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  • न्यूटन का शीतलन नियम (Newton’s Law of Cooling) क्या है ?

    न्यूटन का शीतलन नियम (Newton’s Law of Cooling) क्या है ?

    न्यूटन का शीतलन नियम (Newton’s Law of Cooling)

    यदि एक बर्तन में गरम जल भर दिया जाए और फिर उसे ठण्डा होने दिया जाए तो प्रारम्भ में जल का ताप जल्दी-जल्दी कम होता है और जैसे-जैसे जल तथा वातावरण के ताप में अन्तर कम होता है, ताप गिरने की दर धीरे-धीरे कम होती जाती है।

    विकिरण द्वारा किसी वस्तु से क्षय होने वाली ऊष्मा की दर, के पृष्ठ की प्रकृति, उसके पृष्ठ क्षेत्रफल तथा उसके व आस-पास के वातावरण के ताप के अन्तर पर निर्भर करती है।

    इसका अध्ययन सर्वप्रथम न्यूटन ने किया था। न्यूटन के शीतलन नियम के अनुसार, समान अवस्था रहने पर विकिरण द्वारा किसी वस्तु के ठण्डे होने की दर (अर्थात् वस्तु की ऊष्मा क्षय होने की दर), उस वस्तु और आस-पास के वातावरण के ताप के अन्तर के अनुक्रमानुपाती होती है (जबकि ताप का अन्तर बहुत अधिक न हो)।

    उदाहरण

    अत: यदि गर्म दूध को थाली (बड़े पृष्ठ क्षेत्रफल वाली वस्तु) में डाला जाए तो वह शीघ्र ठण्डा हो जाता है। अत: वस्तु जैसे-जैसे ठण्डी होती जाएगी उसके ठण्डे होने की दर कम होती जाएगी।

  • विकिरण (Radiation) क्या होता है ?

    विकिरण (Radiation) क्या होता है ?

    विकिरण (Radiation)

    ऊष्मा संचरण की इस विधि में माध्यम कोई भाग नहीं लेता है। इस विधि में ऊष्मा, गरम वस्तु से ठण्डी वस्तु की ओर बिना किसी माध्यम की सहायता के (अर्थात् निर्वात में भी) तथा बिना माध्यम को गरम किए प्रकाश की चाल में सीधी रेखा में संचरित होती है। 

    उदाहरण

    पृथ्वी पर सूर्य से ऊष्मा विकिरण विधि द्वारा ही प्राप्त होती है। सूर्य तथा पृथ्वी के बीच बहुत अधिक स्थान में कोई भी माध्यम नहीं है तथा निर्वात फैला हुआ है, अत: चालन अथवा संवहन की विधि से ऊष्मा पृथ्वी तक नहीं आ सकती है (क्योंकि इनके लिए माध्यम आवश्यक है)। माध्यम की अनुपस्थिति में ऊष्मा पृथ्वी तक विकिरण द्वारा प्रकाश तरंगों के साथ पहुंचती है। विकिरण में ऊष्मा, तरंगों के रूप में चलती है जिन्हें ‘विद्युत-चुम्बकीय तरंगे’ कहते हैं। 

    उपयोग

    • चाय की केतली की बाहरी सतह चमकदार बनायी जाती है: चमकदार सतह न तो बाहर से ऊष्मा का अवशोषण करती है और न भीतर की ऊष्मा बाहर जाने देती है। अत: चाय देर तक गर्म बनी रहती है।
    • प्रयोगशाला में ऊष्मामापी की बाहरी सतह को, इंजन में भाप की नलियों को तथा गर्म जल ले जाने वाले पाइपों की बाहरी सतहों को पॉलिश द्वारा चमकदार बनाकर विकिरण द्वारा होने वाले ऊष्मा-ह्रास (Heat-loss) को घटाया जाता है। 
    • पॉलिश किए हुए जूते धूप में शीघ्र गर्म नहीं होते क्योंकि वे अपने ऊपर गिरने वाली ऊष्मा का अधिकांश भाग परावर्तित कर देते हैं।
    • रेगिस्तान दिन में बहुत गरम तथा रात में बहुत ठण्डे हो जाते हैं: रेत ऊष्मा का अवशोषक है, अत: दिन में सूर्य की ऊष्मा को अवशोषित करके गर्म हो जाता है। रात में वह अपनी ऊष्मा को विकिरण द्वारा खोकर ठण्डा हो जाता है।
    • बादलों वाली रात, स्वच्छ आकाश वाली रात की अपेक्षा गर्म होती है: दिन में सूर्य की गरमी से पृथ्वी गर्म हो जाती है तथा रात को विकिरण द्वारा ठण्डी होती है। जब आकाश स्वच्छ होता है, तो ऊष्मा विकिरण द्वारा पृथ्वी से आकाश की ओर चली जाती है। परन्तु जब आकाश में बादल छाए रहते हैं, तो ऊष्मा के विकिरण बादलों से टकराते हैं। परन्तु बादल ऊष्मा के बुरे अवशोषक है, अत: ऊष्मा के विकिरण पृथ्वी की ओर वापस आ जाते हैं जिससे पृथ्वी गर्म ही बनी रहती है।
  • संवहन (Convection) क्या होता है ?

