Blog

  • विद्युत शक्ति (Power) क्या है ?

    विद्युत शक्ति (Power) क्या है ?

    What is Power ?

    विद्युत परिपथ में ऊर्जा के क्षय होने की दर को ‘शक्ति’ कहते हैं। इसका SI मात्रक वाट (W) होता है।

    1 किलोवाट-घण्टा मात्रक अथवा 1 यूनिट, विद्युत ऊर्जा की वह मात्रा है जो कि किसी परिपथ में व्यय होती है जबकि परिपथ में 1,000 वोल्ट विभवान्तर पर 1 ऐम्पियर की धारा 1 घण्टे तक प्रवाहित की जाए, अथवा 100 वोल्ट विभवान्तर पर 10 ऐम्पियर की धारा 1 घण्टे तक प्रवाहित की जाए।

  • विधुत (Electricity) से जुडी परिभाषाये और अनुप्रयोग

    विधुत (Electricity) से जुडी परिभाषाये और अनुप्रयोग

    Definitions and applications related to electricity

    परिभाषाये

    प्रतिरोधों का श्रेणीक्रम समायोजन (Series Combination of Resistances)

    यदि प्रतिरोधों को एक-दूसरे से इस प्रकार जोड़ा जाए कि उनमें समान धारा प्रवाहित हो तथा भिन्न-भिन्न प्रतिरोधों के बीच भिन्न-भिन्न विभवान्तर हो तो यह प्रतिरोधों को श्रेणीक्रम में समायोजन’ कहलाता है। दिए हुए निश्चित प्रतिरोधों से अधिकतम प्रतिरोध प्राप्त करने हेतु प्रतिरोध को श्रेणीक्रम में जोड़ा जाता है।

    प्रतिरोधों का समानान्तर क्रम समायोजन (Parallel Combination of Resistances)

    यदि प्रतिरोधों को इस प्रकार जोड़ा जाए कि प्रत्येक प्रतिरोध पर विभवान्तर समान रहे (परन्तु उनमें धाराएं असमान भी हो सकती हैं।) तो यह प्रतिरोधों का समान्तर क्रम में समायोजन कहलाता है। दिए हुए निश्चित प्रतिरोधों से न्यूनतम प्रतिरोध प्राप्त करने हेतु इस समायोजन का प्रयोग किया जाता है।

    लॉरेन्ज बल (Lorentz Force)

    जब किसी चुम्बकीय क्षेत्र में कोई आवेशित कण गति करता है, तो उस पर एक बल आरोपित होता है जिसे लॉरेन्ज बल कहते हैं। यह बल कण के आवेश, उसकी चाल तथा चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता के अनुक्रमानुपाती होती है।

    चुम्बकीय क्षेत्र का मात्रक: 1 टेसला (T) = 1 न्यूटन/ऐम्पियर मीटर) = वेबर/मीटर2    

    धारामापी (Galvanometer)

    विद्युत परिपथ में विद्युत धारा की उपस्थिति बताने वाला यह एक सुग्राही यन्त्र है। इस यन्त्र की सहायता से 10-6 ऐम्पियर तक की विद्युत धारा को मापा जा सकता है।

    अमीटर (Ammeter)

    किसी शंट युक्त धारामापी को ‘अमीटर’ कहते हैं। इसमें एक पैमाना होता है। इसकी सहायता से धारा का मान ऐम्पियर में ज्ञात किया जाता है। एक आदर्श अमीटर का प्रतिरोध शून्य होता है। अमीटर । को सदैव विद्युत परिपथ के श्रेणीक्रम में लगाया जाता है।

    शंट

    शंट एक अत्यन्त कम प्रतिरोध वाला तार होता है। जिसे धारामापी के समान्तर क्रम में लगाकर अमीटर बनाया जाता है। शंट उच्च धाराओं से धारामापी की रक्षा करता है क्योंकि यह मुख्य धारा का अधिकांश भाग अपने अन्दर होकर प्रवाहित कर देता है। शंट का प्रतिरोध कम होने से शंटयुक्त धारामापी का कुल प्रतिरोध भी बहुत कम हो जाता है।

    वोल्टमीटर (Voltmeter)

    धारामापी के श्रेणीक्रम में एक उच्च प्रतिरोध लगाकर वोल्टमीटर बनाया जाता है। इसके पैमाने पर परिपथ के किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच विभवान्तर पढ़ने के लिए वोल्ट में अंशांकन कर दिया जाता है। वोल्टमीटर का प्रतिरोध बहुत अधिक होता है। वास्तव में, एक आदर्श वोल्टमीटर का प्रतिरोध अनन्त होता है। इसको परिपथ के उन दो बिन्दुओं के बीच समान्तर क्रम में जोड़ते हैं जिनके बीच विभवान्तर ज्ञात करना होता है।

