गुरुत्व के नए सिद्धांत (New Gravity Theory) के बारे में दावा किया गया है कि इसके जरिए खगोलीय परिघटनाओं की पूरी व्याख्या की जा सकती है और डार्क मैटर (Dark Matter) जैसे किसी अदृश्य पदार्थ के अस्तित्व की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. मिलग्रोमैन गतिकी (Milgromian Dynamics) नाम का यह सिद्धांत गैलेक्सी के घूर्णन की व्याख्या के साथ उसका पूर्वानुमान तक लगा सकता है जिसके लिए अभी तक वैज्ञानिक डार्क मैटर को जिम्मेदार बता रहे थे |
पिछले कुछ दशकों से विज्ञान जगत में डार्क मैटर (Dark Matter) की खूब चर्चा रही है | अभी तक इसके अस्तित्व सिद्ध किए बिना ही कई परिघटनाओं की व्याख्या में इसका उपयोग हुआ है | डार्क मैटर के बारे में बताया जाता है कि यह अदृश्य पदार्थ प्रकाश से तो अप्रभावित होता है, लेकिन गुरुत्व से नहीं | नई समीक्षा में वैज्ञानिकों ने सुझाया है कि विभिन्न पैमानों पर किए गए व्यापक अवलोकन बताते हैं कि गुरुत्व का एक वैकल्पिक सिद्धांत (New Gravity Theory), जिसे मिलग्रोमैन गतिकी (Milgromian dynamics) या मोंड भी कहते है, सभी परिघटनाओं की व्याख्या कर सकता है जिसके लिए डार्क मैटर जैसे अदृश्य की जरूरत ही नहीं होगी |
डार्क मैटर की अवधारणा
न्यूटन के भौतिकी के नियम सौरमडंल के ग्रहों की चाल तो सटीकता से बता पाते हैं, लेकिन 1970 के दशक में वैज्ञानिकों ने पाया कि ऐसा गैलेक्सी की चक्रिका (Galaxy Discs) के साथ नहीं हो रहा है | बाहरी किनारे पर तारों की घूमने की गति न्यूटन के सिद्धांत के द्वारा बताई गई गति से कहीं ज्यादा थी | यहीं से डार्क मैटर की अवधारणा आई जिसे उस अतिरिक्त गुरुत्व खिंचाव के लिए जिम्मेदार माना गया जो तारों को गति प्रदान कर रहा था |
गुरुत्व और डार्क मैटर
गुरुत्व का यह नया सिद्धांत 40 साल पहले इजराइली भौतिकविद मोर्डेहाई मिलग्रोम ने दिया था | बताया जा रहा है कि यह सिद्धांत डार्क मैटर की आवश्यकता को खत्म कर देगा | मोंड सिद्धांत में मूलतः बताया गया है कि जब गुरुत्व बहुत ही कमजोर हो जाती है, जैसा की गैलेक्सी के किनारों पर होता है, तब वह न्यूटन की भौतिकी से अलग बर्ताव करने लगती है | इस तरह से इसकी व्याख्या करना संभव हो सकेगा कि 150 गैलेक्सी के किनारों पर तारे, ग्रह और गैस आदि तेजी से क्यों घूमते हैं |
मानक प्रतिमान से बेहतर?
इससे भी खास बात यह है कि मोंड केवल घूर्णन वक्र की ही व्याख्या नहीं करता है, बल्कि इससे कई मामलों में सही पूर्वानुमान भी लगाया जा सकता है विज्ञान के दार्शनिकों का कहना है कि मोंड की पूर्वानुमान लगाने की यह क्षमता उसे मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान (standard cosmological model) से ऊपर उठा देता है जिसके अनुसार ब्रह्माण्ड में दिखाई देने वाला यानि सामान्य पदार्थ की तुलना में डार्कमैटर ज्यादा है | इस प्रतिमान के अनुसार गैलेक्सी में अनिश्चित लेकिन बहुत ही ज्यादा पदार्थ होता है. जिससे गैलेक्सी के घूर्णन की व्याख्या नहीं हो सकती है |
मोंड के सटीक पूर्वानुमान
गैलेक्सी के किनारे के पिडों की घूमने की गति की व्याख्या के ना होने की जिम्मेदार डार्क मैटर को ही बताया जाता रहा है | लेकिन मोंड के अभी तक के पूर्वानुमानों की पुष्टि तक होती रही है | जहां सामान्य पदार्थ के वितरण के आधार पर गैलेक्सी के किनारों के घूर्णन की गति 100 और 300 किलोमीटर प्रतिघंटा का अनुमान लगा पता है, मोंड इसे 180-190 किलोमीटर प्रतिघंटा की गति बताता है और बाद में अवलोकन करने में पता चलता है कि वास्तविक घूर्णन की गति 188 किलोमीटर प्रतिघंटा है, तो साफ है कि ऐसे में मोंड सिद्धांत को ही प्राथमिकता दी जाएगी |
मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान की कमजोरी
मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान की सबसे बड़ी नाकामी गैलेक्सी बार से संबंधित है जो तारों का बनाया छड़ के आकार के इलाके होते हैं | ये इलाके सर्पिल गैलेक्सी के केंद्रीय इलाके में पाए जाते हैं | यह छड़ समय के साथ घूर्णन करती है. यदि गैलेक्सी में विशालकाय भार डार्क मैटर मौजूद है तो उनके बार या छड़ों की गति धीमी हो जानी चाहिए, लेकिन बहुत सी गैलेक्सी के अवलोकनों में पाया गया है कि ये छड़े बहुत तेज हैं | इससे मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान पर विश्वास काफी कम हो जाता है | डार्क मैटर (Dark Matter) की गैलेक्सी में उपस्थिति कई परिघटनाओं की सही व्याख्या नहीं कर पाती है |
डार्क मैटर का गुरुत्व का प्रभाव
डार्क मैटर का गुरुत्व का प्रभाव तो होता है, लेकिन वे समान्य पदार्थ के गुरुत्व से प्रभावित नहीं होते हैं | इससे गणना में तो आसानी होती है, लेकिन यह वास्तविकताओं से मेल नहीं खाती है | जब इसे बाद में सिम्यूलेशन के लिए उपयोग में लाया गया तो भी विशेषताओं की सही व्याख्या नहीं हुई. इसके अलावा मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान में कई और भी खामियां पाई गई हैं |
लेकिन कनवरसेशन में प्रकाशित लेख में वैज्ञानिकों ने मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान और मोंड के खगोलीय अवलोकनों के परिपेक्ष्य में परीक्षण के लिए ओकाम के रेजर की अवधारणा का उपयोग किया | जिसके मुताबिक मानदंडों से मुक्त एक सिद्धांत ज्यादा आकड़ों से संगत होता है जिससे वह और जटिल हो जाता है | इसकी व्याख्या लिए उन्होंने सैद्धांतिक लचीलेपन की भी अवधारणा दी | बहराल मोंड का सिद्धांत अवलोकनों से मेल खाता हुआ संगत दिखाई देता है लेकिन अभी डार्कमैटर या मानक ब्रह्माण्डकीय प्रतिमान को खारिज करना शायद जल्दबाजी हो |
वैज्ञानिकों ने एक ऐसे जीवाणु (Bacteria) की खोज की है, जो नंगी आंखों से भी दिखता है। अगर इंसान से तुलना करें तो इसका आकार दूसरी बैक्टीरिया के मुकाबले इतना ही विशालकाय है, जैसे मानव के लिए माउंट एवरेस्ट। गौरतलब है कि बैक्टीरिया से पृथ्वी का बहुत ही नजदीकी रिश्ता है। इंसान के शरीर में अनगिनत बैक्टीरिया होते हैं। ऐसा पहली बार हुआ है, जब इतना बड़ा बैक्टीरिया मिला है, जिसे हम बिना माइक्रोस्कोप की मदद से भी देख सकते हैं।
थियोमार्गरीटा मैग्निफा (Thiomargarita Magnifica)की खोज
कैरिबियन द्वीप समूह में मैंग्रोव के दलदल में दुनिया का सबसे विशाल बैक्टीरिया की खोज की गई है। वैज्ञानिकों को यह भी अनुमान लग रहा है कि किस वजह से इस बैक्टीरिया ने इतना विशाल आकार विकसित किया होगा। इस बैक्टीरिया को थियोमार्गरीटा मैग्निफा (Thiomargarita Magnifica) नाम दिया गया है, जो ज्यादातर जीवाणुयों की तुलना में 5,000 गुना विशाल है। जबकि, अबतक जितने भी विशाल बैक्टीरिया की जानकारी है, उनसे भी यह 50 गुना ज्यादा बड़ा है (इसके नाम में मैग्निफिका का संदर्भ लैटिन में ‘बड़ा’ और फ्रेंच शब्द मैग्निफिक्यू से है)।
