Category: फ़िजिक्स

  • प्रकाश का परावर्तन (Reflection of Light) क्या है ?

    प्रकाश का परावर्तन (Reflection of Light) क्या है ?

    What is Reflection of Light ?

    जब प्रकाश की किरण किसी सतह पर पड़ती है, तो उसका कुछ भाग परावर्तित हो जाता है परन्तु जब सतह चिकनी एवं चमकदार हो तो प्रकाश की किरणों का लगभग सभी भाग विभिन्न दिशाओं में परावर्तित हो जाता है। इस प्रकार की चिकनी सतह से टकराकर वापस लौटने की घटना को ‘प्रकाश का परावर्तन‘ कहते हैं।

    समतल दर्पण से किसी बिन्दु पर वस्तु का प्रतिबिम्ब दर्पण के पीछे उतनी ही दूरी पर बनता है जितनी दूरी पर वस्तु दर्पण के सामने रखी होती है। यह प्रतिबिम्ब आभासी होता है तथा वस्तु के बराबर होता है।

    दर्पण में यदि कोई मनुष्य अपना पूरा प्रतिबिम्ब देखना चाहता है, तो दर्पण की न्यूनतम ऊंचाई मनुष्य की ऊंचाई की आधी होनी चाहिए।

    यदि दो समतल दर्पण θ0 कोण पर झुके हो तो उनके द्वारा उनके मध्य में रखी वस्तु के बनाए गए कुल प्रतिबिम्बों की संख्या 3600-1 होती है। यदि यह पूर्णांक नहीं है, तो इसका अगला पूर्णांक मान लिया जाता है। इस प्रकार समकोण (900) पर झुके दो दर्पणों से वस्तु के तीन प्रतिबिम्ब बनते हैं और दो समान्तर रखे दर्पणों से अनन्त प्रतिबिम्ब बनते हैं।

    बहुरूपदर्शी (Kaleidoscope)

    इसमें समान लम्बाई तथा समान चौड़ाई के तीन आयताकार समतल दर्पण इस प्रकार लगे रहते हैं, कि दो दर्पणों के बीच 60° का कोण बनता है। तीनों दर्पणों के परावर्तक तल भीतर की ओर रहते हैं और दर्पणों द्वारा घिरे स्थानों में रंगीन कांच के कुछ टुकड़े रहते हैं। ये तीनों दर्पण एक मोटी नली (Pipe) के अन्दर लगे रहते हैं। नली को घुमाने से रंगीन कांच के टुकड़ों की स्थितियां बदल जाती हैं और इसलिए आकृतियों के रंग में भी परिवर्तन हो जाता है।

    परिदर्शी (Periscope)

    इसमें दो समतल दर्पण एक-दूसरे से 45° पर स्थित होते हैं। इन दर्पणों की परावर्तक सतहें आमने-सामने रहती हैं। अत: ऊपर वाले सिरे से होकर प्रवेश करने वाली किरणें दर्पण द्वारा परावर्तित होकर नीचे की ओर आती हैं और दूसरे दर्पण द्वारा परावर्तित होकर आंखों में प्रवेश करती है।

    इसी कारण युद्ध के समय बंकर में छिपे सैनिक जमीन पर चल रहे दुश्मनों की गतिविधियां देखने के लिए इस उपकरण का उपयोग करते हैं।

    पनडुब्बी जहाज में भी यह उपकरण प्रयुक्त होता है। इससे जहाज के भीतर बैठा आदमी भी समुद्र के अन्दर से ही जल की सतह पर स्थित दुश्मन की गतिविधि को देखने में समर्थ होता है।

    गोलीय दर्पण (Spherical Mirror)

    गोलीय दर्पण उस दर्पण को कहते हैं जिसकी परावर्तक सतह एक खोखले गोले का एक भाग होती है। गोलीय दर्पण प्रायः कांच के एक टुकड़े को रजतित (Silvered) कर बनाया जाता है।

    ये दो प्रकार के होते हैं—अवतल दर्पण तथा उत्तल दर्पण।

  • प्रकाश का ‘विवर्तन’ (Diffraction) और प्रकाश का ‘प्रकीर्णन’ (Scattering) क्या है ?

    प्रकाश का ‘विवर्तन’ (Diffraction) और प्रकाश का ‘प्रकीर्णन’ (Scattering) क्या है ?