    महत्वपूर्ण बातें

    घर के विद्युत परिपथ में बिजली के बल्ब पार्श्वबद्ध संयोजित रहते है क्योंकि श्रेणीबद्ध होने पर एक बल्ब के फिलामेण्ट के टूटने पर सभी बल्बों के धारा का प्रवाह रुक जाएगा।

    शुद्ध धातु के तार का प्रतिरोध ताप के साथ बढ़ता है।

  • ओम का नियम (Ohm’s Law) क्या है ?

    ओम का नियम (Ohm’s Law) क्या है ?

    What is Ohm’s Law ?

    किसी चालक में प्रवाहित विद्युत धारा का मान उसके सिरों पर लगे हुए विभवान्तर के अनुक्रमानुपाती होता है। (जबकि चालक की विमाएं तथा ताप स्थिर रहें)। इस कथन को ओम का नियम (Ohm’s Law) कहते हैं।

    विभवान्तर को वोल्ट में तथा धारा को ऐम्पियर में व्यक्त करें, तो प्रतिरोध का मान वोल्ट/ऐम्पियर में होगा। वोल्ट/ऐम्पियर को ‘ओम’ (Ohm) कहते हैं।

    जो चालक ओम के नियम का पालन करते हैं उन्हें ओमीय प्रतिरोध (Ohmic resistor) तथा उनके प्रतिरोधक को ओमीय प्रतिरोध कहते हैं, जैसे—मैंगनिन का तार।

    जो चालक ओम के नियम का पालन नहीं करते, उन्हें अन ओमीय प्रतिरोधक तथा उनके प्रतिरोध को अनओमीय प्रतिरोध (Non-ohmic resistance) कहते हैं, जैसे ट्रायोड वाल्व का प्रतिरोध।

    पदार्थ का विशिष्ट प्रतिरोध

    • किसी चालक पदार्थ के एक मीटर भुजा वाले घन के आमने-सामने के फलकों के बीच विद्युत प्रतिरोध को उस पदार्थ का विशिष्ट प्रतिरोध (Specific resistance) कहते हैं। इसका मात्रक ओम मीटर होता है। एक ही पदार्थ के बने हुए मोटे तार का प्रतिरोध कम तथा पतले तार का प्रतिरोध अधिक होता है परन्तु दोनों का विशिष्ट प्रतिरोध समान होता है क्योंकि यह केवल पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है। विशिष्ट प्रतिरोध को आजकल ‘प्रतिरोधकता’ (Resistivity) कहा जाता है।

  • विद्युत सेल (Power Cell) क्या है ?

    विद्युत सेल (Power Cell) क्या है ?

    What is Power Cell ?

    विद्युत सेल परिपथ में दो बिन्दुओं के बीच आवश्यक विभवांतर बनाकर विद्युतधारा के प्रवाह को लगातार बनाए रखने वाली युक्ति है।

    विद्युत सेल में रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है।

    सेल के प्रकार

    सेल दो प्रकार के होते हैं प्राथमिक (Primary) व द्वितीयक (Secondary)।

    टार्च, रेडियो, आदि में प्रयुक्त होने वाले शुष्क सेल प्राथमिक सेल होते हैं।

    कार की बैटरी का निर्माण लैड सेल से किया जाता है जो कि द्वितीयक सेल है। इन्हें ‘स्टोरेज सेल’ या ‘एक्यूमुलेटर‘ भी कहते हैं। इनका आन्तरिक प्रतिरोध बहुत कम होता है, अतः इनसे उच्च धारा प्राप्त की जा सकती है। इनका लाभ यह है, कि इनको पुनः आवेशित (Recharge) किया जा सकता है।

    आपातकालीन (Emergency) लाइट में भी द्वितीयक सेलों से निर्मित क्षारीय बैटरी का प्रयोग किया जाता है जो मेन्स सप्लाई के बन्द हो जाने पर स्वत: प्रकाश देने लगती है और सप्लाई के आ जाने पर बन्द हो जाती है और पुन: आवेशित होने लगती है।

    सेल का विद्युत वाहक बल (e.m.f.)

