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  • गुरुत्व-केन्द्र (Centre of Gravity) क्या है ?

    What is Centre of Gravity ?

    परिभाषा

    गुरुत्व केन्द्र वह बिन्दु है, जहां वस्तु का समस्त भार कार्य करता है, किसी पिण्ड का गुरुत्व केन्द्र तब तक स्थिर रहता है जब तक उसका आकार नहीं बदलता। किसी वस्तु का भार गुरुत्व केन्द्र से ठीक नीचे की ओर कार्य करता है।

    गुरुत्व-केन्द्र की स्थिति (Position of Centre of Gravity)

    पिण्ड का गुरुत्व-केन्द्र तब तक स्थिर रहता है जब तक उसका आकार नहीं बदलता। सुडौल पिण्डों का गुरुत्व-केन्द्र उनके आकार से ज्ञात किया जाता सकता है।

    सन्तुलन के प्रकार (Kinds of Equilibria)

    सन्तुलन तीन प्रकार का होता है स्थायी, अस्थायी तथा उदासीन ।

    1. स्थायी सन्तुलन (Stable Equilibrium): यदि किसी वस्तु को उसकी सन्तुलन स्थिति से थोड़ा-सा विस्थापित करने पर उसका गुरुत्व केन्द्र G कुछ ऊपर उठता है, तथा छोड़ देने पर वस्तु पुनः अपनी पहली स्थिति में आ जाती है तो उसका सन्तुलन ‘स्थायी’ कहलाता है।

    2. अस्थायी सन्तुलन (Unstable Equilibrium): यदि वस्तु को सन्तुलन को स्थिति से थोड़ा-सा विस्थापित करने पर उसका गुरुत्व-केन्द्र G कुछ नीचे आ जाता है तथा छोड़ देने पर वस्तु अपनी पहली स्थिति में नहीं आती बल्कि उस स्थिति से और हट जाती है अर्थात् गिर पड़ती है, तो उसका सन्तुलन ‘अस्थायी’ कहलाता है।

    3. उदासीन सन्तुलन (Neutral Equilibrium): यदि वस्तु को सन्तुलन की स्थिति से थोड़ा-सा विस्थापित करने पर उसका गुरुत्व-केन्द्र G उसी ऊंचाई पर बना रहता है तथा छोड़ देने पर वस्तु अपनी नई स्थिति में ही सन्तुलित हो जाती है, तो उसका सन्तुलन ‘उदासीन’ कहलाता है।

    स्थायी सन्तुलन की शर्ते

    किसी वस्तु के स्थायी सन्तुलन के लिए दो शर्तों का पूरा होना आवश्यक है:

    1. वस्तु का गुरुत्व-केन्द्र अधिक-से-अधिक नीचा होना चाहिए: नुकीली पेन्सिल अपनी नोंक पर सन्तुलित नहीं होती, परन्तु यदि पेन्सिल की साइड के निचले भाग में दोनों तरफ चाकू धंसा दें तो वह सुगमता से सन्तुलित हो जाती है। कारण स्पष्ट है, चाकू धंसाने पर पेन्सिल का (चाकू सहित) निचला भाग भारी हो जाता है जिससे उसका गुरुत्व-केन्द्र नीचा हो जाता है। अतः सन्तुलन का स्थायित्व बढ़ जाता है।

    2. गुरुत्व-केन्द्र से होकर जाने वाली ऊर्ध्वाधर रेखा वस्तु के आधार से गुजरनी चाहिए: वस्तु का सन्तुलन तभी तक सम्भव है जब तक कि उसके गुरुत्व-केन्द्र में होकर खींची गई ऊर्ध्वाधर रेखा वस्तु के आधार में होकर गुजरती है। अत: वस्तु का आधार जितना अधिक फैला हुआ होगा, वस्तु का सन्तुलन उतना ही अधिक स्थायी होगा।

    उदाहरण:

    पीसा की ऐतिहासिक मीनार तिरछी होते हुए भी नहीं गिरती क्योंकि उसके गुरुत्व-केन्द्र से गुजरने वाली ऊर्ध्वाधर रेखा उसके आधार से होकर जाती है।

    जहाजों की तली (Bottom) में भारी पदार्थ भरा जाता है, इससे पूरे जहाज का गुरुत्व-केन्द्र नीचा हो जाता है और उसका सन्तुलन अधिक स्थायी हो जाता है।

    टेबिल लैम्प, बर्नर, फ्लास्क, बोतल, इत्यादि के आधार भी इसी कारण चौड़े व भारी बनाए जाते हैं।

    पहाड़ पर चढ़ते समय अथवा अपनी पीठ पर भारी बोझ लेकर चलने वाला मनुष्य आगे की ओर झुक जाता है, जिससे कि उसका आधार बढ़ जाता है और उसके गुरुत्व-केन्द्र से जाने वाली ऊर्ध्वाधर रेखा उसके पैरों के पास आधार से होकर जाती है और वह अपने सन्तुलन को बनाए रखता है।

    दो मंजिल वाली बसों (Double) में नीचे वाली मंजिल में अधिक यात्री बिठाए जाते हैं तथा ऊपर वाली में कम, ताकि यात्रियों सहित बस का गुरुत्व-केन्द्र नीचा ही रहे तथा ऊंची-नीची सड़क आने पर बस के उलटने का भय न रहे।

  • बल-आघूर्ण (Moment of Force) क्या है ?

    What is Moment of Force ?

