (fleshy) हो जाते हैं। इस प्रकार के भूमिगत तने की बाहरी परत शुष्क (dry) होती है। यह तना संकेन्द्रीय क्रम में व्यवस्थित शल्क पत्र लिये हुए पाये जाते हैं। प्याज (Onion) तथा लहसुन (Garlic) इस प्रकार के भूमिगत तने का उत्तम उदाहरण है।

    (iv) घनकन्द (Corm): 

    इस प्रकार का भूमिगत तन प्रकन्द (Rhizome) का संघनित रूप है। यह भूमि के नीचे उर्ध्व दिशा में वृद्धि करता है। इसमें अधिक मात्रा में भोजन संचित हो जाता है। शल्क पत्रों के कक्षा में कलिकाएँ पायी जाती हैं जबकि इसके आधार से अपस्थानिक जड़ें निकलती हैं। कचालू एवं जिमीकन्द में इस प्रकार का भूमिगत तना देखने को मिलता है।

    2. अर्द्धवायवीय तना (Sub Aerial Stem):

    जब तने का कुछ भाग भूमि के अन्दर तथा कुछ भाग भूमि के बाहर वायु में पाया जाता है, तब इस प्रकार के तने की अर्द्धवायवीय तना कहते हैं। जैसे – दूब घास, मर्सीलिया, पैसीफ्लोरा, अरुई, जलकुम्भी, समुद्री सोख, गुलदाऊदी, पिपरमिन्ट आदि।

    अर्द्धवायवीय तने में कायिक जनन के लिए कलिकाएँ पायी जाती हैं, जिनसे पार्श्व शाखाओं (Lateral branches) की उत्पत्ति होती है।

    अर्द्धवायवीय तने का रूपान्तरण (Modification of sub aerial stem):

    अर्द्धवायवीय तने के चार प्रकार होते हैं जो निम्न है :

    (i) उपरिभूस्तरी (Runner)-

    यह भूमि की सतह के समानान्तर फैला हुआ अर्द्धवायवीय तना है। इस प्रकार के तने में लम्बे एवं पतले पर्व (Inter nodes) पाये जाते हैं। पर्वसन्धियों से ऊपर की ओर शाखाएँ एवं तना तथा भूमि के अन्दर अपस्थानिक जड़ें निकलती हैं दूब घास, मर्सीलिया आदि में उपरिभूस्तरी तना पाया जाता है।

    (ii) भूस्तरी (Stolon): 

    इस प्रकार का अर्द्धवायवीय तना भूमि के अन्दर क्षैतिज दिशा में वृद्धि करता है। इस प्रकार के तने पर पर्व (Internode) तथा पर्व सन्धियाँ (Nodes) पाये जाते हैं। पर्व सन्धियों से नीचे की ओर अपस्थानिक जड़ें तथा ऊपर की ओर शाखाएँ विकसित होती हैं। अरुई तथा पैसीफ्लोरा में इस प्रकार का अर्द्धवायवीय तना पाया जाता है।

    (iii) भूस्तारिका (offset): 

    इस प्रकार का अर्द्ध वायवीय तना उपरिभूस्तरी (Runner) की तरह ही होता है, परन्तु इनके पर्व (nodes) मोटे तथा छोटे होते हैं। पर्व सन्धियों से ऊपर पतियाँ एक स्वतंत्र पौधे की भाँति होती है। जलकुम्भी भूस्तारिका का अच्छा उदाहरण है।

    (iv) अन्तः भूस्तरी (suckers):

    इस प्रकार के अर्द्धवायवीय तने में भूस्तरी (stolon) तने की तरह एक पार्श्व शाखा होती है, परन्तु यह ऊपर की ओर तिरछा बढ़ता है और एक नए पौधे को जन्म देता है। यह भूस्तरी (stolon) की तुलना में छोटा होता है। इस प्रकार का अर्द्धवायवीय तना गुलदाऊदी, पिपरमिण्ट आदि में देखने को मिलता है।

    3. वायवीय तना (Aerial stem): 

    जब सम्पूर्ण तना भूमि के ऊपर स्थित होता है, तो ऐसे तने को वायवीय तना कहते हैं। इस प्रकार के तने में शाखाएँ, पत्तियाँ, पर्व, पर्वसन्धियाँ, कलिकाएँ, फल, फूल सभी पाये जाते हैं। उदाहरण- गुलाब, अंगूर, नागफनी, रस्कस, कोकोलोवा आदि।

    वायवीय तने का रूपांतरण (Modification of Aerial Stem):

    वायवीय तने के पांच प्रकार होते हैं जो निम्न है :

    (i) कटक स्तम्भ (stem thorn): 

    इस प्रकार के तने में कक्षस्थ कलिकाएँ काँटे (thorn) के रूप में परिवर्तित हो जाती हैं। इन काँटों पर पत्ती, शाखा एवं पुष्प विकसित होते हैं। नींबू, वोगेनविलिया आदि पौधों में कटक स्तम्भ पाये जाते हैं।

    (ii) स्तम्भ प्रतान (stem tendril): 

    इस प्रकार के तने में पत्तियों के कक्ष से निकली शाखा बनाने वाली कलिका एक कुण्डलित, तन्तु बना लेती है जो कमजोर तने वाले पौधों के आरोहण में सहायता करती है। यह तन्तु (Filament) ही स्तम्भ प्रतान कहलाता है। अंगूर तथा कुकुरबिटेसी कुल के पौधों में स्तम्भ प्रतान पाया जाता है।

