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  • एलन मस्क के न्यूरालिंक को मनुष्यों में मस्तिष्क प्रत्यारोपण के अध्ययन के लिए एफडीए की मंजूरी मिली

    एलन मस्क के न्यूरालिंक को मनुष्यों में मस्तिष्क प्रत्यारोपण के अध्ययन के लिए एफडीए की मंजूरी मिली

    एलन मस्क के न्यूरालिंक को मनुष्यों में मस्तिष्क प्रत्यारोपण पर एक अध्ययन करने के लिए यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) से मंजूरी मिली है। यह कंपनी के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, जो ऐसी तकनीक विकसित करने पर काम कर रही है जो मानव दिमाग को सीधे कंप्यूटर से जोड़ सकती है। अध्ययन में चार रोगियों के दिमाग में उपकरणों को प्रत्यारोपित करना शामिल होगा, जिनके मस्तिष्क की गतिविधि की निगरानी करने और संभावित रूप से मिर्गी के दौरे की आवृत्ति को कम करने के उद्देश्य शामिल हैं ।

    न्यूरालिंक के पीछे की तकनीक

    न्यूरालिंक की तकनीक में मस्तिष्क में छोटे इलेक्ट्रोड प्रत्यारोपित करना शामिल है, जिसका उपयोग मस्तिष्क गतिविधि की निगरानी और उत्तेजित करने के लिए किया जा सकता है। इलेक्ट्रोड कान के पीछे प्रत्यारोपित एक छोटे से उपकरण से जुड़े होते हैं, जो कंप्यूटर या स्मार्टफोन के साथ वायरलेस तरीके से संवाद कर सकता है। प्रौद्योगिकी का अंतिम लक्ष्य मनुष्यों को कीबोर्ड या माउस की आवश्यकता के बिना कंप्यूटर के साथ सीधे संवाद करने की अनुमति देना है।

    प्रौद्योगिकी में चिकित्सा से लेकर मनोरंजन तक क्षेत्रों की एक विस्तृत श्रृंखला में क्रांति लाने की क्षमता है। उदाहरण के लिए, इसका उपयोग पक्षाघात वाले लोगों को कृत्रिम अंगों को नियंत्रित करने में मदद करने के लिए किया जा सकता है, या लोगों को अपने विचारों का उपयोग करके आभासी वास्तविक वातावरण को नियंत्रित करने की सुविधा दी जा सकती है !

    मस्तिष्क प्रत्यारोपण के लाभ

    मस्तिष्क प्रत्यारोपण के कई संभावित लाभ हैं, विशेष रूप से मिर्गी, पार्किंसंस रोग और अल्जाइमर रोग जैसी न्यूरोलॉजिकल स्थितियों वाले लोगों के लिए। वास्तविक समय में मस्तिष्क गतिविधि की निगरानी करके, डॉक्टर इस बात की बेहतर समझ हासिल कर सकते हैं कि ये स्थितियां कैसे विकसित होती हैं और प्रगति करती हैं, जिससे अधिक प्रभावी उपचार हो सकते हैं।

    इसके अलावा, मस्तिष्क प्रत्यारोपण का उपयोग अन्य स्थितियों की एक विस्तृत श्रृंखला के इलाज के लिए किया जा सकता है, जैसे कि पुरानी दर्द और अवसाद। मस्तिष्क के विशिष्ट क्षेत्रों को उत्तेजित करके, डॉक्टर दवा की आवश्यकता के बिना संभावित रूप से लक्षणों को कम कर सकते हैं।

    मस्तिष्क प्रत्यारोपण के जोखिम

    जबकि मस्तिष्क प्रत्यारोपण के लिए कई संभावित लाभ हैं, इसमें महत्वपूर्ण जोखिम भी शामिल हैं। इलेक्ट्रोड को प्रत्यारोपित करने के लिए सर्जरी करनी पड़ेगी जिसमें संक्रमण या रक्तस्राव का खतरा रहेगा। इसके अलावा, एक जोखिम है कि इलेक्ट्रोड मस्तिष्क को नुकसान पहुंचा सकते हैं या इसके सामान्य कामकाज में बाधा पैदा कर सकते हैं।

    मस्तिष्क प्रत्यारोपण के उपयोग के आसपास नैतिक चिंताएं भी हैं। कुछ लोग चिंता करते हैं कि प्रौद्योगिकी का उपयोग लोगों के विचारों या व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए किया जा सकता है, या इसका उपयोग सैन्य उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।

    मस्तिष्क प्रत्यारोपण का भविष्य

    जोखिम और चिंताओं के बावजूद, मस्तिष्क प्रत्यारोपण के संभावित लाभ काफी महत्वपूर्ण हैं कि कई शोधकर्ता और कंपनियां प्रौद्योगिकी में निवेश करना जारी रख रही हैं। न्यूरालिंक मस्तिष्क प्रत्यारोपण विकसित करने पर काम करने वाली कई कंपनियों में से एक है, और बाजार पर पहले से ही कई चिकित्सा उपकरण हैं जो समान तकनीक का उपयोग करते हैं।

    भविष्य में, यह संभावना है कि मस्तिष्क प्रत्यारोपण अधिक सामान्य और अधिक उन्नत हो जाएगा। जैसे-जैसे तकनीक में सुधार होता है, स्थितियों की एक विस्तृत श्रृंखला का इलाज करने के लिए मस्तिष्क प्रत्यारोपण का उपयोग करना संभव हो सकता है, और लोगों को अधिक परिष्कृत तरीकों से कंप्यूटर के साथ संवाद करने की अनुमति मिल सकती है।

    समाप्ति

    न्यूरालिंक के अध्ययन के लिए एफडीए की मंजूरी कंपनी के लिए और मस्तिष्क प्रत्यारोपण के क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। जबकि प्रौद्योगिकी से जुड़े महत्वपूर्ण जोखिम और चिंताएं हैं, संभावित लाभ अनदेखा करने के लिए बहुत अच्छे हैं। जैसा कि अनुसंधान जारी है, यह संभावना है कि मस्तिष्क प्रत्यारोपण अधिक सामान्य और अधिक उन्नत हो जाएगा, संभावित रूप से चिकित्सा से मनोरंजन तक के क्षेत्रों की एक विस्तृत श्रृंखला में क्रांति आएगी।

  • अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने 2022 में जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप से खोजे 200 से ज्यादा ग्रह

    अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने 2022 में जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप से खोजे 200 से ज्यादा ग्रह

    अंतरिक्ष को अनंत माना जाता है। इसमें अनगिनत खगोलीय पिंड (Celestial bodies) हैं जिनकी बहुत थोड़ी संख्या ही अब तक ज्ञात थी। खगोलीय पिंड (Celestial bodies) यानी एक प्राकृतिक वस्तु (object) जो पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर स्थित है, जैसे धूमकेतु (comet), क्षुद्रग्रह (asteroid), चंद्रमा (moon), ग्रह (planet), सूर्य (sun) या तारा (star) ।

    लेकिन 2022 ऐसा साल रहा जिसमें अंतरिक्ष के क्षेत्र में बड़ी क्रांति आई। वैज्ञानिकों ने इस साल हमारे सोलर सिस्टम के बाहर भी सैकड़ों ग्रह खोज डाले। और इसका सबसे बड़ा श्रेय जाता है जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (James Webb Space Telescope) को। इसके आने के बाद से वैज्ञानिकों की आंखों की पहुंच अंतरिक्ष में करोड़ों प्रकाश वर्ष आगे तक चली गई।

    जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (James Webb Space Telescope)

    जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST) अब तक का सबसे शक्तिशाली टेलीस्कोप है, जिसे अंतरिक्ष में लॉन्च किया गया है। JWST को 25 दिसंबर 2021 में लॉन्च किया गया था और लांच के बाद से ही इसने सितारों और आकाशगंगाओं के निर्माण की जांच शुरू कर दी है । जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप – जिसे कभी-कभी JWST या वेब (Webb) कहा जाता है, NASA का सबसे बड़ा और सबसे शक्तिशाली अंतरिक्ष विज्ञान टेलीस्कोप है।

    अमेरिकन स्पेस एजेंसी नासा (National Aeronautics and Space Administration – NASA) ने यूरोपियन स्पेस एजेंसी (European Space Agency – ESA) और कैनेडियन स्पेस एजेंसी (Canadian Space Agency – CSA) के सहयोग से JWST को develop और डिजाईन किया है ।

    नोट: जेम्स वेब कौन है? (Who is James Webb) – जेम्स एडविन वेब एक अमेरिकी सरकार के अधिकारी थे, जिन्होंने 1949 से 1952 तक राज्य के अवर सचिव (Undersecretary of State) के रूप में कार्य किया। वह 14 फरवरी, 1961 से 7 अक्टूबर, 1968 तक नासा के दूसरे नियुक्त प्रशासक भी थे।

    जेम्स वेब किस लिए प्रसिद्ध है? – जेम्स एडविन वेब ने फरवरी 1961 से अक्टूबर 1968 तक अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के प्रशासक के तौर पर बेहतरीन कार्य किया था।

    नए एग्जोप्लेनेट्स (Exoplanet) की खोज

    एग्जोप्लेनेट (Exoplanet) ऐसे ग्रहों को कहा जाता है हमारे सौर मंडल की सीमा के बाहर मौजूद हैं। अब तक खोजे गए एग्जोप्लेनेट्स (Exoplanet) की संख्या अब 5235 हो गई है। एस्ट्रोनॉमर्स ने इस साल 200 के लगभग एग्जोप्लेनेट्स की खोज की है।

    जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की मदद से यह संभव हो पाया है। इसने हबल टेलीस्कोप को भी पीछे छोड़ दिया है। हालांकि, हबल टेलीस्कोप अभी भी अपना काम कर रहा है। नासा ने एक ट्वीट में यह जानकारी दी है कि अकेले 2022 में ही उसने सैकड़ों एग्जोप्लेनेट्स का पता लगा लिया है।

    हबल स्पेस टेलीस्कोप (Hubble Space Telescope)

    एक स्पेस टेलीस्कोप है जिसे 1990 में पृथ्वी की निचली कक्षा में लॉन्च किया गया था और यह अभी भी ऑपरेशन में है। यह पहला अंतरिक्ष टेलीस्कोप नहीं था, लेकिन यह सबसे बड़े और सबसे बहुमुखी में से एक टेलिस्कोप है, जो एक महत्वपूर्ण शोध उपकरण (vital research tool) और खगोल विज्ञान के लिए वरदान के रूप में प्रसिद्ध है।

    नए एग्जोप्लेनेट्स (Exoplanet) की बनावट

    नासा के मुताबिक, 2022 की शुरुआत में उनके पास खोजे गए एग्जोप्लनेटेस् की संख्या 5000 के करीब थी। लेकिन 2022 के खत्म होते होते उन्होंने 200 से ज्यादा एग्जोप्लेनेट्स खोज डाले और यह संख्या 5235 पर पहुंच गई। इनमें से 4% ग्रह ऐसे हैं जिन पर पृथ्वी और मंगल की तरह ही चट्टाने पाई जाती हैं। इस उपलब्धि से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि 2023 में और अधिक एग्जोप्लेनेट्स को अंतरिक्ष वैज्ञानिक खोज सकने में कामयाब हो जाएंगे।

    एग्जोप्लेनेट्स की बनावट में बहुत भिन्नता पाई जाती है। इनमें से कुछ आकार में बहुत छोटे होते हैं, तो कुछ दिखने में धरती जैसे लगते हैं और इनकी सतह पर भी रेत और चट्टानें पाई जाती हैं। 2022 में खोजा गया सबसे लेटेस्ट प्लेनेट नेप्च्यून (Neptune) जैसा दिखता है। इसका नाम HD 109833 b बताया गया है। यह एक जी-टाइप तारे के गिर्द घूमता है।

    नोट: नेपच्यून सूर्य से आठवां ग्रह है और सौरमंडल का सबसे दूर का ज्ञात ग्रह है। व्यास की दृष्टि से यह सौर मंडल का चौथा सबसे बड़ा ग्रह, तीसरा सबसे विशाल ग्रह और सबसे घना विशालकाय ग्रह है। यह पृथ्वी के द्रव्यमान का 17 गुना है, और इसके निकट-जुड़वां यूरेनस से थोड़ा अधिक भारी है

    एग्जोप्लेनेट (Exoplanet) में नए क्या मिला

    अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को दो एग्जोप्लेनेट ऐसे भी मिले हैं जिन पर अधिकतर मात्रा में पानी मौजूद हो सकता है। इन पर प्रत्य़क्ष रूप से पानी की खोज नहीं हुई है। बल्कि इनके आकार और घनत्व की तुलना जब दूसरे मॉडल्स के साथ की गई तो पता चला कि इनके घनत्व का आधे से ज्यादा हिस्सा ऐसे पदार्थ से बना है जो चट्टानों से तो हल्का है, लेकिन हाइड्रोजन और हीलियम जैसे गैसीय पदार्थों से भारी है। इसलिए बहुत संभावना जताई गई है इन पर पानी मौजूद हो सकता है। अगर ऐसा हो पाता है तो पृथ्वी के अलावा भी किसी अन्य ग्रह पर जीवन पाया जा सकता है।

    जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (James Webb Space Telescope) के बारे जानने के लिए नासा की official वेबसाइट – https://webb.nasa.gov/

  • Nobel Prize in Chemistry 2022: तीन वैज्ञानिकों को केमिस्ट्री में मिला नोबेल पुरस्कार

    Nobel Prize in Chemistry 2022: तीन वैज्ञानिकों को केमिस्ट्री में मिला नोबेल पुरस्कार

    रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज (The Royal Swedish Academy of Sciences) ने रसायन विज्ञान के लिए 2022 (Nobel Prize in Chemistry 2022 ) के नोबेल पुरस्कार की घोषणा की | इस बार नोबेल पुरस्कार तीन वैज्ञानिकों को अमेरिका की स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी में कैमिस्ट कैरोलिन आर. बर्टोजी (Carolyn R. Bertozzi), डेनमार्क की यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन के मॉर्टेन मेल्डल (Morten Meldal) और अमेरिका ला जोला स्थित स्क्रिप्स रिसर्च के वैज्ञानिक के. बैरी शार्पलेस (K. Barry Sharpless) को दिया गया है |

    ये साझा पुरस्कार उन्हें क्लिक केमिस्ट्री (Click Chemistry) और बायोऑर्थोगोनल केमिस्ट्री (Bioorthogonal Chemistry) के विकास के लिए दिया गया है |

    The Royal Swedish Academy of Sciences द्वारा निकाली प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया की रसायन विज्ञान 2022 का नोबेल पुरस्कार कठिन प्रक्रियाओं को आसान बनाने के लिए दिया जा रहा है | के. बैरी शार्पलेस (K. Barry Sharpless) और मॉर्टेन मेल्डल (Morten Meldal) ने रसायन विज्ञान के एक कार्यात्मक रूप ‘क्लिक केमिस्ट्री (Click Chemistry)’ की नींव रखी है जिसमें आणविक भवन ब्लॉक (molecular building) जल्दी और कुशलता से एक साथ स्नैप करते हैं। कैरोलिन आर. बर्टोजी (Carolyn R. Bertozzi) ने क्लिक केमिस्ट्री को एक नए आयाम में ले लिया है और जीवित जीवों (living organisms) में क्लिक केमिस्ट्री का उपयोग करना शुरू कर दिया है।

    क्लिक केमिस्ट्री यानी ऐसी केमिस्ट्री जिसमें आप बेकार और गड़बड़ पदार्थों को हटाकर किसी नए प्रकार का पदार्थ बना सकते हैं |

    क्लिक केमिस्ट्री (Click Chemistry) तकनीक कैंसर का इलाज कर सकती है | डीएनए में बदलाव कर सकती है | प्लास्टिक कचरे से निजात दिला सकती है | घर को सुरक्षित बना सकती है | शॉर्ट सर्किट से लगने वाली आग से बचा सकती है क्लिक केमिस्ट्री और बायोऑर्थोगोनल केमिस्ट्री का इस्तेमाल भविष्य में जीवों और इंसानों के शरीर में ऐसे मॉलीक्यूल्स के निर्माण के लिए होगा, जो उन्हें बीमारी मुक्त जीवन दे सकें या फिर बीमाॉरियों से बचा सकें या बीमारी होने ही न दें | क्लिक केमिस्ट्री असल में समान व्यवहार रखने वाले छोटे-छोटे मॉलीक्यूल्स (molecules) को जोड़ने की प्रक्रिया है इसे बायोकंजुगेशन (Bioconjugation) कहते हैं |

    कैरोलिन आर. बर्टोजी (Carolyn R. Bertozzi)

    कैरोलिन आर. बर्टोजी (Carolyn R. Bertozzi)

    कैरोलिन आर. बर्टोजी (Carolyn R. Bertozzi) एक अमेरिकी कैमिस्ट हैं | उनका जन्म 10 अक्टूबर, 1966 को बॉस्टन में हुआ | इन्हें रसायन विज्ञान (Chemistry) और जीव विज्ञान (Biology) दोनों में किए गए उनके कामों के लिए जाना जाता है | जीवित प्रणालियों के साथ कैमिकल रिएक्शन के लिए बायोऑर्थोगोनल केमिस्ट्री ((Bioorthogonal Chemistry))‘ शब्द उन्हीं ने दिया है |

    55 वर्षीय कैरोलिन ने 1988 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी (Harvard University) से स्नातक किया और 1993 में यूसी बर्कले से रसायन विज्ञान में पीएचडी की | सेलुलर इम्यूनोलॉजी के क्षेत्र में यूसीएसएफ में पोस्टडॉक्टरल काम पूरा करने के बाद, वह 1996 में यूसी बर्कले फैकल्टी में शामिल हो गईं | जून 2015 में, वे Sarafan ChEM-H में स्कॉलर के तौर पर स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में संकाय में शामिल हुईं |        

    प्रो. कौरोलिन की लैब कैंसर, सूजन और बैक्टीरियल इंफेक्शन से जुड़े सेल सरफेस ग्लाइकोसिलेशन में बदलावों पर केंद्रित है | उन्हें उनकी शोध उपलब्धियों के लिए कई सम्मान और पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है | वे इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिन, नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज और अमेरिकन एकेडमी ऑफ आर्ट्स एंड साइंसेज की निर्वाचित सदस्य हैं | उन्हें लेमेल्सन-एमआईटी पुरस्कार, हेनरिक वेलैंड पुरस्कार और मैकआर्थर फाउंडेशन फैलोशिप से सम्मानित किया गया है | कैरोलिन बर्टोज़ी मैसाचुसेट्स के लेक्सिंगटन में पली-बढ़ी हैं | उनके पिता, विलियम बर्टोज़ी, MIT में फिजिक्स के प्रोफेसर थे | कैरोलिन ने तो क्लिक केमिस्ट्री को अलग ही आयाम पर पहुंचा दिया | कैरोलिन ने ऐसे क्लिक केमिस्ट्री की खोज की जो जीवों में काम करता था | उन्होंने इसे बायोऑर्थोगोनल रिएक्शन (Bioorthogonal Reaction) का नाम दिया यानी ऐसी क्लिक केमिस्ट्री जो कोशिकाओं के अंदर हो रही है | इस तकनीक के आते ही इसका ज्यादा उपयोग दवाओं को लेकर किया गया | सबसे पहले कैंसर की दवाओं को लेकर काम शुरू किया गया | अब इन दवाओं के क्लनिकल ट्रायल्स चल रहे हैं |

