मिश्रण वह अशुद्ध पदार्थ है जो दो या दो से अधिक शुद्ध पदार्थों (तत्वों या यौगिकों या दोनों) के किसी भी अनुपात में बिना रासायनिक संयोग के मिलने से बनता है तथा जिसके अवयवी पदार्थों को सरल, यांत्रिक या भौतिक विधियों द्वारा पृथक किया जा सकता है।
उदाहरण
वायु अनेक गैसों एवं धूलकणों का मिश्रण है l वायु के अवयवी गैसों में नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प प्रमुख हैं।
समुद्री जल कई लवणों का जल में मिश्रण है, जिसमें सोडियम क्लोराइड प्रमुख लवण है।
पीतल, ताँबा और जस्ता का जल में मिश्रण होता है l
मिश्रण के अवयवी पदार्थों की प्रकृति तथा बने मिश्रण के गुण एवं संघटन के आधार पर मिश्रण को दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया गया है:
समांग मिश्रण (Homogeneous Mixture)
वह मिश्रण जिसके प्रत्येक भाग में उसके अवयवी पदार्थों का संघटन एवं गुण समान होता है, समांग मिश्रण कहलाता है। चीनी का जल में विलयन, नमक का जल में विलयन, गंधक का कार्बन डाइसल्फाइड में विलयन, अमोनिया गैस का हवा में विलयन, आदि समांग मिश्रण के उदाहरण हैं।
असमांग मिश्रण (Heterogeneous Mixture)
वह मिश्रण जिसके विभिन्न भागों में उसके अवयवी पदार्थो का संघटन एवं गुण एक-से नहीं होते हैं, असमाग मिश्रण कहलाता है। लोहा एवं गंधक का मिश्रण, बालू एवं नमक का मिश्रण।
यौगिक वह शुद्ध पदार्थ है जो दो या दो से अधिक तत्वों के निश्चित अनुपात में रासायनिक संयोग से बनता है और जिसे उचित रासायनिक विधियों द्वारा दो या दो से अधिक सर्वथा भिन्न गुणों वाले अवयवों (या अवयव तत्वों) में विभक्त किया जा सकता है।
यौगिकों को ऐसे पदार्थों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिनमें 2 या उससे अधिक प्रकार के तत्व होते हैं जो इसके परमाणुओं के एक निश्चित अनुपात में होते हैं। जब तत्व आपस में जुड़ते हैं तो तत्वों के कुछ व्यक्तिगत गुण (individual property) नष्ट हो जाते हैं और नए बने यौगिक में नए गुण हो जाते हैं।
रासायनिक सूत्र (Chemical Formula)
यौगिकों को उनके रासायनिक सूत्र द्वारा दर्शाया जाता है। एक रासायनिक सूत्र परमाणुओं के अनुपात का एक प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व (Representation of the proportions) है जो एक विशेष रासायनिक यौगिक का निर्माण करता है।
उदाहरण
शुद्ध पानी दो तत्वों – हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से बना एक यौगिक है। पानी में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का अनुपात हमेशा 2:1 होता है। पानी के प्रत्येक अणु में दो हाइड्रोजन परमाणु होते हैं जो एक ऑक्सीजन परमाणु से बंधे (Bonded) होते हैं।
शुद्ध टेबल नमक दो तत्वों – सोडियम और क्लोरीन से बना एक यौगिक है। सोडियम क्लोराइड में सोडियम आयनों का क्लोराइड आयनों से अनुपात हमेशा 1:1 होता है।
शुद्ध मीथेन दो तत्वों – कार्बन और हाइड्रोजन से बना एक यौगिक है। मीथेन में हाइड्रोजन और कार्बन का अनुपात हमेशा 4:1 होता है।
शुद्ध ग्लूकोज तीन तत्वों – कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से बना एक यौगिक है। ग्लूकोज में हाइड्रोजन से कार्बन और ऑक्सीजन का अनुपात हमेशा 2:1:1 होता है।
यौगिक के प्रकार
यौगिकों को दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है, आणविक यौगिक (Molecular Compounds) और लवण (Salts)।
आणविक यौगिकों में, परमाणु एक दूसरे को सहसंयोजक बंधों (covalent bonds) के माध्यम से बांधते हैं।
लवण में यह आयनिक बंधों (ionic bonds) के साथ जुड़ा रहता है। ये दो प्रकार के बंधन हैं जिनसे प्रत्येक यौगिक बनता है।
तत्व वह मौलिक पदार्थ है, जिसे किसी भी भौतिक या रासायनिक विधि द्वारा न तो दो या दो से अधिक सदैव भिन्न गुणों वाले पदार्थों में विभाजित किया जा सकता है, और न ही दो या दो से अधिक पदार्थों के बीच संयोग कराकर संश्लेषित किया जा सकता है।
