Category: फ़िजिक्स

  • किरचॉफ का नियम क्या होता है ?

    किरचॉफ का नियम क्या होता है ?

    किरचॉफ का नियम

    इसके अनुसार, अच्छे अवशोषक ही अच्छे उत्सर्जन होते हैं। अंधेरे कमरे में यदि एक काली और एक सफेद वस्तु को समान ताप तक गरम करके रखा जाए तो काली वस्तु अधिक विकिरण उत्सर्जित करेगी। अत: काली वस्तु अंधेरे में अधिक चमकेगी। 

    लोहे की अवशोषकता अधिक होती है, इसलिए उसकी उत्सर्जकता भी अधिक होती है। इसलिए लोहे के बर्तन शीघ्रता से गरम व शीघ्रता से ठण्डे हो जाते हैं। 

    उदाहरण

    अत: किरचॉफ के नियमानुसार, लाल रंग की वस्तु गरम होने पर हरे रंग का प्रकाश उत्सर्जित करेगी। इसीलिए लाल कांच की गेंद को गरम करके अंधेरे कमरे में देखा जाए तो वह हरी दिखायी देती है और हरे कांच की पर्याप्त रूप से गरम गेंद लाल दिखायी देगी।

  • चुम्बकीय क्षेत्र और उसके उपयोग

    चुम्बकीय क्षेत्र और उसके उपयोग

    Magnetic Field and its use

    चुम्बक के चारों ओर कम्पास-सूई द्वारा चुम्बक के प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है। अतः चुम्बक के चारों ओर वह क्षेत्र, जिसमें चुम्बक के प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है, ‘चुम्बकीय क्षेत्र‘ कहलाता है। चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा, चुम्बकीय सुई से निर्धारित की जाती है।

    चुम्बकीय क्षेत्र के मात्रक को ‘टेसला’ (Tesla) कहते हैं।

    उपयोग

    विद्युत-चुम्बकीय में चुम्बकीय क्षेत्र का बहुत महत्त्व है।

    विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण का प्रयोग बिजली घरों में प्रयोगआने वाले जेनरेटरों में गाड़ियों के डायनमों में होता है।

    आवेशित कणों को त्वरित करने के लिए चुम्बकीय क्षेत्र का प्रयोग होता है। इन त्वरित कणों का नाभिकीय प्रयोगों में बहुत महत्त्व है।

    ऐम्पियर मीटर द्वारा बिना परिपथ में जोड़े अधिक धारावाही तारों में बहती धारा का मान पढ़ा जा सकता है। यह धारा के चुम्बकीय प्रभाव पर आधारित यन्त्र है। MRI में चुम्बकीय क्षेत्र के प्रभाव में उच्च आवृत्ति की रेडियो तरंगों का मानव शरीर के विभिन्न भाग भिन्न अनुपात में अवशोषण करके एक प्रतिछाया (Image) बनाते हैं जिससे शरीर के भीतरी भाग में अनियमितताओं का पता चलता है तथा उसकी चिकित्सा की जाती है।

    ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने विश्व का पहला प्लास्टिक चुम्बक विकसित करने में सफलता प्राप्त की है। दरहम विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित कार्बनिक सुचालक पदार्थ समूह का यह पहला ऐसा चुम्बक है जो सामान्य तापमान में भी काम कर सकेगा। यह चुम्बक एक तरह का पॉलिमर है जो पीएएनआई (PANI) और टीसीएनक्यू (TCNA) के मिश्रण से निर्मित अणुओं की श्रृंखला है। इसमें असाधारण विद्युतीय गुण है। प्लास्टिक चुम्बक का प्रयोग कम्प्यूटर हार्ड डिस्क की कोटिंग में किए जाने की सम्भावना है जिससे उच्च क्षमता वाले ” डिस्क का विकास हो सकता है। इसका उपयोग चिकित्सा क्षेत्र में किया जा सकेगा।

  • दैनिक जीवन में चुंबक का उपयोग

    दैनिक जीवन में चुंबक का उपयोग

    Use of Magnet in daily life

    प्रकृति में लोहा और ऑक्सीजन का एक विशेष यौगिक धातु-खनिज या अयस्क के रूप में पाया जाता है जिसे मैग्नेटाइट कहा जाता है। मैग्नेटाइट के टुकड़ों को प्राकृतिक चुम्बक कहा जाता है।

