फोटो सेल वह यंत्र है जो प्रकाश ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदल देता है।
एक फोटोवोल्टिक सेल (Photovoltaic Cell) एक अर्धचालक उपकरण है जो प्रकाश ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है। इसे सौर सेल के रूप में जाना जाता है जब प्रकाश स्रोत सूर्य का प्रकाश होता है।
जब प्रकाश एक फोटोवोल्टिक सेल के पारदर्शी आवरण से होकर गुजरता है और बाधा परत (barrier layer) से टकराता है, तो सेलेनियम परमाणुओं (selenium atoms) में इलेक्ट्रॉन ऊर्जा प्राप्त करते हैं और पारदर्शी आवरण पर जमा होने के लिए बाधा परत के माध्यम से वैलेंस रिंग (valence ring) से आगे बढ़ते हैं।\
उदाहरण
इस सेल का उपयोग सिनेमा घरों में ध्वनि के पुनरुत्पादन में, फोटोग्राफी में तथा टेलीविजन में किया जाता है।
बैंकों में चोरी की सूचना देने वाले बर्गलर्स एलार्म में इन्हीं का उपयोग होता है।
अंतरिक्ष यात्री इसी सेल द्वारा ‘सौर बैटरी’ से सूर्य के प्रकाश को विद्युत ऊर्जा में बदल लेते हैं।
फोटो सेल सड़कों पर बत्तियों के स्वतः जलने तथा बुझने में भी उपयोग में लाए जाते हैं।
फोटोवोल्टिक प्रभाव (photovoltaic effect) V/s फोटोइलेक्ट्रिक प्रभाव (photoelectric effect)
फोटोवोल्टिक प्रभाव (photovoltaic effect)फोटोइलेक्ट्रिक प्रभाव (photoelectric effect) से निकटता से संबंधित है। फोटोवोल्टिक प्रभाव में प्रकाश अवशोषित हो जाता है और एक इलेक्ट्रॉन या अन्य आवेश वाहक उच्च ऊर्जा अवस्था के लिए उत्साहित होता है।
जबकि फोटोइलेक्ट्रिक प्रभाव शब्द का उपयोग तब किया जाता है जब इलेक्ट्रॉन को सामग्री से बाहर निकाल दिया जाता है, जबकि फोटोवोल्टिक शब्द का उपयोग सामग्री के भीतर रहता है।
इस आर्टिकल में हम प्रकाश-विद्युत प्रभाव (Photo-electric Effect) क्या है ? आइंस्टीन का प्रकाश विद्युत प्रभाव (फोटो इलेक्ट्रिक इफ़ेक्ट) क्या है? प्रकाश-विद्युत प्रभाव के नियम और विशेषताएँ क्या है ? आइंस्टीन के प्रकाश विद्युत समीकरण की स्थापना कैसे हुई ? प्रकाश विद्युत उत्सर्जन का आशय और उसके नियम क्या है ?