इलेक्ट्रॉनिक संरचना के अनुसार तत्व वह पदार्थ है जिसके प्रत्येक परमाणु का नाभिकीय आवेश समान होता है। हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, सोडियम, लोहा, ताँबा, सोना, चादी, प्लैटिनम, आदि तत्वों के प्रमुख उदाहरण हैं।
तत्व के प्रकार
तत्व दो प्रकार के होते हैं—धातु (Metal) और अधातु (Non-metal)|
धातु
धातु तत्व विद्युत और ऊष्मा के सुचालक होते हैं तथा ये ठोस अवस्था में आघातवर्द्धनीय (Malleable) और तन्य (Ductile) होते हैं। लोहा, ताँबा, ऐलुमिनियम, चांदी, सोना, प्लैटिनम, आदि धातु हैं।
अधातु
अधातु तत्व विद्युत और ऊष्मा के कुचालक होते हैं। साथ ही साथ अधातु तत्व भुरभुरे (Brittle) होते हैं और प्रहार करने पर चूर-चूर हो जाते है। गंधक, फॉस्फोरस, ऑक्सीजन, ब्रोमीन, इत्यादि अधातु है।
2021 तक 118 रासायनिक तत्वों की खोज की जा चुकी है l इनमे से 94 तत्व प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं। तत्वों को आम तौर पर उसी क्रम में सूचीबद्ध किया जाता है जिसमें प्रत्येक को पहले शुद्ध तत्व के रूप में परिभाषित किया गया था, क्योंकि अधिकांश तत्वों की खोज की सटीक तिथि सटीक रूप से निर्धारित नहीं की जा सकती है।
वर्तमान समय में 112 तत्वों की खोज की जा चुकी है। इनमें से 92 तत्व प्रकृति में पाये जाते हैं। जबकि शेष अन्य तत्व वैज्ञानिकों द्वारा प्रयोगशालाओं में कृत्रिम तरीकों से संश्लोषित किए गए हैं।
आवर्त सारणी का विकास (Development of Periodic Table)
रसायनज्ञों (Chemists) ने हमेशा से तत्वों को उनके गुणों के बीच समानता को प्रतिबिंबित(reflect) करने के लिए व्यवस्थित करने के तरीकों की तलाश की है। आधुनिक आवर्त सारणी (modern periodic table) में तत्वों को बढ़ते हुए परमाणु क्रमांक (atomic number) (एक परमाणु के नाभिक में प्रोटॉनों की संख्या) के क्रम में सूचीबद्ध (lists) किया गया है।
ऐतिहासिक रूप से, हालांकि, तत्वों को व्यवस्थित करने की कोशिश कर रहे वैज्ञानिकों द्वारा सापेक्ष परमाणु द्रव्यमान का उपयोग किया गया था। यह मुख्य रूप से इसलिए था क्योंकि परमाणुओं के छोटे उप-परमाणु कणों (प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉनों) से बने होने का विचार विकसित नहीं हुआ था।
फिर भी, आधुनिक आवर्त सारणी का आधार अच्छी तरह से स्थापित था और यहां तक कि परमाणु संख्या की अवधारणा विकसित होने से बहुत पहले से अनदेखे तत्वों के गुणों की भविष्यवाणी करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था।
17 फरवरी, 1869 को, रसायन विज्ञान के एक रूसी प्रोफेसर, दिमित्री इवानोविच मेंडेलीव (Dimitri Ivanovich Mendeleev) ने अपने कई आवधिक चार्टों में से पहला पूरा किया (first of his numerous periodic charts)।
भौतिक अवस्था के आधार पर पदार्थों को तीन वर्गों में बांटा गया है। ये तीन वर्ग हैं—ठोस (Solid), द्रव (Liquid) तथा गैस (Gas) |
किसी पदार्थ की अवस्था (ठोस द्रव या गैस) उसके अन्तराण्विक बल (Intermolecular force) पर निर्भर करती है।
ठोस (Solid)
ठोस पदार्थ की वह अवस्था है जिसमें उसके आकार एवं आयतन निश्चित होते हैं, जैसे-कुर्सी, मेज, ईंट, आदि।
ठोसों के कण आपस में अत्यधिक निकट होते हैं, इस कारण इनमें उच्च घनत्व और असंपीड्यता होती है। ठोसों में कणों के उच्च क्रम में व्यवस्था को ‘क्रिस्टल जालक’ कहते हैं जिसके फलस्वरूप क्रिस्टलों की एक नियमित ज्यामितीय आकृति होती है।
द्रव (Liquid)
द्रव पदार्थ की वह अवस्था है, जिसमें उसका आयतन निश्चित होता है, परन्तु आकार अनिश्चित होता है जैसे दूध, पानी, तेल और शराब, आदि।
द्रव पदार्थ की सभी स्थितियों में ऊपरी सतह हमेशा समतल होती है। द्रव पदार्थ के अणु ठोस पदार्थ की अपेक्षा दूर-दूर रहते हैं। फिर भी, इनके बीच की दूरी बहुत अधिक नहीं होती है। अत: द्रव पदार्थ अपना आकार असानी से बदल सकते हैं।