इस शोध के लीड ऑथर और कैलिफोर्निया के मरीन बायोलॉजिस्ट जीन-मैरी वोलैंड ने इसकी विशालता के बारे में कहा कि, ‘इसका संदर्भ देखने के लिए, इसे ऐसे समझा जा सकता है, जैसे एक इंसान का सामना माउंट एवरेस्ट के रूप में दूसरे इंसान से होता है।’ दरअसल, इसकी सबसे बड़ी विशेषता ही यही है कि किसी भी बैक्टीरिया को देखने के लिए माइक्रोस्कोप की आवश्यकता होती है, लेकिन यह इतना अनोखा है कि इसे नंगी आंखों से भी देखा जा सकता है।
करीब एक सेंटीमीटर है थियोमार्गरीटा मैग्निफा की लंबाई
थियोमार्गरीटा मैग्निफा का आकार लगभग इंसान के पलकों जितनी है और यह करीब एक सेंटीमीटर लंबा है। एक सामान्य बैक्टीरिया प्रजाति की लंबाई 1 से 5 माइक्रोमीटर होती है। जबकि, इस प्रजाति की औसत लंबाई 10,000 माइक्रोमीटर है। इनमें से कुछ तो इससे भी करीब दोगुनी हैं। बैक्टीरिया एक कोशिका वाला जीव है, जो धरती पर हर जगह मौजूद है। कुछ तो पारिस्थितिक तंत्र और अधिकांश जीवित चीजों के लिए बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं।
पृथ्वी का पहला जीव है बैक्टीरिया
माना जाता है कि पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत बैक्टीरिया से ही हुई और अरबों साल बाद भी इसकी संरचना काफी सामान्य है। हमारे शरीर में भी अनगिनत बैक्टीरिया मौजूद हैं, जिनमें से कुछ ही ऐसे होते हैं, जो गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं। बाकी हमारे शरीर में अच्छे जीवाणुओं की काफी जरूरत रहती है। यह शोध डिसकवरी साइंस जर्नल में विस्तार से प्रकाशित किया गया है।
मैंग्रोव के दलदल में अनेक चीजों से चिपका मिला
फ्रेंच वेस्ट इंडीज और गुयाना यूनिवर्सिटी के एक को-ऑथर और बायोलॉजिस्ट ओलिवियर ग्रोस ने 2009 में ग्वाडेलोप द्वीपसमूह में भी मैंग्रोव के पत्तों से चिपके हुए इस जीवाणु का पहला सैंपल देखा था। लेकिन, इसके विशाल आकार की वजह से वह तत्काल नहीं जान पाए थे कि एक यह बैक्टीरिया था। बाद में जेनेटिक एनालिसिस से यह खुलासा हुआ कि वह जीव एक कोशिका वाला बैक्टीरिया ही था। ग्रोस ने पाया कि बैक्टीरिया दलदल में सीप के शेल, चट्टानों और ग्लास की बोतलों से भी चिपका हुआ था।
अपनी रक्षा के लिए विशाल बना थियोमार्गरीटा मैग्निफा (Thiomargarita Magnifica)!
वैज्ञानिक इसे अभी लैब कल्चर में विकसित नहीं कर पाए हैं, लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि इसकी कोशिका में एक ऐसी संरचना है,जो बैक्टीरिया के लिए असामान्य है। शोधकर्ताओं का कहना है कि वे निश्चित नहीं हैं कि जीवाणु इतना बड़ा क्यों है, लेकिन को-ऑथर वोलैंड का अनुमान है कि छोटे जीवों से खाए जाने से बचने के लिए इसने इतना विशाल स्वरूप धारण किया हो सकता है।
इस आर्टिकल में हम जानेगे कि उत्तक क्या होते है और उनके कितने प्रकार होते है | साथ ही जानेगे की उत्तक किस प्रकार बहुकोशिकीय जन्तुओ के लिय जरूरी होते है | साथ ही हम जानेगे कि उपकला या एपीथीलियमी ऊतक (Epithelial tissues), संयोजी ऊतक (Connective Tissue), पेशीय ऊतक (Muscular Tissue) और तंत्रिकीय ऊतक (Nervous Tissue) क्या होते है |
उत्तक क्या है ? (What is Tissues)
शरीर की संरचनात्मक इकाई कोशिका है। समान कोशिकाएँ मिलकर ऊतक बनाती हैं। भ्रूणीय विकास, रचना एवं कार्यों में समान कोशाओं के समूहों अथवा परतों को ऊतक (Tissues) कहते हैं। कई ऊतक मिलकर अंग; जैसे- मस्तिष्क, हृदय, यकृत, नेत्र आदि कई अंग मिलकर अंगतन्त्र बनाते हैं, जो विशेष कार्य करते हैं; जैसे- गुर्दे, मूत्रवाहिनियाँ एवं मूत्राशय मिलकर उत्सर्जन तन्त्र बनाते हैं। जन्तुओं के शरीर में विभिन्न प्रकार के अगतन्त्र; जैसे- पाचन तन्त्र, श्वसन तन्त्र, परिसंचरण तन्त्र, तन्त्रिका तन्त्र आदि मौजूद रहते हैं।
उत्तक के अध्ययन को ऊतकी (Histology) कहते हैं। इस अध्ययन को कुछ लोग सूक्ष्मशरीर (Micro-anatomy) भी कहते हैं, परन्तु इसका विषय-विस्तार ऊतकी से अधिक है। इटली के वैज्ञानिक, मारसेली मैल्पीजाई (1628-1694) ने जीव विज्ञान की यह शाखा स्थापित की, लेकिन इसे हिस्टोलॉजी का नाम मेयर (1819) ने दिया। टिशू (Tissue) शब्द का प्रथम प्रयोग बाइकाट (Bichat, 1771-1802) ने किया।
ऊतक में उपस्थित मैट्रिक्स का तरल, उस माध्यम का काम करता है जिसके द्वारा ऊतक की कोशाएँ रक्त या लसीका से अपना रासायनिक लेन-देन करती है। अतः इसे ऊतक द्रव (Tissue fluid) कहते हैं, कुछ ऊतकों में कोशाओं का रक्त या लसीका से सीधा सम्पर्क होता है, या साइनोवियल द्रव (Synovial fluid) या सेरीन्त्रीस्पाइनल द्रव (Cerebrospinal fluid) आदि विशेष प्रकार के तरल पदार्थ रासायनिक लेन-देन के माध्यम का काम करते हैं।
मानव फेफड़े के एक हिस्टोलॉजिक नमूने का microscope से लिया गया चित्र | जिसमें विभिन्न ऊतक जैसे रक्त, संयोजी ऊतक, संवहनी एंडोथेलियम और श्वसन उपकला, हेमटॉक्सिलिन और ईओसिन दिखाई दे रहे है | (Photo – Wikipedia)
उत्तक के प्रकार (Type of Tissues)
बहुकोशिकीय जन्तुओं में पाये जाने वाले ऊतकों की चार प्रमुख श्रेणियाँ होती हैं:
उपकला या एपीथीलियमी ऊतक (Epithelial tissues)
संयोजी ऊतक (Connective Tissue)
पेशीय ऊतक (Muscular Tissue)
तंत्रिकीय ऊतक (Nervous Tissue
उपकला या एपीथीलियमी ऊतक(Epithelial Tissues)
इन ऊतकों को उपकला (Epithelial) नाम 18वीं सदी में डच वैज्ञानिक रयूश (Ruysch) ने दिया। ये ऊतक शरीर तथा आन्तरांगों की बाहरी तथा भीतरी उघड़ी (Exposed) सतहों पर, रक्षात्मक चादर या छीलन (Peeling) की भाँति ढके रहते हैं। अतः ठोस आंतरान्गों (जीभ, गुर्दे, जिगर, तिल्ली आदि) पर बाहर तथा त्वचा एवं खोखले आन्तरांगों (श्वास-नालें, आहारनाल, रुधिरवाहिनियाँ आदि) पर भीतर-बाहर इसी ऊतक की एक या अधिक परतें आच्छादित उपकला (Epithelial) ऊतक, भ्रूणीय परिवर्धन में तीनों हि प्राथमिक रोहिस्तरों (Primary germinal layers) एक्टोडर्म, मीसोडर्म एवं एन्डोडर्म से बनती हें।
यह ऊतक शरीर के सुरक्षा कवच का कार्य करते हैं। यह ऊतक शरीर के ऊपर तथा अन्दर विभिन्न भागों की गुहिका का आवरण बनाता है। त्वचा, मुँह, आहारनाल तथा फेफड़ों की बाहरी सतह इसी की बनी होती है।
इसकी उत्पत्ति भ्रूण के तीनों प्राथमिक जनन स्तरों— एक्टोडर्म, मीसोडर्म एवं एन्डोडर्म से होती है। उपकला ऊतक की कोशिकाएँ एक-दूसरे से सटी रहती हैं तथा अन्तराल बन्धन द्वारा जुड़ी होती हैं, जिसमें रुधिर वाहिनियाँ अनुपस्थित होती हैं। यह ऊतक अकोशिकीय आधारी झिल्ली पर स्थित होता है, जो इसके नीचे स्थित संयोजी ऊतक से अलग करती है। यह जल एवं अन्य पोषक पदार्थों के अवशोषण में सहायता पहुँचाते हैं।