प्रकाश-विद्युत प्रभावकी परिभाषा
प्रकाश क्वांटा-फोटॉन (light quanta – photons) के कारण धातु की प्लेट से इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन होता है।
किसी धातु की सतह पर प्रकाश पड़ने से इलेक्ट्रॉन निकलने की क्रिया ‘प्रकाश-विद्युत प्रभाव’ कहलाती है। सभी क्षारीय धातुएं एवं जिंक प्रकाश के साथ विद्युत प्रभाव दिखाती हैं। सभी धातुएं एक्स-किरणों एवं गामा-किरणों के साथ भी प्रकाश-विद्युत प्रभाव दिखाती है।
दुसरे शब्दों में, फोटो इलेक्ट्रिक प्रभाव, वह घटना है जिसमें विधुत आवेशित कण, विद्युत चुम्बकीय किरण(electromagnetic radiation) को अवशोषित करने पर किसी पदार्थ ((धातु, अधातु ठोस, द्रव एवं गैसें) से या उसके भीतर निकलते हैं। इस प्रभाव में अक्सर किसी मेटल प्लेट पर प्रकाश पड़ने पर उसमे से इलेक्ट्रॉनों का डिस्चार्ज होता है ।
व्यापक परिभाषा में, दीप्तिमान ऊर्जा (radiant energy) इन्फ्रारेड, दृश्य (visible), या पराबैंगनी प्रकाश, एक्स-रे, या गामा किरणों के रूप में हो सकती हैं; पदार्थ ठोस, तरल या गैस हो सकते है; और जो पार्टिकल रिलीज़ होते है वो विद्युत आवेशित परमाणु या अणु के साथ-साथ इलेक्ट्रॉन भी हो सकते हैं। यह घटना आधुनिक भौतिकी के विकास में मौलिक रूप से महत्वपूर्ण थी क्योंकि इसने प्रकाश की प्रकृति के बारे में महत्वपुर्ण प्रश्नों को उठाया था
प्रकाश-विद्युत प्रभाव की खोज हर्ट्स (Heinrich Rudolf Hertz) ने की थी। रेडियो तरंगों पर करने के दौरान, हर्ट्ज ने देखा कि, जब दो धातु इलेक्ट्रोड पर पराबैंगनी प्रकाश चमकता है, तो प्रकाश जिस पर स्पार्किंग होती है उसके वोल्टेज को बदल देता है । प्रकाश और बिजली (इसलिए फोटोइलेक्ट्रिक) के बीच इस संबंध को 1902 में एक अन्य जर्मन भौतिक विज्ञानी फिलिप लेनार्ड (Philipp Lenard) ने स्पष्ट किया था। इसकी विस्तृत व्याख्या आइन्सटीन (Albert Einstein) एवं मिलिकन (Robert A. Millikan) ने की जिसके लिए उन्हें क्रमश: 1921 एवं 1923 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुए।
विद्युत-चुम्बकीय तरंगें छोटे-छोटे कणों से बनी होती हैं, जिन्हें फोटॉन कहते हैं। ये फोटॉन धातु की सतह से टकराते हैं तब एक फोटॉन की कुछ ऊर्जा धातु के एक-एक इलेक्ट्रॉन में स्थानान्तरित हो जाती है।
प्रकाश-विद्युत प्रभाव के नियम
1. जब प्रकाश के विशेष रंग की कोई किरण धातु की सतह पर पड़ती है, तब प्रति सेकण्ड धातु की सतह से निकलने वाले इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रकाश की तीव्रता के अनुक्रमानुपाती होती है।
2. उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा का मान शून्य से महत्तम के बीच बदलता रहता है। इलेक्ट्रॉन की इस गतिज ऊर्जा का मान प्रकाश की आवृत्ति पर निर्भर करता है, प्रकाश की तीव्रता पर नहीं।
