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  • अल्फा-किरण (α-rays), बीटा-किरण (β-rays) तथा गामा-किरण (γ-rays)

    अल्फा-किरण (α-rays), बीटा-किरण (β-rays) तथा गामा-किरण (γ-rays)

    What are Alpha, Beta and Gama rays ?

    अल्फा-किरण (α-rays)

    i. ये किरणे अति सूक्ष्म धन आवेशित कणों की बनी होती हैं। इस कारण विद्युत क्षेत्र से होकर गमन करते समय ये किरणें विद्युत क्षेत्र के ऋण ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं।

    ii. प्रयोग के आधार पर यह पाया गया है, कि α-कण वस्तुत: द्विआवेशयुक्त हीलियम आयन (He++) हैं। इनकी मात्रा हाइड्रोजन परमाणु की मात्रा से चार गुनी अधिक होती है।

    iii. ये कण अत्यंत तीव्र वेग से रेडियोसक्रिय तत्वों के नाभिक से बाहर निकलते हैं। इसका वेग प्रकाश के वेग का लगभग 1/10 भाग होता है

    iv. इन कणों का द्रव्यमान अधिक होने के कारण इनकी गतिज ऊर्जा अधिक होती है।

    v. इन किरणों को किसी गैस से होकर प्रवाहित करने पर ये आयनित कर देती हैं।

    vi. अधिक द्रव्यमान होने के कारण इन किरणों की भेदन क्षमता (Penetrating power) कम होती है। मिमी. मोटी ऐलुमिनियम की एक पत्तर इन्हें रोक सकती है।

    vii. ये किरणे फोटोग्राफिक प्लेट को प्रभावित करती हैं तथा जिंक सल्फाइड या बेरियम प्लैटिनोसायनाइड में स्फुरदीप्ति (Phosphorescence) उत्पन्न करती है।

    viii. ये किरणें जीव कोशिकाओं (Living cells) को नष्ट कर देती हैं

    बीटा-किरण (β-rays)

    i. ये किरणें ऋण आवेशयुक्त अत्यंत सूक्ष्म कणों की बनी होती हैं। इस कारण विद्युत क्षेत्र से होकर गमन करते समय ये किरणें विद्युत क्षेत्र के धन ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं।

    ii. इन कणों के लिए आवेश और द्रव्यमान का अनुपात e/m कैथोड किरणों में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों के समान होता है।

    iii. इन किरणों का द्रव्यमान हाइड्रोजन परमाणु के द्रव्यमान का 1/1840 होता है।

    iv. इन कणों का वेग प्रकाश के वेग का लगभग 9/10 वां भाग होता है अर्थात् इनका वेग α-कण के वेग का नौ गुना होता है।

    v. इनकी गतिज ऊर्जा α-कणों से बहुत कम होती है, क्योंकि इनका द्रव्यमान कम होता है।

    vi. कम गतिज ऊर्जा के कारण इनकी आयतन क्षमता कणों की अपेक्षा कम होती है।

    vii. उच्च वेग और कम द्रव्यमान होने के कारण इनकी भेदन क्षमता (Penetrating power) α कणों से 100 गुनी अधिक होती है। इनको रोकने के लिए 0.01 मीटर मोटी ऐलुमिनियम की चादर आवश्यक होती है।

    viii. इनकी गतिज ऊर्जा कम होने के कारण इन किरणों में जिंक सल्फाइड एवं बेरियम प्लेटिनोसायनाइड जैसे लवणों में स्फुरदीप्ति उत्पन्न करने की क्षमता नहीं के बराबर होती है।

    ix. किसी विद्युत क्षेत्र से होकर गुजरने पर ये धन-ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं, किन्तु किरणों की अपेक्षा इनका विचलन अधिक होता है।

    x. इन किरणों में जीव कोशिकाओं (Living cells) को नष्ट करने की क्षमता होती है

    गामा किरण ( – rays)

    i. ये किरणें विद्युतत: उदासीन होती हैं। इस कारण विद्युत क्षेत्र से होकर गमन करते समय किरणें विचलित नहीं होती हैं।

    ii. ये किरणें अति लघु तरंगदैर्घ्य वाली विद्युत चुम्बकीय तरंग है।

    iii. ये किरणें कणों की नहीं बनी होती हैं।

    iv. इनका वेग प्रकाश के वेग के लगभग बराबर होता है।

    V. इनकी मात्रा शून्य होती है। अत: गामा किरणे अद्रव्य (Non-material) प्राकृतिक वाली होती है।

    vi. अति उच्च वेग से गतिशील होने के कारण गामा किरणों की भेदन क्षमता (Penetrating power) α- और β-किरणों की तुलना में सबसे अधिक होती है।

