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  • प्रतिचुम्बकीय, अनुचुम्बकीय तथा लौह चुम्बकीय पदार्थ क्या है ?

    What are Diamagnetic, Paramagnetic and Iron magnet Substances

    प्रतिचुम्बकीय पदार्थ (Diamagnetic Substances)

    जब इन पदार्थों को बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र लगाकर चुम्बकीय किया जाता है, तो उनके अन्दर उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र बाह्य आरोपित चुम्बकीय क्षेत्र के विपरीत होता है। अत: प्रतिचुम्बकीय पदार्थों की चुम्बकीय प्रवृत्ति का मान ऋणात्मक होता है। यदि इस पदार्थ की छड़ को एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाए, तो वह चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा के लम्बवत् हो जाता है। प्रतिचुम्बक का गुण प्रायः उन पदार्थों में पाया जाता है जिनके परमाणुओं में इलेक्ट्रॉनों की संख्या सम (Even) होती है। इनके उदाहरण हैं, बिस्मथ, ऐण्टिमनी, चांदी, सोना, नमक, जल, ऐल्कोहॉल, आदि।

    अनुचुम्बकीय पदार्थ (Paramagnetic Substances)

    इन पदार्थों के अंदर प्रेरित चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा बाह्य आरोपित चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में ही होती है। अतः इन पदार्थों की चुम्बकीय प्रवृत्ति धनात्मक होती है परन्तु इसका मान 1 से बहुत कम होता है। अनुचुम्बकत्व का गुण प्रायः उन पदार्थों में पाया जाता है जिनके परमाणुओं में इलेक्ट्रॉनों की संख्या विषम होती है। यदि किसी अनुचुम्बकीय पदार्थ की बनी छड़ को एकसमान (Uniform) चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाए तो वह क्षेत्र के समान्तर हो जाती है। इन पदार्थों के उदाहरण हैं—प्लैटिनम, क्रोमियम, सोडियम, ऐलुमिनियम, ऑक्सीजन, मैगनीज, आदि।

    लौहचुम्बकीय पदार्थ (Ferromagnetic Substances)

    ये वे पदार्थ हैं जिनमें उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र, आरोपित चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में ही होता है। अतः इन पदार्थो की चुम्बकीय प्रवृत्ति भी धनात्मक होती है और उसका मान 1 से बहुत अधिक होता है। यदि इन पदार्थों को बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाए तो स्वयं चुम्बक बन जाते हैं। इनके उदाहरण हैं—लोहा, इस्पात, निकल, कोबाल्ट, आदि।

    लौहचुम्बकीय पदार्थ में प्रत्येक परमाणु ही एक चुम्बक होता है और उनमें असंख्य परमाणुओं के समूह होते हैं, जिन्हें ‘डोमेन’ (Domains) कहते हैं। एक डोमेन में 1018 से 1021  तक परमाणु होते हैं। लौहचुम्बकीय पदार्थों का तीव्र चुम्बकत्व इन डोमेनों के कारण ही होता है।

  • चुम्बकीय बल और चुम्बकीय बल रेखाओं के गुण क्या है ?

    चुम्बकीय बल और चुम्बकीय बल रेखाओं के गुण क्या है ?

    What are the magnetic force and properties of magnetic force lines ?

    चुम्बकीय बल-रेखाएं सदैव चुम्बक के उत्तरी ध्रुव से निकलती हैं तथा वक्र बनाती हुई दक्षिणी ध्रुव में प्रवेश करती हैं और चुम्बक के अन्दर से होती हुई पुनः उत्तरी ध्रुव पर वापस आती है। इस प्रकार चुम्बकीय बल-रेखाएं बन्द वक्र के रूप में होती हैं। [विस्तृत जानकारी के लिए चुम्बकत्व टॉपिक पढ़े ]

    दो बल-रेखाएं एक-दूसरे को कभी नहीं काटती।

    चुम्बक के ध्रुव के समीप जहां चुम्बकीय क्षेत्र प्रबल होता है, वहां बल-रेखाएं पास-पास होती हैं। ध्रुव से दूर जाने पर चुम्बकीय क्षेत्र की प्रबलता घटती जाती है तथा बल-रेखाएं भी परस्पर दूर-दूर होती है।

