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  • कार्बन क्रेडिट क्या होता है?

    कार्बन क्रेडिट क्या होता है?

    कार्बन क्रेडिट की संकल्पना क्योटो प्रोटोकॉल से उद्भूत हुई, संयुक्त राष्ट्र की पहल पर ग्लोबल वार्मिंग की चुनौती से निबटने हेतु 1992 में यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेन्शन ऑन क्लाइमेट चेंज अस्तित्व में आया !

    इसने जलवायु परिवर्तन के खतरों से निबटने हेतु एक अंतरराष्ट्रीय समझौते का मसौदा तैयार करने के लिए बातचीत शुरू की फतेह जापान के क्योटो शहर में 11 दिसंबर 1997 को हुए UNFCC के तीसरे सम्मेलन में क्योटो प्रोटोकॉल को स्वीकार किया गया

    क्या है कार्बन क्रेडिट

    कार्बन क्रेडिट एक तरह का सर्टिफिकेट है जो कार्बन उत्सर्जन करने का सर्टिफिकेट देता है. ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन घटाने के लिए इसे तैयार किया गया है. आप जितना कार्बन उत्सर्जन करेंगे, उतना ही ज्यादा आपको ऐसे प्रोजेक्ट में खर्च करने होंगे जो उत्सर्जन को घटाएं.

    समाधान

    इसका समाधान क्या है? क्या सभी उद्योग बंद कर देने चाहिए? ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि दुनिया को चलाना जरूरी है और यह उद्योगों के बिना मुमकिन नहीं है. इसका एक हल यह हो सकता है कि अक्षय ऊर्जा के स्रोतों से उद्योगों को चलाया जाए. इसमें सोलर या विंड एनर्जी का सहारा लिया जा सकता है जिससे कि कोई कार्बन उत्सर्जन नहीं होता है. हालांकि पूरी दुनिया को अक्षय ऊर्जा स्रोत से अभी चलाना मुश्किल है क्योंकि इसमें कई वर्षों का वक्त लगेगा. ऐसे में अभी क्या किया जा सकता है?

    कार्बन क्रेडिट पर विवाद

    1997 में क्योटो प्रोटोकॉल में दुनिया भर के सभी देशों ने कार्बन उत्सर्जन घटाने पर सहमति जताई थी. उसी के हिसाब से कार्बन क्रेडिट की रूपरेखा तैयार की गई थी. इसके तहत एक सीमा तय की गई कि कंपनियां एक साल में कितना कार्बन उत्सर्जन कर सकती हैं. यूरोपीय संघ के देशों ने अपने कार्बन उत्सर्जन में बड़े स्तर पर कटौती करने का फैसला किया. इसके लिए कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य तय किया गया.

    इसी हिसाब से उद्योगों को कार्बन के लक्ष्य दिए गए. इसमें एक दिक्कत ये आई कि दुनिया के कुछ हिस्से में देशों ने कार्बन उत्सर्जन में कटौती की जबकि कुछ देशों में उत्सर्जन जारी है. इससे उत्सर्जन में कटौती करने वाले देशों की लागत में बढ़ोतरी आई है. इसे देखते हुए कार्बन क्रेडिट पर कई लोग सवाल भी उठाते हैं. एक बात जरूर है कि कार्बन क्रेडिट के नाम पर कई परियोजनाओं में निवेश किया गया जिससे हमारे पर्यावरण को स्वस्छ बनाने में मदद मिली है.

  • केसर बनाने के लिए पौधे का कौन सा हिस्सा उपयोग में लाया जाता है ?

    केसर बनाने के लिए पौधे का कौन सा हिस्सा उपयोग में लाया जाता है ?