    What are Diffraction of Light and Scattering of Light ?

    प्रकाश का ‘विवर्तन’ (Diffraction)

    यदि हम अपनी आंख के सामने अपनी दो अंगुलियों को खड़ा करके उनके बीच बनी पतली झिरी से किसी दूर स्थित पतले प्रकाश स्रोत (ट्यूब-लाइट) को देखते हैं, तो हमें क्रमिक रूप में दीप्त तथा अदीप्त पट्टियां दिखाई देती हैं। जब किसी प्रकाश स्रोत और पर्दे के बीच तीक्ष्ण कोर वाली अपारदर्शी वस्तु (ब्लेड) रखी जाती है, तो पर्दे पर उसकी छाया बन जाती है परन्तु इस छाया के किनारे तीक्ष्ण नहीं होते। किनारों के पास वाले भाग में भी कुछ प्रकाश पहुंच जाता है और हमें किनारों के पास पतली दीप्त तथा अदीप्त पट्टियां दिखाई देती हैं।

    प्रकाश के इस प्रकार अवरोध के किनारों पर थोड़ा मुड़ कर उसकी छाया में प्रवेश करने की घटना को ‘विवर्तन’ (Diffraction) कहते हैं।

    प्रकाश का ‘प्रकीर्णन’ (Scattering)

    जब प्रकाश किसी ऐसे माध्यम से गुजरता है जिसमें धूल तथा अन्य पदार्थों के अत्यन्त सूक्ष्म कण होते हैं, तो उनके द्वारा प्रकाश सभी दिशाओं में (कुछ दिशाओं में कम तथा कुछ में अधिक) प्रसारित हो जाता है। इस घटना को प्रकाश का ‘प्रकीर्णन’ कहते हैं।

    प्रयोगों द्वारा ज्ञात हुआ है, कि बैंगनी रंग के प्रकाश का प्रकीर्णन सबसे अधिक होता है। वर्णक्रम में बैंगनी से लेकर लाल रंग तक के प्रकाश का प्रकीर्णन इन रंगों के क्रम में घटता जाता है। इस प्रकार लाल रंग का प्रकीर्णन सबसे कम होता है। चूकि बैंगनी रंग की तरंग-दैर्ध्य सबसे कम होती है, अत: इस रंग के प्रकाश का प्रकीर्णन अधिकतम होता है

    चन्द्रमा पर वायुमण्डल नहीं है। अत: चन्द्रमा के तल पर पहुंचने वाले सूर्य के प्रकाश का प्रकीर्णन नहीं होता। इस कारण चन्द्रमा के तल से देखने पर आकाश काला दिखाई देता है। वास्तव में, पृथ्वी के वायुमण्डल के ऊपर सूर्य के प्रकाश का प्रकीर्णन न होने के कारण अन्तरिक्ष में सभी स्थानों पर आकाश काला दिखाई देगा। वायुमण्डल से बाहर जाने वाले अन्तरिक्ष यानों से इसकी पृष्टि सिद्ध होती है।

    पारदर्शक वस्तुएं (Transparent Bodies)

    वे वस्तुएं जिनके अन्दर से प्रकाश की किरणें आर-पार निकल जाती है, जैसे कांच, जल, आदि

    परन्तु कुछ वस्तुएं ऐसी होती है, कि जिन पर यदि प्रकाश डाला जाए तो कुछ प्रकाश तो अवशोषित हो जाता है और कुछ आर-पार बाहर निकल जाता है, ‘अर्द्धपारदर्शक वस्तुएं’ कहलाती हैं, जैसे—ग्रीस लगा हुआ कागज, घी या तेल लगा हुआ कागज।

    अपारदर्शक वस्तुएं (Opaque Bodies)

    वे वस्तुएं जिनमें होकर प्रकाश की किरणें बाहर नहीं निकल पाती हैं, ‘अपारदर्शक‘ कहलाती है, जैसे धातुएं, आदि।

    अर्द्धपारदर्शक वस्तुएं (Translucent Bodies)

    वे वस्तुएं जिन पर प्रकाश की किरणें पड़ने से उनका कुछ भाग तो अवशोषित हो जाता है तथा कुछ बाहर निकल जाता है, ‘अर्द्धपारदर्शक वस्तुएं कहलाती है, जैसे तेल लगा हुआ कागज।

  • सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण कैसे होता है ?

    सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण कैसे होता है ?

    How does solar eclipse and lunar eclipse occur?

    पृथ्वी एक वर्ष में सूर्य की परिक्रमा एक बार करती है और चन्द्रमा प्रति महीने एक बार पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इससे कभी-कभी चन्द्रमा, पृथ्वी और सूर्य तीनों एक सीध में आ जाते हैं, कभी चन्द्रमा की छाया पृथ्वी पर पड़ती है जिस कारण सूर्य ग्रहण होता है और कभी पृथ्वी की छाया चन्द्रमा पर पड़ती है जिससे चन्द्र ग्रहण होता है परन्तु हर महीने ग्रहण नहीं दिखाई देता क्योंकि पृथ्वी का कक्ष-तल चन्द्रमा के कक्ष-तल के साथ 5° का कोण बनाता है

    सूर्य ग्रहण

    सूर्य ग्रहण उस समय होता है जब चन्द्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच में आ जाता है और ऐसी स्थिति अमावस्या (full moon) के दिन ही होती है। सूर्य तो प्रकाश का उद्गम है और चन्द्रमा की अपेक्षा विस्तार में बहुत बड़ा है, अत: जब चन्द्रमा उस सरल रेखा पर अथवा उसके समीप आ जाता है जो पृथ्वी को सूर्य से मिलाती है, तो वह प्रकाश-किरणों को रोक लेता है। अत: चन्द्रमा की छाया पृथ्वी पर पड़ती है। अब चूंकि छाया का बनना तो स्वयं प्रकाश के सरल रैखिक गमन पर आधारित है, पृथ्वी का जो भाग प्रच्छाया में रहता है, वहां किरणें बिल्कुल नहीं पहुंचती अतःवहां से देखने पर सूर्य का कोई भाग दिखाई नहीं पड़ता, इसे ही पूर्णग्रास (Total eclipse) ‘सूर्य ग्रहण’ कहते हैं।

    पूर्णाग्रास सूर्य ग्रहण के दौरान आकाश अंधकारमय हो जाता है, तारे दिखाई पड़ने लगते हैं, तापमान गिर जाता है और पक्षी चहकना बन्द कर देते हैं।

    चन्द्र ग्रहण

    चन्द्र ग्रहण के समय पृथ्वी सूर्य और चन्द्रमा के बीच में होती है। जब चन्द्रमा पूर्णतः पृथ्वी की प्रच्छाया में पड़ता है, तो चन्द्रमा का कोई भाग पृथ्वी से दिखाई नहीं देता क्योंकि चन्द्रमा तक सूर्य की किरण नहीं पहुंच पाती। ऐसी स्थिति में लगे चन्द्र ग्रहण को ‘सर्वग्रास चन्द्र ग्रहण’ (Total lunar eclipse) कहते हैं परन्तु यदि चंद्रमा का थोड़ा ही भाग पृथ्वी की प्रच्छाया में पड़ने के कारण नहीं दखाई देता तो ऐसी स्थिति में लगे चन्द्र ग्रहण को ‘खण्डग्रास चंद्रग्रहण’ (Partial lunar eclipse) कहते हैं। पूर्णाग्रास सूर्य ग्रहण के दौरान आकाश अंधकारमय हो जाता है, तारे दिखाई पड़ने लगते हैं, तापमान गिर जाता है और पक्षी चहकना बन्द कर देते हैं l

    सूची छिद्र कैमरे (Pinhole Camera) से प्रतिबिम्ब का बनना, छाया का बनना, सूर्य-ग्रहण तथा चन्द्र ग्रहण का होना, आदि प्रकाश के सीधी रेखा में गमन के उदाहरण है।

  • प्रकाश (Light) क्या है ?

    प्रकाश (Light) क्या है ?

    What is Light ?