3. धातु की सतह पर पड़ने वाले प्रकाश की आवृत्ति का मान एक निश्चित मान से कम होता है, तो इलेक्ट्रॉन का उत्सर्जन धातु की सतह से नहीं हो पाता है। आवृत्ति के इस न्यूनतम निश्चित मान को ‘देहली आवृत्ति’ (Threshold frequency) कहते हैं। भिन्न-भिन्न धातुओं के लिए इसका मान भिन्न-भिन्न होता है। क्षारीय धातुओं के लिए इस आवृत्ति का मान वर्णक्रम के दृश्य क्षेत्र में होता है।
आइंस्टीन का प्रकाश विद्युत प्रभाव
आइन्स्टीन ने बताया कि प्रकाश-विद्युत प्रभाव के लिए आपतित फोटॉन की ऊर्जा का मान धातु के कार्यफलन (Work function) और उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा के मान के योग के बराबर होता है।
परमाणु संरचना के मॉडलों में तरंग यान्त्रिकी मॉडल (Wave mechanical model) विशेष रूप से सफल रहा है। इसका प्रारम्भिक रूप ‘बोर मॉडल’ (Bohr’s model) है जिसे सन् 1913 में डेनमार्क के भौतिक विज्ञानी नील्स बोर ने हाइड्रोजन के लिए प्रस्तुत किया था। इसके अनुसार, परमाणु में नाभिक के चारों ओर विभिन्न वृत्ताकार कक्षाओं (Circular orbits) में इलेक्ट्रॉन घूमते रहते हैं, जैसे—सूर्य के चारों ओर पृथ्वी, मंगल, आदि ग्रह घूमते रहते हैं। सबसे हल्का परमाणु हाइड्रोजन का होता है जिसमें केवल 1 इलेक्ट्रॉन होता है और सबसे भारी प्राकृतिक रूप से उपलब्ध परमाणु यूरेनियम का है जिसमें 92 इलेक्ट्रॉन होते हैं।
विकिरण उत्सर्जन
सामान्य परमाणु में इलेक्ट्रॉन अपने न्यूनतम ऊर्जा-स्तर में रहते हैं परन्तु यदि पदार्थ को गरम करके परमाणुओं को अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान की जाए तो उसके कुछ इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तरों में चले जाते हैं। यदि उच्च ऊर्जा वाला कोई कण इलेक्ट्रॉन से टकराकर उसे अपनी ऊर्जा दे देता है तो भी इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा-स्तर में पहुंच सकता है। इस स्थिति में परमाणु को ‘उत्तेजित अवस्था’ (Excited state) में कहा जाता है। परन्तु परमाणु इस अवस्था में 10-8 सेकण्ड से अधिक देर तक नहीं रहता है और इलेक्ट्रॉन वापस किसी निम्न ऊर्जा स्तर में चला जाता है। दोनों ऊर्जा-स्तरों में जो अन्तर होता है वह उतनी ऊर्जा के फोटॉन के रूप में उत्सर्जित हो जाता है। इसे ही ‘विकिरण उत्सर्जन‘ कहते हैं।
फोटॉन को ऊर्जा का पैकेट माना जा सकता है। यदि फोटॉन की ऊर्जा अधिक है, तो वे गामा किरणों (या उच्च ऊर्जा विद्युत-चुम्बकीय तरंग) के फोटॉन होते हैं और कम होने पर वे क्रमशः एक्स-किरणों के, पराबैंगनी किरणों के, दृश्य प्रकाश के या अवरक्त विकिरण के फोटॉन हो सकते हैं।
परमाणु भौतिकी में परमाणु तथा उसकी अन्तक्रियाओं (Interactions) का अध्ययन किया जाता है।
डाल्टन के परमाणुवाद के अनुसार, परमाणु पदार्थ के सबसे छोटे कण होते हैं। ये परमाणु अविभाज्य होते हैं, किन्तु बीसवीं सदी के वैज्ञानिक जे. जे. थॉमसन (J.J.Thomson) व रदरफोर्ड (Ernest Rutherford) ने पदार्थ की संरचना के गहन अध्ययन से निष्कर्ष निकाला कि परमाणु अविभाज्य नहीं है, बल्कि यह छोटे-छोटे आवेशित कणों से मिलकर बना होता है।