    एक समान चुम्बकीय क्षेत्र की बल-रेखाएं परस्पर समानांतर एवं बराबर-बराबर दूरियों पर होती है।

    चुम्बकीय क्षेत्र में बल-रेखाएं के काल्पनिक रेखाएं हैं जो उस स्थान में चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा का अविरत प्रदर्शन करती है।

    चुम्बकीय बल-रेखा के किसी भी बिन्दु पर खींची गई स्पर्श रेखा उस बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा को प्रदर्शित करती है।

    चुम्बकशीलता

    जब एक समान चुम्बकीय क्षेत्र में नर्म लोहे की छड़ रखी जाती है, तो छड़ के भीतर चुम्बकीय बल-रेखाओं की सघनता बाहर की अपेक्षा बढ़ जाती है। इसके विपरीत जब इसी चुम्बकीय क्षेत्र में ऐलुमिनियम को छड़ रखी जाती है, तो छड़ के भीतर चुम्बकीय बल-रेखाओं की सघनता बाहर की अपेक्षा कम हो जाती है। पदार्थ के इस गुण को जिसके कारण उसके भीतर चुम्बकीय बल-रेखाओं की सघनता बढ़ या घट जाती है ‘चुम्बकशीलता‘ कहते हैं।

    चुम्बकीय बल-रेखाएं निर्वात में से होकर भी गुजरती हैं। अत: निर्वात में भी चुम्बकशीलता का गुण होता है।

    चुम्बकीय बल लगाकर लोहा, ऐलुमिनियम, आदि पदार्थों को चुम्बकीय किया जा सकता है।

    नर्म लोहा शीघ्र ही चुम्बक बन जाता है और शीघ्र ही इसका चुम्बकत्व समाप्त भी हो जाता है। इसीलिए अस्थायी चुम्बक (Temporary magenet) बनाने के लिए नर्म लोहे का प्रयोग किया जाता है। विद्युत चुम्बक नर्म लोहे के ही बनाए जाते हैं।

    विद्युत घण्टी, ट्रांसफॉर्मर क्रोड, डायनेमों, आदि में नर्म लोहे का ही उपयोग किया जाता है।

  • चुम्बकत्व (Magnetism) क्या है ?

    What is Magnetism ?

    पदार्थ का वह विशिष्ट गुण जिसके कारण वह लौह-चूर्ण एवं लोहे के छोटे-छोटे टुकड़े को आकर्षित करता है और स्वतन्त्र रूप से लटकाए जाने पर जिसके सिरे उत्तर-दक्षिण दिशा में स्थिर हो जाते हैं, उसे ‘चुम्बकत्व‘ कहते हैं।

    लौह चूर्ण का चुम्बक द्वारा आकर्षण चुम्बक के सिरों के समीप सबसे अधिक होता है।

    प्राकृतिक एवं कृत्रिम चुम्बक (Natural and Artificial Magnets)

    प्रकृति में लोहा और ऑक्सीजन का एक विशेष यौगिक धातु-खनिज या अयस्क के रूप में पाया जाता है जिसे मैग्नेटाइट कहा जाता है। मैग्नेटाइट के टुकड़ों को प्राकृतिक चुम्बक कहा जाता है। इसमें लोहे के टुकड़ों को आकर्षित करने तथा उत्तर दक्षिण दिशा का संकेत देने का गुण होता है। इसकी कोई निश्चित आकृति नहीं होती। कुछ पदार्थों को कृत्रिम विधियों द्वारा चुम्बक बनाया जा सकता है, इन्हें कृत्रिम चुम्बक कहते हैं इनकी लोहे के टुकड़ों को आकर्षित करने की शक्ति, प्राकृतिक चुम्बकों की अपेक्षा कहीं अधिक होती है।

    चुम्बकत्व

    चुम्बक लोहे को अपनी ओर आकर्षित करता है। इस गुण को ‘चुम्बकत्व’ कहते हैं। चुम्बक के सिरों के समीप चुम्बकत्व सबसे अधिक होता है तथा मध्य की ओर कम होता जाता है। चुम्बक के ठीक मध्य में चुम्बकत्व नहीं होता। चुम्बक के सिरों पर जिन क्षेत्रों में चुम्बकत्व सबसे अधिक होता है वे क्षेत्र चुम्बक के ‘ध्रुव’ (Poles) कहलाते हैं।