    परिभाषा

    जब किसी पिण्ड पर लगा बाह्य बल उसे किसी अक्ष के परितः घुमाने का प्रयास करता है, तो बल की इस प्रवृत्ति को बल आघूर्ण कहते हैं।

    घूर्णन गति

    यदि हम किसी पिण्ड को एक बिन्दु पर स्थिर करके उसके किसी अन्य बिन्दु पर एक बल लगाएं (जिसकी क्रिया-रेखा पर स्थिर बिन्दु न हो) तो वह पिण्ड स्थिर बिन्दु के परितः घूमने लगता है। इस गति को ‘घूर्णन गति’ कहते हैं।

    बल द्वारा एक पिण्ड को एक अक्ष के परितः घुमाने की प्रवृत्ति को ‘बल-आघूर्ण’ कहते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल बल के परिमाण पर निर्भर करती है अपितु अक्ष से बल की क्रिया-रेखा के बीच की लम्बवत् दूरी पर भी निर्भर करती है। अत: किसी अक्ष (या बिन्दु) के परित: एक बल का बल-आघूर्ण उस बल के परिमाण तथा अक्ष (या बिन्दु) से बल की क्रिया-रेखा के बीच की लम्बवत् दूरी के गुणनफल के बराबर होता है।

    यदि किसी बल को अक्ष से अधिक दूरी पर लगाया जाए तो उसका बल-आघूर्ण अधिक होगा। उदाहरण :

    नट और बोल्ट को कसने (Screwing) या खोलने (Unscrewing) के लिए प्रयुक्त किए जाने वाला पाना या स्पैनर (Spanner) इसी सिदान्त पर कार्य करते है l

    जब दरवाजे को खोलने के लिए हम बल को कब्जे (Hinge) के बहुत पास लगाते हैं तो हम उसे नहीं खोल पाते हैं, परन्तु कब्जे से दूर थोड़ा बल लगाने पर ही दरवाजा खुल जाता है।

    आटा पीसने की हाथ की चक्की में हत्था किनारे पर लगाते हैं जिससे आघूर्ण भुजा बढ़ जाती है और कम बल लगाना पड़ता है।

    कुम्हार के चाक में भी घुमाने का डण्डा लगाने के लिए गड्ढा केन्द्र से दूर परिधि के निकट बनाया जाता है जिससे आघूर्ण ऊर्जा बढ़ जाए।

    बल आघूर्ण के सिदान्त पर आधारित मशीनें

    उत्तोलक (Lever), घिरनी या गरारी (Pulley). आनत तल (Inclined plane), स्क्रू जैक, आदि कुछ सरल मशीनों के उदाहरण हैं। सरल मशीन एक ऐसी युक्ति (Device) होती है जिसमें किसी सुविधाजनक बिन्दु पर एक बल लगाकर, किसी अन्य बिन्दु पर रखे हुए एक भार को उठाया जा सकता है।

    याद रखिये l

    मशीन द्वारा यद्यपि कम बल लगाकर अधिक भार उठाया जा सकता है, परन्तु निवेशित ऊर्जा (Input energy) सदैव निर्गत (Output) ऊर्जा से अधिक होती है, क्योंकि ऊर्जा का कुछ अंश घर्षण बलों के विरुद्ध कार्य करने में खर्च हो जाता है। अतः मशीन द्वारा किया गया लाभदायक कार्य दी गई ऊर्जा से कम होता है। अत: मशीन की दक्षता (Efficiency) 100% से कम होती है।

  • अपकेन्द्री बल (Centrifugal Force) क्या है ?

    What is Centrifugal Force ?

    परिभाषा

    अपकेन्द्री बल : जब कोई पिण्ड किसी वृत्तीय मार्ग पर चलता है, तो उस पर मार्ग के केन्द्र की ओर एक बल लगता है जिसे ‘अपकेन्द्री बल’ कहते हैं।

    उदाहरण:

    1. यदि कोई व्यक्ति कार में बैठा है और कार अचानक दाईं ओर घूम जाए, तो व्यक्ति को बाई ओर एक झटका लगता है। इससे व्यक्ति अपने बाईं ओर एक बल लगा हुआ अनुभव करता है, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है। बल्कि होता यह है, कि कार तथा व्यक्ति को दाईं ओर घूमने के लिए आवश्यक अभिकेन्द्री बल चाहिए, कार को तो यह बल सड़क व पहियों के बीच घर्षण से प्राप्त हो जाता है, जबकि व्यक्ति को यह प्राप्त नहीं हो पाता। इसलिए व्यक्ति जड़त्व के कारण अपनी पूर्ववत् सीधी दिशा में गति करने की प्रवृति रखता है और इसीलिए कार के मुड़ते ही वह विपरीत दिशा में झटका खाकर ऐसा अनुभव करता है जैसे कि उस पर कोई बल कार्य कर रहा हो, यही अपकेन्द्री बल है।

    2. घूमते झूले पर खड़ा व्यक्ति यदि झूले की रस्सियों को न पकड़े तो वह बाहर की ओर गिर पड़ता है। इससे यह आभास होता है, कि उस पर बाहर की ओर कोई बल (अपकेन्द्री बल) कार्य करता है जबकि वास्तव में उपर्युक्त व्याख्या की भांति उस पर कोई बल कार्य नहीं करता।