गैस (Gas)
गैस पदार्थ की वह अवस्था है, जिसमें उसके आकार और आयतन दोनों अनिश्चित होते हैं, जैसे—वायु, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, क्लोरीन, आदि।
गैस अवस्था में पदार्थ का न तो कोई आकार होता है और न कोई आयतन।
Bombs based on nuclear fission and nuclear fusion and their side effects
नाभिकीय अस्त्र मूलतः दो प्रकार के होते हैं (1) नाभिकीय विखण्डन पर आधारित, जैसे—परमाणु बम तथा (2) नाभिकीय संलयन पर आधारित, जैसे—हाइड्रोजन बम। इनके विस्फोट से मानव जीवन पर दूरगामी प्रभाव पड़ते है।
वे प्रभाव चार प्रकार के हैं:
विस्फोट तरंग
विस्फोट की शुरुआत आग के गोले के निर्माण से शुरू होती है जिसमें धूलकणों एवं गर्म गैसों का उच्च दाब पर घना बादल होता है। विस्फोट के कुछ ही क्षण बाद ये गैसें फैलने लगती है जिससे विस्फोट तरंगें बनती है, इन्हें ‘प्रघात तरंगें’ (Shock waves) भी कहते हैं। इन विस्फोट तरंगों से 5 किलोमीटर तक के सभी लोग और 10 किलोमीटर तक के कुछ लोग मारे जाते हैं। 10 किलोमीटर क्षेत्र तक के कई अन्य व्यक्ति गम्भीर रूप से घायल हो जाते हैं।
तापीय विकिरण
इसमें आग के गोले से निकलने वाली पराबैंगनी, अवरक्त तथा दृश्य किरणें शामिल होती हैं। पराबैंगनी किरणें वायु द्वारा शीघ्रता से अवशोषित कर ली जाती हैं और इसलिए इससे कम क्षति पहुंचती है। लेकिन दृश्य विकिरणों तथा अवरक्त विकिरणों से आंख के साथ-साथ त्वचा को भी क्षति पहुंच सकती है, इसे ‘दीप्ति जलन’ कहा जाता है। तापीय विकिरणों से अखबारों एवं सूखे पत्तों में प्रज्वलन उत्पन्न हो सकता है। इन पदार्थों के जलने से आग लगने की बड़ी घटनाएं हो सकती हैं। हिरोशिमा के 20% से 30% लोगों की मृत्यु इसी विकिरण से हुई थी।
प्राथमिक नाभिकीय विकिरण
ये विकिरण विस्फोट के 1 मिनट के अन्दर उत्पन्न होते हैं। इसमें न्यूट्रॉन और गामा किरणें होती हैं। कुछ न्यूट्रॉन तथा गामा किरणों का उत्सर्जन आग के गोले से लगातार जारी रहता है। शेष गामा किरणों का उत्सर्जन मशरूम के आकार के उन रेडियो सक्रिय पदार्थों के बादल से होता है जो विस्फोट के फलस्वरूप बनते हैं। नाभिकीय विकिरणों से सूजन हो सकती है और मानव कोशिकाओं को क्षति पहुंच सकती है तथा कोशिकाओं का सामान्य विस्थापन भी अवरुद्ध हो जाता है। विकिरणों की बड़ी मात्रा से मृत्यु भी हो सकती है।
अवशिष्ट नाभिकीय विकिरण
ये विकिरण विस्फोट के 1 मिनट के बाद उत्पन्न होते हैं, इन विकिरणों में गामा किरणें तथा बीटा किरणें होते हैं। संलयन से उत्पन्न विकिरणों का निर्माण मुख्यत: न्यूट्रॉनों से होता है। ये कण चट्टानों, मिट्टी तथा जल एवं अन्य पदार्थों से टकराकर मशरूम के आकार का बादल बनाते हैं। परिणामस्वरूप, ये कण रेडियो सक्रिय हो जाते हैं। जब ये कण पृथ्वी पर पुनः गिरने लगते हैं, तो इन्हें निक्षेप (Fall out) कहा जाता है। पृथ्वी की सतह से जितना निकट विस्फोट होगा, निक्षेप का निर्माण उतना ही अधिक होगा।
अतिचालकता की खोज एक डच भौतिकशास्त्री कैमरलिंग ओनिस द्वारा 1911 में की गयी।
अत्यन्त निम्न ताप पर कुछ पदार्थों का विद्युत प्रतिरोध शून्य हो जाता है। इन्हें ‘अतिचालक’ (Super-conductor) कहते हैं और इस गुण को ‘अतिचालकता’ कहते हैं।
4.2 k (अर्थात् 268.8°C) पर पारा अतिचालक बन जाता है, अर्थात् उसका विद्युत प्रतिरोध शून्य हो जाता है, यदि उस समय उसमें धारा प्रवाहित की जाए तो वह अनन्त काल तक बहती रहेगी, उसमें कोई कमी नहीं आएगी।
कुछ मिश्र धातुएं, जैसे—नियोबियस्टन काफी ऊंचे ताप पर भी अतिचालकता प्राप्त कर लेती है।
अतिचालक का दूसरा महत्त्वपूर्ण गुण यह होता है, कि वह पूर्णतः प्रतिचुम्बकीय होता है, अर्थात् वह पूर्ण ‘चुम्बकीय कवच’ होता है जिसे कोई चुम्बकीय बल-रेखा भेदकर उसके अन्दर नहीं जा सकती है।