    (iii) पर्णकाय स्तम्भ (Phyloclade): 

    यह एक हरा, चपटा तथा कभी-कभी गोल-सा तना होता है जो कि पत्तियों की भाँति कार्य करता है। इसकी पत्तियाँ कॉटे रूपी संरचना में परिवर्तित हो जाती हैं। यह रूपान्तरण पौधों से होने वाले जल हानि को रोकता है। पर्णकाय स्तम्भ अनिश्चित वृद्धि वाले शाखा से विकसित होता है। नागफनी (Opuntia) तथा केजुराइना (Casurina) पर्णकाय स्तम्भ का उत्तम उदाहरण है।

    (iv) पर्णाभ पर्त (Cladode): 

    कुछ पौधों की पर्त सन्धियाँ से छोटी, हरी, बेलनाकार अथवा चपटी शाखाएँ निकलती हैं। इस प्रकार की शाखाएँ पत्तियों के कक्ष से निकलती हैं, जो स्वयं शल्क पत्र (scaly leaves) में रूपांतरित हो जाती हैं। ऐसा रूपांतरण पौधों में वाष्पोत्सर्जन की दर को कम करने के उद्देश्य से होता है। प्रकाश संश्लेषण की क्रिया हरे तने एवं उसकी शाखाओं के द्वारा सम्पादित होती है। तनों के इस प्रकार के रूपान्तरण को पर्णाभ पर्व (Cladode) कहते हैं। सतावर (Asparagus), रस्कस (Ruscus) पणभि पर्व का सुन्दर उदाहरण हैं।

    (v) पत्र प्रकलिका (Bulbil): 

    कुछ पौधों की कक्षस्थ एवं पुष्प कलिकाएँ विशेष छोटे आकार की रचना में रूपांतरित हो जाती हैं, जिन्हें पत्र-प्रकलिका (Bulbil) कहते हैं। ये पत्र-प्रकलिका अपने मातृ पौधे (Mother plant) से अलग होकर मिट्टी में गिर जाती हैं तथा अनुकूल परिस्थितियों में विकसित होकर नए पौधों को जन्म देती हैं। अलोय (Aloe), अगेव (Agave) आदि पौधों में पत्र-प्रकलिका देखने को मिलता है।



  • जड़ (Root) किसे कहते है, जड़ के प्रकार, विशेषताएँ तथा कार्य (what is root,  its type and function) मूसला जड़ एवं अपस्थानिक जड़ें

    जड़ (Root) किसे कहते है, जड़ के प्रकार, विशेषताएँ तथा कार्य (what is root, its type and function) मूसला जड़ एवं अपस्थानिक जड़ें

    जड़ (Root) मूलांकुर (radicle) से निर्मित विभिन्न शाखाओं में फैलकर, भूमि के अन्दर प्रकाश से दूर (negatively phototropic), जल की तलाश में, गुरुत्व की ओर वृद्धि करता है। जड़ें मृदा से जल एवं विभिन्न प्रकार के खनिज लवणों का अवशोषण करते हैं।

    जड़ पौधे का वह भाग है जो बीजों के अंकुरण के समय मूलांकर (Radicle) से विकसित होता है और प्रकाश के विपरीत (negatively phototropic) लेकिन जल एवं भूमि की तरफ बढ़ता है |

    जड़ें मृदा से जल एवं विभिन्न प्रकार के खनिज लवणों का अवशोषण करते हैं।

    मूलांकुर से विकसित प्रथम जड़ प्राथमिक जड़, जबकि सभी शाखाएँ द्वितीयक जड़ कहलाते हैं। जड़ो में एककोशिकीय मूलरोम पाए जाते हैं।

    जड़ों में सन्धियाँ, पर्वसन्धियाँ, पत्तियाँ आदि नहीं पाई जाती है। जडें नकारात्मक प्रकाशानुवर्ती और धनात्मक गुरुत्वानुवर्ती होती हैं।

    जड़ों के प्रकार (Types of Roots)

    सामान्यतः जड़ें दो प्रकार की होती हैं-

    मूसला जड़ (Tap Root )
    अपस्थानिक जड़ (Adventitious Root)

    मूसला जड़ (Tap Root)

    मूसला जड़ वह जड़ है, जिसमें मूलांकुर (Radicle) विकसित होकर एक मुख्य या प्राथमिक जड़ (Primary root) का निर्माण करता है, जो अन्य शाखाओं से मोटी होती है तथा अधिक गहराई तक जाती है। इससे कई शाखाएँ निकलती हैं, जिन्हें द्वितीयक जड़ (Secondary root) कहते हैं।

    द्वितीयक जड़ों से निकलने वाली शाखाओं को तृतीयक जड़ (Tertiary root) कहते हैं।

    इस प्रकार बनी प्राथमिक जड़ तथा इसकी शाखाओं को मूसला जड़ तन्त्र (Tap root system) कहते हैं।

    ऐसी जड़ें द्विबीजपत्री पौधों में पायी जाती हैं तथा भूमि में बहुत गहराई तक वृद्धि करके पौधे को मजबूती से खड़ा रखती हैं। यह जड़, चना, मटर, गाजर, मूली, सरसों, आम, नीम इत्यादि  पौधों में पायी जाती है।

    मूसला जड़ (Tap Root) के प्रकार

    1. तर्कुरूप (Fusiform)
    इस प्रकार की जड़ें बीच से मोटी और किनारों पर पतली होती है जैसे-मूली।