    1 कूलॉम्ब आवेश को पूरे विद्युत परिपथ में एक पूर्ण चक्र लगाने हेतु सेल द्वारा किए गए कार्य को सेल का वि.वा.ब. (e.m.f) कहते हैं। वि.वा.ब. का मात्रक वोल्ट होता है।

  • समाकलित परिपथ (Integrated Circuits) क्या है ?

    समाकलित परिपथ (Integrated Circuits) क्या है ?

    What is Integrated Circuits ?

    इसे संक्षेप में IC कहते हैं। साधारणत: IC अर्द्धचालक युक्तियों (Semiconductor devices) की एक ऐसी व्यवस्था होती है जो विशेष प्रकार का कार्य कर सकती हैं या कई कार्य कर सकती है,

    जैसे स्विच का कार्य, टाइमर का कार्य, आदि।

    इसमें प्राय: एक ही क्रिस्टल चिप होती है। जिसका आकार 1.5 मिमी. के लगभग होता है। इसमें विभिन्न प्रकार के ऐक्टिव तथा पैसिव परिपथ तथा उनके विभिन्न संयोग (Combinations) बने होते हैं।

  • विद्युत विभव (Voltage) और विभवान्तर (Potential Difference) क्या है ?

    विद्युत विभव (Voltage) और विभवान्तर (Potential Difference) क्या है ?

    What is Electricity Voltage and Potential Difference ?

    विभव (Voltage)

     किसी धनात्मक परीक्षण आवेश को अनन्त से विद्युत क्षेत्र के किसी बिन्दु तक लाने में किए गए कार्य एवं परीक्षण आवेश के मान की निष्पत्ति (Ration) को उस बिन्दु का विद्युत विभव (Electric potential) कहा जाता है अर्थात् विद्युत विभव SI मात्रक वोल्ट होता है तथा विभव एक अदिश राशि है

    यदि 1 कूलॉम्ब धनात्मक आवेश को अनन्त से विद्युत क्षेत्र के किसी बिन्दु तक लाने में 1 जूल कार्य करना पड़े, तो उस बिन्दु का विद्युत विभव 1 वोल्ट (Volt) कहलाता है।

    विभवान्तर (Potential Difference)

    एक कूलॉम्ब धनात्मक आवेश को विद्युत क्षेत्र में एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक ले जाने में किए गए कार्य को उन बिन्दुओं के मध्य विभवान्तर (Potential difference) कहते हैं। विभवान्तर एक अदिश राशि है।

    विभव तथा विभवान्तर दोनों के मात्रक एक ही अर्थात् वोल्ट होते हैं।

    विद्युत सेल परिपथ में दो बिन्दुओं के बीच आवश्यक विभवांतर बनाकर विद्युतधारा के प्रवाह को लगातार बनाए रखने वाली युक्ति है।

  • किरचॉफ का नियम क्या होता है ?

    किरचॉफ का नियम क्या होता है ?

    किरचॉफ का नियम

    इसके अनुसार, अच्छे अवशोषक ही अच्छे उत्सर्जन होते हैं। अंधेरे कमरे में यदि एक काली और एक सफेद वस्तु को समान ताप तक गरम करके रखा जाए तो काली वस्तु अधिक विकिरण उत्सर्जित करेगी। अत: काली वस्तु अंधेरे में अधिक चमकेगी। 

    लोहे की अवशोषकता अधिक होती है, इसलिए उसकी उत्सर्जकता भी अधिक होती है। इसलिए लोहे के बर्तन शीघ्रता से गरम व शीघ्रता से ठण्डे हो जाते हैं। 

    उदाहरण

    अत: किरचॉफ के नियमानुसार, लाल रंग की वस्तु गरम होने पर हरे रंग का प्रकाश उत्सर्जित करेगी। इसीलिए लाल कांच की गेंद को गरम करके अंधेरे कमरे में देखा जाए तो वह हरी दिखायी देती है और हरे कांच की पर्याप्त रूप से गरम गेंद लाल दिखायी देगी।

  • चुम्बकीय क्षेत्र और उसके उपयोग

    चुम्बकीय क्षेत्र और उसके उपयोग

    Magnetic Field and its use

    चुम्बक के चारों ओर कम्पास-सूई द्वारा चुम्बक के प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है। अतः चुम्बक के चारों ओर वह क्षेत्र, जिसमें चुम्बक के प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है, ‘चुम्बकीय क्षेत्र‘ कहलाता है। चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा, चुम्बकीय सुई से निर्धारित की जाती है।