    मॉर्टेन पीटर मेल्डल (Morten Peter Meldal)

    मॉर्टेन पीटर मेल्डल (Morten Peter Meldal)

    मॉर्टेन पीटर  मेल्डल (Morten Peter Meldal) एक डेनिश कैमिस्ट हैं | उनका जन्म 16 जनवरी 1954 को डेनमार्क में हुआ था | वह डेनमार्क में कोपेनहेगन युनिवर्सिटी में रसायन विज्ञान के प्रोफेसर हैं | उन्हें CuAAC-क्लिक रिएक्शन करने के लिए जाना जाता है |

    उन्होंने 1981 में डेनमार्क टेक्निकल युनिवर्सिटी से कैमिकल इंजीनियरिंग में एमएससी की है | उन्होंने 1983 में डेनमार्क के इंस्टिट्यूट ऑफ ऑर्गैनिक कैमिस्ट्री से पीएचडी की | 1988 – 2011 तक वह इस युनिवर्सिटी में अलग-अलग पदों पर रहे | वह कार्ल्सबर्ग लैब में लीडर ऑफ सिंथेसिस रहे और 2003 में प्रोफेसर बने | उन्होंने कॉम्बिनेटरियल केमिस्ट्री और पेप्टाइड केमिस्ट्री में नई तकनीकों का विकास किया |

    मॉर्टेन मेल्डल (Morten Meldal) ने ऐसा केमिकल रिएक्शन खोजा जो इस समय कई जगहों पर इस्तेमाल हो रहा है | जैसे दवाओं के विकास में, डीएनए मैपिंग में और नए टिकाऊ पदार्थों को बनाने में |

    उनकी रुचि बायोऑर्गेनिक केमिस्ट्री और पॉलिमर, एंजाइमोलॉजी में विकास और जीपीसीआर में रही है | उन्हें राल्फ एफ. हिर्शमैन (Ralph F. Hirschmann) और विंसेंट डू विग्नॉड अवार्ड्स (Vincent du Vignaud Awards) सहित कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं | वे सोसाइटी ऑफ कॉम्बिनेटोरियल साइंसेज के अध्यक्ष भी हैं |

    कार्ल बैरी शार्पलेस (Karl Barry Sharpless)

    कार्ल बैरी शार्पलेस (Karl Barry Sharpless)

    कार्ल बैरी शार्पलेस (Karl Barry Sharpless) एक अमेरिकी कैमिस्ट हैं | इनका जन्म 28 अप्रैल, 1941 को फ़िलाडेल्फ़िया में हुआ | इन्हें स्टीरियोसेलेक्टिव रिएक्शन और क्लिक केमिस्ट्री पर उनके काम के लिए जाना जाता है |

    के. बैरी शार्पलेस (K. Barry Sharpless) को दूसरी बार नोबेल पुरस्कार मिला है | इससे पहले भी शार्पलेस को 2001 में चिरली उत्प्रेरित ऑक्सीकरण रिएक्शन (chirally catalysed oxidation reactions) पर उनके काम और क्लिक केमिस्ट्री शब्द को पैदा करने के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था |

    नोबेल पुरस्कार 2022 (Nobel Prize 2022)

    नोबेल पुरस्कार की घोषणा सोमवार (3 अक्टूबर 2022) को हुई थी |

    स्वीडिश वैज्ञानिक स्वंते पाबो को चिकित्सा क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था (3 अक्टूबर 2022) | उन्हें निएंडरथल डीएनए पर उनकी खोजों के लिए ये पुरस्कार मिला था |

    इसके बाद मंगलवार (4 अक्टूबर) को भौतिकी विज्ञान के लिए नोबेल प्राइज की घोषणा की गई थी. भौतिकी के लिए इस साल ये पुरस्कार तीन वैज्ञानिकों को दिया गया | एलेन एस्पेक्ट, जॉन एफ क्लॉजर और एंटोन ज़िलिंगर को भौतिकी विज्ञान के लिए नोबेल प्राइज से सम्मानित किया गया है | ‘क्वांटम मेकैनिक्स’ के क्षेत्र में तीनों वैज्ञानिकों को कार्य करने के लिए नोबेल प्राइज दिया गया है |

    स्त्रोत:

    नोबल पुरस्कार आधिकारिक वेबसाइट : https://www.nobelprize.org/

    प्रेस रिलीज़ – https://www.nobelprize.org/prizes/chemistry/2022/press-release/

    The click reaction that changed chemistry: https://www.nobelprize.org/uploads/2022/10/press-chemistry2022-figure2.pdf

    Bioorthogonal chemistry illuminates the cell : https://www.nobelprize.org/uploads/2022/10/press-chemistry2022-figure3.pdf

  • Nobel Prize in Physics 2022: तीन वैज्ञानिकों को भौतिक विज्ञान के लिए नोबेल प्राइज

    Nobel Prize in Physics 2022: तीन वैज्ञानिकों को भौतिक विज्ञान के लिए नोबेल प्राइज

    एलेन एस्पेक्ट, जॉन एफ क्लॉजर और एंटोन ज़िलिंगर को भौतिक विज्ञान के लिए नोबेल प्राइज (The Nobel Prize in Physics 2022) से सम्मानित किया गया है |

    नोबेल पुरस्कारों की घोषणा की शुरुआत 3 अक्टूबर 2022  से हो गई थी | सबसे पहले फिजियोलॉजी/मेडिसिन कैटि‍गरी में पुरस्‍कार का ऐलान किया गया। इस बार का मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार स्वीडन के स्‍वांते पाबो (Svante Pääbo) को ‘‘विलुप्त होमिनिन और मानव विकास के जीनोम से संबंधित खोजों के लिए (Discoveries concerning the genomes of extinct hominins and human evolution)’ दिया गया है।  पाबो ने आधुनिक मानव और विलुप्त प्रजातियों के जीनोम की तुलना कर बताया कि इनमें आपसी मिश्रण है।

    इसी क्रम में मंगलवार (4 अक्टूबर 2022) को भौतिकी विज्ञान (Physics Science) के लिए नोबेल पुरस्कारों की घोषणा की गई | रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज (The Royal Swedish Academy of Sciences) ने एलेन एस्पेक्ट (Alain Aspect), जॉन फ्रांसिस क्लॉजर (John F. Clauser) और एंटोन ज़िलिंगर (Anton Zeilinger) को भौतिकी में 2022 नोबेल पुरस्कार से सम्मानित करने का निर्णय लिया है |

    एलेन एस्पेक्ट फ्रांस के भौतिक विज्ञानी हैं, जबकि जॉन ए.क्लॉसर अमेरिका और एंटोन जिलिंगर ऑस्ट्रिया के वैज्ञानिक हैं।

    तीनों वैज्ञानिकों को ‘क्वांटम मेकैनिक्स’ के क्षेत्र में कार्य करने के लिए ये पुरस्कार दिया गया है |

    उन्हें यह पुरस्कार इनटैंगल्ड फोटॉन (Entangled photons) के साथ प्रयोग करने, बेल असमानताओं (Bell inequalities) के उल्लंघन को स्थापित करने और क्वांटम इन्फॉर्मेशन साइंस में उनके काम के लिए दिया गया है |

    इन वैज्ञानिकों ने इनटैंगल्ड फोटॉन (Entangled photons) का उपयोग करते हुए अभूतपूर्व प्रयोग किए हैं, जहां दो कण अलग होने पर भी एक इकाई की तरह व्यवहार करते हैं। उनके परिणामों ने क्वांटम सूचना पर आधारित नई तकनीक का रास्ता साफ कर दिया है।

    इनटैंगल्ड फोटॉन (Entangled photons) और एलेन एस्पेक्ट, जॉन एफ क्लॉजर और एंटोन ज़िलिंगर की खोज

    क्वांटम यांत्रिकी (Quantum Mechanics) अब अनुसंधान का एक बड़ा क्षेत्र है जिसमें क्वांटम कंप्यूटर, क्वांटम नेटवर्क और सुरक्षित क्वांटम एन्क्रिप्टेड संचार शामिल हैं।

    इस विकास का एक प्रमुख कारक यह है कि कैसे क्वांटम यांत्रिकी दो या दो से अधिक कणों को एक उलझी हुई अवस्था में मौजूद रहने की अनुमति देता है। उलझे हुए जोड़े में से एक कण का क्या होता है यह निर्धारित करता है कि दूसरे कण का क्या होता है, भले ही वे बहुत दूर हों।

    लंबे समय तक, यह सवाल था कि क्या सहसंबंध (correlation ) इसलिए था क्योंकि एक उलझे हुए जोड़े (entangled pair) में कणों में छिपे हुए variables, निर्देश होते थे जो उन्हें बताते हैं कि उन्हें प्रयोग में कौन सा परिणाम देना चाहिए।