    संवहन (Convection) क्या होता है ?

    संवहन (Convection)

    तरल पदार्थों (द्रव अथवा गैस) में ऊष्मा का संचरण मुख्यतः संवहन द्वारा होता है। ठोसों में संवहन द्वारा ऊष्मा संचरण सम्भव नहीं है। इस विधि में तरल के कण गरम भाग से ऊष्मा लेकर स्वयं हल्के होकर ऊपर उठते हैं तथा ठण्डे भाग की ओर जाते हैं। इनका स्थान लेने के लिए पुनः ठण्डे भाग से नीचे आते हैं।

    इस प्रकार, संवहन विधि में ऊर्ध्वाधरतः तापान्तर होने पर ऊष्मा का प्रवाह नीचे से ऊपर की ओर माध्यम के घनत्व में परिवर्तन होने के कारण संवहन धाराओं द्वारा होता है।

    उदाहरण

    जब हम एक बीकर में जल लेकर उसे नीचे से गरम करते हैं, तो बीकर की तली का पानी पहले गरम होता है जिससे इसका घनत्व कम हो जाता है। घनत्व कम हो जाने के कारण (या प्रसार के कारण) यह जल ऊपर उठता है तथा उसका स्थान लेने के लिए ऊपर से ठण्डा जल (अधिक घनत्व के कारण) नीचे आता है। फिर वह भी ऊष्मा लेकर तथा गरम होकर ऊपर उठ जाता है और उसका स्थान पुनः ऊपर से आकर ठण्डा जल ले लेता है।

    इस प्रकार, सम्पूर्ण जल में संवहन धाराएं प्रवाहित होने लगती हैं जिससे ऊष्मा, जल के विभिन्न भागों में पहुंचकर सम्पूर्ण जल को गरम कर देती है।

    उपयोग

    • रेफ्रिजरेटर में फ्रीजर पेटिका को ऊपर रखा जाता है। जिससे कि फ्रीजर पेटिका के नीचे का शेष स्थान संवहन धाराओं द्वारा ठण्डा बना रहे। इसका कारण यह है, कि नीचे की गरम वायु हल्की होने के कारण ऊपर उठती है तथा फ्रीजर पेटिका से टकराकर ठण्डी हो जाती है। ऊपर की ठण्डी वायु भारी होने के कारण नीचे आती है तथा रेफ्रिजरेटर में इस स्थान में रखी वस्तुओं जैसे—पानी की बोतल, साग-सब्जी, आदि से टकराकर उन्हें ठण्डा कर देती है।
    • समुद्री हवाएं तथा स्थली हवाएं: दिन के समय सूर्य की गर्मी से जल की अपेक्षा थल जल्दी गरम हो जाता है जिससे थल के सम्पर्क की हवाएं ऊपर उठती हैं तथा उनका स्थान लेने के लिए समुद्र की ओर से ठण्डी हवाएं थल की ओर बहने लगती हैं। इन हवाओं को ‘समुद्री हवाएं’ (Sea breeze) कहते हैं। 
    • रात के समय थल, जल की अपेक्षा जल्दी ठण्डा हो जाता है। इसलिए समुद्र के जल से सम्पर्क की गरम हवाएं ऊपर उठती हैं तथा इनका स्थान लेने के लिए थल से समुद्र की ओर हवाएं चलने लगती है। इन्हें ‘स्थली हवाएं’ (Land breeze) कहते हैं।
    • बिजली के बल्बों में निष्क्रिय गैसों का भरा जाना: बिजली के बल्बों में निर्वात के स्थान पर निष्क्रिय गैसें, जैसे—आर्गन, आदि भरी जाती है। इसका कारण यह है, कि बल्ब के अन्दर निर्वात होने पर तन्तु के चलने पर उत्पन्न ऊष्मा से तन्तु का ताप इतना बढ़ सकता है, कि तन्तु पिघल जाए। लेकिन बल्ब में निष्क्रिय गैस भरने से तन्तु की ऊष्मा संवहन धाराओं द्वारा चारों ओर फैल जाती है जिससे तन्तु का ताप उसके गलनांक तक नहीं बढ़ पाता है। निष्क्रिय गैस होने से वह तन्तु के पदार्थ के साथ कोई रासायनिक क्रिया भी नहीं करती है। यदि वायु भर दी जाए तो उसके अन्दर की ऑक्सीजन तन्तु की धातु से क्रिया करके उसे ऑक्साइड में बदल देगी और तन्तु का चमकना बन्द हो जाएगा। 
  • चालन (Conduction) क्या होता है ?

