Category: फ़िजिक्स

  • तड़ित चालक (Lightning Conductor) क्या है ?

    तड़ित चालक (Lightning Conductor) क्या है ?

    What is Lightning Conductor ?

    तड़ित चालक दो आवेशित बादलों के बीच या आवेशित बादलों व पृथ्वी के बीच होता है। तड़ित चालक का प्रयोग तड़ित के दौरान बहुत ऊंचे भवनों की सुरक्षा के लिए किया जाता है। तड़ित चालक एक मोटी तांबे की पट्टी होती है। जिसके ऊपरी सिरे पर कई नुकीले सिरे बने होते हैं। इस नुकीले सिरे को भवनों के सबसे ऊपर के भाग पर लगा दिया जाता है तथा दूसरे सिरे को तांबे की पट्टी के साथ जमीन में गाड़ दिया जाता है।

    जब आवेशित बादल भवन के ऊपर से गुजरते हैं तो उनका आवेश तड़ित चालक के नुकीले भाग द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है तथा यह आवेश कुछ तो संवहन धाराओं द्वारा वायु में वितरित कर दिया जाता है और कुछ भवन को बिना किसी नुकसान के जमीन में स्थानान्तरित कर दिया जाता है। इस प्रकार भवनों की तड़ित से सुरक्षा हो जाती है।

  • विद्युत एवं उसके प्रभाव (Electricity and its Effects) क्या है ?

    विद्युत एवं उसके प्रभाव (Electricity and its Effects) क्या है ?

    What are Electricity and its Effects ?

    विद्युत वह ऊर्जा है जिसके कारण किसी पदार्थ में हल्की वस्तुओं को आकर्षित करने का गुण उत्पन्न हो जाता है

    दो वस्तुओं को आपस में रगड़ने से उत्पन्न विद्युत को ‘घर्षण विद्युत’ (Frictional electricity) कहते हैं। यदि पदार्थ में उत्पन्न हुई इस विद्युत को स्थिर रखा जाए (अर्थात् बहने नहीं दिया जाए) तो इसे ‘स्थिर-विद्युत‘ भी कहते हैं।

    विद्युत आवेश’ (Electric charge)

    स्थिर-विद्युत दो प्रकार की होती है। यदि कांच की छड़ को रेशम से रगड़कर विद्युत उत्पन्न की जाए तो कांच में धनात्मक विद्युत तथा रेशम में ऋणात्मक विद्युत उत्पन्न होती है। इसी प्रकार जब ऊनी कपड़े को ऐम्बर, एबोनाइट, प्लास्टिक या रबड़ से रगड़कर विद्युत उत्पन्न की जाती है, तो प्लास्टिक, आदि में ऋणात्मक विद्युत और ऊन में उतनी ही धनात्मक विद्युत उत्पन्न होती है। इसी प्रकार जब बिल्ली की खाल को एबोनाइट छड़ से रगड़ते हैं, तो खाल धनावेशित तथा छड़ ऋणावेशित हो जाती है। विद्युत ऊर्जा की मात्रा (Quantity of electricity) को ‘विद्युत आवेश’ (Electric charge) कहते हैं।

    समान प्रकार के (अर्थात् धन-धन या ऋण-ऋण) आवेश परस्पर प्रतिकर्षित करते हैं तथा विपरीत प्रकार के (Unlike) आवेश परस्पर आकर्षित करते हैं ।

