इन्द्रधनुष कैसे बनता है ?

How does rainbow become ?

इन्द्रधनुष बनने का कारण

पूर्ण आन्तरिक परावर्तन तथा अपवर्तन द्वारा वर्ण विक्षेपण का सबसे अच्छा उदाहरण आकाश में वर्षा के बाद दिखाई देने वाला इन्द्रधनुष है। सूर्य की सफेद किरणें जब जल की बूंदों पर पड़ती हैं, तो उनके प्रकाश का बूंदों के भीतर के अवतल तल से पूर्ण आन्तरिक परावर्तन होता है और जब यह बूंदों से बाहर निकलने लगती हैं, तो विक्षेपित हो जाती है और इस प्रकार विभिन्न रंग दिखाई पड़ते हैं। कभी-कभी दो इन्द्रधनुष दिखाई देते हैं। दूसरा इन्द्रधनुष बूंदों में दो बार आन्तरिक परावर्तन होने के कारण बनता है। दोनों का एक ही केन्द्र होता है और यह सूर्य के ठीक विपरीत दिशा में होता है। जब दो इन्द्रधनुष बनते हैं, तो एक को ‘प्राथमिक’ तथा दूसरे को ‘द्वितीयक इन्द्रधनुष’ कहते हैं।

प्रकाश के सात रंगों में से लाल, हरा तथा नीला रंग ‘प्राथमिक रंग’ कहलाते हैं क्योंकि उन्हें विभिन्न अनुपात में मिलाने से अन्य रंग प्राप्त होते हैं। इस तरह मिलाने से जो रंग प्राप्त होते हैं उन्हें ‘द्वितीयक रंग’ कहते हैं।

लाल + नीला = बैंगनी

नीला + हरा = प्रशियन नीला (Peacock blue or Cyan)

लाल + हरा = पीला

जब दो रंग परस्पर मिलने से श्वेत प्रकाश उत्पन्न करते हैं, उन्हें ‘पूरक रंग’ कहते हैं।

विभिन्न रंगों के मिश्रण से निम्नलिखित रंग प्राप्त कर सकते हैं:

लाल + हरा = पीला लाल + नीला = मैजेंटा

हरा + नीला = पीकॉक ब्ल्यू (सयान)

हरा + मैजेंटा = श्वेत लाल + पीकॉक ब्ल्यू = श्वेत

नीला + पीला = श्वेत लाल + हरा + नीला = श्वेत

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