    vii. इन किरणों का द्रव्यमान नहीं के बराबर होने के कारण इनका फोटाग्राफिक प्लेट एवं जिंक सल्फाइड या बेरियस प्लैटिनोसायनाइड पर प्रभाव बहुत कम पड़ता है।

    viii. इन किरणों में जीव-कोशिकाओं को नष्ट करने की शक्ति होती है

    ix. गतिज ऊर्जा का मान बहुत कम होने के कारण इन किरणों में गैसों को आयनित करने की क्षमता बहुत कम होती है।

  • रेडियोसक्रिय किरणें (Radioactive Rays) क्या है ?

    रेडियोसक्रिय किरणें (Radioactive Rays) क्या है ?

    What is Radioactive Rays ?

    रेडियोसक्रिय पदार्थों से निकलने वाली अदृश्य किरणों को रेडियोसक्रिय किरणें (Radioactive rays) कहते हैं

    रेडियोसक्रिय पदार्थों से निकलने वाली इन किरणों को रदरफोर्ड ने 1902 ई. में चुम्बकीय तथा विद्युत क्षेत्र से प्रवाहित करके पाया कि कुछ किरणों विद्युत क्षेत्र के धन ध्रुव की ओर मुड़ जाती है तथा अन्य किरणों पर चुम्बकीय एवं विद्युत क्षेत्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और ये सीधे गमन करती हुई निकल जाती हैं।

    रदरफोर्ड ने इन किरणों को क्रमश: अल्फा-किरण (α-rays), बीटा-किरण (β-rays) तथा गामा-किरण (γ-rays) कहा

    रेडियोसक्रिय किरणों के गुण

    अल्फा (α) किरणों के गुण

    i. ये किरणे अति सूक्ष्म धन आवेशित कणों की बनी होती हैं। इस कारण विद्युत क्षेत्र से होकर गमन करते समय ये किरणें विद्युत क्षेत्र के ऋण ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं।

    ii. प्रयोग के आधार पर यह पाया गया है, कि α-कण वस्तुत: द्विआवेशयुक्त हीलियम आयन (He++) हैं। इनकी मात्रा हाइड्रोजन परमाणु की मात्रा से चार गुनी अधिक होती है।

    iii. ये कण अत्यंत तीव्र वेग से रेडियोसक्रिय तत्वों के नाभिक से बाहर निकलते हैं। इसका वेग प्रकाश के वेग का लगभग 1/10 भाग होता है।

    iv. इन कणों का द्रव्यमान अधिक होने के कारण इनकी गतिज ऊर्जा अधिक होती है।

    v. इन किरणों को किसी गैस से होकर प्रवाहित करने पर ये आयनित कर देती हैं।

    vi. अधिक द्रव्यमान होने के कारण इन किरणों की भेदन क्षमता (Penetrating power) कम होती है। मिमी. मोटी ऐलुमिनियम की एक पत्तर इन्हें रोक सकती है।

    vii. ये किरणे फोटोग्राफिक प्लेट को प्रभावित करती हैं तथा जिंक सल्फाइड या बेरियम प्लैटिनोसायनाइड में स्फुरदीप्ति (Phosphorescence) उत्पन्न करती है।

    viii. ये किरणें जीव कोशिकाओं (Living cells) को नष्ट कर देती हैं।

    बीटा (β) किरणों के गुण

    i. ये किरणें ऋण आवेशयुक्त अत्यंत सूक्ष्म कणों की बनी होती हैं। इस कारण विद्युत क्षेत्र से होकर गमन करते समय ये किरणें विद्युत क्षेत्र के धन ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं।

    ii. इन कणों के लिए आवेश और द्रव्यमान का अनुपात e/m कैथोड किरणों में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों के समान होता है।

    iii. इन किरणों का द्रव्यमान हाइड्रोजन परमाणु के द्रव्यमान का 1/1840 होता है।

    iv. इन कणों का वेग प्रकाश के वेग का लगभग 9/10 वां भाग होता है अर्थात् इनका वेग α-कण के वेग का नौ गुना होता है।