    ३. पृथ्वी पर खड़े व्यक्ति को सूर्य घूमता हुआ प्रतीत होता है, जबकि सूर्य अपनी जगह स्थिर है तथा पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूम रही है। पृथ्वी के घूमने के कारण सूर्य त्वरित प्रतीत होता है अर्थात् सूर्य पर एक बल का अनुभव होता है, यह अपकेन्द्री बल है।

    अपकेन्द्री बल के सिद्धान्त पर आधारित यन्त्र

    अपकेन्द्रित (Centrifuge)

    यह एक ऐसा यन्त्र है जिसकी सहायता से हल्के व भारी कणों को पृथक् किया जाता है। इस प्रकार के यन्त्र के उदाहरण अपकेन्द्रित शोषक (Centrifuge drier), क्रीम निकालने की मशीन (Cream separator), अपकेन्द्र पम्प (Centrifugal pump), आदि हैं।

    क्रीम निकालने की मशीन (Cream Separator) में जब दूध भरकर मशीन को तेजी से घुमाया जाता है, तो क्रीम के कण घूर्णन अक्ष के निकट एकत्रित हो जाते हैं, जबकि दूध के कण बाहर की ओर चले जाते हैं। अत: बर्तन के केन्द्रीय भाग में लगे निकास द्वार से क्रीम तथा बाहरी भाग से दूध निकाल कर अलग कर लिए जाते हैं। दही में से मक्खन भी इसी सिद्धान्त के अनुसार निकलता है।

    अपकेन्द्रित शोषक (Centrifuge Drier) में जब गीले कपड़ों को घुमाया जाता है, तो पानी के कण बाहर की ओर चले जाते हैं क्योंकि पानी के कण कपड़ों से भारी हैं अर्थात् पानी का घनत्व कपड़ों से अधिक होता है। इस प्रकार कपड़े सूख जाते हैं।

  • अभिकेन्द्री बल (Centripetal Forces) क्या है ?

    अभिकेन्द्री बल (Centripetal Forces) क्या है ?

    What is Centripetal Forces ?

    अभिकेन्द्री बल (Centripetal Force)

    जब कोई कण (अथवा पिण्ड) एकसमान चाल v से त्रिज्या । के वृत्तीय मार्ग पर गति करता है तो उस पर अभिकेन्द्री त्वरण लगता है जिसका परिमाण होता है, परन्तु त्वरण की दिशा लगातार बदलती रहती है। त्वरण की दिशा सदैव वृत्त के केन्द्र की ओर रहती है। न्यूटन के द्वितीय नियमानुसार, किसी पिण्ड में त्वरण उत्पन्न करने के लिए, त्वरण की दिशा में ही बल लगाना आवश्यक होता है। अत: हम कह सकते हैं कि कण की वृत्तीय मार्ग में गति बनाए रखने के लिए, वृत्त के केन्द्र की ओर एक बल आवश्यक होता है। इसे ‘अभिकेन्द्री बल’ कहते हैं।

    उदाहरण

    यदि हम एक पत्थर के टुकड़े को किसी डोरी के एक सिरे में बांधकर वृत्ताकार मार्ग में घुमाएं तो हमें डोरी को अन्दर की ओर खींचे रखना पड़ता है। दूसरे शब्दों में, पत्थर के टुकड़े को डोरी से बांधकर घुमाने पर डोरी में उत्पन्न तनाव ही आवश्यक अभिकेन्द्री बल प्रदान करता है। अब यदि हम डोरी के सिरे को हाथ से छोड़ दें तो टुकड़ा वृत्तीय मार्ग को छोड़कर, वृत्त की स्पर्श रेखा के अनुदिश भाग जाता है। इसका कारण यह है, कि डोरी के सिरे को हाथ से छोड़ने पर डोरी में तनाव समाप्त हो जाता है, अत: वृत्तीय मार्ग में गति बनाए रखने के लिए इसे आवश्यक अभिकेन्द्री बल नहीं मिल पाता है। इसलिए पत्थर का टुकड़ा सरल रेखा में चलने लगता है।

    सूर्य के चारों ओर ग्रहों की गति तथा ग्रहों के चारों ओर प्राकृतिक व कृत्रिम उपग्रहों की गति के लिए गुरुत्वाकर्षण बल, आवश्यक अभिकेन्द्री बल प्रदान करता है। परमाणु के नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉन की वृत्ताकार गति के लिए विद्युत आकर्षण बल, आवश्यक अभिकेन्द्री बल प्रदान करता है, किसी मोड़ पर रेल (अथवा कार या मोटर, आदि), के मुड़ने समय पहियों व सड़क के मध्य लगने वाला घर्षण बल, आवश्यक अभिकेन्द्री बल प्रदान करता है।

    अभिकेन्द्री बल की प्रतिक्रिया (Reaction of Centripetal Force)

    न्यूटन के गति के तीसरे नियम के अनुसार, प्रत्येक क्रिया (Action) के बराबर तथा विपरीत एक प्रतिक्रिया (Reaction) होती है, क्रिया तथा प्रतिक्रिया सदैव अलग-अलग वस्तुओं पर कार्य करती है। अत: वृत्तीय पथ पर गतिमान वस्तु पर कार्य करने वाले अभिकेन्द्री बल की भी प्रतिक्रिया होती है।

    उदाहरण

    1. जब हम पत्थर को डोरी से बांधकर वृत्तीय पथ में घुमाते हैं, तो हमारा हाथ डोरी के तनाव द्वारा वृत्त के केन्द्र की ओर अभिकेन्द्री बल (क्रिया) लगाता है जबकि पत्थर हमारे हाथ पर बाहर की ओर प्रतिक्रिया बल लगाता है।

    2. ‘मौत के कुएं’ में कुएं की दीवार मोटर साइकिल पर अन्दर की ओर क्रिया बल लगाती है, जबकि इसका प्रतिक्रिया बल मोटर साइकिल द्वारा कुएं की दीवार पर बाहर की ओर कार्य करता है।

    3. पृथ्वी चन्द्रमा पर अन्दर की ओर अभिकेन्द्री बल (गुरुत्वाकर्षण बल) लगाती है जबकि चन्द्रमा पृथ्वी पर प्रतिक्रिया बल बाहर की ओर लगाता है।

  • घर्षण बल (Force of Friction) क्या है ?

