Blog

  • अम्ल (Acids) क्या है ?

    अम्ल (Acids) क्या है ?

    What is Acids ?

    अम्ल वे यौगिक पदार्थ हैं जिनमें एक या एक से अधिक विस्थापनशील हाइड्रोजन परमाणु विद्यमान हों तथा जिन्हें अंशत: या पूर्णतः धातुओं या धातुओं के सदृश आचरण करने वाले मूलकों द्वारा विस्थापित करने पर लवण का निर्माण होता हो, जो क्षारक या क्षार से अभिक्रिया कर लवण एवं जल बनाते हों, जिनके जलीय घोल नीले लिटमस को लाल करते हों तथा जो स्वाद में खट्टे हों।

    अम्ल के गुण:

    1. अम्ल स्वाद में खट्टा होता है।

    2. अच्छे एवं प्रबल अम्ल विद्युत के सुचालक होते हैं।

    3. अम्ल धातु से क्रिया करके हाइड्रोजन गैस मुक्त करते हैं।

    4. भस्म एवं क्षार से प्रतिक्रिया करके लवण और जल बनाता है।

    5. नीले लिटमस पत्र तथा मिथाइल ऑरन्ज को लाल कर देता है।

    अम्ल दो प्रकार के होते हैं:

    ऑक्सी अम्ल (Oxy Acids)

    जिन अम्लों में हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन दोनों उपस्थित रहते हैं उन्हें ‘ऑक्सी अम्ल’ कहते हैं, जैसे—सल्फ्यूरिक अम्ल (H.SO), फॉस्फोरिक अम्ल (H.PO), नाइट्रिक अम्ल (HNO.), नाइट्रस अम्ल (HNO,), आदि।

    हाइड्रा अम्ल (Hydra Acids)

    जिन अम्लों में केवल हाइड्रोजन उपस्थित रहता है, ‘हाइड्रा अम्ल’ कहलाता है। हाइड्रा अम्ल में ऑक्सीजन अनुपस्थित होता है, जैसे हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCI), हाइड्रोनोमिक अम्ल (HBr), हाइड्रोआयोडिक अम्ल (HI), हाइड्रोसायनिक अम्ल (HCN), आदि।

    अम्लों के उपयोगः

    1. सल्फ्यूरिक अम्ल का उपयोग: पेट्रोलियम के शोधन में, कई प्रकार के विस्फोट बनाने में, रंग व औषधिया बनाने में संचायक बैटरियों में, आदि।

    2. नाइट्रिक अम्ल का उपयोग: औषधियों के निर्माण में, उर्वरक बनाने में, फोटोग्राफी में, विस्फोटक पदार्थों के निर्माण में, अम्लराज बनाने में, प्रयोगशाला में अभिकर्मक के रूप में, आदि।

    3. हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का उपयोगः प्रयोगशाला में, अभिकर्मक के रूप में, अम्लराज बनाने में, रंग एवं औषधि निर्माण में, आदि।

    4. एसीटिक अम्ल का उपयोगः जीवाणुनाशक के रूप में, सिरका निर्माण में, एसीटोन बनाने में, खट्टे खाद्य पदार्थ बनाने में, आदि।

    5. फार्मिक अम्ल का उपयोग: जीवाणुनाशक के रूप में, फलों को संरक्षित करने में, रबर के स्कंदन में, चमड़ा उद्योग में, आदि।

    6. ऑक्जेलिक अम्ल का उपयोगः फोटोग्राफी में, कपड़ों की छपाई व रंगाई में, चमड़े के विरंजक के रूप में, कपड़े पर स्याही के धब्बे को हटाने में, आदि।

    7. बेंजोइक अम्ल का उपयोगः दवा व खाद्य पदार्थों के संरक्षण में, आदि।

    8. साइट्रिक अम्ल का उपयोग: धातुओं को साफ करने में, खाद्य पदार्थों व दवाओं के निर्माण में, कपडा उद्योग में, आदि।

    नोटः अम्ल का pH मान 7 से कम होता है

    बफर विलयन (Buffer Solution)

    वह विलयन जो कि अम्ल या क्षार की साधारण मात्राओं को अपनी प्रभावी अम्लता या क्षारता में पर्याप्त परिवर्तन किए बिना अवशोषित कर लेता है, ‘बफर विलयन’ कहलाता है, जैसे सोडियम ऐसीटेट तथा ऐसीटिक एसिड का मिश्रण एक प्रभावी बफर विलयन है, जब उसे पानी में विलीन किया जाता है। जिस विलयन में बफर विलयन अंतर्विष्ट होता है, वह अत्यधिक मंद अम्ल के रूप में कार्य करता है।

    कार्बनिक अम्लों के प्राकृतिक स्रोत
    अम्लप्राकृतिक स्रोत
    फार्मिक अम्ल लाल चीटियों में
    साइट्रिक अम्ल खट्टे फलों में
    बेन्जोइक अम्ल घास, पत्ते एवं मूत्र में
    ऑक्जेलिक अम्ल सारेल का वृक्ष
    एसोटिक अम्ल फलों के रसों में
    टारटेरिक अम्ल इमली में
    लैक्टिक अम्ल दूध में
    ग्लूटेमिक अम्ल गेहूँ में
  • ऑक्सीकारण – अवकरण क्या है ?