    विद्युत-आवेश के मूलस्रोत प्रोटॉन तथा इलेक्ट्रॉन

    प्रत्येक पदार्थ परमाणुओं से बना होता है। परमाणु के भीतर धनावेशित मूल कण प्रोटॉन, ऋणावेशित मूल कण इलेक्ट्रॉन तथा आवेशरहित मूल कण न्यूट्रान होते हैं। किसी भी वस्तु में प्रोटॉनों तथा इलेक्ट्रॉनों की संख्या बराबर होती है। यदि किसी वस्तु से कुछ इलेक्ट्रॉन बाहर निकाल दिए जाएं तो वस्तु में प्रोटॉनों की संख्या इलेक्ट्रॉनों की संख्या से अधिक हो जाएगी। इससे वस्तु धनावेशित हो जाएगी। वस्तु में यदि कुछ इलेक्ट्रॉन बाहर से दे दिए जाएं तो वस्तु में इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रोटॉनों की संख्या से अधिक हो जाएगी। इससे वस्तु ऋणावेशित हो जाएगी। इससे यह स्पष्ट हो गया, कि विद्युत-आवेश के मूलस्रोत प्रोटॉन तथा इलेक्ट्रॉन हैं। ये वस्तु में ही विद्यमान रहते हैं ।

    प्रयोगों से पता चलता है, कि जब किसी धातु के खोखले चालक पदार्थ को स्थिर-विद्युत से आवेशित किया जाता है, तो विद्युत आवेश चालक की केवल बाहरी सतह पर ही स्थित होता है, चालक के अन्दर नहीं। उसका अन्दर का भाग बिल्कुल आवेश रहित हो जाता है। यही कारण है, कि यदि किसी कार पर तड़ित विद्युत (Lightning) गिर जाए तो कार के अन्दर बैठे हुए व्यक्ति पूर्ण सुरक्षित रहते हैं। तड़ित से प्राप्त विद्युत आवेश कार की बाहरी सतह पर ही रहता है ।

  • भू-चुम्बकत्व (Terrestrial Magnetism) क्या है ?

    भू-चुम्बकत्व (Terrestrial Magnetism) क्या है ?

    What is Terrestrial Magnetism ?

    किसी स्थान पर पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को तीन तत्वों (Element) द्वारा व्यक्त किया जाता है:

    दिक्पात् कोण (Angle of declination), नमन कोण (Angle of dip) तथा चुम्बकीय क्षेत्र का क्षतिज घटना (Horizontal component of earth’s magnetic field)

    दिक्पात् कोण (Angle of declination)

    किसी स्थान पर भौगोलिक याम्योत्तर (Meridian) तथा चुम्बकीय याम्योत्तर के बीच के कोण को ‘दिक्पात् कोण’ कहते हैं।

    नमन कोण (Angle of dip)

    किसी स्थान पर पृथ्वी का सम्पूर्ण चुम्बकीय क्षेत्र क्षैतिज तल के साथ जितना कोण बना है उसे उस स्थान का ‘नमन कोण’ कहते हैं। पृथ्वी के ध्रुवों पर नमन कोण मान 90° तथा विषुवत् रेखा पर 0° होता है।

    चुम्बकीय क्षेत्र का क्षतिज घटना (Horizontal component of earth’s magnetic field)

    पृथ्वी के चम्बकत्व का ठीक कारण अभी ज्ञात नहीं है परन्तु विश्वास किया जाता है, कि पृथ्वी के अन्दर अत्यधिक ताप होने के कारण वहां लोहा, आदि धातुएं पिघली अवस्था में होती हैं। जब पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है, तो इन पिघली हुई वस्तुओं में संवहन धाराएं उत्पन्न होती हैं जिसके कारण चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है।

  • क्यूरी ताप (Curie Temperature) क्या है ?

    क्यूरी ताप (Curie Temperature) क्या है ?

    What is Curie Temperature ?

    जब किसी लौहचुम्बकीय पदार्थ को गरम किया जाता है, तो एक ऐसा ताप आता है जब उसका लौहचुम्बकत्व अनुचुम्बकत्व में बदल जाता है। इस ताप को ‘क्यूरी ताप‘ कहते हैं।

    लोहा और निकिल के लिए क्यूरी ताप के मान क्रमश: 770°C तथा 358°C होते हैं।

    नर्म लोहे के विपरीत स्टील (फौलाद या इस्पात) कठिनता से चुम्बक बनता है और कठिनता से ही अपने चुम्बकत्व को छोड़ता है। अतः स्थायी चुम्बक बनाने के लिए स्टील का उपयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए, लाउडस्पीकर, दिक्सूचक, गैल्वेनोमीटर, आदि के स्थायी चुम्बक स्टील के ही बन जाते है l

  • चुम्बकीय बल और चुम्बकीय बल रेखाओं के गुण क्या है ?

