Category: रिसर्च

  • क्‍या पृथ्‍वी पर पानी एस्‍टरॉयड लाए? क्या है एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) ?

    क्‍या पृथ्‍वी पर पानी एस्‍टरॉयड लाए? क्या है एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) ?

    Resource

    https://iopscience.iop.org/article/10.3847/2041-8213/ac83bd

    https://www.sciencealert.com/asteroid-ryugu-reveals-ancient-grains-of-stardust-older-than-the-solar-system

    करीब 6 साल के एक जापानी अंतरिक्ष मिशन में जुटाए गए गए दुर्लभ नमूनों का विश्लेषण करने के बाद वैज्ञानिकों ने कहा है कि हमारे सौर मंडल के बाहरी किनारों से एस्‍टरॉयड्स द्वारा पानी पृथ्वी पर लाया गया हो सकता है।

    जीवन की उत्पत्ति और ब्रह्मांड के निर्माण पर रोशनी डालने के लिए रिसर्चर्स साल 2020 में एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) से पृथ्वी पर लाए गए मटेरियल की जांच कर रहे हैं।

    एक एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, 5.4 ग्राम (0.2 औंस) वजन वाली चट्टान और धूल को एक जापानी स्‍पेस प्रोब, “हायाबुसा -2′ (Hayabusa-2) ने इकट्ठा किया था। यह प्रोब उस आकाशीय पिंड पर उतरा था और उसने पिंड के सर्फेस पर एक ‘प्रभावक’ (impactor) को फायर किया था। इस मटीरियल से जुड़ी स्‍टडी प्रकाशित होने लगी हैं।

    एस्‍टरॉयड रयुगु (Asteroid Ryugu) क्या है ?

    यह सी-प्रकार के क्षुद्रग्रह 162173 रयुगु का रंगीन दृश्य है, जिसे हायाबुसा 2 के बोर्ड पर ओएनसी-टी कैमरे द्वारा देखा गया है।

    संयुक्त राज्य अमेरिका में सोकोरो, न्यू मैक्सिको के पास लिंकन लैब के ईटीएस (Lincoln Lab’s ETS ) में लिंकन नियर-अर्थ क्षुद्रग्रह अनुसंधान (Lincoln Near-Earth Asteroid Research) के साथ खगोलविदों द्वारा 10 मई 1999 को रयुगु की खोज की गई थी। इसे अनंतिम पदनाम 1999 JU3 दिया गया था | इसका व्यास लगभग 1 किलोमीटर (0.62 मील) है और यह दुर्लभ वर्णक्रमीय प्रकार Cb (rare spectral type Cb) की एक काली वस्तु है, जिसमें C-प्रकार के क्षुद्रग्रह (C-type asteroid) और B-प्रकार के क्षुद्रग्रह ((B-type asteroid)) दोनों के गुण हैं।

    28 सितंबर 2015 को माइनर प्लैनेट सेंटर (Minor Planet Center ) द्वारा आधिकारिक तौर पर क्षुद्रग्रह का नाम “रयुगु” रखा गया था।

    यह नाम रियोगो-जो (ड्रैगन पैलेस) (Ryūgū-jō (Dragon Palace) को संदर्भित करता है, जो की एक जापानी लोककथा में एक जादुई महल होता है जो पानी के नीचे स्थित होता है | इस लोक कथा में, मछुआरा उरशिमा तारो (Urashima Tarō ) एक कछुए की पीठ पर इस जादुई महल की यात्रा करता है, और जब वह वापस उस महल से लौटता है, तो अपने साथ एक रहस्यमय बॉक्स लेकर आता है, जैसे हायाबुसा 2 इस एस्‍टरॉयड के नमूनों के साथ वापस पृथ्वी पर आया था |

    हायाबुसा-2 अंतरिक्ष यान जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (Japan Aerospace Exploration Agency (JAXA) द्वारा दिसंबर 2014 में लॉन्च किया गया था और 27 जून 2018 को यह सफलतापूर्वक क्षुद्रग्रह (asteroid) पर पहुंचा। 6 दिसंबर 2020 को एक कैप्सूल एस्‍टरॉयड के samples के साथ ऑस्ट्रेलिया में लैंड हुआ ।

    एस्‍टरॉयड रयुगु से क्या पाया वैज्ञानिकों ने ?

    इस साल जून में रिसर्चर्स के एक समूह ने कहा था कि उन्हें कार्बनिक पदार्थ मिला है, जिससे पता चलता है कि पृथ्वी पर जीवन के कुछ बिल्डिंग ब्‍लॉक्‍स, अमीनो एसिड अंतरिक्ष में बने हो सकते हैं।

    नेचर एस्ट्रोनॉमी जर्नल में प्रकाशित एक नए पेपर में वैज्ञानिकों ने कहा है कि एस्‍टरॉयड ‘रयुगु’ (Ryugu) के सैंपल इस बात पर रोशनी डाल सकते हैं कि अरबों साल पहले पृथ्वी पर महासागर कैसे बने। जापान और अन्य देशों के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस अध्ययन में कहा गया है कि वाष्पशील और ऑर्गनिक रिच C-टाइप के एस्‍टरॉयड, पृथ्वी के पानी के प्रमुख सोर्सेज में से एक हो सकते हैं। उनके मुताबिक पृथ्वी पर वाष्पशील पदार्थ (ऑर्गेनिक्स और पानी) का होना अभी भी बहस का विषय है। खास बात यह है कि स्‍टडी में पहचाने गए रयुगु एस्‍टरॉयड के पार्टिकल्‍स में पाए जाने वाले कार्बनिक पदार्थ संभवत: वाष्पशील पदार्थ के एक अहम सोर्स हो सकते हैं। 