    ये सवाल अक्सर ही प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछा जाता है और विकल्प कुछ इस तरह होते हैं –

    • पत्ता
    • पंखुड़ी
    • बाह्यफल
    • वर्तिकाग्र (स्टिग्मा)

    उत्तर – केसर मसाला बनाने के लिए पौधे का वर्तिकाग्र प्रयोग में लाया जाता है

    केसर का वानस्पतिक नाम क्रोकस सैटाइवस (Crocus sativus) है। अंग्रेज़ी में इसे सैफरन (saffron) नाम से जाना जाता है। यह इरिडेसी (Iridaceae) कुल का क्षुद्र वनस्पति है जिसका मूल स्थान दक्षिण यूरोप है। ‘आइरिस’ परिवार का यह सदस्य लगभग 80 प्रजातियों में विश्व के विभिन्न भू-भागों में पाया जाता है।

    विश्व में केसर उगाने वाले प्रमुख देश हैं – फ्रांस, स्पेन, भारत, ईरान, इटली, ग्रीस, जर्मनी, जापान, रूस, आस्ट्रिया, तुर्किस्तान, चीन, पाकिस्तान के क्वेटा एवं स्विटज़रलैंड।

    आज सबसे अधिक केसर उगाने का श्रेय स्पेन को जाता है, इसके बाद ईरान को। कुल उत्पादन का 80% इन दोनों देशों में उगाया जा रहा है, जो लगभग 300 टन प्रतिवर्ष है।

  • Night Vision (रात्रि दृष्टि) उपकरणों में कौन सी किरणों का प्रयोग किया जाता है ?

    Night Vision (रात्रि दृष्टि) उपकरणों में कौन सी किरणों का प्रयोग किया जाता है ?

    नाइट विजन उपकरणों में अवरक्त तरंगों का प्रयोग किया जाता है अवरक्त तरंगों की खोज विलियम हरशैल ने की थी

    अवरक्त किरणें, अधोरक्त किरणें या इन्फ़्रारेड वह विद्युत चुम्बकीय विकिरण है जिसका तरंग दैर्घ्य (वेवलेन्थ) प्रत्यक्ष प्रकाश से बड़ा हो एवं सूक्ष्म तरंग से कम हो।

    इसका नाम ‘अधोरक्त’ इसलिए है क्योंकि विद्युत चुम्बकीय तरंग के वर्णक्रम (स्पेक्ट्रम) में यह मानव द्वारा दर्शन योग्य लाल वर्ण से नीचे (या अध:) होती है।

    इसका तरंग दैर्घ्य 750 nm and 1 mm के बीच होता है। सामान्य शारिरिक तापमान पर मानव शरीर 10 माइक्रॉन की अधोरक्त तरंग प्रकाशित कर सकती है !

    यह तरंगे पदार्थों को उच्च ताप पर गर्म करने पर निकलती हैं इनका उपयोग अस्पतालों में रोगियों की सिकाई करने में एवं कोहरे में फोटोग्राफी करने में भी किया जाता है !

  • शुष्क सेल (Dry Cell) बनाने में क्या प्रयोग किया जाता है ?

    शुष्क सेल (Dry Cell) बनाने में क्या प्रयोग किया जाता है ?

    शुष्क सेल में अमोनियम क्लोराइड तथा जिंक क्लोराइड का प्रयोग विद्युत अपघटन के रूप में किया जाता है |

    ड्राई-सेल बैटरी एक या एक से अधिक इलेक्ट्रोकेमिकल कोशिकाओं से बना एक उपकरण है जो संग्रहीत रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करती है।

    इसमें एक इलेक्ट्रोलाइट होता है जो पेस्ट या अन्य नम माध्यम में निहित होता है।एक मानक शुष्क सेल बैटरी में एक केंद्रीय छड़ के भीतर एक जस्ता एनोड और एक कार्बन कैथोड शामिल होता है।

    कैडमियम, कार्बन, लेड, निकल और जिंक का उपयोग विभिन्न शुष्क सेल डिजाइन और क्षमताओं के निर्माण के लिए किया जाता है, कुछ मॉडल दूसरों की तुलना में कुछ उपकरणों के लिए अधिक उपयुक्त होते हैं।

    वेट-सेल बैटरियों के विपरीत, सूखी बैटरी फैलती नहीं है, जो उन्हें पोर्टेबल उपकरणों के लिए आदर्श बनाती है।

  • पाचन क्या है ? सरल भाषा में

    पाचन क्या है ? सरल भाषा में

    जटिल अणुओं का उनके सरल अणुओं में परिवर्तन पाचन कहलाता है | प्रोटीनों (जटिल अणुओं) का एमीनो अम्लों (सरल अणुओं) में विघटन – इसी प्रकार ग्लुकोज़ CO2 और H2O में विघटन – श्वसन प्रक्रिया ग्लूकोस का ग्लाइकोजन में रूपांतरण संश्लेषणात्मक प्रक्रिया है !

