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  • प्रकाश तरंगों का व्यतिकरण क्या है ?

    What is Interference of Light Waves ?

    व्यतिकरण सभी प्रकार की तरंगों का एक गुण है। चूंकि प्रकाश तरंगों के रूप में चलता है, अत: प्रकाश तरंगें भी व्यतिकरण की घटना को दर्शाती हैं।

    परिभाषा

    जब समान आवृत्ति और लगभग समान आयाम की दो प्रकाश तरंगें किसी माध्यम में एक साथ एक ही दिशा में गमन करती हैं, तो अध्यारोपण के सिद्धान्त के अनुसार परिणामी तरंग का निर्माण करती हैं। परिणामी तरंग का आयाम मूल तरंगों के आयाम से भिन्न होता है। चूंकि प्रकाश की तीव्रता आयाम के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होती है, प्रकाश की तीव्रता में परिवर्तन हो जाता है। कुछ स्थानों पर प्रकाश की तीव्रता अधिकतम, कुछ स्थानों पर न्यूनतम अथवा शून्य होती है। इस घटना को प्रकाश का ‘व्यतिकरण’ कहते हैं।

    व्यतिकरण दो प्रकार के होते हैं—(1) संपोषी या रचनात्मक व्यतिकरण और (2) विनाशी व्यतिकरण।

    संपोषी या रचनात्मक व्यतिकरण (Constructive Interference)

    माध्यम के जिस बिन्दु पर दोनों तरंगें समान कला में मिलती है अर्थात् दोनों तरंगों के शीर्ष या गर्त एक साथ पड़ते हैं, उस बिन्दु पर दोनों तरंगें एक-दूसरे के प्रभाव को बढ़ाती है। अत: प्रकाश की परिणामी तीव्रता अधिकतम होती है। इस प्रकार के व्यतिकरण को ‘संपोषी’ या ‘रचनात्मक व्यतिकरण‘ कहते हैं।

    विनाशी व्यतिकरण (Destructive Interference)

    माध्यम के जिस बिन्दु पर दोनों तरंगे विपरीत कला में मिलती है अर्थात् एक तरंग के शीर्ष पर दूसरी तरंग का गर्त या एक तरंग के गर्त पर दूसरी तरंग का शीर्ष पड़ता है, उस बिन्दु पर दोनों तरंगें एक-दूसरे के प्रभाव को नष्ट कर देती है। अत: उस बिन्दु पर प्रकाश की परिणामी तीव्रता न्यूनतम या शून्य होती है। इस प्रकार के व्यतिकरण का विनाशी व्यतिकरण न्यूनतम या शून्य होती है। इस प्रकार के व्यतिकरण को ‘विनाशी व्यतिकरण‘ कहते हैं।

    उदाहरण

    वर्षा ऋतु में विभिन्न मोटर वाहनों से टपकी तेल की बूंदे सड़क पर पतली फिल्म के रूप में बिखर जाती है।

    सूर्य के प्रकाश में यह फिल्म विभिन्न रंगों की दिखाई देती है। इसी तरह जल की सतह पर तेल की बूंदों से बनी पतली फिल्म भी रंगीन दिखाई देती है।

    साबुन के रंगहीन बुलबुले भी सूर्य के प्रकाश में रंगीन दिखाई देते हैं। इन सबका कारण प्रकाश का व्यतिकरण है।

  • गोलीय तथा वर्ण विपथन (Spherical and Chromatic Aberration) क्या है ?

    गोलीय तथा वर्ण विपथन (Spherical and Chromatic Aberration) क्या है ?

    What are Spherical and Chromatic Aberration ?

    गोलीय विपथन

    यदि लेन्स बड़ा हो और उसके पूरे भाग पर प्रकाश पड़ता हो तो लेन्स का बाहरी भाग (Peripheral portion) तथा केन्द्रीय भाग प्रकाश के एक ही बिन्दु पर फोकस नहीं करते हैं। इससे एक बिन्दु रूप की वस्तु को प्रतिबिम्ब भी फैला हुआ और अस्पष्ट बनता है। इस दोष को ‘गोलीय विपथन‘ कहते हैं।

    इस दोष का निवारण करने के लिए अनबिंदुक (Anastigmatic) लेन्सों का उपयोग किया जाता है। अनबिंदुक लेन्स विभिन्न प्रकार के कांच के अनेक लेन्सों को परस्पर जोड़ कर बनाए जाते हैं। गोलीय विपथन का निवारण विशेष प्रकार से बनाए गए नवचन्द्रक लेन्स (Meniscus lens) का उपयोग करके भी किया जाता है।

