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  • वायुमण्डलीय दाब (Atmospheric Pressure) क्या है ?

    What is Atmospheric Pressure ?

    वायुमण्डलीय दबाव का अर्थ है, किसी भी दिए गए स्थान और समय पर वहां की हवा के स्तम्भ का भार। यह दबाव एक यन्त्र की सहायता से मापा जाता है जिसे बैरोमीटर कहते हैं। समुद्रतल से ऊपर जाने पर वायु की अनेक परतें नीचे छूट जाने के कारण वायुमण्डलीय दाब कम तथा समुद्रतल के नीचे जाने पर दाब अधिक हो जाता है।

    ऊंचाई पर वायुदाब कम हो जाता है।

    वायुदाब के मात्रक

    एक पास्‍कल दाब एक न्‍युटन के बल को इकाई क्षेत्रफल पर आरोपित करने पर उत्‍पन्‍न होता है l

    वायुमंडलीय दाब 101,325 पास्कल के रूप में परिभाषित दबाव की एक इकाई है, जो 760 मिमी या 29.9212 इंच पारे के स्तम्भ के , या 14.696 psi  के बराबर है।

    वायुमण्‍डलीय दाब को atm से व्‍यक्‍त किया जाता है।
    1 atm=101325 पास्‍कल होता है।

    वायुमण्‍डलीय दाब का मात्रक बार अथवा मिलीबार होता है इसे निम्न इकाइयों से नापा जाता है –
    1 बार =100000 newton/square METER 
    1मिली बार = 100 पास्‍कल
    1 टॅार (torr) =1.332 मिलीबार =133.32 पास्‍कल
    मानक वायुमण्‍डलीय दाब ( STANDARD  ATMOSPHERIC  PRESSURE  )का मान (VALUE ) मानक समुद्र तल पर वायु के द्वारा लगाये गये दाब के बराबर होता है, जिसका मान 101325 पास्‍कल होता है।


    वायुमण्‍डलीय दाब का मापन मैनोमीटर नामक उपकरण द्वारा किया जाता है। ऊपर की और जाने पर वायुदाब में कमी होती है।

    1 टॅार (torr) =1.332 मिलीबार =133.32 पास्‍कल

    1मिली बार = 100 पास्‍कल

    1 बार =100000 newton/square METER 

    1 atm=101325 पास्‍कल होता है।

    उदाहरण

    • वायुयान में बैठे यात्री के फाउंटेन पैन से स्‍याही इसलिये रिसने लगती है क्‍योंकि उपर जाने पर वायुमण्‍डलीय दाब का मान कम हो जाता है।
    • वायुमण्‍डलीय दाब के कम हेाने के कारण पर्वतारोही तथा उच्‍च रक्‍त चाप से पीडित व्‍यक्तियों को उॅंचाई पर जाने पर उनकी नाक से खून निकलने लगता है।
    • अगर हम बिना स्पेस सूट के अंतरिक्ष में चले जाए तो हमारा शरीर फट जायर्गा क्यूंकि वहां वायुदाब शून्य होता है ।
    • गहरे पानी की समुद्री मछली सतह पर लायी जाए तो मर जाती है क्यूंकि ऊपर के पानी में दाब कम होता है और मछली का शरीर उच्च दाब का आदि होता है।
    • पहाड़ों पर खाना पकाने में कठिनाई होती है, क्योंकि वहां वायुदाब कम होने से पानी 100°C के बजाए निम्न ताप पर ही उबलकर भाप बनने लगता है।
    • प्रति 1,000 फुट ऊपर जाने पर वायु का दाब पारा स्तम्भ का 1 इंच (= 2.54 सेमी.) कम हो जाता है l

    वायुदाबमापी

    फोर्टिन वायुदाबमापी: यह सरल वायुदाबमापी का एक संशोधित रूप है जिससे दाब का मापन अधिक शुद्धता से किया जाता है।

    निर्द्रव (Aneroid) वायुदाबमापी: यह एक छोटा सुबाह्य (Portable) दाबमापी है जिसमें किसी द्रव का प्रयोग नहीं किया जाता है।

    तुंगतामापी (Altimeter): जब निर्द्रव वायुदाबमापी में ऊंचाई मापने के निशान बना दिए जाते हैं, तो उसे ‘ऊंचाईमापी’ या ‘तुगतामापी’ कहते हैं।

  • डॉप्लर प्रभाव (Doppler Effect) क्या होता है ?