    पाचन वह क्रिया है जिसमें भोजन को यांत्रि‍कीय और रासायनिक रूप से छोटे छोटे घटकों में विभाजित कर दिया जाता है ताकि उन्हें रक्तधारा में अवशोषित किया जा सके. पाचन एक प्रकार की अपचय क्रिया है: जिसमें आहार के बड़े अणुओं को छोटे-छोटे अणुओं में बदल दिया जाता है।

    स्तनपायी प्राणियों द्वारा भोजन को मुंह में लेकर उसे दांतों से चबाने के दौरान लार ग्रंथियों से निकलने वाले लार में मौजूद रसायनों के साथ रासायनिक प्रक्रिया होने लगती है।

    यह भोजन फिर ग्रासनली से होता हुआ उदर में जाता है, जहां हाइड्रोक्लोरिक अम्ल सर्वाधिक दूषित करने वाले सूक्ष्माणुओं को मारकर भोजन के कुछ हिस्से का यांत्रि‍क विभाजन (जैसे, प्रोटीन का विकृतिकरण) और कुछ हिस्से का रासायनिक परिवर्तन आरंभ करता है।

    भोजन को पक्वाशय में पहुंचते ही सर्वप्रथम इसमें यकृत से निकलने वाला पित्त रस आकर मिलता है पित्त रस छारीय होता है और यह भोजन को अम्लीय से छारीय बना देता है यहां अग्नाशय से अग्नाशय रस आकर भोजन मिलता है इसमें तीन प्रकार के एंजाइम होते हैं !

    • ट्रिप्सिन यह प्रोटीन एवं उनको पॉलिपेप्टाइड तथा अमीनो अम्ल में परिवर्तित करता है
    • एमाइलेज – यह मांड को घुलनशील शर्करा में परिवर्तित करता है
    • लाइपेज – यह इमल्सीफाइड वसाओं का ग्रीन तथा फैटी एसिड्स में परिवर्तित करता है
  • किंग कोबरा घोंसला क्यूँ बनाता है ?

    किंग कोबरा घोंसला क्यूँ बनाता है ?

    विश्व में किंग कोबरा एकमात्र ऐसा सर्प है जो घोंसला बनाता है पर क्या आपको पता है वो घोंसला क्यूँ बनाता है ?

    वास्तव में ये एक अंडप्रजक सर्प है जो घोंसले में अंडे देता है और अंडों से सर्प निकलने तक घोंसले की पहरेदारी करता है ! विश्व में सर्प प्रजाति का केवल किंग कोबरा ही अपना घोंसला बनाता है !

    King Kobra संसार का सबसे लम्बा विषधर सर्प है। इसकी लम्बाई 5.6 मीटर तक होती है। सांपों की यह प्रजाति दक्षिणपूर्व एशिया एवं भारत के कुछ भागों में खूब पायी जाती है। एशिया के सांपों में यह सर्वाधिक खतरनाक सापों में से एक है।

    इसकी लंबाई 20 फिट तक हो सकती है। तथा यह भारत के दक्षिण क्षेत्रों में बहुतायात में पाया जाता है।

    भारत में, किंग कोबरा वन्यजीव संरक्षण की अनुसूची द्वितीय अधिनियम, 1972 (यथा संशोधित) और एक व्यक्ति को सांप के ऊपर से 6 साल के लिए कैद हो सकती है हत्या का दोषी के तहत रखा जाता है।

  • LASIK (लेसर असिस्टेड इन सीटू केराइटोमील्यूसिस) क्या है ?

    LASIK (लेसर असिस्टेड इन सीटू केराइटोमील्यूसिस) क्या है ?