नाभिक,इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन औरन्यूट्रॉन
आधुनिक अभिधारणा के अनुसार, परमाणु धनावेशित प्रोटॉनों, ऋणावेशित इलेक्ट्रॉनों व उदासीन न्यूट्रॉनों से मिलकर बना होता है। परमाणु के केन्द्र में एक ‘नाभिक’ (Nucleus) होता है जिसमें परमाणु का लगभग सम्पूर्ण द्रव्यमान प्रोटॉन व न्यूट्रॉन के रूप में समाहित होता है। नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉनों का बादल जैसा होता है जिसमें इलेक्ट्रॉन लगातार गति करते रहते हैं। इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रोटॉनों की संख्या के बराबर होती है। प्रोटॉन पर धनात्मक आवेश तथा इलेक्ट्रॉन पर उतना ही ऋणात्मक आवेश होता है परन्तु न्यूट्रॉन आवेश रहित होता है।
सूर्य के केन्द्र में नाभिकीय संलयन (Nuclear fusion) क्रिया द्वारा हाइड्रोजन लगातार हीलियम में बदलती रहती है और अपार ऊर्जा निकलती रहती है। सूर्य, इस ऊर्जा का कुछ भाग पृथ्वी को प्रकाश के रूप में प्रदान करता है।
सूर्य से पृथ्वी को प्रति सेकण्ड लगभग 4×1026 जूल ऊर्जा प्राप्त होती है। केवल इतनी ऊर्जा प्रदान करने में भी प्रति सेकण्ड सूर्य के द्रव्यमान में लगभग 4 x 109 किग्रा. की कमी हो रही है परन्तु फिर भी सूर्य अपना प्रकाश लगभग 450 करोड़ वर्षों तक देता रहेगा।
तापदीप्त स्रोत
जब किसी पिण्ड को अत्यधिक गरम किया जाता है, तो वह प्रकाश देने लगता है, ऐसे पिण्ड को ‘तापदीप्त स्रोत’ कहते हैं। उत्सर्जित प्रकाश का रंग स्रोत के ताप पर निर्भर करता है। उत्सर्जित प्रकाश का रंग स्रोत के ताप पर निर्भर करता है।
प्रदीप्त वस्तुएं(Luminous bodies)
वे वस्तुएं जो अपने स्वयं के प्रकाश से प्रकाशित होती हैं, जैसे विद्युत-बल्ब, सूर्य, तारे, आदि ‘प्रदीप्त वस्तुएं’ कहलाती हैं।
अप्रदीप्त वस्तुएं (Non-luminous bodies)
ऐसी वस्तुएं जिनका अपना प्रकाश नहीं होता है परन्तु उन पर यदि प्रकाश डाला जाए, तो वे दिखाई देती हैं, जैसे–चन्द्रमा, सभी ग्रह, वृक्ष, पर्वत, आदि ‘अप्रदीप्त वस्तुएं’ कहलाती हैं।
जैव-प्रकाश (Bio-luminescence)
जुगनू (Fire fly) जैसे कुछ जन्तु प्रकाश उत्सर्जित करते है, इसे जैव-प्रकाश (Bio-luminescence) कहते हैं।
गोलीय दर्पण (Spherical Mirror): गोलीय दर्पण उस दर्पण को कहते हैं जिसकी परावर्तक सतह एक खोखले गोले का एक भाग होती है। गोलीय दर्पण प्रायः कांच के एक टुकड़े को रजतित (Silvered) कर बनाया जाता है।
ये दो प्रकार के होते हैं—अवतल दर्पण तथा उत्तल दर्पण।
अवतल दर्पण में एक परावर्तक सतह (reflective surface) होती है जो प्रकाश स्रोत से अंदर और दूर घुमावदार (curved) होती है। अवतल दर्पण प्रकाश को एक केंद्र बिंदु की ओर अंदर (inward) की ओर परावर्तित करते हैं l
बड़ी फोकस दूरी वाला अवतल दर्पण-दाढ़ी बनाने के काम में आता है। मनुष्य का चेहरा दर्पण के ध्रुव व फोकस के मध्य होता है, अत: उसका बड़ा और सीधा प्रतिबिम्ब बनता है l