    ऑक्सीकारण – अवकरण क्या है ?

    What are Oxidation and Reduction ?

    ऑक्सीकारक

    जिस पदार्थ का ऑक्सीकरण होता है, वह अवकारक (Reducing agent) कहलाता है तथा जिस पदार्थ का अवकरण होता है, वह ‘ऑक्सीकारक’ (Oxidising agent) कहलाता है।

    ऑक्सीकारक वे पदार्थ होते हैं जो इलेक्ट्रॉन ग्रहण करते हैं तथा अवकारक वे पदार्थ होते हैं जो इलेक्ट्रॉन त्याग करते हैं।

    अपचयन (Reduction)

    अपचयन वह रासायनिक प्रक्रिया है जिसके फलस्वरूप किसी तत्व या यौगिक में विद्युत धनात्मक परमाणुओं या मूलकों का अनुपात बढ़ जाता है अथवा किसी यौगिक में विद्युत ऋणात्मक परमाणुओं या मूलकों का अनुपात कम हो जाता है।

    आयनिक सिद्धान्त के आधार पर ऑक्सीकरण एवं अवकरण की परिभाषा

    ऑक्सीकरण (Oxidation): ऑक्सीकरण वह प्रक्रिया है जिसके फलस्वरूप किसी आयन पर धन आवेश बढ़ जाता है या ऋण आवेश कम हो जाता है। उदाहरण: फेरस क्लोराइड (FeCI2) से फेरिक क्लोराइड (FeCI3) के बनने में फेरस आयन (Fe++) बदलकर फेरिक आयन (Fe+++) हो जाता है अर्थात् लोहे के आयन पर धन आवेश बढ़ जाता है।

    अपचयन (Reduction): अपचयन वह रासायनिक प्रक्रिया है जिसके फलस्वरूप किसी आयन पर धन आवेश घट जाता है या ऋण आवेश बढ़ जाता है।

    ऑक्सीकारक एवं अवकारक पदार्थ (Oxidising and Reducing Agent)

    ऑक्सीकारक’ (Oxidising agent)

    जिस पदार्थ का ऑक्सीकरण होता है, वह अवकारक (Reducing agent) कहलाता है तथा जिस पदार्थ का अवकरण होता है, वह ‘ऑक्सीकारक’ (Oxidising agent) कहलाता है।

    ऑक्सीकारक वे पदार्थ होते हैं जो इलेक्ट्रॉन ग्रहण करते हैं तथा अवकारक वे पदार्थ होते हैं जो इलेक्ट्रॉन त्याग करते हैं

    कुछ मुख्य ऑक्सीकारक पदार्थ निम्न हैं: ऑक्सीजन (O2), ओजोन (O3), हाइड्रोजन परऑक्साइड (H2O2), नाइट्रिक अम्ल (HNO3), क्लोरीन (CI2), पोटैशियम परमैंगनेट (KMnO4), पोटैशियम डाइक्रोमेट (K2Cr2O7), लेड ऑक्साइड (PbO2) आदि।

    कुछ मुख्य अवकारक पदार्थ के उदाहरण हैं: हाइड्रोजन (H2), हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S), कार्बन मोनोआक्साइड (CO), सल्फर डाइऑक्साइड (SO2), कार्बन (C), हाइड्रोजन अम्ल (HI), स्टैनस क्लोराइड (SnCI2) आदि।

    ऑक्सीकारक एवं अवकारक दोनों की तरह व्यवहार करने वाले पदार्थः हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S), हाइड्रोजन पर ऑक्साइड (H2O2), सल्फर डाइऑक्साइड (SO2), नाइट्रस अम्ल (HNO2), आदि।

    ऑक्सीकारक वह पदार्थ है जो किसी दूसरे पदार्थ की ऑक्सीकरण संख्या को बढ़ा देता है जबकि अवकारक वह पदार्थ है जो किसी दूसरे पदार्थ की ऑक्सीकरण संख्या को घटा देता है। जिस पदार्थ की ऑक्सीकरण संख्या बढ़ती है, वह अवकृत होता है अर्थात् वह ऑक्सीकारक (Oxidising agent) है

  • रासायनिक बंधन (Chemical Bonding) क्या है ?

    रासायनिक बंधन (Chemical Bonding) क्या है ?

    What is Chemical Bonding ?