    LASIK एक लेजर तकनीक है जो निकट दृष्टि दोष दूर दृष्टि दोष और जरा दृष्टि दोष आदि नेत्र संबंधी दोषों के उपचार में लिया जाता है किंतु उसका उपयोग अधिक उम्र के व्यक्ति पर नहीं किया जा सकता |

    LASIK नेत्र शल्य चिकित्सा दृष्टि की समस्याओं को ठीक करने के लिए सबसे प्रसिद्ध और सबसे अधिक प्रदर्शन की जाने वाली लेजर अपवर्तक सर्जरी है। लेज़र-असिस्टेड इन सीटू केराटोमाइल्यूसिस (LASIK) चश्मे या कॉन्टैक्ट लेंस का विकल्प हो सकता है।

    LASIK सर्जरी के दौरान, दृष्टि में सुधार के लिए आपकी आंख (कॉर्निया) के सामने गुंबद के आकार के स्पष्ट ऊतक के आकार को ठीक से बदलने के लिए एक विशेष प्रकार के काटने वाले लेजर का उपयोग किया जाता है।

    सामान्य दृष्टि वाली आंखों में, कॉर्निया आंख के पिछले हिस्से में रेटिना पर प्रकाश को ठीक से झुकता है (अपवर्तित करता है)। लेकिन निकट दृष्टि (मायोपिया), दूरदर्शिता (हाइपरोपिया) या दृष्टिवैषम्य के साथ, प्रकाश गलत तरीके से मुड़ा हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप धुंधली दृष्टि होती है।

    चश्मा या कॉन्टैक्ट लेंस दृष्टि को सही कर सकते हैं, लेकिन कॉर्निया को फिर से आकार देने से भी आवश्यक अपवर्तन प्रदान होगा।

    लैसिक नेत्र शल्य चिकित्सा के कुछ दुष्प्रभाव, विशेष रूप से शुष्क आंखें और अस्थायी दृश्य समस्याएं जैसे चकाचौंध, काफी सामान्य हैं।

    ये आमतौर पर कुछ हफ्तों या महीनों के बाद साफ हो जाते हैं और बहुत कम लोग इन्हें दीर्घकालिक समस्या मानते हैं।

  • राइबोसोम की सरंचना एवं प्रकार (Ribosome in Hindi) | राइबोसोम के कार्य, विशेषताएं क्या है ? हिंदी में

    राइबोसोम की सरंचना एवं प्रकार (Ribosome in Hindi) | राइबोसोम के कार्य, विशेषताएं क्या है ? हिंदी में

    इस आर्टिकल में राइबोसोम की सरंचना एवं प्रकार के बारे में जानेगें | राइबोसोम की खोज किसने की ? उसके प्रमुख कार्य क्या है ? राइबोसोम को प्रोटीन का कारखाना (फैक्ट्री) क्यों कहा जाता है ? राइबोसोम के प्रकार क्या है आदि के बारे में जानकारी लेगें |

    राइबोसोम का परिचय (Introduction of Ribosome)

    राइबोसोम एक गोलाकार, दो उपइकाइयों के बने, झिल्ली विहीन राइबोन्यूक्लिओप्रोटीन के सूक्ष्म कण होते हैं, जो हरितलवक, केन्द्रक तथा कोशिकाद्रव्य में (अन्तःप्रद्रव्यी जालिका पर राइबोफोरोन प्रोटीन द्वारा जुड़ा) पाए जाते हैं।

    यह एक झिल्ली विहीन कोशिकांग है। राइबोसोम सभी कोशिकाओं (सार्वभौमिक कोशिकांग) में पाया जाता है। कोशिकाद्रव्य में यह स्वतंत्र रूप में तथा खुरदरीअन्तःप्रद्रव्यी जालिका पर दाने के रूप में पाया जाता है। राइबोसोम सबसे छोटी कोशिकांग इकाई भी है और इसका आकार 15-20nm होता है।

    राइबोसोम RBC कोशिका को छोड़कर शेष सभी कोशिकाओं में (यूकैरियोटिक कोशिकाप्रोकैरियोटिक कोशिका) में पाया जाता है। ये प्रोटीन संश्लेषण नामक प्रक्रिया में अमीनो एसिड से प्रोटीन को बनाते हैं | राइबोसोम परिपक्व आरबीसी (Mature RBC) में अनुपस्थित होता हैं। रीबोफोरिन प्रोटीन की मदद से RER (खुरदरी अन्तःप्रद्रव्यी जालिका) पर उपस्थित होता है।