इन ऊतकों के द्वारा घाव भरा जाता है क्योंकि इनमें पुनरुत्पादन (regeneration) की क्षमता बहुत होती है। यह आहारलाल में अवशोषण, वृक्क नलिकाओं में पुनरावशोषण तथा उत्सर्जन में सहायता करती है।
शरीर की सभी अन्थियाँ उपकला ऊतक से बनती है, जो दो प्रकार की होती है।
एककोशिकीय ग्रन्थि (Unicellular Glands)
जब एक कोशिका स्वावण का कार्य करती है, तो उसे एककोशिकीय ग्रन्थि कहते हैं। इन ग्रन्थियों में प्राय: श्लेष्मा (mucous) बनता रहता है, जो स्रावित होकर संवधिंत सतह को गोला रखता है। जैसे- श्वसन सतह तथा आहारनाल में उपस्थित चषक कोशिकाएँ (gublet cell) |
बहुकोशिकीय ग्रन्थि (Multicellular Glands)
इसके अन्तर्गत अनेक कोशिकाएँ स्रावण करने के लिए समूह बना लेती हैं। यह समूह बहुकोशिकीय ग्रन्थि कहलाती है।
ये दो प्रकार की होती है :
अन्तः स्त्रावी ग्रन्थियाँ (Endocrine Glands) – इन ग्रन्थियों का सतह से सम्बन्ध समाप्त हो जाता है तथा इनके स्त्रावण (हॉर्मोन) सीधे रुधिर में पहुँचते हैं; जैसे-पीयूष ग्रन्थि, थायरॉइड ग्रन्थि आदि।
बहिः स्त्रावी ग्रन्थियाँ (Exocrine Glands) – इसमें स्त्रावण नलिकाओं द्वारा सतह पर स्त्रावित होते हैं, जैसे-आमाशयी, आन्त्रिय, लार ग्रन्थियाँ आदि।
उपकला या एपीथीलियमी ऊतक के कार्य (Functions)
उपकलाएँ मुख्यतः शरीर एवं आन्तरांगों के लिए सुरक्षात्मक आवरण बनाती हैं। अतः ये भीतर स्थित ऊतकों की कोशाओं को चोट से, हानिकारक पदार्थों तथा बैक्टीरिया आदि के दुष्प्रभाव से और सूख जाने से बचाती हैं।
शरीर एवं आन्तरांगों का अपने बाहरी वातावरण से पदार्थों का सभी लेन-देन एपीथीलियमी आवरण के ही आर-पार होता है।
आहारनाल की दीवार की भीतरी सतह पर ये पोषक पदार्थों एवं जल के अवशोषण (Absorption) का और उत्सर्जन अंगों में उत्सर्जन (Excretion) का कार्य करती हैं।
त्वचा पर तथा संवेदांगों में ये संवेदना ग्रहण (Sensory reception) का कार्य करती हैं।
कई नलिका जैसी खोखले अंगों में ये श्लेष्म (Mucus) या अन्य तरल पदार्थों के संवहन में सहायता करती हैं।
इनमें पुनरुत्पादन (Regeneration) की बहुत क्षमता होती है। अतः क्षत ऊतकों पर शीघ्रतापूर्वक पुनरुत्पादित होकर ये घावों के भरने में सहायता करती हैं।
संयोजी ऊतक (Connective Tissue)
भ्रूण में एक्टोडर्म और एण्डोडर्म स्तरों के बीच में कोशाओं का एक ढीला-सा तीसरा स्तर, मीसोडर्म होता है। इस स्तर से बनने वाले वयस्क के सारे ऊतकों को हर्टविग (1883) ने मीसेनकाइमा का नाम दिया। भ्रूणीय परिवर्धन के दौरान, इस स्तर के कुछ भाग तो सघन होकर वयस्क के कंकालीय तथा पेशीय ऊतक (Muscular tissue) बनाते हैं और शेष ढीले रहकर संवहनीय और संयोजी ऊतक (Connective tissue) बनाते हैं। पेशीय ऊतकों (Muscular tissues) के अतिरिक्त अन्य सभी मीसोडर्मी ऊतकों की व्यस्क के संयोजी ऊतकों की श्रेणी में रखा जाता है।
संयोजी ऊतक विभिन्न अंगों और ऊतकों को सम्बद्ध करता है। इस ऊतक कोशिकाओं की संख्या कम होती है तथा अन्तरकोशिकीय पदार्थ अधिक होता है। यह अन्तरकोशिकीय पदार्थ तन्तुवत, ठोस जैली की तरह तरल सघन या कठोर अवस्था में रह सकता है। इस ऊतक का निर्माण भ्रूणीय मोसोडमं (embryonic mesoderm) में होता है। शरीर के लगभग 30% भाग का निर्माण संयोजी ऊतक से ही होता है। पूरे शरीर में सबसे अधिक फैले होते हैं। ये प्रत्येक अंग के भीतर तथा बाहर और विभिन्न अंगों के बीच-बीच में स्थित पाये जाते हैं। अंगों और इनके विभिन्न ऊतकों की साधना, सहारा देना और परस्पर जोड़े रखना संयोजी ऊतकों का मूल कार्य होता है या कह सकते है कि यह शरीर के विभिन्न कोशिकाओं, ऊतकों एवं अंगों के बीच रहता है तथा इसे परस्पर बाँधने या जोड़ने का कार्य करता है।
संयोजी ऊतक के प्रकार (Kinds of Connective Tissues)
मैट्रिक्स तथा तन्तुओं की रचना के आधार पर संयोजी ऊतक को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है :
1. वास्तविक संयोजी ऊतक
अन्तराली ऊतक
वसा ऊतक
श्वेत तन्तुमय संयोजी ऊतक
पीत लोचदार संयोजी ऊतक
जालिकामय संयोजी ऊतक
श्लेष्मी संयोजी ऊतक
2. कंकालीय संयोजी ऊतक
1. अस्थि 2. उपास्थि
3. तरल संयोजी ऊतक
(i) रुधिर (ii) लसीका
वास्तविक संयोजी ऊतक
फाइब्रोब्लास्ट घाव भरने में सहायक होता है।
मैक्रोफेज ग्लीयल कोशिका (मस्तिष्क), कुफ्फर कोशिका (यकृत), मोनोसाइट ( रुधिर ) । ये कोशिकाएँ फैगोसाइटिक तथा अपमार्जक होती हैं ।
मास्ट कोशिकाएँ एलर्जी क्रिया में भूमिका, शरीर की रक्षा तथा विभिन्न पदार्थ उत्पन्न करते हैं; जैसे- हिपेरीन रुधिर को जमने से रोकता है। हिस्टेमिन एलर्जी में उत्तेजक होता है।
लसीका कोशिकाएँ प्रतिरक्षियों का संश्लेषण एवं संवहन में सहायक होता है।
प्लाज्मा कोशिकाएँ प्रतिरक्षी पदार्थों का संश्लेषण करते हैं।
अन्तराली संयोजी ऊतक विभिन्न ऊतकों के बीच का स्थान भरने तथा उन्हें जोड़ने एवं अंगों को उनके स्थान पर बनाए रखने में सहायक होता है। उदाहरण धमनी व शिराओं की भित्ति पर, खोखले अंगों में आदि।
वसामय ऊतक यह वसा को संश्लेषित, संचय एवं उसका उपापचय करते हैं। व्हेल का ब्लबर (blubber), ऊँट का कूबड़ तथा मैरीनों भेड़ की मोटी पूँछ मुख्यतया वसा ऊतक की बनी होती है।
श्वेत तन्तुमय ऊतक यह टेण्डन्स या कण्डराओं का निर्माण करता है, जो पेशी को अस्थि से जोड़ता है।
पीत लोचदार ऊतक यह लिगामेन्ट का निर्माण करता है, जो एक अस्थि को दूसरे अस्थि से जोड़ता है। यह इलास्टिन तन्तुओं का बना होता है।
कंकालीय संयोजी ऊतक (मीजोडर्म से विकसित)
उपास्थि (Cartilage) – यह ठोस, अर्द्ध कठोर तथा लचीला संयोजी ऊतक है। यह लेरिंक्स, ट्रेकिया, ब्रोंकाई आदि में मिलते हैं। उपास्थि की रचना तीन घटकों द्वारा होती है
1. पेरीकॉण्ड्रियम
2. मैट्रिक्स
3. कॉण्ड्रियोसाइट्स।
शार्क मछली का पूरा कंकाल तन्त्र उपास्थि का बना होता है।
अस्थि (Bone) एक ठोस, कठोर संयोजी ऊतक है। इसके मैट्रिक्स में कैल्शियम तथा फॉस्फोट के एपोटाइट लवण होते हैं। ऑस्टिओसाइट अस्थि का निर्माण करती हैं। इसके मैट्रिक्स को ओसीन (ossien) कहते हैं।
स्तनधारियों की लम्बी अस्थियों के मैट्रिक्स में एक हैवर्सियन नलिका होती है, जो रुधिर द्वारा अस्थि के अन्दर पोषक पदार्थों तथा ऑक्सीजन का परिवहन करता है ।