    2. कुम्भी रूप (Napiform)
    ये जड़ें शीर्ष पर मोटी और फूली हुई होती है तथा नीचे की ओर पतली होती है जैसे – शलजम (Turnip), चुकन्दर (Beet) 

    3. शंकु रूप (Conical)
    इस प्रकारी की मूसला जड़े आधार की ओर मोटी तथा नीचे की ओर क्रमशः पतली होती हैं। जैसे-गाजर।

    4. श्वसन मूल (Pneumatophores (न्यूमेटाफ़ोर) root)  – राइजोफोरा (Rhizophora), सुन्दरी (Sundari) आदि पौधे जो दलदली स्थानों पर उगते हैं, में भूमिगत मुख्य जड़ों से विशेष प्रकार की जड़ें निकलती हैं, जिसे न्यूमेटाफोर कहते हैं। ये खूंटी के आकार की होती हैं, जो ऊपर वायु में निकल आती हैं। इनके ऊपर अनेक छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिन्हें न्यूमेथोडस (Pneumathodes) कहते हैं। 

    अपस्थानिक जड़ (Adventitious root or Fibrous root system)

    कुछ पौधों में अकुंरण के कुछ समय बाद मूलांकुर (Redicle) की वृद्धि रुक जाती है और प्रांकुर के आधार या तने की निचली पर्वसन्धियों से रेशे के रूप में जड़ें विकसित हो जाती हैं, उन्हें ही अपस्थानिक या रेशेदार जड़ (Fibrous root) कहते हैं। इस प्रकार से बने जड़ गुच्छ को अपस्थानिक जड़ तन्त्र (Adventitious root system) कहते हैं।

    अपस्थानिक जड़ मूलांकुर की वृद्धि एक जाने के कारण जड़े शाखाओ, तनों के आधारीय भागों तथा पत्तियों में निकलती है। यह प्रायः एकबीजपत्री (monocot plants) पौधों में पाई जाती है जैसे-धान, गेहूँ, मक्का, ज्वार, बाजरा, गन्ना इत्यादि। 

    कुछ द्विबीजपत्री पादकों जैसे बरगद, पान, अमरबेल इत्यादि  में भी अपस्थानिक जड़ें पायी जाती हैं। ये जड़ें भूमि में गहराई तक न जाकर केवल ऊपरी सतह तक फैली होती हैं।

    विभिन्न प्रकार की अपस्थानिक जड़ें

    भोजन संग्रह, पौधों को यांत्रिक सहारा (Mechanical support) प्रदान करने अथवा अन्य विशिष्ट कार्यों को करने के उद्देश्य से अपस्थानिक जड़ें अनेक प्रकार से रूपांतरित हो जाती हैं।

    मूसला तथा अपस्थानिक जड़ों में अन्तर (Difference between Tap root and Adventitious roots)

    मूसला जड़ (Tap root) अपस्थानिक जड़
    मूसला जड़ की प्राथमिक जड़ समाप्त नहीं होती तथा यह क्रमश: पतली होती जाती है। अपस्थानिक जड़ों की प्राथमिक जड़ बनने के तुरन्त बाद समाप्त हो जाती है और प्ररोह के अन्तिम भाग से अनेक रेशेदार जड़ें निकलती हैं।
    यह भूमि के अन्दर गहराई तक जाती है । यह भूमि की ऊपरी सतह पर ही स्थित होती है ।
    यह बीज के मूलांकुर से पैदा होती है। यह पौधे के प्ररोह भाग (वायवीय भाग) से पैदा होती है।
    इसकी प्राथमिक जड़ से अनेक शाखाएँ निकलती हैं। उदाहरण- मटर, चना, अरहर इत्यादि की जड़ें। इसकी प्राथमिक जड़ विलुप्त हो जाती हैं। उदाहरण-गेहूँ, जौ, धान, मक्का इत्यादि की जड़ें ।

    जड़ की विशेषताएँ (Characteristics of root)

    जड़ पौधों के अक्ष का अवरोही (Descending) भाग है, जो मूलांकुर (Radicle) से विकसित होता है।

    जड़ सदैव प्रकाश से दूर भूमि में वृद्धि करती है।

    भूमि में रहने के कारण ही जड़ों का रंग सफेद अथवा मटमैला होता है।

    जड़ों पर तनों के समान पर्व (Nodes) एवं पर्व सन्धियाँ (Internodes) नहीं पायी जाती है।

    जड़ों पर पत्र एवं पुष्प कलिकाएँ भी नहीं होती हैं। अतः ये पतियाँ, पुष्प एवं फल धारण नहीं करती हैं।

    जड़ें सामान्यतः धनात्मक गुरुत्वानुवर्ती (Positive geotropic) तथा ऋणात्मक प्रकाशानुवर्ती (Negative phototropic) होती हैं।

    जड़ का सिरा मूल गोप (Root cap) द्वारा सुरक्षित रहता है।

    जड पर एककोशिकीय रोम (Unicellular hairs) होते हैं।

    जड़ों के कार्य (Functions of Roots)

    जड़ें मूल रोमों की सहायता से जल एवं खनिज लवणों का अवशोषण करते है।

    (जलोद्भिद् में मूल रोमों का अभाव होता है) पिस्टिया व लेमना पौधों में मूल गोप की जगह मूल पॉकेट (root pocket) पाया जाता है।