    उत्तरी ध्रुव (North pole) और दक्षिणी ध्रुव (South pole)

    चुम्बक को क्षैतिज तल में स्वतन्त्रतापूर्वक लटकाने पर उसका एक ध्रुव सदैव उत्तर की ओर तथा दूसरा ध्रुव सदैव दक्षिण की ओर ठहरता है। उत्तर की ओर ठहरने वाले ध्रुव को उत्तरी ध्रुव’ (North pole) तथा दक्षिण की ओर ठहरने वाले ध्रुव को ‘दक्षिणी ध्रुव’ (South pole) कहते हैं।

    चुम्बक के दोनों ध्रुवों को मिलाने वाली रेखा को ‘चुम्बकीय अक्ष’ (Magnetic axis) कहते हैं।

    दो चुम्बकों के विजातीय ध्रुव (उत्तर-दक्षिणी) एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं तथा सजातीय ध्रुव (उत्तर-उत्तरी अथवा दक्षिण-दक्षिणी) एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं।

    चुम्बकीय प्रेरण (Magnetic Induction)

    चुम्बक चुम्बकीय पदार्थों में प्रेरण (Induction) द्वारा चुम्बकत्व उत्पन्न कर देता है। यदि हम नर्म लोहे की छड़ को किसी शक्तिशाली चुम्बक के एक ध्रुव के समीप लाएं तो वह छड़ भी एक चुम्बक बन जाती है। छड़ के उस सिरे पर जो चुम्बक के ध्रुव के समीप है, विजातीय ध्रुव बनता है तथा दूसरे पर सजातीय ध्रुव बनता है। इस घटना को ‘चुम्बकीय प्रेरण’ (Magnectic induction) कहते हैं।

    एक अकेले चुम्बकीय ध्रुव का कोई अस्तित्व नहीं होता।

    यदि हम किसी छड़-चुम्बक की बीच में से दो भागों में तोड़ दें तो इसके उत्तरी व दक्षिणी (N व S) ध्रुव अलग-अलग नहीं होंगे, बल्कि प्रत्येक भाग एक पूर्ण चुम्बक होगा जिसमें दोनों ध्रुव होंगे। यदि हम इनमें से प्रत्येक भाग को पुन: तोड़ दें तो भी प्रत्येक छोटा भाग एक पूर्ण चुम्बक होगा। इससे स्पष्ट है, कि हम चुम्बक के ध्रुवों को कभी भी अलग-अलग नहीं कर सकते

    चुम्बकीय क्षेत्र (Magnetic Area)

    चुम्बक के चारों ओर कम्पास-सूई द्वारा चुम्बक के प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है। अतः चुम्बक के चारों ओर वह क्षेत्र, जिसमें चुम्बक के प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है, ‘चुम्बकीय क्षेत्र’ कहलाता है। चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा, चुम्बकीय सुई से निर्धारित की जाती है। चुम्बकीय क्षेत्र का मात्रक गौस (Gauss) होता है l

    किसी चुम्बकीय क्षेत्र के प्रत्येक बिन्दु पर क्षेत्र की एक निश्चित दिशा तथा एक निश्चित तीव्रता (परिमाण) होती है।

    क्षेत्र के किसी बिन्दु पर रखी कम्पास-सूई के दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर खींची गई रेखा की दिशा उस बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र की ‘दिशा’ कहलाती है।

    चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता एक सदिश राशि है

    इसका मात्रक न्यूटन/(ऐम्पियर-मीटर) अथवा वेबर/ मी. होता है। चुम्बकीय क्षेत्र के मात्रक को ‘टेसला’ (Tesla) कहते हैं।

  • दृश्य एवं अवरक्त विकिरण क्या होते हैं ?