    v. इनकी गतिज ऊर्जा α-कणों से बहुत कम होती है, क्योंकि इनका द्रव्यमान कम होता है।

    vi. कम गतिज ऊर्जा के कारण इनकी आयतन क्षमता कणों की अपेक्षा कम होती है।

    vii. उच्च वेग और कम द्रव्यमान होने के कारण इनकी भेदन क्षमता (Penetrating power) α कणों से 100 गुनी अधिक होती है। इनको रोकने के लिए 0.01 मीटर मोटी ऐलुमिनियम की चादर आवश्यक होती है।

    viii. इनकी गतिज ऊर्जा कम होने के कारण इन किरणों में जिंक सल्फाइड एवं बेरियम प्लेटिनोसायनाइड जैसे लवणों में स्फुरदीप्ति उत्पन्न करने की क्षमता नहीं के बराबर होती है।

    ix. किसी विद्युत क्षेत्र से होकर गुजरने पर ये धन-ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं, किन्तु किरणों की अपेक्षा इनका विचलन अधिक होता है।

    x. इन किरणों में जीव कोशिकाओं (Living cells) को नष्ट करने की क्षमता होती है।

    गामा (γ) किरणों के गुण

    i. ये किरणें विद्युतत: उदासीन होती हैं। इस कारण विद्युत क्षेत्र से होकर गमन करते समय किरणें विचलित नहीं होती हैं।

    ii. ये किरणें अति लघु तरंगदैर्घ्य वाली विद्युत चुम्बकीय तरंग है।

    iii. ये किरणें कणों की नहीं बनी होती हैं।

    iv. इनका वेग प्रकाश के वेग के लगभग बराबर होता है।

    V. इनकी मात्रा शून्य होती है। अत: गामा किरणे अद्रव्य (Non-material) प्राकृतिक वाली होती है।

    vi. अति उच्च वेग से गतिशील होने के कारण गामा किरणों की भेदन क्षमता (Penetrating power) α- और β-किरणों की तुलना में सबसे अधिक होती है।

    vii. इन किरणों का द्रव्यमान नहीं के बराबर होने के कारण इनका फोटाग्राफिक प्लेट एवं जिंक सल्फाइड या बेरियस प्लैटिनोसायनाइड पर प्रभाव बहुत कम पड़ता है।

    viii. इन किरणों में जीव-कोशिकाओं को नष्ट करने की शक्ति होती है।

    ix. गतिज ऊर्जा का मान बहुत कम होने के कारण इन किरणों में गैसों को आयनित करने की क्षमता बहुत कम होती है।

  • रेडियोसक्रियता (Radioactivity) क्या है ?

    रेडियोसक्रियता (Radioactivity) क्या है ?

    What is Radioactivity ?

    प्रकृति में पाये जाने वाले वे तत्व जो स्वत: विखंडित होकर कुछ अदृश्य किरणों का उत्सर्जन करते रहते हैं रेडियोसक्रिय तत्व कहलाते हैं तथा यह घटना ‘रेडियोसक्रियता’ कहलाती है। रेडियोसक्रिय तत्वों से निकलने वाली अदृश्य किरणें ‘रेडियोसक्रिय किरणें’ कहलाती है।

    रेडियोसक्रियता की खोज (Discovery of Radioactivity)

    1896 ई. में फ्रांस के वैज्ञानिक हेनरी बेकरेल (Henery Becquerel) ने सर्वप्रथम रेडियोसक्रियता का पता लगाया

    हेनरी बेकरेल ने पाया कि यूरेनियम तथा यूरेनियम लवणों से कुछ अदृश्य किरणें स्वतः उत्सर्जित होते हैं। प्रारम्भ में इन दृश्य किरणों को बेकरेल किरणें (Becquerel rays) कहा गया।

    1898 ई. में मैडम क्यूरी (Madam Curie) तथा उनके पति पियरे क्यूरी (Pierre Curie) ने यह सुझाव दिया कि यूरेनियम और इसके यौगिकों से बेकरेल किरणों का निकलना एक परमाणुजनित क्रिया (Atomic phenomenon) है और यह विशिष्ट गुण यूरेनियम की रासायनिक स्थिति या भौतिक अवस्था पर निर्भर नहीं करता है। 1898 ई. में ही मैडम क्यूरी एवं स्मीट (Schimidt) ने अन्य रेडियोसक्रिय पदार्थों की खोज के क्रम में बतलाया कि थोरियम धातु के तत्व में भी रेडियोसक्रियता पायी जाती है