    घर्षण बल (Force of Friction) क्या है ?

    घर्षण बल

    जब मेज पर रखी किसी वस्तु को धीरे से धक्का देते हैं तो वह आगे नहीं बढ़ती है। इसका अर्थ है, कि सम्पर्क में रखी दो वस्तुओं के मध्य एक प्रकार का बल कार्य करता है जो दोनों वस्तुओं के बीच आपेक्षिक गति का विरोध करता है। यह बल ही ‘घर्षण बल’ कहलाता है। इसे ही ‘घर्षण’ कहते हैं। इसकी दिशा सदैव वस्तु की गति की दिशा के विपरीत होती है।

    घर्षण का मुख्य कारण वस्तुओं की सतह का खुरदरा होना है। यदि हम ध्यान से सड़क, मेज, कैरम-बोर्ड, आदि की सतह को देखें तो हमें ज्ञात होगा कि इनकी सतह चिकनी तथा सपाट नहीं होती l लेकिन बहुत अधिक चिकनी तथा सपाट सतहों के मध्य भी घर्षण होता है। इसका कारण है, कि जब दो अणुओं के मध्य बहुत कम दूरी होती है तो वे परस्पर आकर्षण बल लगाते हैं और गति का विरोध करते हैं l

    घर्षण बल के उपयोग

    • घर्षण बल के कारण ही मनुष्य सीधा खड़ा रहता है।
    • यदि सड़कों पर घर्षण न हो तो पट्टा मोटर के पहिए को नहीं घुमा सकेगा।
    • यदि पट्टा तथा पुली के बीच घर्षण न हो तो पट्टा मोटर के पहिए को नहीं घुमा सकेगा।
    • घर्षण बल न होने पर हम केले के छिलके तथा बरसात में चिकनी सड़क पर फिसल जाते हैं।

    घर्षण से हानि

    सभी प्रकार की मशीनों में घर्षण के कारण अति ऊष्मा पैदा होती है और मशीन के चल हिस्से (Moving parts) घिस जाते हैं।

    उदाहरण

    वैसे पदार्थ जो दो सतहों के बीच घर्षण कम करते हैं ‘स्नेहक (Lubrication)’ कहलाते हैं तथा घर्षण को स्नेहकों की सहायता से कम करने की विधि को स्नेहन कहा जाता है। तेल, ग्रीज, आदि उपस्नेहकों से घर्षण का मान न्यूनतम हो जाता है। तेल, वैसलीन, आदि पदार्थ सस्पर्श-तलों के बीच एक पतली परत बना देते हैं, जिसके कारण रगड़ खाने वाले दोनों तल सीधे सम्पर्क में नहीं आते। फलतः रगड़ भी कम होती है और पुर्जे भी जल्दी नहीं घिसते हैं।

    घर्षण कम करने के लिए घिसने वाली दो सतहों के बीच धातु की गोली डाली जाती है। फलत: विसी घर्षण का परिवर्तन लोटनिक घर्षण में हो जाता है। हम जानते हैं कि लोटनिक घर्षण का मान विसी घर्षण से कम होता है। अत: बॉल बेयरिंग के प्रयोग से घर्षण का परिमाण घट जाता है। साइकिल के चक्के, हैण्डिल, पैडिल, आदि में इस प्रकार की बॉल बेयरिंग विधि का प्रयोग होता है।

  • बल का आवेग (Impulse of a Force) क्या है ?

    बल का आवेग (Impulse of a Force) क्या है ?

    किसी वस्तु पर आरोपित बल और बल के कार्य करने के समय के गुणनफल को उस बल का आवेग’ कहा जाता है जो वस्तु के संवेग के परिवर्तन के बराबर होता है। आवेग एक सदिश राशि है जिसका मात्रक ‘न्यूटन सेकण्ड’ (Ns) होता है तथा इसकी दिशा वही होती है जो बल की होती दैनिक जीवन में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जबकि किसी वस्तु को आवेग देने के लिए एक बड़ा बल बहुत थोड़े समयान्तराल के लिए लगाया जाता है, जैसे बल्ले द्वारा क्रिकेट की गेंद पर चोट मारकर गेंद को दूर भेजना, छड़ी द्वारा पिंग-पोंग की गेंद को पाले में भेजना, हथौड़े द्वारा कील ठोकना, इत्यादि।

    उदाहरण

    खिलाड़ी क्रिकेट की गेंद का ‘कैच’ लेते समय अपना हाथ पीछे खींचता है। इसका कारण है, कि जब खिलाड़ी गेंद को रोक लेता है तो गेंद का संवग शून्य हो जाता है। संवेग-परिवर्तन के लिए खिलाड़ी गेंद को जितने अधिक समय में रोकेगा, आवेग देने के लिए उसे ङ्केउता ही काम बला लगाना पड़ेगा।