    चुम्बकीय बल और चुम्बकीय बल रेखाओं के गुण क्या है ?

    What are the magnetic force and properties of magnetic force lines ?

    चुम्बकीय बल-रेखाएं सदैव चुम्बक के उत्तरी ध्रुव से निकलती हैं तथा वक्र बनाती हुई दक्षिणी ध्रुव में प्रवेश करती हैं और चुम्बक के अन्दर से होती हुई पुनः उत्तरी ध्रुव पर वापस आती है। इस प्रकार चुम्बकीय बल-रेखाएं बन्द वक्र के रूप में होती हैं। [विस्तृत जानकारी के लिए चुम्बकत्व टॉपिक पढ़े ]

    दो बल-रेखाएं एक-दूसरे को कभी नहीं काटती।

    चुम्बक के ध्रुव के समीप जहां चुम्बकीय क्षेत्र प्रबल होता है, वहां बल-रेखाएं पास-पास होती हैं। ध्रुव से दूर जाने पर चुम्बकीय क्षेत्र की प्रबलता घटती जाती है तथा बल-रेखाएं भी परस्पर दूर-दूर होती है।

    एक समान चुम्बकीय क्षेत्र की बल-रेखाएं परस्पर समानांतर एवं बराबर-बराबर दूरियों पर होती है।

    चुम्बकीय क्षेत्र में बल-रेखाएं के काल्पनिक रेखाएं हैं जो उस स्थान में चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा का अविरत प्रदर्शन करती है।

    चुम्बकीय बल-रेखा के किसी भी बिन्दु पर खींची गई स्पर्श रेखा उस बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा को प्रदर्शित करती है।

    चुम्बकशीलता

    जब एक समान चुम्बकीय क्षेत्र में नर्म लोहे की छड़ रखी जाती है, तो छड़ के भीतर चुम्बकीय बल-रेखाओं की सघनता बाहर की अपेक्षा बढ़ जाती है। इसके विपरीत जब इसी चुम्बकीय क्षेत्र में ऐलुमिनियम को छड़ रखी जाती है, तो छड़ के भीतर चुम्बकीय बल-रेखाओं की सघनता बाहर की अपेक्षा कम हो जाती है। पदार्थ के इस गुण को जिसके कारण उसके भीतर चुम्बकीय बल-रेखाओं की सघनता बढ़ या घट जाती है ‘चुम्बकशीलता‘ कहते हैं।

    चुम्बकीय बल-रेखाएं निर्वात में से होकर भी गुजरती हैं। अत: निर्वात में भी चुम्बकशीलता का गुण होता है।

    चुम्बकीय बल लगाकर लोहा, ऐलुमिनियम, आदि पदार्थों को चुम्बकीय किया जा सकता है।

    नर्म लोहा शीघ्र ही चुम्बक बन जाता है और शीघ्र ही इसका चुम्बकत्व समाप्त भी हो जाता है। इसीलिए अस्थायी चुम्बक (Temporary magenet) बनाने के लिए नर्म लोहे का प्रयोग किया जाता है। विद्युत चुम्बक नर्म लोहे के ही बनाए जाते हैं।

    विद्युत घण्टी, ट्रांसफॉर्मर क्रोड, डायनेमों, आदि में नर्म लोहे का ही उपयोग किया जाता है।

  • चुम्बकत्व (Magnetism) क्या है ?

    What is Magnetism ?

