Category: फ़िजिक्स

  • अर्धचालक (Semiconductor) क्या है ?

    अर्धचालक (Semiconductor) क्या है ?

    What is Semiconductor ?

    जर्मेनियम व सिलिकॉन जैसे पदार्थ जिनकी विद्युत चालकता सामान्य ताप पर चालक (Conductors) व विद्युत-रोधी (Insulators) पदार्थों की चालकताओं के मध्य होती है, ‘अर्धचालक’ कहलाते हैं।

    ताप बढ़ाने पर अर्धचालक की चालकता बढ़ती है तथा ताप घटाने पर घटती है जबकि चालक पदार्थों की चालकता ताप बढ़ाने पर घटती है।

    शुद्ध अर्धचालक को ‘निज अर्धचालक’ (Intrinsic semiconductor) कहते है तथा अपद्रव्य (Impurity) युक्त अर्धचालक को ‘बाह्य अर्धचालक’ (Extrinsic semiconductor) कहते हैं। अपद्रव्य मिलाए जाने की प्रक्रिया को ‘डोपिंग’ (Doping) कहते हैं।

    N-टाइप अर्धचालक

    शुद्ध अर्धचालक (जैसे–जर्मेनियम) में किसी पंचसंयोजी (Pentavalent) अपद्रव्य, जैसे आर्सेनिक को मिलाने से N-टाइप अर्धचालक प्राप्त होता है। इसमें धारा प्रवाह मुख्यतः इलेक्ट्रॉनों द्वारा होता है।

    P-टाइप अर्धचालक

    शुद्ध अर्धचालक में किसी त्रिसंयोजी (Trivalent) अपद्रव्य, जैसे-ऐलुमिनियम को मिलाने से P-टाइप अर्धचालक प्राप्त होता है। इसमें धारा प्रवाह मुख्य रूप से होल (Hole) द्वारा किया जाता है।

    उदाहरण

    ट्रांजिस्टर (Transistor): इसमें भिन्न अर्द्ध चालकों की दो संधियां बनाई जाती है। जब एक N-टाइप अर्धचालक की पतली पर्त को दो P-टाइप अर्धचालकों के मध्य दबा कर रखा जाता है, तो इससे P-N-P प्रकार का ट्रांजिस्टर बन जाता है।

  • X-किरणें (X-Rays) क्या है ? एक्स किरणों की खोज, उनके प्रकार,गुण और विशेषताएँ  (Hindi me)

    X-किरणें (X-Rays) क्या है ? एक्स किरणों की खोज, उनके प्रकार,गुण और विशेषताएँ (Hindi me)

    इस आर्टिकल में हम जानेगें कि X-किरणें (X-Rays) क्या होती है ? उसकी खोज कब हुई ? उसके प्रकार क्या है ?, एक्स-रे किरणों की गुण और विशेषताएँ क्या है ?

    एक्स-रे विद्युत चुम्बकीय विकिरण (electromagnetic radiation) का एक प्रकार हैं जिसका सबसे ज्यादा आम प्रयोग चिकित्सकों द्वारा किसी रोगी की त्वचा के माध्यम से उसकी हड्डियों की छवियों (images) को देखा जाता है । टेक्नोलॉजी के बढ़ने के साथ केंद्रित एक्स-रे बीम के साथ-साथ इन प्रकाश तरंगों का प्रयोग तेजी से बढ़ा है और आज X – रे किरणों जैविक कोशिकाओं की इमेजिंग से लेकर कैंसर कोशिकाओं को मारने तक में सक्षम है ।

    X-किरणों का इतिहास (History of X-rays)

    एक्स-रे किरणों की खोज 1895 में जर्मनी के वुर्जबर्ग विश्वविद्यालय (Würzburg University) के प्रोफेसर विल्हेम कॉनराड रोएंटजेन (Wilhelm Conrad Röentgen) ने की थी।

    नॉनडेस्ट्रक्टिव रिसोर्स सेंटर ( Nondestructive Resource Center) के “हिस्ट्री ऑफ रेडियोग्राफी” के अनुसार, रोएंटजेन ने एक उच्च वोल्टेज कैथोड-रे ट्यूब (cathode-ray tube) के पास क्रिस्टल को एक फ्लोरोसेंट (fluorescent) चमक प्रदर्शित करते हुए देखा, और ऐसा तब हुआ जब कि क्रिस्टल को रोएंटजेन ने काले कागज से परिरक्षित (shielded) किया। कागज को भेदने वाली नली से किसी प्रकार की ऊर्जा उत्पन्न हो रही थी और क्रिस्टलों में चमक आ रही थी। रॉन्टगन ने इस अज्ञात ऊर्जा को “एक्स-विकिरण” कहा। इस तरह प्रयोगों से पता चला कि यह विकिरण हमारी त्वचा के नरम ऊतकों में प्रवेश कर सकता है लेकिन हड्डी में नहीं, और इस तरह एक्स-रे किरणों का प्रयोग फोटोग्राफिक प्लेटों पर छाया चित्र उत्पन्न करने में होने लगा l

    X-किरणों का उत्पादन कैसे होता है ? How are X-rays produced?