    किसी अणु में उपस्थित अवयवी परमाणुओं को परस्पर बांधकर अणु को विशेष ज्यामितीय आकार में रखने वाले बल को रासायनिक बंधन कहते हैं।

    रासायनिक बंधन मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं

    1. विद्युत संयोजन बंधन या आयनिक बंधन (Electrovalent or lonic Bond)

    जब एक परमाणु से दूसरे परमाणु में इलेक्ट्रॉनों के स्थानान्तरण होने से उन दोनों परमाणुओं के बीच बंधन बनता है, तो उसे ‘विद्युत संयोजन बंधन’ कहते हैं

    इलेक्ट्रॉनों का स्थानांतरण इस प्रकार होता है, कि प्राप्त आयनों की बाह्यतम कक्षाओं की इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था अक्रिय गैसों की भांति स्थायी बन जाती है। उदाहरणार्थ, सोडियम क्लोराइड का बनना।

    सोडियम परमाणु (Na) अपनी बाह्यतम कक्षा के एक इलेक्ट्रॉन का त्याग कर अक्रिय गैस निऑन जैसी स्थायी इलेक्ट्रॉनिक संरचना प्राप्त करता है। क्लोरीन परमाणु (CI) एक इलेक्ट्रॉन प्राप्त कर अक्रिय गैस ऑर्गन जैसे स्थायी इलेक्ट्रॉनिक संरचना प्राप्त करता है। अब Na+ और CIआयनों पर विपरीत आवेशों की उपस्थिति के कारण ये दोनों आयन स्थिर विद्युत आकर्षण बल (Electrostatic force of attraction) द्वारा परस्पर जुड़कर सोडियम क्लोराइड (Na+, CI या NaCI) बनाते हैं।

    विद्युत संयोजन यौगिकों के गुण (Characters of Electrovalent Compounds)

    जिन रासायनिक यौगिक के अणु में विद्युत संयोजन बंधन या आयनिक बंधन रहता है। उन्हें विद्युत संयोजन या आयनिक यौगिक कहते है। जैसे—NaCI, MgCI2, CaO, आदि। विद्युत संयोजनकों में निम्नलिखित गुण पाये जाते हैं:

    (a) विद्युत संयोजन यौगिक या आयनिक यौगिक दो विपरीत आवेशयुक्त आयनों से निर्मित होते हैं, जैसे—Na+CL (b) वैद्यत् संयोजन या आयनिक यौगिकों में विपरीत आवेश वाले आयनों के बीच मजबूत अंतर आणविक विद्युत आकर्षण बल लगने के कारण ये उच्च घनत्व वाले ठोस होते हैं। ये कठोर और भंगुर होते हैं।

    (c) मजबूत अंतर आण्विक विद्युत आकर्षण बल से जुड़े आयनों को एक-दूसरे से पृथक करने में अत्यधिक ऊष्मीय ऊर्जा की आवश्यकता होती हैं इस कारण आयनिक यौगिकों के द्रवणांक और क्वथनांक उच्च होते हैं।

    (d) आयनिक प्रकृति वाले विद्युत संयोजन यौगिक प्रायः ध्रुवीय घोलकों (जल, द्रव, अमोनिया, आदि) में घुलनशील होते हैं, परन्तु कार्बनिक घोलकों (बेंजीन, ईथर, कार्बन टेट्राक्लोराइड, आदि) जो अध्रुवीय होते हैं, में अघुलनशील होते हैं। उदाहरण के लिए, सोडियम क्लोराइड, पोटैशियम आयोडाइड, आदि जल में घुलनशील होते हैं, परन्तु ये बेंजीन, किरोसीन तेल, पेट्रोल, आदि में अघुलनशील होते हैं।

    (e) ठोस अवस्था में आयनिक यौगिकी के अवयवी आयनों के बीच मजबूत आकर्षण बल कार्यरत रहने के कारण इनके आयन एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर गमन नहीं कर सकते हैं। इस कारण ठोस अवस्था में ये यौगिक विद्युत के कुचालक होते हैं।

    (f) आयनिक यौगिकों के अवयवी आयन गलित अवस्था में या जलीय विलयन में आयनीकृत होकर एक-दूसरे के आकर्षण बल में मुक्त हो जाते हैं। इस कारण गलित अवस्था में या जलीय विलयन में ये यौगिक विद्युत के सुचालक होते हैं तथा विद्युत अपघटन होता है।

    (g) विद्युत संयोजन यौगिकी की अभिक्रियाएँ आयनिक प्रकृति की और प्रायः तीव्र गति वाली होती हैं।

    2. सहसंयोजन बंधन (Covalent Bond)

    जब दो परमाणुओं के बीच इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी के फलस्वरूप रासायनिक बंधन बनता है, तब उसे सहसंयोजक बंधन कहते हैं। सहसंयोजन बंधन के बनने में दोनों परमाणु इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी इस प्रकार से करते हैं, कि निर्मित अणु में प्रत्येक परमाणु एक अक्रिय गैस का स्थायी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास प्राप्त कर लेता है।

    दो परमाणुओं के बीच इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी के फलस्वरूप बने रासायनिक यौगिक को ‘सहसंयोजक यौगिक’ कहते हैं। सहसंयोजक यौगिक के निम्नलिखित गुण होते हैं:

    1. अधिकांश सहसंयोजक यौगिक साधारण अवस्था में गैस या द्रव या वाष्पशील ठोस होते हैं।

    2. सहसंयोजक यौगिकों के द्रवणांक और क्वथनांक निम्न होते हैं, इसका कारण यह है, कि इनमें अंतराण्विक बल विद्युत आकर्षण बल की अपेक्षा बहुत कमजोर होते हैं।

    3. सहसंयोजक यैगिक जल में प्राय: अविलेय, परन्तु कार्बनिक विलायकों में विलेय होते हैं।