    चालन (Conduction) क्या होता है ?

    चालन (Conduction)

    यह ऊष्मा संचरण की ऐसी विधि है जिसमें माध्यम के कण भाग तो लेते हैं परन्तु अपने स्थान को नहीं छोड़ते हैं। इसमें ऊष्मा माध्यम के गरम भागों से ठण्डे भागों की ओर प्रत्येक कण से समीपवर्ती अन्य कणों में होती हुई संचरित होती है। 

    चालन द्वारा ऊष्मा का संचरण सभी पदार्थों (ठोस, द्रव तथा गैसों) से सम्भव है परन्तु ठोसों (तथा पारे) में ऊष्मा का संचरण केवल चालन द्वारा ही होता है। द्रवों तथा गैसों में ऊष्मा का संचरण चालन द्वारा बहुत कम होता है। 

    उदाहरण

    यदि हम किसी धातु की छड़ का एक सिरा गरम करें तो यह सिरा ऊष्मा पाकर गरम हो जाता है तथा चालन द्वारा ऊष्मा दूसरे सिरे तक पहुंचकर उसे भी गरम कर देती है। जिस सिरे को हम गरम करते हैं, उस सिरे के कण ऊष्मा पाकर अपनी मध्यमान स्थिति के दोनों ओर तेजी से तथा अधिक आयाम से कम्पन करने लगते हैं तथा अपने निकट वाले पृष्ठ के कणों से टकराते हैं तथा उन्हें ऊष्मा दे देते हैं। इस पृष्ठ के कण (जो अब तेजी से कम्पन करने लगे हैं) अपने निकट वाले पृष्ठ के कणों को ऊष्मा दे देते हैं इस प्रकार, ऊष्मा दूसरे सिरे तक एक पृष्ठ के कणों से दूसरे पृष्ठ के कणों में होती हुई पहुंच जाती है। 

    ऊष्मा चालकता

    पदार्थ में चालन द्वारा ऊष्मा का संचरण ‘ऊष्मा चालकता’ कहलाती है। ऊष्मा चालकता के आधार पर पदार्थों को तीन वर्गों में बांटा जाता है: 

    चालक

    वे पदार्थ जिनसे होकर ऊष्मा का चालन सरलता से होता है, ‘चालक’ कहलाते हैं। उदाहरण 6 अम्लीय जल, सभी धातु। 

    ऊष्मारोधी

    वे पदार्थ जिनसे होकर ऊष्मा का चालन बिल्कुल नहीं होता है, ‘ऊष्मारोधी’ कहलाते हैं। ऐसे पदार्थ की ऊष्मा चालकता शून्य होती है। एस्बेस्टॉस व एवोनाइट ऊष्मारोधी पदार्थ हैं।

    कुचालक

    वे पदार्थ जिनसे होकर ऊष्मा का चालन सरलता से नहीं होती है, ‘कुचालक’ कहलाते हैं उदाहरण—वायु, गैसें, रबर, लकड़ी व कांच, आदि। 