    डॉप्लर प्रभाव (Doppler Effect)

    ध्वनि में आवृत्ति परिवर्तन के प्रभाव को सर्वप्रथम जॉन डॉप्लर ने 1842 में प्रतिपादित किया जिसके कारण उन्हीं के नाम पर उसे ‘डॉप्लर प्रभाव’ कहते हैं। डॉप्लर के अनुसार, ‘जब किसी ध्वनि स्रोत व श्रोता के बीच आपेक्षिक गति होती है, तो श्रोता को ध्वनि की आवृत्ति उसकी वास्तविक आवृत्ति से अलग सुनाई देती है। यदि कोई स्त्रोत, श्रोता के निकट आ रहा होता है, तो ध्वनि की आवृत्ति बढ़ जाती है और यदि स्रोत. श्रोता से दूर जाता है, तो आवृत्ति कम हो जाती है।

    यही कारण है, कि जब रेलगाड़ी का इन्जन सीटी बजाते हुए श्रोता के निकट आता है, तो उसकी ध्वनि बड़ी तीखी (Shrill) अर्थात् अधिक आवृत्ति की सुनाई देती है और जैसे ही इन्जन श्रोता को पार करके aदूर जाने लगता है तुरन्त ध्वनि की आवृत्ति कम हो जाती है और सीटी की ध्वनि मोटी (Grave) हो जाती है। 

    प्रयोग

    डॉप्लर प्रभाव का उपयोग करके गैलेक्सी तथा सुदूर तारों का अध्ययन किया जाता है। तारे के प्रकाश के वर्णक्रमण (Spectrum) का अध्ययन करके प्रकाश की आवृत्ति में हुए परिवर्तन का पता लगाया जाता है। इस परिवर्तन से यह ज्ञात हो जाता है, कि तारा पृथ्वी से दूर जा रहा है या उसके पास आ रहा है और उसकी गति का वेग क्या है !

    यदि स्पेक्ट्रम में प्रकाश रेखा बैंगनी सिरे की ओर विस्थापित होती है (बैंगनी-विस्थापन, Violet-shift) तो प्रकाश स्रोत (तारा, गैलेक्सी, आदि) पृथ्वी की ओर आ रहा है और यदि वह लाल सिरे की ओर विस्थापित होती है (अर्थात् लाल-विस्थापन या अभिरक्त विस्थापन, Red-shift) तो प्रकाश स्रोत पृथ्वी से दूर जा रहा होता है। 

    प्रकाश में डॉप्लर प्रभाव

    प्रकाश तरंगें भी डॉप्लर प्रभाव दर्शाती हैं। इन दोनों में अन्तर यह है, कि ध्वनि में डॉप्लर प्रभाव असममित (Asymmetric) होता है जबकि प्रकश में सममित (Symmetric) होता है। इसका तात्पर्य यह है, कि ध्वनि में डॉप्लर प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है, कि ध्वनि स्रोत श्रोता की ओर आ रहा है या उससे परे जा रहा है। इसके विपरीत प्रकाश में डॉप्लर प्रभाव केवल प्रकाश स्रोत व दर्शक के मध्य आपेक्षिक वेग पर निर्भर करता है, इस बात पर नहीं कि स्रोत दर्शक के निकट आ रहा है या उससे दूर जा रहा है। 