डॉक्टर प्रकाश की किरणों को छोटे अवतल दर्पण से परावर्तित करके आंख, नाक, कान, गले में डालकर आन्तरिक भागों को स्पष्ट देखते हैं।
सर्चलाइटों में, मोटरकारों के हेडलाइटों, आदि में अवतल तथा परावलयिक दर्पणों का प्रयोग परावर्तकों के रूप में किया जाता है।
जब प्रकाश की किरण किसी सतह पर पड़ती है, तो उसका कुछ भाग परावर्तित हो जाता है परन्तु जब सतह चिकनी एवं चमकदार हो तो प्रकाश की किरणों का लगभग सभी भाग विभिन्न दिशाओं में परावर्तित हो जाता है। इस प्रकार की चिकनी सतह से टकराकर वापस लौटने की घटना को ‘प्रकाश का परावर्तन‘ कहते हैं।
समतल दर्पण से किसी बिन्दु पर वस्तु का प्रतिबिम्ब दर्पण के पीछे उतनी ही दूरी पर बनता है जितनी दूरी पर वस्तु दर्पण के सामने रखी होती है। यह प्रतिबिम्ब आभासी होता है तथा वस्तु के बराबर होता है।
दर्पण में यदि कोई मनुष्य अपना पूरा प्रतिबिम्ब देखना चाहता है, तो दर्पण की न्यूनतम ऊंचाई मनुष्य की ऊंचाई की आधी होनी चाहिए।
यदि दो समतल दर्पण θ0 कोण पर झुके हो तो उनके द्वारा उनके मध्य में रखी वस्तु के बनाए गए कुल प्रतिबिम्बों की संख्या 3600-1 होती है। यदि यह पूर्णांक नहीं है, तो इसका अगला पूर्णांक मान लिया जाता है। इस प्रकार समकोण (900) पर झुके दो दर्पणों से वस्तु के तीन प्रतिबिम्ब बनते हैं और दो समान्तर रखे दर्पणों से अनन्त प्रतिबिम्ब बनते हैं।
बहुरूपदर्शी (Kaleidoscope)
इसमें समान लम्बाई तथा समान चौड़ाई के तीन आयताकार समतल दर्पण इस प्रकार लगे रहते हैं, कि दो दर्पणों के बीच 60° का कोण बनता है। तीनों दर्पणों के परावर्तक तल भीतर की ओर रहते हैं और दर्पणों द्वारा घिरे स्थानों में रंगीन कांच के कुछ टुकड़े रहते हैं। ये तीनों दर्पण एक मोटी नली (Pipe) के अन्दर लगे रहते हैं। नली को घुमाने से रंगीन कांच के टुकड़ों की स्थितियां बदल जाती हैं और इसलिए आकृतियों के रंग में भी परिवर्तन हो जाता है।
परिदर्शी (Periscope)
इसमें दो समतल दर्पण एक-दूसरे से 45° पर स्थित होते हैं। इन दर्पणों की परावर्तक सतहें आमने-सामने रहती हैं। अत: ऊपर वाले सिरे से होकर प्रवेश करने वाली किरणें दर्पण द्वारा परावर्तित होकर नीचे की ओर आती हैं और दूसरे दर्पण द्वारा परावर्तित होकर आंखों में प्रवेश करती है।
इसी कारण युद्ध के समय बंकर में छिपे सैनिक जमीन पर चल रहे दुश्मनों की गतिविधियां देखने के लिए इस उपकरण का उपयोग करते हैं।
पनडुब्बी जहाज में भी यह उपकरण प्रयुक्त होता है। इससे जहाज के भीतर बैठा आदमी भी समुद्र के अन्दर से ही जल की सतह पर स्थित दुश्मन की गतिविधि को देखने में समर्थ होता है।
गोलीय दर्पण (Spherical Mirror)
गोलीय दर्पण उस दर्पण को कहते हैं जिसकी परावर्तक सतह एक खोखले गोले का एक भाग होती है। गोलीय दर्पण प्रायः कांच के एक टुकड़े को रजतित (Silvered) कर बनाया जाता है।
ये दो प्रकार के होते हैं—अवतल दर्पण तथा उत्तल दर्पण।
What are Diffraction of Light and Scattering of Light ?