    प्रकाश सरल रेखाओं में चलता है। प्रकाश विद्युत-चुम्बकीय अनुप्रस्थ तरंग है। प्रकाश निर्वात में भी चल सकता है, किन्तु भिन्न-भिन्न माध्यमों में प्रकाश की चाल भिन्न-भिन्न होती है।

    जिन पदार्थों में से प्रकाश बाहर नहीं निकल पाता है उनको अपारदर्शी पदार्थ कहते हैं

    कुछ पदार्थों (तेल लगे हुए कागज, घिसे हुए कांच) में से प्रकाश का कुछ अंश बाहर निकल जाता है, ऐसे पदार्थों को पारभासी पदार्थ कहा जाता है। इसका तरंग दैर्ध्य 3,900A से 7,800A के बीच होता है। (1A= 10-10 मीटर)।

    प्रकाश का विद्युत-चुम्बकीय तरंग सिद्धान्त प्रकाश के केवल कुछ प्रमुख गुणों की ही व्याख्या कर पाता है, जैसे—प्रकाश का परावर्तन, अपवर्तन, सीधी रेखा में चलना, विवर्तन, व्यतिकरण व ध्रुवण।

    प्रकाश के कुछ गुण ऐसे भी हैं जिनकी व्याख्या यह तरंग सिद्धान्त नहीं कर पाता है। इनमें प्रमुख हैं—

    प्रकाश-विद्युत प्रभाव (Photoelectric effect) तथा कॉम्पटन प्रभाव (Compton effect)

    इन प्रभावों की व्याख्या आइन्सटीन द्वारा प्रतिपादित प्रकाश के फोटॉन सिद्धान्त द्वारा की जाती है। इस सिद्धान्त के अनुसार, प्रकाश ऊर्जा के छोटे-छोटे बण्डलों या पैकटों के रूप में चलता है जिन्हें ‘फोटॉन’ (Photon) कहते हैं। वास्तव में ये दो प्रभाव प्रकाश की कण प्रकृति (Particle nature) को प्रकट करते हैं।

    प्रकाश के कण फोटॉन साधारण धूल के कणों की भांति सीमित दिक्-काल (time period) में नहीं रहते। फोटॉन ऊर्जा कण है जिसकी ऊर्जा का मान उससे सम्बद्ध विद्युत-चुम्बकीय तरंग की आवृत्ति को एक नियतांक h जिसे प्लांक नियतांक कहते हैं से गुणा करके प्राप्त होती है।

    प्रकाश की दोहरी प्रकृति (Dual Nature of Light)

    आज प्रकाश को कुछ घटनाओं में तरंग और कुछ घटनाओं में कण माना जाता है अर्थात् प्रकाश कणों की बौछार (Shower of particles) भी है और तरंग भी है। कुछ घटनाओं (Phenomena) में उसकी तरंग प्रकृति प्रबल होती है (कण प्रकृति दबी रहती है) और कुछ में प्रकाश की कण प्रकृति स्पष्टत: उभरकर आती है और तरंग प्रकृति दबी रहती है। इसी को प्रकाश की दोहरी प्रकृति कहते हैं।

    प्रकाश निर्वात में भी गमन करता है। इसकी चाल निर्वात में अन्य माध्यमों की तुलना में सबसे अधिक होती है।

    विभिन्न माध्यमों में प्रकाश की चाल :

    माध्यम –  प्रकाश की चाल (सी./सेकण्ड)

    • निर्वात – 3.00 x 108
    • पानी – 2.25 x 108
    • कांच – 2.00 x 108
    • तारपीन का तेल – 2.04 x 108
    • नाइलॉन – 1.96×108

    प्रकाश की उत्पत्ति के मुख्य सिद्धान्त

    • कणिक सिद्धान्त—न्यूटन
    • तरंग सिद्धान्त-हाइजिन
    • फोटोन सिद्धान्त—आइन्स्टीन

    छाया (Shadow)

    जब प्रकाश के मार्ग में कोई अपारदर्शी वस्तु आ जाती है, तो वह प्रकाश की किरणों को रोक लेती है क्योंकि प्रकाश की किरणें सीधी रेखा में ही चल सकती हैं। अत: यदि आगे कोई पर्दा हो तो पर्दे के कुछ भाग पर, प्रकाशित भाग पर अपरादर्शी वस्तु के बीच में आ जाने के कारण प्रकाश की किरणें नहीं पहुंच पाती फलत: पर्दे पर प्रकाशित भाग के बीच कुछ ऐसा होता है जो काला दिखता है क्योंकि वहां अंधकार रहता है। इस भाग को छाया कहते हैं। छाया की लम्बाई तथा आकार (1) प्रकाश के उद्गम. (2) अपारदर्शी वस्तु के आकार तथा (3) प्रकाश के उद्गम एवं वस्तु के बीच की दूरी पर निर्भर करता है।

  • पीजो-विद्युत प्रभाव (Piezoelectric Effect) क्या है ?