    X-किरणों का उत्पादन एक निर्वातित (Evacuated) X-किरण नलिका में किया जाता है जिसमें एक इलेक्ट्रॉनों का स्रोत, जैसे—एक तप्त तन्तु (Heated filament) तथा एक टंगस्टन का लक्ष्य (Target) होता है जिससे इलेक्ट्रॉन टकराते हैं, अर्थात् स्रोत व लक्ष्य आमने-सामने होते हैं। इन दोनों के मध्य लगभग 50,000 से 1,00,000 वोल्ट का विभवान्तर रखा जाता है। उच्च विभवान्तर के कारण इलेक्ट्रॉन लक्ष्य की ओर त्वरित हो जाते हैं और बहुत अधिक वेग से लक्ष्य से टकराते हैं।

    अभिलाक्षणिक X-किरणें (Characteristic X-rays)

    टंगस्टन के परमाणु उत्तेजित हो जाते हैं और जब वे अपनी सामान्य अवस्था में आते हैं, तो X-किरणों के फोटॉन उत्सर्जित करते हैं। इस तरह उत्पन्न X-किरण फोटॉन की ऊर्जा निश्चित होती है, अतः इन्हें ‘अभिलाक्षणिक X-किरणें’ (Characteristic X-rays) कहते हैं।

    संतत X-किरणें (Continuous X-rays)

    इसके विपरीत, यदि X-किरणों के फोटॉनों की ऊर्जाएं एक निश्चित न्यूनतम मान से किसी निश्चित अधिकतम मान तक के बीच की सभी सम्भव ऊर्जाएं होती हैं, तो इस तरह की X-किरणों को ‘संतत X-किरणें’ (Continuous X-rays) कहते हैं। ये किरणें तब उत्पन्न होती हैं जब कुछ इलेक्ट्रॉन लक्ष्य के निकट के स्थान में अवमन्दित (Decelerated) होते हैं।

    एक्स किरणों के प्रकार (Types of X-Rays)

    एक्स-रे किरणों को मोटे तौर पर सॉफ्ट (नरम) एक्स-रे किरणें (soft X-rays) और हार्ड (कठोर) एक्स-रे किरणें (hard X-rays) में वर्गीकृत किया जाता है। नरम एक्स-रे में लगभग 10 नैनोमीटर (एक नैनोमीटर मीटर का एक अरबवां हिस्सा) की अपेक्षाकृत कम तरंग दैर्ध्य (wavelengths) होती है, और इसलिए वे पराबैंगनी (ultraviolet) (यूवी) प्रकाश और गामा-किरणों (gamma-rays) के बीच विद्युत चुम्बकीय (electromagnetic) (ईएम) स्पेक्ट्रम की सीमा में आते हैं। हार्ड एक्स-रे में लगभग 100 पिकोमीटर की तरंग दैर्ध्य होती है (एक पिकोमीटर एक मीटर का एक ट्रिलियनवां हिस्सा होता है)। ये विद्युतचुंबकीय तरंगें EM स्पेक्ट्रम के समान क्षेत्र में गामा-किरणों के रूप में व्याप्त हैं। उनके बीच एकमात्र अंतर उनके स्रोत का है: एक्स-रे इलेक्ट्रॉनों को तेज करके उत्पन्न होते हैं, जबकि गामा-किरणें चार परमाणु प्रतिक्रियाओं में से एक में परमाणु नाभिक द्वारा निर्मित होती हैं।

    एक्स किरणों के गुण (Properties of X-Rays)

    मानव शरीर पर सीधे X किरणें के उपयोग होने पर यह उत्तकों और स्वेत रुधिर कोशिकाओं को नष्ट कर सकती है ।

    ये किरणें प्रकाश के वेग से गति करती है, निर्वात में इनकी गति 3.00 × 108 m/s होती है।

    X किरणें विद्युत चुम्बकीय विकिरण होती है जिनकी तरंग दैर्ध्य 10 A से 0.01 A के मध्य होती है।

    चुम्बकीय क्षेत्र तथा विद्युत क्षेत्र द्वारा ये किरणें विक्षेपित नहीं होती है।

    इनकों नग्न आखों से नहीं देखा जा सकता है।

    सामान्य प्रकाश की तरह ये किरणें भी अपवर्तन , परावर्तन , विवर्तन , व्यतिकरण आदि घटनाओं को प्रदर्शित करती है।