    हायाबुसा-2 को साल 2014 में लगभग 300 मिलियन किलोमीटर दूर ‘रयुगु’ एस्‍टरॉयड की ओर लॉन्‍च किया गया था। दो साल पहले ही यह पृथ्वी की कक्षा में लौटा था। नेचर एस्ट्रोनॉमी में पब्लिश हुई स्‍टडी में रिसर्चर्स ने मिशन द्वारा प्कीराप्त की गई खोजों को महत्वपुर्ण बताया है ।

  • रेडियो टेलीस्कोप का इस्‍तेमाल कर वैज्ञानिक लगायेगे ‘एलियंस’ और नये ग्रहों का पता

    रेडियो टेलीस्कोप का इस्‍तेमाल कर वैज्ञानिक लगायेगे ‘एलियंस’ और नये ग्रहों का पता

    Resource: https://www.sciencealert.com/scientists-have-found-a-new-way-to-detect-alien-worlds-beyond-our-solar-system

    बीते कुछ वर्षों में साल से वैज्ञानिकों ने अपना फोकस एक्‍सोप्‍लैनेट की ओर बढ़ा दिया है। ऐसे ग्रह जो सूर्य के अलावा अन्य तारों की परिक्रमा करते हैं उन्हें एक्सोप्लैनेट (exoplanets) कहलाते हैं। वैज्ञानिक लगातार नये ग्रहों की खोज इस उम्मीद में करते रहते है की शायद उन्‍हें वहां जीवन के संकेत मिल जाएंगे।

    एक्‍सोप्‍लैनेट को कैसे खोजा जाता है ?

    ज्‍यादातर एक्‍सोप्‍लैनेट को ट्रांजिट मेथड (transit method) द्वारा खोजा गया है। इसमें एक ऑप्टिकल टेलीस्कोप समय के साथ किसी तारे की चमक को मापता है। अगर तारे की चमक बहुत कम है, तो यह संकेत हो सकता है कि कोई ग्रह उसके सामने से गुजरा है। ट्रांजिट मेथड एक पावरफुल टूल है, लेकिन इसकी अपनी कुछ सीमाएं हैं। इसके लिए ऑप्टिकल टेलीस्‍कोप चाहिए और तारे के पास से ग्रह को गुजरना चाहिए ।

    एक्सोप्लैनेट का पता लगाने का नया मेथड

    नई मेथड खगोलविदों को रेडियो टेलीस्कोप का इस्‍तेमाल करके एक्सोप्लैनेट का पता लगाने में मदद कर सकती है। Sciencealert की रिपोर्ट के अनुसार, रेडियो तरंग दैर्ध्य (Wavelengths) पर एक्सोप्लैनेट को ऑब्‍जर्व करना आसान नहीं है। ज्‍यादातर ग्रह बहुत ज्‍यादा रेडियो लाइट उत्सर्जित नहीं करते हैं और तारे ऐसा करते हैं। हालांकि तारों से निकलने वाले फ्लेयर्स (stellar flares) के कारण रेडियो लाइट में भी अंतर हो सकता है। लेकिन बृहस्पति जैसे बड़े गैस ग्रह रेडियो ब्राइट (radio bright) हो सकते हैं। इसकी वजह इनका मजबूत चुंबकीय क्षेत्र है। बृहस्पति ग्रह की रेडियो लाइट इतनी चमकदार है कि आप इसे घर में मौजूद रेडियो टेलीस्कोप से पहचान सकते हैं।

    बृहस्पति गृह की रेडियो इमेज (Radio image of Jupiter). (Imke de Pater; Michael H. Wong, UC Berkeley; Robert J. Sault, University of Melbourne)

    एस्‍ट्रोनॉमर्स ने कई और ग्रहों से रेडियो सिग्‍नल्‍स का पता लगाया है। स्‍टडी के दौरान टीम ने यह समझने की कोशिश की कि इस तरह के सिग्‍नल कैसे हो सकते हैं। उन्होंने अपने मॉडल को मैग्नेटोहाइड्रोडायनामिक्स (MHD) पर आधारित किया। यह बताता है कि चुंबकीय क्षेत्र और आयनित गैसें कैसे आपस में इंटरेक्‍ट करती हैं। अपनी स्‍टडी को वैज्ञानिकों ने HD 189733 के रूप में पहचाने के गए ग्रह सिस्‍टम पर अप्‍लाई किया। उन्होंने सिम्‍युलेट किया कि कैसे एक तारे की हवा ने ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र इंटरेक्‍ट किया।

    वैज्ञानिकों को कई दिलचस्‍प चीजें पता चलीं। उन्‍हें पता चला कि रेडियो ऑब्‍जर्वेशन अपने तारे के सामने से गुजरने वाले किसी ग्रह के ट्रांजिशन का पता लगा सकते हैं। हालांकि ऐसे सिग्‍नल काफी फीके होंगे और उन्‍हें पकड़ने के लिए नई जेनरेशन वाले रेडियो टेलिस्‍कोप की जरूरत होगी। लेकिन अगर हम उनका पता लगाते हैं, तो ग्रहों के रेडियो सिग्नल हमें सिस्टम में कम से कम एक ग्रह का सटीक ऑर्बिटल माप देंगे। इससे एक्सोप्लैनेट की संरचना और इंटीरियर को समझने में मदद मिलेगी।

  • नासा ने खोजी 4 गुना बड़ी ‘पृथ्‍वी’, क्‍या इस ग्रह पर संभव हो पायेगा इंसानी जीवन ?

    नासा ने खोजी 4 गुना बड़ी ‘पृथ्‍वी’, क्‍या इस ग्रह पर संभव हो पायेगा इंसानी जीवन ?

    अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) ने एक नया पृथ्वी जैसा ग्रह खोजा है। यह काफी दूर हमारी आकाशगंगा के बाहरी इलाके में है। ‘रॉस 508 बी’ (ROSS 508 b) नाम के इस नए सुपर अर्थ (Super Earth) ने खगोलविदों की उम्मीदें बढ़ा दी हैं, क्‍योंकि यह अपने लाल बौने तारे के रहने योग्‍य जोन में स्थित है। पृथ्‍वी जैसे इस ग्रह की खोज में सुबारू टेलीस्कोप (Subaru Telescope) ने भूमिका निभाई जिस पर इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोग्राफ का इस्‍तेमाल करते हुए ग्रह को खोजा गया। 

    पृथ्‍वी से बाहर जीवन की मौजूदगी की बात आती है, तो एक्‍सोप्‍लैनेट (Exoplanets) सबसे बड़े संभावित उम्‍मीदवारों के रूप में नजर आते हैं । ऐसे ग्रह जो सूर्य के अलावा अन्य तारों की परिक्रमा करते हैं, एक्सोप्लैनेट कहलाते हैं। वैज्ञानिकों ने ऐसे कई एक्‍सोप्‍लैनेट को अब तक खोजा है, जो पृथ्‍वी की तरह ही चट्टानी हैं। हालांकि विस्‍तृत शोध में वहां जीवन की संभावनाएं नजर नहीं आईं, क्‍योंकि कई ग्रहों का तापमान बहुत अधिक है।

    रॉस 508 बी‘ (ROSS 508 b) को पृथ्‍वी से भी बड़ी संभावित चट्टानी दुनिया माना जा रहा है, लेकिन यह अपने रहने योग्‍य जोन से मूव कर रहा है। इसके बावजूद उम्‍मीदें बरकरार हैं, क्‍योंकि यह ग्रह अपनी सतह पर पानी को बनाए रखता है, जिससे जीवन की संभावना को बल मिलता है। नासा ने बताया है कि ‘रॉस 508 बी (ROSS 508 b)‘ एक सुपर अर्थ एक्सोप्लैनेट है। यह M-टाइप तारे की परिक्रमा करता है, जो पृथ्वी से लगभग 37 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है। इस ग्रह का द्रव्यमान 4 पृथ्‍वी के बराबर है और ग्रह को अपने तारे की एक परिक्रमा करने में 10.8 दिन लगते हैं।

    कैसे खोजते है ऐसे ग्रहों को वैज्ञानिक

    सवाल उठता है कि आखिर वैज्ञानिक उन ग्रहों को कैसे ढूंढते हैं, जो रहने लायक हो सकते हैं। इसका जवाब हैं गोल्डीलॉक्स जोन (Goldilocks Zone) या वासयोग्य क्षेत्र (Habitable Zone) ।

    ये ऐसे जोन होते हैं जिनसे होकर गुजरने वाले ग्रहों में जीवन की संभावना हो सकती है। नासा ने कहा है कि यह ऐसा ग्रह है, जो अपनी सतह पर पानी बनाए रखने में सक्षम हो सकता है और भविष्य में M क्‍लास वाले बौने तारों के आसपास जीवन की संभावना का अध्ययन करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।

    हाल में एक अध्ययन से पता चला है कि विभिन्‍न परिस्थितियों में भी कई अरबों वर्षों तक लिक्विड वॉटर, एक्सोप्लैनेट की सतह पर मौजूद रह सकता है। पृथ्वी की तरह जीवन दे सकने वाले एक्सोप्लैनेट की खोज में लिक्विड वॉटर यानी पानी की भूमिका महत्‍वपूर्ण है। बर्न यूनिवर्सिटी, ज्यूरिख यूनिवर्सिटी और नेशनल सेंटर ऑफ कॉम्पीटेंस इन रिसर्च (NCCR) के रिसर्चर्स ने समझाया है कि रहने योग्य एक्सोप्लैनेट की खोज के लिए इस दृष्टिकोण की बेहद जरूरत है।

  • रेडिएशन को रोकने के लिय पृथ्वी और सूरज के बीच बुलबुला (Space Bubbles) बनाने की तैयारी में वैज्ञानिक

    रेडिएशन को रोकने के लिय पृथ्वी और सूरज के बीच बुलबुला (Space Bubbles) बनाने की तैयारी में वैज्ञानिक

    पृथ्वी लगातार जलवायु परिवर्तन, भयानक सूखा, तूफान, हीट वेव और ग्लेशियर की वजह से समुद्री जलस्तर बढ़ने जैसे विनाश को झेल रही है और इस विनाश को रोकने के लिए एमआईटी के वैज्ञानिकों ने सूर्य और पृथ्वी के बीच ‘स्पेस बबल्स‘ बनाने का प्रस्ताव दिया है। शोधकर्ताओं की कोशिश है कि, सूरज और पृथ्वी के बीच एक विशालकाय बुलबुले (Space Bubbles) का निर्माण किया जाए, ताकि सूरज से धरती की तरफ आने वाली भयानक रेडिएशन को धरती पर पहुंचने से रोका जा सके।

    ब्राजील के आकार का बुलबुला

    वैज्ञानिकों की इस इस जियोइंजीनियरिंग के विचार के मुताबिक, ब्राजील के आकार के एक गोलाकार बुलबुले, जिसे वैज्ञानिक भाषा में इन्फ्लेटेबल बुलबुला (Inflatable Bubbles) कहा जाता है, उसका निर्माण पृथ्वी और सूर्य के बीच किया जाएगा, ताकि रेडिएशन को हमारे ग्रह से टकराने से रोका जा सकेगा। वैज्ञानिकों की टीम ने एक प्रेस रिलीज में कहा है कि, ‘हम सूरज और पृथ्वी के बीच स्पेस बबल का निर्माण करना चाहते हैं, जिसे लिक्विड सिलिकॉन (Liquid Silicon) से बनाया जाएगा और उसे विशालकाय बुलबुला बनाकर सूरज और पृथ्वी के बीच अंतरिक्ष में स्थापित कर दिया जाएगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि, ऐसा करने से सूरज से आने वाली रेडिएशन की किरणें परावर्तित हो जाएंगी और हमें अंतरिक्ष में बड़ी बड़ी फिल्म लांच करने की भी जरूरत नहीं होगी।