    इसलिए वह गंद के अंगुलियों के बीच में आते ही अपना हाथ पीछे की ओर खींचता है जिससे कि वह गेंद पर अधिक समय तक बल लगा सके। यदि वह अपने हाथ को पीछे नहीं खींचे तो गेंद हथेली से टकराकर तुरन्त ही ठहर जाएगी अर्थात् उसका संवेग यकायक शून्य हो जाएगा। अत: खिलाड़ी को बहुत अधिक बल लगाना पड़ेगा जिससे उसके हाथ में चोट आने का भय रहेगा।

    यदि हम कुछ ऊंचाई से पक्के फर्श पर कूद जाएं तो फर्श द्वारा हमारे पैर को दिए गए आवेग के कारण हमारा संवेग ‘यकायक’ शून्य हो जाएगा। यह आवेग एक बड़े बल का होगा जिसके कारण हमारे पैर में चोट आ जाएगी। परन्तु यदि हम फर्श पर मिट्टी अथवा गद्दा बिछा लें तो हमारे पैर उसमें धंसेंगे (अर्थात् धीरे-धीरे गढ़ेंगे) तथा संवेग के शून्य होने में कुछ देर लगेगी। अतः अब हमारे पैर को उतना ही आवेग एक छोटे बल से मिलेगा जिससे कि पैर में चोट नहीं आएगी। यही कारण है, कि कुश्ती लड़ने के अखाड़ों में पोली मिट्टी भरी जाती है।

  • संवेग-संरक्षण का नियम (Law of Conservation of Momentum) क्या है ?

    संवेग-संरक्षण का नियम (Law of Conservation of Momentum) क्या है ?

    यदि कणों के किसी समूह या निकाय (System) पर कोई बाह्य बल नहीं लग रहा हो तो उस निकाय का कुछ संवेग नियत रहता है, अर्थात् संरक्षित रहता है।’ इस कथन को ही ‘संवेग-संरक्षण का नियम’ कहते हैं अर्थात् एक वस्तु में जितना संवेग परिवर्तन होता है, दूसरी में उतना ही संवेग विपरीत दिशा में हो जाता है।

    अर्थात किसी पृथक व्यवस्था (आइसोलेटेड सिस्टम) में दो पिंड टकराएँ, तो उस व्यवस्था का कुल संवेग टकराव के पहले तथा टकराव के बाद संरक्षित (conserved) रहेगा। टकराव के पहले अगर दोनों पिंडों के वेग v1 और V1 है तथा टकराने के बाद v2 और V2, तब
    mv1 + MV1 = mv2 + MV2
    जहाँ m और M दोनों पिंडों के वज़न हैं।

    क्योंकि संवेग एक वेक्टर मात्रा है, यह परिमाण (मैग्नीट्यूड) तथा दिशा (डायरेक्शन) दोनों में संरक्षित रहता है।

    संवेग बनता या नष्ट नहीं होता। उसका बस एक पिंड से दूसरे पिंड में स्थानांतरण हो जाता है।

    उदाहरण के लिय जब कोई गाड़ी किसी दीवार से भिड़ जाती है तो गाड़ी रुक जाती है और दीवार भी वही रहती है। ऐसे में गाड़ी का संवेग नष्ट नहीं होता। बल्कि वह दीवार के अणुओं और धरती में समा जाता है और धरती उस दिशा में और तेज़ी से घूमती है।

    उदाहरण : जब बन्दूक से गोली छोड़ी जाती है तो वह अत्यधिक वेग से आगे की ओर बढ़ती है, जिससे गोली में आगे की दिशा में संवेग उत्पन्न हो जाता है। गोली भी बन्दूक को प्रतिक्रिया बल के कारण पीछे की ओर ढकेलती है, जिससे उसमें पीछे की ओर संवेग उत्पन्न जाता है। चूँकि बन्दूक का द्रव्यमान गोली से अधिक होता है, जिससे बन्दूक के पीछे हटने का वेग गोली के वेग से बहुत कम होता है। यदि दो एकसमान गोलियाँ भारी तथा हल्की बन्दूकों से अलग–अलग दागी जाएँ तो हल्की बन्दूक अधिक वेग से पीछे की ओर हटेगी, जिससे चोट लगने की सम्भावना अधिक होती है। रॉकेट के ऊपर जाने का सिद्धान्त भी संवेग संरक्षण पर आधारित होता है। रॉकेट से गैसें अत्यधिक वेग से पीछे की ओर निकलती हैं तथा रॉकेट को ऊपर उठाने के लिए आवश्यक संवेग प्रदान करती हैं।  

  • संवेग (Momentum) क्या होता है ?

    संवेग (Momentum) क्या होता है ?