    राइबोसोम की खोज (Introduction of Ribosome)

    राइबोसोम की खोज सर्वप्रथम रोमानिया के जीववैज्ञानिक जॉर्ज पैलाडे (George Emil Palade) ने 1955 में की थी | उन्होंने इस खोज के लिए इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी का प्रयोग किया था जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। राइबोसोम नाम 1958 में वैज्ञानिक रिचर्ड बी. रॉबर्ट्स (Richard B. Roberts) ने प्रस्तावित किया था।

    राइबोसोम और उसके सहयोगी अणु 20वीं शताब्दी के मध्य से जीवविज्ञान के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाए हुए हैं। 7 अक्टूबर, 2009 को भारतीय मूल के वैज्ञानिक वेंकटरमन रामकृष्णन को रसायन विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें राइबोसोम की कार्यप्रणाली व संरचना के उत्कृष्ट अध्ययन के लिए यह पुरस्कार संयुक्त रूप से दिया गया |

    राइबोसोम की संरचना (Structure of Ribosome)

    प्रत्येक राइबोसोम लगभग दो गोलाकार सबयूनिट्स (Subunits) का बन जाता है. इनमें एक छोटी (छोटी इकाई) एवं एक बड़ी सब-यूनिट (बड़ी उप इकाई) होती है | छोटी इकाई की आकृति अण्डाकार एवं बड़ी इकाई की आकृति गुंबद के आकार जैसी होती है

    छोटी इकाई व बड़ी उप इकाई के क्रमशः कार्य m- RNA को जोड़ना व t- RNA को जोड़ने का काम करते हैं। राइबोसोम की संरचना के स्थाइत्व के लिए mg2+ की आवश्यकता होती है जिसका मान 0.001 मोलर होता है।

    राइबोसोम की बड़ी उपइकाई में तीन स्थल (साइट) होते हैं :

    ए-स्थल (A-Site): – यह अमीनोएसिल स्थल तथा टी-आरएनए के लिए ग्राही स्थल होता है।

    पी-स्थल (P-Site): – यह पेप्टाइडल साइट, पेप्टाइड श्रंखला के दीर्घीकरण के लिए स्थल होता है।

    ई-स्थल (E-Site): – यह टी-आरएनए के लिए राइबोसोम से बाहर निकलने के लिए स्थल होता है।

    इसकी उपइकाईयाँ राइबोप्रोटीन और आर-आरएनए द्वारा बनी होती है। जो निम्न प्रकार की होती है-

    50s उपइकाई – 34% प्रोटीन + 23 एस और 5 एस आर-आरएनए

    30s उपइकाई – 21% प्रोटीन + 16 एस आर-आरएनए

    60s उपइकाई – 40% प्रोटीन + 28 एस, 5.8 एस और 5 एस आर-आरएनए

    40s उपइकाई 33% प्रोटीन + 18 एस आरआरएनए

    Ribosome का निर्माण न्यूक्लियोलस (केन्द्रिक) में 40-60% प्रोटीन और 60-40% आरएनए द्वारा होता है। न्यूक्लियोलस को राइबोसोमल उत्पादक फैक्टरी (Ribosomal Manufactring Factory) माना जाता है।

    राइबोसोम के प्रकार (Types of Ribosome)

    राइबोसोम प्रोकेरियोटिक कोशिका और यूकैरियोटिक कोशिका दोनों में पाया जाता है। राइबोसोम के प्रकार निम्न है-

    प्रोकेरीयोट राइबोसोम (Prokaryotic Ribosome) 

    प्रोकैरियोटिक कोशिका में राइबोसोम 70S  प्रकार का पाया जाता है जो बड़ी उप इकाई 50S की इकाई 25s + 5S) एवं छोटी उप इकाई 30S की इकाई 16S प्रकार की बनी होती है

    युकेरीयोट  राइबोसोम (Eukaryotic Ribosome)

    यूकैरियोटिक कोशिका में राइबोसोम 80S प्रकार का पाया जाता हैं जो बड़ी उप इकाई 60S की इकाई (28S + 5.8S + 5S) एवं छोटी उप इकाई 40S की इकाई 18S  प्रकार की बनी होती है।