    क्या जलवायु परिवर्तन से निपट पायेगा यह बुलबुला  

    वैज्ञानिकों का मानना है कि, सूरज से आने वाले रेडिएशन को इस स्पेस बुलबुले के जरिए पूरी तरह से नहीं रोका जा सकता है, हां उसे रेडिएशन को कम जरूर किया जा सकता है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है, कि ये जलवायु परिवर्तन से निपटने के मौजूदा प्रयासों को रिप्लेस कर देगा। हालांकि, शोधकर्ताओं का मानना है कि, जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जो भी मौजूदा उपाए किए जा रहे हैं, उनमें से ये सबसे ज्यादा बेहतर है।

    सूरज और पृथ्वी के बीच सिलिकॉन से छाता

    अंतरिक्ष में किया गया टेस्ट शोधकर्ताओं का कहना है कि, ये एक तरह से सूरज और पृथ्वी के बीच सिलिकॉन से छाता बनाने जैसा है, जो रेडिएशन को बहुत हद तक रोक सकेगा। वहीं, एमआईटी की सेंसेबल सिटी लैब के मुताबिक, अंतरिक्ष में पृथ्वी और सूरज के बीच बुलबुले का टेस्ट किया जा चुका है और एमआईटी के वैज्ञानिकों का मानना है कि, आने वाले दिनों में सूरज के रेडिएशन को रोकने के लिए अंतरिक्ष बुलबुलों का इस्तेमाल किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि, अंतरिक्ष में किया जाने वाला ये उपाए आने वाले दिनों में काफी सुरक्षित होंगे। वैज्ञानिकों का कहना है कि, अगर हम धरती पर टकराने से पहले 1.8 प्रतिशत सौर रेडिएशन को परावर्तित कर देते हैं, तो हम आज की ग्लोबल वार्मिंग को पूरी तरह से उलट सकते हैं।

    बुलबुलों को कभी भी किया जा सकता है खत्म

    एमआईटी वैज्ञानिकों की तरफ से जारी प्रेस रिलीज में कहा गया है कि, अंतरिक्ष में पृथ्वी और सूरज के बीच जिस बुलबुले का निर्माण किया जाएगा, उसे कभी भी नष्ट किया जा सकता है। इससे सौर जियोइंजीनियरिंग समाधान पूरी तरह से प्रतिवर्ती हो जाएगा और अंतरिक्ष मलबे को काफी कम कर देगा।’ वैज्ञानिकों ने कहा कि, पृथ्वी और सूर्य के बीच का वो क्षेत्र, जहां जेम्स वेब टेलीस्कॉप स्थिति है, वहां पर अंतरिक्ष बुलबुले को रखा जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि, सूरज से निकलने वाले रेडिएशन को परावर्तित करने के लिए वो सबसे सही स्थान है।

    जेम्स अर्ली के विचारों पर आधारित है प्रयोग

    स्पेस बबल्स रिसर्च प्रोजेक्ट वैज्ञानिक जेम्स अर्ली के विचारों पर आधारित है, जिन्होंने पहले लैग्रैंगियन पॉइंट (Lagrange Point) पर एक डिफ्लेक्टिव ऑब्जेक्ट को तैनात करने का सुझाव दिया था, और खगोलविद रोजर एंजेल, जिन्होंने बबल-बेड़ा का प्रस्ताव रखा था। हालांकि जियोइंजीनियरिंग एक साइंस फिक्शन फिल्म की तरह लगती है, लेकिन इसका इस्तेमाल वास्तविक दुनिया में किया जा रहा है। पिछले साल, संयुक्त अरब अमीरात ने 122 डिग्री फ़ारेनहाइट तक के तापमान को कम करने के लिए दुबई में बारिश बनाने के लिए जियोइंजीनियरिंग का इस्तेमाल किया था। बादल का निर्माण ड्रोन तकनीक का उपयोग करके किया गया था, जिसमें बारिश करवाने के लिए बिजली का झटका दिया गया था।

    महासागरों में जियोइंजीनियरिंग का प्रस्ताव 2021 में जारी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंजीनियरिंग एंड मेडिसिन (NASEM) की एक रिपोर्ट ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए और वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को हटाने के लिए पृथ्वी के महासागरों को जियोइंजीनियरिंग करने का प्रस्ताव दिया था। इस आइडिया के तहत छोटे प्रकाश संश्लेषक के विकास को बढ़ाने के लिए उर्वरक जोड़ना, क्षारीयता को बढ़ावा देने के लिए पानी के माध्यम से विद्युत धाराओं को पारित करना और समुद्री जल के कैमिकल साइंस को बदलना शामिल है। स्कॉट डोनी, जो वर्जीनिया विश्वविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान में प्रोफेसर हैं और इस रिपोर्ट के लेखक हैं, उन्होंने एक बयान में कहा कि, ‘महासागर कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की रणनीतियों पर पहले से ही वैज्ञानिकों, गैर-सरकारी संगठनों और द्वारा चर्चा की जा रही है। संभावित जलवायु प्रतिक्रिया रणनीतियों के रूप में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है’।