    ये किरणें कॉम्पटन प्रभाव तथा प्रकाश विद्युत प्रभाव को प्रदर्शित करती है।

    खुली जगह में एक सीधी रेखा के रूप में गति करती है।

    इनमे कोई ध्वनी उत्पन्न नहीं होती है और न ही कोई गंध उत्पन्न होती है।

    सीसा X  किरणों का सबसे अच्छा अवशोषक होता है।

    इन किरणों का उपयोग राडार में नहीं किया जा सकता है क्यूंकि ये किरणें लक्ष्य से परावर्तित कम होती है और लक्ष्य द्वारा अवशोषित अधिक होती है।

    एक्स किरणों का उपयोग (Uses of X-Rays)

    कुछ सामग्रियों में अन्दर घुसने की इनकी क्षमता के कारण, एक्स किरणों का उपयोग कई गैर-विनाशकारी मूल्यांकन और परीक्षण अनुप्रयोगों विशेष रूप से संरचनात्मक घटकों (structural components) में खामियों या दरारों की पहचान के लिए किया जाता है, ।

    इसका उपयोग डॉक्टरों और दंत चिकित्सकों द्वारा क्रमशः हड्डियों और दांतों की एक्स-रे छवियों को बनाने के लिए किया जाता है।

    एक्स किरणों के द्वारा ही यात्रियों के सामान (luggage), कार्गो और परिवहन आदि का सुरक्षा निरीक्षण  किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक इमेजिंग डिटेक्टर कोई भी सामान और वस्तुओं को रियल टाइम में देख सकते है और उनकी जाँच कर सकते है ।

    रेडिएशन थेरेपी में high-energy radiation द्वारा X – किरणों के उपयोग से कैंसर कोशिकाओं के डीएनए को डैमेज कर शरीर से उन्हें खत्म किया जाता है l

    रेडियोग्राफी में इनका उपयोग किया जाता है।

    किसी भी क्रिस्टल की संरचना अध्ययन x किरणों की मदद से की जाती है।

    रेडियो चिकित्सा के क्षेत्र में x किरणों का उपयोग किया जाता है l

  • कैथोड किरणें (Cathode Rays) क्या है ? कैथोड किरणों की खोज, कैथोड किरणों के गुण और विशेषताएँ क्या है, केथोड किरणें नलिका क्या है (in Hindi)

    कैथोड किरणें (Cathode Rays) क्या है ? कैथोड किरणों की खोज, कैथोड किरणों के गुण और विशेषताएँ क्या है, केथोड किरणें नलिका क्या है (in Hindi)

    What is Cathode Rays ?

    जब विसर्जन नलिका (Discharge tube) के सिरों पर 20 किलो वोल्ट का विभवान्तर लगाया जाता है और उसका दाब 0.1 मिलीमीटर पारे के स्तम्भ के बराबर होता है, तो उसके कैथोड से एक इलेक्ट्रॉन पुंज (Beam) निकलने लगता है। इसे ही ‘कैथोड किरणें‘ कहते हैं। अत: कैथोड किरणें केवल उच्च ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉनों का पुंज है। इसके अलावा जब किसी इलेक्ट्रान नलिका में किसी फिलामेंट को गर्म किया जाता है तो इस फिलामेंट से भी इलेक्ट्रान की धारा निकलती है अर्थात इससे भी इलेक्ट्रान उत्सर्जित होते है इन ऋणात्मक कणों को भी कैथोड किरणें कहा जता है।

    जब कैथोड किरणें किसी उच्च परमाणु क्रमांक वाली धातु (जैसे—टंगस्टन) पर गिरती हैं, तो ये X-किरणें उत्पन्न करती हैं। कैथोड किरणें कांच पर गिरती हैं, तो प्रतिदीप्ति उत्पन्न करती हैं।

    ये विद्युत तथा चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा विक्षेपित (Deflect) हो जाती हैं।

    कैथोड किरणों की खोज किसने की ?