    1960 के दशक में, जॉन स्टीवर्ट बेल (John Stewart Bell) ने उनके नाम पर गणितीय असमानता विकसित की। यह बताता है कि यदि छिपे हुए चर (variables) हैं, तो बड़ी संख्या में माप के परिणामों के बीच संबंध कभी भी एक निश्चित मूल्य से अधिक नहीं होगा। हालांकि, क्वांटम यांत्रिकी भविष्यवाणी करता है कि एक निश्चित प्रकार का प्रयोग बेल की असमानता (Bell’s inequality) का उल्लंघन करेगा, इस प्रकार एक मजबूत सहसंबंध (stronger correlation) के परिणामस्वरूप अन्यथा संभव होगा।

    जॉन एफ क्लॉजर ने जॉन बेल के विचारों को विकसित किया, जिससे एक व्यावहारिक प्रयोग हुआ। जब उन्होंने माप लिया, तो उन्होंने बेल असमानता का स्पष्ट रूप से उल्लंघन करके क्वांटम यांत्रिकी का समर्थन किया। इसका मतलब है कि क्वांटम यांत्रिकी को एक सिद्धांत द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है जो छिपे हुए चर (hidden variables) का उपयोग करता है।

    जॉन एफ क्लॉजर के प्रयोग के बाद कुछ खामियां (loopholes) रह गईं। एलेन एस्पेक्ट (Alain Aspect) ने सेटअप को इस तरह से विकसित किया, जिससे एक महत्वपूर्ण बचाव का रास्ता बंद हो गया। वह एक उलझी हुई जोड़ी (entangled pair) के अपने स्रोत को छोड़ने के बाद माप सेटिंग्स (measurement settings) को स्विच करने में सक्षम था, इसलिए जब वे उत्सर्जित (emitted) होते थे तो सेटिंग परिणाम को प्रभावित नहीं कर सकती थी। परिष्कृत उपकरणों और प्रयोगों की लंबी श्रृंखला का उपयोग करते हुए, एंटोन ज़िलिंगर (Anton Zeilinger) ने उलझी हुई क्वांटम अवस्थाओं (entangled quantum) का उपयोग करना शुरू कर दिया। अन्य बातों के अलावा, उनके शोध समूह ने क्वांटम टेलीपोर्टेशन (quantum teleportation) नामक एक घटना का प्रदर्शन किया है, जिससे क्वांटम अवस्था को एक कण से एक दूरी पर स्थानांतरित करना संभव हो जाता है (makes it possible to move a quantum state from one particle to one at a distance)।

    एलेन एस्पेक्ट (Alain Aspect)

    एलेन एस्पेक्ट (Alain Aspect)

    फ्रांस के फिजिसिस्ट एलेन एस्पेक्ट (Alain Aspect) का जन्म 15 जून 1947 को फ्रांस के एजेन में हुआ था | 75 वर्षीय एलेन एस्पेक्ट ने पेरिस साकले यूनिवर्सिटी और पेरिस यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी की थी | 1980 में जब उनकी पीएचडी चल रही थी, तब उन्होंने बेल टेस्ट एक्सपेरीमेंट्स (Bell Test Experiments) करने शुरू कर दिए थे  जिसमें उन्होंने क्वांटम इनटैंगलमेंट (Quantum Entanglement) से जुड़े कुछ रहस्यों का पता लगाया |

    इनटैंगल्ड फोटॉन (1982) के साथ उनके बेल टेस्ट एक्सपेरिमेंट ने, 1935 में शुरू हुई अल्बर्ट आइंस्टीन और निल्स बोहर के बीच एक बहस को सुलझाने में योगदान दिया है |

    एलेन एस्पेक्ट, इंस्टीट्यूट डी ऑप्टिक ग्रेजुएट स्कूल और इकोले पॉलीटेक्निक (यूनिवर्सिटी पेरिस-सैकले) में प्रोफेसर हैं | वह कई एकैडमी (फ्रांस, यूएसए, ऑस्ट्रिया) के सदस्य हैं | अब तक उन्हें अपने रिसर्च के निम्न पुरस्कार मिल चुके है :

    CNRS गोल्ड मेडल (2005); 2010 में फिजिक्स में वुल्फ पुरस्कार ( Wolf prize); निल्स बोहर (Nils Bohr Gold medal); अल्बर्ट आइंस्टीन मेडल (2012); ओएसए (2013) का इवेस मेडल/क्विन प्राइज़; और 2014 में क्वांटम सूचना में बलजान पुरस्कार(Balzan prize)

    जॉन फ्रांसिस क्लॉजर (John Francis Clauser)

    जॉन फ्रांसिस क्लॉजर (John Francis Clauser)

    जॉन फ्रांसिस क्लॉजर एक अमेरिकी एक्सपेरिमेंटल और थ्योरेटिकल भौतिक विज्ञानी हैं | उन्हें क्वांटम मेकैन्किस में उनके योगदान के लिए जाना जाता है | उन्हें क्लॉसर-हॉर्न-शिमोनी-होल्ट (Clauser-Horne-Shimony-Holt (CHSH) ) इनीक्वैलिटी, नॉन लोकल क्वांटम इनटैंगलमेंट के पहले प्रायोगिक प्रमाण और लोकल रियलिज़्म की थ्योरी के निर्माण के लिए जाना जाता है |

    जॉन फ्रांसिस क्लॉजर का जन्म 1 दिसंबर 1942 को अमेरिका के पासाडेना में हुआ था | उन्होंने 1964 में, कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से फिजिक्स में बी.एस किया | 1966 में उन्होंने फिजिक्स में एमए किया और 1969 में कोलंबिया युनिवर्सिटी से पीएचडी की | 1969 से 1996 तक उन्होंने लॉरेंस बर्कले नेशनल लेबोरेटरी, लॉरेंस लिवरमोर नेशनल लेबोरेटरी और कैलिफोर्निया युनिवर्सिटी बर्कले में काम किया |

    1969 में, जॉन बेल के सैद्धांतिक परिणामों से प्रेरित माइकल हॉर्न, अब्नेर शिमोनी और रिचर्ड होल्ट के साथ, उन्होंने स्थानीय छिपी हुई वेरिएबल थ्योरी के पहले टेस्ट का प्रस्ताव दिया था | इन सिद्धांतों के लिए उन्होंने पहले प्रयोगात्मक परीक्षण योग्य सीएचएसएच-बेल की थ्योरम- क्लॉजर-हॉर्न-शिमोनी-होल्ट (CHSH) इनीक्वैलिटी दी | 1972 में, उन्होंने CHSH का पहला प्रायोगिक परीक्षण किया और 1976 में दूसरा परीक्षण किया |

    1974 में, माइकल हॉर्न के साथ काम करते हुए उन्होंने लोकल रियलिस्टिक थ्योरी के सिद्धांत को लोकल हिडन वैरिएबल थ्योरी के सामान्यीकरण के रूप में तैयार किया | 1974 में उन्होंने प्रकाश के लिए उप-पॉसोनियन आंकड़ों (Sub-Poissonian statistics) का पहला अवलोकन किया | इस तरह पहली बार प्रयोगात्मक रूप से साबित किया कि फोटॉन स्थानीयकृत कणों (localized particles) की तरह व्यवहार कर सकते हैं न कि विद्युत चुम्बकीय विकिरण (electromagnetic radiation) के संक्षिप्त पल्स की तरह |

    1982 में उन्हें जॉन बैल के साथ रियलिटी फाउंडेशन प्राइज़ (Reality Foundation Prize) दिया गया | 2010 में उन्हें एलेन एस्पेक्ट और एंटोन ज़िलिंगर के साथ, नॉन लोकल क्वांटम इनटेंगलमेंट पर उनकी टिप्पणियों के लिए और लोकल रियलिज़िम के एक्सपेरिमेंटल टेस्ट के लिए फिजिक्स में वुल्फ पुरस्कार (Wolf Prize) से सम्मानित किया गया था | 2011 में उन्हें थॉमसन-रॉयटर्स प्रशस्ति-पत्र पुरस्कार (Thompson-Reuters Citation Laureate) से सम्मानित किया गया था

    एंटोन ज़िलिंगर (Anton Zeilinger)

    एंटोन ज़िलिंगर (Anton Zeilinger)

    एंटोन ज़िलिंगर का जन्म 20 May 1945 को ऑस्ट्रिया के रीड इम इनक्रेइस में हुआ था | ज़िलिंगर वियना यूनिवर्सिटी में फिजिक्स के प्रोफेसर हैं और ऑस्ट्रियन एकेडमी ऑफ साइंसेज में क्वांटम ऑप्टिक्स और क्वांटम सूचना संस्थान में वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं | उनके ज्यादातर शोध क्वांटम इनटैंगलमेंट के प्रयोगों से जुड़े हैं | उन्हें खासतौर पर अपने एक्सपेरिमेंटल और सैद्धांतिक कामों के लिए जाना जाता है, खासकर इनटैंगलमेंट, क्वांटम टेलीपोर्टेशन, क्वांटम कम्यूनिकेशन और क्रिप्टोग्राफी |

    उन्होंने 1971 में वियना यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की थी | 1999 में वियना यूनिवर्सिटी में शामिल होने से पहले वे वियना की टेक्निकल यूनिवर्सिटी और इन्सब्रुक यूनिवर्सिटी के संकायों में थे, जहां उन्होंने फिजिक्स डिपार्टमेंट के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया | ज़िलिंगर ने एमआईटी, म्यूनिख के तकनीकी विश्वविद्यालय, हम्बोल्ट विश्वविद्यालय बर्लिन, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और कॉलेज डी फ्रांस में चेयर इंटरनेशनल सहित कई जगहों पर काम किया है | ज़िलिंगर ऑस्ट्रियन फिजिकल सोसाइटी के अध्यक्ष रहे हैं और फिलहाल ऑस्ट्रियन एकेडमी ऑफ साइंसेज के अध्यक्ष हैं |