    हरितलवक राइबोसोम (Chloroplast Ribosome)

    यह 70s प्रकार के जो 50s और 30s उपइकाई के बने होते है।

    माइटोकांड्रिया राइबोसोम (Mitochondrial Ribosome)

    माइटोकॉन्ड्रिया के राइबोसोम को माइटोराइबोसोम भी कहते हैं यह 70s प्रकार के जो 50s और 30s उपइकाई के बने होते है। माइटोकॉन्ड्रिया व क्लोरोप्लास्ट का राइबोसोम 70S प्रकार का पाया जाता है। क्लोरोप्लास्ट के राइबोसोम को प्लास्टीड्यिल राइबोसोम कहते हैं।

    ध्यान दें :

    s = अवसादन गुणांक (Sedimentation coefficient) (राइबोसोम के आकार की मापने की इकाई होती है)

    70S राइबोसोम्स: ये आकार में छोटे होते हैं एवं इनका अवसादन गुणांक 70S होता है. ये माइटोकॉन्ड्रिया, क्लोरोप्लास्ट एवं बैक्टीरिया आदि में पाए जाते हैं |

    80S राइबोसोम्स: ये आकार में कुछ बड़े होते हैं और इनका अवसादन गुणांक 80S होता है. ये उच्च विकसित पौधों एवं जन्तु कोशिकाओं में पाए जाते हैं |

    राइबोसोम की प्रमुख विशेषताएं

    • राइबोसोम झिल्ली विहीन (Membraneless) होते हैं।
    • राइबोसोम कोशिकाद्रव्य, माइटोकॉन्ड्रिया, केंद्रक, अन्तःप्रद्रव्यी जालिका, हरितलवक में पाए जाते है।
    • यह गोलाकार (spherical) होते हैं।
    • इनका व्यास 150- 250 Å होता है
    • यह राइबोप्रोटीन तथा mRNAके बने होते हैं।
    • इनके आकार का निर्धारण अवसादन गुणांक (Sedimentation coefficient) के आधार पर किया जाता है।

    राइबोसोम के कार्य (Functions of Ribosome)

    राइबोसोम एक ऐसी कोशिका संरचना है जो प्रोटीन के संश्लेषण में सहायक होती है | कई कोशिकाओं को उनकी मरम्मत या रासायनिक प्रक्रियाओं को निर्देशित करने के लिए प्रोटीन की आवश्यकता होती है | राइबोसोम का मुख्य कार्य अमीनों अम्ल के द्वारा प्रोटीन संश्लेषण में सहायता करना है | प्रोटीन के निर्माण की प्रक्रिया ट्रांसलेशन या अनुवादन (Translation) कहलाती है।

    पॉलीराइबोसोम

    प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis)के दौरान कई Ribosome एम-आरएनए से जुड़कर एक सरंचना बनाता है, जिसे पॉलीराइबोसोम या पोलीसीम कहा जाता है।

    राइबोसोम को प्रोटीन की फैक्ट्री क्यों कहा जाता है ?

    चूँकि राइबोसोम प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis) में भाग लेता है, इसलिए इसे सेल के इंजन या प्रोटीन फैक्ट्री के रूप में जाना जाता है। इस को कोशिका का प्रोटीन कारखाना (Protein Factory of the Cell) या प्रोटीन की फैक्ट्री कहा जाता है |

    यदि कोशिका में राइबोसोम हटा दिया जाए तो क्या होगा?

    यदि कोशिका से राइबोसोम हटा दिए जाते हैं, तो प्रोटीन संश्लेषण नहीं होगा। इस प्रकार कोशिका चयापचय उत्पादों की कमी के कारण आगे प्रदर्शन करने की क्षमता खो देगी। कोशिका अंततः मर जाएगी | 
  • नीले हरे शैवालों की कुछ जातियों की कौन सी विशेषता उन्हें जैविक खाद के रूप में वर्धित करने में सहायक है ?

    नीले हरे शैवालों की कुछ जातियों की कौन सी विशेषता उन्हें जैविक खाद के रूप में वर्धित करने में सहायक है ?