    प्रकाश के डॉप्लर प्रभाव द्वारा सुदूर तारों व गैलेक्सियों के पृथ्वी के सापेक्ष वेग तथा उनकी गति की दिशा ज्ञात की जाती है। वास्तव में खगोलज्ञ एडविन हब्बल (1889-1953) ने डॉप्लर प्रभाव द्वारा ही यह ज्ञात किया था, कि विश्व (Universe) का विस्तार हो रहा है।

    यदि कोई तारा या गैलेक्सी पृथ्वी की ओर आ रहा है, तो उससे प्राप्त प्रकाश की तरंग दैर्ध्य स्पेक्ट्रम के बैंगनी सिरे की ओर विस्थापित होती है और यदि तारा या गैलेक्सी पृथ्वी से दूर जा रहा है, तो प्राप्त प्रकाश की तरंग-दैर्ध्य स्पेक्ट्रम के लाल सिरे की ओर विस्थापित होती

  • ध्वनि का विवर्तन क्या होता है ?

    ध्वनि का विवर्तन (Diffraction of Sound)

    ध्वनि की तरंग-दैर्ध्य 1 मीटर की कोटि की होती है। अतः जब इसी कोटि का कोई अवरोध, जैसे—दरवाजा, खिड़की, दीवार, आदि। ध्वनि के मार्ग में आता है, तो ध्वनि अवरोध के किनारों पर मुड़कर आगे बढ़ जाती है।

    इस घटना को ‘ध्वनि का विवर्तन‘ कहते हैं। यही कारण है, कि यदि हम कमरे के अन्दर बैठे हैं, तो भी हम बाहर के शोरगुल या अन्य ध्वनियों को सुन लेते हैं, कारण यही है, कि बाहर से आने वाली ध्वनि दरवाजों, खिड़की, आदि पर मुड़कर हमारे कानों तक पहुंच जाती है। 

    ध्वनि में डॉप्लर प्रभाव का उपयोग करके किसी वायुयान या पनडुब्बी की गति की दिशा व उसका वेग ज्ञात किया जा सकता है। 

  • ध्वनि का विस्पंद क्या होता है ?

    विस्पंद (Beat)

    जब कभी दो लगभग बराबर आवृत्ति की ध्वनि तरंग साथ-साथ उत्पन्न होती है, तो उनके अध्यारोपण से जो परिणामी ध्वनि उत्पन्न होती है, उसकी तीव्रता बारी-बारी से घटती और बढ़ती है। ध्वनि की तीव्रता के इस चढ़ाव व उतार को ‘विस्पंद’ कहते हैं। एक चढ़ाव और एक उतार को मिलाकर एक विस्पंद बनता है !

    विस्पंद आवृत्ति

    एक सेकण्ड में जितनी बार ध्वनि की तीव्रता में चढ़ाव या उतार होता है, उसे ‘विस्पंद आवृत्ति’ (Beat frequency) कहते हैं। विस्पंद आवृत्ति = ध्वनियों की आवृत्तियों का अन्तर = श्रोतों की आवृत्तियों का अन्तर। यदि हम बराबर आवृत्ति के दो ध्वनि श्रोतों को एक साथ बजाते हैं, तो उनसे उत्पन्न परिणामी ध्वनि की तीव्रता में हमें कोई उतार-चढ़ाव सुना नहीं देता। 

    विस्पंद के अनुप्रयोग

    • स्वरित्र द्विभुज की आवृत्ति के निर्धारण
    • वाद्यों के समस्वरण में
    • रेडियो अभिग्रहण में 
    • खानों में विस्फोटक मीथेन गैस का पता लगाने में
  • ध्वनि का व्यतिकरण क्या होता है ?