किसी अस्थि के जल जाने से कार्बनिक पदार्थ जल जाता है, जबकि अकार्बनिक पदार्थ राख के रूप में शेष रह जाता है। अस्थि में कार्बनिक तथा अकार्बनिक लवणों का अनुपात क्रमश: 62% और 38% होता है। जिन अस्थियों में हैविर्सियन तन्त्र पाया जाता है, उन्हें संहत (campact) अस्थि कहते हैं।
स्नायु (Ligaments) यह अस्थि को अस्थि जोड़ता है।
कंडरा (Tendons) एक संयोजी ऊतक है, जो पेशी को अस्थि से जोड़ता है।
तरल संयोजी ऊतक
रुधिर (Blood) एवं लसीका (Lymph), विशेष प्रकार के तरल संयोजी ऊतक (Connective tissue) होते हैं, जिनका कि सारे शरीर में संचारण होता है। रुधिर की उत्पति भ्रूण (Embryo) की मीसोडर्म से होती है। यह शरीर का 8% भाग होता है।
आयुकरण (Aging)
संयोजी ऊतकों के मैट्रिक्स का आयुकरण के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। बच्चों में यह अधिकतर लसदार होता है, क्योंकि तंतुओं की संख्या कम होती है। आयु बढ़ने के साथ-साथ इसमें जेली-सदृश आधार पदार्थ की मात्रा कम होती जाती है और तन्तुओं की मोटाई और संख्या बढ़ती जाती है। कुछ स्थानों पर, जैसे लवणों का भी जमाव होने लगता है। इसलिए इस दीवार का लचीलापन कम होता जाता है और ऊतकों में रक्त की आपूर्ति (Supply) गड़बड़ होती जाती है। इस प्रकार धीरे-धीरे सभी ऊतकों की क्रिया-क्षमता और दक्षता में गिरावट आ जाती है। इसी को आयुकरण (Aging) कहते हैं।
संयोजी ऊतक कार्य (Functions of Connective Tissue)
संयोजी ऊतक (Connective tissue) को अवलंबन ऊतक(Supporting tissue) भी कहते हैं, क्योंकि अन्य कोशाओं, ऊतकों एवं अंगों को सीमेन्ट की तरह परस्पर जोड़कर सहारा देना, यथास्थान साधे रखना तथा पैकिंग पदार्थ के रूप में इन्हें परस्पर बाँधे रखना इनका प्रमुख कार्य होता है।
इसके मैट्रिक्स में उपस्थित ऊतक द्रव्य ऊतकों की कोशाओं और रुधिर वाहिनियों के बीच रासायनिक लेन-देन के माध्यम का काम करता है।
प्रत्येक आन्तरांग के ऊपर यह एक तन्तुमय सुरक्षात्मक खोल बनाता है।
यह आन्तरांगों एवं ऊतकों की आवश्यक लोच (Elasticity), चिकनाहट (Lubrication) एवं दृढ़ता प्रदान करता है और धक्कों को सहने (Shock absorber) का काम करता है।
यह रासायनिक पदार्थों का संग्रह एवं संवहन भी करता है। उदाहरणार्थ- वसीय अर्थात् ऐडिपोज संयोजी ऊतक (Adipose Connective Tissue) में वसा (Fat) का संग्रह होता है। यह वसीय ऊतक शरीर में कहीं भी, अन्तराली ऊतक के रूपान्तर से बन सकता है, लेकिन त्वचा के नीचे (मानव में पैनीकुलस एडीपोसस- (Panniculus adiposus), तथा हाथी और व्हेल का ब्लबर (Blubber) पीली अस्थिमज्जा एवं रक्तवाहिनियों के गिर्द तथा मेढक में वृक्कों (Kidneys) के निकट विशेष वसीय ऊतक होते हैं। मनुष्य का अधस्त्वचीय (Sub-cutaneous) पैनीकुलस ऐडीपीसस कुछ सीमा तक पुरुष व नारी के शरीर की आकृति में अन्तर के लिए जिम्मेवार होता है।
ऊँट का कूबड़ तथा मैराइनो भेड़ (Marino sheep) की मोटी पूँछ भी वसा-संचय के कारण ही होती है। वसा ऊतक शरीर का लगभग 10% से 15% भाग बनाते हैं।
यह विषैले पदार्थों (toxins), रोगाणुओं, कीटाणुओं आदि को नष्ट करके शरीर की सुरक्षा करता है।
घायल और संक्रमित स्थानों पर यह मृत कोशाओं को नष्ट करके सफाई तथा इनकी क्षतिपूर्ति करके मरम्मत का काम करता है।
हड्डियों और पेशियों को दृढ़तापूर्वक परस्पर जोड़कर यह गति एवं गमन में सहायता करता है।
कशेरुकियों (Vertebrates) में पूरे शरीर को साधने और इसकी आकृति बनाए रखने के लिए दृढ़ अन्तः कंकालीय ढांचा (Endoskeletal framework) होता है यह एक विशेष प्रकार के सघन संयोजी ऊतक (Dense Connective tissue) का बना हुआ होता है जिसे कंकाल ऊतक (Skeletal tissue) कहते हैं।
पेशीय ऊतक (Muscular Tissue)
संकुचनशीलता (Contractility) एवं चालकता (Motility) जीवद्रव के मूल लक्षण होते हैं। अधिकांश बहुकोशीय जन्तुओं में गमन और अंगों की गति के लिए विशेष प्रकार की कोशाओं के ऊतक (Tissue) होते हैं। इन्हें पेशीय ऊतक या पेशियाँ (Muscles) कहते हैं और इनकी कोशाओं को पेशी कोशाएं कहा जाता है । ये ऊतक भ्रूण (Embryo) की मीसोडर्म से बनते हैं (केवल आँखों की आइरिस और सिलियरी काय की पेशियाँ ऐक्टोडर्म से बनती हैं)। पेशीय ऊतक (Muscular tissue) शरीर के भार का लगभग आधा अंश बनाते हैं। पेशीय कोशाएं लम्बी व सँकरी होती हैं, इसीलिए इन्हें पेशी तन्तु (Muscle fibres) भी कहते हैं। आकुंचनशीलता (Contractility) इनका प्रमुख लक्षण होता है।
पेशीय ऊतक के प्रकार (Type ofMuscular Tissue)
रेखित पेशियाँ (Striated or striped muscles)
अरेखित या अनैच्छिक पेशियां (Unstriaped, Smooth or involuntary Muscles)
ह्रदय पेशियां (Cardiac Muscles)
रेखित पेशियां (Striated or Striped Muscles)
शरीर की अधिकांश पेशियाँ रेखित होती हैं। ये शरीर के भार का 40% बनाती हैं। ये केन्द्रीय और परिधीय तन्त्रों के नियन्त्रण में जन्तु की इच्छानुसार कार्य करती हैं। अतः इन्हें ऐच्छिक पेशियाँ (Voluntary Muscles) भी कहते हैं। अधिकांश रेखित पेशियाँ अपने दोनों सिरों पर हड्डियों से जुड़ी होती हैं। अतः इन्हें कंकालीय पेशियाँ (Skeletal Muscles) भी कहते हैं। हाथ-पैरों की गति तथा शरीर की गतियाँ एवं गमन इन्हीं पेशियों द्वारा होता है। अतः इन्हें दैहिक पेशियाँ (Somatic Muscles) भी कहते हैं, क्योंकि ये अंगों में द्रुतगामी (rapid) परन्तु अल्पकालीन गतियाँ उत्पन्न करती हैं।
ऑक्सीजन-ऋण(Oxygen-Debt)
सक्रिय शारीरिक कार्य या व्यायाम के समय पेशियों में ऊर्जा का व्यय बहुत बढ़ जाता है और अधिकांश एटीपी (ATP), एडीपी (ADP) में बदल जाती है। अतः ग्लूकोज का जारण तेजी से होने लगता है, परन्तु फेफड़े (Lungs) इसके लिए आवश्यक ऑक्सीजन (O2) की पूर्ति नहीं कर पाते। इसीलिए सांस फूलने लग जाती है (Hard breathing)। इसी दशा के शरीर को ऑक्सीजन ऋण (Oxygen debt) कहते हैं। व्यायाम की समाप्ति के काफी देर बाद तक हम जल्दी-जल्दी साँस लेकर इस ऑक्सीजन ऋण को समाप्त कर देते हैं, अर्थात् हवा से अधिक ऑक्सीजन लेकर पेशियों के जारण द्वारा एटीपी के असाधारण व्यय की पूर्ति करते हैं। इसलिए जिन व्यक्तियों की पेशियों में ग्लूकोज की कमी होगी वे अधिक मेहनत का काम नहीं कर सकते।
थकावट (Fatigue)
यदि पेशियों को कुछ समय तक निरन्तर आकुंचन करना पड़े तो इनमें आकुंचन की क्षमता धीरे-धीरे कम हो जाती है और पेशियों में लैक्टिक अम्ल (Lactic acid) के जमा हो जाने के कारण इनमें आकुंचन हो ही नहीं पाता। इसी की थकावट (Fatigue) कहते हैं। बाद में धीरे-धीरे लैक्टिक अम्ल को ग्लूकोज में बदल कर थकावट की दशा समाप्त हो जाती है।
कंपकपी (Shivering)