    पदार्थ का वह विशिष्ट गुण जिसके कारण वह लौह-चूर्ण एवं लोहे के छोटे-छोटे टुकड़े को आकर्षित करता है और स्वतन्त्र रूप से लटकाए जाने पर जिसके सिरे उत्तर-दक्षिण दिशा में स्थिर हो जाते हैं, उसे ‘चुम्बकत्व‘ कहते हैं।

    लौह चूर्ण का चुम्बक द्वारा आकर्षण चुम्बक के सिरों के समीप सबसे अधिक होता है।

    प्राकृतिक एवं कृत्रिम चुम्बक (Natural and Artificial Magnets)

    प्रकृति में लोहा और ऑक्सीजन का एक विशेष यौगिक धातु-खनिज या अयस्क के रूप में पाया जाता है जिसे मैग्नेटाइट कहा जाता है। मैग्नेटाइट के टुकड़ों को प्राकृतिक चुम्बक कहा जाता है। इसमें लोहे के टुकड़ों को आकर्षित करने तथा उत्तर दक्षिण दिशा का संकेत देने का गुण होता है। इसकी कोई निश्चित आकृति नहीं होती। कुछ पदार्थों को कृत्रिम विधियों द्वारा चुम्बक बनाया जा सकता है, इन्हें कृत्रिम चुम्बक कहते हैं इनकी लोहे के टुकड़ों को आकर्षित करने की शक्ति, प्राकृतिक चुम्बकों की अपेक्षा कहीं अधिक होती है।

    चुम्बकत्व

    चुम्बक लोहे को अपनी ओर आकर्षित करता है। इस गुण को ‘चुम्बकत्व’ कहते हैं। चुम्बक के सिरों के समीप चुम्बकत्व सबसे अधिक होता है तथा मध्य की ओर कम होता जाता है। चुम्बक के ठीक मध्य में चुम्बकत्व नहीं होता। चुम्बक के सिरों पर जिन क्षेत्रों में चुम्बकत्व सबसे अधिक होता है वे क्षेत्र चुम्बक के ‘ध्रुव’ (Poles) कहलाते हैं।

    उत्तरी ध्रुव (North pole) और दक्षिणी ध्रुव (South pole)

    चुम्बक को क्षैतिज तल में स्वतन्त्रतापूर्वक लटकाने पर उसका एक ध्रुव सदैव उत्तर की ओर तथा दूसरा ध्रुव सदैव दक्षिण की ओर ठहरता है। उत्तर की ओर ठहरने वाले ध्रुव को उत्तरी ध्रुव’ (North pole) तथा दक्षिण की ओर ठहरने वाले ध्रुव को ‘दक्षिणी ध्रुव’ (South pole) कहते हैं।

    चुम्बक के दोनों ध्रुवों को मिलाने वाली रेखा को ‘चुम्बकीय अक्ष’ (Magnetic axis) कहते हैं।

    दो चुम्बकों के विजातीय ध्रुव (उत्तर-दक्षिणी) एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं तथा सजातीय ध्रुव (उत्तर-उत्तरी अथवा दक्षिण-दक्षिणी) एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं।

    चुम्बकीय प्रेरण (Magnetic Induction)

    चुम्बक चुम्बकीय पदार्थों में प्रेरण (Induction) द्वारा चुम्बकत्व उत्पन्न कर देता है। यदि हम नर्म लोहे की छड़ को किसी शक्तिशाली चुम्बक के एक ध्रुव के समीप लाएं तो वह छड़ भी एक चुम्बक बन जाती है। छड़ के उस सिरे पर जो चुम्बक के ध्रुव के समीप है, विजातीय ध्रुव बनता है तथा दूसरे पर सजातीय ध्रुव बनता है। इस घटना को ‘चुम्बकीय प्रेरण’ (Magnectic induction) कहते हैं।