    सन् 1902 में मैडम क्यूरी तथा उनके पति पियरे क्यूरी ने पता लगाया कि यूरेनियम के खनिज पिच ब्लैंड (Pitch blend) में यूरेनियम की अपेक्षा लगभग चार गुनी अधिक रेडियोसक्रिय तत्व उपस्थित है। इस अनुमान के आधार पर इस वैज्ञानिक दम्पत्ति ने अपने कठिन और जोखिम भरे अनुसंधान के फलस्वरूप सन् 1903 में पिच ब्लैंड से रेडियम (Radium) नामक एक अत्यंत रेडियोसक्रिय तत्व की खोज की

    आज तक विभिन्न तत्वों के 1,000 से अधिक रेडियोधर्मी समस्थानिक (radioactive isotopes) ज्ञात हैं। इनमें से लगभग 50 प्रकृति में पाए जाते हैं; शेष कृत्रिम रूप से परमाणु प्रतिक्रियाओं (nuclear reactions) के प्रत्यक्ष उत्पादों के रूप में या परोक्ष रूप से इन उत्पादों के रेडियोधर्मी वंशज (radioactive descendants) के रूप में उत्पादित होते हैं। रेडियोधर्मी समस्थानिकों (Radioactive isotopes) में कई उपयोगी अनुप्रयोग होते हैं।

    रेडियोसक्रियता दो प्रकार की होती है :

    प्राकृतिक रेडियोसक्रियता (Natural Radioactivity)

    रेडियोसक्रिय तत्वों के परमाणु के नाभिक स्वत: विखंडित होकर अन्य तत्वों के परमाणुओं में परिवर्तित होते रहते हैं। यह क्रिया स्वाभाविक रूप से चलती रहती है तथा इसमें रेडियोसक्रिय किरणों का उत्सर्जन होता है, इसे प्राकृतिक रेडियोसक्रियता कहते हैं,

    उदाहरण के लिए, यूरेनियम, रेडियम, थोरियम, आदि तत्वों का विखंडन स्वयं होता रहता है। अत: इन तत्वों में पायी जाने वाली रेडियोसक्रियता ‘प्राकृतिक रेडियोसक्रियता’ कहलाती है।

    कृत्रिम रेडियोसक्रियता (Artificial Radioactivity)

    कृत्रिम रेडियोसक्रियता वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा उस तत्व पर तीव्र वेग वाले कणों (प्रोट्रॉन, ड्यूट्रॉन, अल्फा कण, आदि) से प्रहार किया जाता है

    उदाहरण के लिए, मैग्नीशियम जो एक स्थायी तत्व है, पर अल्फा कणों (2He4) से प्रहार करने पर एक अस्थायी और रेडियोसक्रिय तत्व सिलिकन (14Si27) बनता है तथा न्यूट्रॉन (0n1) मुक्त होता है, फिर यह (14Si27) स्वतः परिवर्तित होकर स्थायी ऐलुमिनियम में बदल जाता है।

  • समभारिक, समन्यूट्रॉनिक और समइलेक्ट्रॉनिक क्या है ?

    समभारिक, समन्यूट्रॉनिक और समइलेक्ट्रॉनिक क्या है ?

    What is Isobars, Isotones and Isoelectronic ?

    वे तत्व जिनकी द्रव्यमान संख्याएं एक ही, किन्तु परमाणु संख्याएं भिन्न-भिन्न होती है समभारिक कहलाते है

    समभारिकों की परमाणु संख्या में भिन्नता का कारण है, उन तत्वों के नाभिकों में प्रोटॉनों की संख्या का भिन्न-भिन्न होना। समभारित एक ग्रीक भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है, समान भारी (Iso = समान, Bars = भारी)।

    समभारिक के गुण:

    1. समभारिकों के अधिकांश भौतिक गुण एक-दूसरे से भिन्न होते हैं।

    2. समभारिकों के रासायनिक गुण एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न होते हैं।

    3. समभारिकों के वे भौतिक गुण एक समान होते हैं जो परमाणु द्रव्यमान पर निर्भर करते हैं।

    नोटः रेडियोसक्रिय तत्वों के बीटा कणों के उत्सर्जन से समभारिक बनते हैं

    समन्यूट्रॉनिक (Isotones)

    वे तत्व जिनकी परमाणु संख्या एवं द्रव्यमान संख्या दोनों भिन्न-भिन्न हों, किन्तु जिनके नाभिक में न्यूट्रॉनों की संख्या समान हो, ‘समन्यूट्रॉनिक’ कहलाते हैं।

    उदाहरण

    1. फॉस्फोरस (15P31) तथा सल्फर (14S30) समन्यूट्रॉनिक है, क्योंकि इनमें से प्रत्येक के नाभिक में 16 न्यूट्रॉन है।