    कैथोड किरणें पहली बार 1869 में जर्मन भौतिक विज्ञानी जूलियस प्लकर और जोहान विल्हेम हिट्टोर्फ (Julius Plücker and Johann Wilhelm Hittorf) द्वारा देखी गई थी और 1876 में यूजेन गोल्डस्टीन कैथोडेनस्ट्रालेन (Eugen Goldstein Kathodenstrahlen) द्वारा इन्हें ‘कैथोड किरणों (Cathode Rays)’ का नाम दिया। 1897 में, ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी जे जे थॉमसन (J. J. Thomson) ने दिखाया कि कैथोड किरणें पहले अज्ञात नेगेटिव आवेशित कणों से बनी थीं, जिसे बाद में इलेक्ट्रॉन नाम दिया गया।

    कैथोड-रे ट्यूब

    कैथोड-रे ट्यूब (Cathode-ray tubes (CRTs) (सीआरटी) के जरिये एक स्क्रीन पर कोई भी इमेज (छवि) दिखाने के लिए विद्युत या चुंबकीय क्षेत्रों द्वारा विक्षेपित इलेक्ट्रॉनों के एक केंद्रित बीम का उपयोग करते हैं।

    कैथोड किरणों के गुण

    1. कैथोड किरणों को केवल गैस का प्रयोग करके पैदा किया जा सकता है।

    2. कैथोड किरणों के उत्पादन में विभव का स्रोत प्रेरण कुन्डली होता है, जो कम विभव के सेल से बहुत उच्च विभव प्रदान करता है। यह पारम्परिक प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है।

    3. कैथोड किरणों अदृश्य होती है और सीधी रेखाओं में चलती है।

    4. कैथोड किरणों ऋणात्मक होती है, इसलिए ये कैथोड से एनोड की तरफ गमन करती है। ये इलेक्ट्रान की बनी होती है और अपनी सतह के लंबवत निकलती है।

    5. कैथोड किरणों का वेग, प्रकाश के वेग का 1/10 गुण होता है।

    6. यह किरण विघुत एवं चुंबकीय क्षेत्र में विक्षेपित होती है।

    7. यह गैसो को आयनित कर देती है एवं धातु पर उष्मीय प्रभाव दिखलाती है।

    8. यह फोटोग्राफिक प्लेट को प्रभावित करती है।

    9. इसकी वेधन क्षमता कम होती है यह धातु की चादर से पार कर जाती है।

    10. कैथोड किरणें जब विघुतीय क्षेत्र से होकर लंबवत गुजरती है, तो इसका रास्ता परवलयाकार होता है।

  • तापदीप्ति (Incandescence) और प्रतिदीप्ति (Fluorescence) क्या है ? तापदीप्तता और प्रतिदीप्तिता की विशेषताएँ (in Hindi)

    तापदीप्ति (Incandescence) और प्रतिदीप्ति (Fluorescence) क्या है ? तापदीप्तता और प्रतिदीप्तिता की विशेषताएँ (in Hindi)

    निचे दिए article में हम तापदीप्ति (Incandescence) और प्रतिदीप्ति (Fluorescence) क्या है, और उनकी विशेषतायें क्या है ? इनके बारे में बतायेगे l

    तापदीप्ति (Incandescence) क्या है ? What is Incandescence ?

    यदि पदार्थ को गर्म करके उसके परमाणुओं को उत्तेजित किया जाए तो अपनी सामान्य अवस्था में आने पर वे प्रकाश विकिरण उत्सर्जित करते हैं (अर्थात् गर्म करने पर कुछ पदार्थ चमकने लगते हैं)। इस घटना को ‘तापदीप्ति’ कहते हैं

    सामान्य विद्युत बल्ब के गर्म टंगस्टन तन्तु द्वारा उत्सर्जित किए गए प्रकाश में विभिन्न तरंग दैर्यों का मिश्रण (विभिन्न रंगों का मिश्रण) होता है इसीलिए वह प्रकाश श्वेत दिखाई देता है। सूर्य का प्रकाश भी तापदीप्ति का ही परिणाम है।

    तापदीप्ति (Incandescence) की विशेषताएँ क्या है ?

    तापदीप्तता तापीय विकिरण (thermal radiation) के कारण होती है। यह आमतौर पर विशेष रूप से दृश्य प्रकाश (Visible light) को संदर्भित करता है, जबकि थर्मल विकिरण इन्फ्रारेड या किसी अन्य विद्युत चुम्बकीय विकिरण को संदर्भित करता है।

    ज्यादा efficient प्रकाश स्रोत, जैसे कि फ्लोरोसेंट लैंप और एलईडी, तापदीप्ति द्वारा कार्य नहीं करते हैं।

    सूरज की रोशनी सूरज की “सफेद गर्म” सतह की ही तापदीप्ति है

    प्रतिदीप्ति (Fluorescence) क्या है ?

    कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं कि यदि उन पर पराबैंगनी प्रकाश (अर्थात् उसके फोटॉन) डाला जाए तो वे उसे अवशोषित कर लेते हैं और उनके परमाणु इस अतिरिक्त ऊर्जा को प्राप्त करके उत्तेजित अवस्था में चले जाते हैं। जब वे सामान्य अवस्था (Ground state) में आते हैं, तो दृश्य प्रकाश का उत्सर्जन करते हैं। ऐसे पदार्थों को ‘प्रतिदीप्त पदार्थ’ (Fluorescent materials) तथा इस घटना को ‘प्रतिदीप्ति’ कहते हैं।

    प्रतिदीप्ति (Fluorescence) की विशेषताएँ और उदाहरण क्या है ?