क्रांतिक ताप (Critical temperature)
कुछ अतिचालक मृत्तिकाएं (Ceramics) थौलियम (TI), बेरियम और कॉपर ऑक्साइड (Cu0) से युक्त होती हैं जिनमें 120 K ताप पर ही अतिचालकता आ जाती है। कोई पदार्थ जिस ताप पर अतिचालक बनता है उसे उसका ‘क्रांतिक ताप’ (Critical temperature) कहते हैं।
जब दो या अधिक हल्के नाभिक संयुक्त होकर एक भारी नाभिक बनाते है और अत्यधिक उर्जा विमुक्त करते है, तो इस अभिक्रिया को नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion)कहते है l
यह अभिक्रिया सूर्य और अन्य तारों में संपन्न होती है और अत्यधिक उर्जा उत्पन्न करती है l सूर्य से प्राप्त प्रकाश और ऊष्मा उर्जा का स्त्रोत नाभिकीय संलयन ही है l
जब अत्यधिक और अति उच्च ताप (जो सूर्य के केंद्रीय भाग में उपलब्ध है ) पर एक ड्यूटेरियम नाभिक ट्रीटियम नाभिक (दोनों हल्के नाभिक) से संयुक्त होता है, तो वे एक हीलियम नाभिक (अपेक्षाकृत भारी नाभिक) बनाते है तथा एक न्यूट्रॉन व अत्यधिक ऊर्जा (17.6 मिलियन इलेक्ट्रॉन वोल्ट) विमुक्त होती है।
सूर्य की असीमित ऊर्जा का कारण नाभिकीय संलयन है। सूर्य में हाइड्रोजन के समस्थानिक ड्यूटेरियम (HP) के परमाणु नाभिकों के संलयन के फलस्वरूप हीलियम नाभिक का निर्माण होता है। इस दौरान प्रचुर ऊर्जा उत्सर्जित होती है।
सबसे सफल संलयन रिएक्टर जिसे ‘टोकामक’ के नाम से जाना जाता है, मूलतः सोवियत वैज्ञानिकों द्वारा डिजाइन किया गया था। रशियन भाषा में टोकामक का अर्थ है-शक्तिशाली धारा।
भारत ने अनुसंधान के उद्देश्य से इंस्टीटयूट ऑफ प्लाज्मा रिसर्च, अहमदाबाद में ‘आदित्य’ नामक टोकामक विकसित कर लिया है।
नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion)के उदाहरण
जब दो भारी हाइड्रोजन का नाभिक (ड्यूट्रॉन 1H2) संलयित होते हैं। तो एक ट्राॅइटियम का नाभिक (ट्राइटॉन) तथा एक प्रोटोन (1H1) प्राप्त होता है। तथा इस प्रक्रिया में 4.0 MeV ऊर्जा निकलती है। 1H2 + 1H2 ⟶⟶ 1H3 + 1H1 + 4.0 MeV ऊर्जा अब ट्राॅइटियम का नाभिक एक तीसरे ड्यूट्रॉन के साथ संलयित होकर एक हीलियम नाभिक (2He4) का निर्माण करती हैं। तथा इस प्रक्रिया में 17.6 MeV ऊर्जा मुक्त होती है। 1H3 + 1H2 ⟶⟶ 2He4 + 0n1 + 17.6 MeV ऊर्जा
Fusion of deuterium with tritium creating helium-4, freeing a neutron, and releasing 17.59 MeV as kinetic energy of the products while a corresponding amount of mass disappears, in agreement with kinetic E = ∆mc2, where Δm is the decrease in the total rest mass of particles
अतः इस प्रकार उपरोक्त दोनों अभिक्रियाओं में तीन ड्यूट्रॉन संलयित होकर एक हीलियम नाभिक, एक प्रोटोन तथा एक न्यूट्रॉन का निर्माण करते हैं। तथा इसमें 21.6 MeV ऊर्जा मुक्त होती है। जो प्रोटॉन (sub>1H1) तथा न्यूट्रॉन (sub>0n1) की गतिज ऊर्जा के रूप में होती है।
हाइड्रोजन बम नाभिकीय संलयन प्रक्रिया पर कार्य करता है। अर्थात् हाइड्रोजन बम नाभिकीय संलयन का एक उदाहरण है।
सूर्य एक मुख्य अनुक्रम तारा (Sequence Star जो हाइड्रोजन नाभिक के हीलियम में परमाणु संलयन द्वारा अपनी ऊर्जा उत्पन्न करता है। अपने मूल में, सूर्य प्रति सेकंड 500 मिलियन मीट्रिक टन हाइड्रोजन का संलयन करता है।
नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion)की प्रक्रिया
नाभिकीय संलयन प्रक्रिया व्यवहार में नाभिकीय विखंडन के मुकाबले एक अत्यंत कठिन प्रक्रिया है। इसका कारण दोनों ड्यूट्रॉनों का धनावेशित होना है। जिसके फलस्वरूप दोनों ड्यूट्रॉन एक दूसरे के निकट मिलने की जगह प्रतिकर्षित हो जाते हैं। यह प्रतिकर्षण बल इतना प्रबल होता है कि अभिक्रिया का होना असंभव सा लगता है। जिस कारण अभिक्रिया में ड्यूट्रॉनों को लगभग 10 मिलियन कैल्विन ताप पर तापित किया जाता है।
हाइड्रोजन बम