    मूल रोम (Root hairs) तथा जड़ों के कोमल भाग जल और घुलित खनिज लवण का अवशोषण करते हैं।

    यह पौधों को भूमि में स्थिर रखती है।

    कुछ जड़ें अपने अंदर भोज्य पदार्थों का संग्रह करते हैं प्रतिकूल परिस्थितियों में इन संचित भोज्य पदार्थों का पौधों द्वारा उपयोग किया जाता है।

    एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री जड़ में अन्तर

    एकबीजपत्री जड़

    इसमें द्वितीयक वृद्धि नहीं पाई जाती है।

    इसमें पिथ पूर्ण विकसित होता है। 

    परिरम्भ से केवल पार्थ मूलों का निर्माण करती है। 

    इनके संवहन पूल की संख्या सामान्यतया छ: से अधिक होती है। 

    इसमें कैम्बियम का अभाव होता है। ।

    द्विबीजपत्री जड़

    इसमें द्वितीयक वृद्धि पाई जाती है। 

    इसमें पिथ अल्प विकसित होता है। 

    परिरम्भ पार्श्व मूलों तथा द्वितीयक विभज्योतक दोनों का निर्माण करती है।

    इनके संवहन पूल की संख्या सामान्यतया छः से कम होती है।

    इसमें कैम्बियम पाया जाता है।

  • पादप ऊतक | Plant Tissue | जाइलम, फ्लोएम, Phloyem, Xylem, Plant Tissues in Hindi

    पादप ऊतक | Plant Tissue | जाइलम, फ्लोएम, Phloyem, Xylem, Plant Tissues in Hindi

    इस आर्टिकल में जीवधारियों की बनावट के साथ उत्तक के बारे में विस्तृत रूप से जानेगें | पादप उत्तक क्या है उसके प्रकार क्या है इसके बारे में जानेगें | साथ ही स्थायी उत्तक (Permanent Tissue) और जटिल स्थायी उत्तक (Complex Permanent Tissue) को समझेगें | जाइलम क्या है ?, फ्लोएम क्या है ? जाइलम और फ्लोएम में क्या अंतर है ? विशिष्ट स्थायी उत्तक (Special Permanent Tissue) क्या है उसके प्रकार क्या है और वह पोधो के लिय किस प्रकार सहायक है ? रबरक्षीरी (Laticiferous glands) ग्रंथिया क्या होती है और किस प्रकार बनती है आदि के बारे में बात करेगे |

    उत्तक क्या है (What is Tissues)

    बहुकोशिकीय जीवों में विभिन्न शारीरिक कायों के सम्पादन हेतु समान उत्पत्ति, संरचना एवं कार्यो वाली कोशिकाओं का समूह संगठित होता है। कोशिकाओं का यह विशेष समूह जिसे ऊतक (tissue) कहते हैं, निश्चित कार्य हेतु जिम्मेदार होते हैं। ऊतक शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम विचट (Witchet) ने किया। जीव विज्ञान की वह शाखा, जिसमें ऊतकों का अध्ययन किया जाता है उसे औतिकी (Histology) कहते हैं।

    विभिन्न कोशिकाएँ मिलकर ऊतक बनते है। ऊतकों का समूह मिलकर अंग, अंगों का समूह अंगतन्त्र बनाता है और अगतन्त्र मिलकर जीव के जीवन प्रक्रिया को सुचारु रूप से चलाते हैं।

    बहुकोशिकीय जीवों का यह संगठन पादपों और प्राणियों में अलग-अलग प्रकार का होता है।

    जैसा कि हम जानते है कि पादप भी जीवित होते हैं, और जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ उनको भी होती हैं, जिनकी पूर्ति के लिए उनमें अनेक प्रकार के कार्य होते हैं। किंतु पादपों का शरीर और शरीर में होने वाली क्रियाएँ जंतुओं से पूर्णतः भिन्न होती हैं। अतः पादप ऊतक भी जंतु ऊतकों से भिन्न होते हैं जो अपने शरीर में होने वाली क्रिया-विधियों के लिए अनुकूलित होते हैं।

    जेवियर बिचैट (Xavier Bichat ) ने 1801 anatomy (शरीर रचना विज्ञान) के अध्ययन के दौरान ऊतक (Tissue) शब्द की शुरुआत की। बिचैट ने 21 प्रकार के प्राथमिक ऊतकों की पहचान की, जिनसे मानव शरीर के अंगों की रचना होती है ।

    पादप तथा जंतु ऊतक (Plant and Animal Tissues)

    विभज्योतक (Meristematic Tissue) – इनमें विभाजन की अपार क्षमता पाई जाती है।
    स्थायी ऊतक (Permanent Tissue) – ये विभाजन की क्षमता खो कर विभिन्न प्रकार के कार्यों को संपादित करते हैं।

    स्थायी ऊतक को पुनः उनकी संरचना की जटिलता के आधार पर दो प्रकारों में बाँटा जाता है-

    सरल स्थायी ऊतक (Simple Permanent Tissue)
    जटिल स्थायी ऊतक (Complex Permanent Tissue)

    सरल स्थायी ऊतकों को पुनः उनकी कोशिकाओं की प्रवृत्यिों एवं अंतराकोशिकीय अवकाश के आधार पर तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-

    पैरेनकाईमा (Parenchyma)
    कोलेनकाईमा (Cholenchyma)
    स्केलेरेनकाईमा (Schalerenchyma)

    इसी प्रकार जटिल स्थायी ऊतक भी उनके द्वारा संपादित कार्यों के आधार पर दो प्रकार के होते हैं-

    जाइलम (Xylem)
    फ्लोएम (Pholem)

    इसी प्रकार जंतु ऊतकों को भी मोटे तौर पर चार भागों में बाँटा जा सकता है-

    उपकला ऊतक (Epithelial Tissue)
    संयोजी ऊतक (Connective Tissue)
    पेशीय ऊतक (Muscular Tissue)
    तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue)

    पादप ऊतक (Plant Tissue) क्या है ?