    उपयोग

    • एस्किमो लोग बर्फ की दोहरी दीवारों के मकान में रहते हैं: इसका कारण यह है, कि बर्फ की दोहरी दीवारों के बीच हवा की पर्त ऊष्मा की कुचालक होती है जिससे अन्दर की ऊष्मा बाहर नहीं जा पाती है तथा कमरे के अन्दर का ताप बाहर की अपेक्षा अधिक बना रहता है। 
    • शीत ऋतु में लकड़ी एवं लोहे की कुर्सियां एक ही ताप पर होती हैं परन्तु लोहे की कुर्सी छूने पर लकड़ी की कुर्सी की अपेक्षा अधिक ठण्डी लगती है: शीत ऋतु में शरीर का ताप, कमरे के ताप से अधिक होता है। लोहे की कुर्सी को छूने पर हमारे हाथ से ऊष्मा तापान्तर के कारण लोहे की कुर्सी में शीघ्रता से प्रवाहित होती है क्योंकि लोहा ऊष्मा का सुचालक है। अत: लोहे की कुर्सी छूने पर हमें ठण्डी प्रतीत होती है लेकिन लकड़ी ऊष्मा की कुचालक है, इसलिए वही तापान्तर होने पर भी हमारे हाथ से ऊष्मा लकड़ी में प्रवाहित नहीं होती है और लकड़ी की कुर्सी छूने पर वह हमें ठण्डी प्रतीत नहीं होती 
    • धातु के प्याले में चाय पीना कठिन है जबकि चीनी मिट्टी के प्याले में चाय पीना आसान है: इसका कारण यह है, कि धातु ऊष्मा की सुचालक होती है, अत: धातु के प्याले में चाय पीने पर चाय से ऊष्मा धातु में होकर होंठों तक पहुंच जाती है और होंठ जलने लगते हैं जबकि चीनी मिट्टी ऊष्मा की कुचालक होती है, अत: चाय से ऊष्मा चीनी मिट्टी से होकर होंठों तक नहीं पहुंच पाती है और चाय पीना आसान होता है।
  • अति चालक (Super Conductors) क्या है ?

    अति चालक (Super Conductors) क्या है ?

    What is Super Conductors ?

    यदि किसी धातु का ताप कम कर दिया जाए तो उसमें विद्युत चालन बढ़ जाता है अर्थात् उसका विद्युत प्रतिरोध (Resistance) कम हो जाता है l कुछ धातुओं का प्रतिरोध परम शून्य ताप (0 K ) के निकट पहुचने पर लगभग शून्य हो जाता है l और तब वे ‘अतिचालक‘ कहलाते है l

    कुछ सेरामिक पदार्थ (Ceramics) 100 K माप पर ही अतिचालक बन जाते है l

    अतिचालकता की खोज एक डच भौतिकशास्त्री कैमरलिंग ओनिस द्वारा 1911 में की गई।

    अतिचालक पदार्थ के उपयोग से ऊर्जा का अधिकाधिक उपयोग किया जा सकता है l यह अतिचालकता की प्रथम व सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

  • विद्युत-धारा का प्रवाह और चालक क्या है ?

    विद्युत-धारा का प्रवाह और चालक क्या है ?

    What is Current flow and conductor of electric current ?

    विद्युत-धारा का प्रवाह

    कुछ पदार्थों में परमाणु ऐसे होते हैं, कि उनमें से बाहरी इलेक्ट्रॉनों को आसानी से निकाला जा सकता है। इन इलेक्ट्रॉन को ‘मुक्त इलेक्ट्रॉन(Free electron) कहते हैं। ये इलेक्ट्रॉन एक परमाणु से निकलकर दूसरे में आसानी से चले जाते हैं। किसी पदार्थ में विद्युत आवेश का प्रवाह (विद्युत-धारा का प्रवाह) पदार्थ में उपस्थित इन्हीं मुक्त इलेक्ट्रॉनों की गति के कारण होता है अर्थात् ये इलेक्ट्रॉन ही आवेश वाहक (Charge carriers) का कार्य करते हैं।

    मुक्त इलेक्ट्रॉन की संख्या के आधार पर पदार्थों को मुख्यत: निम्नलिखित तीन वर्षों में बांटा जा सकता है:

    चालक

    धातुओं (जैसे—चादी, तांबा, ऐलुमिनियम, आदि) में अपेक्षाकृत मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या बहुत अधिक होती है, अतः इनमें विद्युत चालन सम्भव होता है। ये पदार्थ चालक कहलाते हैं। इन्हें आवेश देने पर यह तुरन्त इनके सम्पूर्ण पृष्ठ पर फैल जाता है।

    अचालक या विद्युतरोधी

    वे पदार्थ (जैसे लकड़ी, कांच, एबोनाइट, आदि) जिनमें अपेक्षाकृत बहुत कम (लगभग नगण्य) मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं, ‘अचालक’ या ‘कुचालक’ या ‘विद्युतरोधी‘ कहलाते हैं। इनमें विद्युत चालन सम्भव नहीं होता है।