    किसी वस्तु के द्रव्यमान तथा वेग के गुणनफल को उस वस्तु का संवेग कहते हैं।

    संवेग = द्रव्यमान (Mass) x वेग (Velocity)

    संवेग एक सदिश राशि है जिसको अंग्रेंजी के ‘P’ अक्षर द्वारा प्रदर्शित किया जाता है जिसकी दिशा वही होती है जो वेग की होती है।

    संवेग गति की मात्रा को संदर्भित करता है । जैसे किसी खेल में कोई टीम जो आगे बढ़ रही है तो हम कहते है कि टीम momentum (गति) में है।

    इसका मात्रक सी.जी.एस. पद्धति में ‘ग्राम-सेमी/सेकण्ड’ या ‘डाइन-सेकण्ड’ तथा एम.के.एस. पद्धति में ‘किग्रा-मीटर/सेकण्ड’ या ‘डाइन-सेकण्ड’ होता है

    यदि दोनों वस्तुओं के द्रव्यमान समान हैं, और जिनमें से एक वस्तु अधिक वेग से चल रही है, तथा दूसरी वस्तु कम वेग से चल रही है, तो अधिक वेग से चलने वाली वस्तु को रोकने में अधिक बल लगाना पड़ेगा। तथा कम वेग से चल रही वस्तु को रोकने में कम बल लगाना पड़ेगा।

  • न्यूटन के गति के नियम (Newton’s Laws of Motion) क्या हैं ?

    न्यूटन के गति के नियम (Newton’s Laws of Motion) क्या हैं ?

    महान अंग्रेज वैज्ञानिक सर आइजक न्यूटन (1642-1727) ने गति के अध्ययन के आधार पर गति के तीन नियमों को 1679 ई. में प्रतिपादित किया जो यान्त्रिकी (Mechanics) के आधारी नियम हैं।

    प्रथम नियम (First Law)

    इस नियम के अनुसार, ‘यदि कोई वस्तु विराम अवस्था में है, तो वह विराम अवस्था में ही रहेगी और यदि यह एकसमान चाल से सीधी रेखा में चल रही है, तो वैसे ही चलती रहेगी. जब तक कि उस पर कोई बाह्य बल (Force) लगाकर उसकी वर्तमान अवस्था में परिवर्तन न किया जाए।’ इसे ‘गैलीलियो का नियम’ भी कहते हैं।

    न्यूटन के प्रथम नियम को ‘जड़त्व का नियम (Law of Inertia) भी कहते हैl

    जड़त्व (Inertia)

    प्रत्येक वस्तु में अपनी विरामावस्था अथवा सरल रेखा में एकसमान गति की अवस्था बनाए रखने की प्रवृत्ति पाई जाती है। वस्तु के इस प्रकृति को जड़त्व कहते हैं। जड़त्व के कारण वस्तु अपने वेग में परिवर्तन होने से रोकता है।

    जड़त्व दो प्रकार का होता है:

    1. विराम का जड़त्व (Inertia of Rest): यदि कोई वस्तु विराम अवस्था में है, तो वह सदैव विराम में ही रहेगी जब तक कि उस पर कोई बाह्य बल लगाकर उसी विराम की अवस्था को बदल नहीं दिया जाता ।

    2. गति का जड़त्व (Inertia of Motion): यदि कोई वस्तु एकसमान चाल से सीधी रेखा में चल रही है, तो वह वैसे ही चलती रहेगी जब तक कि उस पर कोई बाह्य बल लगाकर उसकी गति की अवस्था को बदल नहीं दिया जाता। इस प्रकार, बल वह बाह्य कारक है जिसके द्वारा किसी वस्तु की विराम अथवा गति की अवस्था में परिवर्तन किया जाता है। अत: प्रथम नियम हमें बल की एक परिभाषा प्रदान करता है।

    जड़त्व के कुछ उदाहरण (Some Important Examples of Inertia):

    (i) चलती हुई मोटरकार के अचानक रुकने पर उसमें बैठे यात्री आगे की ओर झुक जाते हैं मोटरकार के रुकने पर उसका फर्श तथा उस पर टिके यात्रियों के पैर तुरन्त ठहर जाते हैं परन्तु शरीर का शेष भाग जड़त्व के कारण अभी गतिशील रहता है इसलिए यात्री आगे की ओर झुक जाते हैं।

    (ii) चलती हुई गाड़ी पर चढ़ने वाले यात्री के पैर गाड़ी पर चढ़ते ही गतिशील हो जाते हैं परन्तु शरीर अभी विराम अवस्था में ही रहता है जिसके कारण यात्री पीछे की ओर गिर पड़ता है। अत: चलती गाड़ी पर चढ़ने से पहले यात्री को कुछ दूर गाड़ी की दिशा में दौड़ना चाहिए।

    न्यूटन का गति का दूसरा नियम (Newton’s Second Law of Motion)

    किसी वस्तु के संवेग-परिवर्तन की दर उस वस्तु पर आरोपित बल के अनुक्रमानुपाती होती है तथा संवेग-परिवर्तन आरोपित बल की दिशा में ही होता है। यदि वस्तु पर बाह्य बल न लगाया जाए तो वस्तु में त्वरण भी उत्पन्न नहीं होगा। त्वरण के शून्य होने का अर्थ है, कि वस्तु या तो विराम अवस्था में ही रहेगी या ‘नियत’ वेग से चलती रहेगी। इस प्रकार, न्यूटन का पहला नियम (गैलीलियो का नियम) दूसरे नियम का ही एक अंग है।

    न्यूटन का गति का तृतीय नियम (Newton’s Third Law of Motion)

    इस नियम के अनुसार, ‘प्रत्येक क्रिया के बराबर, परन्तु विपरीत दिशा में, प्रतिक्रिया होती है।’न्यूटन के तृतीय नियम को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है क्रिया-प्रतिक्रिया बराबर तथा विपरीत दिशा में होता है। अत: न्यूटन के तृतीय नियम को ‘क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम’ भी कहा जाता है। इस नियम के सम्बन्ध में दो बातें महत्त्वपूर्ण हैं -एक तो यह कि हम नहीं कह सकते कि कौन बल क्रिया है और कौन प्रतिक्रिया। दूसरे क्रिया तथा प्रतिक्रिया बल सदैव दो भिन्न-भिन्न वस्तुओं पर कार्य करते हैं, एक पर नहीं। इसलिए वे एक-दूसरे को निरस्त (Cancel) नहीं कर सकते हैं।