जाड़े में कभी-कभी क्षणभर के लिए हमें अपने आप कंपकपी आ जाती है। यह कंकाल पेशियों की एक अनैच्छिक क्रिया होती है। शरीर ताप को बढ़ाना इस क्रिया का उद्देश्य होता है।
अरेखित या अनैच्छिक पेशियाँ(Unstriped, Smooth or Involuntary Muscles)
अरेखित पेशियां खोखले आंतरांगों की दीवार, अतिरिकत जननांगों, त्वचा की डर्मिस आदि में होती हैं। इस प्रकार ये आहारनाल, मूत्राशय, पित्ताशय, श्वसन नालों, प्लीहा, नेत्रों, त्वचा, गर्भाशय, योनि, जनन एवं रुधिरवाहिनियों आदि में होती हैं। इन्हें इसलिए आंतरांगीय पेशियां (Visceral muscles) भी कहते हैं। अस्थियों से इनका कोई सम्बन्ध नहीं होता। त्वचा में बालों से सम्बन्धित ऐरेक्टर पिलाई (Arrector pilli) पेशियां तथा शिश्न का स्पंजी पेशी जाल भीअरेखित पेशी ऊतक होते हैं।
इन पेशियों का आकुंचन स्वायत्त तन्त्र (Autonomous nervous system) के नियन्त्रण में धीरे-धीरे प्रायः एक निश्चित क्रम या लय (Rhythm) में, स्वतः यन्त्रवत् होता रहता है, इस पर जन्तु इच्छा-शक्ति का नियन्त्रण नहीं होता है। इसीलिए इन पेशियों को अनैच्छिक पेशियाँ (Involuntary muscules) कहते हैं। आन्तरांगों का संकुचन, नालवत् आन्तरांगों की गुहा का फैलना या सिकुड़ना, आहारनाल की तरंग-गति (Peristalsis) आदि क्रियाएँ इन्हीं के संकुचन पर निर्भर करती हैं।
हृद पेशियां (Cardiac muscles)
कशेरुकियों (Vertebrates) के हृदय की दीवार का अधिकांश भाग हृदपेशियों का बना होता है जिसे मायोकार्डियम (Myocardium) कहते हैं। इन पेशियों के कुछ लक्षण रेखित और कुछ अरेखित पेशियों के होते हैं- इनके छोटे लेकिन मोटे व बेलनाकार पेशी तन्तु रेखित होते हैं। परन्तु इनमें केवल एक या कभी-कभी दो केन्द्रक होते हैं। ये तन्तु कुछ शाखान्वित होकर परस्पर जुड़े होते हैं। केवल इन्हीं पेशियों में पेशी तन्तु सिरों पर ऊँगली- जैसे प्रबंधों (Interdigitations) द्वारा परस्पर गुंथे रहते हैं। इन्हीं स्थानों को पहले अंतर्विष्ट पट्टियां (Intercalated discs) कहते हैं। स्वभाव में हृद पेशियां अन्य पेशियों से भिन्न होती हैं। ये स्वायत्त तन्त्रिका तन्तुओं से सम्बन्धित होती हैं। इनका सबसे विशिष्ट लक्षण यह होता है कि यह जन्तु की इच्छा से स्वतन्त्र अपने आप (Automatically), बिना थके, बिना रुके एक लय से (rhythmically) और मनुष्य में लगभग 72 बार प्रति मिनट की दर से, जीवन भर आकुंचन करती रहती है। इसी को हृदय की धड़कन (Heart beat) कहते हैं। स्पष्ट है कि इनमें एटीपी (ATP) का सबसे अधिक व्यय होता है। इसीलिए पूरे शरीर में इन्हीं कोशाओं में माइटोकॉण्ड्रिया सबसे अधिक व जटिल होते हैं। इनका संकुचन तन्त्रिजनक (Neurogenic) नहीं होता, अर्थात यह तंत्रिका प्रेरणा के कारण नहीं होता, वरन इन्हीं में अन्तर्भूत (Inherent), अर्थात् पेशीजनक (Myogenic) होता है।
पेशियों में वृद्धि एवं क्षय (Growth and Waste)
यदि पेशियों को बहुत अधिक कार्य करना पड़े तो धीरे-धीरे इनके तन्तु मोटे हो जाते हैं। इसे पेशी की अतिवृद्धि (Hypertrophy) कहते हैं। गर्भवती स्त्रियों के गर्भाशय की पेशियों में हॉरमोन्स के प्रभाव से अतिवृद्धि हो जाती है। इससे गर्भाशय कई गुना बड़ा हो जाता है। यदि किसी पेशी को काफी समय तक कार्य न करना पड़े तो इसके तन्तु पतले हो जाते हैं। इसे पेशी का क्षय (Atrophy) कहते हैं।
तंत्रिकीय ऊतक (Nervous Tissue)
आकुंचन की भाँति, उत्तेजनशीलता (Irritability) एवं संवाहकता (Conductivity) भी जीव द्रव्य के मूलभूत गुण होते हैं, लेकिन अधिकांश मेटाजोआ में इन कार्यों के लिए भी विशिष्ट कोशाएं होती हैं, जिन्हें तंत्रिका कोशाएं या न्यूरॉन्स (Nerve Cells or neurons) कहते हैं। ये भ्रूण की एक्टोडर्म की न्यूरल प्लेट से बनती हैं और तन्त्रिकीय ऊतक की रचनात्मक तथा क्रियात्मक इकाइयां (Units) होती हैं।
भ्रूणीय परिवर्धन (Embryonic Development)
भ्रूणीय परिवर्धन में एक बार बन जाने के बाद तन्त्रिका कोशाएँ कभी विभाजित नहीं होती वरन् जीवन भर अन्तरावस्था (Interphase) में रहती हैं और शरीर की वृद्धि के साथ-साथ बड़ी हो जाती हैं। मस्तिष्क की कुछ तन्त्रिका कोशाओं में मिलैनिन (Melanin) रंगा होता है। मादा की तन्त्रिका कोशाओं के केन्द्रक में केन्द्रिका के निकट प्रायः एक बार काय(Barr body) होता है जो एक्स (X) गुणसूत्र के रूपान्तरण से बनता है। तन्त्रिका कोशाओं के कोशापिण्ड, अधिकांश केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (Central nervous system), मुख्यतः मष्तिष्क के धूसर द्रव्य (Grey matter) में होते हैं। केन्द्रीय तन्त्र के बाहर थोड़े से कोशापिण्ड छोटेछोटे समूहों में पाए जाते हैं जिन्हें गुच्छक या गैग्लिया (Ganglia) कहते हैं। मस्तिष्क के अनुमस्तिष्क (Cerebellum) में फ्लास्क की आकृति के कोशापिण्ड होते हैं। इन्हें पुरकिन्जे की कोशाएं (Purkinje cells) कहते हैं।
तन्त्रिका ऊतक के कार्य (Functions of Nervous Tissue)
तन्त्रिका ऊतक का कार्य तन्त्रिकीय प्रेरणाओं (Nerve impulses) का संवहन (Conduction) अर्थात एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जाना होता है। त्वचा, कान, आँख, नाक आदि संवेदांगों अर्थात् ग्राहक अंगों (Receptor Organs) की तन्त्रिकासंवेदी (Neurosensory) कोशाएँ जब बाहरी उद्दीपनों (External stimuli) को ग्रहण करती हैं, तो इनसे सम्बन्धित संवेदी अर्थात् अभिवाही तन्त्रिका कोशाओं के तन्तुओं (Sensory or afferent nerve fibres) में विद्युत प्रवाह के रूप में, संवेदी प्रेरणाएँ (Sensory impulses) उत्पन्न होती हैं जिन्हें ये तन्तु केन्द्रीय तन्त्रिका में पहुँचाते हैं। केन्द्रीय तन्त्र से प्रेरक अर्थात् अपवाही तन्त्रिका कोशाओं के तन्तु (Motor or efferent nerve fibres) चालक प्रेरणाओं (Motor impulses) को पेशियों, ग्रन्थियों आदि अपवाहक अंगों (Effector organs) में ले जाते हैं जो उद्दीपनों के अनुसार प्रतिक्रिया (Response) करते हैं। चालक प्रेरणाओं का दूर-दूर (Ganglia) में तन्त्रिका कोशाएँ अपने-अपने अक्ष-तन्तुओं एवं डेन्ड्राइट्स की शाखाओं द्वारा परस्पर सम्बन्धित रहती हैं। इन सम्बन्धों को सिनैप्स (Synaps) कहते हैं।
14 जुलाई 2022 को सऊदी स्पेस कमीशन के CEO मोहम्मद सऊद अल-तमीमी ने सऊदी अरब किंगडम की ओर से आर्टेमिस समझौते (Artemis Accords) पर हस्ताक्षर किए। आर्टेमिस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला सऊदी अरब सातवां देश है और इसमें शामिल होने वाला चौथा मिडिल ईस्ट का देश है। यह समझोता मानवता के लिए अंतरिक्ष के लाभकारी उपयोग को बढ़ावा देने वाले सिदान्तों पर आधारित है l
क्या है आर्टेमिस-1 मिशन (Artemis Accords) ?