    कुछ पदार्थों को कृत्रिम विधियों द्वारा चुम्बक बनाया जा सकता है, इन्हें कृत्रिम चुम्बक कहते हैं इनकी लोहे के टुकड़ों को आकर्षित करने की शक्ति, प्राकृतिक चुम्बकों की अपेक्षा कहीं अधिक होती है।

    चुम्बक लोहे को अपनी ओर आकर्षित करता है। इस गुण को ‘चुम्बकत्व‘ कहते हैं।

    चुम्बक के चारों ओर कम्पास-सूई द्वारा चुम्बक के प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है। अतः चुम्बक के चारों ओर वह क्षेत्र, जिसमें चुम्बक के प्रभाव का अनुभव किया जा सकता है, ‘चुम्बकीय क्षेत्र‘ कहलाता है।

    दैनिक जीवन में चुम्बक का उपयोग

    1. लौह पदार्थों की पहचान करने के लिए चुम्बक का प्रयोग किया जाता है।
    2. चुम्बक का आज दिक्सूचक (Compass box) में प्रयोग किया जाता है।
    3. खदान पर काम करने वाले मजदूरों की आंख में लोहे का बुरादा चले जाने पर चुम्बक की सहायता से उन्हें निकाला जाता है।
    4. ध्वनि अभिलेखन व पुनरुत्पादन के लिए टेप रिकॉर्डर बनाए गए हैं। टेप के ऊपर चुम्बकीय पदार्थ की एक पर्त में परिवर्तित चुम्बकीय क्षेत्र का अभिलेखन किया जा सकता है। संगीत, भाषण, इत्यादि ध्वनियों को टेप पर रिकॉर्ड किया जाता है तथा ‘बाद में कभी भी सुना जा सकता है।
    5. वीडियो टेप में न केवल ध्वनि अपितु चित्रों का भी अंकन चुम्बकीय क्षेत्र की परिवर्ती तीव्रता के रूप में किया जा सकता है। चलचित्रों को वीडियो टेप पर रिकॉर्ड किया जा सकता है।
    6. वीडियो कैमरा द्वारा किसी भी आयोजन को चुम्बकीय वीडियो रूप पर अभिलेखित किया जा सकता है।
    7. कम्प्यूटर के क्षेत्र में चुम्बकीय मेमोरी का बहुत महत्त्व है। फ्लॉपी डिस्क पर चुम्बकीय पदार्थ का लेप होता है। आंकड़ों को बहुत सुग्राहिता से फ्लॉपी डिस्क पर लिखा व मिटाया जा सकता है।
    8. ATM कार्ड, क्रेडिट कार्ड व डेबिट कार्ड के पीछे चुम्बकीय पदार्थ के लेप की एक पट्टी होती है। इस पट्टी में ही प्रयोगकर्ता की पहचान व उसका कोड छिपा रहता है। बैंकों व व्यापारिक प्रतिष्ठानों की मशीन में डालकर किसी भी समय मुद्रा विनियम किया जा सकता है।
  • विकिरण का उत्सर्जन व अवशोषण (Emission and Absorption of Radiation)

    विकिरण का उत्सर्जन व अवशोषण (Emission and Absorption of Radiation)

    विकिरण का उत्सर्जन व अवशोषण (Emission and Absorption of Radiation)

    प्रिवोस्ट के विनियम सिद्धान्त के अनुसार सभी तापों पर (परम शून्य को छोड़कर) प्रत्येक वस्तु विकिरण ऊर्जा को उत्सर्जित करती है तथा अपने वातावरण से विकिरण ऊर्जा का अवशोषण भी करती है। इस विकिरण ऊर्जा को ‘ऊष्मीय विकिरण’ (Thermal radiation) कहते हैं।

    यदि वस्तु का ताप उसके चारों ओर के वातावरण के ताप से ऊंचा होता है, तो उस वस्तु के पृष्ठ से उत्सर्जित ऊर्जा, उसके द्वारा अवशोषित ऊर्जा से अधिक होती है।