    पीजो-विद्युत प्रभाव (Piezoelectric Effect) क्या है ?

    What is Piezoelectric Effect ?

    कुछ क्रिस्टलों के सतहों पर दबाव डालने पर उसके किन्ही अन्य सतहों के बीच विद्युत विरूपण (Distortion) विभवान्तर उत्पन्न हो जाता है। इसके विपरीत ऐसे क्रिस्टलों को विद्युत क्षेत्र में रखने पर उनको सतहों में विरूपण उत्पन्न हो जाती है।

    पियरे क्यूरी (Pierre Curie) व उनके भाई जैक्वेश (Jacques) ने इन प्रभाव को क्वार्ट्स ((quartz)) व रोशले लवण ((Rochelle salt) के क्रिस्टलों (crystals) में देखा। इसे पीजो-विद्युत प्रभाव (Piezoelectric Effect) कहते हैं। बेरियम टाइटनेट व टूरमैलीन क्रिस्टलों में भी यह प्रभाव देखा गया है। क्रिस्टलों की सतह पर दबाव पड़ने से उनके एकांक सेल में ध्रुवण होता है जिससे धन व ऋण आवेश विभिन्न सतहों पर एकत्र होकर विद्युत क्षेत्र अथवा विभवान्तर उत्पन्न करते हैं। बड़े क्रिस्टलों में एकांक सेल नियमित क्रम में होते हैं अत: ध्रुवण से उत्पन्न प्रभाव कई गुना हो जाता है।

    गैस लाइटर में इसी प्रभाव के कारण चिंगारी उत्पन्न की जाती है। क्वार्ट्स क्रिस्टल (quartz crystals) को प्रत्यावर्ती विद्युत क्षेत्र में रखकर उनमें निश्चित आवृत्ति के कम्पन्न उत्पन्न किए जा सकते हैं। इनका प्रयोग आजकल क्वार्ट्ज घड़ियों में किया जा रहा है।

  • विद्युत शॉक (Electric Shock) कैसे लगता है ?

    विद्युत शॉक (Electric Shock) कैसे लगता है ?

    How does electric shock feel ?

    विद्युत के कारण जब शरीर में शॉक लगता है, तो संवेदी अंग (जहां शॉक लगा है) उस संकेत को विद्युत स्पन्दन (Pulse) के रूप में न्यूरॉन की सहायता से मस्तिष्क में भेजता है।

    इसकी चाल लगभग 25 मीटर प्रति सेकण्ड होती है।

    मस्तिष्क उसका विश्लेषण करके उतनी ही चाल से विद्युत संकेत को सम्बन्धित अंग को आवश्यक अनुक्रिया करने के लिए भेजता है, फलस्वरूप प्रभावित अंग की मांसपेशी सिकुड़ती है या अन्य अनुक्रिया करती है।

    इस प्रकार शरीर में न्यूरॉन (तन्त्र कोशिका) एक प्रकार के जैव-विद्युत रासायनिक सेल (Bioelectro chemical cell) का कार्य करता है।

  • विद्युत फ्यूज तार (Electric Fuse Wire) कैसे काम करता है ?

    विद्युत फ्यूज तार (Electric Fuse Wire) कैसे काम करता है ?

    How does Electric Fuse Wire work?

    विद्युत फ्यूज तांबा टिन व सीसा की मिश्र धातु से बना होता है एवं उसका गलनांक कम होता है। फ्यूज तार एक निश्चित क्षमता की मोटाई का लिया जाता है। तार के मोटाई जितनी अधिक होती है, उसमें प्रवाहित धारा का मान भी उतना ही अधिक होता है। विद्युत फ्यूज परिपथ के साथ श्रेणीक्रम में जोड़ा जाता है। इसका प्रयोग परिपथ में लगे उपकरणों की सुरक्षा के लिए किया जाता है।