    2. वेनेडियम (23V51) तथा क्रोमियम (24Cr52) भी समन्यूट्रॉनिक हैं, क्योंकि इन दोनों के नाभिक में न्यूट्रॉनों की संख्या 28 है।

    समइलेक्ट्रॉनिक (Isoelectronic)

    वे आयन जिनमें इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है, ‘समइलेक्ट्रॉनिक आयन’ कहलाते हैं

    उदाहरण:

    Na+, Mg++, F, आदि समइलेक्ट्रॉनिक आयन हैं, क्योंकि इनमें से प्रत्येक में इलेक्ट्रॉनों की संख्या 10 है।

  • समस्थानिक (Isotopes) क्या है ?

    समस्थानिक (Isotopes) क्या है ?

    What is Isotopes ?

    एक ही तत्व के वे परमाणु जिनकी परमाणु संख्याएं समान, किन्तु द्रव्यमान संख्याएं भिन्न-भिन्न होती हैं, ‘समस्थानिक’ कहलाते हैं

    किसी तत्व के विभिन्न समस्थानिकी की परमाणु संख्या समान होने का कारण यह है कि उनके नाभिक में प्रोटॉन की संख्या समान होती है किन्तु उनके नाभिक में न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न-भिन्न होने के कारण उनकी द्रव्यमान संख्याएं भिन्न-भिन्न होती है।

    परमाणु संख्या (Atomic Number) : किसी तत्व के परमाणु के नाभिक में उपस्थित इकाई धन आवेशों की कुल संख्या या उस तत्व के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों कि कुल संख्या को उस तत्व की परमाणु संख्या कहते है l

    समस्थानिकों के गुण:

    • किसी तत्व के सभी समस्थानिकों के भौतिक गुण प्रायः भिन्न-भिन्न होते हैं।
    • किसी तत्व के सभी समस्थानिकों के रासायनिक गुण एक जैसे होते हैं।
    • किसी तत्व के सभी समस्थानिक आवर्त सारणी में एक ही स्थान ग्रहण करते है।
    • किसी तत्व के सभी समस्थानिकों के परमाणुओं में इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है।
    • हाइड्रोजन ही एकमात्र ऐसा तत्व है जिसके सभी समस्थानिकों के अलग-अलग नाम है।
    • पोलोनियम सर्वाधिक समस्थानिकों वाला तत्व है।
    • हाइड्रोजन का समस्थानिक ‘ट्राइटियम’ (1H3) रेडियोसक्रियता का गुण प्रदर्शित करता है।

    उदाहरण:

    1. ऑर्गन (18Ar40), पोटैशियम (19K40) तथा कैल्सियम (19Ca40) समभारिक है, क्योंकि इन तीनों की द्रव्यमान संख्याएं समान हैं।

    2. नाइट्रोजन (7N14) तथा कार्बन (6CI4) समभारिक हैं, क्योंकि इन दोनों की द्रव्यमान संख्याएं समान हैं।

    3. सोडियम ( 11Na24) तथा मैग्नीशियम (12Mg24) समभारिक हैं, क्योंकि इनकी द्रव्यमान संख्याएं समान हैं।

  • प्लैंक का क्वांटम सिद्धांत क्या है ?

    प्लैंक का क्वांटम सिद्धांत क्या है ?

    What is Plank’s Quantum Theory ?

    सन् 1901 में प्लैंक ने तप्त काली वस्तुओं से उत्सर्जित विभिन्न कम्पनावृत्तियों वाली प्रकाश ऊर्जा के अध्ययन से एक सिद्धांत का प्रतिपादन किया।

    इस सिद्धांत के अनुसार, “किसी वस्तु से प्रकाश और ऊष्मा जैसी विकिरण ऊर्जा का उत्सर्जन या अवशोषण सतत् नहीं होता, बल्कि असतत् रूप से छोटे-छोटे सवेष्ट (Packets) में होता है।’ इन छोटे संवेष्टों को ‘क्वांटम’ (Quantum) कहते हैं।

    उदाहरण

    हाइड्रोजन (H) परमाणु के नाभिक में सिर्फ 1 प्रोटॉन रहता है अत: हाइड्रोजन की परमाणु संख्या 1 होती है।

    कार्बन (C) परमाणु के नाभिक में 6 प्रोटॉन रहते हैं। अतः कार्बन की परमाणु संख्या 6 होती है।