    समान तापमान पर दो चीजें संतुलन में रह सकती हैं, जैसे टी तापमान पर प्रकाश के बादल से घिरा पदार्थ टी तापमान पर औसत रूप से बादल में उतना प्रकाश विकिरित कर सकता है, जितना वह सोख ले, यह प्रीवोस्ट के विनिमय सिद्धांत पर आधारित है, जो विकरणशील संतुलन को सन्दर्भित करता है। विस्तृत संतुलन का सिद्धांत कहता है कि उत्सर्जन और अवशोषण की प्रक्रिया के बीच कोई अजीब किस्म का सह-संबंध नहीं है, उत्सर्जन की प्रक्रिया अवशोषण से प्रभावित नहीं होती बल्कि यह केवल उत्सर्जन कर रहे पदार्थ की सौर स्थिति से प्रभावित होती है। इसका मतलब यह हुआ कि टी तापमान पर पदार्थ द्वारा उत्सर्जित कुल प्रकाश, चाहे वह कृष्ण पदार्थ हो या नही, हमेशा उस कुल प्रकाश के बराबर होता है, जिसे पदार्थ अवशोषित करता है, जो टी तापमान पर प्रकाश से घिरा हो।

    कृष्णिका के लिए अवशोषित प्रकाश की मात्रा उतनी होती है, जितनी वह सतह पर पड़ती है। किसी भी तरंगदैर्घ्य λ के प्रति ईकाई समय में अवशोषित प्रकाश ऊर्जा अनिवार्य रूप से कृष्णिका के कर्व के अनुपात में होती है। इसका मतलब है कि कृष्णिका का घुमाव कृष्णिका द्वारा उत्सर्जित प्रकाश ऊर्जा जितना है, जो इसके नाम को उपयुक्त ठहराता है। यह सौर विकिरण का किरचॉफ नियम है: कृष्णिका का उत्सर्जन घुमाव प्रकाश की सौर विशेषता है, जो केवल गुहा की दीवारों केतापमानपर ही निर्भर करता है, बशर्ते यह स्थिति होनी आवश्यक है कि गुहा में कुछ पूरी तरह से काली सामग्री हो और यह विकरणशील संतुलन में हो। जब कृष्णिका इतना छोटा हो कि इसके आकार की प्रकाश के तरंगदैर्घ्य से तुलना की जा सके तो अवशोषण संशोधित हो जाता है, क्योंकि एक छोटी सी वस्तु लंबे तरंगदैर्घ्य के प्रकाश का एक कुशल अवशोषक नहीं हो सकती, लेकिन उत्सर्जन और अवशोषण की कठोर समानता के सिद्धांत हमेशा सही ठहराये जाते हैं।

  • न्यूटन का शीतलन नियम (Newton’s Law of Cooling) क्या है ?

    न्यूटन का शीतलन नियम (Newton’s Law of Cooling) क्या है ?

    न्यूटन का शीतलन नियम (Newton’s Law of Cooling)

    यदि एक बर्तन में गरम जल भर दिया जाए और फिर उसे ठण्डा होने दिया जाए तो प्रारम्भ में जल का ताप जल्दी-जल्दी कम होता है और जैसे-जैसे जल तथा वातावरण के ताप में अन्तर कम होता है, ताप गिरने की दर धीरे-धीरे कम होती जाती है।

    विकिरण द्वारा किसी वस्तु से क्षय होने वाली ऊष्मा की दर, के पृष्ठ की प्रकृति, उसके पृष्ठ क्षेत्रफल तथा उसके व आस-पास के वातावरण के ताप के अन्तर पर निर्भर करती है।

    इसका अध्ययन सर्वप्रथम न्यूटन ने किया था। न्यूटन के शीतलन नियम के अनुसार, समान अवस्था रहने पर विकिरण द्वारा किसी वस्तु के ठण्डे होने की दर (अर्थात् वस्तु की ऊष्मा क्षय होने की दर), उस वस्तु और आस-पास के वातावरण के ताप के अन्तर के अनुक्रमानुपाती होती है (जबकि ताप का अन्तर बहुत अधिक न हो)।

    उदाहरण

    अत: यदि गर्म दूध को थाली (बड़े पृष्ठ क्षेत्रफल वाली वस्तु) में डाला जाए तो वह शीघ्र ठण्डा हो जाता है। अत: वस्तु जैसे-जैसे ठण्डी होती जाएगी उसके ठण्डे होने की दर कम होती जाएगी।

  • विकिरण (Radiation) क्या होता है ?