हाइड्रोजन बम नाभिकीय संलयन अभिक्रिया पर आधारित है। इस सिद्धान्त के आधार पर हाइड्रोजन के दो नाभिकों को संलयित करके एक अधिक द्रव्यमान का नाभिक तैयार किया जाता है। इस क्रम में काफी मात्रा में ऊर्जा उत्सर्जित होता है जो अन्य नाभिकों को भी संलयित करती है जिससे पुनः ऊर्जा का उत्सर्जन होता है। परिणामस्वरूप अभिक्रिया की एक श्रृंखला बन जाती है जिससे अपरिमित ऊर्जा निःसृत होती है। यह बम, परमाणु बम की अपेक्षा लगभग 10 हजार गुना अधिक विध्वंसात्मक होता है।
नाभिकीय विखण्डन अभिक्रिया ‘स्व-प्रजननी’ (Self-propagating) होने के कारण बहुत महत्त्वपूर्ण है। ‘नियन्त्रित’ विखण्डन से उत्पन्न ऊर्जा पूर्ण नियन्त्रण में रहती है। यह ऊर्जा मुख्यत: ऊष्मा के रूप में होती है तथा इसका विद्युत और यान्त्रिक ऊर्जा में रूपान्तरण करके अनेक लाभदायक कार्यों में उपयोग किया जा सकता है।
1. विद्युत शक्ति का उत्पादन (Electric power generation) करने में;
2. जहाज, वायुयान, पनडुब्बी (Submarine) और रेल चलाने में:
3. रॉकेट उड़ाने में; तथा
4. रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों का उत्पादन करने में। इन समस्थानिकों का उनके स्वतः विघटन के गुण के कारण चिकित्सा, कृषि, रासायनिक विश्लेषण, जीव-रसायन अनुसन्धान, इत्यादि कई क्षेत्रों में उपयोग किया जाता है।
नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion)से जुड़े प्रश्न और ऊत्तर
प्रश्न – नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion)क्या है ?
उत्तर – जब दो हल्के नाभिक परस्पर संयुक्त होकर एक भारी तत्व के नाभिक की रचना करते हैं तो इस प्रक्रिया को नाभिकीय संलयन कहते हैं। नाभिकीय संलयन के फलस्वरूप जिस नाभिक का निर्माण होता है उसका द्रव्यमान संलयन में भाग लेने वाले दोनों नाभिकों के सम्मिलित द्रव्यमान से कम होता है। द्रव्यमान में यह कमी ऊर्जा में रूपान्तरित हो जाती है।
प्रश्न – नाभिकीय अभिक्रिया से क्या तात्पर्य है?
उत्तर – नाभिकीय अभिक्रिया वह प्रक्रम है जिसमें में दो नाभिक या नाभिकीय कण आपस में टक्कर करने के बाद नये उत्पाद बनाते हैं। सिद्धांततः नाभिकीय अभिक्रिया में दो से अधिक नाभिक भी भाग ले सकते हैं किन्तु दो से अधिक नाभिकों के एक ही समय पर टकराने की प्रायिकता बहुत कम होती है, इसलिये ऐसी अभिक्रियाएं अत्यन्त कम होती हैं।
प्रश्न – नाभिकीय विखण्डन व नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion)क्या है?
उत्तर – विखंडन का आशय एक बड़े परमाणु का दो या दो से अधिक छोटे परमाणुओं में विभाजन से है।नाभिकीय संलयन का आशय दो हल्के परमाणुओं के संयोजन से एक भारी परमाणु नाभिक के निर्माण की प्रकिया से है। विखंडन प्रकिया सामान्य रूप से प्रकृति में घटित नहीं होती है। प्रायः सूर्य जैसे तारों में संलयन प्रक्रिया घटित होती है।
प्रश्न – सूर्य में कौन सी क्रिया होती है?
उत्तर – सूर्य (Sun) में नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया होती है
प्रश्न – नाभिकीय ऊर्जा का महत्व क्या है?
उत्तर – यूरेनियम के एक परमाणु क विखण्डन से जो ऊर्जा मुक्त होती है वह कोयले के किसी कार्बन परमाणु के दहन से उत्पन्न ऊर्जा की तुलना में एक करोड़ गुना अधिक होती है। नाभिकीय ऊर्जा प्रदूषण नहीं करती है।यह ऊर्जा थोडी मात्रा में अवशिष्ट पदार्थ उत्पन्न करती है।यह ऊर्जा नवीकरणीय ऊर्जा है।
जब किसी अस्थायी भारी नाभिक पर उच्च ऊर्जा वाले न्यूट्रॉन की बमबारी की जाती है, तो वह लगभग समान द्रव्यमान वाले दो नाभिकों में विभक्त हो जाता है। इस प्रक्रिया को ‘नाभिकीय विखण्डन’ कहा जाता है।
यूरेनियम-235 का नाभिकीय विखण्डन अनेक प्रकार से हो सकता है, उनमें से एक नाभिकीय अभिक्रिया निम्न प्रकार है:
श्रृंखला अभिक्रिया (Chain Reaction)