प्रकाश का ‘विवर्तन’ (Diffraction)
यदि हम अपनी आंख के सामने अपनी दो अंगुलियों को खड़ा करके उनके बीच बनी पतली झिरी से किसी दूर स्थित पतले प्रकाश स्रोत (ट्यूब-लाइट) को देखते हैं, तो हमें क्रमिक रूप में दीप्त तथा अदीप्त पट्टियां दिखाई देती हैं। जब किसी प्रकाश स्रोत और पर्दे के बीच तीक्ष्ण कोर वाली अपारदर्शी वस्तु (ब्लेड) रखी जाती है, तो पर्दे पर उसकी छाया बन जाती है परन्तु इस छाया के किनारे तीक्ष्ण नहीं होते। किनारों के पास वाले भाग में भी कुछ प्रकाश पहुंच जाता है और हमें किनारों के पास पतली दीप्त तथा अदीप्त पट्टियां दिखाई देती हैं।
प्रकाश के इस प्रकार अवरोध के किनारों पर थोड़ा मुड़ कर उसकी छाया में प्रवेश करने की घटना को ‘विवर्तन’ (Diffraction) कहते हैं।
प्रकाश का ‘प्रकीर्णन’ (Scattering)
जब प्रकाश किसी ऐसे माध्यम से गुजरता है जिसमें धूल तथा अन्य पदार्थों के अत्यन्त सूक्ष्म कण होते हैं, तो उनके द्वारा प्रकाश सभी दिशाओं में (कुछ दिशाओं में कम तथा कुछ में अधिक) प्रसारित हो जाता है। इस घटना को प्रकाश का ‘प्रकीर्णन’ कहते हैं।
प्रयोगों द्वारा ज्ञात हुआ है, कि बैंगनी रंग के प्रकाश का प्रकीर्णन सबसे अधिक होता है। वर्णक्रम में बैंगनी से लेकर लाल रंग तक के प्रकाश का प्रकीर्णन इन रंगों के क्रम में घटता जाता है। इस प्रकार लाल रंग का प्रकीर्णन सबसे कम होता है। चूकि बैंगनी रंग की तरंग-दैर्ध्य सबसे कम होती है, अत: इस रंग के प्रकाश का प्रकीर्णन अधिकतम होता है।
चन्द्रमा पर वायुमण्डल नहीं है।अत: चन्द्रमा के तल पर पहुंचने वाले सूर्य के प्रकाश का प्रकीर्णन नहीं होता। इस कारण चन्द्रमा के तल से देखने पर आकाश काला दिखाई देता है। वास्तव में, पृथ्वी के वायुमण्डल के ऊपर सूर्य के प्रकाश का प्रकीर्णन न होने के कारण अन्तरिक्ष में सभी स्थानों पर आकाश काला दिखाई देगा। वायुमण्डल से बाहर जाने वाले अन्तरिक्ष यानों से इसकी पृष्टि सिद्ध होती है।
पारदर्शक वस्तुएं (Transparent Bodies)
वे वस्तुएं जिनके अन्दर से प्रकाश की किरणें आर-पार निकल जाती है, जैसे कांच, जल, आदि
परन्तु कुछ वस्तुएं ऐसी होती है, कि जिन पर यदि प्रकाश डाला जाए तो कुछ प्रकाश तो अवशोषित हो जाता है और कुछ आर-पार बाहर निकल जाता है, ‘अर्द्धपारदर्शक वस्तुएं’ कहलाती हैं, जैसे—ग्रीस लगा हुआ कागज, घी या तेल लगा हुआ कागज।
अपारदर्शक वस्तुएं (Opaque Bodies)
वे वस्तुएं जिनमें होकर प्रकाश की किरणें बाहर नहीं निकल पाती हैं, ‘अपारदर्शक‘ कहलाती है, जैसे धातुएं, आदि।
अर्द्धपारदर्शक वस्तुएं (Translucent Bodies)
वे वस्तुएं जिन पर प्रकाश की किरणें पड़ने से उनका कुछ भाग तो अवशोषित हो जाता है तथा कुछ बाहर निकल जाता है, ‘अर्द्धपारदर्शक वस्तुएं कहलाती है, जैसे तेल लगा हुआ कागज।