    न्यूटन का गति का तृतीय नियम के उदाहरण

    सूर्य पृथ्वी को खींचता है, पृथ्वी भी सूर्य को अपनी ओर उसी बल से खींचती है। पृथ्वी चन्द्रमा को अपनी ओर खींचती है, चन्द्रमा भी पृथ्वी को अपनी ओर उसी बल से खींचता है। चन्द्रमा के इस खिंचाव के कारण ही समुद्र में ज्वार भाटे (Tides) आते हैं।

    रॉकेट में किसी ज्वलनशील पदार्थ को जलाकर गैसें उत्पन्न की जाती हैं, जो नीचे की ओर अत्यन्त तीव्र वेग से एक जेट के रूप में निकलती है। ये गैसें रॉकेट पर ऊपर की ओर प्रतिक्रिया बल लगाती हैं जिससे रॉकेट ऊपर उठ जाता है। गैस के जेट का वेग जितना अधिक होता है रॉकेट भी ऊपर की ओर उतने ही अधिक वेग से उठता है।

  • गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force) क्या होता है  (Hindi me) ? परिभाषा, मात्रक , गुण, नियम और विशेषताएँ

    गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force) क्या होता है (Hindi me) ? परिभाषा, मात्रक , गुण, नियम और विशेषताएँ

    नीचे दिए गये article में हम जानेगे कि गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force) क्या होता है ? गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force) की परिभाषा क्या है ? उसका मात्रक और गुण क्या है ? गुरुत्वाकर्षण बल से जुड़े नियम और विशेषताएं क्या है ?

    जिस बल के कारण दो वस्तुएं एक-दूसरे को अपनी ओर आकर्षित करती है, उसे ‘गुरुत्वाकर्षण बल कहते हैं। गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force ) किन्ही दो वस्तु, पदार्थ अथवा कणों के बीच उपस्थित एक आकर्षण बल है l गुरुत्वाकर्षण बल न सिर्फ पृथ्वी और वस्तुओं के मध्य का आकर्षण बल है बल्कि यह ब्रह्माण्ड में मौजूद हर पदार्थ या वस्तु के बीच मौजूद है। गुरुत्वाकर्षण को उस त्वरण (acceleration) से मापा जाता है जो मुक्त रूप से गिरने वाली वस्तुओं को देता है।

    हर वो वस्तु जिसका द्रव्यमान ( mass)  होता है उसका गुरुत्वाकर्षण भी होता है। सबसे महत्वपुर्ण बात यह है कि अगर किसी वस्तु का द्रव्यमान अधिक है तो उसका गुरुत्वाकर्षण बल अधिक होगा।

    वस्तुएं एक-दूसरे से किसी प्रकार जुड़े बिना भी आपस में गुरुत्वाकर्षण बल लगाती हैं। किसी वस्तु पर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल को प्रायः उस वस्तु पर पृथ्वी का गुरुत्व बल कहा जाता है। उदाहरण के लिए पृथ्वी सूर्य के चारों ओर और चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ही घूमता हैं ।

    न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का नियम

    सर आइजैक न्यूटन (25 दिसम्बर 1642 – 20 मार्च 1726/27]) एक महान गणितज्ञ, भौतिक विज्ञानी और सबसे प्रभावशाली वैज्ञानिक थे ।

    उनकी पुस्तक फिलॉसॉफी नेचुरलिस प्रिंसिपिया मैथमैटिका (Philosophiæ Naturalis Principia Mathematica – प्राकृतिक दर्शन के गणितीय सिद्धांत), पहली बार 1687 में प्रकाशित हुई जिसमे न्यूटन ने गति और सार्वभौमिक गुरुत्वाकर्षण के नियमों को बताया ।

    न्यूटन ने चंद्रमा की गति और पृथ्वी पर स्वतंत्र रूप से गिरने वाले पिंड की गति के बीच संबंध की खोज की।

    न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का नियम पिंडो के मध्य लगने वाले आकर्षण बल का मान ज्ञात करने के लिए काम में लिया जाता है l

    यदि दो पिंडो का द्रव्यमान m1 तथा m2 हो और इन दोनों पिंडो के मध्य की दूरी r हो तो इन दोनों पिंडो के मध्य लगने वाले इस आकर्षण बल (गुरुत्वाकर्षण बल) का मान निम्न सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है

    सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियम

    ग्रहों और चन्द्रमा की गतियों के अपने अध्ययन के दौरान , न्यूटन ने निष्कर्ष निकाला कि गुरुत्वीय आकर्षण न केवल पृथ्वी की ओर गिरते सेव की गति और पृथ्वी के चारो ओर घूर्णन करते चन्द्रमा की गति के लिए उत्तरदायी है बल्कि “ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु प्रत्येक अन्य वस्तु को आकर्षित करती है ” के लिए भी उत्तरदायी है।

    न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम के अनुसार ब्रह्माण्ड में पदार्थ का प्रत्येक कण बल द्वारा प्रत्येक अन्य कण को आकर्षित करता है जो कि कणों के द्रव्यमानों के गुणन के समानुपाती होता है और इनके मध्य की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