    घरों में प्रयोग की जाने वाली ट्यूब में इसी घटना का उपयोग किया जाता है। इस ट्यूब में पारे की वाष्प तथा आर्गन गैस (या अन्य कोई अक्रिय गैस) का मिश्रण भरा रहता है। विद्युत-धारा प्रवाहित होने पर इस मिश्रण द्वारा पराबैंगनी विकिरण का उत्सर्जन किया जाता है।

    ट्यूब की दीवारों पर प्रतिदीप्त पदार्थ जिसे ‘फॉस्फर’ (Phosphor) कहते हैं, का लेप होता है जो इन पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर लेता है और बाद में दृश्य प्रकाश का उत्सर्जन करता है।

    प्रतिदीप्ति पदार्थों के दैनिक जीवन में अनेक उपयोग देखने को मिलते हैं। इनकी सहायता से आंखों से न दिखायी देने वाले विकिरणों, जैसे—पराबैंगनी किरणें, एक्स किरणें, आदि का पता लगाया जाता है।

  • फोटो सेल (Photo Cell) क्या है ?

    फोटो सेल (Photo Cell) क्या है ?

    What is Photo Cell ?

    फोटो सेल वह यंत्र है जो प्रकाश ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदल देता है

    एक फोटोवोल्टिक सेल (Photovoltaic Cell) एक अर्धचालक उपकरण है जो प्रकाश ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है। इसे सौर सेल के रूप में जाना जाता है जब प्रकाश स्रोत सूर्य का प्रकाश होता है।

    जब प्रकाश एक फोटोवोल्टिक सेल के पारदर्शी आवरण से होकर गुजरता है और बाधा परत (barrier layer) से टकराता है, तो सेलेनियम परमाणुओं (selenium atoms) में इलेक्ट्रॉन ऊर्जा प्राप्त करते हैं और पारदर्शी आवरण पर जमा होने के लिए बाधा परत के माध्यम से वैलेंस रिंग (valence ring) से आगे बढ़ते हैं।\

    उदाहरण

    इस सेल का उपयोग सिनेमा घरों में ध्वनि के पुनरुत्पादन में, फोटोग्राफी में तथा टेलीविजन में किया जाता है।

    बैंकों में चोरी की सूचना देने वाले बर्गलर्स एलार्म में इन्हीं का उपयोग होता है।

    अंतरिक्ष यात्री इसी सेल द्वारा ‘सौर बैटरी’ से सूर्य के प्रकाश को विद्युत ऊर्जा में बदल लेते हैं।

    फोटो सेल सड़कों पर बत्तियों के स्वतः जलने तथा बुझने में भी उपयोग में लाए जाते हैं।

    फोटोवोल्टिक प्रभाव (photovoltaic effect) V/s फोटोइलेक्ट्रिक प्रभाव (photoelectric effect)

    फोटोवोल्टिक प्रभाव (photovoltaic effect) फोटोइलेक्ट्रिक प्रभाव (photoelectric effect) से निकटता से संबंधित है। फोटोवोल्टिक प्रभाव में प्रकाश अवशोषित हो जाता है और एक इलेक्ट्रॉन या अन्य आवेश वाहक उच्च ऊर्जा अवस्था के लिए उत्साहित होता है।

    जबकि फोटोइलेक्ट्रिक प्रभाव शब्द का उपयोग तब किया जाता है जब इलेक्ट्रॉन को सामग्री से बाहर निकाल दिया जाता है, जबकि फोटोवोल्टिक शब्द का उपयोग सामग्री के भीतर रहता है।

  • प्रकाश-विद्युत प्रभाव (Photo-electric Effect) क्या है ? आइंस्टीन का प्रकाश विद्युत प्रभाव क्या है? प्रकाश-विद्युत प्रभाव के नियम और विशेषताएँ  (Hindi me)

    प्रकाश-विद्युत प्रभाव (Photo-electric Effect) क्या है ? आइंस्टीन का प्रकाश विद्युत प्रभाव क्या है? प्रकाश-विद्युत प्रभाव के नियम और विशेषताएँ (Hindi me)

    इस आर्टिकल में हम प्रकाश-विद्युत प्रभाव (Photo-electric Effect) क्या है ? आइंस्टीन का प्रकाश विद्युत प्रभाव (फोटो इलेक्ट्रिक इफ़ेक्ट) क्या है? प्रकाश-विद्युत प्रभाव के नियम और विशेषताएँ क्या है ? आइंस्टीन के प्रकाश विद्युत समीकरण की स्थापना कैसे हुई ? प्रकाश विद्युत उत्सर्जन का आशय और उसके नियम क्या है ?