    क्वांटम संख्याएं (Quantum Numbers)

    क्वांटम संख्याएं वे संख्याएं हैं जो किसी इलेक्ट्रॉन की स्थिति तथा उसकी ऊर्जा की जानकारी देता है। किसी इलेक्ट्रॉन की स्थिति और उसकी ऊर्जा जानने के लिए निम्नलिखित चार तथ्यों का ज्ञान अनिवार्य है

    (1) इलेक्ट्रॉन का कोश, (2) उस कोश में वह किस सबकोश में है, (3) उस सबकोश में वह किस कक्षक में है, तथा (4) उस कक्षक में उसका चक्रण किस प्रकार है।

    उदाहरणः

    1. हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक होते हैं, जिसकी परमाणु संख्या 1 किन्तु उनकी द्रव्यमान संख्याएं क्रमश: 1,2 और 3 होती है। प्रोटियम (1H1), ड्यूटेरियम(1H2), ट्राइटियम (1H3),

    2. कार्बन के दो समस्थानिक होते हैं, जिनकी परमाणु संख्या 6 तथा द्रव्यमान संख्याएं 12 और 14 होती है। 6C12 तथा 6C14

    परमाणु संख्या (Atomic Number)

    किसी तत्व के परमाणु के नाभिक में उपस्थित इकाई धन आवेशों की कुल संख्या या उस तत्व के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों कि कुल संख्या को उस तत्व की परमाणु संख्या कहते है l

  • रदरफोर्ड का नाभिकीय सिद्धांत क्या है ?

    रदरफोर्ड का नाभिकीय सिद्धांत क्या है ?

    What is Rutherford’s Nuclear Theory ?

    1911 ई. में लॉर्ड रदरफोर्ड (Lord Rutherford) ने एक अति महत्त्वपूर्ण प्रयोग करके परमाणु की आंतरिक व्यवस्था से सम्बन्धित एक आश्चर्यजनक तथ्य का पता लगाया।

    रदरफोर्ड द्वारा किये गए इस प्रयोग को रदरफोर्ड का प्रकीर्णन प्रयोग (Rutherford’s Scattering Experiment) कहा जाता है। टॉम्सन द्वारा प्रस्तुत परमाणु का स्वरूप अस्वीकार करते हुए रदरफोर्ड ने अपने प्रयोग के निरीक्षणों के आधार पर एक सिद्धांत का प्रतिपादन किया जिसे रदरफोर्ड का ‘नाभिकीय सिद्धांत’ कहते हैं

    रदरफोर्ड के ‘नाभिकीय सिद्धांत’ की सिद्धांत की मुख्य बातें

    1. परमाणु में इलेक्ट्रॉनों से घिरे केन्द्र में प्रोटॉन का एक छोटा-सा किन्तु भारी नाभिक होता है।
    2. परमाणु के अंदर का अधिकांश भाग खाली होता है।
    3. परमाणु गोलीय (Spherical) होता है।
    4. परमाणु के नाभिक का आकार परमाणु के आकार की तुलना में अत्यन्त छोटा होता है।

    परमाणु के स्थायित्व की व्याख्या के लिए रदरफोर्ड ने अनुमान लगाया कि परमाणु सौरमंडल की तरह होता है। परमाणु में उपस्थित इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर वृत्ताकार पथ में ठीक उसी तरह परिक्रमा करते रहते हैं, जिस तरह सूर्य के चारों ओर विभिन्न नक्षत्र करते हैं। इन वृत्ताकार पथ को कक्षाएं (Orbits) कहा जाता है। ऐसा होने से नाभिक तथा इलेक्ट्रॉन के बीच कार्यरत स्थिर विद्युत आकर्षण बल इलेक्ट्रॉन के वेग से उत्पन्न केन्द्राभिसारी बल (Centrifugal force) के बराबर होता है। इस परमाणु में उपस्थित इलेक्ट्रॉन अपनी कक्षाओं में गतिशील रहते हुए परमाणु को स्थायित्व प्रदान करते हैं।

  • परमाणु द्रव्यमान, मोल और एवोग्राड्रो संख्या क्या है ?

    परमाणु द्रव्यमान, मोल और एवोग्राड्रो संख्या क्या है ?