    4. सहसंयोजक यौगिक द्रवित अवस्था या विलयन की अवस्था में विद्युत के कुचालक होते हैं क्योंकि इन अवस्थाओं में ये आयन उत्पन्न नहीं करते हैं। किन्तु HCI और NH, के जलीय विलयन विद्युत के सुचालक होते हैं, क्योंकि इन विलयनों में आयन उपस्थित होते हैं।

    5. सहसंयोजन यौगिकों के साथ अभिक्रियाएँ प्रायः धीरे-धीरे होती है।

    6. सहसंयोजक यौगिक अणुओं के रूप में रहते हैं।

    इलेक्ट्रॉन की निर्जन जोड़ी

    इलेक्ट्रॉनों का ऐसा जोड़ा जो सहसंयोजन बंधन के बनने में भाग नहीं लेता है। इलेक्ट्रॉन की निर्जन जोड़ी कहलाता है। उदाहरण के लिए, जल (H2O) के बनने में ऑक्सीजन परमाणु के पास दो जोड़े इलेक्ट्रॉन शेष रह जाते हैं, जिनका साझा किसी भी परमाणु के साथ नहीं होता है। इसी प्रकार अमोनिया (NH3) में नाइट्रोजन परमाणु के पास एक जोड़ा इलेक्ट्रॉन शेष रह जाता है।

  • संयोजकता (Valency) क्या है ?

    संयोजकता (Valency) क्या है ?

    What is Valency ?

    तत्वों के परमाणुओं के परस्पर संयोजन करने की क्षमता को ही ‘संयोजकत्ता’ कहते है

    किसी तत्व की संयोजकता उसके परमाणु की बाह्यतम कक्षा में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए, सोडियम परमाणु एक इलेक्ट्रॉन का त्यागकर अक्रिय गैस निऑन जैसी इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था प्राप्त करता है।

    अत: सोडियम (Na) की संयोजकता 1 होती है। इसी प्रकार क्लोरीन परमाणु एक इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर अक्रिय गैस ऑर्गन जैसी इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था प्राप्त करता है। अत: क्लोरीन की संयोजकता 1 होती है।

    विद्युत संयोजन बंधन या आयनिक बंधन (Electrovalent or lonic Bond)

    जब एक परमाणु से दूसरे परमाणु में इलेक्ट्रॉनों के स्थानान्तरण होने से उन दोनों परमाणुओं के बीच बंधन बनता है, तो उसे ‘विद्युत संयोजन बंधन’ कहते हैं। इलेक्ट्रॉनों का स्थानांतरण इस प्रकार होता है, कि प्राप्त आयनों की बाह्यतम कक्षाओं की इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था अक्रिय गैसों की भांति स्थायी बन जाती है। उदाहरणार्थ, सोडियम क्लोराइड का बनना।

    विद्युत संयोजन (Electrovalent Compounds)

    जिन रासायनिक यौगिक के अणु में विद्युत संयोजन बंधन या आयनिक बंधन रहता है। उन्हें विद्युत संयोजन या आयनिक यौगिक कहते है। जैसे—NaCI, MgCI, CaO, आदि।

    सहसंयोजन बंधन (Covalent Bond)

    जब दो परमाणुओं के बीच इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी के फलस्वरूप रासायनिक बंधन बनता है, तब उसे सहसंयोजक बंधन कहते हैं। सहसंयोजन बंधन के बनने में दोनों परमाणु इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी इस प्रकार से करते हैं, कि निर्मित अणु में प्रत्येक परमाणु एक अक्रिय गैस का स्थायी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास प्राप्त कर लेता है।

    सहसंयोजक यौगिक

    दो परमाणुओं के बीच इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी के फलस्वरूप बने रासायनिक यौगिक को ‘सहसंयोजक यौगिक’ कहते हैं। सहसंयोजक यौगिक साधारण अवस्था में गैस या द्रव या वाष्पशील ठोस होते हैं।

  • आयन (Ions) क्या है ?

    आयन (Ions) क्या है ?

    What is Ions ?

    विद्युत आवेशयुक्त परमाणु या परमाणुओं के समूह को आयन कहा जाता है

    उदाहरण के लिए, सोडियम आयन (Na+), मैग्नीशियम आयन (Mg++), क्लोराइड आयन (CT), सल्फेट आयन (SO4), तथा कार्बोनेट आयन (CO3), आदि।

    आयन दो प्रकार के होते हैं

    धनायन (Cation)

    जिस आयन पर धन आवेश (Positive charge) होता है, उसे ‘धनायन’ कहते हैं।

    उदाहरण के लिए, सोडियम आयन (Na+) और मैग्नीशियम आयन (Mg++) धनायन हैं। धन आयन का निर्माण परमाणु से एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों के निकल जाने से होता है।

    सभी धातु तत्वों के आयन धनायन होते हैं। सिर्फ हाइड्रोजन (H+) और अमोनियम आयन (NH4+) अधातु तत्वों के बने होते हैं।

    ऋणायन (Anion)