    विद्युत परिपथों की सुरक्षा के लिए सबसे आवश्यक युक्ति फ्यूज है। फ्यूज ऐसे तार का टुकड़ा होता है जिसके पदार्थ का गलनांक (Melting point) बहुत कम होता है। जब परिपथ में अतिभारण या लघुपथन के कारण बहुत अधिक धारा प्रवाहित हो जाती है तब फ्यूज का तार गरम होकर पिघल जाता है। इसके फलस्वरूप परिपथ टूट जाता है और उसमें धारा प्रवाहित होनी बन्द हो जाती है। फ्यूज सदैव विद्युन्मय तार में लगाया जाता है। अच्छे फ्यूज का तार शुद्ध टिन धातु का बना होता है परन्तु सस्ता फ्यूज तांबे तथा टिन की मिश्र धातु का बना होता है

  • घरेलू विद्युत सप्लाई (Domestic Power Supply)

    घरेलू विद्युत सप्लाई (Domestic Power Supply)

    Domestic Power Supply

    घरों में सप्लाई की जाने वाली विद्युत 220V की A.C. (प्रत्यावर्ती धारा) होती है जिसकी ध्रुवता (Polarity) प्रति सेकण्ड 100 बार बदलती है अर्थात् उसकी आवृत्ति 50 हर्टज होती है। एक चक्र में धारा की ध्रुवता (अर्थात उसकी दिशा) दो बार बदलती है। इसे मुख्य लाइन (मेन लाइन) कहते हैं तथा जिन तारों में से यह धारा प्रवाहित होती है उन्हें मेन्स कहते हैं। मेन्स द्वारा प्राय: दो विभिन्न एम्पियर पर सप्लाई दी जाती है जो 5A तथा 15A होती है। पहले को ‘घरेलू’ (डोमेस्टिक) तथा दूसरे को ‘पॉवर लाइन’ कहते हैं।

    दो प्रकार की सप्लाई की आवश्यकता का कारण यह है, कि घरों में विभिन्न प्रकार के उपकरण, जैसे—बल्ब, ट्यूब, हीटर, रेडियो, टेलीविजन, रेफ्रिजरेटर, इत्यादि प्रयुक्त किए जाते हैं। इनमें से कुछ को 5A (घरेलू (डोमेस्टिक) की तथा कुछ को 15A (पॉवर लाइन) की धारा की आवश्यकता होती है।

    घरों में विभिन्न प्रतिरोध के उपकरण उपयोग में लाए जाते हैं। हीटर का प्रतिरोध लगभग 20-40 ओम होता है जबकि बल्ब का प्रतिरोध उसका लगभग 20 गुना अधिक होता है। यदि ये दोनों उपकरण श्रेणीक्रम में जुड़े हों, तो प्रवाहित होने वाली धारा कम हो जाएगी तथा प्रत्येक उपकरण को कार्य करने के लिए उपयुक्त शक्ति नहीं प्राप्त होगी। समान्तर क्रम संयोजन में तुल्य प्रतिरोध कम हो जाता है जिसके कारण प्रवाहित धारा बन्द हो जाती है। इस स्थिति में प्रत्येक उपकरण को आवश्यक ऊर्जा प्राप्त होती है।

    घरेलू वायरिंग (Domestic Wiring)

    घरों में विद्युत की मुख्य सप्लाई 3 कोर वाली तार द्वारा की जाती है जिन्हें विद्युन्मय (Live), उदासीन (Neutral) तथा भू-तार (Earth) कहते हैं।

    विद्युन्मय तार सामान्यतया लाल रंग का होता है तथा मेन्स से धारा इसके द्वारा प्रवाहित होती है।

    उदासीन तार सामान्यतया काले रंग का होता है तथा यह धारा को वापस ले जाता है।

    भू-तार सामान्यतया हरे रंग का होता है। ये तारें घर के अन्दर विभिन्न परिपथों को विद्युत सप्लाई करती हैं।

    घरों में प्रायः दो अलग परिपथ बनाए जाते हैं—एक तो 15 ऐम्पियर के उपकरणों के लिए तथा दूसरा 5 ऐम्पियर के उपकरण के लिए। भू-तार घर के निकट पृथ्वी में दबी एक धातु की प्लेट से जोड़ी जाती है। यह सुरक्षा का एक साधन है तथा सप्लाई को किसी प्रकार प्रभावित नहीं करता है।

  • विद्युत शक्ति संयन्त्र (Electric Power Plant) कैसे काम करता है ?