    परमाणु द्रव्यमान (Atomic Mass)

     किसी तत्व का परमाणु द्रव्यमान एक संख्या है जो यह बतलाती है, कि उस तत्व के एक परमाणु का द्रव्यमान कार्बन (परमाणु द्रव्यमान = 12) के एक परमाणु के द्रव्यमान के 12वें भाग से कितना गुना भारी है।

    मोल (Mole)

    मोल किसी पदार्थ के परमाणु, अणु अथवा आयन की निश्चित संख्या को व्यक्त करता है। यह संख्या 6.022 x 1023 है। संख्या 6.022 x 1023 जो मोल को प्रकट करता है, को एवोगाड्रो संख्या भी कहते हैं। अत: मोल पदार्थ के कणों की एवोगाड्रो संख्या भी व्यक्त करता है।

    एवोगाड्रो संख्या (Avogadro Number)

    किसी तत्व के एक ग्राम परमाणु (1 मोल) में उपस्थित परमाणुओं की संख्या 6.022 x 10-3 होती है या किसी पदार्थ (तत्व या यौगिक) के 1 ग्राम अणु (1 मोल) में उपस्थित अणुओं की संख्या भी इतनी ही अर्थात् 6.022 x 10 होती है। इस संख्या को ‘ एवोगाड्रो संख्या’ कहते है।

  • मिश्रणों को अलग करने की विधियाँ क्या है ?

    मिश्रणों को अलग करने की विधियाँ क्या है ?

    मिश्रण में उपस्थित घटकों को विभिन्न विधियों द्वारा अलग-अलग किया जाता है। मिश्रणों के पृथक्करण की कुछ सामान्य विधिया निम्नलिखित हैं:

    क्रिस्टलन (Crystallisation)

    क्रिस्टलन विधि के द्वारा अकार्बनिक ठोसों में उपस्थित घटकों का पृथक्करण एवं शुद्धीकरण किया जाता है। इसमें उपस्थित अशुद्ध ठोस या मिश्रण को उचित विलायक के साथ मिलाकर गर्म किया जाता है तथा गर्म अवस्था में ही इस विलयन को फनल (Funnel) द्वारा छाना जाता है। छानने के पश्चात् विलयन को ठंडा किया जाता है। ठंडा होने पर शुद्ध पदार्थ क्रिस्टल के रूप में विलयन से पृथक् हो जाता है और इसमें उपस्थित अशुद्धियां मातृ द्रव में घुली रह जाती हैं। इन क्रिस्टलों को छानकर अलग कर सुखा लिया जाता है।

    आसवन (Distillation)

    आसवन विधि द्वारा मुख्यतः द्रवों के मिश्रण को पृथक् किया जाता है। जब दो द्रवों के क्वथनांकों में अंतर अधिक होता है, तो उनके मिश्रण को इस विधि से पृथक किया जाता है।

    आसवन विधि में द्रव को वाष्प में परिवर्तित कर किसी दूसरे स्थान में भेजा जाता है, जहां उसे ठंडा कर पुनः द्रव अवस्था में परिवर्तित कर लिया जाता है। आसवन विधि में पहला प्रक्रम वाष्पन तथा दूसरा प्रक्रम संघनन कहलाता है

    उर्ध्वपातन (Sublimation)

    सामान्य ठोस पदार्थों को गर्म करने पर वे द्रव अवस्था में परिवर्तित होते हैं और उसके पश्चात् गैसीय अवस्था में, लेकिन कुछ ठोस पदार्थ ऐसे होते हैं। जिन्हें गर्म किये जाने पर वे द्रव अवस्था में आने के बदले सीधे वाष्प में परिणत हो जाते हैं। वाष्प को ठंडा किये जाने पर यह पुनः ठोस अवस्था में हो जाते है। ऐसे पदार्थों को उर्ध्वपातूज (Sublimate) कहा जाता है। इस प्रकार की क्रिया ‘उर्ध्वपातन‘ कहलाती है।

    इस विधि के द्वारा दो ऐसे ठोसों के मिश्रण में से उसको पृथक् करते हैं, जिसमें एक ठोस उर्ध्वपात्ज होता है, दूसरा नहीं। ऐसे ठोसों के मिश्रण को गर्म करने पर उर्ध्वपात्ज ठोस सीधे वाष्प अवस्था में परिवर्तित हो । जाता है। इस वाष्प को अलग ठंडा कर लिया जाता है। इस प्रकार दोनों ठोस पृथक् हो जाते है। इस विधि के द्वारा कपूर, नेफ्थलीन, अमोनियम क्लोराइड, एन्थ्रासीन, बेन्जोइक अम्ल, आदि पदार्थ शुद्ध किये जाते हैं

    प्रभाजी आसवन (Fractional Distillation)