    प्रकाश-विद्युत प्रभाव की परिभाषा

    प्रकाश क्वांटा-फोटॉन (light quanta – photons) के कारण धातु की प्लेट से इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन होता है।

    किसी धातु की सतह पर प्रकाश पड़ने से इलेक्ट्रॉन निकलने की क्रिया ‘प्रकाश-विद्युत प्रभाव’ कहलाती है। सभी क्षारीय धातुएं एवं जिंक प्रकाश के साथ विद्युत प्रभाव दिखाती हैं। सभी धातुएं एक्स-किरणों एवं गामा-किरणों के साथ भी प्रकाश-विद्युत प्रभाव दिखाती है।

    दुसरे शब्दों में, फोटो इलेक्ट्रिक प्रभाव, वह घटना है जिसमें विधुत आवेशित कण, विद्युत चुम्बकीय किरण(electromagnetic radiation) को अवशोषित करने पर किसी पदार्थ ((धातु, अधातु ठोस, द्रव एवं गैसें) से या उसके भीतर निकलते हैं। इस प्रभाव में अक्सर किसी मेटल प्लेट पर प्रकाश पड़ने पर उसमे से इलेक्ट्रॉनों का डिस्चार्ज होता है ।

    व्यापक परिभाषा में, दीप्तिमान ऊर्जा (radiant energy) इन्फ्रारेड, दृश्य (visible), या पराबैंगनी प्रकाश, एक्स-रे, या गामा किरणों के रूप में हो सकती हैं; पदार्थ ठोस, तरल या गैस हो सकते है; और जो पार्टिकल रिलीज़ होते है वो विद्युत आवेशित परमाणु या अणु के साथ-साथ इलेक्ट्रॉन भी हो सकते हैं। यह घटना आधुनिक भौतिकी के विकास में मौलिक रूप से महत्वपूर्ण थी क्योंकि इसने प्रकाश की प्रकृति के बारे में महत्वपुर्ण प्रश्नों को उठाया था

    प्रकाश-विद्युत प्रभाव की खोज हर्ट्स (Heinrich Rudolf Hertz) ने की थी। रेडियो तरंगों पर करने के दौरान,  हर्ट्ज ने देखा कि, जब दो धातु इलेक्ट्रोड पर पराबैंगनी प्रकाश चमकता है, तो प्रकाश जिस पर स्पार्किंग होती है उसके वोल्टेज को बदल देता है । प्रकाश और बिजली (इसलिए फोटोइलेक्ट्रिक) के बीच इस संबंध को 1902 में एक अन्य जर्मन भौतिक विज्ञानी फिलिप लेनार्ड (Philipp Lenard) ने स्पष्ट किया था। इसकी विस्तृत व्याख्या आइन्सटीन (Albert Einstein) एवं मिलिकन (Robert A. Millikan) ने की जिसके लिए उन्हें क्रमश: 1921 एवं 1923 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुए।

    विद्युत-चुम्बकीय तरंगें छोटे-छोटे कणों से बनी होती हैं, जिन्हें फोटॉन कहते हैं। ये फोटॉन धातु की सतह से टकराते हैं तब एक फोटॉन की कुछ ऊर्जा धातु के एक-एक इलेक्ट्रॉन में स्थानान्तरित हो जाती है।

    प्रकाश-विद्युत प्रभाव के नियम

    1. जब प्रकाश के विशेष रंग की कोई किरण धातु की सतह पर पड़ती है, तब प्रति सेकण्ड धातु की सतह से निकलने वाले इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रकाश की तीव्रता के अनुक्रमानुपाती होती है।

    2. उत्सर्जित इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा का मान शून्य से महत्तम के बीच बदलता रहता है। इलेक्ट्रॉन की इस गतिज ऊर्जा का मान प्रकाश की आवृत्ति पर निर्भर करता है, प्रकाश की तीव्रता पर नहीं।

    3. धातु की सतह पर पड़ने वाले प्रकाश की आवृत्ति का मान एक निश्चित मान से कम होता है, तो इलेक्ट्रॉन का उत्सर्जन धातु की सतह से नहीं हो पाता है। आवृत्ति के इस न्यूनतम निश्चित मान को ‘देहली आवृत्ति’ (Threshold frequency) कहते हैं। भिन्न-भिन्न धातुओं के लिए इसका मान भिन्न-भिन्न होता है। क्षारीय धातुओं के लिए इस आवृत्ति का मान वर्णक्रम के दृश्य क्षेत्र में होता है।

    आइंस्टीन का प्रकाश विद्युत प्रभाव

    आइन्स्टीन ने बताया कि प्रकाश-विद्युत प्रभाव के लिए आपतित फोटॉन की ऊर्जा का मान धातु के कार्यफलन (Work function) और उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा के मान के योग के बराबर होता है

  • परमाणु संरचना (Atomic Structure) क्या है ?