    भाष्कराचार्य का गुरुत्वाकर्षण का नियम

    गुरुत्वाकर्षण: “पिताजी, यह पृथ्वी, जिस पर हम निवास करते हैं, किस पर टिकी हुई है?” लीलावती ने शताब्दियों पूर्व यह प्रश्न अपने पिता भास्कराचार्य से पूछा था। इसके उत्तर में भास्कराचार्य ने कहा, “बाले लीलावती !, कुछ लोग जो यह कहते हैं कि यह पृथ्वी शेषनाग, कछुआ या हाथी या अन्य किसी वस्तु पर आधारित है तो वे गलत कहते हैं।

    यदि यह मान भी लिया जाए कि यह किसी वस्तु पर टिकी हुई है तो भी प्रश्न बना रहता है कि वह वस्तु किस पर टिकी हुई है और इस प्रकार कारण का कारण और फिर उसका कारण… यह क्रम चलता रहा, तो न्याय शास्त्र में इसे अनवस्था दोष कहते हैं।

    तब भास्कराचार्य ने कहा, क्यों हम यह नहीं मान सकते कि पृथ्वी किसी भी वस्तु पर आधारित नहीं है। यदि हम यह कहें कि पृथ्वी अपने ही बल से टिकी है और इसे गुरुत्वाकर्षण शक्ति कह दें तो क्या दोष है?

    पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर खींचती है और आकर्षण के कारण वह जमीन पर गिरते हैं। पर जब आकाश में समान ताकत चारों ओर से लगे, तो कोई कैसे गिरे? अर्थात् आकाश में ग्रह निरावलम्ब रहते हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरुत्व शक्तियाँ संतुलन बनाए रखती हैं।

    गुरुत्वाकर्षण बल के गुण या विशेषतायें (properties of gravitational force)

    यह बल प्रकृति में पाए जाने वाले सभी बलों से दुर्बल होता है, दो इलेक्ट्रान के मध्य पाए जाने वाले विद्युत बल का मान गुरुत्वाकर्षण बल से लगभग 1043 गुना होता है।

    यह सार्वत्रिक (Universal) आकर्षण का बल होता है जो ब्रह्माण्ड में उपस्थित प्रत्येक दो पिंडो के मध्य पाया जाता है।

    यह बल हमेशा आकर्षण प्रकृति का होता है जो बहुत कम दूरी पर स्थित पिंडो के बीच भी कार्य करता है और हजारो किलोमीटर दूर स्थित पिंडो के बीच भी कार्य करता है।

    इसका मान दोनों पिंडो के द्रव्यमानो के गुणनफल के समानुपाती व दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

    गुरुत्वाकर्षण बल अन्य पिण्डो की उपस्थिति या अनुपस्थिति से अप्रभावित रहता है।

    यह बल दोनों पिंडो के मध्य उपस्थित माध्यम पर निर्भर नहीं करता है।

    गुरुत्वाकर्षण बलों पर अध्यारोपण का सिद्धांत लागू होता है अर्थात किसी निकाय में उपस्थित सभी बलों का योग , अलग अलग बलों के योग के बराबर होता है।

    गुरुत्वाकर्षण बल दोनों पिंडो को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश कार्य करता है

    इस बल के द्वारा किया गया कार्य का मान पथ या मार्ग पर निर्भर नहीं करता है साथ ही एक पूर्ण चक्कर में किया गया कार्य का मान शून्य होता है अत: गुरुत्वाकर्षण बल संरक्षी बल होता है।

    गुरुत्वाकर्षण बल और ग्रहों से जुडी महत्वपुर्ण बाते

    पृथ्वी प्रत्येक वस्तु को एक बल द्वारा आकर्षित करती है , जिसे वस्तु का भार कहा जाता है। वस्तु समान परिमाण के बल द्वारा पृथ्वी को भी आकर्षित करती है लेकिन पृथ्वी वस्तु की ओर गति नहीं करती है। क्यों कि पृथ्वी का त्वरण इसके उच्च द्रव्यमान (आपके द्रव्यमान का 1023 गुना ) के कारण नगण्य होता है।

    गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ही चन्द्रमा, पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है इसके लिय चन्द्रमा को आवश्यक अभिकेंद्रिय बल का मान दोनों में उपस्थित आकर्षण बल द्वारा प्राप्त होता है।

    ग्रहों या उपग्रहों को उनकी कक्षा में चक्कर लगाने के लिए आवश्यक अभिकेन्द्रीय बल, सूर्य के मध्य कार्यरत गुरुत्वाकर्षण बल के द्वारा प्राप्त होता है।

    तारों के टूटने तथा बनने और आकाश गंगा के निर्माण में भी गुरुत्वाकर्षण बल का योगदान है।

    गुरुत्वाकर्षण के कारण चन्द्रमा , ग्रह एवं तारे लगभग गोलीय होते है। चूँकि वस्तु के सभी कण एक दुसरे को आकर्षित करते है इसलिए कण इनके मध्य की दूरी को न्यूनतम करने के लिए गति करते है। जिसके परिणाम स्वरूप , वस्तु गोलीय आकार प्राप्त करती है। यह प्रभाव निम्न द्रव्यमान की वस्तु में अत्यधिक समानित किया जाता है। चूँकि गुरुत्वाकर्षण खिंचाव कम होता है इसलिए खगोलीय वस्तुएं जैसे क्षुदग्रह (निम्न द्रव्यमान) गोलीय नहीं होते है।