    अर्द्धचालक

    वे पदार्थ जिनमें मुक्त इलेक्ट्रॉन न बहुत अधिक और न बहुत कम होते हैं, अर्द्धचालक कहलाते हैं। उदाहरण के लिए, कार्बन, सिलिकॉन, जर्मेनियम, आदि अर्द्धचालक हैं। इनमें साधारण ताप तथा निम्न ताप पर विद्युत चालन सम्भव नहीं होता है, लेकिन उच्च ताप पर विद्युत चालन सम्भव हो जाता है।

  • तड़ित चालक (Lightning Conductor) क्या है ?

    तड़ित चालक (Lightning Conductor) क्या है ?

    What is Lightning Conductor ?

    तड़ित चालक दो आवेशित बादलों के बीच या आवेशित बादलों व पृथ्वी के बीच होता है। तड़ित चालक का प्रयोग तड़ित के दौरान बहुत ऊंचे भवनों की सुरक्षा के लिए किया जाता है। तड़ित चालक एक मोटी तांबे की पट्टी होती है। जिसके ऊपरी सिरे पर कई नुकीले सिरे बने होते हैं। इस नुकीले सिरे को भवनों के सबसे ऊपर के भाग पर लगा दिया जाता है तथा दूसरे सिरे को तांबे की पट्टी के साथ जमीन में गाड़ दिया जाता है।

    जब आवेशित बादल भवन के ऊपर से गुजरते हैं तो उनका आवेश तड़ित चालक के नुकीले भाग द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है तथा यह आवेश कुछ तो संवहन धाराओं द्वारा वायु में वितरित कर दिया जाता है और कुछ भवन को बिना किसी नुकसान के जमीन में स्थानान्तरित कर दिया जाता है। इस प्रकार भवनों की तड़ित से सुरक्षा हो जाती है।

  • विद्युत एवं उसके प्रभाव (Electricity and its Effects) क्या है ?

    विद्युत एवं उसके प्रभाव (Electricity and its Effects) क्या है ?

    What are Electricity and its Effects ?

    विद्युत वह ऊर्जा है जिसके कारण किसी पदार्थ में हल्की वस्तुओं को आकर्षित करने का गुण उत्पन्न हो जाता है

    दो वस्तुओं को आपस में रगड़ने से उत्पन्न विद्युत को ‘घर्षण विद्युत’ (Frictional electricity) कहते हैं। यदि पदार्थ में उत्पन्न हुई इस विद्युत को स्थिर रखा जाए (अर्थात् बहने नहीं दिया जाए) तो इसे ‘स्थिर-विद्युत‘ भी कहते हैं।

    विद्युत आवेश’ (Electric charge)

    स्थिर-विद्युत दो प्रकार की होती है। यदि कांच की छड़ को रेशम से रगड़कर विद्युत उत्पन्न की जाए तो कांच में धनात्मक विद्युत तथा रेशम में ऋणात्मक विद्युत उत्पन्न होती है। इसी प्रकार जब ऊनी कपड़े को ऐम्बर, एबोनाइट, प्लास्टिक या रबड़ से रगड़कर विद्युत उत्पन्न की जाती है, तो प्लास्टिक, आदि में ऋणात्मक विद्युत और ऊन में उतनी ही धनात्मक विद्युत उत्पन्न होती है। इसी प्रकार जब बिल्ली की खाल को एबोनाइट छड़ से रगड़ते हैं, तो खाल धनावेशित तथा छड़ ऋणावेशित हो जाती है। विद्युत ऊर्जा की मात्रा (Quantity of electricity) को ‘विद्युत आवेश’ (Electric charge) कहते हैं।

    समान प्रकार के (अर्थात् धन-धन या ऋण-ऋण) आवेश परस्पर प्रतिकर्षित करते हैं तथा विपरीत प्रकार के (Unlike) आवेश परस्पर आकर्षित करते हैं ।