    एक अकेले चुम्बकीय ध्रुव का कोई अस्तित्व नहीं होता।

    यदि हम किसी छड़-चुम्बक की बीच में से दो भागों में तोड़ दें तो इसके उत्तरी व दक्षिणी (N व S) ध्रुव अलग-अलग नहीं होंगे, बल्कि प्रत्येक भाग एक पूर्ण चुम्बक होगा जिसमें दोनों ध्रुव होंगे। यदि हम इनमें से प्रत्येक भाग को पुन: तोड़ दें तो भी प्रत्येक छोटा भाग एक पूर्ण चुम्बक होगा। इससे स्पष्ट है, कि हम चुम्बक के ध्रुवों को कभी भी अलग-अलग नहीं कर सकते

    चुम्बकीय क्षेत्र (Magnetic Area)

    चुम्बक के चारों ओर कम्पास-सूई द्वारा चुम्बक के प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है। अतः चुम्बक के चारों ओर वह क्षेत्र, जिसमें चुम्बक के प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है, ‘चुम्बकीय क्षेत्र’ कहलाता है। चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा, चुम्बकीय सुई से निर्धारित की जाती है। चुम्बकीय क्षेत्र का मात्रक गौस (Gauss) होता है l

    किसी चुम्बकीय क्षेत्र के प्रत्येक बिन्दु पर क्षेत्र की एक निश्चित दिशा तथा एक निश्चित तीव्रता (परिमाण) होती है।

    क्षेत्र के किसी बिन्दु पर रखी कम्पास-सूई के दक्षिणी ध्रुव से उत्तरी ध्रुव की ओर खींची गई रेखा की दिशा उस बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र की ‘दिशा’ कहलाती है।

    चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता एक सदिश राशि है

    इसका मात्रक न्यूटन/(ऐम्पियर-मीटर) अथवा वेबर/ मी. होता है। चुम्बकीय क्षेत्र के मात्रक को ‘टेसला’ (Tesla) कहते हैं।

  • दृश्य एवं अवरक्त विकिरण क्या होते हैं ?

    दृश्य विकिरण (Visible Radiation)

    इनके स्रोत सूर्य तथा तारों के अतिरिक्त ज्वाला (Flame), विद्युत-बल्ब, आर्क लैम्प, आदि ताप दीप्त वस्तुएं हैं। प्रकाश से ही हमें वस्तुएं दिखायी देती हैं। ये फोटोग्राफिक प्लेट पर रासायनिक क्रिया करती है। इनके संसूचन का प्रमुख साधन नेत्र हैं। 

    अवरक्त विकिरण (Infra-red Radiation)

    इन विकिरणों का पता हरशैल ने लगाया था। इनकी प्राप्ति तप्त वस्तुओं तथा सूर्य से होती है इनके द्वारा ऊष्मा का संचरण होता है अर्थात् ये किरणें ‘ऊष्मीय विकिरण’ है। ये जिस वस्तु पर पड़ती हैं उसका ताप बढ़ जाता है। इनका प्रकीर्णन बहुत कम होता है। इसलिए ये कुहरे में भी बहुत दूर तक चली जाती है।

    इनका संसूचन (Detection) तापपुंज (Thermopile) अथवा तापमापी से किया जा सकता है। इनका उपयोग अस्पतालों में रोगियों को सिकाई करने तथा कुहरे में फोटोग्राफी करने में होता है। TV के रिमोट कण्ट्रोल में भी इनका प्रयोग किया जाता है। 

  • पराबैंगनी विकिरण (Ultra-violet Radiation) क्या होता है ?