आर्टेमिस-1 मिशन के जरिए चंद्रमा को एक्स्प्लोर किया जाएगा। इसका स्पेसक्राफ्ट चार से छह सप्ताह में पृथ्वी से 280,000 मील की यात्रा करेगा। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा इस मिशन को लेकर तेजी से काम पूरे कर रही है। आर्टेमिस समझौते के सिद्धांत, 1967 की आउटर स्पेस ट्रिटी पर आधारित हैं और नासा के आर्टेमिस प्रोग्राम को आगे बढ़ाते हैं। यह प्रोग्राम एक बार फिर से इंसानों को चंद्रमा पर उतारेगा साथ ही मंगल ग्रह पर मानव मिशन के लिए रास्ता तैयार करेगा।
आर्टेमिस-1 मिशन के जरिए चंद्रमा को एक्स्प्लोर किया जाएगा। यह स्पेसक्राफ्ट चार से छह सप्ताह में पृथ्वी से 280,000 मील की यात्रा करेगा। हालांकि मिशन की लॉन्चिंग में देरी हुई है। नासा ने पिछले साल नवंबर में आर्टेमिस-1 को लॉन्च करने की योजना बनाई थी। तब से अबतक इसमें देरी ही हो रही है।
आर्टेमिस प्रोग्राम एक व्यापक और विविध अंतरराष्ट्रीय गठबंधन पर निर्भर है। इस समझौते में शामिल होने के बाद अमेरिका और सऊदी अरब मिलकर आउटर स्पेस में अनिश्चितता को कम करेंगे और स्पेस ऑपरेशंस की सुरक्षा में वृद्धि करेंगे। सऊदी अरब से पहले कई और देश इस समझौते पर हस्ताक्षर कर चुके हैं।
इनमें ऑस्ट्रेलिया, बहरीन, ब्राजील, कनाडा, कोलंबिया, फ्रांस, इजराइल, इटली, जापान, कोरिया गणराज्य, लक्जमबर्ग, मैक्सिको, न्यूजीलैंड, पोलैंड, रोमानिया, सिंगापुर, यूक्रेन, यूएई और ब्रिटेन जैसे देश हैं। समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला सऊदी अरब 21वां देश है।
यह प्रोग्राम अपने तय समय से काफी पीछे है। मई में नासा ने इस मिशन की लॉन्चिंग के लिए कुछ और संभावित तारीखों के बारे में बताया था। एजेंसी जुलाई से दिसंबर 2022 का वक्त लेकर चल रही है। मिशन के तहत ओरियन स्पेसक्राफ्ट को स्पेस लॉन्च सिस्टम (SLS) रॉकेट पर पर अंतरिक्ष में भेजा जाएगा।
बीते दिनों एसएलएस रॉकेट को वेट ड्रेस रिहर्सल से भी गुजारा गया था। कुछ समय पहले ही नासा ने बताया था कि उसकी टीमें आर्टेमिस मिशन के प्रमुख हिस्सों को भी टेस्ट कर रही हैं, जिन्हें पहले दो मिशन के बाद लॉन्च किया जाना है। ये आर्टिमिस-3, 4 और 5 मिशन होंगे।
पानी (Water) तो पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में है, लेकिन स्वच्छ, पीने योग्य और सुरक्षित पानी (Safe and drinking Water) दुर्लभ है | दुनिया के बहुत से लोग साफ और सुरक्षित पानी से आज भी वंचित हैं. लेकिन साफ पानी हासिल करना इतना मुश्किल भी नहीं है | पानी के कई स्रोत होते हैं जिनमें महासागर, नदी, तालाब, जमीन के अंदर का पानी, बारिश का पानी (Rainwater) प्रमुख हैं | यहां हम बात करेंगे कि बारिश का पानी कितना शुद्ध होता है और क्या वह पीने योग्य होता भी है या नहीं और उसका वायु प्रदूषण से क्या संबंध है |
बारिश – पानी का सबसे शुद्ध रूप
बारिश के पानी को लेकर लोगों में कई तरह की भ्रांतियां हैं, लेकिन सच यही है कि यही पानी का सबसे शुद्ध रूप होता है | एक समय था पानी की कमी नहीं मानी जाती थी | तालाब, कुएं नदी सब जगह पर पानी उपलब्ध होता था | छोटी छोटी नदियां तक 12 महीने बहा करती थीं | बारिश के पानी में बच्चे नहाया करते थे और अपना मुंह खोल कर पानी पी लिया करते थे | उन्हें बारिश का पानी साफ है कि नहीं सोचने की जरूरत नहीं पड़ती थी |
बोतलबंद पानी की शुरुआत
आज हम धीरे धीरे शुद्ध पानी के नाम पर बोतलबंद पानी को ही प्राथमिकता देते हैं | बारिश आते ही हम बच्चों से कहते हैं कि बारिश में ना रहो बल्कि अंदर आ जाओ. लेकिन क्या आज किसी से कहा जा सकता है कि बोतलबंद पानी की जगह बारिश का पानी पीजिए | लेकिन इस बात के प्रमाण हैं जो दर्शाते हैं कि बोतलबंद पानी की शुरुआत बारिश के पानी से हुई थी |
बारिश के पानी की शुद्धता
नदियों और नहरों में अधिकांश पानी बारिश का पानी होता है | यहां तक का नलों में आने वाला पानी का मुख्य स्रोत बारिश होता है | प्राकृतिक संसार में भी चल चक्र में शीर्श पर बारिश का पानी होता है | बादलों में पानी पहुंचता है वह वाष्पीकरण की प्रक्रिया से पहुंचता है जिसके बाद बारिश के जरिए धरती पर पहुंचने तक वह शुद्ध ही रहता है |
कैसे प्रदूषित होता है पानी
दुनिया में धरती पर कोई पानी हो, वह बारिश के पानी से ही आया है | जब वजह जमीन के अंदर जाता है तो मिनिरल वाटर हो जाता है क्योंकि उसमें जमीन के नीचे के खनिज घुल जाते हैं | ये पानी फिर भी तुलनात्मक रूप से पाने के लिहाज से सुरक्षित और साफ होता है | बारिश का पानी जहां जाता है उसी के अनुकूल हो जाता है | कचरे पर गिरता है तो वह प्रदूषित हो जाता है |
सबसे शुद्ध कब होता है बारिश का पानी
यह भी एक सच है कि पानी जितना फैलता है यानि ज्यादा जगह जाता है उसमें प्रदूषण मिलने की संभावना ज्यादा होती जाती है | और उसके बाद हमें उसके शुद्धिकरण की कीमत अदा करते हैं | इस तरह सबसे शुद्ध पानी बारिश का वह पानी होता है जो जमीन पर नहीं पहुंच हो | प्राकृतिक रूप से यही सबसे शुद्ध पानी होता है | इसलिए हमें इसे प्रदूषित होने से पहले ही हासिल करने के प्रयास करना चाहिए |
आखिर पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमने (Rotation of Earth) कैसे लगी | सौरमंडल (Solar System) और उसके साथ पृथ्वी का निर्माण कैसे हुआ | इसकी व्याख्या भी सौरमंडल के निर्माण की शुरुआत में छिपी है | आइये इसके बारे में जानते है –