    परमाणु संरचना (Atomic Structure) क्या है ?

    इस आर्टिकल में हम जानेगे :

    1. परमाणु संरचना क्या होती है?
    2. परमाणु संरचना की खोज कब हुई?

    बोर मॉडल’ (Bohr’s model)

    परमाणु संरचना के मॉडलों में तरंग यान्त्रिकी मॉडल (Wave mechanical model) विशेष रूप से सफल रहा है। इसका प्रारम्भिक रूप ‘बोर मॉडल’ (Bohr’s model) है जिसे सन् 1913 में डेनमार्क के भौतिक विज्ञानी नील्स बोर ने हाइड्रोजन के लिए प्रस्तुत किया था। इसके अनुसार, परमाणु में नाभिक के चारों ओर विभिन्न वृत्ताकार कक्षाओं (Circular orbits) में इलेक्ट्रॉन घूमते रहते हैं, जैसे—सूर्य के चारों ओर पृथ्वी, मंगल, आदि ग्रह घूमते रहते हैं। सबसे हल्का परमाणु हाइड्रोजन का होता है जिसमें केवल 1 इलेक्ट्रॉन होता है और सबसे भारी प्राकृतिक रूप से उपलब्ध परमाणु यूरेनियम का है जिसमें 92 इलेक्ट्रॉन होते हैं

    विकिरण उत्सर्जन

    सामान्य परमाणु में इलेक्ट्रॉन अपने न्यूनतम ऊर्जा-स्तर में रहते हैं परन्तु यदि पदार्थ को गरम करके परमाणुओं को अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान की जाए तो उसके कुछ इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तरों में चले जाते हैं। यदि उच्च ऊर्जा वाला कोई कण इलेक्ट्रॉन से टकराकर उसे अपनी ऊर्जा दे देता है तो भी इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा-स्तर में पहुंच सकता है। इस स्थिति में परमाणु को ‘उत्तेजित अवस्था’ (Excited state) में कहा जाता है। परन्तु परमाणु इस अवस्था में 10-8 सेकण्ड से अधिक देर तक नहीं रहता है और इलेक्ट्रॉन वापस किसी निम्न ऊर्जा स्तर में चला जाता है। दोनों ऊर्जा-स्तरों में जो अन्तर होता है वह उतनी ऊर्जा के फोटॉन के रूप में उत्सर्जित हो जाता है। इसे ही ‘विकिरण उत्सर्जन‘ कहते हैं।

    फोटॉन को ऊर्जा का पैकेट माना जा सकता है। यदि फोटॉन की ऊर्जा अधिक है, तो वे गामा किरणों (या उच्च ऊर्जा विद्युत-चुम्बकीय तरंग) के फोटॉन होते हैं और कम होने पर वे क्रमशः एक्स-किरणों के, पराबैंगनी किरणों के, दृश्य प्रकाश के या अवरक्त विकिरण के फोटॉन हो सकते हैं।

  • परमाणु भौतिकी (Atomic Physics) क्या है ?

    परमाणु भौतिकी (Atomic Physics) क्या है ?

    What is Atomic Physics ?

    परमाणु भौतिकी में परमाणु तथा उसकी अन्तक्रियाओं (Interactions) का अध्ययन किया जाता है।

    डाल्टन के परमाणुवाद के अनुसार, परमाणु पदार्थ के सबसे छोटे कण होते हैं। ये परमाणु अविभाज्य होते हैं, किन्तु बीसवीं सदी के वैज्ञानिक जे. जे. थॉमसन (J.J. Thomson) व रदरफोर्ड (Ernest Rutherford) ने पदार्थ की संरचना के गहन अध्ययन से निष्कर्ष निकाला कि परमाणु अविभाज्य नहीं है, बल्कि यह छोटे-छोटे आवेशित कणों से मिलकर बना होता है

    नाभिक, इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन

    आधुनिक अभिधारणा के अनुसार, परमाणु धनावेशित प्रोटॉनों, ऋणावेशित इलेक्ट्रॉनों व उदासीन न्यूट्रॉनों से मिलकर बना होता है। परमाणु के केन्द्र में एक ‘नाभिक’ (Nucleus) होता है जिसमें परमाणु का लगभग सम्पूर्ण द्रव्यमान प्रोटॉन व न्यूट्रॉन के रूप में समाहित होता है। नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉनों का बादल जैसा होता है जिसमें इलेक्ट्रॉन लगातार गति करते रहते हैं। इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रोटॉनों की संख्या के बराबर होती है। प्रोटॉन पर धनात्मक आवेश तथा इलेक्ट्रॉन पर उतना ही ऋणात्मक आवेश होता है परन्तु न्यूट्रॉन आवेश रहित होता है।