    पिछले साल इनको मिला था भौतिकी में नोबल पुरस्कार

    पिछले साल स्यूकुरो मानेबे, क्लॉस होसेलमैन और जियोर्जियो पेरिसी को भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें यह पुरस्कार जटिल भौतिक प्रणालियों को लेकर हमारी समझ में विकसित करने के लिए दिया गया था।

    स्यूकुरो मानेबे और क्लॉस होसेलमैन ने यह पुरस्कार ‘धरती की जलवायु की भौतिक मॉडलिंग’ और ‘ग्लोबल वार्मिंग की भविष्यवाणी’ को मजबूत करने के लिए जीता था। वहीं पेरिसी को ‘परमाणु से ग्रहों के पैमाने तक ‘भौतिक प्रणालियों में उतार-चढ़ाव की क्रिया के खोज के लिए’ नोबल से सम्मानित किया गया था।

    स्त्रोत:

    नोबल पुरस्कार आधिकारिक वेबसाइट : https://www.nobelprize.org/

    एलेन एस्पेक्ट (Alain Aspect) के बारे में – https://youtu.be/lZyZtrF01qQ

    एंटोन ज़िलिंगर (Anton Zeilinger) के बारे में – https://youtu.be/epooR8ONrj4

    जॉन फ्रांसिस क्लॉजर (John F. Clauser)https://youtu.be/ZYZiLX2uibM

    प्रेस रिलीज़ – https://www.nobelprize.org/prizes/physics/2022/press-release/

    Does colour exist when no one is watching? – https://www.nobelprize.org/uploads/2022/10/press-physics2022-figure2.pdf

    Entangled particles that never met – https://www.nobelprize.org/uploads/2022/10/press-physics2022-figure3.pdf

  • Nobel Prize 2022: स्‍वीडन के स्‍वांते पाबो को मेडिसिन का नोबेल (नोबेल पुरस्कार के बारे में जाने)

    Nobel Prize 2022: स्‍वीडन के स्‍वांते पाबो को मेडिसिन का नोबेल (नोबेल पुरस्कार के बारे में जाने)

    नोबेल प्राइज वीक 2022 (Nobel Prize) की शुरुआत हो गई है। स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में आयोजित हो रहे वीक में सबसे पहले फिजियोलॉजी/मेडिसिन कैटि‍गरी में पुरस्‍कार का ऐलान किया गया। इस बार का मेडिसिन का नोबेल पुरस्कार स्वीडन के स्‍वांते पाबो (Svante Pääbo) को ‘‘विलुप्त होमिनिन और मानव विकास के जीनोम से संबंधित खोजों के लिए (Discoveries concerning the genomes of extinct hominins and human evolution)’ दिया गया है।  

    द नोबेल कमि‍टी के सेक्रेटरी थॉमस पर्लमैन ने उनके नाम का ऐलान किया। इस साल के नोबेल पुरस्कार की घोषणा 3-10 अक्टूबर को की जा रही है | इस साल 5 अक्टूबर को केमिस्ट्री, 6 अक्टूबर को साहित्य, 7 अक्टूबर को नोबेल शांति और 10 अक्टूबर को इकोनॉमिक्स के लिए नोबेल का ऐलान किया जाएगा। नोबेल पुरस्कारों को व्यापक रूप से उनके संबंधित क्षेत्रों में उपलब्ध सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों के रूप में माना जाता है

    नोबेल फाउंडेशन ने 2020 और 2021 के विजेताओं के साथ दिसंबर में स्टॉकहोम में होने वाले नोबेल सप्ताह में 2022 के नोबेल पुरस्कार विजेताओं को आमंत्रित करने का भी फैसला किया है।

    वेबसाइट – https://www.nobelprize.org/

    Press Release – https://www.nobelprize.org/prizes/medicine/2022/press-release/

    कौन हैं स्वांते पाबो (Svante Pääbo)

    20 अप्रैल 1955 को स्‍वीडन के स्‍टॉकहोम में जन्‍मे स्‍वांते पाबो ने उप्‍साला यूनिवर्सिटी (Uppsala University) से अपनी पढ़ाई पूरी की। स्‍वांते एक जेनेटिसिस्ट (Geneticist) हैं और इवोल्यूशनरी जेनेटिक्स ( Evolutionary Genetics ) के क्षेत्र में एक्सपर्ट हैं। उन्होंने 1986 में उप्साला विश्वविद्यालय में अपनी पीएचडी थीसिस पूरी की | स्‍वांते पाबो ज्यूरिख विश्वविद्यालय, स्विट्जरलैंड और बाद में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले, यूएसए में पोस्टडॉक्टरल फेलो थे। वे 1990 में म्यूनिख विश्वविद्यालय, जर्मनी में प्रोफेसर बने। 1999 में उन्होंने जर्मनी के लीपज़िग में मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर इवोल्यूशनरी एंथ्रोपोलॉजी (Max Planck Institute for Evolutionary Anthropology) की स्थापना की, जहा स्‍वांते अभी सेवाएं दे रहे हैं।  वह ओकिनावा इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, जापान में सहायक प्रोफेसर के रूप में भी कार्यरत हैं।

    DNA को लेकर भी उन्‍होंने काफी काम किया है। खास बात यह है कि स्‍वांते के पिता सुन बर्गस्‍ट्रॉमी (Sune Bergström) जो एक बायोकेमिस्‍ट थे उन्हें 1982 में नोबेल प्राइज मिला था |

    अपने शोध के जरिए स्‍वांते पाबो ने विलुप्त होमिनिन से कई अतिरिक्त जीनोम अनुक्रमों (genome sequences) का विश्लेषण पूरा कर लिया है। पाबो की खोजों का इस्‍तेमाल वैज्ञानिक समुदाय द्वारा मानव विकास और प्रवास को बेहतर ढंग से समझने के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है। जीनोम सिक्‍वेसिंग के नए तरीकों से संकेत मिलता है कि अफ्रीका में होमो सेपियंस के साथ होमिनिन भी मिश्रित हो सकते हैं। 
    Photo courtesy: https://www.nobelprize.org/prizes
    पाबो के इस मौलिक शोध ने एक पूरी तरह से नए विज्ञान 'जीवाश्म विज्ञान' को जन्म दिया है । सभी जीवित मनुष्यों को विलुप्त होमिनिन से अलग करने वाले आनुवंशिक अंतरों को प्रकट करके, उनकी खोजों ने यह पता लगाने का आधार प्रदान किया कि क्या हमें विशिष्ट मानव बनाता है।

    हम मनुष्य कहा से आये है ? Where do we come from?

    मानव विकास के अध्ययन के लिए जीवाश्म विज्ञान और पुरातत्व महत्वपूर्ण हैं। अनुसंधान ने इस बात का सबूत दिया कि शारीरिक रूप से आधुनिक मानव, होमो सेपियन्स, लगभग 300,000 साल पहले पहली बार अफ्रीका में दिखाई दिए, जबकि हमारे सबसे करीबी रिश्तेदार, निएंडरथल, अफ्रीका के बाहर विकसित हुए और लगभग 400,000 साल से 30,000 साल पहले तक यूरोप और पश्चिमी एशिया में बसे हुए थे, जिस बिंदु पर वे विलुप्त हो गए। लगभग 70,000 साल पहले, होमो सेपियन्स के समूह अफ्रीका से मध्य पूर्व में चले गए और वहाँ से वे दुनिया के बाकी हिस्सों में फैल गए। होमो सेपियन्स और निएंडरथल इस प्रकार यूरेशिया के बड़े हिस्से में दसियों हज़ार वर्षों तक सहअस्तित्व में रहे। लेकिन हम विलुप्त निएंडरथल के साथ अपने संबंधों के बारे में क्या जानते हैं? सुराग जीनोमिक जानकारी से प्राप्त किए जा सकते हैं। 1990 के दशक के अंत तक, लगभग पूरे मानव जीनोम को अनुक्रमित कर दिया गया था। यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, जिसने विभिन्न मानव आबादी के बीच अनुवांशिक संबंधों के बाद के अध्ययनों की अनुमति दी। हालांकि, वर्तमान मानव और विलुप्त निएंडरथल के बीच संबंधों के अध्ययन के लिए पुरातन नमूनों से बरामद जीनोमिक डीएनए की अनुक्रमण की आवश्यकता होगी।

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    नोबेल पुरस्कार क्या है ? कैसे शुरुआत हुई नोबेल पुरस्कारों की

    नोबेल पुरस्कार की 1895 में स्थापना हुई थी। पहली बार 1901 में नोबेल पुरस्कार दिए गए थे। अब तक 975 लोगों को नोबेल मिल चुका है। इसके अलावा संस्थानों को 609 नोबेल पुरस्कार दिए गए हैं। जिन क्षेत्रों में नोबेल दिया जाता है उनमें फिजिक्स (Physics), मेडिसिन (Physiology or Medicine), केमिस्ट्री (Chemistry), साहित्य (Literature), शांति (Peace) और अर्थशास्‍त्र शामिल हैं।

    पुरस्कार समारोह प्रतिवर्ष होते हैं।  एक पुरस्कार तीन से अधिक व्यक्तियों के बीच साझा नहीं किया जा सकता है, यद्यपि नोबेल शांति पुरस्कार तीन से अधिक लोगों के संगठनों को प्रदान किया जा सकता है। यद्यपि नोबेल पुरस्कार मरणोपरांत नहीं दिए जाते हैं, यदि किसी व्यक्ति को पुरस्कार दिया जाता है और प्राप्त करने से पहले उसकी मृत्यु हो जाती है, तो पुरस्कार प्रदान किया जाता है।

    नोबेल की स्थापना किसने की?