    पादप ऊतक दो प्रकार के विभज्योत्तक ऊतक और स्थायी ऊतक होते है

    विभज्योत्तक ऊतक (Meristematic Tissue)

    इस ऊतक की कोशिकाओं में तीव्र गति से विभाजन (सूत्री विभाजन) होने की प्रवृत्ति होती है। यह ऊतक पौधों के वर्धी भागों, जैसे तने तथा जड़ों के अग्र सिरे (apical rogion) में पाए जाते हैं। यह ऊतक पौधों की लम्बाई एवं मोटाई बढ़ाने हेतु उत्तरदायी होते हैं। यह मुख्यतया तीन प्रकार के होते हैं:

    शीर्षस्थ अथवा अग्रही विभज्योत्तक (Apical Meristematic Tissue)

    यह ऊतक जड़ एवं तने के अग्र (शीर्ष) भाग तथा पत्तियों के कक्षों में स्थित कलिकाओं में ऊतक पाया जाता है। यह ऊतक मुख्य रूप से पौधों की लम्बाई में वृद्धि के लिए उत्तरदायी होते हैं। उदाहरण – प्ररोह शीर्ष तथा मूल शीर्ष

    पार्श्व विभज्योत्तक (Lateral Meristematic Tissue)

    ये ऊतक पौधों के तने एवं जड़ों के पार्श्व भागों में पाए जाते है, जो पौधों की मोटाई के लिए विशेष महत्व रखती है। इसी में जाइलम और फ्लोएम, जैसे संवहनी तन्त्र पाए जाते हैं। उदाहरण – संवहन कैम्बियम तथा कॉर्क कैम्बियम

    अन्तर्वेशी विभज्योत्तक (Intercalary Meristematic Tissue)

    ये ऊतक हमेशा पर्व सन्धि (nodes) पर पाए जाते हैं तथा इन ऊतकों के कारण पौधों की लम्बाई में वृद्धि होती है। ये वास्तव में शीर्षस्थ विभज्योत्तकों के अवशेष है, जो बीच में स्थायी ऊतकों के आ जाने के कारण अलग हो जाते हैं। शाकाहारी जन्तुओं द्वारा घासों के अग्र भाग खा लिए जाने पर, उसमें अन्तर्वेशी विभज्योत्तक के माध्यम से ही वृद्धि होती है।

    स्थायी ऊतक (Permanent Tissue)

    विभज्योत्तक ऊतक परिपक्व होने पर स्थायी ऊतकों में परिवर्तित हो जाती है। किन्तु स्थायी ऊतकों में विभाजन की क्षमता नहीं होती है। इन ऊतकों की कोशिकाएँ मृत अथवा जीवित, पतली या मोटी भित्ति वाली होती है। यह तीन प्रकार की होती हैं :

    साधारण स्थायी ऊतक (Simple Permanent Tissue)

    इस ऊतक की यही विशेषता होती है कि इसमें एक ही प्रकार की आकृति तथा एक ही तरह के कार्य करने वाली (homogeneous) कोशिकाओं का समूह होता है। ये तीन प्रकार के होते हैं :

    मृदूतक (Parenchyma)

    यह ऊतक पौधों के मुलायम भागों तथा विभिन अंगों (बाहरी त्वचा तथा फल के गूदे आदि) में पाए जाते हैं। इसका मुख्य कार्य खाद्य पदार्थों जैसे मण्ड, प्रोटीन तथा वसा का संग्रह करना है। कुछ पौधों जैसे नागफनी तथा यूफोरबिया के माँसल तनों तथा पत्तियों में जल संग्रह का कार्य करते हैं। यदि इनमें हरित लवण उपस्थित होता है तो यह प्रकाश-संश्लेषण करते हैं और क्लोरेनकाइमा कहलाते हैं।

    स्थूलकोणोत्तक (Collenchyma)

    यह ऊतक मृदूतक का ही रूपान्तरित रूप है तथा यह शाकीय पौधों की बाहरी त्वचा के नीचे और पत्तियों के पर्णवृन्तों में पाए जाते है। इसकी कोशिकाएँ जीवित, रिक्तिकायुक्त एवं कोशिकाद्रव्य युक्त होती है। इसकी कोशका भित्तियों के कोनों पर सेलुलोज तथा पेक्टिन के जमाव के कारण असमान रूप से मोटी होती है। इसका मुख्य कार्य पौधों को यान्त्रिक बल तथा लचीलापन प्रदान करने तथा हरितलवक की उपस्थिति में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया करना है ।

    दृढ़ोतक (Sclerenchyma)