    साधारण उपाय यह है, कि एक काले कागज में छोटा गोलाकार छिद्र बनाकर उस कागज को लेन्स पर लगा दिया जाये। इससे लेन्स के केवल केन्द्रीय भाग से प्रकाश गुजरेगा, अत: बाहरी भाग से प्रतिबिम्ब बनेगा ही नहीं परन्तु इस विधि में लेन्स का एक छोटा भाग ही प्रयुक्त होता है, अत: प्रतिबिम्ब कम चमकीला बनता है।

    वर्ण विपथन

    यदि अकेले लेन्स का प्रयोग किया जाए तो प्रायः श्वेत प्रकाश से भी प्रतिबिम्ब रंगीन व अस्पष्ट बनता है। लेन्स के इस दोष को ‘वर्ण विपथन‘ कहते हैं। इसका कारण यह है, कि लेन्स के पदार्थ का अपवर्तनांक तथा उसके कारण लेन्स की फोकस दूरी भिन्न-भिन्न रंगों के लिए भिन्न-भिन्न होती है। अत: भिन्न-भिन्न रंग की किरणें भिन्न-भिन्न बिन्दुओं पर फोकस होती है और प्रतिबिम्ब अस्पष्ट तथा रंगीन बनता है।

    परमाणु सिद्धान्त का विकास करने वाले प्रसिद्ध रसायनज्ञ जॉन डाल्टन वर्णाध थे। अत: वर्णाधता को ‘डाल्टोनिक रोग’ भी कहते हैं।

    मक्खिया पराबैंगनी प्रकाश को देख सकती है परन्तु लाल प्रकाश को नही देख सकती है l

  • रंगीन टेलीविजन (Colour Television) कैसे काम करता है ?

    How does color television work?

    इसमें चित्रों का निर्माण प्राथमिक रंगों के विभिन्न प्रकार के संकलनों द्वारा होता है। चित्र से प्रकाश को रंगीन टेलीविजन के कैमरे पर लेंस द्वारा संसृत किया जाता है। जब प्रकाश कैमरे पर पहंचता है, तो यह विशेष प्रकार के दर्पणों द्वारा तीन किरण पुंजों में विभक्त हो जाता है। जब प्रत्येक किरण-पुंज फिल्टर से गुजरती है तब उससे तीन पृथक् लाल, हरा और नीले रंगों का किरण-पुंज बनता है।

    एक रंगीन टेलीविजन के पर्दे पर हजारों ऐसे छोटे-छोटे संवेदनशील क्षेत्र होते हैं जो इलेक्ट्रॉन के सम्पर्क में आने पर दीप्त हो जाते हैं। कुछ क्षेत्र लाल प्रकाश, कुछ हरे प्रकाश तथा शेष बचे अन्य क्षेत्र नीला प्रकाश उत्पन्न करते हैं। जब हम कोई रंगीन कार्यक्रम देखते हैं, तो लाल, हरा या नीला प्रकाश ही नहीं देखते अपितु इनके संकलन से निर्मित अनेक रंगों के चित्र देखते है हम श्वेत प्रकाश तब देखते हैं जब नीले, हरे और लाल रंग के प्रकाश का एक निश्चित अनुपात में संकलन होता है। प्राथमिक रंगों के मिश्रण से श्वेत वर्ण के प्रकाश के निर्मित होने के कारण ही एक रंगीन टेलीविजन पर हम श्वेत-श्याम चित्र भी देख सकते हैं।

  • रंजक (Pigment) क्या है ?

    What is Pigment ?

    वैसे पदार्थ हैं जो पेंटों या रंग-सामग्नियों को रंग प्रदान करते हैं।

    ऐसा इसलिए हो पाता है, कि ये रंजक कुछ ही वर्गों को परावर्तित करते हैं तथा शेष सभी वर्गों के प्रकाश को अवशोषित कर लेते हैं। अधिकांश रंजक अशुद्ध होते हैं अर्थात् वे एक से अधिक वर्ण को परावर्तित करते हैं। जब उन्हें मिलाया जाता है तो उनसे मेल खाने वाले या सर्वनिष्ठ सभी वर्ण परावर्तित हो जाते हैं।