    दृश्य विकिरण (Visible Radiation)

    इनके स्रोत सूर्य तथा तारों के अतिरिक्त ज्वाला (Flame), विद्युत-बल्ब, आर्क लैम्प, आदि ताप दीप्त वस्तुएं हैं। प्रकाश से ही हमें वस्तुएं दिखायी देती हैं। ये फोटोग्राफिक प्लेट पर रासायनिक क्रिया करती है। इनके संसूचन का प्रमुख साधन नेत्र हैं। 

    अवरक्त विकिरण (Infra-red Radiation)

    इन विकिरणों का पता हरशैल ने लगाया था। इनकी प्राप्ति तप्त वस्तुओं तथा सूर्य से होती है इनके द्वारा ऊष्मा का संचरण होता है अर्थात् ये किरणें ‘ऊष्मीय विकिरण’ है। ये जिस वस्तु पर पड़ती हैं उसका ताप बढ़ जाता है। इनका प्रकीर्णन बहुत कम होता है। इसलिए ये कुहरे में भी बहुत दूर तक चली जाती है।

    इनका संसूचन (Detection) तापपुंज (Thermopile) अथवा तापमापी से किया जा सकता है। इनका उपयोग अस्पतालों में रोगियों को सिकाई करने तथा कुहरे में फोटोग्राफी करने में होता है। TV के रिमोट कण्ट्रोल में भी इनका प्रयोग किया जाता है। 

  • पराबैंगनी विकिरण (Ultra-violet Radiation) क्या होता है ?

    पराबैंगनी विकिरण (Ultra-violet Radiation)

    इस विकिरण का पता रिटर (Ritter) ने लगाया था। ये सूर्य, आर्क, विद्युत स्पार्क, विसर्जन नलिका, आदि से प्राप्त होती हैं। इनकी भेदन क्षमता एक्स-किरणों से कम होती है। इनमें फोटोग्राफिक प्लेट पर रासायनिक क्रिया, प्रतिदीप्ति उत्पन्न करने तथा प्रकाश-विद्युत प्रभाव के गुण होते हैं।

    खोज

    इनकी खोज इस प्रेक्षण से बहुत कुछ जुङी हुई हैं, कि रजत नीरेय लवण (सिल्वर क्लोराइड) धूप पङने पर काले पङ जाते हैं। 1801 में जोहन्न विल्हैम रिटर ने एक विशिष्ट प्रेक्षण किया, कि बैंगनी प्रकाश के परे (ऊपर) अप्रत्यक्ष किरणें, रजत नीरेय के लवण में भीगे कागज को काला कर देतीं है। उसने उन्हें डी-ऑक्सिडाइजिंग किरणें कहा जिससे कि उनकी रसायनीय क्रियाओं पर बल दिया जा सके साथ ही इन्हें वर्णक्रम के दूसरे सिरे पर उपस्थित ऊष्म किरणों से पृथक पहचाना जा सके। कालांतर में एक सरल शब्द रासायनिक किरणें प्रयोग हुआ। जो कि उन्नीसवीं शताब्दी तक चला, जब जाकर दोनों के ही नाम बदले और पराबैंगनीएवं अधोरक्त’ कहलाए।

    उपयोग

    इनका संसूचन (Detection) प्रकाश-विद्युत प्रभाव, प्रतिदीप्त पर्दा अथवा फोटोग्राफिक प्लेट द्वारा किया जाता है। इनका उपयोग सिकाई करने, प्रकाश-विद्युत प्रभाव को उत्पन्न करने, हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने, आदि में किया जाता है।

  • एक्स-किरणें (X-rays) क्या होती हैं ?

    एक्स-किरणें (X-rays)

    इन किरणों को उनके अन्वेषक के नाम पर ‘रॉन्टजन किरणें’ भी कहते हैं। ये तीव्रगामी इलेक्ट्रॉनों के किसी भारी लक्ष्य वस्तु पर टकराने से उत्पन्न होती हैं। इनकी भेदन क्षमता गामा-किरणों से कम होती है।

    चिकित्सा में इनका उपयोग टूटी हड्डी तथा फेफड़ों के रोगों का पता लगाने में किया जाता है। इनका उपयोग जासूसी तथा इंजीनियरी में भी किया जाता है। X-किरणों की खोज सन् 1895 में विल्हम के रॉन्टजन ने की थी।