    यह ऊतक मोटी कोशिका भित्ति तथा लिग्निन युक्त मृत (dead), लम्बी, संकरी तथा दोनों सिरों पर नुकीली होती है। यह ऊतक पौधों को यान्त्रिक दृढ़ता प्रदान करता है। इसकी कोशिका भित्ति में अनेक जगहों पर सेलुलोज का जमाव नहीं होता है चूँकि इन स्थानों पर जीवद्रव्य तन्तु होते हैं। ऐसे स्थान सरल गर्त (simple pits) कहलाते हैं। लिग्निन युक्त होने के कारण इसका तन्तु अत्यन्त ही दृढ़ होता है, जिसे स्क्लेरिड्स कहते हैं। अखरोट तथा नारियल की अन्तः फल भित्तियों में तथा लेग्युमिनोसी कुल के बीजों के बीजाकरण में यह ऊतक पाए जाते हैं।

    जटिल स्थायी ऊतक (Complex Permanent Tissue)

    इस प्रकार के ऊतक एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से बने होते हैं। इसे संवहन ऊतक भी कहा जाता है क्योंकि पादपों में यह संवहन का कार्य करते हैं। इसके अन्तर्गत जाइलम एवं फ्लोएम जैसे संवहनीय ऊतक आते हैं।

    1. जाइलम (Xylem) क्या है ?

    यह पतली एवं लम्बी नलिकाओं के रूप में पौधों की जड़ों से लेकर पत्तियों तक फैले होते हैं। ये जड़ों द्वारा अवशोषित जल एवं खनिज-लवणों को पत्तियों तक पहुँचाने का कार्य करता है तथा पौधों को दृढ़ता प्रदान करता है इसे प्रायः काष्ठ (wood) भी कहा जाता है। जाइलम को जटिल ऊतक इसलिए कहते हैं क्योंकि यह चार प्रकार की कोशिकाओं- वाहिनिकाओं (tracheids), वाहिकाओं (vessel), काष्ठ तन्तु (wood fibres) और काष्ठ मृदूतक (wood parenchyma) की बनी होती है।

    वाहिनिकाएँ एवं वाहिकाएँ मृत कोशिकाओं की बनी होती है। वाहिकाएँ टेरिडोफाइट्सजिम्नोस्पर्म में अनुपस्थित होती हैं।

    आवृतबीजियों में उपस्थित जल एवं खनिज लवणों के संवहन हेतु इसमें अनेक वाहिनिकाएँ एवं वाहिकाएँ होती है। जाइलम के अन्तर्गत आने वाले काष्ठ मृदूतक (जीवित व अधिक मात्रा में होती है) स्टार्च तथा वसीय पदार्थों का संचय तथा जल परिवहन में सहायता करते हैं। इसकी कोशिका भित्ति सख्त तथा लिग्निनयुक्त होती है, जो पौधों को अतिरिक्त यान्त्रिक दृढ़ता प्रदान करता है। सामूहिक रूप से इसे काष्ठ तन्तु (Xylem Fibre) कहते हैं।

    2. संवहन पूल (Vascular Bundle) क्या है ?

    संवहन पूल कैम्बियम सहित या कैम्बियम रहित जाइलम तथा फ्लोयम का बना होता है। कैम्बियम युक्त संवहन पूल खुले (open vascular bundle), जबकि कैम्बियम रहित संवहन पूल बन्द (closed vascular bundle) कहलाते हैं।

    • एण्डार्क (Endarch) सेन्ट्रीफ्यूगल जाइलम (जब प्रोटोजाइलम मध्य भाग की ओर तथा मेटाजाइलम बाहर की ओर होता है)।
    • एक्सार्क (Exarch) सेन्ट्रीपीटल जाइलम (जब प्रोटोजाइलम बाहर की तथा मेटाजाइलम केन्द्र की ओर होता है)।
    • संयुक्त संवहन पूल (Conjoint vascular bundle) जाइलम व फ्लोएम एक अर्द्धव्यास पर साथ-साथ पाए जाते हैं ।
    • संकेन्द्री (Concentric) एक प्रकार का संवहन ऊतक है, जो दूसरे प्रकार के संवहन ऊतक को घेरे रहता है।

    द्वितीयक वृद्धि

    जब पौधा छोटा होता है, तब उसमें ऊतक प्राथमिक विभज्योत्तक द्वारा बनते हैं अर्थात् इनके द्वारा निर्मित ऊतकों को प्राथमिक ऊतक कहते हैं।

    आयु बढ़ने के साथ द्विबीजपत्री पौधों में नई कोशिकाओं का निर्माण स्थायी मृदूतक द्वारा उत्पन्न नई विभज्योत्तक से होता है। ये नई कोशिकाएँ द्वितीयक ऊतक कहलाती हैं।

    इन्हीं द्वितीयक ऊतकों के कारण पौधे के अंगों की मोटाई में वृद्धि होती है, जिसे द्वितीयक वृद्धि कहते हैं।

    द्वितीयक वृद्धि एधा (cambium) एवं कॉर्क एधा (cork cambium) के कारण होती है। द्वितीयक वृद्धि केवल द्विबीजपत्री पादपों में ही पाई जाती है। इससे बनने वाले वार्षिक वलयों के आधार पर ही वृक्षों की आयु निर्धारित होती है।

    3. फ्लोएम (Phloem) क्या है ?