    उदाहरण के लिए, नीले और पीले पेंटों को मिलाने से एक हरा रंग बनता है क्योंकि नीला रंग जामुनी तथा हरे रंग को परावर्तित करता है साथ ही नीले रंग को भी। जबकि पीला रंग हरे, पीले और नारंगी वर्ण के प्रकाश को परावर्तित करता है। केवल हरा रंग ही दोनों द्वारा परावर्तित होता है। रंगीन रंजकों को मिलाना एवं व्यवकलन (Subtraction) प्रक्रिया है। रंगीन प्रकाशों को संकलन द्वारा मिश्रित किया जाता है।

  • वस्तुओं के रंग (Colour of Objects)

    Colour of Objects

    वस्तुओं का अपना कोई रंग नहीं होता। वस्तुएं प्रकाश का कुछ भाग परावर्तित करती है तथा कुछ भाग अवशोषित भी करती हैं। प्रकाश का परावर्तित भाग ही वस्तु का रंग निर्धारित करता है।

    कोई वस्तु जिस रंग में दिखाई देती है वह वास्तव में, (श्वेत प्रकाश के सातों रंगों में से) केवल उसी रंग को परावर्तित करती है, शेष सभी रंग को अवशोषित कर लेती है जो वस्तु सभी रंगों को परावर्तित कर देती है वह श्वेत दिखाई देती है क्योंकि सभी रंगों को मिश्रित प्रभाव श्वेत होता है जो वस्तु सभी रंगों को अवशोषित कर लेती है और किसी रंग को परावर्तित नहीं करती है, वह काली दिखाई देती है। अत: सभी अपारदर्शी (Opaque) वस्तुओं का रंग उनके द्वारा परावर्तित प्रकाश का रंग होता है। इसके विपरीत पारदर्शी (Transparent) वस्तुओं का रंग उनसे पार होने वाले प्रकाश के रंग पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, जब हरे कांच को हम सूर्य के प्रकाश में देखते है, तो वह हरा दिखाई देता है क्योंकि वह हरे रंग को अपने अन्दर से जाने देता है और शेष सभी रंगों को अवशोषित कर लेता है। अतः स्पष्ट है, कि यदि किसी लाल रंग की प्लेट को हरे प्रकाश में (अन्य किसी एक रंग के प्रकाश में) देखा जाए तो वह हरे प्रकाश को अवशोषण कर लेगी इसलिए काली दिखाई देगी।

  • इन्द्रधनुष कैसे बनता है ?

    How does rainbow become ?

    इन्द्रधनुष बनने का कारण

    पूर्ण आन्तरिक परावर्तन तथा अपवर्तन द्वारा वर्ण विक्षेपण का सबसे अच्छा उदाहरण आकाश में वर्षा के बाद दिखाई देने वाला इन्द्रधनुष है। सूर्य की सफेद किरणें जब जल की बूंदों पर पड़ती हैं, तो उनके प्रकाश का बूंदों के भीतर के अवतल तल से पूर्ण आन्तरिक परावर्तन होता है और जब यह बूंदों से बाहर निकलने लगती हैं, तो विक्षेपित हो जाती है और इस प्रकार विभिन्न रंग दिखाई पड़ते हैं। कभी-कभी दो इन्द्रधनुष दिखाई देते हैं। दूसरा इन्द्रधनुष बूंदों में दो बार आन्तरिक परावर्तन होने के कारण बनता है। दोनों का एक ही केन्द्र होता है और यह सूर्य के ठीक विपरीत दिशा में होता है। जब दो इन्द्रधनुष बनते हैं, तो एक को ‘प्राथमिक’ तथा दूसरे को ‘द्वितीयक इन्द्रधनुष’ कहते हैं।

    प्रकाश के सात रंगों में से लाल, हरा तथा नीला रंग ‘प्राथमिक रंग’ कहलाते हैं क्योंकि उन्हें विभिन्न अनुपात में मिलाने से अन्य रंग प्राप्त होते हैं। इस तरह मिलाने से जो रंग प्राप्त होते हैं उन्हें ‘द्वितीयक रंग’ कहते हैं।

    लाल + नीला = बैंगनी

    नीला + हरा = प्रशियन नीला (Peacock blue or Cyan)

    लाल + हरा = पीला

    जब दो रंग परस्पर मिलने से श्वेत प्रकाश उत्पन्न करते हैं, उन्हें ‘पूरक रंग’ कहते हैं।