    प्रभाजी आसवन विधि के द्वारा उन मिश्रित द्रवों का पृथक्करण किया जाता है, जिनके क्वथनांकों में बहुत कम का अंतर होता है। दूसरे शब्दों में द्रवों के क्वथनांक एक-दूसरे के समीप होते हैं।

    भूगर्भ से निकाले गये खनिज तेल से शुद्ध पेट्रोल, डीजल, मिट्टी का तेल, आदि इसी विधि द्वारा पृथक किये जाते हैं। जलीय वायु (Liquid air) से विभिन्न गैसें भी इसी विधि द्वारा पृथक् किये जाते है।

    वर्णलेखन (Chromatography)

    वर्णलेखन विधि इस तथ्य पर आधारित है कि किसी मिश्रण के भिन्न घटकों की अधिशोषण क्षमता भिन्न-भिन्न होती है तथा वे किसी अधिशोषक पदार्थ में विभिन्न दूरियों पर अधिशोषित होते हैं और इस प्रकार पृथक् कर लिए जाते हैं

    भाप आसवन (Steam Distillation)

    भाप आसवन विधि के द्वारा ऐसे कार्बनिक पदार्थों का शुद्धीकरण किया जाता है। जो जल में अघुलनशील, परन्तु वाष्प के साथ वाष्पशील होते हैं। इस विधि के द्वारा विशेष रूप में उन पदार्थों का शुद्धीकरण किया जाता है जो अपने क्वथनांक पर अपघटित हो जाते हैं।

    कार्बनिक पदार्थों जैसे एसीटोन, मेथिल ऐल्कोहॉल, एसीटल्डिहाइड, आदि का शुद्धीकरण भाग आसवन विधि द्वारा ही किया जाता है।

  • अणु (Molecule)और परमाणु (Atom) क्या है ?

    अणु (Molecule)और परमाणु (Atom) क्या है ?

    What is Molecule & Atom ?

    किसी पदार्थ (तत्व या यौगिक) का वह सूक्ष्मतम कण जो स्वतंत्र अवस्था में रह सकता है, परन्त रासायनिक अभिक्रियाओं (प्रतिक्रियाओं) में भाग नहीं ले सकता है तथा जिसमें उस पदार्थ के सभी गुण विद्यमान रहते हैं, अणु कहलाता है।

    एक पदार्थ के सभी अणु हर प्रकार (द्रव्यमान, आकार, गुण, आदि) से एक-दूसरे के सदृश होते हैं। इसके विपरीत, किन्ही दो पदार्थों के अणु एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न होते हैं।

    उदाहरण के लिए, जल (H2O) के सभी अणु सदृश होते हैं। जल के प्रत्येक अणु का सापेक्ष द्रव्यमान 18 होता है। इसके अणुओं के भौतिक एवं रासायनिक गुण, इनके आकार, आदि पूर्णतया समरूप होते हैं।

    अणु दो प्रकार के होते हैं—तत्व के अणु एवं यौगिक के अणु।

    तत्व के अणु

    जब एक ही तत्व के एक से अधिक परमाणु मिलकर उसके सूक्ष्मतम स्वतंत्र कणों का निर्माण करते हैं, तो ये कण तत्व के ‘अणु’ कहलाते हैं। उदाहरण के लिए, हाइड्रोजन का अणु (H) हाइड्रोजन के दो परमाणुओं से मिलकर बना होता है।

    यौगिक के अणु

    जब एक से अधिक तत्वों के परमाणु परस्पर मिलकर सूक्ष्मतम स्वतंत्र कणों का निर्माण करते हैं, तो ये कण यौगिक के अणु कहलाते हैं। उदाहरण के लिए, मिथेन (CH) का प्रत्येक अणु कार्बन के एक परमाणु तथा हाइड्रोजन के चार परमाणुओं से मिलकर बना होता है।

    परमाणु (Atom)

    किसी पदार्थ (तत्व) का वह संभव सूक्ष्मतम कण जो स्वतंत्र अवस्था में नहीं रह सकता है, परन्तु रासायनिक अभिक्रियाओं में भाग लेता है तथा जिसमें उस पदार्थ के सभी गुण विद्यमान रहते हैं, परमाणु कहलाता है

    डाल्टन के अनुसार, परमाणु अविभाज्य था, परन्तु आधुनिक आविष्कारों से यह ज्ञात हो चुका है कि ‘परमाणु भी सूक्ष्म कणों से मिलकर बना होता है, जिनमें इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन एवं न्यूट्रान मुख्य है