  • Electric Planes – भविष्य का हवाई जहाज – बिना तेल के चलने वाला विमान

    Electric Planes – भविष्य का हवाई जहाज – बिना तेल के चलने वाला विमान

    अंतरिक्ष पर्यटन (Space Tourism) के साथ अब विमानन (Aviation) के क्षेत्र में क्रांतिकारी आविष्कारों की तैयारी हो रही है| कई कंपनियां आधुनिक तकनीक से युक्त विमान विकसित कर रही हैं जो जीवाश्वम ईंधन पर नहीं बल्कि इलेक्ट्रिक मोटर (Electric Motors) की ताकत के जरिए उड़ सकेंगे | कुछ कंपनियां तो इस दशक में ही इस तरह के विमानों का व्यवसायिक उपयोग शुरू करने की योजना बना रहे हैं |

    दुनिया में अभी अंतरिक्ष पर्यटन  की बातें तो होने लगी हैं | अंतरिक्ष अनुसंधानकर्ता ऐसा रॉकेट विकसित करने में लगे हैं  जिससे लोगों को अंतरिक्ष में पहुंचाने की लागत बहुत कम हो सके | इस लिहाज से देखा जाए तो हमारा विमानन या उड्डयन (Aviation) का क्षेत्र भी पीछे नहीं रहा हैं | विशेषज्ञ विमान तकनीक में नए नवाचारों पर काम रहे हैं जिसमें व्यवसायिक विद्युतीय विमानन (Electrical Aviation) भी शामिल है |

    इनमें से फैराडेयर एविएशन (Faradair Aviation) का हाइब्रिड इलेक्ट्रिक यात्री विमान (Hybrid Electric Passenger Plane), राइट इलेक्ट्रिक का विमान (Wright Electric is an American startup company developing an electric airliner), इजराइल का  ईविएशन का एलिस (Eviation Alice), जैसे विमानों पर काम चल रहा है| फैराडेयर कंपनी एक हाइब्रिड-इलेक्ट्रिक विमान की अवधारणा विकसित कर रही है जो क्षेत्रीय उड़ान विकास में बाधा डालने वाली तीन मुख्य समस्याओं (संचालन लागत(Operation Costs), उत्सर्जन (Emissions ), शोर (Noise) को हल करती है।

    फैराडेयर का विमान (Faradair’s plane)

    यूके में एक स्टार्टअप इसी व्यवसायिक इलेक्ट्रिफाइट एविएशन पर काम कर रहा है| क्षेत्रीय विमानन बाजार को देखते हुए फैराडेयर एविएशन कंपनी एक हाइब्रिड इलेक्ट्रिक यात्री विमान को विकसित पर बेचने की योजना पर काम कर रही है| इसमें 19 सीटें होंगी और इसके पंखों को चलाने के ले इलेक्ट्रिक मोटर ही काफी होगी| इसके लिए जरूरी बिजली एक छोटे से गैसे टर्बाइन से आएगी|

    विमान की विशेषता

    इतना ही नहीं अतिरिक्त उठाव के लिए और छोटी हवाई पट्टी पर उड़ान भरने और उतरने के लिए भी इन विमानों में त्रिस्तरीय पंख होंगे इनसे शानदार एरोडायनामिक्स होने के बाद भी वे वर्ल्ड वार वन फाइटर प्लेन के जैसे दिखाई देते हैं| कंपनी के प्रमुख नील क्लॉग्ले का दावा है कि ऐसे विमानों में परम्परागत प्रोपेलर की तुलना में हिलने वाले कम पुर्जे होंगे| इससे वह सस्ता होने के साथ ज्यादा शांत और कम उत्सर्जन पैदा करने वाला विमान होगा|

    विमानों का उपयोग

    इस तरह के किफायती विमानों पर काम केवल यात्रियों के लिए ही नहीं बल्कि माल ढोने वाले विमानों पर भी चल रहा है| ऐसे विमान रेलवे लाइन बिछाने या सड़क बनाने के खर्चे को भी बचा सकते हैं| फैराडेयर 2025 तक इस तरह के विमान की उड़ान शुरू कर सकता और 2027 से उनका व्यवसायिक उपयोग भी शुरू हो जाएगा|

    कैलिफोर्निया की राइट इलेक्ट्रिक (Wright Electric) का plane

    लेकिन इस क्षेत्र में केवल फैराडेयर ही अकेली कंपनी नहीं है| कैलिफोर्निया की राइट इलेक्ट्रिक भी 100 सीटों वाला पूरी तरह से इलेक्ट्रिक एयरक्राफ्ट बनाने की तैयारी में है और इस सदी के मध्य में लोगों को उपलब्ध कराने की भी तैयारी कर रही है| यह विमान वर्तमान बे146 पर आधारित होगा जिसके टर्बोफैन इंजन की जगह इलेक्ट्रिक मोटर होंगी| कंपनी की ईजीजेट से साझेदारी भी होगी और यह लंदन –पेरिस, न्यूयॉर्क वॉशिंगटन या हॉन्गकॉन्ग ताईपेई के बीच एक घंटे वाली उड़ान भी मुहैया कराएगी|

    हाइब्रिड से इलेक्ट्रिक तक का सफ़र

    ये विमान अभी हाइब्रिट विमान की तरह ही होंगे जिसमें केवल चार इंजन को ही इलक्ट्रिक मोटर से बदला जाएगा| और बाकियों को सफल परीक्षणों के बाद ही बदला जाएगा| कंपनी का कहना है कि इससे ग्राहकों में एक विश्वास विकसित करने में मदद मिलेगी| कार उद्योग भी इस तरह से बदलाव ला रहा है| लेकिन विमानन में बैटरी का उपयोग एक बड़ी चुनौती है|