यदि बहुत अधिक यूरेनियम-235 के परमाणु उपलब्ध हों, तो नाभिकीय विखण्डन एक श्रृंखला अभिक्रिया बन जाती है। यूरेनियम-235 पर जब मन्द गति वाले न्यूट्रॉनों की बमबारी की जाती है, तो U-235 परमाणु एक न्यूट्रॉन को अवशोषित (Absorb) कर लेता है जिससे U-236 का अस्थायी परमाणु बन जाता है। U-236 का नाभिक अत्यधिक अस्थायी होने के कारण तुरन्त दो खण्डों में विभक्त हो जाता है और प्राय: 3 न्यूट्रॉन तथा बहुत अधिक ऊर्जा मुक्त होती है। इस क्रिया में निर्मुक्त न्यूट्रॉनो में से माना दो न्यूट्रॉन दूसरे दो U-235 परमाणुओं का विखण्डन करते है जिससे पहले से अधिक ऊर्जा और लगभग 6 न्यूट्रॉन मुक्त होते हैं। माना इनमें से 4 न्यूट्रॉन दूसरे चार U-235 परमाणुओं का विखण्डन करते हैं जिससे और अधिक ऊर्जा एवं लगभग 12 न्यूट्रॉन मुक्त होते हैं। इस प्रकार यह क्रिया अपने-आप आगे बढ़ती रहती है और अभिक्रियाओं की एक श्रृंखला बन जाती है। प्रथम विखण्डन क्रिया प्रारम्भ होने के पश्चात् बाहर से न्यूट्रॉनों की बमबारी करना आवश्यक नहीं है, क्योंकि अभिक्रिया में उत्पन्न हुए न्यूट्रॉन (मन्दित होकर) विखण्डन अभिक्रिया को स्वयं आगे बढ़ाते रहते हैं। इसे ही ‘श्रृंखला अभिक्रिया’ कहते हैं।
यह अभिक्रिया भी दो प्रकार की बनाई जा सकती है—अनियन्त्रित तथा नियन्त्रित श्रृंखला अभिक्रिया।
परमाणु बम (Atom Bomb)
नाभिकीय विखण्डन क्रिया पर जब किसी प्रकार का नियन्त्रण नहीं होता है, तो विखण्डन क्रिया की दर बहुत तीव्र होती है जिस कारण कुछ ही क्षणों में प्रचण्ड विस्फोट हो जाता है। परमाणु बम में अनियन्त्रित विखण्डन क्रिया होती है। प्रथम परमाणु बम सन् 1945 में बनाया गया था।
द्वितीय विश्वयुद्ध में प्रथम परमाणु बम का विस्फोट 6 अगस्त, 1945 को जापान में हिरोशिमा पर और इसके तीन दिन बाद ही दूसरा परमाणु-विस्फोट जापान में ही नागासाकी पर किया गया था।
समृद्धित यूरेनियम (Enriched Uranium)
परमाणु बम के निर्माण में पर्याप्त यूरेनियम-235 की आवश्यकता होती है परन्तु प्राकृतिक यूरेनियम में केवल 0.7% ही यूरेनियम-235 होता है शेष यूरेनियम-238 होता है जिसका विखण्डन मन्द न्यूट्रॉनों द्वारा नहीं होता है। अतः प्राकृतिक यूरेनियम से यूरेनियम-235 अलग किया जाता है। वह यूरेनियम जिसमें विखण्डनीय यूरेनियम-235 की प्रचुर मात्रा होती है उसे ‘समृद्धित यूरेनियम’ कहते हैं।
नाभिकीय रिएक्टर (Nuclear Reactor)
नियन्त्रित नाभिकीय शृंखला उत्पन्न करने के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले रिएक्टर को ‘नाभिकीय रिएक्टर या परमाणु भट्टी‘ कहा जाता है। इसमें यूरेनियम-235 का नियन्त्रित विखण्डन कराया जाता है। विखण्डन में निकलने वाली ऊर्जा अधिकांशतः ऊष्मीय ऊर्जा के रूप में होती है जिससे पानी को गर्म करके भाप बनाई जाती है। इस भाप द्वारा टरबाइन चलाकर विद्युत उत्पन्न की जाती है। प्रथम नाभिकीय रिएक्टर वैज्ञानिक ऐनरिको फर्मी के निर्देशन में अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय में सन् 1942 में बनाया गया था।
नाभिकीय रिएक्टर के पांच भाग होते हैं:
नाभिकीय ईंधन (Nuclear Fuel) : यह रिएक्टर का मुख्य भाग होता है। इसमें विखण्डनीय (Fissile) पदार्थ होता है। यह प्रायः समृद्धित यूरेनियम होता है।
मन्दक (Moderator) : यह विखण्डन अभिक्रिया में उत्पन्न तीव्र न्यूट्रॉनों को मन्दित करता है। इसके लिए प्रायः ग्रेफाइट या भारी जल (Heavy water) का उपयोग किया जाता है। ड्यूटेरियम ऑक्साइड (D2O) को भारी जल कहते है l इस प्रकार के जल का घनत्व साधारण जल के घनत्व से लगभग 10% अधिक होता है। भारी जल को सबसे अच्छा मंदक माना जाता है।
नियन्त्रक छड़ें (Control Rods) : विखण्डन की श्रृंखला अभिक्रिया को नियन्त्रण में रखने के लिए कैडमियम या बोरॉन की लम्बी छड़ों का उपयोग किया जाता है जिनकी कुछ लम्बाई को रिएक्टर के विखण्डन कक्ष (Fission chamber) के अन्दर तथा कुछ को बाहर रखा जाता है। ये छड़ें विखण्डन में उत्पन्न होने वाले न्यूट्रॉनों को अवशोषित कर लेती हैं, अत: विखण्डन की श्रृंखला रुक जाती है।