    जिस आयन पर ऋण आवेश होता है, उसे ऋणायन कहते हैं।

    उदाहरण के लिए, क्लोराइड आयन (CI), ऑक्साइड आयन (O), सल्फेट आयन (SO4), कार्बोनेट आयन (CO3), आदि ऋणायन हैं। ऋणायनों का निर्माण किसी परमाणु द्वारा एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों के ग्रहण करने के कारण होता है।

    सभी अधातुओं के आयन ऋणायन (Anion) होते हैं।

    सामान्यतः धातु तत्वों के परमाणुओं में एक या एक से अधिक इलेक्ट्रॉन त्यागकर धनायन में बदल जाने की प्रवृत्ति के कारण ये विद्युत धनात्मक तत्व कहलाते हैं। इसके विपरीत अधातु तत्वों के परमाणुओं में एक या एक से अधिक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके ऋणायन में बदल जाने की प्रवृत्ति के कारण ये ‘विद्युत ऋणात्मक तत्व’ कहलाते है l

  • अक्रिय गैसों का इलेक्ट्रिॉनिक विन्यास

    अक्रिय गैसों का इलेक्ट्रिॉनिक विन्यास

    Electronic Configurations of Inert Gases

    प्रकृति में पाये जाने वाले अक्रिय गैसों की संख्या 6 है। ये गैसें है—हीलियम (He), निऑन (Ne), ऑर्गन (Ar), क्रिप्टॉन (Kr), जेनॉन (Xe) तथा रेडॉन (Rn)।

    हीलियम (He) को छोड़कर सभी अक्रिय गैसों के परमाणुओं की बाह्यतम कक्षा में 8 इलेक्ट्रॉन होते हैं। परमाणु की बाह्यतम कक्षा में 8 इलेक्ट्रॉनों का समूह सर्वाधिक स्थायी होता है। 8 इलेक्ट्रॉनों के समूह को ‘अष्टक’ (Octet) कहते हैं।

    अक्रिय गैसों को छोड़कर अन्य जितने भी तत्व हैं, उनके परमाणु की बाह्यतम कक्षा अस्थायी होती है, क्योंकि उनमें 8 से कम इलेक्ट्रॉन होते हैं। वे अपनी बाहयतम कक्षा में अपने निकटतम अक्रिय गैस की भांति इलेक्ट्रॉन प्राप्त कर लेने की प्रवृत्ति रखते हैं, ताकि वे स्थायी बन जाये। इसी कारण तत्वों के बीच रासायनिक संयोग होता है।

    रासायनिक बंधन (Chemical Bonding)

    किसी अणु में उपस्थित अवयवी परमाणुओं को परस्पर बांधकर अणु को विशेष ज्यामितीय आकार में रखने वाले बल को रासायनिक बंधन कहते हैं।

    अष्टक पूर्ण करने की प्रक्रिया (Process of Completion of the Octet)

    कोई भी परमाणु अक्रिय गैसों की इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था तीन प्रकार से प्राप्त करता है:

    1. किसी दूसरे परमाणु को अपना एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों का त्याग करके

    2. किसी दूसरे परमाणु से एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों को प्राप्त करके

    3. किसी दूसरे परमाणु के साथ एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों का साझा करके

  • परमाणु रिएक्टर (Atomic Reactor) क्या है ?

    परमाणु रिएक्टर (Atomic Reactor) क्या है ?

    What is Atomic Reactor ?

    वह संयंत्र जिसमें नाभिकीय ऊर्जा को ऊष्मा में परिवर्तित कर विद्युत ऊर्जा प्राप्त की जाती है, ‘परमाणु रिएक्टर या नाभिकीय रिएक्टर’ (Nuclear reactor) कहलाता है, इसमें होने वाली विखंडन श्रृंखला अभिक्रिया नियंत्रित (Controlled) रहती है।

    परमाणु रिएक्टर के मुख्य भाग निम्नलिखित हैं:

    1. कोर (Core)

    2. मंदक (Moderator)

    3. शीतलक (Coolant) तथा

    4. परिरक्षण (Shielding)

    नाभिकीय रिएक्टरों में मंदक के रूप में भारी जल (D2O) तथा ग्रेफाइट का प्रयोग किया जाता है, जबकि शीतलक के रूप में सोडियम और पोटैशियम के द्रवित मिश्रधातु का उपयोग होता है। जब ग्रेफाइट का उपयोग मंदक के रूप में होता है, तब रिएक्टर को परमाणु पाइल (Atomic pile) कहते हैं, किन्तु भारी जल का मंदक के रूप में उपयोग होने पर वह स्वीमिंग पुल रिएक्टर (Swimming pool reactor) कहलाता है।

    नाभिकीय रिएक्टर में यूरेनियम या प्लूटोनियम का उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है, जबकि कैडमियम छड़ का उपयोग नियंत्रक छड़ के रूप में होता है। विश्व का सबसे पहला नाभिकीय रिएक्टर इटली के वैज्ञानिक प्रोफेसर एनरिको फर्मी (Enrico fermi) के निर्देशन में शिकागो विश्वविद्यालय में बनाया गया था

    नाभिकीय रिएक्टर के उपयोग

    1. नाभिकीय रिएक्टर से प्राप्त नाभिकीय ऊर्जा की विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करके विद्युत उत्पादन के लिए विद्युत गृह बनाये जाते हैं।

    2. नाभिकीय रिएक्टर में अनेक प्रकार के रेडियो समस्थानिक उत्पन्न होते हैं, जिनका उपयोग चिकित्सा-विज्ञान, कृषि, रोगों के उपचार, उद्योग-धन्धों, आदि में किये जाते हैं।

  • नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Energy) क्या है ?

    नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Energy) क्या है ?

    What is Nuclear Energy ?

    किसी रेडियोसक्रिय तत्व के नाभिक में होने वाले परिवर्तनों के दौरान नाभिक के द्रव्यमान में होने वाली क्षति का ऊर्जा में परिवर्तन के परिणामस्वरूप प्राप्त ऊर्जा की नाभिकीय ऊर्जा कहलाती है।

    यूरेनियम, रेडियम तथा थोरियम, आदि तत्वों के नाभिकों में कूल कणों (प्रोटॉनों तथा न्यूट्रॉनों) की विशेष अवस्था के कारण जो स्थितिज ऊर्जा निहित होती है वही ‘नाभिकीय ऊर्जा‘ कहते हैं। नाभिकीय ऊर्जा, एक परमाणु के नाभिक (nucleus) या कोर (core) में पाई जाने वाली ऊर्जा है

    नाभिकीय ऊर्जा के दो स्रोत हैं:

    नाभिकीय विखण्डन Nuclear Fission)

    वह नाभिकीय अभिक्रिया जिसके फलस्वरूप एक भारी नाभिक विखंडित होकर दो हल्के नाभिकों में परिवर्तित हो जाता है तथा ऊर्जा की एक विशाल राशि विमुक्त होती है, ‘नाभिकीय विखण्डन’ कहलाती है

    1. 1939 ई. में जर्मन वैज्ञानिक ऑटो हान (Otto Hahn) और स्ट्रासामान (Strassman) ने बताया कि (92U235) के नाभिक पर मंद वेग वाले न्यूट्रॉन से प्रहार करने पर यूरेनियम का नाभिक टूटकर 56BA141 तथा 36Kr92 में बदल जाता है। इस प्रक्रिया में तीन अन्य न्यूट्रॉन भी उत्पन्न होते हैं तथा ऊर्जा की एक विशाल राशि विमुक्त होती है।

    2. नाभिकीय विखंडन प्रक्रिया में नाभिक के द्रव्यमान में कुछ क्षति होती है। द्रव्यमान की यह क्षति आइन्सटीन के समीकरण E=mc2 (E= ऊर्जा, m द्रव्यमान से क्षति, C = प्रकाश का वेग) के अनुसार, ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है।

    3. नाभिकीय विखंडन की प्रक्रिया में उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों में से कुछ न्यूट्रॉन अन्य यूरेनियम नाभिकों पर प्रहार करते हैं जिसके परिणामस्वरूप प्रारम्भिक प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। इस प्रकार एक श्रृंखला प्रक्रिया (Chain process) प्रारंभ हो जाती है और ऊर्जा की अपार राशि विमुक्त होती है। परमाणु बम (Atom bomb) के विस्फोट में यही श्रृंखला प्रक्रिया तेजी से होती है। इस प्रक्रिया को नाभिकीय रिएक्टरों (Nuclear reactor) में नियंत्रित ढंग से सम्पन्न कराकर प्राप्त ऊर्जा का उपयोग शांतिपूर्ण एवं रचनात्मक कार्यों में किया जाता है।

    नाभिकीय संयोजन (Nuclear Fusion)

    वह नाभिकीय अभिक्रिया जिसके फलस्वरूप दो हल्के नाभिक परस्पर संयुक्त होकर एक भारी और स्थायी नाभिक का निर्माण करते हैं, ‘नाभिकीय संयोजन’ कहलाती है

    नाभिकीय संयोजन प्रक्रिया में द्रव्यमान की सदैव क्षति होती है जो आइन्सटीन समीकरण E = mc2 के अनुसार, ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है। यही कारण है, कि इस प्रक्रिया में अपार ऊर्जा विमुक्त होती है,

    साथ ही इस प्रक्रिया के प्रारंभ हो जाने पर इसमें विमुक्त ऊर्जा इस प्रक्रिया को जारी रखने के लिए पर्याप्त होती है। चूंकि नाभिकीय संयोजन की प्रक्रिया अति उच्च ताप (लगभग 10 लाख) डिग्री सेल्सियस पर होती है, इस कारण इसे ‘ऊष्मा नाभिकीय अभिक्रिया’ (Thermo nuclear reaction) कहा जाता है। हाइड्रोजन बम (Hydrogen bomb) जिसकी संहारक क्षमता परमाणु बम से कई गुना ज्यादा होती है, के निर्माण में नाभिकीय संयोजन का सिद्धांत निहित है।

    उदाहरण: 1H2+1H3+2He4 +0n1+ ऊर्जा

    यह अभिक्रिया लगभग 10.6 सेकण्ड में समाप्त हो जाती है। इस क्रिया में उत्पन्न न्यूट्रॉन पुन: प्लूटोनियम या यूरेनियम पर प्रहार कर उसे विखंडित करते हैं। इसी कारण हाइड्रोजन बम की संहारक क्षमता परमाणु बम की तुलना में कई गुना अधिक होती है