नेबुला का निर्माण
आज से 4.57 अरब साल पहले जब हमारे सौरमंडल का निर्माण हो रहा था, तब वह केवल एक गैस के बादल से बना था जिसे नेबुला कहते हैं | ये धूल और गैस गुरुत्व के बल के कारण जमा होते गए जो पहले से वृत्ताकार में घूम रहे थे. लेकिन जैसे ही ये सब एक जगह पर जमा होने लगे तब वे सूर्य और और ग्रहों का निर्माण होने लगा |
पृथ्वी केघूर्णन की शुरुआत
इसी निर्माण के दौरान ही ये पिंड अपना कोई आकार लेने से पहले ही घूर्णन करने लगे थे और यह घूर्णन की गति तेज होने लगी थी | जब आप किसी घूमते हुए पिंड को और भी सघन करते हैं तो उसकी घूमने की गति और भी तेज हो जाती है यह बिलकुल ऐसा ही है जब आइस स्केटर घूमती है तो अपनी गति को बढ़ाने के लिए अपने साथ समेट लेती है और उसकी गति अपने आप बढ़ जाती है |
जब जमा होने लगा पदार्थ
जब धूल और गैस के झुंड में सभी चट्टानें एक साथ आना शुरू हुईं उससे ग्रह या हमारी पृथ्वी भी और तेजी से घूमने लगी | इस तरह से पृथ्वी अपने निर्माण के दौरान ही घूमने लगी थी और तब से अब तक घूम ही रही है, लेकिन सवाल यह है कि आखिर वह अब भी क्यों घूम रह है | सैद्धांतिक रूप से कोई भी घूमने वाला पिंड हमेशा के लिए ही घूमता रहेगा, जब तक हम या तो उसमें कोई ऊर्जा ना जोड़ दें या फिर उससे कोई ऊर्जा निकाल ना लें |
ऊर्जा का कम होना
जब कोई लट्टू घूमता है तो हम पहले शुरुआत में उसमें ऊर्जा जोड़ कर उसकी घूर्णन शुरूकरते हैं और पृथ्वी से हो रहे घर्षण से उसकी ऊर्जा कम होती जाती है और धीरे धीरे उसका घूर्णन बंद हो जाता है | घर्षण ही के कारण पिंड की घिस कर या फिर खिंच कर ऊर्जा चली जाती है. गाड़ियों में ब्रेक से गति धीमी होने का कारण घर्षण ही है |
कुछ रोक नहीं रहा है पृथ्वी को
इसी तरह की अवधारणा पर फिजिट स्पिनर खिलौने में भी उपयोग में लाई जाती है. उन्हें बनाते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि जब वे घूमें तो घर्षण कम से कम हो इसी लिए वे इतना लंबे समय तक घूम पाते हैं | अब पृथ्वी अंतरिक्ष में तैरता हुआ पिंड है | वह अब भी घूमता ही रहेगा जब तक कि कुछ से धीमा नहीं करता, लेकिन पृथ्वी इतनी बड़ी है कि उसकी घूर्णन को रोकने के लिए बहुत ही ज्यादा ऊर्जा की जरूरत होगी |
वायुमंडल भी नहीं रोक पाता है यह घूर्णन
पृथ्वी की घूमने की गति इतनी तेज है कि उससे जमीन तो उसके साथ घूम ही रही है, इतना भारी वायुमडंल भी उसके साथ ही घूम रहा है और उसका घर्षण उसे धीमा नहीं कर सकता है | यही वजह है कि पृथ्वी इतने समय से लगातार घूर्णन करती जा रही है और रुकने का नाम नहीं ले रही है |
लेकिन फिर भी चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल जो महासागरों में ज्वार भाटा पैदा करता है, बहुत ही धीमी गति से पृथ्वी के घूर्णन को धीमा कर रहा है | इसी तरह से सूर्य का गुरुत्वाकर्षण भी धरती को धीमा कर रहा है | वहीं अगर कोई क्षुद्रग्रह जैसे विशाल पिंड पृथ्वी से टकरा जाए तो पृथ्वी का घूर्णन धीमा कर देगा | वैज्ञानिकों को लगता है कि यूरेनस ग्रह के साथ ऐसा ही हुआ था | पृथ्वी के अलावा सौरमंडल के बाकी ग्रह भी घूमते हैं और उनकी घूर्णन की गति अलग अलग होती है इसलिए उनके दिन की लंबाई भी अलग अलग होती है |
चीन के दक्षिण-पश्चिम में स्थित सिचुआन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक खास रोबोटिक मछली (Robot Fish) बनाई है. जो माइक्रोप्लास्टिक (Microplastics) खाती है.
इसे विकसित करने वाले वैज्ञानिक वांग युयान ने कहा कि यह मछली छूने में एकदम असली मछली जैसी महसूस होती है.
इसकी लंबाई मात्र 1.3 सेंटीमीटर यानी आधा इंच है.
यह रोबोटिक मछली छिछले पानी में माइक्रोप्लास्टिक को अपने अंदर खींच लेती है.
These 1.3 cm long robotic fish developed by scientists from China’s Sichuan University can eat microplastics from water, proving to be potentially helpful in cleaning oceans. Read more here https://t.co/rbPPid2qy9pic.twitter.com/HxOfxHeoDX
— Reuters Science News (@ReutersScience) July 13, 2022
इसे इतना छोटा और हल्का रोबोट फिश बनाया गया है कि इसका उपयोग कई तरह से कर सकते हैं. यह बायोमेडिकल और घातक ऑपरेशंस में भी काम आ सकता है.
भविष्य में इसे इतना छोटा बनाया जाएगा कि ये आपके शरीर के किसी भी हिस्से में मौजूद बीमारी को ठीक कर सके.
फिलहाल यह रोबोटिक मछली नीयर-इंफ्रारेड लाइट (NIR) की दिशा में आगे बढ़ती है.
यह रोशनी देखकर चलती है. वैज्ञानिक रोशनी कम ज्यादा करके इसकी दिशा और गति को नियंत्रित कर सकते हैं.
अगर इस मछली को समुद्र में किसी बड़ी मछली ने खा भी लिया तो कोई दिक्कत नहीं है. इसका शरीर पॉलीयूरीथेन से बना है. जो जैविक तरीके से गल जाता है.
रोबोटिक मछली (Robotic Fish) यह अपनी शरीर से करीप पौने तीन गुना ज्यादा दूरी प्रति सेकेंड की गति से कवर करती है. यह दुनिया में बनाए गए अभी तक के सबसे नरम रोबोट्स में सबसे तेज गति से चलने वाली रोबोट है.
अब वैज्ञानिकों की टीम इस काम में लगी है कि किसी तरह इसे समुद्री गहराई में गोते लगाने लायक बनाया जा सके. इसके जरिए वैज्ञानिक समुद्री प्रदूषण को खत्म करने का प्रयास करना चाहते हैं.