    एक धनी स्वीडिश उद्योगपति और डाइनामाइट के आविष्कारक सर एल्फ्रेड नोबेल (Sir Alfred Nobel की वसीहत के आधार पर चिकित्सा, भौतिकी, रसायन शास्त्र, साहित्य और शांति क्षेत्र के नोबेल पुरस्कारों की स्थापना की गई थी। पहला नोबेल पुरस्कार वर्ष 1901 में सर एल्फ्रेड नोबेल के निधन के पांच साल बाद दिया गया था।

    अल्फ्रेड नोबेल

    अल्फ्रेड नोबेल का जन्म 21 अक्टूबर 1833 को स्टॉकहोल्म के स्वीडन में हुआ था। इनका तालुक्क एक अभियंता परिवार से था जो बहुत ही समृद्ध था। आप एक रसायनज्ञ, अभियंता व् अविष्कारक है। 1894 में आपने बेफोर्स आयरन और स्टील मील ख़रीदा जिसे आपने एक महत्वपूर्ण हथियार निर्माता का केंद्र बनाया तथा आपने बैल्लेस्टिक मिसाइलो का भी सफल परीक्षण किया।

    अर्थशास्त्र का नोबेल

    अर्थशास्त्र का नोबेल, जिसे आधारिक तौर पर ‘बैंक ऑफ स्वीडन प्राइज इन इकोनॉमिक साइंसेज इन मेमोरी ऑफ एल्फ्रेड नोबेल (एल्फ्रेड नोबेल की स्मृति में अर्थशास्त्र में बैंक ऑफ स्वीडन पुरस्कार)’, उसकी स्थापना एल्फ्रेड नोबेल की वसीहत के आधार पर नहीं हुई थी, बल्कि स्वीडन के केंद्रीय बैंक ने 1968 में इसकी शुरुआत की थी।

    नोबेल पुरस्कार विजेताओं को पुरस्कार में क्या मिलता है?\

    प्रत्येक क्षेत्र के नोबेल के तहत विजेताओं को एक स्वर्ण पदक और एक प्रमाणपत्र के साथ एक करोड़ क्रोनोर (लगभग नौ लाख डॉलर) की पुरस्कार राशि दी जाती है। विजेताओं का सम्मान हर साल 10 दिसंबर को किया जाता है। 1896 में 10 दिसंबर की तारीख को ही एल्फ्रेड नोबेल का निधन हुआ था।

    1901 से 2021 तक अलग-अलग क्षेत्रों में कुल 609 बार नोबेल पुरस्कार प्रदान किए जा चुके हैं।

    किसी प्रत्याशी को नोबेल पुरस्कार के लिय कौन नामित कर सकता है?

    दुनियाभर में हजारों लोग नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकन जमा करने के पात्र हैं। इनमें विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर, कानूनविद, पूर्व नोबेल पुरस्कार विजेता और खुद नोबेल समिति के सदस्य शामिल हैं। हालांकि, नामांकन को 50 वर्षों तक गुप्त रखा जाता है, लेकिन जो लोग उन्हें जमा करते हैं, वे कभी-कभी सार्वजनिक रूप से अपनी सिफारिशों की घोषणा करते हैं, खासकर नोबेल शांति पुरस्कार के संबंध में।

    नोबेल पुरस्कारों का नॉर्वे से क्या संबंध है?

    नोबेल शांति पुरस्कार नॉर्वे में प्रदान किया जाता है, जबकि अन्य क्षेत्रों के पुरस्कार स्वीडन में दिए जाते हैं। ऐसा एल्फ्रेड नोबेल की इच्छा के आधार पर किया जाता है। इस इच्छा के पीछे की असल वजह तो स्पष्ट नहीं है, लेकिन एल्फ्रेड नोबेल के जीवनकाल में स्वीडन और नॉर्वे एक संघ का हिस्सा थे, जो 1905 में भंग हो गया था।

    स्टॉकहोम स्थित नोबेल फाउंडेशन, जो पुरस्कार राशि का प्रबंधन करता है और ओस्लो स्थित शांति पुरस्कार समिति के बीच संबंध कई मौके पर तनावपूर्ण रहे हैं।

  • दो नए ग्रहों की खोज, बृहस्पति जितना विशाल है आकार – क्या मिलेगे जीवन के लक्षण ?

    दो नए ग्रहों की खोज, बृहस्पति जितना विशाल है आकार – क्या मिलेगे जीवन के लक्षण ?

    इजरायल के एक यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की अगुवाई में शोधकर्ताओं की टीम ने पृथ्वी वाले सौर मंडल के दायरे से काफी बाहर मौजूद दूसरी दुनिया में टेलीस्कोप के माध्यम से जाकर दो विशाल ग्रहों का पता लगाया है। ये इतने विशाल ग्रह हैं कि अपने बृहस्पति ग्रह के आकार के बराबर हैं। जानते हैं इन दोनों नए ग्रहों और उनकी खोज के बारे में।

    आकाशगंगा की दूसरी दुनिया में दो नए ग्रहों की खोज

    इजरायल के तेल अवीव विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की अगुवाई में वैज्ञानिकों की एक टीम ने मिल्की वे आकाशगंगा के अंदर सौर मंडल के दूरस्थ क्षेत्र में दो नए ग्रहों की खोज की है। इन्होंने यूरोपीय स्पेस एजेंसी और इसकी गैया स्पेसक्राफ्ट की टीमों के साथ सहयोग से शोध के हिस्से के रूप में गैया-1 बी और गैया -2 बी नाम से इन दोनों विशाल ग्रहों की पहचान की है। ऐसा पहली बार हुआ है कि गैया स्पेसक्राफ्ट ने सफलतापूर्वक दो नए ग्रहों को खोज निकाला है।

    आकाशगंगा के 3डी मैप तैयार करने के मिशन के दौरान मिली सफलता

    गैया एक तारा सर्वेक्षण उपग्रह है। इसे आकाशगंगा के 3डी मैप तैयार करने के मिशन पर भेजा गया है। इसकी सटीकता को अभूतपूर्व रखने की कोशिश की गई है, इतनी सटीक कि कोई पृथ्वी पर खड़े होकर भी चांद पर मौजूद 10-शेकेल (यहूदियों का प्राचीन सिक्का) सिक्कों की पहचान कर ले। इस शोध के परिणाम को साइंटिफि जर्नल एस्ट्रोनॉमी और ऐस्टेरफिजिक्स में प्रकाश किया गया है। इस खोज के अगुवा और तेल अवीव यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शाय जुकर ने कहा, ‘दो नए ग्रहों की खोज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक का इस्तेमाल करते हुए सूक्ष्म छानबीन के दौरान की गई।

    40 और ग्रहों की हो सकती है खोज

    दोनों नए ग्रहों को उनके आकार और उनके मेजबान तारों से निकटता की वजह से ‘हॉट जुपिटर’ कहा गया है। प्रोफेसर जुकर के मुताबिक, ‘अमेरिका में हमने टेलीस्कोप से जो माप किए, उससे इसकी पुष्टि हुई कि ये असल में दो विशाल ग्रह थे, जो हमारे सौर मंडल में बृहस्पति ग्रह के आकार जैसे थे, और अपने सूर्य के इतने पास मौजूद थे कि चार दिनों से भी कम समय में एक कक्षा पूरी कर लेते थे। इसका मतलब हुआ कि प्रत्येक पृथ्वी वर्ष उस ग्रह के 90 वर्ष के बराबर होता है।’ उन्होंने कहा, ‘हमने 40 और कैंडिडेट के बारे में भी प्रकाशित किया है, जिन्हें हमने गैया के माध्यम से पता लगाया है। खगोलीय समुदाय को अब इन ग्रहों की प्रकृति की पुष्टि करने की कोशिश करनी होगी, जैसा कि हमने पहले दो कैंडिडेट के लिए किया।’

    1995 में पहली बार हुई थी दूसरी दुनिया के ग्रह की खोज

    हमारा सौर मंडल सूर्य और उसके आठ ग्रहों से बना है। जबकि, आकाशगंगा में हजारों दूसरे अज्ञात और कम ज्ञात ग्रह मौजूद हैं, जो अनगिनत सौर मंडल शामिल हैं। दूरस्थ सौर मंडल में पहला ग्रह 1995 में खोजा गया था। यही वजह है कि इनके बारे में जानने-समझने को लेकर खगोलविदों की ओर से एक सतत प्रयास जारी है; और उसी का परिणाम है कि इन दो नए और विशाल ग्रहों के बारे में पता चल पाया है।

    जीवन के लक्षण को लेकर अनुमान क्या है ?