    परमाणु बम, हाइड्रोजन बम, सूर्य तथा अन्य तारों में नाभिकीय ऊर्जा का रूपान्तर प्रकाश व ऊष्मा के रूप में होता है।

    नाभिकीय ऊर्जा की उपयोगिताएँ

    1. नाभिकीय रिएक्टरों में यूरेनियम (92U235) के परमाणुओं को मंद न्यूट्रॉनों द्वारा विखंडन के परिणामस्वरूप मुक्त ऊष्मा ऊर्जा की विपुल राशि से जल को भाप में बदलकर टरबाइन (Turbines) चलाये जाते हैं, जिससे विद्युत ऊर्जा उत्पन्न होती है।

    2. नाभिकीय ऊर्जा का उपयोग वायुयान, जहाज, पनडुब्बी, आदि चलाने में किया जाता है।

    3. रॉकेट उड़ाने में भी नाभिकीय ऊर्जा का उपयोग किया जा रहा है।

    4. सूर्य एवं अन्य तारों से प्राप्त ऊष्मा एवं प्रकाश ऊर्जा का स्रोत नाभिकीय संयोजन अभिक्रियाएँ हैं जो वहां लगातार चलती रहती हैं।

  • रेडियोसक्रिय समस्थानिकों की उपयोगिता क्या है ?

    रेडियोसक्रिय समस्थानिकों की उपयोगिता क्या है ?

    Applications of Radio Isotopes ?

    रेडियोसक्रिय समस्थानिक जिसे रेडियोआइसोटोप (Radio Isotopes), रेडियोन्यूक्लाइड (radionuclide), या रेडियोधर्मी न्यूक्लाइड (radioactive nuclide) भी कहा जाता है, एक ही रासायनिक तत्व की कई प्रजातिया होती है जो विभिन्न द्रव्यमानों के साथ, जिनके नाभिक अस्थिर होते हैं और अल्फा, बीटा और गामा किरणों के रूप में विकिरण उत्सर्जित करके अतिरिक्त ऊर्जा को समाप्त कर देते हैं।

    किसी परमाणु के नाभिक में से एक α कण तथा दो β कणों के निकल जाने से प्राप्त होने वाले परमाणु की परमाणु संख्या वही रहती है जो मूल परमाणु की है, लेकिन इसका परमाणु द्रव्यमान मूल परमाणु के द्रव्यमान से 4 इकाई कम हो जाता है अर्थात् मूल परमाणु और नए परमाणु दोनों एक दूसरे के समस्थानिक (Isotopes) होते हैं।

    रेडियोसक्रियता की इकाई (Unit of Radioactivity)

    रेडियोसक्रियता की इकाई को ‘क्यूरी’ (Curie) कहते हैं। किसी रेडियोसक्रिय पदार्थ का वह परिमाण जिसमें प्रति सेकण्ड 3.70 x 1010 विखंडन होते हैं, क्यूरी कहलाता है।

    रेडियो आइसोटोप डेटिंग (Radio Isotope Dating)

    किसी रेडियोसक्रिय समस्थानिक की मात्रा की किसी पत्थर के नमूने, काष्ठ या जैव अवशेष में मापन करके उनके आयु का निर्धारण करना ‘रेडियो आइसोटोप डेटिंग’ (Radio isotope dating) कहलाता है। कार्बन डेटिंग (Carbon dating) रेडियो आइसोटोप डेटिंग का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।

    कार्बन डेटिंग के द्वारा जीवाश्मों, मृत पेड़-पौधों, आदि की आयु का अंकन किया जाता है। निर्जीव वस्तुओं, जैसे—पृथ्वी, पुरानी चट्टानों, आदि की आयु ज्ञात करने के लिए यूरेनियम का प्रयोग किया जाता है। इस यूरेनियम द्वारा आयु अंकन (Dating by uranium) कहते हैं। अधिक पुरानी चट्टानों के लिए पोटैशियम ऑर्गन डेटिंग विधि भी अधिक उपयुक्त सिद्ध हुई है। मृत पेड़-पौधों और जानवरों का आयु निर्धारण उनमें 6C14 और 6C12 का अनुपात ज्ञात करके किया जाता है।

    रेडियोसक्रिय समस्थानिकों की उपयोगिता (Applications of Radio Isotopes)

    1. रेडियोसक्रिय समस्थानिकों का उपयोग मृत पेड़-पौधों, जानवरों तथा पत्थर के पुराने नमूने की आयु ज्ञात करने में किया जाता है। इस विधि को रेडियो आइसोटोप डेटिंग कहते हैं।

    2. रेडियो समस्थानिकों का उपयोग औषधियों में ट्रेसर (Tracer) के रूप में किया जाता है। इस विधि द्वारा मानव शरीर में किसी प्रकार के ट्यूमर का पता लगाया जाता है।