    प्रकाश-संश्लेषण में निर्मित भोज्य पदार्थ का पौधों के विभिन्न भागों में पहुँचाने का कार्य फ्लोएम संवहनीय ऊतक द्वारा संचालित होता है।

    यह चार प्रकार की कोशिकाएँ-चालनी नलिकाएँ (sieve tubes), सखि कोशिकाएँ (companion cells), फ्लोएम मृदूतक (phloem parenchyma) तथा फ्लोएम तन्तु (phloem fibres) से मिलकर बनता है।

    इनमें से चालनी नलिका में छिद्रित भित्ति मुख्य रूप से भोज्य पदार्थ के संवहन का कार्य करती है, जबकि अन्य शेष कोशिका उसे इस कार्य में सहायता करती है। फ्लोएम की नलिकाएँ जीवित कोशिकाएँ होती हैं तथा पौधों की यान्त्रिक दृढ़ता में विशेष योगदान नहीं करती है। चालनी नलिकाएँ परिपक्व अवस्था में अकेन्द्री (enucleate) हो जाती हैं। ये कोशिकाएँ अनावृतबीजी (gymnosperm) में अनुपस्थित होती हैं।

    जाइलम (Xylem) और फ्लोएम (Phloem) में क्या अंतर है ?

    1. जाइलम के ऊतक (Tissue) ट्यूबलर के आकार की संरचना के होते हैं, जिसमें क्रॉस दीवारों (Cross walls) की अनुपस्थिति होती है । यह ऊतक एक तारे के आकार जैसा दिखता है. वहीं फ्लोएम ऊतक ट्यूबलर के आकार के, लम्बें होते हैं, पतली छलनी नलिकाओं (Thin Sieve Tubes) के साथ दीवारों (Walls) की उपस्थिति के साथ संरचनाएं वाले ।

    2. जाइलम एक संवहनी ऊतक है जो पानी और विघटित खनिजों को जड़ से अवशोषित कर शेष पौधे तक पहुँचाता है और फ्लोएम एक संवहनी ऊतक है जो पौधे के हरे भागों से पौधे के बाकी हिस्सों में प्रकाश संश्लेषण के दौरान तैयार घुलनशील कार्बनिक यौगिकों को स्थानांतरित करता है।

    3. जाइलम मुख्य रूप से संवहनी बंडलों (Vascular Bundles) के केंद्र में स्थित होते हैं और फ्लोएम मुख्य रूप से संवहनी बंडलों की परिधि (Periphery) की ओर स्थानीयकृत होते हैं।

    4. जाइलेम के फाइबर छोटे होते हैं और फ्लोएम के फाइबर बड़े होते हैं ।

    5. जाइलेम जड़ों, स्टेम और पत्तियों में मौजूद होते हैं और फ्लोएम, स्टेम और पत्तियों में मौजूद होते हैं, जो बाद में जड़ों, फलों और बीजों में स्थानांतरित और विकसित होते हैं ।

    6. जाइलम का मूवमेंट एक ही दिशा में होता है यानी यूनीडायरेक्शनल (Unidirectional) ऊपर की ओर, वहीं फ्लोएम का द्विदिश यानी दोनों दिशा में (Bidirectional) मूवमेंट होता है (Up and Down) ।

    7. जाइलम में ट्रेकिड्स (Tracheids), Vessel Elements, जाइलम पैरेन्काइमा, और जाइलम फाइबर शामिल हैं । वहीं फ्लोएम में शामिल हैं: सह कोशिकाएं (Companion Cells), छलनी नलिकाएं (Sieve Tubes), बास्ट फाइबर (Bast Fibres), फ्लोएम फाइबर, और फ्लोएम पैरेन्काइमा ।

    8. जाइलम ऊतक की कोशिकाएं पैरेन्काइमा कोशिकाओं को छोड़कर मृत कोशिकाएं (Dead cells) होती हैं और फ्लोएम ऊतक की कोशिकाएं बास्ट फाइबर को छोड़कर जीवित कोशिकाएं होती हैं।

    9. जाइलम में कोशिकाओं की कोशिका भित्ति (Cell wall) मोटी होती है और फ्लोएम की कोशिकाओं की कोशिका भित्ति पतली होती है।

    10. लिग्नीफाइबड (Lignified) कोशिका भित्ति (Cell wall) जाइलम में मौजूद होती हैं और फ्लोएम में कोशिका भित्ति (Cell wall) लिग्नीफाइबड (Lignified) नहीं होती है।

    11. संवहनी बंडलों (Vascular Bundles) में जाइलम ऊतक की मात्रा फ्लोएम ऊतक से अधिक होती है यानी संवहनी ऊतक में फ्लोएम ऊतक की मात्रा तुलनात्मक रूप से कम होती है।

    12. जाइलम ऊतक के दो प्रकार के तत्वों अर्थात जाइलम वाहिकाओं (Xylem Vessels) और वाहिनिकाओं (Tracheid) से होकर ही जल एवं खनिजों को पौधों की जड़ों से उसकी पत्तियों तक पहुंचाया जाता है और फ्लोएम की जीवित कोशिकाएं ‘चालनी नलिकाएँ’ (Sieve Tubes) कहलाती हैं. फ्लोएम में कोशिकाओं की अंतिम भित्ति पर चालनी पट्टियाँ (sieve plates) पायी जाती हैं, जिनमें छोटे–छोटे छिद्र बने होते हैं।

    13. जाइलेम घुलनशील खनिज पोषक तत्वों और पानी के अणुओं को जड़ों से पौधे के अन्य हिस्सों तक पहुंचाता है और फ्लोएम भोजन और अन्य पोषक तत्वों सहित चीनी और अमीनो एसिड पत्तियों से भंडारण अंगों और पौधे के बढ़ते भागों तक पहुंचाता है।