    सवाल है कि जो बृहस्पति के आकार वाले दोनों नए ग्रहों का वैज्ञानिकों ने पता लगाया है, वहां जीवन के लक्षण मिलने की कितनी संभावनाएं हैं? इस रिसर्च में शामिल रेमंड के डॉक्टरेट के एक छात्र एवियाद पान्ही ने बताया, ‘नए ग्रह अपने सूर्य के बहुत ही करीब हैं और इसलिए वहां का तापमान बहुत ही ज्यादा है, करीब 1,000 डिग्री सेल्सियस, इसलिए वहां जीवन के विकसित होने की संभावना शून्य है।’

  • Electric Planes – भविष्य का हवाई जहाज – बिना तेल के चलने वाला विमान

    Electric Planes – भविष्य का हवाई जहाज – बिना तेल के चलने वाला विमान

    अंतरिक्ष पर्यटन (Space Tourism) के साथ अब विमानन (Aviation) के क्षेत्र में क्रांतिकारी आविष्कारों की तैयारी हो रही है| कई कंपनियां आधुनिक तकनीक से युक्त विमान विकसित कर रही हैं जो जीवाश्वम ईंधन पर नहीं बल्कि इलेक्ट्रिक मोटर (Electric Motors) की ताकत के जरिए उड़ सकेंगे | कुछ कंपनियां तो इस दशक में ही इस तरह के विमानों का व्यवसायिक उपयोग शुरू करने की योजना बना रहे हैं |

    दुनिया में अभी अंतरिक्ष पर्यटन  की बातें तो होने लगी हैं | अंतरिक्ष अनुसंधानकर्ता ऐसा रॉकेट विकसित करने में लगे हैं  जिससे लोगों को अंतरिक्ष में पहुंचाने की लागत बहुत कम हो सके | इस लिहाज से देखा जाए तो हमारा विमानन या उड्डयन (Aviation) का क्षेत्र भी पीछे नहीं रहा हैं | विशेषज्ञ विमान तकनीक में नए नवाचारों पर काम रहे हैं जिसमें व्यवसायिक विद्युतीय विमानन (Electrical Aviation) भी शामिल है |

    इनमें से फैराडेयर एविएशन (Faradair Aviation) का हाइब्रिड इलेक्ट्रिक यात्री विमान (Hybrid Electric Passenger Plane), राइट इलेक्ट्रिक का विमान (Wright Electric is an American startup company developing an electric airliner), इजराइल का  ईविएशन का एलिस (Eviation Alice), जैसे विमानों पर काम चल रहा है| फैराडेयर कंपनी एक हाइब्रिड-इलेक्ट्रिक विमान की अवधारणा विकसित कर रही है जो क्षेत्रीय उड़ान विकास में बाधा डालने वाली तीन मुख्य समस्याओं (संचालन लागत(Operation Costs), उत्सर्जन (Emissions ), शोर (Noise) को हल करती है।

    फैराडेयर का विमान (Faradair’s plane)

    यूके में एक स्टार्टअप इसी व्यवसायिक इलेक्ट्रिफाइट एविएशन पर काम कर रहा है| क्षेत्रीय विमानन बाजार को देखते हुए फैराडेयर एविएशन कंपनी एक हाइब्रिड इलेक्ट्रिक यात्री विमान को विकसित पर बेचने की योजना पर काम कर रही है| इसमें 19 सीटें होंगी और इसके पंखों को चलाने के ले इलेक्ट्रिक मोटर ही काफी होगी| इसके लिए जरूरी बिजली एक छोटे से गैसे टर्बाइन से आएगी|

    विमान की विशेषता

    इतना ही नहीं अतिरिक्त उठाव के लिए और छोटी हवाई पट्टी पर उड़ान भरने और उतरने के लिए भी इन विमानों में त्रिस्तरीय पंख होंगे इनसे शानदार एरोडायनामिक्स होने के बाद भी वे वर्ल्ड वार वन फाइटर प्लेन के जैसे दिखाई देते हैं| कंपनी के प्रमुख नील क्लॉग्ले का दावा है कि ऐसे विमानों में परम्परागत प्रोपेलर की तुलना में हिलने वाले कम पुर्जे होंगे| इससे वह सस्ता होने के साथ ज्यादा शांत और कम उत्सर्जन पैदा करने वाला विमान होगा|

    विमानों का उपयोग

    इस तरह के किफायती विमानों पर काम केवल यात्रियों के लिए ही नहीं बल्कि माल ढोने वाले विमानों पर भी चल रहा है| ऐसे विमान रेलवे लाइन बिछाने या सड़क बनाने के खर्चे को भी बचा सकते हैं| फैराडेयर 2025 तक इस तरह के विमान की उड़ान शुरू कर सकता और 2027 से उनका व्यवसायिक उपयोग भी शुरू हो जाएगा|

    कैलिफोर्निया की राइट इलेक्ट्रिक (Wright Electric) का plane

    लेकिन इस क्षेत्र में केवल फैराडेयर ही अकेली कंपनी नहीं है| कैलिफोर्निया की राइट इलेक्ट्रिक भी 100 सीटों वाला पूरी तरह से इलेक्ट्रिक एयरक्राफ्ट बनाने की तैयारी में है और इस सदी के मध्य में लोगों को उपलब्ध कराने की भी तैयारी कर रही है| यह विमान वर्तमान बे146 पर आधारित होगा जिसके टर्बोफैन इंजन की जगह इलेक्ट्रिक मोटर होंगी| कंपनी की ईजीजेट से साझेदारी भी होगी और यह लंदन –पेरिस, न्यूयॉर्क वॉशिंगटन या हॉन्गकॉन्ग ताईपेई के बीच एक घंटे वाली उड़ान भी मुहैया कराएगी|

    हाइब्रिड से इलेक्ट्रिक तक का सफ़र

    ये विमान अभी हाइब्रिट विमान की तरह ही होंगे जिसमें केवल चार इंजन को ही इलक्ट्रिक मोटर से बदला जाएगा| और बाकियों को सफल परीक्षणों के बाद ही बदला जाएगा| कंपनी का कहना है कि इससे ग्राहकों में एक विश्वास विकसित करने में मदद मिलेगी| कार उद्योग भी इस तरह से बदलाव ला रहा है| लेकिन विमानन में बैटरी का उपयोग एक बड़ी चुनौती है|

    इजराली ईविएशन कंपनी का विमान

    इजराइल की एक कंपनी ईविएशन एक नौ सीटों वाला विमान विकसित कर रही है|  छोटी श्रेणी का यह विमान कई सालों से विकसित किया जा रहा है| इसे 600 मील तक की उड़ान के लिए डिजाइन किया गया है और यह पूरी तरह से इलेक्ट्रिक है| वहीं विशाल हाइब्रिड विमान 500 किलोमीटर की दूरी तय कर सकेंगे|

    यूरोपीय विमानन कंपनी एयरबस ने 2017 वमें अपने प्रोटोटाइप हाइब्रिड विमान ई-फैन एक्स पर काम करना शुरू किया था| यह राइट इलेक्ट्रिक्स के BAe 146 पर आधारित था| लेकिन तीन साल बाद इस कार्यक्रम को रद्द कर दिया गया| इसके अलावा एयर बस हाइड्रोजन ऊर्जा के उपयोग पर भी काम कर रही है| कंपनी की टीम क्रायोजेनिक और सुपरकंडक्टिंग तकनीकों पर काम रही हैं| कंपनी का लक्ष्य साल 2035 तक हाइड्रोजन आधारित व्यवसायिक उड़ान भरने का है|

  • वैज्ञानिकों को मिला सबसे विशाल बैक्टीरिया थियोमार्गरीटा मैग्निफा, बिना माइक्रोस्कोप के दिखने वाला पहला Bacteria

    वैज्ञानिकों को मिला सबसे विशाल बैक्टीरिया थियोमार्गरीटा मैग्निफा, बिना माइक्रोस्कोप के दिखने वाला पहला Bacteria

    वैज्ञानिकों ने एक ऐसे जीवाणु (Bacteria) की खोज की है, जो नंगी आंखों से भी दिखता है। अगर इंसान से तुलना करें तो इसका आकार दूसरी बैक्टीरिया के मुकाबले इतना ही विशालकाय है, जैसे मानव के लिए माउंट एवरेस्ट। गौरतलब है कि बैक्टीरिया से पृथ्वी का बहुत ही नजदीकी रिश्ता है। इंसान के शरीर में अनगिनत बैक्टीरिया होते हैं। ऐसा पहली बार हुआ है, जब इतना बड़ा बैक्टीरिया मिला है, जिसे हम बिना माइक्रोस्कोप की मदद से भी देख सकते हैं।

    थियोमार्गरीटा मैग्निफा (Thiomargarita Magnifica) की खोज

    कैरिबियन द्वीप समूह में मैंग्रोव के दलदल में दुनिया का सबसे विशाल बैक्टीरिया की खोज की गई है। वैज्ञानिकों को यह भी अनुमान लग रहा है कि किस वजह से इस बैक्टीरिया ने इतना विशाल आकार विकसित किया होगा। इस बैक्टीरिया को थियोमार्गरीटा मैग्निफा (Thiomargarita Magnifica) नाम दिया गया है, जो ज्यादातर जीवाणुयों की तुलना में 5,000 गुना विशाल है। जबकि, अबतक जितने भी विशाल बैक्टीरिया की जानकारी है, उनसे भी यह 50 गुना ज्यादा बड़ा है (इसके नाम में मैग्निफिका का संदर्भ लैटिन में ‘बड़ा’ और फ्रेंच शब्द मैग्निफिक्यू से है)।

    नंगी आंखों से दिखता है ये बैक्टीरिया

    इस शोध के लीड ऑथर और कैलिफोर्निया के मरीन बायोलॉजिस्ट जीन-मैरी वोलैंड ने इसकी विशालता के बारे में कहा कि, ‘इसका संदर्भ देखने के लिए, इसे ऐसे समझा जा सकता है, जैसे एक इंसान का सामना माउंट एवरेस्ट के रूप में दूसरे इंसान से होता है।’ दरअसल, इसकी सबसे बड़ी विशेषता ही यही है कि किसी भी बैक्टीरिया को देखने के लिए माइक्रोस्कोप की आवश्यकता होती है, लेकिन यह इतना अनोखा है कि इसे नंगी आंखों से भी देखा जा सकता है।