    विभिन्न रंगों के मिश्रण से निम्नलिखित रंग प्राप्त कर सकते हैं:

    लाल + हरा = पीला लाल + नीला = मैजेंटा

    हरा + नीला = पीकॉक ब्ल्यू (सयान)

    हरा + मैजेंटा = श्वेत लाल + पीकॉक ब्ल्यू = श्वेत

    नीला + पीला = श्वेत लाल + हरा + नीला = श्वेत

  • वर्ण-विक्षेपण, प्रकाश-किरण और स्पेक्ट्रम

    Chromatic aberration, Light Beam and Spectrum

    वर्णक्रम अथवा स्पेक्ट्रम

    जब कोई प्रकाश-किरण प्रिज्म में से गुजरती है, तो वह अपने मार्ग से विचलित होकर प्रिज्म के आधार की ओर झुक जाती है। यदि किरण सूर्य के श्वेत प्रकाश की है, तो झुकने के साथ-साथ विभिन्न रंगों की किरणों में विभाजित भी हो जाती है। इस प्रकार से उत्पन्न विभिन्न रंगों के समूह को ‘वर्णक्रम अथवा स्पेक्ट्रम” (Spectrum) कहते हैं,

    जब सूर्य के प्रकाश को प्रिज्म के भीतर से गुजारा जाता है, तो हमें श्वेत निर्गत प्रकाश के स्थान पर रंगीन प्रकाश की पट्टी (Bond) प्राप्त होती है। रंगीन प्रकाश की पट्टी को ‘स्पेक्ट्रम’ कहते हैं और इसमें रंग लाल (R). नारंगी (O), पीला (Y), हरा (G), नीला (B), जामुनी (D और बैंगनी (V) रंग के होते हैं।

    वर्ण-विक्षेपण

    श्वेत प्रकाश के अपने अवयवी (Component) रंगों में विभक्त होने की क्रिया को ‘वर्ण-विक्षेपण’ कहते हैं।

    किसी पारदर्शी पदार्थ, जैसे कांच का अपवर्तनांक प्रकाश के रंग पर निर्भर करता है। यह लाल प्रकाश के लिए सबसे कम तथा बैंगनी प्रकाश के लिए सबसे अधिक होता है।

    प्रकाश-किरण और वर्ण-विक्षेपण

    प्रकाश-किरण कांच के प्रिज्म में से गुजरती है, तो वह अपने प्रारम्भिक मार्ग से विचलित होकर प्रिज्म के आधार की ओर झुक जाती है। प्रकाश-किरण में उत्पन्न यह विचलन कांच के अपवर्तनांक पर निर्भर करता है। अपवर्तनांक जितना अधिक होगा, प्रकाश-किरण का विचलन भी उतना ही अधिक होगा। अत: यदि प्रिज्म में से गुजरने वाली किरण श्वेत प्रकाश की है तब इस प्रकाश में उपस्थित भिन्न-भिन्न रंगों की किरणों में विचलन भिन्न-भिन्न होगा। कांच का अपवर्तनांक लाल प्रकाश के लिए सबसे कम तथा बैंगनी प्रकाश के लिए सबसे अधिक है। अत: लाल प्रकाश की किरण प्रिज्म के आधार की ओर सबसे कम झुकेगी तथा बैंगनी प्रकाश की किरण सबसे अधिक झुकेगी। इस प्रकार श्वेत प्रकाश का प्रिज्म में गुजरने पर वर्ण-विक्षेपण हो जाएगा।

  • सूक्ष्मदर्शी (Microscopes) क्या है ?

    What is Microscopes ?

    सूक्ष्मदर्शी एक ऐसा प्रकाशित यन्त्र है जिसकी सहायता से सूक्ष्म वस्तुएं देखी जाती है। इसके द्वारा सूक्ष्म वस्तु का आभासी एवं आवर्धित प्रतिबिम्ब स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी (25 सेमी.) पर बनता है जिससे वह स्पष्ट दिखायी देती है।

    सूक्ष्मदर्शी दो प्रकार के होते हैं (1) सरल सूक्ष्मदर्शी तथा (2) संयुक्त सूक्ष्मदर्शी

    सरल सूक्ष्मदर्शी (Simple Microscope)

    सरल सूक्ष्मदर्शी छोटी फोकस-दूरी का एक उत्तल (अभिसारी) लेंस होता है । इस लेन्स को ‘आवर्धक लेंस’ (Magnifying lens) भी कहते हैं।