    3. जमीन के अंदर बिछाई गई जल पाइप नालियों, गैस पाइप नालियों तथा तेल पाइप नालियों में किसी प्रकार के छेद या रिसाव का पता लगाने के लिए रेडियोसक्रिय समस्थानिकों का उपयोग होता है।

    4. रेडियोसक्रिय समस्थानिकों का उपयोग पौधों में उर्वरकों की क्रिया जानने में किया जाता है।

    5. रासायनिक अभिक्रियाओं की क्रियाविधि निर्धारण में रेडियोसक्रिय समस्थानिकों का उपयोग किया जाता है l

    6. कैंसर जैसे अनेक रोगों से ग्रस्त कोशिकाओं (Cells) को नष्ट करने में रेडियोसक्रिय समस्थानिकों का उपयोग किया जाता है। उदाहरणार्थ, कोबाल्ट के समस्थानिक Co60 का उपयोग कैंसर के इलाज में तथा मस्तिष्क में विकसित होने वाली ट्यूमर (Tumor) को नष्ट करने में किया जाता है।

    7. रेडियोसक्रिय समस्थानिकों का उपयोग पाचन तंत्र का अध्ययन करने में भी किया जाता है।

    8. रेडियोसक्रिय आयोडीन का उपयोग थायरॉइड ग्रंथि में उत्पन्न विकार ज्ञात करने में किया जाता है।

    9. रेडियोसक्रिय फॉस्फोरस का उपयोग अस्थि रोगों के इलाज में होता है।

    10. रेडियोसक्रिय सोडियम के द्वारा शरीर में रक्त प्रवाह का वेग मापा जाता है।

    11. रेडियोसक्रिय लोहा का उपयोग एनीमिया (अरक्तता) रोग ज्ञात करने में होता है।

    12. रेडियोसक्रिय यूरेनियम (U28) का उपयोग पृथ्वी का आयु निर्धारण में किया जाता है।

    13. कम क्रियाशील रेडियोसक्रिय किरणों का उपयोग अनाज, फल, सब्जियों, आदि के रोगाणुनाशन (Disinfection) में किया जाता है।

  • रेडियोसक्रिय विखंडन क्या है ?

    रेडियोसक्रिय विखंडन क्या है ?

    What is Radioactive Disintegration ?

    रेडियोसक्रिय तत्वों के नाभिक से रेडियोसक्रिय तत्वों के स्वत: उत्सर्जन की प्रक्रिया को रेडियोसक्रिय विखंडन या रेडियोसक्रिय क्षय (Radioactive decay) कहा जाता है

    चूंकि यह क्रिया स्वाभाविक रूप से स्वत: होती है, अत: इसे प्राकृतिक विखण्डन (Natural disintegration) भी कहते हैं। इस क्रिया में α-, β– और γ– किरणों का उत्सर्जन होता है।

    1913 ई. में सॉडी (Soddy), फॉजान्स (Fajans) तथा रदरफोर्ड (Rutherford) ने रेडियोसक्रिय विखंडन से सम्बन्धित सिद्धांत का प्रतिपादन किया। इसके अनुसार,

    1. रेडियोसक्रिय तत्वों के परमाणु अस्थायी होते हैं जो स्वत: विखडित होकर नये तत्वों में परिवर्तित होते रहते है l

    2. α-कण और β-कण रेडियोसक्रिय तत्व के परमाणु के नाभिक से उत्पन्न होते हैं।

    3. रेडियोसक्रिय परिवर्तन दो प्रकार के होते हैं:

    i.   α परिवर्तनः α कण के निकलने से होने वाले परिवर्तन को ‘α परिवर्तन’ कहते हैं।

    ii.  β परिवर्तनः । कण के निकलने से होने वाले परिवर्तन को ‘β परिवर्तन’ कहते हैं।

    किसी परमाणु नाभिक में एक कण के निकल जाने से प्राप्त होने वाले परमाणु का द्रव्यमान मूल परमाणु के द्रव्यमान से 4 कम हो जाता है और परमाणु संख्या 2 कम हो जाती है।

    किसी परमाणु के नाभिक में से एक α कण तथा दो β कणों के निकल जाने से प्राप्त होने वाले परमाणु की परमाणु संख्या वही रहती है जो मूल परमाणु की है, लेकिन इसका परमाणु द्रव्यमान मूल परमाणु के द्रव्यमान से 4 इकाई कम हो जाता है अर्थात् मूल परमाणु और नए परमाणु दोनों एक दूसरे के समस्थानिक (Isotopes) होते हैं।

    अर्द्धआयु काल (Half Life Period)

    वह समयांतराल जिसमें किसी रेडियोसक्रिय तत्व में उपस्थित परमाणु की संख्या विखंडित होकर प्रारंभिक संख्या की आधी हो जाती है, उस तत्व की अर्द्धआयु काल कहलाता है

    रेडियोसक्रिय पदार्थ की अर्द्धआयु कुछ सेकण्डों से लेकर लाखों वर्षों तक हो सकती है। उदाहरण के लिए, पोलोनियम के एक समस्थानिक (84Po214) की अर्द्धआयु 10.4 सेकण्ड होती है जबकि यूरेनियम के समस्थानिक की अर्द्धआयु 4.5×109 वर्ष होती है।