    विद्युत-आवेश के मूलस्रोत प्रोटॉन तथा इलेक्ट्रॉन

    प्रत्येक पदार्थ परमाणुओं से बना होता है। परमाणु के भीतर धनावेशित मूल कण प्रोटॉन, ऋणावेशित मूल कण इलेक्ट्रॉन तथा आवेशरहित मूल कण न्यूट्रान होते हैं। किसी भी वस्तु में प्रोटॉनों तथा इलेक्ट्रॉनों की संख्या बराबर होती है। यदि किसी वस्तु से कुछ इलेक्ट्रॉन बाहर निकाल दिए जाएं तो वस्तु में प्रोटॉनों की संख्या इलेक्ट्रॉनों की संख्या से अधिक हो जाएगी। इससे वस्तु धनावेशित हो जाएगी। वस्तु में यदि कुछ इलेक्ट्रॉन बाहर से दे दिए जाएं तो वस्तु में इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रोटॉनों की संख्या से अधिक हो जाएगी। इससे वस्तु ऋणावेशित हो जाएगी। इससे यह स्पष्ट हो गया, कि विद्युत-आवेश के मूलस्रोत प्रोटॉन तथा इलेक्ट्रॉन हैं। ये वस्तु में ही विद्यमान रहते हैं ।

    प्रयोगों से पता चलता है, कि जब किसी धातु के खोखले चालक पदार्थ को स्थिर-विद्युत से आवेशित किया जाता है, तो विद्युत आवेश चालक की केवल बाहरी सतह पर ही स्थित होता है, चालक के अन्दर नहीं। उसका अन्दर का भाग बिल्कुल आवेश रहित हो जाता है। यही कारण है, कि यदि किसी कार पर तड़ित विद्युत (Lightning) गिर जाए तो कार के अन्दर बैठे हुए व्यक्ति पूर्ण सुरक्षित रहते हैं। तड़ित से प्राप्त विद्युत आवेश कार की बाहरी सतह पर ही रहता है ।

  • भू-चुम्बकत्व (Terrestrial Magnetism) क्या है ?

    भू-चुम्बकत्व (Terrestrial Magnetism) क्या है ?

    What is Terrestrial Magnetism ?

    किसी स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को तीन तत्वों (Element) द्वारा व्यक्त किया जाता है:

    दिक्पात् कोण (Angle of declination), नमन कोण (Angle of dip) तथा चुम्बकीय क्षेत्र का क्षतिज घटना (Horizontal component of earth’s magnetic field)

    दिक्पात् कोण (Angle of declination)

    किसी स्थान पर भौगोलिक याम्योत्तर (Meridian) तथा चुम्बकीय याम्योत्तर के बीच के कोण को ‘दिक्पात् कोण’ कहते हैं।

    नमन कोण (Angle of dip)

    किसी स्थान पर पृथ्वी का सम्पूर्ण चुम्बकीय क्षेत्र क्षैतिज तल के साथ जितना कोण बना है उसे उस स्थान का ‘नमन कोण’ कहते हैं। पृथ्वी के ध्रुवों पर नमन कोण मान 90° तथा विषुवत् रेखा पर 0° होता है।

    चुम्बकीय क्षेत्र का क्षतिज घटना (Horizontal component of earth’s magnetic field)

    पृथ्वी के चम्बकत्व का ठीक कारण अभी ज्ञात नहीं है परन्तु विश्वास किया जाता है, कि पृथ्वी के अन्दर अत्यधिक ताप होने के कारण वहां लोहा, आदि धातुएं पिघली अवस्था में होती हैं। जब पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है, तो इन पिघली हुई वस्तुओं में संवहन धाराएं उत्पन्न होती हैं जिसके कारण चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है।

  • क्यूरी ताप (Curie Temperature) क्या है ?

    क्यूरी ताप (Curie Temperature) क्या है ?

    What is Curie Temperature ?

    जब किसी लौहचुम्बकीय पदार्थ को गरम किया जाता है, तो एक ऐसा ताप आता है जब उसका लौहचुम्बकत्व अनुचुम्बकत्व में बदल जाता है। इस ताप को ‘क्यूरी ताप‘ कहते हैं।

    लोहा और निकिल के लिए क्यूरी ताप के मान क्रमश: 770°C तथा 358°C होते हैं।

    नर्म लोहे के विपरीत स्टील (फौलाद या इस्पात) कठिनता से चुम्बक बनता है और कठिनता से ही अपने चुम्बकत्व को छोड़ता है। अतः स्थायी चुम्बक बनाने के लिए स्टील का उपयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए, लाउडस्पीकर, दिक्सूचक, गैल्वेनोमीटर, आदि के स्थायी चुम्बक स्टील के ही बन जाते है l