    मूल कणों की विशेषताएं:

    कण द्रव्यमान (किग्रा.)आवेश (कूलाम्ब)
    प्रोटॉन1.672 x 10-27+ 1.6 x 10-19
    न्यूट्रॉन1.675 x 10-270 ( आवेशहीन)
    इलेक्ट्रॉन9.108 x 10-31– 1.6 x 10-19
  • प्रकाश के स्त्रोत क्या है ?

    प्रकाश के स्त्रोत क्या है ?

    What are Sources of Light ?

    सूर्य

    सूर्य के केन्द्र में नाभिकीय संलयन (Nuclear fusion) क्रिया द्वारा हाइड्रोजन लगातार हीलियम में बदलती रहती है और अपार ऊर्जा निकलती रहती है। सूर्य, इस ऊर्जा का कुछ भाग पृथ्वी को प्रकाश के रूप में प्रदान करता है।

    सूर्य से पृथ्वी को प्रति सेकण्ड लगभग 4×1026 जूल ऊर्जा प्राप्त होती है। केवल इतनी ऊर्जा प्रदान करने में भी प्रति सेकण्ड सूर्य के द्रव्यमान में लगभग 4 x 109 किग्रा. की कमी हो रही है परन्तु फिर भी सूर्य अपना प्रकाश लगभग 450 करोड़ वर्षों तक देता रहेगा।

    तापदीप्त स्रोत

    जब किसी पिण्ड को अत्यधिक गरम किया जाता है, तो वह प्रकाश देने लगता है, ऐसे पिण्ड को ‘तापदीप्त स्रोत’ कहते हैं। उत्सर्जित प्रकाश का रंग स्रोत के ताप पर निर्भर करता है। उत्सर्जित प्रकाश का रंग स्रोत के ताप पर निर्भर करता है।

    प्रदीप्त वस्तुएं (Luminous bodies)

    वे वस्तुएं जो अपने स्वयं के प्रकाश से प्रकाशित होती हैं, जैसे विद्युत-बल्ब, सूर्य, तारे, आदि ‘प्रदीप्त वस्तुएं’ कहलाती हैं।

    अप्रदीप्त वस्तुएं (Non-luminous bodies)

    ऐसी वस्तुएं जिनका अपना प्रकाश नहीं होता है परन्तु उन पर यदि प्रकाश डाला जाए, तो वे दिखाई देती हैं, जैसे–चन्द्रमा, सभी ग्रह, वृक्ष, पर्वत, आदि ‘अप्रदीप्त वस्तुएं’ कहलाती हैं।

    जैव-प्रकाश (Bio-luminescence)

    जुगनू (Fire fly) जैसे कुछ जन्तु प्रकाश उत्सर्जित करते है, इसे जैव-प्रकाश (Bio-luminescence) कहते हैं।

  • अवतल दर्पण क्या है ?

    अवतल दर्पण क्या है ?

    What is concave mirror ?

    गोलीय दर्पण (Spherical Mirror): गोलीय दर्पण उस दर्पण को कहते हैं जिसकी परावर्तक सतह एक खोखले गोले का एक भाग होती है। गोलीय दर्पण प्रायः कांच के एक टुकड़े को रजतित (Silvered) कर बनाया जाता है।

    ये दो प्रकार के होते हैं—अवतल दर्पण तथा उत्तल दर्पण।

    अवतल दर्पण में एक परावर्तक सतह (reflective surface) होती है जो प्रकाश स्रोत से अंदर और दूर घुमावदार (curved) होती है। अवतल दर्पण प्रकाश को एक केंद्र बिंदु की ओर अंदर (inward) की ओर परावर्तित करते हैं l

    • बड़ी फोकस दूरी वाला अवतल दर्पण-दाढ़ी बनाने के काम में आता है। मनुष्य का चेहरा दर्पण के ध्रुव व फोकस के मध्य होता है, अत: उसका बड़ा और सीधा प्रतिबिम्ब बनता है l
    • डॉक्टर प्रकाश की किरणों को छोटे अवतल दर्पण से परावर्तित करके आंख, नाक, कान, गले में डालकर आन्तरिक भागों को स्पष्ट देखते हैं।
    • सर्चलाइटों में, मोटरकारों के हेडलाइटों, आदि में अवतल तथा परावलयिक दर्पणों का प्रयोग परावर्तकों के रूप में किया जाता है।
    • दूरबीनों में भी इसका उपयोग किया जाता है।