    इजराली ईविएशन कंपनी का विमान

    इजराइल की एक कंपनी ईविएशन एक नौ सीटों वाला विमान विकसित कर रही है|  छोटी श्रेणी का यह विमान कई सालों से विकसित किया जा रहा है| इसे 600 मील तक की उड़ान के लिए डिजाइन किया गया है और यह पूरी तरह से इलेक्ट्रिक है| वहीं विशाल हाइब्रिड विमान 500 किलोमीटर की दूरी तय कर सकेंगे|

    यूरोपीय विमानन कंपनी एयरबस ने 2017 वमें अपने प्रोटोटाइप हाइब्रिड विमान ई-फैन एक्स पर काम करना शुरू किया था| यह राइट इलेक्ट्रिक्स के BAe 146 पर आधारित था| लेकिन तीन साल बाद इस कार्यक्रम को रद्द कर दिया गया| इसके अलावा एयर बस हाइड्रोजन ऊर्जा के उपयोग पर भी काम कर रही है| कंपनी की टीम क्रायोजेनिक और सुपरकंडक्टिंग तकनीकों पर काम रही हैं| कंपनी का लक्ष्य साल 2035 तक हाइड्रोजन आधारित व्यवसायिक उड़ान भरने का है|

  • चीनी रिसर्चर्स जानबूझकर करेगे अंतरिक्ष यान को एस्‍टरॉयड के साथ दुर्घटनाग्रस्त

    चीनी रिसर्चर्स जानबूझकर करेगे अंतरिक्ष यान को एस्‍टरॉयड के साथ दुर्घटनाग्रस्त

    एस्‍टरॉयड्स (asteroids) का पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने के लिए चीनी रिसर्चर्स एक नई मेथड पर काम कर रहे हैं। इस मेथड के तहत 20 से ज्‍यादा बड़े एंटीना को मिलाकर एक सारणी (Array) बनाई जा रही है, ताकि एस्‍टरॉयड्स से सिग्‍नलों को बाउंस किया जा सके। प्रोजेक्‍ट का नाम चाइना फुयान अंग्रेजी में – कंपाउंड आई है, जिसे बीजिंग इंस्टि‍ट्यूट ऑफ टेक्‍नॉलजी लीड कर रहा है। इस मेथड को सितम्बर 2022 में टेस्‍ट किया जाना है l

    इसके अलावा, अप्रैल में ग्‍लोबल टाइम्‍स ने बताया था कि देश की अंतरिक्ष एजेंसी एक नया मॉनिटरिंग और डिफेंस सिस्‍टम विकसित कर रही है। इसकी टेस्टिंग जानबूझकर एक अंतरिक्ष यान को एस्‍टरॉयड के साथ दुर्घटनाग्रस्त करके की जाएगी। रिपोर्टों में आगे कहा गया है कि नया मिशन 2025 की शुरुआत में एक खतरनाक एस्‍टरॉयड की कक्षा बदलने और उस पर अटैक करने के लिए लॉन्‍च किया जाएगा।

    चीनी रिसर्चर्स के एस्‍टरॉयड्स (asteroids)  पर किये गये इस मेथड से यह जाननें में मदद मिलेगी कि स्‍पेस रॉक का कोई विशाल टुकड़ा पृथ्वी के लिए खतरा तो नहीं है। इस मेथड के तहत 20 से ज्‍यादा बड़े एंटीना को मिलाकर एक सारणी (array) बनाई जा रही है, ताकि एस्‍टरॉयड्स से सिग्‍नलों को बाउंस किया जा सके और निर्धारित किया जा सके कि वे हमारे ग्रह को प्रभावित कर सकते हैं या नहीं। इस प्रोजेक्‍ट में कुछ चीनी विश्वविद्यालय शामिल हैं। इसके बारे में सबसे पहले डिटेल चीन के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के ऑफ‍िशियल न्‍यूज पेपर- साइंस एंड टेक्‍नॉलजी डेली में पब्लिश हुई थी। 

    चीन के मंत्रालय के अनुसार, इस प्रोजेक्‍ट का नाम चाइना फुयान अंग्रेजी में – कंपाउंड आई है और इस प्रोजेक्‍ट को बीजिंग इंस्टि‍ट्यूट ऑफ टेक्‍नॉलजी लीड कर रहा है। सिग्नल बाउंसिंग के लिए चुने गए एस्‍टरॉयड पृथ्वी से 93 मिलियन मील (150 मिलियन किलोमीटर) की दूरी पर मौजूद रहेंगे। 

    स्‍पेसडॉटकॉम की रिपोर्ट के अनुसार, प्रोजेक्‍ट के तहत दो एंटीना दक्षिणी चीन के चोंगकिंग में एक साइट पर बनाए गए हैं इस एंटीना का व्‍यास 82 से 98 फीट होगा।  । सितंबर में इन्‍हें टेस्‍ट किया जाएगा। टेस्टिंग अगर सफल रहती है, तो उसके बाद इन्‍हें शुरू कर दिया जाएगा।

    बीजिंग इंस्टि‍ट्यूट ऑफ टेक्‍नॉलजी के प्रेसिडेंट लॉन्ग टेंग ने ग्लोबल टाइम्स को बताया कि यह प्रोजेक्‍ट देश की उन जरूरतों को पूरा करेगा, जिनमें पृथ्‍वी के नजदीकी इलाके की सुरक्षा और एस्‍टरॉयड के निर्माण से जुड़े शोध शामिल हैं। रिसर्चर ने कहा कि यह सिस्‍टम को पृथ्वी की कक्षा में उपग्रहों और मलबे को ट्रैक करने के लिए भी लागू किया जा सकता है। 

  • क्या सोते समय हमारा दिमाग काम नही करता है ?