    चुम्बकीय क्षेत्र के मात्रक को ‘टेसला’ (Tesla) कहते हैं।

    उपयोग

    विद्युत-चुम्बकीय में चुम्बकीय क्षेत्र का बहुत महत्त्व है।

    विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण का प्रयोग बिजली घरों में प्रयोगआने वाले जेनरेटरों में गाड़ियों के डायनमों में होता है।

    आवेशित कणों को त्वरित करने के लिए चुम्बकीय क्षेत्र का प्रयोग होता है। इन त्वरित कणों का नाभिकीय प्रयोगों में बहुत महत्त्व है।

    ऐम्पियर मीटर द्वारा बिना परिपथ में जोड़े अधिक धारावाही तारों में बहती धारा का मान पढ़ा जा सकता है। यह धारा के चुम्बकीय प्रभाव पर आधारित यन्त्र है। MRI में चुम्बकीय क्षेत्र के प्रभाव में उच्च आवृत्ति की रेडियो तरंगों का मानव शरीर के विभिन्न भाग भिन्न अनुपात में अवशोषण करके एक प्रतिछाया (Image) बनाते हैं जिससे शरीर के भीतरी भाग में अनियमितताओं का पता चलता है तथा उसकी चिकित्सा की जाती है।

    ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने विश्व का पहला प्लास्टिक चुम्बक विकसित करने में सफलता प्राप्त की है। दरहम विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित कार्बनिक सुचालक पदार्थ समूह का यह पहला ऐसा चुम्बक है जो सामान्य तापमान में भी काम कर सकेगा। यह चुम्बक एक तरह का पॉलिमर है जो पीएएनआई (PANI) और टीसीएनक्यू (TCNA) के मिश्रण से निर्मित अणुओं की श्रृंखला है। इसमें असाधारण विद्युतीय गुण है। प्लास्टिक चुम्बक का प्रयोग कम्प्यूटर हार्ड डिस्क की कोटिंग में किए जाने की सम्भावना है जिससे उच्च क्षमता वाले ” डिस्क का विकास हो सकता है। इसका उपयोग चिकित्सा क्षेत्र में किया जा सकेगा।

  • दैनिक जीवन में चुंबक का उपयोग

    दैनिक जीवन में चुंबक का उपयोग

    Use of Magnet in daily life

    प्रकृति में लोहा और ऑक्सीजन का एक विशेष यौगिक धातु-खनिज या अयस्क के रूप में पाया जाता है जिसे मैग्नेटाइट कहा जाता है। मैग्नेटाइट के टुकड़ों को प्राकृतिक चुम्बक कहा जाता है।

    कुछ पदार्थों को कृत्रिम विधियों द्वारा चुम्बक बनाया जा सकता है, इन्हें कृत्रिम चुम्बक कहते हैं इनकी लोहे के टुकड़ों को आकर्षित करने की शक्ति, प्राकृतिक चुम्बकों की अपेक्षा कहीं अधिक होती है।

    चुम्बक लोहे को अपनी ओर आकर्षित करता है। इस गुण को ‘चुम्बकत्व‘ कहते हैं।

    चुम्बक के चारों ओर कम्पास-सूई द्वारा चुम्बक के प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है। अतः चुम्बक के चारों ओर वह क्षेत्र, जिसमें चुम्बक के प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है, ‘चुम्बकीय क्षेत्र‘ कहलाता है।

    दैनिक जीवन में चुम्बक का उपयोग

    1. लौह पदार्थों की पहचान करने के लिए चुम्बक का प्रयोग किया जाता है।
    2. चुम्बक का आज दिक्सूचक (Compass box) में प्रयोग किया जाता है।
    3. खदान पर काम करने वाले मजदूरों की आंख में लोहे का बुरादा चले जाने पर चुम्बक की सहायता से उन्हें निकाला जाता है।
    4. ध्वनि अभिलेखन व पुनरुत्पादन के लिए टेप रिकॉर्डर बनाए गए हैं। टेप के ऊपर चुम्बकीय पदार्थ की एक पर्त में परिवर्तित चुम्बकीय क्षेत्र का अभिलेखन किया जा सकता है। संगीत, भाषण, इत्यादि ध्वनियों को टेप पर रिकॉर्ड किया जाता है तथा ‘बाद में कभी भी सुना जा सकता है।
    5. वीडियो टेप में न केवल ध्वनि अपितु चित्रों का भी अंकन चुम्बकीय क्षेत्र की परिवर्ती तीव्रता के रूप में किया जा सकता है। चलचित्रों को वीडियो टेप पर रिकॉर्ड किया जा सकता है।
    6. वीडियो कैमरा द्वारा किसी भी आयोजन को चुम्बकीय वीडियो रूप पर अभिलेखित किया जा सकता है।
    7. कम्प्यूटर के क्षेत्र में चुम्बकीय मेमोरी का बहुत महत्त्व है। फ्लॉपी डिस्क पर चुम्बकीय पदार्थ का लेप होता है। आंकड़ों को बहुत सुग्राहिता से फ्लॉपी डिस्क पर लिखा व मिटाया जा सकता है।
    8. ATM कार्ड, क्रेडिट कार्ड व डेबिट कार्ड के पीछे चुम्बकीय पदार्थ के लेप की एक पट्टी होती है। इस पट्टी में ही प्रयोगकर्ता की पहचान व उसका कोड छिपा रहता है। बैंकों व व्यापारिक प्रतिष्ठानों की मशीन में डालकर किसी भी समय मुद्रा विनियम किया जा सकता है।
  • विकिरण का उत्सर्जन व अवशोषण (Emission and Absorption of Radiation)