    विकिरण (Radiation) क्या होता है ?

    विकिरण (Radiation)

    ऊष्मा संचरण की इस विधि में माध्यम कोई भाग नहीं लेता है। इस विधि में ऊष्मा, गरम वस्तु से ठण्डी वस्तु की ओर बिना किसी माध्यम की सहायता के (अर्थात् निर्वात में भी) तथा बिना माध्यम को गरम किए प्रकाश की चाल में सीधी रेखा में संचरित होती है। 

    उदाहरण

    पृथ्वी पर सूर्य से ऊष्मा विकिरण विधि द्वारा ही प्राप्त होती है। सूर्य तथा पृथ्वी के बीच बहुत अधिक स्थान में कोई भी माध्यम नहीं है तथा निर्वात फैला हुआ है, अत: चालन अथवा संवहन की विधि से ऊष्मा पृथ्वी तक नहीं आ सकती है (क्योंकि इनके लिए माध्यम आवश्यक है)। माध्यम की अनुपस्थिति में ऊष्मा पृथ्वी तक विकिरण द्वारा प्रकाश तरंगों के साथ पहुंचती है। विकिरण में ऊष्मा, तरंगों के रूप में चलती है जिन्हें ‘विद्युत-चुम्बकीय तरंगे’ कहते हैं। 

    उपयोग

    • चाय की केतली की बाहरी सतह चमकदार बनायी जाती है: चमकदार सतह न तो बाहर से ऊष्मा का अवशोषण करती है और न भीतर की ऊष्मा बाहर जाने देती है। अत: चाय देर तक गर्म बनी रहती है।
    • प्रयोगशाला में ऊष्मामापी की बाहरी सतह को, इंजन में भाप की नलियों को तथा गर्म जल ले जाने वाले पाइपों की बाहरी सतहों को पॉलिश द्वारा चमकदार बनाकर विकिरण द्वारा होने वाले ऊष्मा-ह्रास (Heat-loss) को घटाया जाता है। 
    • पॉलिश किए हुए जूते धूप में शीघ्र गर्म नहीं होते क्योंकि वे अपने ऊपर गिरने वाली ऊष्मा का अधिकांश भाग परावर्तित कर देते हैं।
    • रेगिस्तान दिन में बहुत गरम तथा रात में बहुत ठण्डे हो जाते हैं: रेत ऊष्मा का अवशोषक है, अत: दिन में सूर्य की ऊष्मा को अवशोषित करके गर्म हो जाता है। रात में वह अपनी ऊष्मा को विकिरण द्वारा खोकर ठण्डा हो जाता है।
    • बादलों वाली रात, स्वच्छ आकाश वाली रात की अपेक्षा गर्म होती है: दिन में सूर्य की गरमी से पृथ्वी गर्म हो जाती है तथा रात को विकिरण द्वारा ठण्डी होती है। जब आकाश स्वच्छ होता है, तो ऊष्मा विकिरण द्वारा पृथ्वी से आकाश की ओर चली जाती है। परन्तु जब आकाश में बादल छाए रहते हैं, तो ऊष्मा के विकिरण बादलों से टकराते हैं। परन्तु बादल ऊष्मा के बुरे अवशोषक है, अत: ऊष्मा के विकिरण पृथ्वी की ओर वापस आ जाते हैं जिससे पृथ्वी गर्म ही बनी रहती है।
  • संवहन (Convection) क्या होता है ?

    संवहन (Convection) क्या होता है ?