एस्टरॉयड्स (asteroids) का पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने के लिए चीनी रिसर्चर्स एक नई मेथड पर काम कर रहे हैं। इस मेथड के तहत 20 से ज्यादा बड़े एंटीना को मिलाकर एक सारणी (Array) बनाई जा रही है, ताकि एस्टरॉयड्स से सिग्नलों को बाउंस किया जा सके। प्रोजेक्ट का नाम चाइना फुयान अंग्रेजी में – कंपाउंड आई है, जिसे बीजिंग इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी लीड कर रहा है। इस मेथड को सितम्बर 2022 में टेस्ट किया जाना है l
इसके अलावा, अप्रैल में ग्लोबल टाइम्स ने बताया था कि देश की अंतरिक्ष एजेंसी एक नया मॉनिटरिंग और डिफेंस सिस्टम विकसित कर रही है। इसकी टेस्टिंग जानबूझकर एक अंतरिक्ष यान को एस्टरॉयड के साथ दुर्घटनाग्रस्त करके की जाएगी। रिपोर्टों में आगे कहा गया है कि नया मिशन 2025 की शुरुआत में एक खतरनाक एस्टरॉयड की कक्षा बदलने और उस पर अटैक करने के लिए लॉन्च किया जाएगा।
चीनी रिसर्चर्स के एस्टरॉयड्स (asteroids) पर किये गये इस मेथड से यह जाननें में मदद मिलेगी कि स्पेस रॉक का कोई विशाल टुकड़ा पृथ्वी के लिए खतरा तो नहीं है। इस मेथड के तहत 20 से ज्यादा बड़े एंटीना को मिलाकर एक सारणी (array) बनाई जा रही है, ताकि एस्टरॉयड्स से सिग्नलों को बाउंस किया जा सके और निर्धारित किया जा सके कि वे हमारे ग्रह को प्रभावित कर सकते हैं या नहीं। इस प्रोजेक्ट में कुछ चीनी विश्वविद्यालय शामिल हैं। इसके बारे में सबसे पहले डिटेल चीन के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के ऑफिशियल न्यूज पेपर- साइंस एंड टेक्नॉलजी डेली में पब्लिश हुई थी।
चीन के मंत्रालय के अनुसार, इस प्रोजेक्ट का नाम चाइना फुयान अंग्रेजी में – कंपाउंड आई है और इस प्रोजेक्ट को बीजिंग इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी लीड कर रहा है। सिग्नल बाउंसिंग के लिए चुने गए एस्टरॉयड पृथ्वी से 93 मिलियन मील (150 मिलियन किलोमीटर) की दूरी पर मौजूद रहेंगे।
स्पेसडॉटकॉम की रिपोर्ट के अनुसार, प्रोजेक्ट के तहत दो एंटीना दक्षिणी चीन के चोंगकिंग में एक साइट पर बनाए गए हैं इस एंटीना का व्यास 82 से 98 फीट होगा। । सितंबर में इन्हें टेस्ट किया जाएगा। टेस्टिंग अगर सफल रहती है, तो उसके बाद इन्हें शुरू कर दिया जाएगा।
बीजिंग इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी के प्रेसिडेंट लॉन्ग टेंग ने ग्लोबल टाइम्स को बताया कि यह प्रोजेक्ट देश की उन जरूरतों को पूरा करेगा, जिनमें पृथ्वी के नजदीकी इलाके की सुरक्षा और एस्टरॉयड के निर्माण से जुड़े शोध शामिल हैं। रिसर्चर ने कहा कि यह सिस्टम को पृथ्वी की कक्षा में उपग्रहों और मलबे को ट्रैक करने के लिए भी लागू किया जा सकता है।
हाल ही में सोशल मीडिया यूजर्स के लिए इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (International Space Station) ने एक सवाल-जवाब का सेशन रखा।
मौका था जब स्पेस स्टेशन के दो अंतरिक्ष यात्री 7 घंटे का स्पेसवॉक करके स्पेस स्टेशन में वापस लौटे थे। इनमें एक जापान के अखिखो होशिदे और दूसरे फ्रांस के थोमस पेस्क्वेस्ट थे। दोनों ही यात्रियों से ट्विटर यूजर्स ने कई उत्सुकता भरे सवाल किए। अखिखो होशिदे और थोमस पेस्क्वेस्ट स्पेसशिप से बाहर एक सपोर्ट ब्रेकेट को इंस्टॉल करने के लिए निकले थे, ताकि आने वाले समय में स्पेस स्टेशन से तीसरा सोलर एर्रे अटैच किया जा सके। दोनों अंतरिक्ष यात्रियों ने अपना मिशन सफलतापूर्वक पूरा किया। इस साल के अंदर होने वाला यह 12वां स्पेसवॉक था।
इस बातचीत के दौरान एक यूजर ने पूछा कि क्या उनके अंतरिक्ष सूट के अंदर तापमान में कुछ अंतर महसूस होता है? ISS के ऑफिशिअल ट्विटर हैंडल से जवाब आया, ” स्पेसवॉक करने वाले अंतरिक्ष यात्री हर 90 मिनट में एक सूर्योदय और सूर्यास्त महसूस करते हैं।” साथ ही उन्होंने तापमान में अंतर वाली बात पर जो खुलासा किया, वह भी चौंकाने वाला था।
इस अद्भुत घटना के बारे में विस्तार से बताते हुए नासा के एक्सपर्ट ने कहा कि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन हर 90 मिनट के अंदर पृथ्वी का गोल चक्कर काट लेता है जिससे हर 45 मिनट के अंदर उनको एक सूर्यास्त और अगले 45 मिनट के अंदर एक सूर्योदय दिखाई देता है। यानि कि हर 90 मिनट में वो एक सूर्योदय और सूर्यास्त देख लेते हैं। इसके अलावा ये भी बताया कि इस दौरान तापमान में भारी अंतर आता है। सूर्यास्त के समय तापमान -250 डिग्री और सूर्योदय के समय यह 250 डिग्री फॉरेनहाइट होता है। स्पेस सूटों में इस तरह के कपड़े का इस्तेमाल किया गया होता है कि उनके ऊपर इस बदलते तापमान का ज्यादा असर नहीं पड़ता है।
चूंकि नासा ने इस साल इंटरनेशनल स्पेसस्टेशन को कमर्शियल इस्तेमाल के लिए भी खोल दिया है, इसलिए वहां पर ऊर्जा की खपत भी बढ़ गई है। इसलिए टीम वहां पर मौजूद 8 चैनलों में से 6 चैनलों को अपग्रेड करने पर काम कर रही है ताकि आने वाले समय में पर्याप्त पावर सप्लाई उपलब्ध हो सके।
जब हम सपने देखते हैं, तो हमारे दिमाग में कुछ रहस्यमय चीजें होती हैं. ऐसा लगता है जैसे हम जाग रहे हों, लेकिन यह स्थिति जागने से काफी अलग होती है. वैज्ञानिक इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि इन दोनों स्थितियों के बीच क्या होता है. अब एक और सुराग मिला है |
चेतना (Consciousness) की एक खास विशेषता होती है – आवाजों को पहचानने की क्षमता. एक नए अध्ययन से पता चला है कि सोते समय हमारी यह क्षमता काम करना बंद कर देती है. इससे हमें यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि हमारा दिमाग सपने कैसे देखता है |
We Lose One Crucial Feature of Consciousness While We Sleep, an 8-Year Study Reveals https://t.co/h8McI2qGcT
लोगों के जागते और सोते समय उनके दिमाग की मैपिंग (Brain Mapping) करना आसान नहीं होता. इसलिए शोधकर्ताओं ने मिर्गी के रोगियों (Epilepsy patients) पर की जा रही रिसर्च का सहारा लिया |
इज़राइल की तेल अवीव यूनिवर्सिटी (Tel Aviv University, Israel) के न्यूरोसाइंटिस्ट युवल नीर (Yuval Nir) का कहना है कि उन्हें ऐसे खास मेडिकल प्रोसीज़र की मदद मिली जिसमें मिर्गी के रोगियों के दिमाग में इलेक्ट्रोड लगाए गए थे और इलाज के लिए उनके दिमाग के अलग-अलग हिस्सों में हो रही गतिविधियों को मॉनिटर किया गया था |
8 साल तक चला शोध
नीर ने कहा कि मरीजों ने सोते और जागते समय, सुनने की स्थिति (Auditory stimulation) पर दिमाग की प्रतिक्रिया जानने में शोधकर्ताओं की मदद की | अब, इलेक्ट्रोड की मदद से, शोधकर्ता नींद की अलग-अलग अवस्थाओं और जागते हुए, सेरिब्रल कॉर्टेक्स (Cerebral cortex) की प्रतिक्रिया में अंतर देख पा रहे थे. रिसर्च के लिए, शोधकर्ताओं ने मरीज़ों को सोते समय स्पीकर से अलग-अलग तरह की आवाज़ें सुनाईं. यह शोध करीब आठ सालों तक चला | इस दौरान करीब 700 से ज़्यादा न्यूरॉन्स का डेटा इकट्ठा किया गया |
शोधकर्ताओं ने पाया कि नींद के दौरान भी मरीज़ों का दिमाग आवाजों के प्रति प्रतिक्रियाएं देता रहा. ध्यान और अपेक्षा से जुड़ी वेव्स, अल्फा-बीटा वेव्स (Alpha-beta waves) का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया | इसका मतलब था कि मरीजों के दिमाग ने आने वाली आवाजों का विश्लेषण तो किया, लेकिन दिमाग ने उस विश्लेषण के नतीजे, चेतना को नहीं भेजे. पहले ये माना जाता था कि नींद के दौरान, आवाजों से जुडे संकेत, दिमाग में बहुत जल्दी खत्म हो जाते हैं. जबकि इस शोध से पता चला है कि ये वास्तव में ज़्यादा मजबूत बने रहते हैं |
अल्फा-बीटा वेव्स के पैटर्न में बढ़ोतरी वाला बदलाव पहले उन मरीज़ों में भी देखा गया था जिन्हें एनेस्थीसिया दिया गया था |
इससे वैज्ञानिकों को ये मापने का एक विश्वसनीय तरीका भी मिलता है कि मरीज कोमा में या ऑपरेशन के दौरान वास्तव में बेहोश है या नहीं |