    संयुक्त सूक्ष्मदर्शी (Compound Microscope)

    संयुक्त सूक्ष्मदर्शी छोटी वस्तुओं के देखने के काम में लाया जाता है। इसकी आवर्धन क्षमता सरल सूक्ष्मदर्शी की तुलना में बहुत अधिक होती है।

    इसमें एक ही अक्ष पर दो उत्तल लेन्स लगे होते हैं जो लेन्स वस्तु की ओर होता है, उसे अभिदृश्यक (Objective lens) और जो आंख के समीप होता है, उसे अभिनेत्र लेन्स (Eye lens) कहते हैं।

    खगोलीय दूरदर्शी (Astronomical Telescope)

    खगोलीय दूरदर्शी एक ऐसा प्रकाशिक यन्त्र है जो आकाशीय पिण्डों अथवा बहुत अधिक दूरी पर स्थित वस्तुओं को देखने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। यह यन्त्र दो उत्तल लेन्सों के संयोग से बनाया जाता है जो लेन्स वस्तु की ओर रहता है, उसे ‘अभिदृश्यक‘ कहते हैं।

    यह लेन्स अधिक फोकस दूरी तथा अधिक द्वारक (Aperture) का उत्तल लेन्स होता है। लेन्स का द्वारक अधिक होने के कारण दूर की वस्तु से आने वाले प्रकाश की अधिक मात्रा को यह एकत्र करता है जिससे दूरदर्शी से बने अन्तिम प्रतिबिम्ब की तीव्रता बढ़ जाती है।

    दूसरे उत्तल लेन्स को जिसके निकट आंख को रखकर दूर की वस्तु के प्रतिबिम्ब को देखा जाता है, ‘अभिनेत्र लेन्स’ कहते हैं। इस लेन्स की फोकस दूरी एवं द्वारक दोनों ही कम होते हैं।

  • गामा-किरणें (γ-Rays) क्या होती हैं ?

    गामा-किरणें (γ-किरण)

    गामा-किरणों को इनके अन्वेषक के नाम पर ‘बैकुरल किरणें’ भी कहते हैं। ये अत्यन्त लघु तरंग दैर्ध्य की विद्युत-चुम्बकीय तरंगें होती है।

    ये उच्च परमाणु द्रव्यमान के रेडियोधर्मी पदार्थों, जैसे यूरेनियम, रेडियम, थोरियम. प्लूटोनियम, आदि के परमाणुओं के नाभिकों के विघटन की क्रिया से उत्सर्जित होती है। इसकी भेदन क्षमता अल्फा तथा बीटा किरणों के मुकाबले अधिक होता है ये किरणें गैस को आयनीकृत कर देती हैं।

    इनकी आवृत्ति बहुत अधिक होने के कारण ये अपने साथ बहुत अधिक ऊर्जा ले जाती हैं। इनकी भेदन क्षमता इतनी अधिक होती है, कि ये 30 सेमी. मोटी लोहे की चादर को भेद कर निकल जाती हैं।

    ये फोटोग्राफिक प्लेटों पर रासायनिक क्रिया करती हैं। ये सोडियम आयोडाइड तथा अन्य प्रस्फुरक पदार्थों की पर्त वाले पर्दे (Fluorescent screen) पर प्रस्फुर (चमक) उत्पन्न करती है। इन प्रस्फुरों के द्वारा अथवा फोटोग्राफिक प्लेट पर प्रभाव से इन किरणों की पहचान की जाती है। इनका उपयोग नाभिकीय अभिक्रिया तथा कृत्रिम रेडियोधर्मिता में किया जाता है।

    उपयोग

    • गामा किरणे, ब्रह्माण्ड में होने वाली अति उच्च ऊर्जा वाली परिघटनाओं के बारे में जानकारी देता है।
    • गामा किरणों के द्वारा आनविक परिवर्तन किया जा सकता है। इसी प्रक्रिया द्वारा अर्ध-रत्नों (semi-precious stones) के गुणों को बदला जाता है।
    • संवेदक (सेन्सर) – स्तर (levels), घनत्व तथा मोटाई मापने के लिये।
    • जीवाणुओं को मारने के लिये – इसे गामा किरणन कहते हैं। गामा किरणन द्वारा चिकित्सा उपकरणों का रोगाणुनाशन (sterilization) किया जाता है जो रासायनिक विधि तथा अन्य विधियों से की जाने वाले रोगाणुनाशन का विकल्प बनकर उभरी है।
    • गामा किरणों के द्वारा भोज्य पदार्थों से उन जीवाणुओं को मार दिया जाता है जो उनका क्षय करते हैं।
    • फल और शब्जियों का अंकुरण रोकने के लिये, या अंकुरण की गति कम करने के लिये या अंकुरण में देरी करने के लिए।
    • कैंसर की चिकित्सा में (गामा किरणों के कारण कैंसर भी हो सकता है।)
  • ध्वनि-अनुनाद क्या होता है ?