पृथ्वी एक वर्ष में सूर्य की परिक्रमा एक बार करती है और चन्द्रमा प्रति महीने एक बार पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इससे कभी-कभी चन्द्रमा, पृथ्वी और सूर्य तीनों एक सीध में आ जाते हैं, कभी चन्द्रमा की छाया पृथ्वी पर पड़ती है जिस कारण सूर्य ग्रहण होता है और कभी पृथ्वी की छाया चन्द्रमा पर पड़ती है जिससे चन्द्र ग्रहण होता है परन्तु हर महीने ग्रहण नहीं दिखाई देता क्योंकि पृथ्वी का कक्ष-तल चन्द्रमा के कक्ष-तल के साथ 5° का कोण बनाता है।
सूर्य ग्रहण
सूर्य ग्रहण उस समय होता है जब चन्द्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच में आ जाता है और ऐसी स्थिति अमावस्या (full moon) के दिन ही होती है। सूर्य तो प्रकाश का उद्गम है और चन्द्रमा की अपेक्षा विस्तार में बहुत बड़ा है, अत: जब चन्द्रमा उस सरल रेखा पर अथवा उसके समीप आ जाता है जो पृथ्वी को सूर्य से मिलाती है, तो वह प्रकाश-किरणों को रोक लेता है। अत: चन्द्रमा की छाया पृथ्वी पर पड़ती है। अब चूंकि छाया का बनना तो स्वयं प्रकाश के सरल रैखिक गमन पर आधारित है, पृथ्वी का जो भाग प्रच्छाया में रहता है, वहां किरणें बिल्कुल नहीं पहुंचती अतःवहां से देखने पर सूर्य का कोई भाग दिखाई नहीं पड़ता, इसे ही पूर्णग्रास (Total eclipse) ‘सूर्य ग्रहण’ कहते हैं।
पूर्णाग्रास सूर्य ग्रहण के दौरान आकाश अंधकारमय हो जाता है, तारे दिखाई पड़ने लगते हैं, तापमान गिर जाता है और पक्षी चहकना बन्द कर देते हैं।
चन्द्र ग्रहण
चन्द्र ग्रहण के समय पृथ्वी सूर्य और चन्द्रमा के बीच में होती है। जब चन्द्रमा पूर्णतः पृथ्वी की प्रच्छाया में पड़ता है, तो चन्द्रमा का कोई भाग पृथ्वी से दिखाई नहीं देता क्योंकि चन्द्रमा तक सूर्य की किरण नहीं पहुंच पाती। ऐसी स्थिति में लगे चन्द्र ग्रहण को ‘सर्वग्रास चन्द्र ग्रहण’ (Total lunar eclipse) कहते हैं परन्तु यदि चंद्रमा का थोड़ा ही भाग पृथ्वी की प्रच्छाया में पड़ने के कारण नहीं दखाई देता तो ऐसी स्थिति में लगे चन्द्र ग्रहण को ‘खण्डग्रास चंद्रग्रहण’ (Partial lunar eclipse) कहते हैं। पूर्णाग्रास सूर्य ग्रहण के दौरान आकाश अंधकारमय हो जाता है, तारे दिखाई पड़ने लगते हैं, तापमान गिर जाता है और पक्षी चहकना बन्द कर देते हैं l
सूची छिद्र कैमरे (Pinhole Camera) से प्रतिबिम्ब का बनना, छाया का बनना, सूर्य-ग्रहण तथा चन्द्र ग्रहण का होना, आदि प्रकाश के सीधी रेखा में गमन के उदाहरण है।
प्रकाश सरल रेखाओं में चलता है। प्रकाश विद्युत-चुम्बकीय अनुप्रस्थ तरंग है। प्रकाश निर्वात में भी चल सकता है, किन्तु भिन्न-भिन्न माध्यमों में प्रकाश की चाल भिन्न-भिन्न होती है।
जिन पदार्थों में से प्रकाश बाहर नहीं निकल पाता है उनको अपारदर्शी पदार्थ कहते हैं।