    करीब एक सेंटीमीटर है थियोमार्गरीटा मैग्निफा की लंबाई

    थियोमार्गरीटा मैग्निफा का आकार लगभग इंसान के पलकों जितनी है और यह करीब एक सेंटीमीटर लंबा है। एक सामान्य बैक्टीरिया प्रजाति की लंबाई 1 से 5 माइक्रोमीटर होती है। जबकि, इस प्रजाति की औसत लंबाई 10,000 माइक्रोमीटर है। इनमें से कुछ तो इससे भी करीब दोगुनी हैं। बैक्टीरिया एक कोशिका वाला जीव है, जो धरती पर हर जगह मौजूद है। कुछ तो पारिस्थितिक तंत्र और अधिकांश जीवित चीजों के लिए बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं।

    पृथ्वी का पहला जीव है बैक्टीरिया

    माना जाता है कि पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत बैक्टीरिया से ही हुई और अरबों साल बाद भी इसकी संरचना काफी सामान्य है। हमारे शरीर में भी अनगिनत बैक्टीरिया मौजूद हैं, जिनमें से कुछ ही ऐसे होते हैं, जो गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं। बाकी हमारे शरीर में अच्छे जीवाणुओं की काफी जरूरत रहती है। यह शोध डिसकवरी साइंस जर्नल में विस्तार से प्रकाशित किया गया है।

    मैंग्रोव के दलदल में अनेक चीजों से चिपका मिला

    फ्रेंच वेस्ट इंडीज और गुयाना यूनिवर्सिटी के एक को-ऑथर और बायोलॉजिस्ट ओलिवियर ग्रोस ने 2009 में ग्वाडेलोप द्वीपसमूह में भी मैंग्रोव के पत्तों से चिपके हुए इस जीवाणु का पहला सैंपल देखा था। लेकिन, इसके विशाल आकार की वजह से वह तत्काल नहीं जान पाए थे कि एक यह बैक्टीरिया था। बाद में जेनेटिक एनालिसिस से यह खुलासा हुआ कि वह जीव एक कोशिका वाला बैक्टीरिया ही था। ग्रोस ने पाया कि बैक्टीरिया दलदल में सीप के शेल, चट्टानों और ग्लास की बोतलों से भी चिपका हुआ था।

    अपनी रक्षा के लिए विशाल बना थियोमार्गरीटा मैग्निफा (Thiomargarita Magnifica)!

    वैज्ञानिक इसे अभी लैब कल्चर में विकसित नहीं कर पाए हैं, लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि इसकी कोशिका में एक ऐसी संरचना है,जो बैक्टीरिया के लिए असामान्य है। शोधकर्ताओं का कहना है कि वे निश्चित नहीं हैं कि जीवाणु इतना बड़ा क्यों है, लेकिन को-ऑथर वोलैंड का अनुमान है कि छोटे जीवों से खाए जाने से बचने के लिए इसने इतना विशाल स्वरूप धारण किया हो सकता है।

  • चंद्रमा को एक्‍स्‍प्‍लोर करने वाला आर्टिमिस समझौते में सहयोगी बना सऊदी अरब – 21वां देश बना

    चंद्रमा को एक्‍स्‍प्‍लोर करने वाला आर्टिमिस समझौते में सहयोगी बना सऊदी अरब – 21वां देश बना

    14 जुलाई 2022 को सऊदी स्‍पेस कमीशन के CEO मोहम्मद सऊद अल-तमीमी ने सऊदी अरब किंगडम की ओर से आर्टेमिस समझौते (Artemis Accords) पर हस्ताक्षर किए। आर्टेमिस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला सऊदी अरब सातवां देश है और इसमें शामिल होने वाला चौथा मिडिल ईस्‍ट का देश है। यह समझोता मानवता के लिए अंतरिक्ष के लाभकारी उपयोग को बढ़ावा देने वाले सिदान्तों पर आधारित है l

    क्या है आर्टेमिस-1 मिशन (Artemis Accords) ?

    आर्टेमिस-1 मिशन के जरिए चंद्रमा को एक्‍स्‍प्‍लोर किया जाएगा। इसका स्‍पेसक्राफ्ट चार से छह सप्ताह में पृथ्वी से 280,000 मील की यात्रा करेगा। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा इस मिशन को लेकर तेजी से काम पूरे कर रही है। आर्टेमिस समझौते के सिद्धांत, 1967 की आउटर स्‍पेस ट्रिटी पर आधारित हैं और नासा के आर्टेमिस प्रोग्राम को आगे बढ़ाते हैं। यह प्रोग्राम एक बार फ‍िर से इंसानों को चंद्रमा पर उतारेगा साथ ही मंगल ग्रह पर मानव मिशन के लिए रास्ता तैयार करेगा। 

    आर्टेमिस-1 मिशन के जरिए चंद्रमा को एक्‍स्‍प्‍लोर किया जाएगा। यह स्‍पेसक्राफ्ट चार से छह सप्ताह में पृथ्वी से 280,000 मील की यात्रा करेगा। हालांकि मिशन की लॉन्चिंग में देरी हुई है। नासा ने पिछले साल नवंबर में आर्टेमिस-1 को लॉन्च करने की योजना बनाई थी। तब से अबतक इसमें देरी ही हो रही है। 

    आर्टेमिस प्रोग्राम एक व्यापक और विविध अंतरराष्ट्रीय गठबंधन पर निर्भर है। इस समझौते में शामिल होने के बाद अमेरिका और सऊदी अरब मिलकर आउटर स्‍पेस में अनिश्चितता को कम करेंगे और स्‍पेस ऑपरेशंस की सुरक्षा में वृद्धि करेंगे। सऊदी अरब से पहले कई और देश इस समझौते पर हस्‍ताक्षर कर चुके हैं।

    इनमें ऑस्ट्रेलिया, बहरीन, ब्राजील, कनाडा, कोलंबिया, फ्रांस, इजराइल, इटली, जापान, कोरिया गणराज्य, लक्जमबर्ग, मैक्सिको, न्यूजीलैंड, पोलैंड, रोमानिया, सिंगापुर, यूक्रेन, यूएई और ब्रिटेन जैसे देश हैं। समझौते पर हस्‍ताक्षर करने वाला सऊदी अरब 21वां देश है।  

    यह प्रोग्राम अपने तय समय से काफी पीछे है। मई में नासा ने इस मिशन की लॉन्चिंग के लिए कुछ और संभावित तारीखों के बारे में बताया था। एजेंसी जुलाई से दिसंबर 2022 का वक्‍त लेकर चल रही है। मिशन के तहत ओरियन स्‍पेसक्राफ्ट को स्‍पेस लॉन्‍च सिस्‍टम (SLS) रॉकेट पर पर अंतरिक्ष में भेजा जाएगा।

    बीते दिनों एसएलएस रॉकेट को वेट ड्रेस रिहर्सल से भी गुजारा गया था। कुछ समय पहले ही नासा ने बताया था कि उसकी टीमें आर्टेमिस मिशन के प्रमुख हिस्सों को भी टेस्‍ट कर रही हैं, जिन्‍हें पहले दो मिशन के बाद लॉन्‍च किया जाना है। ये आर्टिमिस-3, 4 और 5 मिशन होंगे। 

  • चीन के वैज्ञानिकों ने रोबोटिक मछली बनाई, जो पानी में माइक्रोप्लास्टिक खाती है

    चीन के वैज्ञानिकों ने रोबोटिक मछली बनाई, जो पानी में माइक्रोप्लास्टिक खाती है

    चीन के दक्षिण-पश्चिम में स्थित सिचुआन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक खास रोबोटिक मछली (Robot Fish) बनाई है. जो माइक्रोप्लास्टिक (Microplastics) खाती है.

    • इसे विकसित करने वाले वैज्ञानिक वांग युयान ने कहा कि यह मछली छूने में एकदम असली मछली जैसी महसूस होती है.
    • इसकी लंबाई मात्र 1.3 सेंटीमीटर यानी आधा इंच है.
    • यह रोबोटिक मछली छिछले पानी में माइक्रोप्लास्टिक को अपने अंदर खींच लेती है.
    • इसे इतना छोटा और हल्का रोबोट फिश बनाया गया है कि इसका उपयोग कई तरह से कर सकते हैं. यह बायोमेडिकल और घातक ऑपरेशंस में भी काम आ सकता है.
    • भविष्य में इसे इतना छोटा बनाया जाएगा कि ये आपके शरीर के किसी भी हिस्से में मौजूद बीमारी को ठीक कर सके.
    • फिलहाल यह रोबोटिक मछली नीयर-इंफ्रारेड लाइट (NIR) की दिशा में आगे बढ़ती है.
    • यह रोशनी देखकर चलती है. वैज्ञानिक रोशनी कम ज्यादा करके इसकी दिशा और गति को नियंत्रित कर सकते हैं.
    • अगर इस मछली को समुद्र में किसी बड़ी मछली ने खा भी लिया तो कोई दिक्कत नहीं है. इसका शरीर पॉलीयूरीथेन से बना है. जो जैविक तरीके से गल जाता है.
    • रोबोटिक मछली (Robotic Fish) यह अपनी शरीर से करीप पौने तीन गुना ज्यादा दूरी प्रति सेकेंड की गति से कवर करती है. यह दुनिया में बनाए गए अभी तक के सबसे नरम रोबोट्स में सबसे तेज गति से चलने वाली रोबोट है.

    अब वैज्ञानिकों की टीम इस काम में लगी है कि किसी तरह इसे समुद्री गहराई में गोते लगाने लायक बनाया जा सके. इसके जरिए वैज्ञानिक समुद्री प्रदूषण को खत्म करने का प्रयास करना चाहते हैं.