    ध्वनि का व्यतिकरण (Interference of Sound)

    जब समान आवृत्ति या आयाम की दो ध्वनि तरंगें एक साथ किसी बिन्दु पर पहुंचती हैं, तो उस बिन्दु पर ध्वनि ऊर्जा का पुनर्वितरण (Redistribution) हो जाता है। इस घटना को ध्वनि का व्यतिकरण कहते हैं।

    ‘सम्पोषी’ (Constructive) व्यतिकरण

    यदि दोनों तरंगें उस बिन्दु पर एक ही कला (Phase) में पहुंचती हैं, तो वहां ध्वनि की तीव्रता अधिकतम होती है। इसे ‘सम्पोषी’ (Constructive) व्यतिकरण कहते हैं।

    ‘विनाशी’ (Destructive) व्यतिकरण

    यदि दोनों तरंगें विपरीत कला में मिलती हैं, तो वहां पर तीव्रता न्यूनतम होती है। इसे ‘विनाशी’ (Destructive) व्यतिकरण कहते हैं।

    उदाहरण

    व्यतिकरण के कुछ उदाहरण हैं—समुद्र में लाइट हाउस पर रखे साइरन से उत्पन्न की गई ध्वनि समुद्र पृष्ठ पर स्थित किसी बिन्दु पर दो प्रकार से पहुंचती है, एक तो लाइट हाउस से सीधे ही और दूसरे समुद्र के पृष्ठ से परावर्तित होने के बाद।

    इन दोनों तरंगों में व्यतिकरण के फलस्वरूप कुछ स्थानों पर ध्वनि तीव्र सुनाई देती है (वहां पर सम्पोषी व्यतिकरण होता है और कुछ स्थानों पर ध्वनि की तीव्रता बहुत कम होती है वहां पर विनाशी व्यतिकरण होता है। जिन्हें ‘नीरव क्षेत्र’ (Silence zone) कहते हैं। 

    किसी बड़े हॉल में एक ही स्थान पर उत्पन्न ध्वनि, श्रोता तक दो प्रकार से पहुंचती है, एक तो श्रोता के पास सीधे ही और दूसरे हाल की छत व दीवारों से परावर्तित होने के बाद। इन दोनों तरंगों में सम्पोषी व विनाशी व्यतिकरण होने के कारण हाल में कुछ बिन्दुओं पर तीव्र ध्वनि और कुछ पर अति मन्द (या बिल्कुल नहीं) ध्वनि सुनाई देगी। ध्वनि के व्यतिकरण का प्रभाव रेडियो के कार्यक्रमों पर स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है।

  • पनडुब्बी (Submarine) कैसे काम करती है ?

    How does a submarine work ?

    पनडुब्बी ऐसा जलयान है जो समुद्र की सतह पर तथा सतह के नीचे तैर सकता है। पनडुब्बी में आगे व पीछे की ओर बड़ी-बड़ी टंकियां होती हैं जिनमें पम्पों की सहायता से समुद्री जल भरा जा सकता है अथवा खाली किया जा सकता है। जब इन टकियां को जल से भर देते हैं, तो इसका भार इसके द्वारा हटाए गए जल के भार से अधिक हो जाता है और पनडुब्बी जल के अन्दर जाकर तैरने लगती है तथा जब पनडुब्बी को सतह पर तैरना होता है, तो उन टंकियों को खाली कर देते है जिससे उसका भार उसके द्वारा हटाए गए जल के भार से कम होता है। इस प्रकार पनडुब्बी को इच्छानुसार जल के अन्दर अथवा सतह पर चलाया जा सकता है।

    यदि वस्तु का घनत्व द्रव के घनत्व से कम है तो वह उस द्रव में तैरती है, अन्यथा डूब जाती है, जैसे लोहा पारे पर तैरता है क्योंकि लोहे का घनत्व पारे के घनत्व से कम है।

    प्लिमसोल रेखा

    यह एक रेखा है जो समुद्री जहाज की तली (Bottom) से कुछ ऊपर खिची रहती है। इस रेखा से अधिक जहाज नहीं डूबना चाहिए। यह जहाज पर अधिकतम लादे गए बोझ का सीमा बताती है।

  • द्रव-घनत्वमापी (Hydrometer) क्या है ?