    पराबैंगनी विकिरण (Ultra-violet Radiation)

    इस विकिरण का पता रिटर (Ritter) ने लगाया था। ये सूर्य, आर्क, विद्युत स्पार्क, विसर्जन नलिका, आदि से प्राप्त होती हैं। इनकी भेदन क्षमता एक्स-किरणों से कम होती है। इनमें फोटोग्राफिक प्लेट पर रासायनिक क्रिया, प्रतिदीप्ति उत्पन्न करने तथा प्रकाश-विद्युत प्रभाव के गुण होते हैं।

    खोज

    इनकी खोज इस प्रेक्षण से बहुत कुछ जुङी हुई हैं, कि रजत नीरेय लवण (सिल्वर क्लोराइड) धूप पङने पर काले पङ जाते हैं। 1801 में जोहन्न विल्हैम रिटर ने एक विशिष्ट प्रेक्षण किया, कि बैंगनी प्रकाश के परे (ऊपर) अप्रत्यक्ष किरणें, रजत नीरेय के लवण में भीगे कागज को काला कर देतीं है। उसने उन्हें डी-ऑक्सिडाइजिंग किरणें कहा जिससे कि उनकी रसायनीय क्रियाओं पर बल दिया जा सके साथ ही इन्हें वर्णक्रम के दूसरे सिरे पर उपस्थित ऊष्म किरणों से पृथक पहचाना जा सके। कालांतर में एक सरल शब्द रासायनिक किरणें प्रयोग हुआ। जो कि उन्नीसवीं शताब्दी तक चला, जब जाकर दोनों के ही नाम बदले और पराबैंगनीएवं अधोरक्त’ कहलाए।

    उपयोग

    इनका संसूचन (Detection) प्रकाश-विद्युत प्रभाव, प्रतिदीप्त पर्दा अथवा फोटोग्राफिक प्लेट द्वारा किया जाता है। इनका उपयोग सिकाई करने, प्रकाश-विद्युत प्रभाव को उत्पन्न करने, हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने, आदि में किया जाता है।

  • एक्स-किरणें (X-rays) क्या होती हैं ?

    एक्स-किरणें (X-rays)

    इन किरणों को उनके अन्वेषक के नाम पर ‘रॉन्टजन किरणें’ भी कहते हैं। ये तीव्रगामी इलेक्ट्रॉनों के किसी भारी लक्ष्य वस्तु पर टकराने से उत्पन्न होती हैं। इनकी भेदन क्षमता गामा-किरणों से कम होती है।

    चिकित्सा में इनका उपयोग टूटी हड्डी तथा फेफड़ों के रोगों का पता लगाने में किया जाता है। इनका उपयोग जासूसी तथा इंजीनियरी में भी किया जाता है। X-किरणों की खोज सन् 1895 में विल्हम के रॉन्टजन ने की थी।

    उपयोग

    चिकित्सीय उपयोगों के अलावा भी एक्सरे का अनेकों प्रकार से उपयोग किया जाता है। एक्सरे के विशिष्ट गुणों के कारण उनका उपयोग विस्तृत रूप से विज्ञान की अनेक शाखाओं तथा विभिन्न उद्योगों में होता आ रहा है। उद्योगों में, विशेषत: निर्माण तथा निर्मित पदार्थो के गुणों के नियंत्रण में, एक्सरे का बहुत उपयोग होता है। निर्मित पदार्थो की अंतस्य त्रुटियाँ एक्सरे फोटोग्राफों द्वारा सरलता से ज्ञात की जा सकती हैं। विमान तथा उसी प्रकार के साधनों के यंत्रों में अति तीव्र वेग तथा चरम भौतिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता हैं; ऐसे यंत्रों के निर्माण में प्रत्येक अवयव अंतर्बाह्य निर्दोष तथा यथार्थ होना चाहिए। ऐसे प्रत्येक अवयव की परीक्षा एक्सरे से की जाती है और सदोष अवयवों का त्याग किया जाता है। धातु एक्सरे का अवशोषण करते हैं, अत: धातुओं के अंतर्भागों की परीक्षा के लिए मृदु एक्सरे अनुपयुक्त होते हैं। विशाल आकार के धात्वीय पदार्थो के लिए अत्युच्च विभव के एक्सरे की आवश्यकता होती है।