    उपयोग

    चिकित्सीय उपयोगों के अलावा भी एक्सरे का अनेकों प्रकार से उपयोग किया जाता है। एक्सरे के विशिष्ट गुणों के कारण उनका उपयोग विस्तृत रूप से विज्ञान की अनेक शाखाओं तथा विभिन्न उद्योगों में होता आ रहा है। उद्योगों में, विशेषत: निर्माण तथा निर्मित पदार्थो के गुणों के नियंत्रण में, एक्सरे का बहुत उपयोग होता है। निर्मित पदार्थो की अंतस्य त्रुटियाँ एक्सरे फोटोग्राफों द्वारा सरलता से ज्ञात की जा सकती हैं। विमान तथा उसी प्रकार के साधनों के यंत्रों में अति तीव्र वेग तथा चरम भौतिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता हैं; ऐसे यंत्रों के निर्माण में प्रत्येक अवयव अंतर्बाह्य निर्दोष तथा यथार्थ होना चाहिए। ऐसे प्रत्येक अवयव की परीक्षा एक्सरे से की जाती है और सदोष अवयवों का त्याग किया जाता है। धातु एक्सरे का अवशोषण करते हैं, अत: धातुओं के अंतर्भागों की परीक्षा के लिए मृदु एक्सरे अनुपयुक्त होते हैं। विशाल आकार के धात्वीय पदार्थो के लिए अत्युच्च विभव के एक्सरे की आवश्यकता होती है।

    धातु विज्ञान तथा धातुगवेषणा में एक्सरे अत्यंत उपयोगी हैं। धातु भी मणिभीय होते हैं, किंतु इनके मणिभ सूक्ष्म होते हैं और वे यथेच्छ प्रकार से स्थापित रहते हैं, अत: धातुओं की लावे-प्रतिमा में सामान्यत: संकेंद्र वर्तुल रहते हैं। प्रत्येक वर्तुल एक समान तीव्रता का होता है, किंतु किसी भौतिक क्रिया से कणों के आकारों में वृद्धि हो जाने पर इन वर्तुलों में बिंदु भी आते हैं। अत: एक्सरे व्याभंग द्वारा इसका ठीक ठीक पता चल जाता है कि धात्वीय मणिभों के कण किस प्रकार के हैं और उनका आकार आदि कैसा है। इस ज्ञान का धातुविज्ञान में अत्यंत महत्त्व है। धातु के पदार्थ बनाने के समय ऊष्मा के कारण उनमें अंतर्विकृति आ जाती है। धातु को मोड़ने से भी उसमें अंतर्विकृति हो जाती है। ऐसी विकृतियों का विश्लेषण एक्सरे से हो सकता है। इस प्रकार विशिष्ट गुणों से युक्त निर्दोष धातु प्राप्त करने में एक्सरे का विशेष उपयोग होता है।

    एक्सरे के अन्य उपयोगों में एक्सरे सूक्ष्मदर्शी उल्लेखनीय है। एक्सरे के तरंगदैर्घ्य प्रकाश के तरंगदैर्घ्यो से सूक्ष्म होते हैं, अत: एक्सरे सूक्ष्मदर्शी को प्रकाश सूक्ष्मदर्शी से अधिक प्रभावशाली होना चाहिए। 1948 में एक्सरे को केंद्रित करने के कर्कपैट्रिक के प्रयत्न अंशत: सफल हुए। इस रीति से तथा अन्य रीतियों से प्रतिबिंब का आवर्धन करने के प्रयत्न अब प्रायोगिक अवस्था पार कर चुके हैं और अनेक निर्माताओं द्वारा निर्मित कई प्रकार के एक्सरे सूक्ष्मदर्शी सुलभ हैं।

    प्रकाश सूक्ष्मदर्शी से जिन बातों का पता नहीं चल पाता उनका ज्ञान सरलतापूर्वक एक्सरे सूक्ष्मदर्शी से हो जाता है।

  • दृष्टि निबंध (Persistence of vision)

    What is Persistence of vision ?

    किसी वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना पर १/10 सेकण्ड तक रहता है। अतः यदि वस्तु को आंख के सामने से हटा दिया जाये तो वस्तु १/10 सेकण्ड तक दिखाई देती रहेगी। दृष्टि का यह विशेष गुण दृष्टि निबंध (Persistence of vision) कहलाता है।

    चलचित्र (Motion picture) इसी सिद्धान्त पर बनाये जाते हैं।

    दृष्टि निर्बध के कारण ही टूटे हुए तारे या उल्काएं आकाश गंगा में लम्बी रेखा जैसे मालूम पड़ते हैं।

    तेजी से घूमते हुए बिजली के पंखे भी अस्पष्ट इसी कारण दिखाई पड़ते हैं।

    एक ऐसा कैमरा जिसमें तेजी के साथ एक के बाद एक चित्र लिया जाता है. ‘चलचित्र कैमरा‘ कहलाता है।

    सिनेमा में प्रत्येक सेकण्ड 24 चित्रों को जो एक-दूसरे से थोड़ा-थोड़ा भिन्न होते हैं दिखाया जाता है। इस कारण हमें चित्र में वस्तु की गतिशीलता का अनुभव होता है। टेलीविजन के रिसीवर में प्रति सेकण्ड 25 पूर्ण चित्र दिखाएं जाते हैं।

  • पोलेराइड (Polaroids) क्या है ?