    विकिरण का उत्सर्जन व अवशोषण (Emission and Absorption of Radiation)

    विकिरण का उत्सर्जन व अवशोषण (Emission and Absorption of Radiation)

    प्रिवोस्ट के विनियम सिद्धान्त के अनुसार सभी तापों पर (परम शून्य को छोड़कर) प्रत्येक वस्तु विकिरण ऊर्जा को उत्सर्जित करती है तथा अपने वातावरण से विकिरण ऊर्जा का अवशोषण भी करती है। इस विकिरण ऊर्जा को ‘ऊष्मीय विकिरण’ (Thermal radiation) कहते हैं।

    यदि वस्तु का ताप उसके चारों ओर के वातावरण के ताप से ऊंचा होता है, तो उस वस्तु के पृष्ठ से उत्सर्जित ऊर्जा, उसके द्वारा अवशोषित ऊर्जा से अधिक होती है।

    समान तापमान पर दो चीजें संतुलन में रह सकती हैं, जैसे टी तापमान पर प्रकाश के बादल से घिरा पदार्थ टी तापमान पर औसत रूप से बादल में उतना प्रकाश विकिरित कर सकता है, जितना वह सोख ले, यह प्रीवोस्ट के विनिमय सिद्धांत पर आधारित है, जो विकरणशील संतुलन को सन्दर्भित करता है। विस्तृत संतुलन का सिद्धांत कहता है कि उत्सर्जन और अवशोषण की प्रक्रिया के बीच कोई अजीब किस्म का सह-संबंध नहीं है, उत्सर्जन की प्रक्रिया अवशोषण से प्रभावित नहीं होती बल्कि यह केवल उत्सर्जन कर रहे पदार्थ की सौर स्थिति से प्रभावित होती है। इसका मतलब यह हुआ कि टी तापमान पर पदार्थ द्वारा उत्सर्जित कुल प्रकाश, चाहे वह कृष्ण पदार्थ हो या नही, हमेशा उस कुल प्रकाश के बराबर होता है, जिसे पदार्थ अवशोषित करता है, जो टी तापमान पर प्रकाश से घिरा हो।

    कृष्णिका के लिए अवशोषित प्रकाश की मात्रा उतनी होती है, जितनी वह सतह पर पड़ती है। किसी भी तरंगदैर्घ्य λ के प्रति ईकाई समय में अवशोषित प्रकाश ऊर्जा अनिवार्य रूप से कृष्णिका के कर्व के अनुपात में होती है। इसका मतलब है कि कृष्णिका का घुमाव कृष्णिका द्वारा उत्सर्जित प्रकाश ऊर्जा जितना है, जो इसके नाम को उपयुक्त ठहराता है। यह सौर विकिरण का किरचॉफ नियम है: कृष्णिका का उत्सर्जन घुमाव प्रकाश की सौर विशेषता है, जो केवल गुहा की दीवारों केतापमानपर ही निर्भर करता है, बशर्ते यह स्थिति होनी आवश्यक है कि गुहा में कुछ पूरी तरह से काली सामग्री हो और यह विकरणशील संतुलन में हो। जब कृष्णिका इतना छोटा हो कि इसके आकार की प्रकाश के तरंगदैर्घ्य से तुलना की जा सके तो अवशोषण संशोधित हो जाता है, क्योंकि एक छोटी सी वस्तु लंबे तरंगदैर्घ्य के प्रकाश का एक कुशल अवशोषक नहीं हो सकती, लेकिन उत्सर्जन और अवशोषण की कठोर समानता के सिद्धांत हमेशा सही ठहराये जाते हैं।