कुछ पदार्थों (तेल लगे हुए कागज, घिसे हुए कांच) में से प्रकाश का कुछ अंश बाहर निकल जाता है, ऐसे पदार्थों को पारभासी पदार्थ कहा जाता है। इसका तरंग दैर्ध्य 3,900A से 7,800A के बीच होता है। (1A= 10-10 मीटर)।
प्रकाश का विद्युत-चुम्बकीय तरंग सिद्धान्त प्रकाश के केवल कुछ प्रमुख गुणों की ही व्याख्या कर पाता है, जैसे—प्रकाश का परावर्तन, अपवर्तन, सीधी रेखा में चलना, विवर्तन, व्यतिकरण व ध्रुवण।
प्रकाश के कुछ गुण ऐसे भी हैं जिनकी व्याख्या यह तरंग सिद्धान्त नहीं कर पाता है। इनमें प्रमुख हैं—
प्रकाश-विद्युत प्रभाव (Photoelectric effect) तथा कॉम्पटन प्रभाव (Compton effect)।
इन प्रभावों की व्याख्या आइन्सटीन द्वारा प्रतिपादित प्रकाश के फोटॉन सिद्धान्त द्वारा की जाती है। इस सिद्धान्त के अनुसार, प्रकाश ऊर्जा के छोटे-छोटे बण्डलों या पैकटों के रूप में चलता है जिन्हें ‘फोटॉन’ (Photon) कहते हैं। वास्तव में ये दो प्रभाव प्रकाश की कण प्रकृति (Particle nature) को प्रकट करते हैं।
प्रकाश के कण फोटॉन साधारण धूल के कणों की भांति सीमित दिक्-काल (time period) में नहीं रहते। फोटॉन ऊर्जा कण है जिसकी ऊर्जा का मान उससे सम्बद्ध विद्युत-चुम्बकीय तरंग की आवृत्ति को एक नियतांक h जिसे प्लांक नियतांक कहते हैं से गुणा करके प्राप्त होती है।
प्रकाश की दोहरी प्रकृति (Dual Nature of Light)
आज प्रकाश को कुछ घटनाओं में तरंग और कुछ घटनाओं में कण माना जाता है अर्थात् प्रकाश कणों की बौछार (Shower of particles) भी है और तरंग भी है। कुछ घटनाओं (Phenomena) में उसकी तरंग प्रकृति प्रबल होती है (कण प्रकृति दबी रहती है) और कुछ में प्रकाश की कण प्रकृति स्पष्टत: उभरकर आती है और तरंग प्रकृति दबी रहती है। इसी को प्रकाश की दोहरी प्रकृति कहते हैं।
प्रकाश निर्वात में भी गमन करता है। इसकी चाल निर्वात में अन्य माध्यमों की तुलना में सबसे अधिक होती है।
विभिन्न माध्यमों में प्रकाश की चाल :
माध्यम – प्रकाश की चाल (सी./सेकण्ड)
निर्वात – 3.00 x 108
पानी – 2.25 x 108
कांच – 2.00 x 108
तारपीन का तेल – 2.04 x 108
नाइलॉन – 1.96×108
प्रकाश की उत्पत्ति के मुख्य सिद्धान्त
कणिक सिद्धान्त—न्यूटन
तरंग सिद्धान्त-हाइजिन
फोटोन सिद्धान्त—आइन्स्टीन
छाया (Shadow)
जब प्रकाश के मार्ग में कोई अपारदर्शी वस्तु आ जाती है, तो वह प्रकाश की किरणों को रोक लेती है क्योंकि प्रकाश की किरणें सीधी रेखा में ही चल सकती हैं। अत: यदि आगे कोई पर्दा हो तो पर्दे के कुछ भाग पर, प्रकाशित भाग पर अपरादर्शी वस्तु के बीच में आ जाने के कारण प्रकाश की किरणें नहीं पहुंच पाती फलत: पर्दे पर प्रकाशित भाग के बीच कुछ ऐसा होता है जो काला दिखता है क्योंकि वहां अंधकार रहता है। इस भाग को छाया कहते हैं। छाया की लम्बाई तथा आकार (1) प्रकाश के उद्गम. (2) अपारदर्शी वस्तु के आकार तथा (3) प्रकाश के उद्गम एवं वस्तु के बीच की दूरी पर निर्भर करता है।