    संवहन (Convection)

    तरल पदार्थों (द्रव अथवा गैस) में ऊष्मा का संचरण मुख्यतः संवहन द्वारा होता है। ठोसों में संवहन द्वारा ऊष्मा संचरण सम्भव नहीं है। इस विधि में तरल के कण गरम भाग से ऊष्मा लेकर स्वयं हल्के होकर ऊपर उठते हैं तथा ठण्डे भाग की ओर जाते हैं। इनका स्थान लेने के लिए पुनः ठण्डे भाग से नीचे आते हैं।

    इस प्रकार, संवहन विधि में ऊर्ध्वाधरतः तापान्तर होने पर ऊष्मा का प्रवाह नीचे से ऊपर की ओर माध्यम के घनत्व में परिवर्तन होने के कारण संवहन धाराओं द्वारा होता है।

    उदाहरण

    जब हम एक बीकर में जल लेकर उसे नीचे से गरम करते हैं, तो बीकर की तली का पानी पहले गरम होता है जिससे इसका घनत्व कम हो जाता है। घनत्व कम हो जाने के कारण (या प्रसार के कारण) यह जल ऊपर उठता है तथा उसका स्थान लेने के लिए ऊपर से ठण्डा जल (अधिक घनत्व के कारण) नीचे आता है। फिर वह भी ऊष्मा लेकर तथा गरम होकर ऊपर उठ जाता है और उसका स्थान पुनः ऊपर से आकर ठण्डा जल ले लेता है।

    इस प्रकार, सम्पूर्ण जल में संवहन धाराएं प्रवाहित होने लगती हैं जिससे ऊष्मा, जल के विभिन्न भागों में पहुंचकर सम्पूर्ण जल को गरम कर देती है।

    उपयोग

    • रेफ्रिजरेटर में फ्रीजर पेटिका को ऊपर रखा जाता है। जिससे कि फ्रीजर पेटिका के नीचे का शेष स्थान संवहन धाराओं द्वारा ठण्डा बना रहे। इसका कारण यह है, कि नीचे की गरम वायु हल्की होने के कारण ऊपर उठती है तथा फ्रीजर पेटिका से टकराकर ठण्डी हो जाती है। ऊपर की ठण्डी वायु भारी होने के कारण नीचे आती है तथा रेफ्रिजरेटर में इस स्थान में रखी वस्तुओं जैसे—पानी की बोतल, साग-सब्जी, आदि से टकराकर उन्हें ठण्डा कर देती है।
    • समुद्री हवाएं तथा स्थली हवाएं: दिन के समय सूर्य की गर्मी से जल की अपेक्षा थल जल्दी गरम हो जाता है जिससे थल के सम्पर्क की हवाएं ऊपर उठती हैं तथा उनका स्थान लेने के लिए समुद्र की ओर से ठण्डी हवाएं थल की ओर बहने लगती हैं। इन हवाओं को ‘समुद्री हवाएं’ (Sea breeze) कहते हैं। 
    • रात के समय थल, जल की अपेक्षा जल्दी ठण्डा हो जाता है। इसलिए समुद्र के जल से सम्पर्क की गरम हवाएं ऊपर उठती हैं तथा इनका स्थान लेने के लिए थल से समुद्र की ओर हवाएं चलने लगती है। इन्हें ‘स्थली हवाएं’ (Land breeze) कहते हैं।
    • बिजली के बल्बों में निष्क्रिय गैसों का भरा जाना: बिजली के बल्बों में निर्वात के स्थान पर निष्क्रिय गैसें, जैसे—आर्गन, आदि भरी जाती है। इसका कारण यह है, कि बल्ब के अन्दर निर्वात होने पर तन्तु के चलने पर उत्पन्न ऊष्मा से तन्तु का ताप इतना बढ़ सकता है, कि तन्तु पिघल जाए। लेकिन बल्ब में निष्क्रिय गैस भरने से तन्तु की ऊष्मा संवहन धाराओं द्वारा चारों ओर फैल जाती है जिससे तन्तु का ताप उसके गलनांक तक नहीं बढ़ पाता है। निष्क्रिय गैस होने से वह तन्तु के पदार्थ के साथ कोई रासायनिक क्रिया भी नहीं करती है। यदि वायु भर दी जाए तो उसके अन्दर की ऑक्सीजन तन्तु की धातु से क्रिया करके उसे ऑक्साइड में बदल देगी और तन्तु का चमकना बन्द हो जाएगा। 
  • चालन (Conduction) क्या होता है ?

    चालन (Conduction) क्या होता है ?