    नीले हरे शैवालों में ऐसी क्रियाविधि होती है जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को ऐसे नए रूप में परिवर्तित कर देती है जिसे फसल के पौधे आसानी से ग्रहण कर सकते हैं !

    शैवालों के अध्ययन को फ़ाइकोलोजी कहते हैं, शैवाल प्राय पर्णहरित युक्त, संवहन ऊतक रहित, आत्मपोषी होते हैं !

    इनका प्रयोग निम्न रूपों में किया जाता है –

    • भोजन के रूप में – फोरफाइरा, अल्वा, सरगासन, लेमिनेरिया, नास्टोक
    • आयोडिन बनाने में – लेमिनेरिया, फ्यूकस, एकलोनिया आदि
    • खाद के रूप में – नोस्टोक, एनाबीना, केल्प आदि
    • औषधियों के रूप में – क्लोरेला से क्लोरेलिन नामक प्रतिजैविक एवं लेमिनेरिया से टिंचर आयोडिन वनाई जाती है !
    • अनुसंधान कार्यों में – क्लोरेला असीटेबुलेरिया, एलोनिया आदि, ये खेत में सड़कर वायु मंडलीय नाइट्रोजन को नाइट्रेट में बदल देते हैं जिससे जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है !
  • कुछ पौधे कीटभक्षी (insectivorous plants) क्यों होते हैं ?

    कुछ पौधे कीटभक्षी (insectivorous plants) क्यों होते हैं ?

    कुछ वनस्पतियां कीट भक्षी होती हैं क्योंकि उन्हें पर्याप्त नाइट्रोजन प्राप्त नहीं होता है और वह पर्याप्त नाइट्रोजन प्राप्त करने के लिए कीट पर निर्भर रहती है !  ये पौधे अपने भोजन को स्वयं संश्लेषित करने की क्षमता रखते हैं और इसलिए इन्हें स्वपोषी (ऑटोट्रोफ्स) कहा जाता है।

    कीट भक्षी पौधे

    1- सेरोसेनिया – इस पौधे में थैली नुमा पत्तियां जमीन पर एक झुंड में सजी रहती हैं। आकर्षक रंग की इन पत्तियों पर कुछ ग्रंथियां रहती हैं जिनमें शहद होता है। कीट पतंगे इसके रंग और शहद के कारण थैली के भीतर चले जाते हैं और कांटों में फंस जाते हैं और बाहर नहीं निकल पाते।

    2- ड्रोसैरा -इसे सनड्यूज़ भी कहते हैं। इसकी गोल-गोल पत्तियों के किनारे लाल रंग की घुण्‍डी वाले आलपिन सरीखे बाल होते हैं जिनसे एक चिपचिपा रस निकलता रहता है। छोटे कीट पतंगों को यही रस चिपका लेता है और फिर घुण्डियां मुड़कर चारों ओर से उसे घेर लेती हैं।

    3- यूट्रीकुलेरिया – इसे ब्लैडरवर्ट भी कहते हैं। इसकी पत्तियां गोल गुब्बारेनुमा होती हैं। जैसे ही कोई कीट-पतंगा इसके नजदीक आता है इस मौजूद रेशे उसे जकड़ लेते हैं। पत्तियों में निकलने वाला एंजाइम कीटो को खत्म करने में मदद करता है।

    4- पिचर प्लांट – इसे नेपिन्थिस के नाम से भी जाना जाता है। इसके मुंह और किनारे की ओर शहद की थैलियां होती हैं। कीट पतंगे सुराही के रंग से आकर्षित होकर शहद के लालच में अपनी जान गंवा बैठते हैं। चिकनी दीवार के कारण ये रेंगकर बाहर भी निकल नहीं पाते। इसे घटपर्णी के नाम से भी जाना जाता है। 

    5- डायोनिया – इसमें कीट पतंगों को पकड़ने वाला फंदा जमीन पर सजी पत्तियां होती हैं। यह भी ड्रोसैरा की तरह ही शिकार करता है। इसके दो पत्ते इसके लिए शिकार का काम करते हैं जिनके ऊपर लगे बाल इतने सक्रिय होते हैं कि चींटी तक की मौजूदगी तक पहचान लेते हैं। जैसे ही शिकार करीब आता है 1 सेकंड में उसे निगल लेता है।