    धातु विज्ञान तथा धातुगवेषणा में एक्सरे अत्यंत उपयोगी हैं। धातु भी मणिभीय होते हैं, किंतु इनके मणिभ सूक्ष्म होते हैं और वे यथेच्छ प्रकार से स्थापित रहते हैं, अत: धातुओं की लावे-प्रतिमा में सामान्यत: संकेंद्र वर्तुल रहते हैं। प्रत्येक वर्तुल एक समान तीव्रता का होता है, किंतु किसी भौतिक क्रिया से कणों के आकारों में वृद्धि हो जाने पर इन वर्तुलों में बिंदु भी आते हैं। अत: एक्सरे व्याभंग द्वारा इसका ठीक ठीक पता चल जाता है कि धात्वीय मणिभों के कण किस प्रकार के हैं और उनका आकार आदि कैसा है। इस ज्ञान का धातुविज्ञान में अत्यंत महत्त्व है। धातु के पदार्थ बनाने के समय ऊष्मा के कारण उनमें अंतर्विकृति आ जाती है। धातु को मोड़ने से भी उसमें अंतर्विकृति हो जाती है। ऐसी विकृतियों का विश्लेषण एक्सरे से हो सकता है। इस प्रकार विशिष्ट गुणों से युक्त निर्दोष धातु प्राप्त करने में एक्सरे का विशेष उपयोग होता है।

    एक्सरे के अन्य उपयोगों में एक्सरे सूक्ष्मदर्शी उल्लेखनीय है। एक्सरे के तरंगदैर्घ्य प्रकाश के तरंगदैर्घ्यो से सूक्ष्म होते हैं, अत: एक्सरे सूक्ष्मदर्शी को प्रकाश सूक्ष्मदर्शी से अधिक प्रभावशाली होना चाहिए। 1948 में एक्सरे को केंद्रित करने के कर्कपैट्रिक के प्रयत्न अंशत: सफल हुए। इस रीति से तथा अन्य रीतियों से प्रतिबिंब का आवर्धन करने के प्रयत्न अब प्रायोगिक अवस्था पार कर चुके हैं और अनेक निर्माताओं द्वारा निर्मित कई प्रकार के एक्सरे सूक्ष्मदर्शी सुलभ हैं।

    प्रकाश सूक्ष्मदर्शी से जिन बातों का पता नहीं चल पाता उनका ज्ञान सरलतापूर्वक एक्सरे सूक्ष्मदर्शी से हो जाता है।

  • दृष्टि निबंध (Persistence of vision)

    What is Persistence of vision ?

    किसी वस्तु का प्रतिबिम्ब रेटिना पर १/10 सेकण्ड तक रहता है। अतः यदि वस्तु को आंख के सामने से हटा दिया जाये तो वस्तु १/10 सेकण्ड तक दिखाई देती रहेगी। दृष्टि का यह विशेष गुण दृष्टि निबंध (Persistence of vision) कहलाता है।

    चलचित्र (Motion picture) इसी सिद्धान्त पर बनाये जाते हैं।

    दृष्टि निर्बध के कारण ही टूटे हुए तारे या उल्काएं आकाश गंगा में लम्बी रेखा जैसे मालूम पड़ते हैं।

    तेजी से घूमते हुए बिजली के पंखे भी अस्पष्ट इसी कारण दिखाई पड़ते हैं।

    एक ऐसा कैमरा जिसमें तेजी के साथ एक के बाद एक चित्र लिया जाता है. ‘चलचित्र कैमरा‘ कहलाता है।

    सिनेमा में प्रत्येक सेकण्ड 24 चित्रों को जो एक-दूसरे से थोड़ा-थोड़ा भिन्न होते हैं दिखाया जाता है। इस कारण हमें चित्र में वस्तु की गतिशीलता का अनुभव होता है। टेलीविजन के रिसीवर में प्रति सेकण्ड 25 पूर्ण चित्र दिखाएं जाते हैं।