    What is Polaroids ?

    रेखीय ध्रवित या समतल ध्रुवित प्रकाश उत्पन्न करने के लिए पोलेराइड (Polaroids) नामक युक्ति का उपयोग किया जाता है। इसमें एक फिल्म होती है जिसे कांच की दो प्लेटों के बीच रखा जाता है। इस फिल्म को बनाने के लिए नाइट्रो सेलुलोज (Nitro cellulose) की एक पतली शीट पर कार्बनिक यौगिक हरपेथाइट (Herapathite) या आयडोक्विनाइन सल्फेट (Idoquinine sulphate) के अति सूक्ष्म आकार के क्रिस्टल इस प्रकार फैलाकर रखें जाते हैं, कि सभी क्रिस्टलों के अक्ष एक-दूसरे के समानान्तर रहें।

    पोलेराइड के उपयोग (Uses of Polaroids)

    1. प्रकाश की चकाचौंध दूर करने के लिए सन ग्लासेस (Sunglasses) में।

    2. मोटर कार के विंड स्क्रीन (Wind screen) तथा हेडलाइट के कवर ग्लास पर पोलेराइड लगा दिया जाते हैं। पोलेराइडों के अक्ष ऊर्ध्वाधर से 45° के कोण पर झुके रहते हैं।

    3. वायुयान और ट्रेन में प्रवेश करने वाले प्रकाश की तीव्रता को नियन्त्रित करने में।

    4.त्रिविमीय वाले चित्रों को देखने में।

    5. धातुओं के प्रकाशीय गुणों के अध्ययन में।

    6. पोलेराइड फोटोग्राफी और कैमरा में

  • यान्त्रिक तरंगें (अनुदैर्ध्य और अनुप्रस्थ तरंग) क्या है ?

    Mechanical waves (Longitudinal and Transverse waves)

    अनुदैर्ध्य तरंग में माध्यम के कण तरंग-संचरण के अनुदिश ही कम्पन करते हैं किन्तु अनुप्रस्थ तरंग में माध्यम के कण तरंग-संचरण की दिशा के लम्बवत् कम्पन करते हैं।

    दोनों ही तरंगों में परावर्तन, अपवर्तन और विवर्तन की घटनाएं होती हैं। अत: इन गणों के आधार पर इन दोनों ही तरंगो में विभेद कर पाना संभव नही है। ध्रुवण प्रकाश सम्बन्धी ऐसी घटना है जो अनुदैर्ध्य तरंग और अनुप्रस्थ तरंग में अन्तर स्पष्ट करती है।

    अनुदैर्ध्य तरंग में ध्रुवण की घटना नहीं होती, जबकि अनुप्रस्थ तरंग में ध्रुवण की घटना होती है। ध्वनि तरंगों में ध्रुवण नहीं होता हैं क्योंकि वे वायु में अनुदैर्ध्य तरंगे हैं।

    प्रकाश तरंगें अनुप्रस्थ होती हैं। अनुप्रस्थ तरंगों के कम्पन तरंग-संचरण की दिशा के लम्बवत् होते हैं। उदाहरणार्थ, यदि प्रकाश-तरंग कागज के तल के लम्बवत् दिशा में गमन करती है, तो उसके कम्पन कागज के तल में होंगे।

    प्रकाश एक विद्युत-चुम्बकीय तरंग भी है।

    प्रकाश एक विद्युत-चुम्बकीय तरंग भी है। विद्युत-चुम्बकीय तरंग को संचिरत होने के लिए माध्यम की आवश्यकता नहीं होती है। प्रकाश-तरंग में विद्युत-वेक्टर (अर्थात् विद्युत क्षेत्र) और चुम्बकीय-वेक्टर (अर्थात् चुम्बकीय क्षेत्र) प्रकाश-संचरण की दिशा के लम्बवत् तलों में एक-दूसरे के लम्बवत् दोलन करते हैं। प्रकाश तरंगों का प्रकाशकीय प्रभाव केवल विद्युत-वेक्टरों के कारण होता है।