    क्या सोते समय हमारा दिमाग काम नही करता है ?

    नेचर न्यूरोसाइंस (Nature Neuroscience) में प्रकाशित हुए शोध के मुताबिक,  जब हम सोते हैं तो हमारी चेतना की एक खासियत काम करना बंद कर देती है |

    जब हम सपने देखते हैं, तो हमारे दिमाग में कुछ रहस्यमय चीजें होती हैं. ऐसा लगता है जैसे हम जाग रहे हों, लेकिन यह स्थिति जागने से काफी अलग होती है. वैज्ञानिक इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि इन दोनों स्थितियों के बीच क्या होता है. अब एक और सुराग मिला है |

    चेतना (Consciousness) की एक खास विशेषता होती है – आवाजों को पहचानने की क्षमता. एक नए अध्ययन से पता चला है कि सोते समय हमारी यह क्षमता काम करना बंद कर देती है. इससे हमें यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि हमारा दिमाग सपने कैसे देखता है |

    https://www.sciencealert.com/we-lose-one-crucial-feature-of-consciousness-while-we-re-asleep

    मिर्गी के रोगियों ने की शोध में मदद

    लोगों के जागते और सोते समय उनके दिमाग की मैपिंग (Brain Mapping) करना आसान नहीं होता. इसलिए शोधकर्ताओं ने मिर्गी के रोगियों (Epilepsy patients) पर की जा रही रिसर्च का सहारा लिया |

    इज़राइल की तेल अवीव यूनिवर्सिटी (Tel Aviv University, Israel) के न्यूरोसाइंटिस्ट युवल नीर (Yuval Nir) का कहना है कि उन्हें ऐसे खास मेडिकल प्रोसीज़र की मदद मिली जिसमें मिर्गी के रोगियों के दिमाग में इलेक्ट्रोड लगाए गए थे और इलाज के लिए उनके दिमाग के अलग-अलग हिस्सों में हो रही गतिविधियों को मॉनिटर किया गया था |

    8 साल तक चला शोध

    नीर ने कहा कि मरीजों ने सोते और जागते समय, सुनने की स्थिति (Auditory stimulation) पर दिमाग की प्रतिक्रिया जानने में शोधकर्ताओं की मदद की | अब, इलेक्ट्रोड की मदद से, शोधकर्ता नींद की अलग-अलग अवस्थाओं और जागते हुए, सेरिब्रल कॉर्टेक्स (Cerebral cortex) की प्रतिक्रिया में अंतर देख पा रहे थे. रिसर्च के लिए, शोधकर्ताओं ने मरीज़ों को सोते समय स्पीकर से अलग-अलग तरह की आवाज़ें सुनाईं. यह शोध करीब आठ सालों तक चला | इस दौरान करीब 700 से ज़्यादा न्यूरॉन्स का डेटा इकट्ठा किया गया |

    शोधकर्ताओं ने पाया कि नींद के दौरान भी मरीज़ों का दिमाग आवाजों के प्रति प्रतिक्रियाएं देता रहा. ध्यान और अपेक्षा से जुड़ी वेव्स, अल्फा-बीटा वेव्स (Alpha-beta waves) का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया | इसका मतलब था कि मरीजों के दिमाग ने आने वाली आवाजों का विश्लेषण तो किया, लेकिन दिमाग ने उस विश्लेषण के नतीजे, चेतना को नहीं भेजे. पहले ये माना जाता था कि नींद के दौरान, आवाजों से जुडे संकेत, दिमाग में बहुत जल्दी खत्म हो जाते हैं. जबकि इस शोध से पता चला है कि ये वास्तव में ज़्यादा मजबूत बने रहते हैं |

    अल्फा-बीटा वेव्स के पैटर्न में बढ़ोतरी वाला बदलाव पहले उन मरीज़ों में भी देखा गया था जिन्हें एनेस्थीसिया दिया गया था |

    इससे वैज्ञानिकों को ये मापने का एक विश्वसनीय तरीका भी मिलता है कि मरीज कोमा में या ऑपरेशन के दौरान वास्तव में बेहोश है या नहीं |

  • क्या है पृथ्‍वी के अंदर मौजूद ‘रहस्यमयी’ ब्लाब (Blob) – माउंट एवरेस्ट से 100 गुना लंबी चट्टानी परत

    क्या है पृथ्‍वी के अंदर मौजूद ‘रहस्यमयी’ ब्लाब (Blob) – माउंट एवरेस्ट से 100 गुना लंबी चट्टानी परत

    Nature Communications and research में प्रकाशित हुई रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिकों ने पृथ्‍वी के अंदर मौजूद ‘रहस्यमयी’ ब्लाब (Blob) की इमेज बनाकर उसे समझने की कोशिश की है। ब्लाब, हमारी पृथ्वी के क्रस्‍ट और उसके कोर के बीच चट्टान की गर्म मोटी परत है। ठोस होने के बावजूद यह धीरे-धीरे बहती रहती है। वैज्ञानिकों ने कहा है कि से इमेजेस भूकंप विज्ञान (Seismology) में ‘मील का पत्थर’ साबित हो सकती हैं।

    हमारे ब्रह्मांड में कई ऐसे रहस्‍य हैं, जिनकी तह तक जाने के लिए वैज्ञानिक दिन-रात जुटे हुए हैं। रहस्‍यों से घिरी तो हमारी पृथ्‍वी भी है। वैज्ञानिकों ने इसके अंदर मौजूद ‘रहस्यमयी’ ब्लाब की इमेज बनाकर उसे समझने की कोशिश की है। ब्लाब, हमारी पृथ्वी के क्रस्‍ट और उसके कोर के बीच चट्टान की गर्म मोटी परत है। ठोस होने के बावजूद यह धीरे-धीरे बहती रहती है। बताया जाता है कि ये ब्‍लाब, माउंट एवरेस्ट से 100 गुना लंबे हैं रिसर्चर्स की एक टीम मानती है कि यह सब थिया (Theia) के अवशेष हैं थिया एक एक प्रोटोप्लैनेट था, जो पृथ्‍वी से टकराया था