    विद्युत शक्ति संयन्त्र (Electric Power Plant) कैसे काम करता है ?

    How Electric Power Plant Works ?

    डीजल चालित जनरेटर (Diesel Generator) द्वारा कुछ किलोवाट तक की विद्युत शक्ति उत्पन्न की जा सकती है जबकि जल-विद्युत सयन्त्रों तथा परमाणु शक्ति संयन्त्रों (Atomic power plants) द्वारा बड़े पैमाने पर कई सौ मेगावाट की विद्युत उत्पन्न की जाती है।

    शक्ति संयन्त्र (Electric Power) में टरबाइन द्वारा विद्युत उत्पन्न की जाती है। टरबाइन में ब्लेड (पंख) लगे होते हैं जिन्हें बांध में से ऊपर से पानी गिराकर (जल-विद्युत सयन्त्र में) घुमाया जाता है। इसे भाप द्वारा परमाणु शक्ति संयन्त्र या तापीय शक्ति (थर्मल पॉवर (Thermal Power) संयन्त्र में अथवा वायुदाब द्वारा वायु शक्ति संयन्त्र में भी घुमाया जा सकता है। टरबाइन की अक्ष के साथ एक कुण्डली या क्रोड (Core) लगी रहती है जो टरबाइन के घूमने पर किसी स्थायी चुम्बकीय क्षेत्र में घूमने लगती है और विद्युत उत्पन्न करती है।

    शक्ति स्टेशनों में भाप उत्पन्न करने के लिए कोयला अथवा प्राकृतिक गैस का प्रयोग किया जाता है जबकि परमाणु शक्ति स्टेशनों में भाप के लिए नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Power) का उपयोग किया जाता है। डीजल चालित जनित्रों में डीजल ईंधन के रूप में प्रयुक्त होता है तथा उसकी मोटर स्वचालित वाहनों (ऑटोमोबाइल) के इंजन की तरह की होती है। डीजल चालित जनरेटर का उपयोग केवल घरों या छोटे भवनों में किया जाता है क्योंकि बड़े-से-बड़ा डीजल चालित जनरेटर भी 75 किलोवाट से अधिक शक्ति उत्पन्न नहीं कर सकता है।

    प्राथमिक शक्ति स्टेशनों पर जो विद्युत उत्पन्न होती है, वह प्रत्यावर्ती धारा होती है तथा उसकी वोल्टता 22,000 V या इससे भी अधिक हो सकती है। विद्युत धारा को उपभोक्ताओं तक संचरण लाइनों (Transmission lines) द्वारा भेजा जाता है। ग्रिड उपस्टेशन (Grid substation) प्रायः ट्रांसफॉर्मरों की सहायता से वोल्टता बढ़ा देते हैं जो 1,32,000 V तक भी हो सकती है। इतनी अधिक वोल्टता पर विद्युत संचरण में विद्युत ऊर्जा का क्षय बहुत कम हो जाता है।

  • टेलीफोन (Telephone) कैसे काम करता है ?

    टेलीफोन (Telephone) कैसे काम करता है ?

    How Telephone Works ?

    टेलीफोन एक ऐसा उपकरण है जिसके द्वारा संवादों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जाता है। इसके दो मुख्य भाग होते हैं माइक्रोफोन तथा अभिग्राही (receiver)।

    जब ध्वनि तरंगें माइक्रोफोन में प्रवेश करती हैं, तो इससे प्राथमिक परिपथ में प्रतिरोध के परिवर्तन के कारण धारा परिवर्तित होती है। इस परिवर्तित धारा के कारण एक उच्च विभव वाली प्रत्यावर्तित धारा उत्पन्न होती है जिसकी आवृत्ति माइक्रोफोन में प्रवेश करने वाली ध्वनि की आवृत्ति के बराबर होती है।

    यह प्रत्यावर्ती धारा तारों से होकर दूसरे टेलीफोन के अभिग्नाही तक पहुंचती है, जहां विद्युतीय ऊर्जा पुनः ध्वनि ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है।

    ट्रांसफॉर्मर के उपयोग के बिना भी संवादों को सम्प्रेषित किया जा सकता है, लेकिन ऐसा कुछ ही दूरियों के लिए सम्भव है।