    चालन (Conduction)

    यह ऊष्मा संचरण की ऐसी विधि है जिसमें माध्यम के कण भाग तो लेते हैं परन्तु अपने स्थान को नहीं छोड़ते हैं। इसमें ऊष्मा माध्यम के गरम भागों से ठण्डे भागों की ओर प्रत्येक कण से समीपवर्ती अन्य कणों में होती हुई संचरित होती है। 

    चालन द्वारा ऊष्मा का संचरण सभी पदार्थों (ठोस, द्रव तथा गैसों) से सम्भव है परन्तु ठोसों (तथा पारे) में ऊष्मा का संचरण केवल चालन द्वारा ही होता है। द्रवों तथा गैसों में ऊष्मा का संचरण चालन द्वारा बहुत कम होता है। 

    उदाहरण

    यदि हम किसी धातु की छड़ का एक सिरा गरम करें तो यह सिरा ऊष्मा पाकर गरम हो जाता है तथा चालन द्वारा ऊष्मा दूसरे सिरे तक पहुंचकर उसे भी गरम कर देती है। जिस सिरे को हम गरम करते हैं, उस सिरे के कण ऊष्मा पाकर अपनी मध्यमान स्थिति के दोनों ओर तेजी से तथा अधिक आयाम से कम्पन करने लगते हैं तथा अपने निकट वाले पृष्ठ के कणों से टकराते हैं तथा उन्हें ऊष्मा दे देते हैं। इस पृष्ठ के कण (जो अब तेजी से कम्पन करने लगे हैं) अपने निकट वाले पृष्ठ के कणों को ऊष्मा दे देते हैं इस प्रकार, ऊष्मा दूसरे सिरे तक एक पृष्ठ के कणों से दूसरे पृष्ठ के कणों में होती हुई पहुंच जाती है। 

    ऊष्मा चालकता

    पदार्थ में चालन द्वारा ऊष्मा का संचरण ‘ऊष्मा चालकता’ कहलाती है। ऊष्मा चालकता के आधार पर पदार्थों को तीन वर्गों में बांटा जाता है: 

    चालक

    वे पदार्थ जिनसे होकर ऊष्मा का चालन सरलता से होता है, ‘चालक’ कहलाते हैं। उदाहरण 6 अम्लीय जल, सभी धातु। 

    ऊष्मारोधी

    वे पदार्थ जिनसे होकर ऊष्मा का चालन बिल्कुल नहीं होता है, ‘ऊष्मारोधी’ कहलाते हैं। ऐसे पदार्थ की ऊष्मा चालकता शून्य होती है। एस्बेस्टॉस व एवोनाइट ऊष्मारोधी पदार्थ हैं।

    कुचालक

    वे पदार्थ जिनसे होकर ऊष्मा का चालन सरलता से नहीं होती है, ‘कुचालक’ कहलाते हैं उदाहरण—वायु, गैसें, रबर, लकड़ी व कांच, आदि। 

    उपयोग

    • एस्किमो लोग बर्फ की दोहरी दीवारों के मकान में रहते हैं: इसका कारण यह है, कि बर्फ की दोहरी दीवारों के बीच हवा की पर्त ऊष्मा की कुचालक होती है जिससे अन्दर की ऊष्मा बाहर नहीं जा पाती है तथा कमरे के अन्दर का ताप बाहर की अपेक्षा अधिक बना रहता है। 
    • शीत ऋतु में लकड़ी एवं लोहे की कुर्सियां एक ही ताप पर होती हैं परन्तु लोहे की कुर्सी छूने पर लकड़ी की कुर्सी की अपेक्षा अधिक ठण्डी लगती है: शीत ऋतु में शरीर का ताप, कमरे के ताप से अधिक होता है। लोहे की कुर्सी को छूने पर हमारे हाथ से ऊष्मा तापान्तर के कारण लोहे की कुर्सी में शीघ्रता से प्रवाहित होती है क्योंकि लोहा ऊष्मा का सुचालक है। अत: लोहे की कुर्सी छूने पर हमें ठण्डी प्रतीत होती है लेकिन लकड़ी ऊष्मा की कुचालक है, इसलिए वही तापान्तर होने पर भी हमारे हाथ से ऊष्मा लकड़ी में प्रवाहित नहीं होती है और लकड़ी की कुर्सी छूने पर वह हमें ठण्डी प्रतीत नहीं होती 
    • धातु के प्याले में चाय पीना कठिन है जबकि चीनी मिट्टी के प्याले में चाय पीना आसान है: इसका कारण यह है, कि धातु ऊष्मा की सुचालक होती है, अत: धातु के प्याले में चाय पीने पर चाय से ऊष्मा धातु में होकर होंठों तक पहुंच जाती है और होंठ जलने लगते हैं जबकि चीनी मिट्टी ऊष्मा की कुचालक होती है, अत: चाय से ऊष्मा चीनी मिट्टी से होकर होंठों तक नहीं पहुंच पाती है और चाय पीना आसान होता है।
  • अति चालक (Super Conductors) क्या है ?