    What is Hydrometer ?

    यह एक प्रकार का यन्त्र है जो द्रवों का विशिष्टि गुरुत्व (Specific gravity) निकालने तथा उनकी शुद्धता की परीक्षा करने के लिए प्रयुक्त होता है।

    आर्किमीडिज़ के सिद्धान्त के अनुसार, द्रव में तैरती हुई वस्तु का उतना ही भाग डूबता है जितने से विस्थापित द्रव की भार वस्तु को भार के बराबर हो जाए। अत: इस प्रकार तैरने वाली वस्तु को अगर विभिन्न घनत्व वाले द्रवों में डुबाया जाये तो किसी में उसका अधिक भाग डूबेगा और किसी में कम। अधिक घनत्व वाले द्रव में वह कम डूबेगी और कम घनत्व वाले द्रव में अधिक डूबेगी। इस प्रकार, वस्तु के डूबे भाग का आयतन तथा द्रव के विशिष्ट गुरुत्व में एक ऐसा सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है। जिससे डूबे भाग के आयतन का अध्ययन करके हम घनत्व जांच सकते हैं। द्रव-घनत्वामापी इसी सिद्धान्त पर कार्य करता है।

    दूध का घनत्व मापने वाला लैक्टोमीटर भी एक हाइड्रोमीटर है तथा बैटरी में अम्ल का घनत्वमापी भी हाइड्रोमीटर ही है।

  • प्लवन (तैरने) का नियम (Law of Floatation) क्या है ?

    What is Law of Floatation ?

    जब कोई वस्तु आंशिक अथवा पूर्ण रूप से किसी द्रव में डुबोई जाती है, तो उसके भार में कमी आ जाती है। यह कमी वस्तु पर द्रव के उत्प्लावन बल के कारण होती। है। उत्क्षेप ऊपर की ओर कार्य करता है साथ ही वस्तु का भार नीचे की ओर कार्य करता है। अत: जब कोई वस्तु किसी द्रव में डुबाई जाती है तो उस पर 2 बल कार्य करते हैं :

    1. वस्तु का भार W नीचे की ओर। 

    2. द्रव का उछाल W, ऊपर की ओर। इसमें तीन अवस्थाएं हो सकती हैं: 

    1. जब W>W, अर्थात् वस्तु का भार उसके द्वारा हटाए गए द्रव के भार से अधिक है। इस अवस्था में वस्तु द्रव में डूब जाएगी।

    2. जब W=W, अर्थात् वस्तु का भार उसके द्वारा हटाए गए द्रव के भार के बराबर होता है। अत: वस्तु पर परिणामी बल W-W = 0 (शून्य) होता है। इस दशा में वस्तु ठीक द्रव की सतह के नीचे तैरती रहेगी।

    3. जब W<W, अर्थात् वस्तु का भार उस पर लगने वाले उत्क्षेपक बल से कम है। अब परिणामी बल ऊपर की ओर लगता है। सन्तुलन अवस्था में वस्तु का कुछ भाग द्रव के बाहर रहता है. शेष अन्दर। इस स्थिति में वस्तु का घनत्व द्रव के घनत्व से कम होता है। इसीलिए कॉर्क तथा लकड़ी का टुकड़ा जल पर तैरता है l

    तैरने के नियम

    • जब वस्तु द्रव पर तैरती है तो उसका भार उसके द्वारा हटाए गए द्रव के भार के बराबर होता है तथा
    • ठोस का गुरुत्व-केन्द्र तथा हटाए गए द्रव का गुरुत्व-केन्द्र दोनों एक ही ऊर्ध्वाधर रेखा में होने चाहिए।