    14. जाइलेम, पौधे को यांत्रिक शक्ति (Mechanical Strength) प्रदान करता है और स्टेम को मजबूत रहने में मदद करता है वहीं जड़ों, बल्ब (Bulbs) और Tubers जैसे अंगों के भंडारण के लिए पौधों के प्रकाश संश्लेषक क्षेत्रों द्वारा संश्लेषित शर्करा का परिसंचरण करता है।

    15. जाइलेम वाष्पशील (Transpiration) और प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के माध्यम से खोए हुए पानी के अणुओं की कुल मात्रा को पूरा करता है और पूरे पौधे में प्रोटीन और mRNAs के परिवहन के लिए जिम्मेदार है ।

    विशिष्ट स्थायी ऊतक (Special Permanent Tissue)

    बाह्य त्वचा (Epidermis) यह पादप देह की सबसे बाहर वाली पर्त है, जो मुख्यतया सुरक्षात्मक कार्य करती है। यह पादपों के सामान्य प्ररोहों (shoots) से वाष्पोत्सर्जन (transpiration) द्वारा अत्यधिक जल हानि से बचाव करती है। इसका कारण एपिडर्मिस की बाह्य सतह पर क्यूटिन अथवा सुबेरिन नामक कड़ा पदार्थ का जमा होना है, जो पौधों में वाष्पोत्सर्जन क्रिया में होने वाली जलहानि को कम करता है।

    स्टोमेटा (Stomata) शाखाओं की बाह्य त्वचा में छोटे-छोटे अति सूक्ष्म छिद्र होते हैं जिन्हें रन्ध्र कहते हैं, जो सेम या गुर्दे (kidneys) के आकार की बाह्य त्वचीय कोशिकाओं से घिरे होते हैं, जिन्हें द्वार कोशिकाएँ (guard cells) कहते हैं। द्वार कोशिकाएँ जीवित, हरितलवक युक्त तथा केन्द्रयुक्त होती हैं। द्वार कोशिकाएँ और आस-पास की बाह्य कोशिकाएँ मिलकर रन्ध्री समूह (Stomatal complex) बनाती है।

    बाह्य त्वचा के त्वचा रोम एककोशिकीय या बहुकोशिकीय शाखित या सरल होते हैं। यदि त्वचा रोम स्रावण का कार्य करते हैं, तो उन्हें ग्रन्थिल रोम कहते हैं, यह दो प्रकार की होती हैं

    बाह्य ग्रन्थियाँ बाह्य त्वचा पर उपस्थित दंशन रोम विषैले पदार्थ का स्रावण करते हैं, जैसे-बिच्छू पौधे मकरन्दकोष (nectaries), शर्करा जैसे पदार्थ मकरन्द का स्रावण करती है। कीटभक्षी पौधों की पाचक ग्रन्थियाँ प्रोटिओलिटिक एन्जाइम का स्रावण करती हैं।

    आन्तरिक ग्रन्थियाँ यह ऊतकों के अन्दर पाई जाती हैं। इसके अन्तर्गत नींबू तथा सन्तरे के फलों के छिलके में तेल ग्रन्थियाँ एवं पान की पत्तियों में श्लेष्मक स्रावी ग्रन्थियाँ, पाइनस में रेजिन एवं टेनिन का स्रावण करने वाली ग्रन्थियाँ पाई जाती हैं। हाइडेथोड जल का स्रावण करने वाली ग्रन्थियाँ हैं।

    रबरक्षीरी (Laticiferous glands) ग्रन्थियाँ कोशिकाएँ लम्बी, पतली भित्ति युक्त, बहुकेन्द्री, गाढ़े तरल लैटेक्स से युक्त कुछ कोशिकाओं में रबरक्षीर भरी होती हैं। ये कोशिकाएँ पतली भित्ति युक्त शाखित तथा बहुकेन्द्रकी एवं स्वतन्त्र इकाइयों के रूप में जैसे यूफोरबिया, मदार तथा कनेर में रबरक्षीरी कोशिकाएँ होती हैं।

    पोस्त, रबड़ आदि में रबरक्षीरी वाहिकाएँ पाई जाती हैं, जो अनेक कोशिकाओं के मिलने तथा बीज की परतों के घुल जाने से बनती हैं।

    उत्तक से जुड़े महत्वपुर्ण तथ्य

    वास्तव में काष्ठ द्वितीयक जाइलम होता है, जो द्वितीयक वृद्धि के दौरान संवहन एधा की सक्रियता के फलस्वरूप बनता है।

    पौधों के तनों एवं जड़ों में द्वितीयक वृद्धि संवहन एधा तथा कॉर्क एथा की सक्रियता के फलस्वरूप होता है।

    द्वितीयक वृद्धि का आशय-पौधों के तनों या जड़ों में स्थायी पैरेन्काइमा ऊतकों द्वारा उत्पन्न नए विभज्योत्तक से है, जिसके फलस्वरूप पौधों की लम्बाई और मोटाई में वृद्धि होती है। यह वृद्धि सिर्फ द्विबीजपत्री पौधों में ही पाई जाती है, चूँकि ये उसी में ही पाए जाते हैं जबकि एकबीजपत्री पौधों में इसका अभाव होता है। कॉर्क मोटी भित्ति वाली मृत कोशिका होती है जो पौधों की तनों की परिधि पर एक पर्त के रूप में रहती है।

    कॉर्क ऊतकों के लिए सुरक्षा का काम करता है।

    व्यवसायिक रूप से कॉर्क का उत्पादन क्यूरकस सुबरनामक वृक्ष से होता है।