    अधुवित प्रकाश (Unpolarised light)

    साधारण प्रकाश में विद्युत-वेक्टर के कम्पन (या अनुप्रस्थ कम्पन) प्रकाश-संचरण की दिशा के लम्बवत् तल में प्रत्येक दिशा में समान रूप से अथवा सममित रूप से होते हैं। ऐसे प्रकाश को अधुवित प्रकाश (Unpolarised light) कहते हैं। प्रकाश-स्रोतों जैसे विद्युत बल्ब, मोमबत्ती, ट्यूब-लाइट, आदि से उत्सर्जित प्रकाश अधुवित प्रकाश होते हैं।

    ‘ध्रुवण’ (Polarisation)

    यदि प्रकाश-तरंग के कम्पन (या विद्युत-वेक्टर के कम्पन) प्रकाश-संचरण की दिशा में लम्बवत् तल में एक ही दिशा में हों, प्रत्येक दिशा में समहित न हों, तो इस प्रकाश को समतल ध्रुवित प्रकाश (Plane polarised light) भी कहते हैं। प्रकाश सम्बन्धी यह घटना ‘ध्रुवण’ (Polarisation) कहलाती है। समतल ध्रुवित प्रकाश को ‘रेखीय ध्रुवित प्रकाश (Linearly polarised light) भी कहते है।

  • प्रकाश तरंगों का विवर्तन क्या है ?

    What is Diffraction of Light Waves ?

    ध्वनि तरंगों के रूप में आगे बढ़ती है। जब ध्वनि के मार्ग में कोई अवरोध (Obstacle) आ जाता है, तो वह मुड़कर चलने लगती है। यही कारण है, कि कमरे के बाहर की आवाज कमरे के अन्दर चारों ओर फैलकर वहां बैठे प्रत्येक व्यक्ति को सुनाई देने लगती है। किनारों पर ध्वनि तरंगों का मुड़ना ध्वनि का विवर्तन कहलाता है।ध्वनि तरंगों की तरंग-दैर्ध्य अवरोध के आकार की कोटि की होती है, अतः ध्वनि का विवर्तन आसानी से ज्ञात हो जाता है।

    विवर्तन

    विवर्तन, प्रत्येक प्रकार की तरंग का एक गुण होता है। प्रकाश भी एक तरंग है। अत: उसमें भी विवर्तन का गुण होता है। सामान्य परिस्थितियों में प्रकाश का विवर्तन दृष्टिगोचर नहीं होता। किन्तु जब प्रकाश किसी छोटे छिद्र (स्लिट) से गुजरता है या उसके मार्ग में कोई बहुत पतली वस्तु (अवरोध), जैसे—बाल, तार, इत्यादि आ जाती है, तो प्रकाश किनारे पर कुछ मुड़ जाता है जिससे प्रकाश रंगीन दिखाई देने लगता है तथा छाया के किनारे तीक्ष्ण (Sharp) नहीं होते हैं।

    तीक्ष्ण धार वाले किनारों पर प्रकाश का मुड़ना तथा अवरोध द्वारा बनी ज्यामितीय छाया में प्रकाश के अतिक्रमण की घटना को प्रकाश का विवर्तन कहते हैं।

    प्रकाश का विवर्तन के अनुप्रयोग

    प्रकाश के विवर्तन के कारण ही दूरदर्शी में तारों के प्रतिबिम्ब तीक्ष्ण बिन्दुओं की तरह दिखाई न देकर अस्पष्ट धब्बों की तरह दिखाई देते हैं।

    जब आप किसी ग्रामोफोनर रिकार्ड या कॉम्पैक्ट डिस्क को किसी कोण से देखते हैं, तो वह इन्द्रधनुषी दिखता है। इसका कारण यह है, कि जब श्वेत प्रकाश की किरण डिस्क के विभिन्न उभारों से होकर समानान्तर गुजरती है, तो वे उभार प्रिज्म की तरह कार्य करते हैं और प्रकाश की श्वेत किरणें सात वर्गों में टूट जाती है। पुनः इन विक्षेपित किरणों का विवर्तन व संचरण होता है, तब वे हमारी आंख तक पहुंचती हैं।