शीतलक (Coolant): नाभिकीय विखण्डन के दौरान बड़ी मात्रा में ऊष्मा निर्मुक्त होती है, जिसे ठण्डा करना आवश्यक होता है। इस निर्मित रिएक्टर में वायु, जल और कार्बन डाइऑक्साइड प्रवाहित किए जाते हैं। इस ऊष्मा का उपयोग वाष्प निर्माण में किया जाता है जिससे टरबाइन चलाकर विद्युत उत्पादित की जाती है।
परिरक्षक (Protector) : नाभिकीय विखण्डन के दौरान कई प्रकार की उच्च शक्ति और भेदन क्षमता वाली किरणें निकलती हैं। इन किरणों से रक्षा के लिए रिएक्टर के चारों ओर कंक्रीट की मोटी-मोटी दीवारों का निर्माण किया जाता है, जिसे ‘परिरक्षक’ कहा जाता है। भारत तथा अन्य कई देशों में नाभिकीय रिएक्टरों का उपयोग विद्युत उत्पादन के लिए किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त रिएक्टर से रेडियोऐक्टिव समस्थानिक (Radioactive isotopes) भी प्राप्त होते हैं। रिएक्टर द्वारा यूरेनियम-238 को विखण्डन-योग्य (Fissile) तत्व प्लूटोनियम-239 में भी परिवर्तित किया जाता है और तब उसे परमाणु बम के निर्माण में प्रयुक्त किया जा सकता है।
ब्रीडर रिएक्टर (Breeder Reactor)
ऐसा रिएक्टर जो प्रयुक्त किए गए विखण्डनीय पदार्थ की तुलना में अधिक विखण्डनीय पदार्थ उत्पन्न करता है, ‘ब्रीडर रिएक्टर’ कहलाता है अर्थात् इसमें प्रयुक्त पदार्थ ही और अधिक मात्रा में उत्पन्न किया जाता है। प्रारम्भ में प्लूटोनियम-239 द्वारा समृद्धित यूरेनियम-238 का अथवा थोरियम-232 का उपयोग किया जाता है, उसके पश्चात् यूरेनियम-238 में एक न्यूट्रॉन संयुक्त हो जाने से प्लूटोनियम-239 प्राप्त होता है और थोरियम-232 से यूरोनियम-233 प्राप्त होता है।
नाभिकीय ऊर्जा (परमाणु ऊर्जा) एक परमाणु के नाभिक या कोर में उपलब्ध उर्जा है। परमाणु ऊर्जा का उपयोग बिजली बनाने के लिए किया जाता है। परमाणु ऊर्जा परमाणु विखंडन, परमाणु क्षय और परमाणु संलयन प्रतिक्रियाओं से प्राप्त की जा सकती है।
सम्पूर्ण नाभिकीय ऊर्जा का मूल स्रोत है द्रव्यमान का ऊर्जा में परिवर्तन।
महान् वैज्ञानिक आइन्सटीन ने बताया कि प्रत्येक द्रव्यमान (m), ऊर्जा (E) के समतुल्य है: E=mc2 जहां, c निर्वात (Vacuum) में प्रकाश की चाल है जो 3 x 108 मीटर/सेकण्ड होती है। इस प्रकार एक किलोग्राम द्रव्यमान के समतुल्य ऊर्जा 1 x (3 x 108) = 9 x 1016 जूल होती है। यह अति विशाल ऊर्जा है। अत: m किलोग्राम द्रव्यमान के लुप्त होने mc2 जूल ऊर्जा उत्पन्न होती है तथा 5 जूल ऊर्जा के उत्पन्न होने पर E/c2 किलोग्राम द्रव्यमान की क्षति (Loss) होती है।
बन्धन ऊर्जा (Binding Energy)
नाभिक में उपस्थित प्रोटॉन व न्यूट्रॉन को ‘न्यूक्लिऑन’ (Nucleon) कहते हैं। नाभिक का वास्तविक द्रव्यमान उसमें उपस्थित न्यूक्लिऑनों के द्रव्यमानों के योग से सदैव कुछ कम होता है। यह द्रव्यमान अन्तर ‘द्रव्यमान क्षति’ (Mass defect) कहलाता है।
जब प्रोटॉन व न्यूट्रॉन मिलकर नाभिक की रचना करते हैं, तो कुछ द्रव्यमान लुप्त हो जाता है। यह लुप्त द्रव्यमान ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है। अतः न्यूट्रॉन व प्रोटॉन के संयोग से किसी नाभिक के बनने में जो ऊर्जा विमुक्त होती है उसे नाभिक की बन्धन ऊर्जा कहते हैं।
रेडियोऐक्टिव समस्थानिक बनाने के लिए पदार्थों को रिएक्टर में न्यूट्रॉनों द्वारा किरणित (Irradiated) किया जाता है अथवा उन पर त्वरक (Accelerator) से प्राप्त उच्च ऊर्जा कणों द्वारा बमबारी की जाती है।
आजकल रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों को उपयोग वैज्ञानिक शोध कार्य, चिकित्सा, कृषि एवं उद्योगों में लगातार बढ़ता जा रहा है। एक तत्व के सभी समस्थानिकों के रासायनिक गुण एक समान होते हैं परन्तु नाभिकीय गुण बहुत भिन्न होते हैं।
समस्थानिकों का उपयोग