    अति चालक (Super Conductors) क्या है ?

    What is Super Conductors ?

    यदि किसी धातु का ताप कम कर दिया जाए तो उसमें विद्युत चालन बढ़ जाता है अर्थात् उसका विद्युत प्रतिरोध (Resistance) कम हो जाता है l कुछ धातुओं का प्रतिरोध परम शून्य ताप (0 K ) के निकट पहुचने पर लगभग शून्य हो जाता है l और तब वे ‘अतिचालक‘ कहलाते है l

    कुछ सेरामिक पदार्थ (Ceramics) 100 K माप पर ही अतिचालक बन जाते है l

    अतिचालकता की खोज एक डच भौतिकशास्त्री कैमरलिंग ओनिस द्वारा 1911 में की गई।

    अतिचालक पदार्थ के उपयोग से ऊर्जा का अधिकाधिक उपयोग किया जा सकता है l यह अतिचालकता की प्रथम व सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

  • विद्युत-धारा का प्रवाह और चालक क्या है ?

    विद्युत-धारा का प्रवाह और चालक क्या है ?

    What is Current flow and conductor of electric current ?

    विद्युत-धारा का प्रवाह

    कुछ पदार्थों में परमाणु ऐसे होते हैं, कि उनमें से बाहरी इलेक्ट्रॉनों को आसानी से निकाला जा सकता है। इन इलेक्ट्रॉन को ‘मुक्त इलेक्ट्रॉन(Free electron) कहते हैं। ये इलेक्ट्रॉन एक परमाणु से निकलकर दूसरे में आसानी से चले जाते हैं। किसी पदार्थ में विद्युत आवेश का प्रवाह (विद्युत-धारा का प्रवाह) पदार्थ में उपस्थित इन्हीं मुक्त इलेक्ट्रॉनों की गति के कारण होता है अर्थात् ये इलेक्ट्रॉन ही आवेश वाहक (Charge carriers) का कार्य करते हैं।

    मुक्त इलेक्ट्रॉन की संख्या के आधार पर पदार्थों को मुख्यत: निम्नलिखित तीन वर्षों में बांटा जा सकता है:

    चालक

    धातुओं (जैसे—चादी, तांबा, ऐलुमिनियम, आदि) में अपेक्षाकृत मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या बहुत अधिक होती है, अतः इनमें विद्युत चालन सम्भव होता है। ये पदार्थ चालक कहलाते हैं। इन्हें आवेश देने पर यह तुरन्त इनके सम्पूर्ण पृष्ठ पर फैल जाता है।

    अचालक या विद्युतरोधी

    वे पदार्थ (जैसे लकड़ी, कांच, एबोनाइट, आदि) जिनमें अपेक्षाकृत बहुत कम (लगभग नगण्य) मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं, ‘अचालक’ या ‘कुचालक’ या ‘विद्युतरोधी‘ कहलाते हैं। इनमें विद्युत चालन सम्भव नहीं होता है।

    अर्द्धचालक

    वे पदार्थ जिनमें मुक्त इलेक्ट्रॉन न बहुत अधिक और न बहुत कम होते हैं, अर्द्धचालक कहलाते हैं। उदाहरण के लिए, कार्बन, सिलिकॉन, जर्मेनियम, आदि अर्द्धचालक हैं। इनमें साधारण ताप तथा निम्न ताप पर विद्युत चालन सम्भव नहीं होता है, लेकिन उच्च ताप पर विद्युत चालन सम्भव हो जाता है।