    वैज्ञानिक आमतौर पर मानते हैं कि ये ब्‍लाब, टेक्टोनिक प्लेटों के मूवमेंट से जुड़े हैं, लेकिन इनमें बदलाव ने वैज्ञानिकों को हैरान किया है। वैज्ञानिकों ने इन्‍हें ‘आकर्षक और जटिल’ कहा है। बताया है कि वह उनके बारे में और ज्‍यादा समझने की कोशिश कर रहे हैं। ये इमेजेस नेचर कम्युनिकेशंस में पब्लिश एक स्‍टडी का हिस्सा हैं। इस स्‍टडी में सर्कुलर अंडरग्राउंड पॉकेट पर फोकस किया गया है, जिसे हवाई के नीचे मौजूद अल्ट्रा-लो वेग जोन कहा जाता है। अब वैज्ञानिकों ने कहा है कि से इमेजेस भूकंप विज्ञान में ‘मील का पत्थर’ साबित हो सकती हैं।

    मिरर यूके की रिपोर्ट के अनुसार, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के जियोफ‍िजिसिस्‍ट, ज़ी ली ने कहा कि पृथ्वी के सभी डीप इंटीरियर फीचर्स में ये सबसे आकर्षक और जटिल हैं। हमें पृथ्‍वी की आंतरिक संरचना दिखाने के लिए पहला ठोस सबूत मिल गया है, जो भूकंप विज्ञान के लिए मील का पत्थर है। इन इमेजेस को बेहतर बनाने के लिए वैज्ञानिक लंबे वक्‍त से कोशिश कर रहे थे। उन्‍होंने कई इंस्‍ट्रूमेंट्स इस्‍तेमाल किए, लेकिन इमेजेस बेहतर नहीं बनीं। पृथ्वी की सतह से दूरी ने इसे चुनौतीपूर्ण काम बना दिया था।

    लेकिन इस बार इमेजेस को कंप्यूटर मॉडलिंग द्वारा तैयार किया गया है। इसके लिए डेटा को पृथ्वी की लेयर्स के जरिए भेजे गए सिग्‍नल्‍स से लिया गया है। इन सिग्‍नल रेस्‍पॉन्‍स के जरिए वैज्ञानिक यह समझ पाए हैं कि यह ब्लाब लगभग एक किलोमीटर साइज का है। इस महीने की शुरुआत में एक और स्‍टडी ने यह अनुमान लगाया था कि पृथ्‍वी के केंद्र के महाद्वीपों के साइज के कुछ बड़े ब्‍लाब हैं।

    बताया जाता है कि ये ब्‍लाब, माउंट एवरेस्ट से 100 गुना लंबे हैं और वैज्ञानिकों को इस बारे में बहुत कम जानकारी है कि वे वहां क्यों मौजूद हैं। रिसर्चर्स की एक टीम अब यह मानती है कि यह सब थिया (Theia) के अवशेष हैं। थिया एक एक प्रोटोप्लैनेट था, जो 4.5 मिलियन साल पहले पृथ्वी से टकराया था। इसी की वजह से चंद्रमा का निर्माण हुआ था। रिपोर्ट के अनुसार, ये ब्‍लाब पश्चिमी अफ्रीका और प्रशांत महासागर के नीचे स्थित हैं और कई दशकों से भूकंप विज्ञानियों को भ्रमित कर रही हैं।

    कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी की स्‍टडी में भाग लेने वाले वैज्ञानिकों में से एक सुजॉय मुखोपाध्याय ने कहा कि अगर यह चीजें वाकई में पुरानी हैं, तो यह हमें बताती हैं कि हमारे ग्रह का निर्माण कैसे हुआ।

  • भूमिगत तेल/ गैस निकालने हेतु विशेष पॉलिमर विकसित

    भूमिगत तेल/ गैस निकालने हेतु विशेष पॉलिमर विकसित

    भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर के शोधकर्ताओं की टीम ने “स्पेशलिटी फ्रिक्शन रेड्यूसर” पॉलिमर विकसित किए हैं, जो भूमिगत कुओं से तेल निकालने में मदद कर सकते हैं |

    • इस प्रकार का पॉलिमर पहली बार तैयार किया गया है। यह पॉलिमर एक्रिलामाइड आधारित पॉलिमर है।
    • एक्रिलामाइड एक प्रकार का रसायन है। ये पॉलिमर सुनिश्चित करते हैं कि भूमिगत तेल को बाहर निकालते समय घर्षण कम से कम हो, जिससे तेल को आसानी से निकाला जा सके।

    पिछले दशक के बाद से वैश्विक तेल और गैस उद्योग भूमिगत तेल निकालने के लिए फ्रैकिंग जैसे नए तरीकों पर तेजी से भरोसा कर रहा है। लेकिन कई स्थान ऐसे है जहां ड्रैग रिडक्शन के अधिक होने के कारण और तरल पदार्थो के प्रवाह गुणों के कारण तेल निकालना बेहद मुश्किल हो जाता है।

    • फ्रैकिंग वह प्रक्रिया है जिसमें जमीन की नीचे से जरूरी तेल रसायन एवं गैस को बहुत ज्यादा दबाव देकर निकाला जाता है।
    • ड्रैग रिडक्शन एक ऐसी भौतिक प्रक्रिया है, जिसके कारण घर्षण कम हो जाता है और द्रव प्रवाह बढ़ जाता है।