    मछलियों का तैरना

    साधारण मछलियों के शरीर में वायु प्रकोष्ठ होते हैं। गलफड़ों की सहायता से जल में घुली वायु को जल से अलग करके इन प्रकोष्ठों में भरकर वे अपना उत्प्लावन बल बढ़ा लेती हैं। शार्क जैसी मछलियों के शरीर में अधिक घनत्व वाली हड्डी होती है तथा वायु प्रकोष्ठ भी नहीं होता। उनके यकृत का आकार बहुत बड़ा होता है तथा उनमें अधिकांश तेल, वसा व चर्बी होती है। इनका घनत्व जल से कम होता है। शार्क का यकृत उसके सम्पूर्ण भार का 25% तक हो सकता है। उसका यह आकार उनके उत्प्लावन में सहायक होता है।

    तरल पदार्थ और उनका घनत्व

    • तरल (Fluid) द्रव तथा गैस, दोनों को ही तरल कहते हैं। जल, ठोस, द्रव एवं गैस तीनों अवस्था में पाया जाता है। 

    • समुद्री जल का घनत्व अधिक होता है, अत: उसमें तैरना आसान होता है। शुद्ध जल का घनत्व 1 ग्राम/सेमी. 

    या 10 किग्रा./मीटर होता है। अतः समुद्री जल की उत्प्लावकता नदी के जल से अधिक होती है। 

    • जब बर्फ पानी पर तैरती है, तो उसके आयतन का 1/10 भाग पानी के ऊपर रहता है। 

    • द्रव में आंशिक रूप से डूबकर तैरने वाली वस्तु के लिए, वस्तु का घनत्व वस्तु का द्रव में डूबा हुआ आयतन द्रव का घनत्व वस्तु का कुल आयतन अत: बर्फ का घनत्व 0.9 ग्राम/सेमी. होता है। इसी सिद्धान्त द्वारा पानी मिले हुए अशुद्ध दूध में दुग्धमापी (Lactometer) को डुबाकर दूध में मिश्रित जल की प्रतिशत मात्रा ज्ञात की जाती है।

    • यदि किसी बर्तन में पानी भरा है और उस पर बर्फ तैर रही हैं, जब बर्फ पूरी तरह पिघल जाएगी तो पात्र में पानी का तल बढ़ता नहीं है, पहले के समान ही रहता है।

  • आर्किमीडिज़ का सिद्धान्त (Principle of Archimedes) क्या है ?

    What is Principle of Archimedes ?

    जब कोई वस्तु किसी द्रव में पूरी अथवा आंशिक रूप से डुबोई जाती है तो उसके भार में कमी का आभास होता है। भार में यह आभासी कमी वस्तु द्वारा हटाए गए द्रव के भार के बराबर होती है। इसे ‘आर्किमीडिज़ का सिद्धान्त‘ कहते हैं।

    आपेक्षित घनत्व = पानी का घनत्व / वस्तु का घनत्व

    आपेक्षिक घनत्व (Relative density) = वस्तु का वायु में भार समान / आयतन के पानी (4°C) का भार

    या आपेक्षिक घनत्व = वस्तु का वायु में भार / पानी में वस्तु के भार में कमी

    आपेक्षिक घनत्व एक शुद्ध संख्या है। इसका कोई मात्रक नहीं होता है।

    द्रव का उत्क्षेप अथवा उत्पलावक बल (Upthrust of Liquid)