चिकित्सा में उपयोग
कोबाल्ट-60 एक रेडियोऐक्टिव समस्थानिक है जो उच्च ऊर्जा की गामा किरणें उत्सर्जित करता है। इन गामा किरणों का उपयोग कैंसर के इलाज में किया जाता है। थायरॉइड ग्रन्थि के कैंसर की चिकित्सा के लिए शरीर में रेडियोऐक्टिव आयोडीन समस्थानिक की पर्याप्त मात्रा प्रविष्ट कराई जाती है।
पाचन क्रिया के अध्ययन के लिए भी रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों का उपयोग किया जाता है। भोजन में एक रेडियोऐक्टिव समस्थानिक की थोड़ी-सी मात्रा मिला दी जाती है और रोगी मनुष्य को वह भोजन खिला दिया जाता है। उसके पश्चात् वह भोजन शरीर में जहां-जहां जाता है, उस मार्ग को जी. एम. काउण्टर नामक यन्त्र द्वारा पूर्णतः पहचान लिया जाता है।
जी. एम. अर्थात् Geiger-Miller काउण्टर एक ऐसी युक्ति (Device) है जो रेडियोऐक्टिव पदार्थ की उपस्थिति को पहचान लेती है तथा उसकी सक्रियता (Activity) को माप भी सकती है।
रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों का उपयोग मानव शरीर में संचरित होने वाले कुल रक्त का आयतन ज्ञात करने में भी किया जाता है। रोगी पर शल्य-क्रिया करने के पहले और बाद में इस प्रकार रक्त के आयतन की माप करके यह पता लगाया जाता है, कि शल्य-क्रिया में कुल कितने रक्त की हानि हुई और उतना ही रक्त पुनः रोगी को को बाहर से दिया जाता है।
उदाहरण के लिए, थायरॉइड ग्रन्थि के कैंसर के उपचार के लिए I-131, टयूमर की खोज में As-74 तथा परिसंचरण तन्त्र में रक्त के थक्के का पता लगाने के लिए Na-24 समस्थानिक का उपयोग किया जाता है। Co-60 का उपयोग सामान्य कैंसर के उपचार में किया जाता है।
कृषि में उपयोग
पौधे ने कितना उर्वरक (Fertilizer) ग्रहण किया है, इसका पता रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों की विधि से लगाया जाता है। इसे ‘ट्रेसर विधि’ (Tracer technique) कहते हैं।
उर्वरक को पौधे में लगाने से पहले उसमें किसी रेडियोऐक्टिव समस्थानिक की थोड़ी-सी मात्रा मिला दी जाती है। जब पौधे बढ़ने लगता है, तो जी. एम. काउण्टर द्वारा पौधे में उपस्थित उर्वरक की मात्रा ज्ञात हो जाती है। इससे यह पता चलता है, कि किस पौधे को कौन-सा उर्वरक कितनी मात्रा में दिया जाना चाहिए। गामा किरणों द्वारा खाने के पदार्थों को अनुर्वर (Sterilize) किया जाता है तथा जीव नाशक (Pests) के रूप में उपयोग किया जाता है।
उद्योग में उपयोग
ऑटोमोबाइल के इंजन के क्षयन (Wear) का पता लगाने के लिए ट्रेसर विधि का उपयोग किया जाता है। इसके लिए इंजन के पिस्टन को रेडियोऐक्टिव बना कर पुन: इंजन में फिट कर दिया जाता है। फिर उसके स्नेहन तेल (Lubricating oil) में रेडियोऐक्टिविटी के बढ़ने की दर को माप करके पिस्टन के क्षयन (या घिसाव) को ज्ञात किया जाता है।
कार्बन काल-निर्धारण (Carbon Dating)
मृत पेड़ पौधों, आदि जैसे प्राचीन वस्तुओं की आयु ज्ञात करने के लिए उसमें उपस्थित कार्बन समस्थानिक (6C14) के क्षय होने की दर को ज्ञात करने की विधि कार्बन आयु अंकन कहलाती है।
जीवित अवस्था में प्रत्येक जीव (पौधे या जन्तु) कार्बन-14 (एक रेडियोऐक्टिव समस्थानिक) तत्व को ग्रहण करता रहता है और मृत्यु के बाद उसका ग्रहण करना बन्द हो जाता है। अत: मृत्यु के बाद जीव के शरीर में प्राकृतिक रूप से कार्बन-14 के क्षय (Decay) द्वारा उसकी मात्रा कम होती रहती है। अत: किसी मृत जीव में कार्बन-14 की सक्रियता को माप करके उसकी मृत्यु से वर्तमान तक के समय की गणना की जा सकती है।
यूरेनियम काल-निर्धारण
चट्टान, आदि प्राचीन निर्जीव पदार्थों की आयु को उनमें उपस्थित रेडियोऐक्टिव खनिजों, जैसे—यूरेनियम द्वारा ज्ञात किया जाता है। यूरेनियम काल-निर्धारण की इस विधि द्वारा चन्द्रमा से लाई गई चट्टानों की आयु 4.6 x 109 (4.6 अरब) वर्ष पाई गई है जो लगभग उतनी ही है जितनी पृथ्वी की है।