    ध्वनि-अनुनाद

    जब किसी वस्तु पर कोई बाहरी आवर्ती (Periodic force) लगाया जाता है, तो वस्तु उस बल के प्रभाव में प्रणोदित कम्पन (Forced vibration) करने लगती है। 

    यदि आवर्ती बल की आवृत्ति, वस्तु की स्वाभाविक आवृत्ति के बराबर हो तो वस्तु के कम्पनों का आयाम अधिकतम हो जाता है। इस घटना को ‘अनुनाद’ (Resonance) कहते हैं। 

    1939 में संयुक्त राज्य अमेरिका का टैकोमा पुल यांत्रिक अनुनाद के कारण ही क्षतिग्रस्त हो गया था। उच्च गति की पवन पुल के ऊपर कम्पन करने लगी जो पुल की स्वाभाविक आवृत्ति के लगभग बराबर आवृत्ति की थी। इससे पुल में दोलन आरम्भ हो गया और यह कई घण्टे तक चलता रहा और कम्पन के आयाम में लगातार वृद्धि होते रहने के कारण पुल टूट गया। 

    उदाहरण

    1. सैनिकों को पल पार करने का प्रशिक्षण अनुनाद से बचने के लिए ही दिया जाता है। पुल को कम्पन कर सकने वाला एक निकाय माना जा सकता है जिसके लिए स्वाभाविक आवृत्ति का एक निश्चित मान होगा। यदि सैनिकों के नियमित पड़ने वाले कदमों की आवृत्ति पुल की आवृत्ति के बराबर हो जाए तो अनुनाद की स्थिति आ जाएगी और पुल में अधिक आयाम के कम्पन उत्पन्न हो जाएंगे। इससे पुल टूटने का खतरा रहता है। इसी कारण पुल पार करते समय सैनिकों की टुकडी कदम मिलाकर नहीं चलती। 
    2. बच्चों का झूला इसका एक सामान्य यांत्रिक उदाहरण है। झूले को ऊंचाई तक ले जाने के लिए उसे हर बार अधिक जोर से धक्का नहीं देना चाहिए, लेकिन उसे एक निश्चित अंतराल पर समान रूप से ही धक्का देना चाहिए। एक छोटे बल के प्रत्येक बार आरोपित होने से ही झूला अपनी उच्चतम स्थिति पर कुछ ही समय में पहुंच जाता है और उसकी गति विस्तृत हो जाती है।
    3. यदि कोई वायुयान कम ऊंचाई से गुजरता है, तो खिड़कियां खड़खडाने लगती हैं। ऐसा तब होता है जब खिड़की को स्वाभाविक आवृत्ति का मान वायुयान के इंजन की निकलने वाले शोर की आवृत्ति के बराबर हो जाता है। जब किसी कमरे में कोई बड़ा विस्फोट होता है, तो खिड़कियां तीव्र गति से खड़खड़ाने लगती हैं और ऐसा तब भी होता है जब खिड़िकियां बंद हों। यदि विस्फोट और भी शक्तिशाली हो, तो खिड़की टूटकर गिर सकती है। इसी प्रकार यदि कोई बम गिराया जाता है, तो कुछ दूरी तक के भवन गिर जाते हैं। 
    4. रेडियो भी अनुनाद के सिद्धान्त पर ही कार्य करता है, किसी रेडियो सेट को समस्वरित (Tune) करने के लिए रेडियो के धारिता के मान को तब तक परिवर्तित किया जाता है जब तक कि विद्युत की वह आवृत्ति न प्राप्त हो जाए जितनी आवृत्ति आ रहे ध्वनि संकेत की है। एण्टीना में छोटे विभवान्तर या वि.वा. बल उत्पन्न किए गए होते हैं जो समस्वरित परिपथ के आयाम के बराबर का आयाम बना सके।