    कुएं से जल की भरी बाल्टी खींचते समय जब तक बाल्टी जल के अन्दर रहती है तब तक वह हल्की लगती है, परन्तु जैसे ही वह जल के ऊपर वायु में आती है तो भारी लगने लगती है। इसका अर्थ यह है, कि जब बाल्टी जल में डूबी रहती है तो उसके भार में कुछ कमी आ जाती है। भार की यह कमी जल द्वारा बाल्टी पर ऊपर की ओर लगाए गए बल के कारण होती है। इस बल को ‘उत्प्लावक बल‘ अथवा ‘उत्क्षेप‘ (Buoyant force or upthrust) कहते हैं। यह उत्क्षेप बाल्टी द्वारा हटाए गए जल के गुरुत्व-केन्द्र पर कार्य करता है जिसे ‘उत्प्लावन केन्द्र’ (Centre of buoyancy) कहते हैं। जल के उत्क्षेप का अध्ययन सर्वप्रथम आर्किमीडिज़ ने किया था। जिसके कारण इसे ‘आर्किमीडिज़ का सिद्धान्त‘ कहा जाता है।

    आर्किमीडिज़ के सिद्धान्त के उपयोग

    1. यह पदार्थों का आपेक्षिक घनत्व ज्ञात करने में उपयोगी है।
    2. जलयानों और पनडुब्बी के डिजाइन बनाने में किया जाता है।
    3. दुग्धमापी (Lactometer ) से दूध की शुद्धता मापने के लिए
    4. आद्रता (Hydrometer ) से द्रवों का घनत्व ज्ञात करने में
    5. पानी में बर्फ का तैरना भी इससे समझा जा सकता है।
    6. उत्पलावकता, तरलो ( द्रव, गैस) का गुण है

    आर्किमिडीज सिद्धांत ( उत्पलावन बल ) के उदाहरण

    1. तालाब की तुलना में समुद्र पानी में तैरना ज्यादा आसान होता है क्योंकि समुद्र पानी का घनत्व, तालाब के पानी के घनत्व से अधिक होता है। अतः उत्पलावन बल अधिक लगता है।
    2. उत्पलावन बल के कारण पत्थर को हवा के बजाय पानी में उठाना अधिक आसान होता है।
    3. लोहे की कील का डुबना : लोहे की कील का घनत्व पानी के घनत्व से अधिक होता है। इस लिए कील का उत्पलावन बल कम है। तो कील पानी में डुब जाएगी।
    4. कॉक का पानी में तैरना :  कॉक का घनत्व पानी के घनत्व से कम है इसलिए पानी में कॉक तैरने लगता है।
    5. झील में पत्थर को डालने पर जैसे-जैसे वह नीचे आता है उस पर सभी जगह उत्पलावन बल का मान समान रहता है।

  • द्रव का उत्क्षेप अथवा उत्पलावक बल (Upthrust of Liquid)क्या है ?

    What is Buoyant Force ?

    कुएं से जल की भरी बाल्टी खींचते समय जब तक बाल्टी जल के अन्दर रहती है तब तक वह हल्की लगती है, परन्तु जैसे ही वह जल के ऊपर वायु में आती है तो भारी लगने लगती है। इसका अर्थ यह है, कि जब बाल्टी जल में डूबी रहती है तो उसके भार में कुछ कमी आ जाती है। भार की यह कमी जल द्वारा बाल्टी पर ऊपर की ओर लगाए गए बल के कारण होती है। इस बल को ‘उत्प्लावक बल‘ अथवा ‘उत्क्षेप‘ (Buoyant force or upthrust) कहते हैं। यह उत्क्षेप बाल्टी द्वारा हटाए गए जल के गुरुत्व-केन्द्र पर कार्य करता है जिसे ‘उत्प्लावन केन्द्र’ (Centre of buoyancy) कहते हैं।

    सरल भाषा में किसी तरल (द्रव या गैस) में आंशिक या पूर्ण रूप से डूबी किसी वस्तु पर उपर की ओर लगने वाला बल उत्प्लावन बल कहलाता है।

    नावों, जलयानों, गुब्बारों आदि के कार्य के लिये उत्प्लावन बल ही जिम्मेदार है।

    जल के उत्क्षेप का अध्ययन सर्वप्रथम आर्किमीडिज़ ने किया था। जिसके कारण इसे ‘आर्किमीडिज़ का सिद्धान्त‘ भी कहा जाता है।